अध्याय 13

सौ उन्नीसवें भजन का ग्यारहवाँ उपदेश। 81-88

Sermons on Psalm 119 · John Calvin

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सौ उन्नीसवें भजन का ग्यारहवाँ उपदेश। 81-88

काफ।

81 मेरा प्राण तेरे उद्धार के लिये बेचैन है; परन्तु मैं तेरे वचन पर आशा रखता हूँ।

82 मेरी आँखें तेरे वचन के लिये धुँधली पड़ गई हैं; मैं कहता हूँ, तू मुझे कब शान्ति देगा?

83 मैं धुएँ में टँगी हुई कुप्पी के समान हो गया हूँ; तौभी मैं तेरी विधियों को नहीं भूलता।

84 तेरे दास के कितने दिन रह गए हैं? तू मेरे सतानेवालों से कब बदला लेगा?

85 अभिमानियों ने मेरे लिये गड़हे खोदे हैं, जो तेरी व्यवस्था के अनुसार नहीं हैं।

86 तेरी सब आज्ञाएँ सच्ची हैं; वे मुझे झूठ-मूठ सताते हैं; तू मेरी सहायता कर।

87 उन्होंने मुझे पृथ्वी पर से प्रायः मिटा ही डाला था; परन्तु मैंने तेरे आदेशों को नहीं छोड़ा।

88 अपनी करुणा के अनुसार मुझे जिला; तब मैं तेरे मुँह की चितौनियों को माना करूँगा।

यदि हम अपनी विपत्तियों और दुःखों में परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को ठीक रीति से स्मरण करें, तो हमें धीरज धराने के लिये वही पर्याप्त होता। और इसी प्रकार हम अपने विश्वास का सच्चा प्रमाण भी देते। परन्तु जैसे ही हम पर कोई क्लेश आता है, हम तुरन्त हियाव छोड़ बैठते हैं, क्योंकि हम परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं को भूल जाते हैं, जिन्हें हम समझते थे कि बहुत पहले से भली-भाँति समझ और सीख चुके हैं। अब कम से कम इतना तो होना चाहिए कि जब आवश्यकता पड़े, वरन् जब हम उनके लिये विवश हों, तब हम उन्हें न भूलें। इसीलिये यहाँ हमारे सामने एक अति उत्तम और ध्यान देने योग्य शिक्षा है; क्योंकि दाऊद परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता के रूप में हमें केवल यही नहीं सिखाता कि हमारा कर्तव्य क्या है और हमारे विश्वास की शक्ति और सामर्थ्य कैसी होनी चाहिए, वरन् अपने उदाहरण से हमें मार्ग भी दिखाता है कि हम अपनी सब विपत्तियों में धीरजवन्त कैसे रहें और उससे गिर कैसे न जाएँ; अर्थात् हम अपनी दृष्टि सदा परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर लगाए रखें। क्योंकि वही हमें इस प्रकार थामे रखने और बनाए रखने के लिये बहुत है कि हम उसके उद्धार की धीरज से बाट जोहें, वरन् उसको पुकारते हुए भी। परन्तु इस शिक्षा से हम और भी लाभ उठा सकें, इसके लिये यहाँ यह जान लेना चाहिए कि पहली दो आयतें एक ही और समान सार की हैं, केवल शब्दों का क्रम बदल दिया गया है। वह पहले कहता है, "मेरा प्राण तेरे उद्धार के लिये बेचैन है।" अर्थात् हे प्रभु, मैं तेरी बाट जोहता रहा हूँ, चाहे जो क्लेश और दुःख मैंने सहे वे बहुत बड़े थे और बहुत समय तक बने रहे, और मुझे उनका न कोई अन्त दिखाई देता है न कोई निकास, तौभी मैं पूरी रीति से इसी पर टिका रहा कि मैं सदा यही भरोसा रखता रहा कि तू मेरा सम्हालनेवाला और सहायक होगा। फिर वह कारण भी बताता है कि वह इस प्रकार बेचैन कैसे हो सका: अर्थात् इसलिये कि उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखा। दूसरी आयत में वह कहता है कि उसकी आँखें परमेश्वर की प्रतिज्ञा के लिये धुँधली पड़ गई हैं, वरन् इसी प्रतिज्ञा की बाट जोहते हुए, और उसने कहा है, "तू मुझे कब शान्ति देगा?" और तीसरी आयत में वह उसी बात को आगे बढ़ाता है जो उसने पहले कही थी: अर्थात् चाहे वह धुएँ में टँगी चमड़े की कुप्पी के समान मानो झुलस गया और सूख गया था, यहाँ तक कि उसमें न नमी बची थी न सार, वरन् वह दुःखों से ही सूख गया था, तौभी उसने परमेश्वर की चितौनियों को नहीं भुलाया।

