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एक सौ उन्नीसवें भजन का नौवाँ उपदेश। 65-72
तेथ।
65 हे यहोवा, तूने अपने वचन के अनुसार अपने दास के साथ भलाई की है।
66 मुझे भले विवेक और ज्ञान की शिक्षा दे, क्योंकि मैंने तेरी आज्ञाओं का विश्वास किया है।
67 उससे पहले कि मैं दुःखित हुआ, मैं भटकता था; परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ।
68 तू भला है, और भला करनेवाला भी है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा।
69 अभिमानियों ने मेरे विरुद्ध झूठ गढ़ा है; परन्तु मैं पूर्ण मन से तेरे आदेशों को मानूँगा।
70 उनका हृदय चर्बी के समान जम गया है; परन्तु मैं तेरी व्यवस्था में मगन हूँ।
71 मेरे लिए यह भला है कि मैं दुःख में पड़ा, जिससे मैं तेरी विधियों को सीखूँ।
72 तेरे मुख की व्यवस्था मेरे लिए हज़ारों रुपयों और सोने-चाँदी से उत्तम है।
यदि हम बहुत-से विषयों में प्रायः मूर्ख और अविवेकी ठहरते हैं, तो यह सबसे अधिक तब प्रकट होता है जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करने चलते हैं; क्योंकि तब यदि हममें बुद्धि या विवेक की एक बूँद भी हो, तो वह प्रकट हो जाती है, परन्तु इस विषय में हम अपनी मूर्खता को अपने अन्य सब कामों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रकट करते हैं। और इसका कारण क्या है? सचमुच, जब हम मनुष्यों से कुछ माँगते हैं तब हम अपना व्यवहार अधिक संयत रखते हैं, परन्तु जब परमेश्वर की महिमा के सम्मुख आते हैं तब ऐसा नहीं करते; क्योंकि हम बिना सोचे-समझे उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं, यह जाने बिना कि उससे क्या माँगना चाहिए, और जो कुछ मुँह में आए उसे यों ही उँडेल देते हैं। इसलिए हमें अपना पाठ और भी अधिक स्मरण करना चाहिए, ताकि हम ठीक-ठीक जान सकें कि प्रार्थना किस क्रम से करनी चाहिए। क्योंकि यदि हम उससे उस वस्तु को छोड़ कोई और वस्तु माँगें जिसे उसने हम पर प्रकट किया है कि वह उसे भाती है, इस प्रकार कि सदा उसी की इच्छा सर्वोपरि रहे और हमारी अभिलाषाएँ मुख्यतः उसी से शासित हों, तो हम परमेश्वर के नाम को अपवित्र करते हैं और अपने आपको उसकी महिमा का अत्यधिक तिरस्कार करनेवाला दिखाते हैं। अब यहाँ हमें चिताया गया है कि सब बातों से बढ़कर हमें परमेश्वर से यह प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें सिखाए और हमें अपनी इच्छा समझने की सामर्थ्य दे, जैसा उसने अपने वचन में हम पर प्रकट किया है; और हमारी आँखें खोले कि हम उसे पूरा कर सकें, ताकि जो कुछ उसमें समाया है उसे हम समझ सकें।
और इन आठ पदों का, जिन्हें अब हमें यहाँ विचारना है, सार और तात्पर्य यही है। क्योंकि दाऊद परमेश्वर से और कुछ नहीं माँगता, केवल यह कि वह व्यवस्था की विषयवस्तु और उसकी शिक्षा को जाने, ताकि उसी से शासित हो और उसका सारा जीवन उसी के अनुसार ढले।
परन्तु पहले तो वह परमेश्वर को उन सब उपकारों का स्मरण दिलाता है जो वह उससे पा चुका था। क्योंकि जब हम परमेश्वर से कोई प्रार्थना करने आते हैं, तब यही बात हमें भरोसा और साहस देती है। और सचमुच संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो हमें इससे उत्तम पहुँच दे, या इससे अधिक शीघ्रता से हमें यह निश्चय दिलाए कि हमारी सुनी जाएगी, जितना यह कि हम उसके उपकारों को अपने ऊपर किए हुए देखें। और यह कैसे हो? हर एक मनुष्य अपने मन में यों विचार करे और कहे, “मैंने पहले अनुभव से अपने परमेश्वर की उदारता को जाना है; हाँ, इसका जितना प्रमाण मुझे मिल सकता था उतना मिल चुका है। इसलिए यह उचित न होगा कि मैं उस पर अविश्वास करूँ और इस सन्देह में पड़ा रहूँ कि जो मैं उससे माँगता हूँ वह वह अब न देगा; क्योंकि मुझे उसके प्रेम का ऐसा उत्तम प्रमाण मिला है कि वह सदा उदारता से मुझ पर अपने उपकार करने को तैयार रहता है। तो जब मैं उससे इतने उपकार पा चुका हूँ, क्या अब मैं अपने मन में सोचूँ कि यह बात कैसे हो सकती है? अर्थात् यह कि जो मैं माँगने जा रहा हूँ वह मुझे मिल जाए? यदि हम इस सन्देह में पड़े रहें, तो हम परमेश्वर के साथ बड़ा अन्याय करेंगे और उसके प्रति अपनी बड़ी कृतघ्नता दिखाएँगे; क्योंकि वह हमारे साथ कभी कोई भलाई इस उद्देश्य के बिना नहीं करता कि हम उसकी दया और अनुग्रह के भागी हों, जिसे वह अन्त तक हम पर बनाए रखेगा; क्योंकि वह हम पर उदारता से अपने उपकार करने में कभी नहीं थकता, जैसा मनुष्यों का स्वभाव होता है कि जब वे किसी को खुले हाथ से देते हैं, तो तुरन्त अपना सिर फिर कंधे में खींच लेते हैं। परन्तु परमेश्वर ऐसा नहीं है; वह ऐसा कुआँ है जो कभी नहीं सूखता। देखो, तो पहले पद में जो कहा गया है उसका तात्पर्य यह है: “हे यहोवा, तूने अपने दास के साथ भलाई की