अध्याय 19

भजन संहिता 119 पर सत्रहवाँ उपदेश। 129-136

Sermons on Psalm 119 · John Calvin

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भजन संहिता 119 पर सत्रहवाँ उपदेश। 129-136

पे।

129 तेरी चितौनियाँ अद्भुत हैं, इसलिये मेरा मन उनको पालता है।

130 तेरे वचनों के खुलने से प्रकाश होता है, और वह भोलों को समझ देता है।

131 मैंने मुँह खोला और हाँफने लगा, क्योंकि मैं तेरी आज्ञाओं से प्रेम रखता था।

132 मेरी ओर दृष्टि कर और मुझ पर अनुग्रह कर, जैसा तू अपने नाम के प्रेमियों के साथ किया करता है।

133 मेरे पैरों को अपने वचन के अनुसार स्थिर कर, और कोई अधर्म मुझ पर प्रभुता न करने पाए।

134 हे प्रभु, मुझे मनुष्यों के अन्याय के व्यवहार से छुड़ा ले, तब मैं तेरी आज्ञाओं को मानूँगा।

अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका, और मुझे अपनी विधियाँ सिखा।

136 मेरी आँखों से जल की धाराएँ बह निकलती हैं, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते।

सच तो यह है कि आठवें खण्ड के इस पहले पद में जो वचन है, वह हमारे बीच अत्यन्त साधारण और सामान्य बात होनी चाहिए। और वास्तव में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो इसे सत्य न माने; फिर भी वह इतना दूर है कि हम सब में से किसी को भी अपने भीतर इसकी अनुभूति नहीं है; अर्थात् यह कि परमेश्वर की व्यवस्था एक अद्भुत बुद्धि है; क्योंकि हम देखते हैं कि उसे कैसे तुच्छ जाना और ठुकराया जाता है। यह बहुत सत्य है कि परमेश्वर सारे पवित्र शास्त्र में पर्याप्त कठोरता से भी बोलता है और दीनता से भी; पर इसका कारण यह है कि वह अपने आपको हमारी सीधी-सादी समझ के अनुकूल बनाना चाहता है। और क्योंकि हम मोटी बुद्धि के और मिट्टी के बने हैं, इसलिए उचित है कि वह ऐसी सरल रीति से बोले कि हम उसे समझ सकें। तो भी इस भाषा में, जिसमें कोई बड़ी महिमा नहीं दिखती और जो संसार की किसी वाक्पटुता से रँगी हुई नहीं है, ऐसे गूढ़ भेद हैं जो हमें आश्चर्यजनक विस्मय से मोहित कर सकते हैं। और सचमुच इन अविश्वासियों और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों के उद्धार की शिक्षा को इतना तुच्छ समझने का कारण यही है कि वे पशु-बुद्धि होने के कारण उसके कहे का स्वाद कभी चखते ही नहीं। देखो, यही वह स्थान है जहाँ से वह घमण्ड और अभक्ति उत्पन्न होती है जो हम आज संसार के अधिकांश भाग में देखते हैं, यहाँ तक कि बहुत थोड़े ही हैं जो परमेश्वर के वचन के प्रति वैसा आदर रखते हैं जैसा उन्हें रखना चाहिए; क्योंकि यह पुरानी कहावत है कि कोई मनुष्य किसी वस्तु से तब तक प्रेम नहीं कर सकता जब तक वह उसे जान न ले। इसलिए जो ऐसे मूर्ख हैं कि उनमें परमेश्वर की सच्चाई को ठीक-ठीक परखने की न समझ है न विवेक, वे उसे यों ही टाल जाते हैं, वरन ऐसे अनमोल भण्डार को अपने पैरों तले रौंद डालते हैं। परन्तु जिन्होंने एक बार जान लिया है कि परमेश्वर पवित्र शास्त्र में हमें क्या सिखाता है, वे दाऊद के साथ भली-भाँति कह सकते हैं कि ये अद्भुत बातें हैं, और ऐसे ऊँचे भेद हैं कि हमें उन पर आश्चर्य करना चाहिए, और वे इस योग्य हैं कि हम में से हर एक अपना पूरा मन उन्हीं में लगा दे। अब वह कहता है कि इसी कारण उसका मन परमेश्वर की चितौनियों को पालता है। इसका अर्थ केवल यह कहने से बड़ा है कि मैंने उन्हें माना है; क्योंकि वह यह जताता है कि उसने उन्हें (जैसा हम कहते हैं) हार्दिक लगन से माना है। और देखो, परमेश्वर की शिक्षा के विषय में हमें ऐसा ही समझना चाहिए: केवल यह धारणा रखना ही नहीं कि वह उत्कृष्ट है और परम तथा उच्च सम्मान के योग्य है, वरन उससे हमारे हृदय गहराई से छू जाएँ, ताकि हमारे मन में ऐसा भय और ऐसी आज्ञाकारिता जड़ पकड़े कि भविष्यद्वक्ता यशायाह का वह वचन हम में पूरा हो, कि हम अपने परमेश्वर की वाणी से थरथराएँ। यही, सार रूप में, इन आठ पदों के पहले पद की विषयवस्तु है जिसे अब हम हाथ में लेने जा रहे हैं; अर्थात् यह कि विश्वासी, जिनकी आँखें परमेश्वर ने खोल दी हैं, जान लें कि पवित्र शास्त्र कोई साधारण शिक्षा नहीं रखता, वरन ऐसी बुद्धिमत्ता की शिक्षा रखता है जो सारे संसार में आदर और सम्मान के योग्य है। अब जब हम एक बार यह जान लेंगे कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था में अपने स्वर्गीय भेदों को खुलकर प्रकट करता है, तो यह पूर्ण रीति से उचित है कि हम अपनी ओर से प्रभावित हों, और जब हमारा परमेश्वर हमसे बोलता है तो सुनने के लिए प्रेरित हों; हाँ, और इस रीति से कि वह छोटी और हल्की और महत्वहीन बातों की चर्चा नहीं करता, वरन अपने वे भेद हमारे सामने खोलता है जो हमारी पहुँच और समझ से बहुत परे हैं, यदि उसने अपनी अनन्त भलाई से हम पर यह कृपा न की होती कि अपने आपको हमारी समझ के अनुकूल बना ले। अब दाऊद दूसरे पद में आगे कहता है:

“तेरे वचनों के खुलने से प्रकाश होता है, और वह अत्यन्त भोलों को समझ देता है।” इसमें वह यह जताता है कि यदि हम परमेश्वर के उन सब भेदों को नहीं समझते जो वह अपने वचन में हमें दिखाता है, तो हमें तुरन्त यह नहीं कहना चाहिए कि वह शिक्षा हमारे लिए निष्फल है। क्यों? क्योंकि उसमें हम जो थोड़ा-सा स्वाद पाएँगे वही हमारे लिए लाभदायक होगा। परमेश्वर के वचन से कुछ लाभ और उन्नति पाने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम बड़े पण्डित या सिद्ध शिक्षक हों; क्योंकि उसमें हमारा प्रवेश चाहे कितना ही छोटा हो, हम उसी से बुद्धिमान और सुविचारशील हो जाएँगे। देखो, दूसरे पद का सार यही है। और यह ऐसा स्थान है जिसे हमें भली-भाँति ध्यान में रखना चाहिए; क्योंकि जैसे बहुत से लोग परमेश्वर के वचन को कुछ नहीं गिनते क्योंकि उन्होंने उसमें निहित भेदों का स्वाद कभी चखा ही नहीं, वैसे ही कुछ ऐसे भी हैं जो यह कहकर बहाना बनाते हैं कि परमेश्वर का वचन बहुत अस्पष्ट और कठिन है, यहाँ तक कि वह उन्हें उससे भगा देता है और वे उसके निकट आने का साहस नहीं करते।