अब हम देखते हैं कि यहाँ हमें जो बताया गया है उसका सार और प्रभाव क्या है: अर्थात् जब हम क्लेश में हों, और हमारी विपत्तियाँ हमारी कल्पना के अनुसार सदा लम्बी खिंचती जाएँ, तब हमें स्थिर और धीरजवन्त बनाए रखने का केवल एक ही उपाय है, और वह यह कि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का स्मरण रखें और उन्हें अपने हृदयों में गहराई से अंकित रखें। क्योंकि यदि ऐसा हो, तो हमें धीरज धरने में अधिक कठिनाई न होगी; और यद्यपि यह कठिन काम है, तौभी अन्त में हम उसके पार पहुँच जाएँगे। तो आओ, अब ध्यान दें कि हमारी अधीरता कहाँ से उपजती है, और इसका क्या कारण है कि हम इतनी बार परीक्षाओं से हार जाते हैं; या फिर जब हम कुछ समय तक उनका सामना कर लेते हैं, तब भी अन्त में घबरा जाते और हियाव छोड़ देते हैं। सच तो यह है कि इसका कारण यह है कि हम परमेश्वर की चितौनियों को भूल जाते हैं और उसके वचन से मुँह फेर लेते हैं। वास्तव में यह बात पहली दृष्टि में हमारे लिये कोई साधारण-सी बात लग सकती है। और सच पूछो तो हर कोई कहेगा कि हमें उन्हें स्मरण रखना चाहिए, और हमें शान्ति देने का यही एकमात्र उपाय है। परन्तु हम इसे तब और अधिक बार करेंगे जब हम यह शिक्षा, जो यहाँ हमारे सामने रखी गई है, भली-भाँति सीख लेंगे और अपने जीवन के सब दिन इसे स्मरण रखेंगे; क्योंकि सब मसीहियों में जो प्रमुख बातें अपेक्षित हैं उनमें से यह एक है कि जब वे देखें कि परमेश्वर ने उन पर अपना हाथ रखा है और वे मानो गिरने ही वाले हैं, तब भी वे उन उद्धार की प्रतिज्ञाओं का सहारा लेकर, जो परमेश्वर ने उनसे की हैं, अपने आप को शान्ति दें। परन्तु आओ, उस शब्द पर भी भली-भाँति विचार करें जो दाऊद यहाँ प्रयोग करता है: वह कहता है, "मैं उद्धार के लिये बेचैन रहा हूँ, और मैंने आशा रखी है, अथवा जब मैंने आशा रखी थी, तो तेरे वचन के कारण रखी थी।"

इस आयत का दूसरा भाग मानो वह नींव है जिस पर दाऊद निर्माण करता है। तो आओ, परमेश्वर के वचन पर उस आशा को समझें जो हमें रखनी चाहिए, जैसी दाऊद ने रखी थी; क्योंकि उसके बिना हमारा घबरा जाना अनिवार्य है। क्योंकि यद्यपि मनुष्यों की दृष्टि में ऐसा प्रतीत हो कि हम में धीरज से सहने और झेलने के लिये कुछ बल और दृढ़ता है, तौभी वह ऐसा सच्चा धीरज न होगा जिसे परमेश्वर ग्रहण करता है। और ऐसा क्यों? क्योंकि हम उसकी आज्ञा मानने की ऐसी चाह कभी न रखेंगे, जब तक हम इस बात से अपने आप को शान्ति न दें कि वह हम से प्रेम रखता है और हम उसकी भलाई पर भरोसा रखते हैं।

मैं कहता हूँ, मनुष्य कभी इस योग्य न होगा कि क्लेशों में परमेश्वर की आज्ञा माने और उसकी महिमा करे, जब तक कि उसने उस भलाई और पितृ-तुल्य प्रेम का स्वाद न चख लिया हो जो वह हम से रखता है। अब जब वह हमें क्लेश देता है, तब हम इस बात का पूरा निश्चय कैसे कर सकते हैं कि परमेश्वर हम से प्रेम रखता है और हमारा कुशल-क्षेम चाहता है, जब तक हम उसकी प्रतिज्ञाओं से सुसज्जित न हों? क्योंकि हमारे लिये परमेश्वर के सत्य को जानना असम्भव है, जब तक वह उसे अपने वचन में हम पर प्रकट न करे। तो आओ, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह सीखें कि विश्वासियों का धीरज परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में विश्वास और आशा के सिवाय किसी और पर नहीं टिक सकता। तो इस स्थान में हमें यही बात ध्यान में रखनी है।