है।” दाऊद ने यह इसलिए नहीं कहा कि वह अपनी सीमा बाँध दे, मानो वह चाहता हो कि परमेश्वर आगे उस पर और उपकार न करे; वरन् इसके ठीक विपरीत, क्योंकि उसने परमेश्वर के अनुग्रह का इतना बड़ा अनुभव पा लिया था, इसलिए वह पूरी रीति से निश्चित था कि वह आगे आनेवाले उपकारों का भी अनुभव करेगा। क्योंकि परमेश्वर बदलनेवाला नहीं है; और जैसा मैं कह चुका हूँ, उसका अनुग्रह कभी घटता नहीं, वरन् वह उसे हम पर सदा बढ़ाता ही रहेगा। इसलिए आओ, दाऊद के उदाहरण से हम सीखें कि जब-जब हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी हो, तब-तब हम विचार करें और उन उपकारों को स्मरण करें जो हमने उसके हाथ से पाए हैं, ताकि वही मानो प्रार्थना में हमारे प्रवेश का द्वार बने, और इससे हम यह निष्कर्ष निकालें कि जब परमेश्वर पहले उदार ठहर चुका है, तो हम उसे आगे अन्त तक वैसा ही अनुभव करेंगे।
अब दाऊद आगे कहता है, “अपने वचन के अनुसार।” और यह अकारण नहीं; क्योंकि हमें केवल इतना ही नहीं जानना चाहिए कि परमेश्वर ने हमारी भलाई की है और जो कुछ हमारे पास है वह सब उसी से आता है, वरन् इसके साथ यह भरोसा भी जोड़ना चाहिए, अर्थात् यह कि उसने यह अपने वचन के अनुसार किया है। क्योंकि जैसे भोजन, चाहे कितना ही अच्छा और मीठा हो, नमक के बिना न स्वाद देता है न रस, वरन् एकदम फीका रहता है; वैसे ही परमेश्वर के उपकारों का भी पूरा स्वाद न होगा कि हम उन्हें जैसा चाहिए वैसा चख सकें, यदि वे विश्वास और भरोसे के नमक से सने और स्वादिष्ट न किए गए हों, और यह न जाना गया हो कि जो अनुग्रह और उपकार परमेश्वर ने हम पर किए हैं वे उसके वचन और प्रतिज्ञा के अनुसार हुए हैं। और ऐसा क्यों? मैं तुमसे पूछता हूँ, यदि हमारे पास परमेश्वर का वचन और उसकी प्रतिज्ञाएँ न हों, तो चाहे (जैसा मैं कह चुका हूँ) हम इस भरोसे पर कि उसने अपनी केवल कृपा और भलाई से पहले ही हमारी सहायता की है, उससे बहुत अच्छी रीति से विनती कर सकें और उसके सम्मुख आ सकें, फिर भी हमें इसका निश्चय न होगा कि वह सदा ऐसा ही करेगा, और न यह कि वह इसमें स्थिर रहेगा, अर्थात् जो उसने आरम्भ किया है उसे पूरा करेगा; मैं कहता हूँ, उसके वचन के बिना हम कभी ऐसा कोई निश्चय पा नहीं सकते। और ऐसा क्यों? जब परमेश्वर हमसे कहता है, “आओ, मेरी सुनो; मैं तुम्हारा पिता होऊँगा, और तुम्हारे प्रति उद्धारकर्ता ठहरूँगा, और तुम मुझे सदा ऐसा ही पाओगे,” तब इन प्रतिज्ञाओं का प्रमाण और फल चख लेने के पश्चात् हम उसके उपकारों को उस काम में भली-भाँति लगा सकते हैं जिसकी चर्चा मैं कर चुका हूँ: क्या परमेश्वर ने मेरी भलाई केवल एक सनक में की? क्या उसने यह केवल बातों-बातों में किया? और क्या वह अब उसे थामे और बनाए न रखेगा? नहीं, ऐसा नहीं; उसने यह अपने वचन के अनुसार किया है। क्या परमेश्वर का वचन केवल एक दिन या एक महीने के लिए ठहरता है? नहीं, वह जीवन और मृत्यु दोनों में बना रहता और स्थिर रहता है। तो आओ, हम यह निष्कर्ष निकालें कि परमेश्वर के उपकार सदा के हैं, और वह उन्हें उन सब पर बनाए रखेगा जो कृतघ्न नहीं हैं। देखो, यह वाक्य जो दाऊद जोड़ता है, अनावश्यक नहीं, वरन् बड़े महत्त्व का है, जब वह कहता है, “हे यहोवा, तूने अपने वचन के अनुसार मेरे साथ भलाई की है।” इसलिए यदि हम परमेश्वर के उन उपकारों से, जो हमने पहले पाए हैं, दृढ़ होना चाहें, और जब हम अपनी विनतियाँ करें तब चाहें कि वह हमारी सुने, तो हमें उसके उपकारों को उसके वचन के साथ जोड़ना चाहिए, और ठीक कहें तो उन मिठाइयों के समान, जो स्वादिष्ट नमक में भली-भाँति लपेटी गई हों; क्योंकि नहीं तो हम उनका ऐसा स्वाद कभी न पा सकेंगे कि उन्हें इस काम में लगाएँ और उसमें विश्वास का सच्चा निश्चय बाँधें। अब दाऊद ऐसी भूमिका बाँधकर आगे कहता है,
“मुझे भले विवेक और ज्ञान की शिक्षा दे, क्योंकि मैंने तेरी आज्ञाओं का विश्वास किया है।” यहाँ दाऊद परमेश्वर से माँगता है कि वह उसे सच्ची बुद्धि दे, कि वह जान सके कि उसे क्या करना है। और वह ऐसा क्यों करता है? वह वही कारण बताता है जो हम पहले देख चुके हैं: क्योंकि मैंने, वह कहता है, तेरे वचन का विश्वास किया है। अब इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जिन्होंने विश्वास किया है वे पर्याप्त शिक्षित हैं, अर्थात् उनमें सच्ची समझ और इतनी बड़ी बुद्धि है कि उन्हें परमेश्वर से यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं कि वह उन्हें और प्रकाशित करे। हमारी सारी बुद्धि विश्वास को छोड़ और किसमें ठहरती है? जब हम परमेश्वर का वचन ग्रहण करते हैं, और उससे शिक्षा पाकर उसी बात पर, जो वह हमसे कहता है, विश्राम करते हैं? देखो, यही हमारी सम्पूर्ण और पूरी सिद्धता है।