कोई कहेगा, हाय, मैं तो बहुत अज्ञानी प्राणी हूँ, या मैं उतना तेज बुद्धि का नहीं हूँ जितना लोग मुझे समझते हैं; या फिर मैं तो एक साधारण विद्यार्थी हूँ, इसलिए इतने ऊँचे भेदों को नहीं समझ सकता। देखो, बहुत से लोग यही बहाने बनाते हैं, ताकि परमेश्वर के वचन से परिचित न होना पड़े। निस्सन्देह हमें ऐसे लोग मिलेंगे जो ऐसे बहाने और भागने के छिद्र केवल इसलिए काम में लाते हैं कि वे अनजान बने रहें और अपनी आँखें कसकर बन्द रखें, चाहे परमेश्वर का प्रकाश उन पर चमकता ही क्यों न हो।

फिर एक और प्रकार के लोग हैं जो परमेश्वर के वचन से बिलकुल दूर रहेंगे, इस भय से कि यदि वे एक बार उसमें प्रवेश करेंगे तो वह भूलभुलैया के समान होगा, जिसमें वे फँसे रह जाएँगे और पूरी तरह घबरा जाएँगे। इसलिए इसी कारण हम दाऊद के इस वचन पर भली-भाँति विचार करें; अर्थात् यह कि चाहे हम ऐसी सिद्धता तक न पहुँचें कि जो कुछ पवित्र शास्त्र में लिखा है वह सब समझ और जान सकें, और उसमें पूरी तरह ऐसे अभ्यस्त हो जाएँ कि हमसे कुछ छूटा ही न हो; परन्तु हम व्यवस्था से भली-भाँति परिचित हों, और भविष्यद्वक्ताओं का सच्चा और निस्सन्देह अर्थ और भावार्थ भी रखें, वरन सुसमाचार को अपनी उँगलियों पर जानते और समझते हों: तो भी, मैं कहता हूँ, यदि हम इस उत्कृष्टता को न पहुँचे हों, तब भी इस कारण हम ज्योतिर्मय होना न छोड़ें।

इसलिए जब हम देखें कि परमेश्वर हमें बुलाता और लुभाता है और अपना वचन हमें सिखाने को तैयार है, तो हम साहस के साथ निकट आएँ; और यह जान लें कि जब हम उसका थोड़ा-सा भी स्वाद चख लेंगे तो वह हमारे उद्धार के लिए होगा, ताकि हम सर्वथा अन्धे न रहें, वरन यह जान सकें कि अनन्त जीवन का सही मार्ग कौन-सा है। संक्षेप में, हम ज्योतिर्मय होंगे, जैसा दाऊद इस स्थान में कहता है। और इससे हम देख सकते हैं कि आज पोपवाद में इस विषय में कितना बड़ा दुरुपयोग फैला हुआ है, जब वे मसीही जगत के अधिकांश लोगों को पवित्र शास्त्र पढ़ने से इस बहाने रोकते हैं कि वह उसमें बिलकुल घबरा जाएगा; और फिर यह कि वे कभी उसका थोड़ा-सा भी स्वाद नहीं पा सकते, क्योंकि वह उनके हस्तक्षेप करने के लिए बहुत ऊँची बात है।

अब यह तो पवित्र आत्मा को खुला झूठा ठहराना है, जिसने दाऊद के मुख से वह बात कही और घोषित की जो हम पहले सुन चुके हैं, कि परमेश्वर के वचन में पहला प्रवेश ही प्रकाश देता है; यहाँ तक कि जैसे ही हम उसका केवल एक ही वाक्य समझ लें, वही हमें अनन्त जीवन की ओर ले चलने और मार्ग दिखाने के लिए पहले से ही पर्याप्त है। अब जब हम देखते हैं कि शैतान पोपवादियों को कैसे वश में किए हुए है, कि वे ऐसे आवरण के नीचे साधारण लोगों को परमेश्वर का वचन पढ़ने से हटाते हैं, वरन इतने क्रूर अत्याचार के साथ उसे उनके लिए वर्जित करते हैं: तो हम अपनी ओर से, जिनके पास ऐसी भली और दृढ़ नींव है, बहुत सावधान रहें कि कहीं डगमगा न जाएँ, और जान-बूझकर सदा अनजान न बने रहें; यह सोचते हुए कि परमेश्वर ने हम पर अपने आपको खुले रूप से और विस्तार से प्रकट किया है, और वह अब भी अधिकाधिक हमारा भला परमेश्वर बना रहता है, और अपनी पाठशाला में उन्नति करने के लिए हमें इतना अवकाश और इतना लम्बा समय देता है।

और ऐसा क्यों? क्योंकि जब अकेला द्वार ही उजला और चमकीला है, तो जब हम कुछ और आगे बढ़ेंगे तब क्या होगा? जब प्रवेश करते ही हमें उद्धार मिलता है, तो मैं तुमसे पूछता हूँ, जब हम आधा मार्ग पार कर चुके होंगे तब हमारी दशा कैसी होगी? और दाऊद इसे और अच्छी रीति से व्यक्त करने के लिए कि यहाँ बड़े पण्डितों की बात नहीं है, विशेष रूप से कहता है कि वह साधारण और भोले लोगों को शिक्षा देता है, ताकि उन्हें प्रकाश और समझ मिले।

मानो वह यह कह रहा हो कि परमेश्वर ने अपना वचन हमें इस रीति से दिया है, और हमारी समझ के लिए उसे इस प्रकार गढ़ा है, कि कोई अत्यन्त सीधा और अज्ञानी व्यक्ति भी ऐसा नहीं होगा जो अपने आपको परमेश्वर का शिष्य होने के योग्य न पाए, बशर्ते कि हम पूरी दीनता और नम्रता के साथ उसके पास आएँ। क्योंकि दाऊद यह कहकर कि परमेश्वर का वचन दीनों को समझ देता है, भली-भाँति दिखाता है कि यदि हम अपने मन के घमण्ड में, अपने तीक्ष्ण सिर पर भरोसा करके उसके पास आएँ, जैसा इस विषय में बहुत से घमण्डी और अभिमानी लोग करते हैं, जो परमेश्वर के अधीन होने और उसके वचन को मानने के बदले उसी पर शासन करना चाहेंगे: तो निस्सन्देह हम अन्धकार में छोड़ दिए जाएँगे। जिन लोगों की मैं पहले चर्चा कर चुका हूँ, वे निरन्तर अत्यन्त मूर्ख बने रहते हैं तो हम इससे लज्जित न हों। पर हमें अपनी ओर से यह जानना चाहिए कि हमें अपने आप में दीन और नीचा किया जाना है, ताकि परमेश्वर हमें ज्योतिर्मय करे। और तब हम सन्देह न करें कि जब हम अपने आपको सच्चे और कर्तव्यनिष्ठ शिष्य दिखाएँगे तो परमेश्वर को सदा एक भले गुरु की भूमिका निभाने को और भी तत्पर पाएँगे।