अब दाऊद ने ऐसी नींव डालकर उस पर यह कहते हुए निर्माण किया कि उसका प्राण परमेश्वर के उद्धार के लिये बेचैन रहा। जब वह कहता है कि उसका प्राण बेचैन रहा, तो उसका आशय यह नहीं कि वह इतना निराश हो गया था कि उसने अन्त में हार ही मान ली, और न यह कि शैतान ने उस पर कुछ बढ़त पा ली थी; परन्तु पवित्रशास्त्र में "बेचैन होना" उस बात के लिये प्रयुक्त है जो उस आज्ञाकारिता के साथ जुड़ी है जो हमें परमेश्वर को देनी चाहिए, अर्थात् अपने आप को उस पर टिकाना और स्थिर करना। वह कैसे? सन्त पौलुस कहता है कि हमें अब्राहम के समान आशा के विरुद्ध आशा रखनी चाहिए: अर्थात् जब परमेश्वर पर हमारे विश्वास की बात उठे, तब हमें अपनी सारी बुद्धि और कल्पनाओं से ऊपर उठना होगा। क्योंकि यदि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को अपनी बुद्धि से नापें, तो उसका क्या होगा? तब हमारा विश्वास मनुष्यों की सारी बुद्धि से बढ़कर और परे होना चाहिए, जैसा यहाँ कहा गया है कि उसका प्राण बेचैन रहा; मानो दाऊद यह कह रहा हो, हे प्रभु, यह सच है कि मनुष्य की समझ के अनुसार मैं बिलकुल निराश्रय हो चुका था; वरन् मैं दुःखों से ऐसा दबा हुआ था कि और सह नहीं सकता था; परन्तु मृत्यु के बीच में रहते हुए भी मैं तब तक नहीं रुका जब तक एक सुरक्षित बन्दरगाह पर न पहुँच गया, अर्थात् तेरी सहायता और तेरी मदद तक। अब वह विशेष रूप से परमेश्वर की सहायता की बात इसलिये करता है कि यह बहुत कठिन है कि हम भटकते न फिरें, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे देखकर यह न टटोलें कि कहीं तैयार सहायता मिल जाए।

परन्तु यदि संकट बहुत समय तक बना रहे और हमें उससे निकलने का कोई मार्ग न दिखाई दे, वरन् वह अथाह गड्ढे के समान हो: तो यद्यपि पहले हमने परमेश्वर पर कुछ भरोसा और आशा रखी थी, तौभी तब हम इधर-उधर सहायता ढूँढ़ने को विवश और उकसाए जाएँगे, हम नहीं जानते कहाँ। और ऐसा क्यों? क्या मेरे लिये उपाय पाना सम्भव नहीं? इसलिये, मैं कहता हूँ, कि हम इतने मन्दबुद्धि हैं, और परमेश्वर पर जो आशा हम रखते हैं वह हमारे पास से इतनी हल्के में निकल जाती है, और पिघलकर इधर-उधर बह जाती है: इसी कारण दाऊद कहता है कि उसने परमेश्वर के उद्धार की आशा रखी। इस प्रकार वह दिखाता है कि यद्यपि उसे दूसरी सहायताओं को ढूँढ़ने, सृजी हुई वस्तुओं पर आँखें लगाने और परमेश्वर को छोड़ देने का अवसर दिया गया था, तौभी परीक्षाएँ उस पर इतनी हावी न हुईं कि वह सदा इस निश्चय पर दृढ़ न रहा हो कि उसकी आवश्यकता को परमेश्वर ही दूर कर सकता है। अब इसी पर वह आगे कहता है,

"मेरी आँखें तेरे वचन के लिये धुँधली पड़ गई हैं; मैं कहता हूँ, तू मुझे कब शान्ति देगा?"