अब दाऊद घोषणा करता है कि उसने परमेश्वर के वचन का विश्वास किया है; तो फिर वह सिखाए जाने की विनती क्यों करता है, मानो वह ज्ञानहीन और अनजान हो? यहाँ हमें यह ध्यान देना है (जैसा हमने आज सवेरे छुआ था) कि हम परमेश्वर के वचन का विश्वास दो प्रकार से करते हैं, अर्थात् हमारे विश्वास को दो भागों में बाँटकर देखना चाहिए: इस अर्थ में नहीं कि हम उसे विभाजित और खण्डित करना चाहते हैं, वरन् उसमें भेद करना चाहते हैं, जैसा उसके अपने स्वभाव में निहित है। तब विश्वास का आरम्भ कहाँ से होता है? सचमुच, उसे अपने आपको तुच्छ जानना चाहिए कि जो कुछ परमेश्वर कहे उसे ग्रहण करे; हमें उसे स्वामी रहने देना है और जो कुछ उससे आता है उसे भला, पवित्र और धर्मी मानना है; कि उसके हमसे बोलने से पहले ही हम उसकी आज्ञा मानने को तैयार और प्रस्तुत हों; और यद्यपि हम उसकी इच्छा अभी नहीं जानते, तो भी अपने मन में यह निश्चय रखें: क्या परमेश्वर बोलता है? अच्छा, तो हमें केवल कान और ध्यान ही नहीं देना है, वरन् जो कुछ उसके पवित्र मुख से निकले उसे बिना विरोध के ग्रहण भी करना है।
देखो, विश्वास का पहला अंश और शर्त यही है। अब एक दूसरा अंश और शर्त है, अर्थात् वह शिक्षा जो परमेश्वर हमें देता है, जब हम उसके पास उस आदर के साथ आ चुके हों जिस आदर से शिष्यों को अपने गुरु के पास आना चाहिए; क्योंकि तब हम उससे अधिक पूर्ण और दृढ़ रीति से सिखाए जाते हैं। दाऊद यही माँगता है। वह घोषणा करता है कि उसने परमेश्वर के वचन का विश्वास किया है; अर्थात् उसने उसमें निहित महिमा को पहचाना, उसकी आज्ञा मानी, और अपने आपको उसके अधीन कर दिया। यह घोषणा करके वह कहता है, हे प्रभु, अब जबकि मैंने तेरे वचन की शक्ति और सामर्थ्य का अनुभव किया है, और मुख्यतः उसी की अभिलाषा की है, तो मुझे यह अनुग्रह दे कि मैं उसे समझ सकूँ।
देखो, यहाँ एक उल्लेखनीय और ध्यान देने योग्य स्थल है। क्योंकि पहले तो हमें चिताया जाता है कि न तो सुसमाचार में और न पवित्रशास्त्र के किसी और भाग में हमें कभी कोई लाभ होगा, यदि हममें यह नम्रता न हो कि हम अपने आपको परमेश्वर के अधीन कर दें; इस विश्वास के साथ कि जिसे हम अपने में भला और विश्वासयोग्य मानते हैं वह उसकी तुलना में कुछ भी नहीं जो वह इसमें अपनी ओर से करना चाहता है, क्योंकि उसने उसे हम पर प्रकट किया है। क्योंकि हम सीधे-सादे और अनजान हैं, और जब तक हम अपने मन को इस युक्ति के आगे झुका न दें, तब तक अपने उद्धार के लिए आवश्यक बातों को ग्रहण नहीं कर सकते। और इसी कारण आज इस विषय में परमेश्वर के शिष्य इतने थोड़े हैं। क्योंकि आज हम कितनों को पाएँगे जिनके मन वैसे दीन हुए हों जैसा होना चाहिए? परन्तु अधिकांश घमण्डी मूर्ख हैं; इस विषय में हम बहुतों को पाएँगे जो परमेश्वर के वचन को उससे अधिक कुछ न समझेंगे मानो किसी नश्वर और भोले मनुष्य ने बात कही हो। इसलिए जब मनुष्य ऐसे घमण्ड के साथ परमेश्वर के पास आते हैं, तो इसमें आश्चर्य न करें कि वह उन्हें बुद्धि और विवेक के बिना छोड़ देता है; और यद्यपि सूर्य उनकी आँखों के सामने तेज चमकता है, तो भी वे निरन्तर अन्धे रहते हैं और मानो अन्धकार में टटोलते फिरते हैं, और गर्दन टूटने के जोखिम तक भटकते रहते हैं। इससे हमें चकित न होना चाहिए कि परमेश्वर उन्हें अपने अनुग्रह से वंचित कर देता है, क्योंकि वे अपने आपको उसके वचन के अधीन नहीं करते। इसी प्रकार जब हममें यह होगा कि परमेश्वर को वह अधिकार और आदर दें जिसके वह योग्य है, तब हम दाऊद के उदाहरण पर आशा रख सकते हैं कि वह हमें और अधिक सिखाएगा, और हम भी उससे यही विनती कर सकते हैं। क्योंकि सारी मसीही बुद्धि की पहली सीढ़ी और पायदान यही है: अर्थात् इस रीति से अपने आपको दीन करना कि वे जो कुछ परमेश्वर उनसे कहे उसे ग्रहण करने को सदा तैयार रहें। जब वे ऐसे तैयार होंगे, तो वे चूक नहीं सकते, और न उन्हें यह भय रहेगा कि परमेश्वर उन्हें कभी त्याग देगा, वरन् वह अपनी सामर्थ्य फैलाकर उन्हें सम्भाले रखेगा, जैसी उसने उनसे इसमें प्रतिज्ञा की है। इन दो पदों के विषय में इतना ही। अब आगे आता है,
“उससे पहले कि मैं दुःखित हुआ, मैं भटकता था; परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ।”
यहाँ दाऊद संकेत करता है कि वह पहले से अधिक दबा हुआ था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे ताड़ना दी थी: मानो वह कहता है, सचमुच, हे प्रभु, उन सब उपकारों में से, जिनका मैं पहले उल्लेख कर चुका हूँ, यह भी एक है कि तूने मुझे क्लेश के द्वारा अपने आपको पहचानना सिखाया; देख, यही मुझे तेरी आज्ञाओं का पालन करवाता है।