अब तुरन्त आगे आता है, “मैंने मुँह खोला और हाँफने लगा”; वह मुश्किल से साँस ले पा रहा था। और इससे उस उत्कट उत्साह का संकेत मिलता है जो उसमें था, अर्थात् परमेश्वर की व्यवस्था की भली-भाँति शिक्षा पाना। अब यहाँ दाऊद दिखाता है कि हम कैसे ज्योतिर्मय किए जाएँ, अर्थात् जब हम दीन और नम्र जाने जाएँ, अपनी घटी और आवश्यकता को अनुभव करते हुए, तब हम अपने परमेश्वर की महिमा के सामने आहें भरें और कराहें, और उससे विनती करें कि वह हमें सिखाए। क्योंकि यदि हम सचमुच और सच्चे मन से उसके शिष्य बनना चाहें और उसके वचन को सब वस्तुओं से ऊपर रखें, तो हमारे ठीक और सिद्ध चलने के लिए हमें बहुत विद्वान होने की आवश्यकता नहीं होगी।

दाऊद भली-भाँति कह सकता था, “हे प्रभु, जो कुछ तूने अपनी व्यवस्था के द्वारा मुझे दिखाया है उसे समझने की मैंने अभिलाषा की है,” और फिर भी केवल इसी कथन से सन्तुष्ट न होता। परन्तु वह विशेष रूप से कहता है कि उसने मुँह खोला, मानो कोई क्षीण हुआ प्राणी जो और सह नहीं सकता। और फिर कहता है कि उसने साँस भीतर खींची, कि वह इतना उत्साही था कि मानो उसकी वाणी ही उससे छिन गई। इसमें सन्देह नहीं कि दाऊद का यहाँ वही एकनिष्ठ भाव अभिप्रेत था जिससे वह प्रभावित था: इस कारण नहीं कि वह अपनी प्रशंसा करना चाहता था, वरन इसलिए कि अपने उदाहरण से हमें दिखाए कि परमेश्वर के प्रति हमारा कर्तव्य और दायित्व क्या है; अर्थात् यह कि हम उसके वचन से अपनी उन्नति करने का यत्न करें।

तो अब हमें यहाँ यह ध्यान देना है कि हम तब ही परमेश्वर के वचन से प्रज्वलित होंगे जब हमें वैसी ही तीव्र अभिलाषा होगी जैसी यहाँ बताई गई है और जैसी पहले कही जा चुकी है। कि परमेश्वर का वचन हमारे लिए संसार की सारी सम्पत्ति से अधिक प्रिय और बहुमूल्य, और पृथ्वी की सब मिठास से अधिक मीठा होना चाहिए। जब हमारी ऐसी अभिलाषा होगी, तब हम परमेश्वर को सदा उस बात को पूरा करने के लिए तत्पर पाएँगे जो पवित्र कुँवारी के गीत में कही गई है, कि उसने भूखों और रिक्तों को तृप्त और सन्तुष्ट किया है। परमेश्वर उन्हें तृप्त करेगा और भर देगा जो केवल इस वर्तमान जीवन से सम्बन्धित वस्तुओं के भूखे हैं। और क्या तुम समझते हो कि जब हम उसकी शिक्षा के अभिलाषी होंगे, यह जानते हुए कि वह सबसे मुख्य लाभ है जिसकी हम कामना कर सकते हैं और जिस पर हमें अपना सारा मन लगाना चाहिए, तो वह हमें भूखा मरने देगा? क्या तुम मानते हो कि वह हमें ऐसी पवित्र अभिलाषा न देगा, ऐसी अभिलाषा जिसे वह सबसे बढ़कर स्वीकार करता है?

परन्तु साथ ही हम यह भी विचार करें कि आज हम वह लाभ और उन्नति अनुभव नहीं करते जो दाऊद इस स्थान में हमारे लिए लाता है: क्योंकि सचमुच हम परमेश्वर की इच्छा खोजने में अत्यन्त ठण्डे हैं। और सच कहूँ तो, मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या सौ में से एक भी मिल सकता है जो इसकी अभिलाषा रखता हो, हाँ, ऐसा जिसमें केवल यही भाव हो कि परमेश्वर से सीखे? इसके विपरीत हम देखते हैं कि हमें अटकाए रखने के लिए सबसे छोटे-से-छोटे तुच्छ खिलौने की भी आवश्यकता नहीं, क्योंकि हम सब प्रकार की व्यर्थता से इतने भरे हैं कि शोक की बात है; और शैतान हमारे सामने जो कुछ भी रखे, हम उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं और उससे हर भली और भक्तिपूर्ण बात से हट जाने का अवसर ले लेते हैं।

तो जब हम अपने को ऐसा ठण्डा पाएँ, क्या यही उस उत्कट लगन से आना है जो दाऊद ने हमें यहाँ बताई है? हाय, वह हमें कहाँ मिलेगी? जब हम देखते हैं कि परमेश्वर से सचमुच शिक्षा पानेवाले इतने कम हैं, तो क्या हमें लज्जित नहीं होना चाहिए? जबकि इतने थोड़े लोग हैं जिनके मन उसकी शिक्षा की सच्ची अभिलाषा से मर्म तक छुए गए हैं? परन्तु इससे भी अधिक हमें यह विचित्र समझना चाहिए कि परमेश्वर तो इतना प्रेममय और कृपालु है कि हमारी उपेक्षा को सहता है, और हम उसकी स्वर्गीय शिक्षा की अभिलाषा में मुँह खोलने के बदले, जैसा दाऊद ने किया, ऐसी वस्तुएँ माँगने को मुँह खोलते हैं जो परमेश्वर की महिमा को ठेस पहुँचाने और दुःख देने के सिवा और कुछ नहीं करतीं: क्योंकि उसी में हमारा सारा आनन्द है और उसी पर हम अपनी सारी शक्ति और बल लगाते हैं। तो जब हम इस रीति से परमेश्वर को छोड़ देंगे और इस संसार की नश्वर वस्तुओं के पीछे पड़ेंगे, हाँ, उन वस्तुओं के जो हानि ही पहुँचा सकती हैं और अनन्त विनाश में ले जाती हैं, तो क्या हम इस योग्य नहीं कि परमेश्वर हमें अत्यन्त दयनीय और अभागे दीनों के समान त्याग दे और छोड़ दे? इसलिए यह शिक्षा यहाँ व्यर्थ नहीं रखी गई।

तो हम समझ लें कि परमेश्वर यहाँ दाऊद के उदाहरण से हमें यह उपदेश देना चाहता है कि यदि हम उसके वचन से भली-भाँति शिक्षा पाना चाहते हैं, तो हमें यहाँ बताई गई ऐसी नम्रता के साथ उत्कट अभिलाषा और उत्साह लेकर उसके पास आना चाहिए, यह जानते हुए कि यह ऐसा लाभ है जो अन्य सब से बढ़कर ठहराए जाने के योग्य है, अर्थात् हमारे प्रति परमेश्वर की इच्छा और प्रेम को जानना, क्योंकि उसी में हमारा सारा उद्धार निहित और स्थित है। अब चौथे पद में आगे आता है:

“मेरी ओर दृष्टि कर और मुझ पर अनुग्रह कर, जैसा तू अपने नाम के प्रेमियों के साथ किया करता है।”