मैं पहले कह चुका हूँ कि इस आयत में कोई नई या अनोखी बात नहीं है, केवल दाऊद शब्दों का क्रम बदलता है। क्योंकि जब वह कहता है कि उसकी आँखें परमेश्वर के वचन के लिये बहुत तरसती रहीं, तो उसका आशय इसके सिवाय और कुछ नहीं कि यद्यपि उसकी सारी बुद्धि व्याकुल थी, और जो बहुत से क्लेश वह सह रहा था उनसे वह मानो अन्धा हो गया था, तौभी वह सदा परमेश्वर के इसी वचन पर टिका रहा, और उसे पुकारने से कभी न रुका, यह कहते हुए: हाय, तू मुझे कब शान्ति देगा? इससे वह हमें दिखाता है कि यदि परमेश्वर की ओर से हमें दी गई प्रतिज्ञाओं पर हमारा सच्चा विश्वास टिका हुआ है, तो जब वह थोड़ी ही देर बाद हमें क्लेश में डालना उचित समझे, तब हमें तुरन्त क्रोधित होकर खच्चरों की तरह लगाम को चबाना नहीं चाहिए; वरन् हम उसकी सच्ची आज्ञाकारिता करें और कहें: हे प्रभु, तू मुझे कब शान्ति देगा? तो हमें ऐसा करते हुए सहना और ठहरे रहना चाहिए: अर्थात् जब हम परमेश्वर से बिनती करें और माँगें कि वह अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार हमारी सहायता करे, तब हम उससे यह भी चाहें कि वह उसे प्रभाव के द्वारा हमें दिखाए: और जब तक वह हमें उसका अनुभव न कराए, तब तक हम दृढ़ और स्थिर बने रहें; क्योंकि यद्यपि वह अपनी सहायता में देर करता है और उसे मानो अधर में लटकाए रखता है, तौभी हमें पूरा निश्चय होना चाहिए कि वह अपने उस कार्य को नहीं भूला जो हमें शान्ति देना है। इसी रीति से हम अन्त में अपनी प्रार्थनाओं का फल पाएँगे। अब वह इसे पूरी रीति से आगे आनेवाली तीसरी आयत में समझाता है, जब वह दिखाता है कि इस प्रकार गिरा दिया जाना कोई छोटी बात न होती, यदि परमेश्वर का वचन उसे सम्भाले और थामे न रखता, परन्तु इसमें बड़ा कारण था। वह कहता है, "मैं बकरी की उस खाल के समान हूँ जिसमें तेल या दाखमधु रखा जाता है, जो धुएँ में टँगी हुई है," और ऐसी सूखी और झुलसी हुई कि उसमें न सार बचा था न नमी। दाऊद यह उपमा इसलिये देता है कि दिखाए कि उसके क्लेश इतने बड़े और अति थे कि वह सारे बल से रहित और जीवन की आशा से रहित था। तौभी वह आगे कहता है, कि "वह फिर भी परमेश्वर की विधियों को नहीं भूला।"

देखो, यह एक उदाहरण है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए, और यहाँ हमें अपनी दुर्बलता का बहाना नहीं बनाना चाहिए: क्योंकि दाऊद भी हमारे ही समान भावुक मनुष्य था; यदि परमेश्वर उसे सामर्थ्य न देता तो वह बहुत सहज ही गिर सकता था। और कैसे? प्रतिज्ञाएँ पाकर उसने उन पर आशा रखी; यह जानकर कि परमेश्वर अपने बच्चों पर अपनी भलाइयाँ इसलिये बनाए रखता है कि वे उसकी शरण में आएँ, उसने उसे पुकारा, क्योंकि वह पहले ही उससे दया और सहायता पा चुका था: परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी ऐसी सहायता की। अब क्या आज हमारे पास वही प्रतिज्ञाएँ नहीं हैं जो दाऊद के पास थीं? वरन् क्या हमारे पास उनसे अधिक विस्तृत और भरपूर प्रतिज्ञाएँ नहीं हैं? क्या हमें दाऊद से कहीं अधिक निकट पहुँच प्राप्त नहीं, क्योंकि यीशु मसीह मध्यस्थ के रूप में व्यवस्था के अधीन की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्टता से प्रकट किया गया है? जब परमेश्वर हमें अपनी भली इच्छा की ऐसी गवाही देता है कि हम निःसंकोच उसके सामने आकर उससे प्रार्थना करें, ताकि वह हमारी आवश्यकताओं में सहायता करे: तो मैं तुम से पूछता हूँ, यदि हम दाऊद के समान साहस के साथ उसके पास न आएँ और उसी उद्देश्य पर अन्त तक दृढ़ न रहें, तो हम क्या बहाना बनाएँगे, जबकि परमेश्वर वही साधन प्रस्तुत करता है जिनसे हम उन सब बातों से लड़ सकें जो हमें उससे दूर कर सकती हैं? और क्या तब से परमेश्वर की सामर्थ्य घट गई है? क्या वह आज भी अपने सब विश्वासियों की अपने पवित्र आत्मा से सहायता नहीं करता, जैसे व्यवस्था के अधीन करता था? वरन् क्या वह यह नहीं कहता कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के राज्य को उस समय से भी अधिक बढ़ाएगा?