अब जब हम परमेश्वर को उन अनुग्रहों के विषय में यों बताते हैं जो उसने हम पर किए हैं, ताकि हम उसकी सेवा के लिए तैयार किए जाएँ, तो इसका कारण यह है कि वह उन्हें हममें अधिक से अधिक बढ़ाए और बहुगुणित करे, जब तक वह उन्हें उनकी पूर्ण परिणति तक न पहुँचा दे। अब इस विषय में हमें वह क्रम देखना है जो दाऊद रखता है: “हे प्रभु,” वह कहता है, “मैं मानता हूँ कि मैं भटका हूँ।” पहली बात यही स्वीकारोक्ति है जो वह करता है: क्योंकि जब परमेश्वर हमें उद्दण्ड और पंक्ति में रखने में कठिन पाता है, तो उचित है कि हमारी यह हठ तोड़ी जाए, और वह हम पर अपना अधिकार दिखाए, ताकि हम शीघ्र ही उसकी कोमलता का अनुभव करें।
और इसलिए दाऊद, यह जानते हुए कि वह एक समय बहुत जंगली और उद्दण्ड था, और परमेश्वर के उस भय में नहीं चला था जैसा उसे चलना चाहिए था, स्वीकार करता है कि यद्यपि उसे सिखाया गया था, तो भी परमेश्वर के लिए आवश्यक था कि उसे पंक्ति में रखे और अच्छे अनुशासन में बनाए रखे। “हे प्रभु,” वह कहता है, “मैं मानता हूँ कि मैं भटका हूँ, हाँ, और यह उससे पहले हुआ कि तूने मुझे ताड़ना दी; परन्तु अब मैं तेरी आज्ञाओं को मानता हूँ।” इससे वह वस्तुतः वही संकेत करता है जो मैंने छुआ है: अर्थात् यह कि वह परमेश्वर के ज्ञान की इस बुद्धि में पहले ही तैयार किया जा चुका था; तो भी वह सदा यही प्रार्थना करता रहा कि वह इस अनुग्रह को उसमें बढ़ाए और उसमें उसे दृढ़ करे, जब तक वह पूरी रीति से सिद्ध न हो जाए।
इसी बीच हमें यह ध्यान देना है कि दाऊद कोई सर्वथा दुष्ट प्रवृत्ति का मनुष्य न था, और न उतना उद्दण्ड जितने परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले बहुत-से लोग हैं। यह सच है कि उसने बहुत भारी और घोर अपराध किए, चाहे वह केवल वही व्यभिचार हो जो उसने ऊरिय्याह की पत्नी बतशेबा के साथ किया, जो ऐसा भयंकर कार्य था कि उसके कारण ही वह परमेश्वर से पूरी रीति से त्याग दिए जाने के योग्य ठहरता। और उसके पश्चात् जब उसने प्रजा की गिनती करानी चाही, तब वह ऐसा घमण्डी हो गया कि व्यर्थ और मूर्खता भरे अहंकार में बहकर बिलकुल भूल गया कि किसने उसे इस राज-सिंहासन तक पहुँचाया था; और ऐसे बड़े उपकार के लिए परमेश्वर को दण्डवत् करने के बदले उसने अपने मन में ठान लिया कि घोड़े पर चढ़कर भाग निकले।
देखो, ये कैसे भारी और लज्जाजनक दोष हैं। परन्तु यदि हम उसके जीवन के क्रम को देखें, तो हम पाएँगे कि वह निरन्तर सीधे मन का, बहुत सीखने को तैयार और शिष्टता से भरा मनुष्य था, जो परमेश्वर की बुलाहट का अनुसरण करता और पूरी रीति से उसी में लगा रहता था। अब इसमें उस मनुष्य के बीच, जो अपने जीवन के सब दिन उपद्रव मचाता है, और उसके बीच, जो कोई एक विशेष बुराई तो करता है परन्तु अपने शेष सारे जीवन में परमेश्वर का भय दिखाता है, बड़ा अन्तर प्रकट होता है: जैसा हो सकता है कि कोई मनुष्य अपने सारे जीवन परमेश्वर की सेवा करे, और इस बीच कुछ गिर भी जाए, और सम्भवतः बहुत भारी रीति से: जैसा हम दाऊद में होता देखते हैं। अब हम औरों को बहुत दुष्ट देखेंगे, जो अपने जीवन भर परमेश्वर को तुच्छ जानते और पूरी रीति से दुष्टता में आनन्दित रहते हैं। परन्तु दाऊद कभी ऐसा न था; तो भी उसने स्वीकार किया कि वह भटका था, उस समय से पहले जब परमेश्वर ने उस पर क्लेश डालकर उसकी सुधि ली। और यदि दाऊद में ऐसा हुआ, तो हाय, हम अभागों का क्या होगा?
इसलिए आओ, हम समझें कि क्लेश हमारे लिए रोटी और पानी से भी अधिक आवश्यक हैं।
हम परमेश्वर से माँगते हैं कि वह हमें खिलाए और पाले। यह बहुत सच है, और वह हमें ऐसी विनती करने की आज्ञा देता है; परन्तु तो भी हमें मुख्य बात छोड़नी नहीं चाहिए: अर्थात् हमें उससे यह विनती करनी चाहिए कि वह हमें इतना मोटा न करे कि हम लाड़-प्यार में बिगड़े और अड़ियल लड़कों के समान उस पर लात चलाएँ और बिदकें, वरन् उसकी उदार भलाई से शासित होकर हम सहज और विनीत रहें कि उसकी इच्छा के अनुसार चलाए जा सकें।
तो बात ऐसी ही है (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ) कि हमें सचमुच क्लेशों के द्वारा वश में किया जाना चाहिए, नहीं तो हम सदा जंगली और हिंसक पशुओं के समान बने रहेंगे।
और इसे प्रमाणित करने के लिए, हम देखते हैं कि हमारा स्वभाव इतना विद्रोही है कि दया आती है, और हमारी वासनाएँ ऐसे भयंकर पशु हैं कि हम उन्हें किसी अच्छे क्रम में नहीं रख सकते: यहाँ तक कि यदि परमेश्वर लगाम ढीली कर दे और रास हमारी गर्दन पर डाल दे, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम उसके विरुद्ध बहुत हठीले और विद्रोही हो जाएँगे: और इस रीति से उपद्रव मचाएँगे कि हम और कुछ न चाहेंगे, केवल यह कि सारा न्याय, निष्पक्षता और अधिकार स्पष्टतः उलट दें। संक्षेप में, इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब हम अपनी इच्छा के अनुसार और बड़ी समृद्धि में जिएँगे, तब हम परमेश्वर से टकराएँगे और उसे लात मारेंगे।