यहाँ दाऊद भली-भाँति दिखाता है कि परमेश्वर की सब सन्तानों की अभिलाषाएँ और विनतियाँ क्या होनी चाहिए, अर्थात् यह कि वे परमेश्वर की केवल दया पर निर्भर रहें, और जानें कि उनका सारा सौभाग्य उसी में है, और इस आधार और नींव पर अपने आपको स्थिर रखें कि परमेश्वर अपनी आँख उन पर लगाए है कि उन्हें मार्ग दिखाए और उन पर शासन करे।

अब यह बात बहुत ध्यान देने योग्य है, क्योंकि मनुष्य सामान्यतः अपने को यह विश्वास दिला लेते हैं कि यदि उन्हें वह मिल जाए जो उनका शरीर चाहता है तो वे धन्य होंगे। जैसे पेटू के पास अपना गन्दा पेट इतना भरने को कुछ हो कि वह तन जाए; व्यभिचारी अपनी सारी घिनौनी दुष्टताओं और पशुवत् लम्पटताओं का भोग करे; लोभी इस प्रकार बटोरता रहे कि उसे चिन्ता ही न हो कि क्या मिलता है और माल कैसे हाथ आता है, कि खेत पर खेत मिलाए और दूसरे के लहू से तृप्त हो: देखो, उनके विचार में यही लोग धन्य हैं। हाँ, और यदि वे दुष्टता में इतने न भी डूबे हों कि खुले रूप से परमेश्वर की महिमा को ठेस पहुँचाएँ, तब भी तुम्हें बहुत थोड़े ही मिलेंगे जो अपने को शापित मानें, पर यह मानें कि परमेश्वर को उनकी और उनके उद्धार की चिन्ता है, और कि इसके सिवा और कोई धन्यता या सौभाग्य नहीं कि वे परमेश्वर के हाथ में और उसकी सुरक्षा में हैं।

और इस पाठ को हमें और भी अधिक स्मरण रखना और बार-बार मन में लाना चाहिए, जब दाऊद कहता है, “हे प्रभु, मेरी ओर दृष्टि कर और मुझ पर अनुग्रह कर।” क्योंकि इससे वह हमें जताता है कि यदि हम चाहते हैं कि हमारा जीवन धन्य हो, यदि हम चाहते हैं कि हमारे सब कामों में हमें सफलता मिले, तो देखो, इसी सोते से हमें अपना सारा सौभाग्य खींचना है: अर्थात् परमेश्वर का विधान, क्योंकि हमें किसी रीति से सन्देह नहीं करना चाहिए कि वह हमारी चिन्ता करता है और हमारी रक्षा के लिए अपने आपको लगाता और काम में लाता है। जब हमारी ऐसी दशा हो तब बाकी सब हमारे लिए भला ही होगा: पर यदि यह बात न रहे तो हम बहुत अभागे हैं, चाहे हमें ऐसा ही क्यों न लगे कि हमारे पास उतना है जितना चाहा जा सकता है।

अब, इसी बीच, हम यह ध्यान दें कि दाऊद, परमेश्वर से अनुग्रह करने की विनती करके, यह प्रकट करता है कि जब तक हम इस संसार में हैं तब तक हम बहुत सी विपत्तियों और क्लेशों के अधीन हैं। इसलिए हमें परमेश्वर की दया की बड़ी आवश्यकता है, नहीं तो हम (जैसा हम कहते हैं) इतने भयंकर टकरावों के बीच सारे प्रहार अपने ऊपर ले जाएँगे, जो शोचनीय होगा। अब यह हमारे दो काम आ सकता है: एक तो यह है कि हम, यहाँ नीचे पृथ्वी पर रहते हुए, यह हिसाब लगा लें कि हम यहाँ मानो स्वर्गलोक में नहीं रह सकते, कि जैसा विश्राम और चैन हम मुख्य रूप से चाहते हैं वैसा हमें मिले, हमें किसी बात की घटी न हो, और हम किसी दुःख या अप्रसन्नता के अधीन न हों: नहीं, ऐसा नहीं: वरन इसके विपरीत हम जान लें कि यहाँ परमेश्वर हमें बहुत सी दीनताओं और दुर्दशाओं के अधीन करता है, ताकि हम सदा उसकी दया के लिए उसे पुकारें और उसके पास सदा दौड़ते रहें। देखो, यही पहली बात है जिस पर हमें इस स्थान में विचार करना है, कि विश्वासी बाहरी दिखावे में बहुत दीन और अत्यन्त दयनीय दशा में रहेंगे, जब तक वे यहाँ नीचे जीवित रहें: और परमेश्वर का अभिप्राय है कि हमें इसी दशा में रखे, ताकि हमें जगाए, कि हम उसे पुकारने और पूरी रीति से उससे लिपटे रहने की बहुत गहरी चाह रखें।

अब यदि हम इस विचार को अपने साथ रखें, तो दूसरे स्थान पर हम दाऊद के साथ कह सकते हैं, “हे प्रभु, हम पर अनुग्रह कर”: अर्थात् हम अपनी सब दुर्दशाओं में निश्चित रह सकते हैं कि परमेश्वर हम पर दयालु और अनुग्रहकारी होगा, हाँ, यदि हम उससे माँगें, जैसा परमेश्वर के आत्मा के द्वारा हमें यहाँ सिखाया गया है। विशेष रूप से दाऊद आगे कहता है, “जैसा तू उनके साथ किया करता है जो तेरे नाम से प्रेम रखते हैं।”

यहाँ एक न्याय का वचन रखा गया है: परन्तु इसका अर्थ कभी माप, कभी दशा, क्रम या रीति होता है: अर्थ अस्पष्ट नहीं है: क्योंकि यह ऐसा है मानो वह कहता, “हे प्रभु, मुझ पर दया कर, ठीक वैसे ही जैसे तू उन पर दया करने का अभ्यासी है जो तेरे नाम को पुकारते हैं।” अब हमें इस वचन से यह निकालना है कि दाऊद ने यह विनती केवल अपने लिए नहीं की, वरन हमारे लिए एक सामान्य नियम ठहराया है, जिसे हम परमेश्वर की हर सन्तान पर लागू कर सकते हैं और करना चाहिए, ताकि हर एक अपनी ओर से निश्चित हो कि परमेश्वर उस पर दया करेगा और उसकी आवश्यकता में सहायता के लिए अपना हाथ बढ़ाएगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि पवित्र आत्मा विशेष रूप से घोषित करता है कि यह परमेश्वर की साधारण रीति है कि वह उन सब पर प्रेममय और दयालु हो जो उसके नाम से प्रेम रखते हैं। तो फिर हमारे करने को क्या शेष रहा? निश्चय ही, हमें परमेश्वर के नाम से प्रेम रखना है। और यहाँ हमें यह भी विचारना है कि इस कथन का क्या अर्थ है, परमेश्वर के नाम से प्रेम रखना: क्योंकि हम में से कुछ ऐसे होंगे जो परमेश्वर का भय किसी-किसी तरह मानेंगे, और फिर भी सन्तुष्ट रहेंगे कि कभी उसके निकट न आएँ, यदि उनके वश में हो: हाँ, वे उसके लिए द्वार बन्द करने में भी न हिचकिचाएँगे, और अपने को उससे जितना हो सके उतना दूर रखेंगे।