अब इस बात की सहायता के लिए इसके सिवा और कोई उपाय नहीं कि परमेश्वर हमें क्लेश दे, क्योंकि यही एकमात्र साधन है जिससे वह हमें अधीनता और भय में रखता है; नहीं तो, यदि वह हमें चैन और शान्ति में छोड़ दे, तो यह असम्भव है कि हमारा स्वभाव उसके विरुद्ध हठपूर्वक विद्रोह न करे। यदि हम इस पाठ को भली-भाँति सीख लें, तो जो क्लेश वह हम पर डालता है उनसे हम उतने दुःखी न होंगे जितने अब होते हैं; वरन् अपनी सब विपत्तियों और कष्टों में हम उससे भिन्न प्रकार की सान्त्वना पाएँगे, यह जानकर कि यद्यपि वे हमारे लिए कड़वी औषधियाँ हैं, तो भी वे हमारे स्वास्थ्य के लिए ठहरेंगी।
आओ, हम चुन लें कि हम जंगली और पागल पशुओं के समान उद्धार के मार्ग से भटकते रहेंगे, हाँ, सचमुच उन्मत्त मनुष्यों के समान परमेश्वर के विरुद्ध सिर उठाएँगे, या उसकी छड़ियों से ताड़ित होकर इस प्रकार जीत लिए जाएँगे कि उसी के द्वारा वह हमें अपनी आज्ञाकारिता में जीवन बिताने का क्रम दे सके।
इसलिए जब हमें क्लेशों से ऐसा लाभ होता है कि उससे हमें जो मिलता है वह सहने में भारी और कठिन नहीं, तो आओ, उसी से अपने को सान्त्वना दें, और उस परिणाम की बाट जोहें जो परमेश्वर हमें देगा। इसके अतिरिक्त हम यह भी स्मरण रखें कि जब परमेश्वर ने ताड़ना देने को अपना हाथ उठाया है और हमारी मूर्ख और अनियन्त्रित लालसाओं को दबा दिया है, तब हमें न सुधरनेवाले न बनना चाहिए, और न जैसी हमारी आदत है कुड़कुड़ाना और बड़बड़ाना चाहिए, मानो उसने हमारे साथ बड़ा अन्याय किया हो; वरन् दाऊद के उदाहरण पर हम अपने आपको ताड़ित और क्लेशित होने दें।
देखो, अति हिंसक और उग्र पशु भी, तो भी अन्ततः वश में किए जा सकते हैं, जब कोई परिश्रमी और उद्यमी मनुष्य उन्हें अपने हाथ में ले, जो जानता हो कि उन्हें कैसे चलाना है।
उस अनसधे घोड़े को देखो, जो स्वभाव से उग्र और हठीला है, तो भी जब उसकी पीठ पर कोई ऐसा मनुष्य हो जो उसे चढ़ना और सधाना जानता है, तब वह अपने को सँभालने और ले जाने देता है और लगाम के साथ मुड़ता है। मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या हमें बहुत लज्जित न होना चाहिए, जब हमारा परमेश्वर हमें व्यवस्थित करने और अपनी ओर जीतने में लगा हुआ है, और फिर भी इसे सिद्ध नहीं कर पाता?
इसलिए आओ, दाऊद के उदाहरण पर हम परमेश्वर की छड़ी के नीचे लाभ उठाने का यत्न करें, ताकि उसके कोड़े खाने के बाद हम उसकी व्यवस्था को मानें। अब इसके तुरन्त बाद आता है।
“तू भला है, और भला करनेवाला भी है; मुझे अपनी विधियाँ सिखा।”
दाऊद यहाँ फिर वही विनती दोहराता है जो हम सुन चुके हैं। और यह ठीक वही है जिसे मैं पहले छू चुका हूँ: अर्थात् उन सब प्रार्थनाओं में से जो हमें परमेश्वर से करनी हैं, यह सबसे मुख्य प्रार्थनाओं में से एक है, कि हम उससे माँगें कि वह अपने वचन में हमें सिखाए: ताकि हम इस वर्तमान जीवन और अपनी देह से सम्बन्धित बातों में इस रीति से न लग जाएँ कि अपनी आत्माओं के दर्पण का तनिक भी विचार न करें। अब यह दर्पण वही है जो परमेश्वर के वचन में है।
इसलिए जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करने चलें तब इतने बड़े उपकार को न भूलें, वरन् इसे विशेष रूप से स्मरण रखें कि हम उसकी विधियों में सिखाए जाएँ। अब इस विनती के अतिरिक्त दाऊद वही कारण देता है जो उसने पहले पद में दिया है: अर्थात् जब वह कहता है, “कि परमेश्वर भला और भला करनेवाला है।”
यह बहुत सच है कि ये दो भिन्न वाक्य हैं; परन्तु तो भी वे एक ही स्रोत से निकलते हैं, और उनका आशय भी एक ही लक्ष्य की ओर जाता है। उसने कहा है, “तूने अपने दास के साथ उदारता से व्यवहार किया है:” और यहाँ, “तू भला है और भला करनेवाला है।” वहाँ उसने कहा है, “अपने वचन के अनुसार भी:” और यहाँ उसने दोनों को रखा है: जिससे हम देख सकें कि यह पद उस बात की पुष्टि मात्र है जो हम पहले दो पदों में देख चुके हैं: कि दाऊद, परमेश्वर को उसकी वह उदारता सुनाते हुए जो वह अपने लोगों के प्रति, अपने स्वभाव के अनुसार ही, दिखाता है, उससे विनती करता है कि वह उसे अपनी विधियाँ सिखाए। अब वह आगे जोड़ता है,
“अभिमानियों ने मेरे विरुद्ध झूठ गढ़ा है; परन्तु मैं पूर्ण मन से तेरे आदेशों को मानूँगा।”
यह दो कारणों से कहा गया है: एक यह कि इससे दाऊद दिखाता है कि उसे परमेश्वर की सहायता की, और उसके वचन में दृढ़ किए जाने की, हाँ और उसी में सिखाए जाने की कितनी आवश्यकता है। और ऐसा क्यों? सचमुच परीक्षाओं का सामना करने के लिए। मानो वह कहता है, “हाय मेरे परमेश्वर, यदि तू मुझे न सिखाए, और अपने पवित्र आत्मा से मेरी अगुआई न करे, तो मैं क्या करूँगा? क्योंकि जब मेरे पास केवल मेरी अपनी इच्छा होगी जो सदा तेरे विरुद्ध लड़ती रहती है, तब भी मैं परीक्षाओं से मुक्त नहीं हूँ; परन्तु मेरे बाहर भी शत्रु हैं जो मुझे दबाते और सताते हैं: इसलिए मुझे तेरे हाथ से चलाए और सँभाले जाने की बहुत ही बड़ी आवश्यकता है।” तब दाऊद ने यह विचार किया कि उसके लिए परमेश्वर से ताड़ना पाना आवश्यक था: ताकि वह अपनी विनती को बहुत अधिक सरलता से पा सके।
अब इसी बीच वह यह दिखाना चाहता है कि उसने अपनी प्रार्थना कपट के बिना की: कि वह बहुत सच्चे मन से, शुद्ध और निष्कपट भाव के साथ परमेश्वर के पास आया: मानो वह कहता है, “हे प्रभु, मैं तेरी व्यवस्था और विधियों में दिखावे के लिए सिखाया जाना नहीं चाहता: वरन् इसलिए कि मैं उस भलाई को जो उसमें है महत्त्व देता हूँ, और इसलिए कि मैं जानता हूँ कि यही सबसे उत्तम सुख है जो हमें मिल सकता है।” और इसे प्रमाणित करने के लिए कि ऐसा ही है, यद्यपि दुष्टों ने मुझ पर चढ़ाई की है, और मुझे बुराई करने की ओर खींचने में बड़ा परिश्रम किया है, और अपना सारा बल और सामर्थ्य उसमें लगाया है: तो भी मैंने तेरी आज्ञाओं को माना है। इससे उसने भली-भाँति प्रमाणित कर दिया कि वह परमेश्वर के वचन से कितना प्रेम रखता था, क्योंकि जो कुछ उन्होंने चालाकी और द्वेष से उसके विरुद्ध किया उसके बावजूद उसने उससे घृणा नहीं की।
तो ये दो कारण हैं जो हमें यहाँ ध्यान में रखने हैं। अब (पहले तो) जब दाऊद यहाँ अभिमानियों की बात करता है, तो हम स्मरण करें कि यह वह उपाधि है जो पवित्रशास्त्र सामान्यतः सब अविश्वासियों और परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों को देता है। क्योंकि यह नीच और पशुवत् अभक्ति कहाँ से आती है कि मनुष्य परमेश्वर के हाथ के नीचे नहीं झुकना चाहते, वरन् कठोर हो जाते और उसके विरुद्ध सिर उठाते हैं? यह अवश्य ही एक भयंकर घमण्ड होगा। इसी प्रकार यह अविश्वास ही है जो मनुष्य को मानो सींग दे देता है, जिसे वह स्वभावतः इतना मूल्यवान समझता है (यद्यपि वास्तव में वह कुछ भी नहीं से भी कम है) और उसे अद्भुत मानता है। और इसके विपरीत, आओ, हम ध्यान दें कि केवल विश्वास ही हमें दीनता की ओर ले जा सकता है, और वही हमें उसमें गढ़ता और ढालता है, क्योंकि हमारे हृदयों का यह फूलना, हमारा अहंकार में बढ़ना, फूलते हुए मेंढकों के समान है। मैं कहता हूँ, इस दोष को केवल विश्वास को छोड़ और कुछ सुधार नहीं सकता। कारण यह है कि विश्वास हमें परमेश्वर तक पहुँचाता है।
अब जब हम जान लेते हैं कि परमेश्वर की धार्मिकता क्या है, तो आओ, अपने पास आएँ, और हम अपने में अधर्म को छोड़ और कुछ न पाएँगे; जब हम परमेश्वर की बुद्धि पर विचार करेंगे, तो देखेंगे कि जो कुछ हम भली युक्ति समझते थे वह व्यर्थता और मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं। इसलिए जब मनुष्य परमेश्वर के तेज को निहारते और चकित होते हैं, तब वे सीखते हैं कि वे गोबर और घिनौनी दुर्गन्ध से अधिक कुछ नहीं हैं, वे अपने आप पर क्रोधित और अप्रसन्न होते हैं, और अपनी गन्दगी पर बहुत लज्जित होते हैं। तो देखो, दीनता विश्वास से उत्पन्न होती है। और इसीलिए दाऊद कहता है कि अभिमानियों, अर्थात् दुष्टों और अविश्वासियों ने उसके विरुद्ध झूठ गढ़ा। इसलिए आओ, हम जानें कि घमण्ड मनुष्यों में उपजता है, और वे उसे संसार में अपने साथ ले आते हैं जैसे ही वे जन्म लेते हैं; वह पूरी आयु तक बढ़ता और फैलता रहता है, जब तक परमेश्वर उसे अपने पवित्र आत्मा और विश्वास के द्वारा सुधार न दे। और इसलिए जब हम परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों को और उन दुष्टों को देखें जो नहीं जानते कि परमेश्वर से शासित होना क्या है, जब हम उन्हें, मैं कहता हूँ, इस प्रकार उपद्रव मचाते देखें: तो इसे अनोखा न समझें, क्योंकि यह स्वभाव का ही क्रम है।
इसके अतिरिक्त, आओ, हम भली-भाँति ध्यान दें कि दाऊद, परमेश्वर की अपनी आवश्यकता की बात करते हुए, अपने उदाहरण से हमें दिखाता है कि जितना अधिक हम परीक्षाओं से सताए जाएँ, उतना ही अधिक हमें साहस के साथ उससे सहायता माँगनी चाहिए, कि वह अपना हाथ बढ़ाकर हमें थामे, और हमें हारने न दे। और यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है: क्योंकि जब हम किसी परीक्षा से दुःखी होते हैं, तब हम नहीं जानते कि यही हमें परमेश्वर की ओर दौड़ाने के लिए है, जो एकमात्र उपाय है जिससे हमें छुड़ाया जाना है।
और इस प्रकार शैतान हमारे भीतर बहुत सरलता से घुसकर हमारे विश्वास को उलट सकता है, क्योंकि वह मानो उसके सामने शिकार के रूप में रख दिया गया है, और इसके सिवा हम वह उपाय भी, जो हमारी सहायता के लिए हमें दिया जाता है, एक बार भी ग्रहण करना उचित नहीं समझते। इसलिए आओ, हम वह क्रम रखें जो दाऊद यहाँ बताता है: अर्थात् यदि हम बड़ी और अति प्रबल परीक्षाओं से घिर जाएँ, तो तब हमारे लिए परमेश्वर की शरण लेने का ठीक समय है, उससे विनती करके कि वह हमें बचाए, और हमारे दोषों का उपाय करे, जो नहीं तो हमें अनन्त विनाश की ओर ले जाएँगे। और इस विषय में इतना ही।