अब दाऊद यहाँ हमें दिखाता है कि परमेश्वर का सच्चा भय क्या है, अर्थात् यह कि हमें अपनी इच्छा से और श्रद्धा के साथ उससे प्रेम रखना है, बाध्य होकर उससे प्रेम और भय नहीं मानना है, वरन यह कि हम उसके पास आना चाहें और पूरी रीति से अपने को उसकी महिमा के अधीन कर दें। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हम सच्चाई से कह सकते हैं कि हम उससे प्रेम रखते हैं, और प्रेम रखते हुए उसका भय भी मानते हैं। सचमुच ये ऐसी बातें हैं जो अलग नहीं की जा सकतीं, क्योंकि हमारे लिए यह असम्भव है कि हम परमेश्वर का यथोचित आदर करें और जैसा चाहिए वैसा उसका भय मानें, जब तक (जैसा भजन में कहा गया है) हम पहले उसे अपना पिता न मानें, और उसी से सब भलाई और कृपालुता की आशा न रखें। इसलिए पहले तो इससे हमें यह निश्चय मिलता है कि परमेश्वर हमसे प्रेम रखता है, कि हमें उसे अपना पिता मानना है, कि हम अनुभव करें कि हमसे प्रेम करने में वह हमारे उद्धार के सिवा और कुछ नहीं चाहता। और पहली बात के विषय में इतना ही। और फिर इसी से दीनता भी उत्पन्न होती है: जब हम देखते हैं कि परमेश्वर अपने आपको इतना नीचा करता है कि हम अभागे प्राणियों को, पृथ्वी के तुच्छ कीड़ों को, हाँ, दण्डित और सर्वथा खोए हुए लोगों को, शैतान के बन्धुआ दासों को खोजता है, कि परमेश्वर हमें नरक में भी खोजता है, और इतने प्रेम से अपनी ओर खींचता है। और क्या यह अवश्य नहीं कि हम बहुत हठीले हैं, यदि हम उसके पास आने, अपने आपको उसे सौंपने, और उसके हाथ और उसकी सुरक्षा से शासित और संचालित होने के लिए प्रभावित और प्रेरित नहीं होते? देखो, मैं कहता हूँ, हमें परमेश्वर के नाम से कैसे प्रेम रखना चाहिए, ताकि हम उस सौभाग्य से आनन्दित हों जिसकी चर्चा दाऊद यहाँ करता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर अपने विधान के द्वारा हमें सुरक्षित रखने का ध्यान रखता है। और यद्यपि हम यहाँ बहुत सी विपत्तियों से घिरे हैं, बहुत सी रीतियों से पीड़ित हैं और अत्यन्त दुःखी समझे जाते हैं, तो भी परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं में सहायता करने को निकट है। और विशेष रूप से इसे परमेश्वर के नाम से प्रेम रखना कहा गया है, क्योंकि उसकी भली इच्छा को समझने के लिए हमें उसी से साक्षी पानी है। हम परमेश्वर को उसके सार में, या जैसा वह वास्तव में है, नहीं देखते, परन्तु वह हम पर अपने आपको दूसरे साधन से प्रकट करता है: अर्थात् यह कि हम उसे उसके वचन के दर्पण में देखें, जहाँ वह अपने आपको हम पर पर्याप्त खुले रूप से दिखाता है। अब दाऊद इसके तुरन्त बाद आगे कहता है,

“मेरे पैरों को अपने वचन के अनुसार स्थिर कर, और कोई अधर्म मुझ पर प्रभुता न करने पाए।”

यहाँ हम और भी स्पष्ट रूप से वह देखते हैं जिसकी मैं पहले चर्चा कर चुका: अर्थात् विश्वासियों की विनतियाँ क्या होनी चाहिए, ताकि वे व्यर्थ बातों में न पड़ें। क्योंकि हमें अपने भटक जाने के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, क्योंकि हमारा अपना स्वभाव हमें उस ओर बहुत आसानी से खींच ले जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब हम बुराई करने पर उतारू होते हैं तो धीमी चाल से कहीं अधिक तेज चलते हैं: हाँ, हम बड़ी तेजी और उग्रता से दौड़ते हैं, उन अभागों के समान जो मोहित कर दिए गए हों। इसलिए यहाँ हमारे सामने एक उपाय रखा गया है: यह देखते हुए कि हमारा स्वभाव सब बुराई की ओर झुका है और हमें सिर के बल उसकी ओर ले जाता है, हमें केवल यही यत्न करना चाहिए कि अपनी व्यर्थ और दुष्ट वासनाओं पर लगाम लगाएँ: और इसके अतिरिक्त हमें परमेश्वर से माँगना चाहिए कि वह अपने वचन के द्वारा हमें थामे रहे, और किसी अधर्म को हम में राज्य करने न दे। देखो, मैं कहता हूँ, सब विश्वासियों को अपने शारीरिक अभिलाषाओं से लड़ते हुए अपने को किस प्रकार चलाना चाहिए: क्योंकि यदि हम परमेश्वर को खोजना और उसके पास आना चाहें तो उचित है कि हम अपने भीतर की बुराई का पूर्ण रूप से त्याग करें। अब यहाँ दो बातें हैं जो दाऊद माँगता है, एक तो यह कि उसके पैर परमेश्वर के वचन के अनुसार स्थिर किए जाएँ: और फिर यह कि कोई अधर्म उस पर प्रभुता न करे। जिसका अर्थ यही है मानो उसने कहा हो कि परमेश्वर उसे अपने वचन के अनुरूप बना दे और सब परीक्षाओं का सामना करने का सामर्थ्य और बल दे।

अब जब वह कहता है, “मेरे पैरों को अपने वचन के अनुसार स्थिर कर,” तो उसका अर्थ है कि जब तक परमेश्वर अपने पवित्र आत्मा से हमारा संचालन न करे, हम कुछ भी नहीं कर सकते। इसलिए यह पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर का वचन हमें सुनाया जाए, कि हम उसे सुनें और उसे पढ़ने में लगे रहें: परन्तु इसके अतिरिक्त परमेश्वर ही को अपना सहायक हाथ बढ़ाना है: वही उसके प्रचार को प्रभावशाली बनाए और हमारे कानों को भेदे, ताकि हम समझें जो हमारे सामने रखा गया है, और पढ़ते समय हमारी आँखें खोले, और यह सब अपने पवित्र आत्मा के द्वारा। और इस विषय में इतना ही। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर का वचन हमें दिया गया है, तो भी हमें उससे कुछ लाभ नहीं होगा जब तक परमेश्वर हमें उसे देखने की समझ न दे। और इसके अतिरिक्त परमेश्वर की इच्छा का ज्ञान होना और उद्धार का सही मार्ग समझना ही पर्याप्त नहीं: परन्तु परमेश्वर स्वयं भी हमें चलाए और अन्त तक हमारा हाथ थामे रहे। और ऐसा क्यों? क्योंकि जब परमेश्वर ने हमें सच्चाई से शिक्षा दे दी हो, तब भी हम पीछे हटना कभी न छोड़ेंगे, यदि वह स्वयं अब भी हमें न चलाए और सदा हमें अपनी दृढ़ और सामर्थी भुजा से न थामे रहे: क्योंकि हमारा विद्रोही स्वभाव हमें बिलकुल उलटी ओर खींचना कभी न छोड़ेगा। क्योंकि सन्त पौलुस ने, जो परमेश्वर के भय में इतनी उन्नति कर चुका था और उसमें इतना आगे बढ़ा हुआ था कि उसके समय में उसके जैसा कोई न था, फिर भी यह कहना न छोड़ा, “मैं अपने भीतर दो व्यवस्थाएँ देखता हूँ: मैं परमेश्वर की सेवा करना चाहता हूँ, परन्तु एक और बात भी है जो मुझे उलटी ओर ले जाती है, यहाँ तक कि जिस बुराई से मैं घृणा करता हूँ और जिसे नहीं करना चाहता वही करता हूँ: और यदि कोई भलाई करता भी हूँ तो वह उतनी प्रसन्नता के भाव से नहीं होती जितनी मैं चाहता हूँ।” देखो, सन्त पौलुस किस प्रकार अपने विषय में शिकायत करता है, और अन्त में निष्कर्ष निकालकर कहता है, “हाय, मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस बन्दीगृह से कौन छुड़ाएगा?” यदि सन्त पौलुस ने इस प्रकार की बात कही, तो हमारा क्या होगा, जब हम परमेश्वर के आत्मा से बिलकुल संचालित न हों? मैं तुमसे पूछता हूँ, केवल शिक्षा से हमें क्या लाभ होगा? इसलिए उचित है कि परमेश्वर हमें सिखाने के बाद हमारा संचालन भी करे, और फिर हमें अपने पीछे चलने का सामर्थ्य और बल दे, और अपनी व्यवस्था को हमारे हृदयों में स्थिर करे, अंकित करे और खोद दे, जैसा इसके विषय में पवित्र शास्त्र में भली-भाँति लिखा भी है।

दाऊद आगे बढ़कर कहता है, “कोई अधर्म मुझ पर प्रभुता न करने पाए।” वह यह किस उद्देश्य से कहता है? क्योंकि वह पहले परमेश्वर से माँग चुका था कि उसके पैर स्थिर करे, ताकि वह सच्ची और विश्वासयोग्य आज्ञाकारिता में उसकी सेवा करे। निश्चय ही इसका कारण यह है कि जब परमेश्वर हम पर अपना अनुग्रह करता है कि हम उससे लिपटे रहना चाहें, तब भी हम बड़े क्लेशों के बिना इसकी पूर्णता तक कभी नहीं पहुँचेंगे, क्योंकि हमारा सामना करने के लिए ऐसा सामर्थी शत्रु खड़ा है जैसा हमारे विरुद्ध है। यह बहुत सत्य है कि हम और कुछ नहीं चाहते केवल यह कि परमेश्वर से सीखने योग्य बनें, और महान चरवाहे यीशु मसीह से अपने को संचालित होने दें: यह तो पहले से ही एक अच्छा कदम है: पर हम थोड़ा और भली-भाँति विचार करें कि ऐसा अनुग्रह हमें लाभ क्यों नहीं देता। इसका कारण यह है कि शैतान तुरन्त आकर उसमें आग लगा देता है, क्योंकि वह हम में सदा बहुत ईंधन पाता है, क्योंकि हमारे स्वभाव में बहुत से दोष और अपूर्णताएँ भरी हैं, जब तक परमेश्वर हमें इस शरीर से पूरी रीति से निकाल न ले। क्योंकि हमारी सब अभिलाषाएँ और वासनाएँ परमेश्वर के विरुद्ध इतने ही विद्रोह हैं कि हम उससे लड़ना कभी बन्द नहीं करते, यहाँ तक कि यदि किसी समय एक ओर हम भलाई करने का यत्न करते हैं, तो दूसरी ओर बुराई करने की ओर खिंच जाते हैं। तो फिर हमें क्या करना चाहिए? हमें इसकी आवश्यकता है कि परमेश्वर हमें ऐसा सामर्थ्य और स्थिरता पहनाए कि हम अपने भीतर की इन सब विरोधी बातों और दुष्ट वासनाओं का सामना कर सकें: कि हम केवल सीखने योग्य और उससे संचालित ही न हों, वरन ऐसे कवच और हथियार से भी सुरक्षित हों जो शैतान और उसकी सब चतुर चालों और बलों से लड़ने के योग्य हैं, ताकि हमारे शत्रु की हम पर कोई पकड़ न रहे: ताकि जैसा सन्त पौलुस कहता है, हमारे पास टोप और ढाल दोनों हों, और हम सब अंगों पर हथियार बाँधे और सुसज्जित हों। और जब हम इस प्रकार सुसज्जित होंगे, तब देखें कि हम अपने परमेश्वर से पूरी रीति से कैसे लिपटे रहें। और शैतान हमारे विरुद्ध चतुराई से जो कुछ भी रचे, और हमारे भीतर जो भी रुकावटें और अड़चनें हों: तो भी हम सन्देह न करें कि हम विजय पाएँगे।

इसलिए यह बिना कारण नहीं कि दाऊद यहाँ इन दो बातों को एक साथ जोड़ता है: परमेश्वर की महिमा से संचालित होना, और सबसे बढ़कर इतना सामर्थ्य से दृढ़ किया जाना कि कोई अधर्म उस पर प्रभुता न कर सके, वरन वह उन सब परीक्षाओं को जीतने में भली-भाँति समर्थ हो जिनसे शैतान किसी भी रीति से उस पर आक्रमण कर सके। अब यदि दाऊद को बिना कपट के परमेश्वर से ऐसी विनती करनी पड़ी, तो इससे हम समझ सकते हैं कि हमारी स्वतंत्र इच्छा में कितना बल और प्रभाव है, जिसकी पोपवादी इतनी बड़ाई करते हैं। जब हम परमेश्वर की सेवा की बात करते हैं, तो वे तुरन्त समझ लेते हैं कि वह हमारे अपने सामर्थ्य और बल से होती है। ऐसा नहीं कि वे यह स्वीकार नहीं करते कि उन्हें किसी न किसी प्रकार परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता है, पर वे परमेश्वर के साथी और सहकर्मी बनना चाहते हैं, और कहते हैं कि यदि वे अपनी ओर से अपने सामर्थ्य और बल से कुछ न करें तो सब कुछ व्यर्थ है। और इसके विपरीत, जब तक परमेश्वर का आत्मा हमें न चलाए और न संचालित करे, हमें अवश्य फिसलना है, हाँ, और सर्वथा गिर जाना है। हम यहाँ केवल आधी सहायता की बात नहीं करते: वरन परमेश्वर ही को पूरा संचालन और अगुवाई अपने ऊपर लेनी है। और जब उसने हमें अपने हाथ में ले लिया हो? तो निस्सन्देह एक दूसरे अनुग्रह की अपेक्षा करनी चाहिए: अर्थात् हम उसके पवित्र आत्मा से सामर्थी किए जाएँ और इस रीति से संचालित हों कि भले कामों में स्थिर रहने के लिए हमें अजेय बल मिले। तथापि इस पद में विचार करने को एक बात और शेष है: और वह यह कि दाऊद चाहता है कि उसके सब पैर परमेश्वर के वचन के अनुसार स्थिर किए जाएँ।