अब इसके तुरन्त बाद हमें यह ध्यान देना है कि हम परमेश्वर की सेवा करने की अपनी सद्इच्छा का भली प्रमाण तब देंगे, जब हम परीक्षाओं का सामना करें। यदि दुष्ट हमें दुष्टता की ओर खींचना चाहें, और हम तो भी दृढ़ और अटल रहें, तब हमारा विश्वास और स्थिरता भली-भाँति परखी जाती है। और यह इसलिए कहा गया है कि कोई मनुष्य अपनी चापलूसी न करे, क्योंकि हम समझते हैं कि यह बहुत पर्याप्त बहाना है, और परमेश्वर भी इससे भली-भाँति सन्तुष्ट हो जाएगा, यदि हम कहें कि हम किसी दूसरे के कारण दुष्टता करने को खींच लिए गए। मैं तुमसे विनती करता हूँ, देखो, हर कोई कहेगा, मैं एक समय बहुत अच्छी उन्नति में था, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीना चाहता था। परन्तु जब मैं संसार को इतना टेढ़ा और दुष्ट देखता हूँ, और यह कि सब मनुष्य इतने दोषों में लगे हैं, तो मेरे लिए बच निकलना असम्भव था, मुझे वही करना पड़ा जो और मनुष्य करते थे। जब हम अपने लिए ऐसे बहाने देंगे, तो हम समझते हैं कि परमेश्वर इससे भली-भाँति सन्तुष्ट रहेगा।
परन्तु इसके विपरीत, हम यहाँ देखते हैं कि विश्वासी इस पर भी परमेश्वर की सेवा करना कभी नहीं छोड़ते: चाहे सारा संसार उन्हें रोकने और बाधा डालने का यत्न करे: कि यद्यपि दुष्ट कितने ही झूठ गढ़ें, और उनके मार्ग में कितनी ही ठोकरें बिछाएँ कि वे सीधे मार्ग से हट जाएँ या मुड़ जाएँ, तो भी वे दृढ़ और अटल खड़े रहते हैं। और यह भी देखो कि हमें क्या करना पड़ेगा, कि यदि हम अपने भले परमेश्वर की विश्वासयोग्यता से सेवा करना चाहें, तो हमें अपनी बुलाहट के पीछे चलना नहीं छोड़ना चाहिए, हाँ चाहे दुष्ट हमारे विरुद्ध अपना सारा सम्भव बल लगा दें कि हमें उद्धार के मार्ग से पूरी तरह फेर दें।
अब यदि यह चितावनी सदा आवश्यक रही है, तो आज यह पहले से भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि हम देखते हैं कि संसार सब अधर्म का भयंकर ढेर बन गया है, यहाँ तक कि हम एक पग भी आगे नहीं रख सकते कि बुराई और खतरे की बहुत-सी मुठभेड़ें हमें न मिलें, जो हमें थका दें और खींच लें, और सब प्रकार की बातों में दुष्टता करने की ओर ले जाएँ। इसलिए हमें इस शिक्षा का और भी अधिक अभ्यास करना चाहिए, कि दुष्टों ने हमारे विरुद्ध झूठ गढ़े हैं: परन्तु तो भी हमने परमेश्वर की व्यवस्था को माना है। क्योंकि जो झूठ अभिमानी और परमेश्वर के शत्रु हमारे विरुद्ध गढ़ते हैं वे एक ही प्रकार के नहीं होते। क्योंकि कभी वे मित्रता के रंग में हमें बहकाएँगे, कभी बहुत-सी बातों का दोष हम पर लगाकर हमारा साहस तोड़ेंगे, कभी सब कुछ ऐसा उलझा देंगे कि हम उजले और काले में भेद न कर सकेंगे। तब हमें उतना ही अधिक सावधान रहना और अपने पहरे पर और दृढ़ खड़े रहना चाहिए। और यद्यपि शैतान अपने आपको भाँति-भाँति के रूपों में बदलता है, तो भी हम परमेश्वर की व्यवस्था को मानना न छोड़ें, हाँ, और वह भी अपने पूरे मन से: यह वह बात है जिस पर हमें परिश्रम से ध्यान देना चाहिए। क्योंकि यदि परमेश्वर के पीछे चलने की हममें केवल कोई थोड़ी और दुर्बल अभिलाषा हो, तो हम शीघ्र ही उससे बहुत थक जाएँगे। इसलिए हमारा हृदय पूरी रीति से इसी में लगा होना चाहिए, नहीं तो हम शैतान के विरुद्ध अपना भाग कभी निभा न सकेंगे। अब थोड़ी देर बाद कहा गया है,
उनका हृदय चर्बी के समान जम गया है; परन्तु मैं तेरी व्यवस्था में मगन हूँ। यहाँ दाऊद परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों और उसकी सेवा करने की अभिलाषा रखनेवालों के बीच तुलना करता है। और वह ऐसा क्यों करता है? वह दिखाता है कि जो कारण अविश्वासियों को परमेश्वर का तिरस्कार करने की ओर इतना प्रेरित करता है, वह उनका उच्छृंखल और पशुवत् जीवन है जो वे बिताते हैं: क्योंकि वे अपने बाड़े में उस सूअर के समान मोटे हैं जिसे बलूत के फल और जौ खिलाए गए हैं, और जो ढेर में अपनी ही चर्बी में लोटता पड़ा रहता है। वह इतना मोटा और भारी है कि उठ नहीं सकता: और यद्यपि वह पहले ही अद्भुत रीति से मोटा और भारी पशु है, जो भूसी और गन्दे पानी के सिवा और कुछ नहीं चाहता, तो भी जब उसे बाड़े में बन्द करके इस प्रकार मोटा किया जाएगा तब वह और भी अधिक मोटा और भारी हो जाएगा। परमेश्वर का तिरस्कार करनेवाले इन श्रापित लोगों का भी यही हाल है, जिन्हें अनन्त जीवन की कोई चिन्ता नहीं, वरन् जो पूरी रीति से अपने देवता, अपने पेट, के हाथ बिक गए हैं। वे अपनी ही चर्बी में लोटते हैं, उस सूअर के समान जिसकी घुरघुराहट सदा कुण्ड में ही रहती है। अब इसके विपरीत दाऊद कहता है कि उसका सारा आनन्द परमेश्वर के वचन में रहा है। इससे वह हमें जताता है कि यद्यपि परमेश्वर ने उसे मोटा किया था, तो भी वह अपनी ही चर्बी में नहीं लोटा, वरन् उस आत्मिक दान में आनन्दित रहा जो उसे दिया गया था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे अपनी पाठशाला में उसे सिखाया था।