अब इससे वह दिखाता है कि यदि हम अपनी ही बुद्धि और कल्पनाओं से चलाए जाएँ तो हम दौड़ने में बहुत तेज होंगे: परन्तु अपना उद्धार खोजने के लिए नहीं। और ऐसा क्यों? क्योंकि हम बिना किसी मार्ग और पगडण्डी पर चले खेतों के आर-पार दौड़ते हैं। देखो, पोपवादियों का यही ढंग है, क्या वे सच्चाई से कह सकते हैं कि उनके पैर परमेश्वर के वचन से स्थिर किए गए हैं? वरन इसके विपरीत उनके मसीह-विरोधी की घृणित बात उन्हें सही मार्ग से हटा देती है, कि वे इधर-उधर भटकें और भूलें, और अन्त में अपने आपको सिर के बल नरक की तलहटी में डाल दें: इस प्रकार कि जिसे वे परमेश्वर की सेवा कहते हैं, जब दोनों छोर मिलाए जाएँगे, तो हम पाएँगे कि वे परमेश्वर के विरुद्ध उतनी ही निन्दाएँ हैं। और यदि उनसे पूछा जाए, “अब महाशय, मैं आपसे पूछता हूँ, आपको अपना मिस्सा, अपना सन्तों से प्रार्थना करना, मृतकों के लिए प्रार्थना, मूर्तियाँ, सन्तों को देवता बनाना, उनके लिए वेदियाँ खड़ी करना, आपकी मशालें, मोमबत्तियाँ, तीर्थयात्राएँ, और आपका बाकी सारा भिखमंगा कूड़ा-कबाड़ किससे मिला?” तो वे क्या उत्तर देंगे? वे अपनी इस थिगलीगिरी के समर्थन में पवित्र शास्त्र में से एक बिन्दु भी नहीं दिखा सकते। तब वे क्या कहेंगे? निश्चय ही, हम अपने पुरखों और उनकी परम्पराओं का अनुसरण करते हैं। हाँ, परन्तु यहाँ विशेष रूप से लिखा है कि हमें परमेश्वर के वचन के अनुसार चलाया जाना है। क्योंकि हमारा सारा जीवन बहुत बड़ी अव्यवस्था है: और हम पशुओं के समान भटकते और बहकते हैं, जब तक परमेश्वर का वचन हमारा एकमात्र नियम और सीधी पटरी न हो। इसलिए हम भली-भाँति सावधान रहें कि इन अभागे शापित लोगों के समान न भटकें, जो उजले दिन में आँखें बन्द कर लेते हैं, वरन जो अपने आपको तेज करते और परमेश्वर के विरुद्ध हठ से अपनी राय पर अड़े रहते हैं, जब वह उन्हें सुधारने और यह दिखाने चलता है कि उन्होंने अब तक अपना सारा समय और परिश्रम व्यर्थ गँवाया है। और यद्यपि वे पूरी तरह ऐसे कठोर हो गए हैं, तो भी हम वैसे न हों: परन्तु हम जान लें कि कोई और अगुवाई भली नहीं, सिवाय उसी के जो परमेश्वर हमें दिखाता है, जैसा मूसा से कहा गया था, “देख, यही वह मार्ग है जिस पर तुझे चलना है।” अब इसके तुरन्त बाद आगे आता है,

“हे प्रभु, मुझे मनुष्यों के अन्याय के व्यवहार से छुड़ा ले, तब मैं तेरी आज्ञाओं को मानूँगा।”

दाऊद इस कथन-शैली से भली-भाँति प्रकट करता है कि परमेश्वर की सन्तानों पर, जब तक वे इस संसार में जीवित रहें, सदा बहुत से और नाना प्रकार के आक्रमण, सताव और दुःख आते रहेंगे, और परमेश्वर का अभिप्राय है कि उसे सब विश्वासियों के देखने के लिए मानो एक दर्पण ठहराए। क्योंकि जब हम देखते हैं कि उसके साथ कैसा व्यवहार हुआ, और उसकी दशा और स्थिति भी देखते हैं, तो निस्सन्देह परमेश्वर ने उसे मानो मंच पर खड़ा किया है, ताकि हम उसके उदाहरण के अनुसार ढाले जाएँ: जैसा वह वास्तव में हमारे प्रभु यीशु मसीह का एक प्रतिरूप भी था। अब हम जानते हैं कि हमारा प्रभु यीशु परमेश्वर की सब सन्तानों का सच्चा आदर्श था, जिसके स्वरूप के अनुसार हमें बनाया जाना है, विशेषकर इस बात में, अर्थात् क्लेशों में, वेदनाओं में और दुर्दशाओं में, जैसा सन्त पौलुस रोमियों को इस विषय में साक्षी देता है। जब बात ऐसी है, तो हम जान लें कि जब तक हमें इस संसार में रहना है, हम दुष्ट और अभक्त लोगों से सदा पीड़ित और व्याकुल किए जाते रहेंगे, और इसे कोई विचित्र बात न समझें, क्योंकि दाऊद ने हमें मार्ग दिखाया है: और परमेश्वर ने ठहराया है कि हमें उसके उदाहरण के अनुसार गढ़े, इसलिए जो क्लेश और सताव हमें आज सहने हैं, वे हमें नए और विचित्र न लगें।

अब इसी पर यह निकला कि वह उसकी आज्ञाओं को मानेगा। जिससे उसने यह जताया कि जब परमेश्वर उसका रक्षक होगा, मनुष्यों की द्वेष-भावना से उसकी सहायता करेगा, तब वह ऐसे उपकार को नहीं भूलेगा, वरन उसकी आज्ञाओं को मानेगा। तो हम सीखें कि जब परमेश्वर हमें बनाए रखे और हमारी रक्षा करे, तब हमें उसकी आज्ञा मानने और उसका भय रखने के लिए और भी बहुत अधिक तत्पर होना चाहिए: और यह सदा हमें और अधिक गम्भीर विचार के लिए उभारे: कि जैसे वह प्रतिदिन हम पर अपने उपकार और बढ़ाता जाता है, वैसे ही उसकी सेवा करने की हमारी लगन भी बढ़े, और इसके अतिरिक्त और अधिक उन्नति पाए और प्रज्वलित हो। अब इसके तुरन्त बाद आगे आता है,

“अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका, और मुझे अपनी विधियाँ सिखा।”

इससे वह उस बात को पक्का करता है जिसकी वह पहले चर्चा कर चुका: और इसलिए हमें इस पद पर अधिक रुकने की आवश्यकता नहीं: क्योंकि वह दिखाता है कि वह इसी से सन्तुष्ट है कि परमेश्वर उसकी ओर देखे और उसकी चिन्ता करे। और इसके सत्य होने का प्रमाण यह है कि तुम देखते हो, जो वह माँगता है वही है जिसकी मैं पहले चर्चा कर चुका हूँ, अर्थात् परमेश्वर की सन्तानों की मुख्य सुरक्षा यह है कि वे परमेश्वर के इस विधान पर अपने को स्थिर रखें, जब वे निश्चित रूप से जानते हों और साहस से कह सकते हों कि परमेश्वर हमारी ओर है और हमें कभी न भूलेगा: और हम चाहे कितने ही अभागे प्राणी क्यों न हों, तो भी वह हमारी चिन्ता करता है, हम पर दृष्टि रखता है, हाँ, हम पर आँख भी रखता है, और न हमें कोई हानि पहुँचने देगा, वरन हमारी सब आवश्यकताओं और घटियों की पूर्ति करेगा। और यदि हम यह भाव अपने साथ रखें, तो हमारे पास वह सबसे बड़ा लाभ है जिसकी कामना की जा सकती है। और यही है जिसकी चर्चा दाऊद इस स्थान में करता है जब वह कहता है, “हे प्रभु, अपने दास पर अपने मुख का प्रकाश चमका।” क्योंकि उसका अर्थ है कि जब वह परमेश्वर की सुरक्षा का अनुभव करेगा, तब वह निश्चित होगा कि परमेश्वर उसकी ओर देखता है, और यही उसे सब चिन्ताओं से छुड़ाएगा। अब हम यह ध्यान दें कि यह कथन-शैली एक उपमा से ली गई है, जैसे जब हम अपने संकट और विपत्ति के समय परमेश्वर के मुख को अन्धकारमय समझते हैं: और कोई सान्त्वना नहीं मिलती जिससे हम उसमें आनन्दित हों, तो हमें तुरन्त ऐसा लगता है कि उसके और हमारे बीच बड़े और भयानक घने बादल हैं, और हम सहज ही मान लेते हैं कि परमेश्वर हमें नहीं देखता। इसलिए दाऊद, जहाँ तक मांस और लहू की पहुँच हो सकती थी, कहता है, “अपने मुख का प्रकाश चमका, अर्थात् मुझे अनुभव करा कि तुझे मेरी चिन्ता है।” और अन्त में वह कहता है,

“मेरी आँखों से जल की धाराएँ बह निकलती हैं, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते।”

यहाँ वह प्रकट करता है कि उस अभिलाषा के अतिरिक्त, जो हमें रखनी चाहिए और जिससे प्रभावित होकर हमें परमेश्वर के वचन के अनुसार उससे लिपटे रहना चाहिए, यह हमारे लिए कितनी बड़ी हानि और दुःख की बात होनी चाहिए कि हम उन ठट्ठा करनेवालों को देखें जो परमेश्वर के वचन को इस प्रकार तुच्छ जानते और ठुकराते हैं, उसे पैरों तले रौंदते हैं, और इसके अतिरिक्त दुष्टों को सब भली व्यवस्था और न्याय को उलट-पुलट करते देखें। इसलिए देखो, परमेश्वर की सच्ची सन्तानों को केवल इतने से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए कि वे स्वयं ठीक चलें और परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार ढलें: परन्तु उन्हें हर सम्भव रीति से यह परिश्रम भी करना चाहिए कि सारे संसार को अपने साथ उसी दशा में लाएँ, ताकि परमेश्वर की सारी सृष्टि एक मन होकर उसकी महिमा का आदर करे और उसे महिमा दे। और इसलिए जब वे परमेश्वर का तिरस्कार होते देखें, तो उन्हें उस पर शोक करना चाहिए, और केवल खेद और खीझ ही नहीं, वरन मानो प्राण-घातक रूप से घायल भी होना चाहिए। क्योंकि दाऊद का यहाँ यह कहना बिना कारण नहीं कि उसकी आँखों से जल की नदियाँ बह निकलीं: इससे उसका अर्थ है कि वह इतना शोकित और व्याकुल था कि कहा नहीं जा सकता। अब यदि दाऊद को परमेश्वर को ठुकराया जाते देखकर इस प्रकार कराहने और रोने का कारण था, तो मैं तुमसे पूछता हूँ, हमारे इस समय का क्या होगा? हम कैसी चरम सीमा तक पहुँच गए हैं? क्या आज अभक्ति या अधर्म अपनी पूरी माप तक नहीं बढ़ गया? क्या हम नहीं देखते कि दुष्ट लोग हर प्रकार की दुष्टता की बहुतायत में बढ़ गए हैं? एक प्रकार के लोग परमेश्वर और सुसमाचार से बिगड़ बैठे हैं: दूसरे प्रकार के लोग मुँह से मान लेंगे कि वे उसे स्वीकार करते हैं या चाहते हैं: और फिर भी हम उन्हें पोपवादियों से सौ हजार गुना बुरा देखते हैं: निस्सन्देह हमारे बीच ऐसे लोग मिलेंगे, ऐसे देहधारी शैतान, इतने दुष्ट और घृणित कि आकाश तक उनके विरुद्ध दण्ड के लिए परमेश्वर की दुहाई देता है। जब हम इन शापित राक्षसों को परमेश्वर और भक्ति को कुछ न गिनते देखें, तो क्या हमें दाऊद के समान दुःखी न होना चाहिए? हम जान लें कि जब हम में यह भक्तिपूर्ण शोक होगा, कि हम उसकी व्यवस्था को इस प्रकार नष्ट और उलटा किया जाता और उसे वैसा आदर न पाते देखें जिसके वह योग्य है, तो परमेश्वर हमारी पुकार और कराह को आशीष देगा। फिर भी परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों को एक दिन हिसाब देना होगा, जब वे किसी और ही रीति से आनन्द करेंगे, और तब उन्हें निश्चय होगा कि उन्हें परमेश्वर की सन्तानों की कराहों और विलापों का लेखा देना है: जब वे न केवल परमेश्वर के नश्वर प्राणियों को सताते हैं, वरन स्वयं जीवित परमेश्वर को और उसके उस पवित्र आत्मा को भी जो हम में वास करता है, जिससे ऐसी सब आहें और कराहें निकलती हैं। और इसलिए जब हम यह देखकर विलाप करें कि परमेश्वर की व्यवस्था दुष्टों द्वारा इस प्रकार नष्ट की जा रही है, तो हम उन्हें परमेश्वर के न्याय के हवाले कर दें, जिसके सामने वे उन सब कराहों और आहों का हिसाब देंगे जो हमने उँडेली हैं, जिन्हें वे अपनी ठट्ठा-हँसी से घोंट देना और दबा देना चाहते थे। क्योंकि चाहे वे परमेश्वर की व्यवस्था को जितना उनके वश में है पैरों तले रौंदें, तो भी उसके लिए जो शोक और दुःख हम सहते हैं वह आकाश तक चढ़कर उनसे बदला लेने की दुहाई देगा।

इस हितकर शिक्षा के अनुसार, आओ हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सामने दण्डवत् करें, अपने अपराधों को मानते हुए, उससे विनती करें कि वह हमें प्रसन्न होकर ऐसा बनाए कि हम अपनी दुर्दशाओं को पहले से अधिक अनुभव करें, हाँ, ताकि हम उन्हें उसके सामने खोल दें, और वहाँ उपाय ढूँढ़ें जहाँ वह मिल सकता है: अर्थात् यह कि जब हमारे इस भले परमेश्वर ने हमें अपने ज्ञान में ज्योतिर्मय कर दिया है, तो वह प्रसन्न होकर उसकी चमक को हम में अधिकाधिक बढ़ाए, और हमें इस प्रकार दृढ़ करे कि हम सही मार्ग से कभी न हटें। और यद्यपि हमें बहुत से आक्रमणों का सामना करना है, और शैतान असंख्य रीतियों से हमें व्याकुल करने के लिए चतुराई से यत्न करना कभी बन्द नहीं करता: तो भी हम उससे विनती करें कि वह हमें उनका सामना करने के लिए अजेय बल दे, जब तक कि हम पूरे विजयी न हो जाएँ, और उसी से संयुक्त होकर उसके राज्य में अनन्त आनन्द और सौभाग्य में जीवन बिताएँ।

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