तो हमें इस स्थल से यह निष्कर्ष निकालना है: कि यद्यपि हम संसार के अधिकांश लोगों को परमेश्वर का तिरस्कार करते देखते हैं, तो भी हमें इससे घबराना नहीं चाहिए। और ऐसा क्यों? आओ, हम भली-भाँति विचार करें कि मनुष्य अपना परम सुख किसमें रखते हैं: और हम उन्हें बैलों और सूअरों के समान पाएँगे, जो और कुछ नहीं चाहते केवल यहीं इस संसार में जीना, इससे आगे कुछ न देखना। परन्तु हमें और आगे देखना है, यदि हम परमेश्वर की सेवा वैसे करना चाहते हैं जैसी उसके योग्य है: अर्थात् हम परमेश्वर के वचन में ऐसा आनन्द और सुख पाएँ कि संसार में और न लगे रहें, जैसा हम अत्यधिक लगे हुए हैं। और यद्यपि परमेश्वर हमें बहुतायत देता है, कि हमें इस संसार में सुख और सुविधाएँ मिलती हैं, तो भी हम उन पर अपना मन न जमाएँ, वरन् जानें कि ये सब तुच्छ और छोटे साधन और आवश्यकताएँ मात्र हैं: परन्तु आओ, हम मुख्य की ओर जाने का परिश्रम करें, और उसे अपना पिता और उद्धारकर्ता मानें: और जब हम उसे ऐसा जान लें, तब हम उसके पास और उस अनन्त जीवन तक चढ़ें जिसके लिए वह हमें बुलाता और न्योता देता है। मैं कहता हूँ, यही वह है जो हमें यहाँ से अपने पास रखना है।
इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर हमें क्लेश के द्वारा वश में करता है। तो आओ, उस बात पर आएँ जो दाऊद जोड़ता है, अर्थात् यह कि उसके लिए भला था कि वह क्लेश में पड़ा। इसलिए यद्यपि परमेश्वर अपना हाथ खींच लेता है, और हमारे साथ कोमलता से व्यवहार करने के बदले कठोरता से पेश आता है, हमें धन की बहुतायत भेजने के बदले हमें भूख और प्यास सहने देता है, हमें स्वास्थ्य देने के बदले रोगों से हमें दुःखी करता है: कि बहुत-सी पीड़ाओं और यातनाओं से सताए जाकर हम नहीं जानते कि क्या करें: तो भी हमें सदा अन्त की ओर देखना चाहिए, कि दाऊद के साथ यह कहकर सान्त्वना पाएँ, “हे प्रभु, मेरे लिए यह भली बात हुई कि मैं क्लेश में पड़ा, जिससे मैं तेरी विधियाँ सीखूँ।”
अब जबकि ऐसा हुआ कि दाऊद क्लेशित किया गया, ताकि वह परमेश्वर की विधियों को सीखने के लिए अधिक तैयार हो, तो हमारा क्या होगा, जो सांसारिक व्यर्थताओं से भरे हैं? तो आओ, हम जानें कि यदि हम उद्धार की शिक्षा में उन्नति करना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के हाथ से सुधारा जाना और छोटी रस्सी में बाँधा जाना आवश्यक है। देखो, तब हमें दाऊद की इस चितावनी का अभ्यास कैसे करना है। और जब हम ऐसा कर चुकेंगे, तो अन्तिम पद में जो लिखा है उसके साथ हम कह सकते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर की व्यवस्था हमारे लिए सोने या चाँदी से अधिक प्रिय है। और इस विषय में हमें यही करना है: हम परमेश्वर के वचन का आदर करें और उसे महत्त्व दें, जैसा वह योग्य है, और संसार की वस्तुओं पर न ठहरें, वरन् सदा और आगे देखें: अर्थात् स्वर्ग की ओर। जब हम परमेश्वर के भेजे हुए क्लेशों से इस प्रकार लाभ उठा चुकेंगे, तब वह थोड़ा-थोड़ा करके हम पर अपना अनुग्रह देगा, कि हम उसके वचन को ऐसा मूल्यवान समझें कि पूरी रीति से उसी से लगे रहें। और आओ, हम उससे विनती करें कि वह कृपा करके हमारी सब दुष्ट शारीरिक लालसाओं और अभिलाषाओं को हमसे छीन ले, और हमसे और कुछ न चाहने दे सिवा यह कि वह हममें राज्य करे और हममें जीवित रहे।
इसी पवित्र शिक्षा के अनुसार, आओ, हम अपने भले परमेश्वर की महिमा के सम्मुख अपने अपराधों को मानते हुए दण्डवत् करें: उससे विनती करें कि वह कृपा करके हमसे वे दुष्ट वासनाएँ दूर करे जो हमें उससे और उसकी सेवा से फेर सकती हैं: और हम वह सब भूल जाएँ जो हमें उद्धार के सीधे मार्ग से फेर सके, कि हम और कुछ न चाहें सिवा इसके कि उस अनन्त जीवन को पाएँ जिसकी हम स्वर्ग में बाट जोहते हैं। कि वह कृपा करके हमें यहाँ पशुओं के समान न जीने दे, जो नहीं जानते कि वे इस संसार में किस उद्देश्य से सृजे गए: वरन् हम उसे अपना सृष्टिकर्ता, अपना पिता और उद्धारकर्ता जानें, कि हम उसकी सृष्टि होकर अपने आपको उसके अधीन करें, और सच्चे और विश्वासयोग्य बच्चों के समान उसकी आज्ञा मानें, जब तक वह हमें इस संसार से उठाकर उस अनन्त आनन्द और अविनाशी निज भाग का भागी न बना ले जो उसने स्वर्ग में तैयार किया है, और जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारे लिए मोल लिया गया है। कि वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् संसार के सब लोगों और जातियों को भी दे, इत्यादि।