तो हमारी कृतघ्नता के सिवाय और कुछ नहीं जिसने परमेश्वर के विरुद्ध द्वार बन्द कर दिया है, ताकि उसके अनुग्रह को हम में पहुँच और प्रवेश न मिल सके। यह बहुत सच है कि वह हम से बहुत कुछ कहेगा, परन्तु हम अपने कान बन्द कर लेंगे; वह हमें बहुत सी सुन्दर प्रतिज्ञाएँ देगा, परन्तु हम उन्हें शीघ्र भूल जाएँगे; अथवा यदि हम उन्हें स्मरण में रखें, तो वह केवल भटकती हुई कल्पना होगी, न उसकी हम में कोई गहरी छाप होगी, न जीवित जड़। इसलिये कि हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को कुछ नहीं समझते, देखो, यही कारण है कि हम इतनी जल्दी गिर जाते हैं, उस छोटी से छोटी परीक्षा से भी जो हम पर आए। प्रार्थनाओं में हम अपने विश्वास का अभ्यास कैसे करते हैं? आज मसीहियों में परमेश्वर का नाम पुकारने के लिये कितनी तत्परता और उत्साह है? हाय, वह इतना ठंडा और दुर्बल है कि और हो ही नहीं सकता। और इसलिये देखो, परमेश्वर ने हमारे अविश्वास के कारण हम से अपना हाथ क्यों खींच लिया है, कि हम उसकी सहायता वैसी अनुभव नहीं करते जैसी करनी चाहिए। इसलिये हमें इस वचन पर और भी गहराई से विचार करना चाहिए, जहाँ दाऊद कहता है कि वह बिलकुल सूख गया था, तौभी उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को नहीं भुलाया।

अब चलो, हम अपनी बड़ाई करें कि हम अच्छे मसीही हैं, कि हमने सुसमाचार में बहुत उन्नति की है; और फिर भी जब किसी छोटे से, वरन् अति हल्के क्लेश से भी हमें छुआ जाएगा, तो हम ऐसे चकित हो जाएँगे कि आश्चर्य होगा। हाय, यदि हम वैसे होते जैसा दाऊद कहता है कि वह था, तो हमारा क्या होता? यदि परमेश्वर हमें इतना सताता कि जीवन के सार की केवल एक बूँद ही बचती, और ऐसा प्रतीत होता कि हम मानो मर ही गए हैं? यदि हम में ऐसी सूखी झुलसन होती, तो क्या होता? परन्तु क्या? दोष इसी में है कि हर कोई अपनी चापलूसी करता है, और हम यह भी सोचते हैं कि परमेश्वर हमारी चापलूसियों के आगे झुक जाए।

परन्तु यह उदाहरण यहाँ हमारे सामने व्यर्थ नहीं रखा गया। तो आओ, हम पहले से अच्छी रीति से अपना अभ्यास करें और परमेश्वर की चितौनियों को स्मरण करें। जब हम ऐसे झुलस जाएँ और ऐसे सूख जाएँ कि प्रतीत हो कि हम में जीवन की एक बूँद भी नहीं रही? तब भी हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर पहले से कहीं अधिक मनन करें, ताकि हम नया बल और नई सामर्थ्य पाएँ। अब जब दाऊद यह कह चुका, तो वह आगे कहता है,

"तेरे दास के कितने दिन रह गए हैं? तू मेरे सतानेवालों से कब बदला लेगा? अभिमानियों ने मेरे लिये गड़हे खोदे हैं, जो तेरी व्यवस्था के अनुसार नहीं हैं।"

यहाँ दाऊद अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए उन दुःखों का उल्लेख करता है जो उसने सहे, अर्थात् दुष्ट और अभक्त लोगों ने उसे अन्याय से सताया, और वह परमेश्वर की ओर, मानो अपनी सुरक्षा के लिये, लौटा, तौभी पहले ही झटके में उसे उसकी ओर से कोई सहायता न मिली, वरन् परमेश्वर ने उसे ऐसे रोके रखा मानो वह निराश्रय व्यक्ति हो। अब इसी पर वह ठीक ही दिखाता है कि उसका विश्वास बिलकुल बुझा नहीं था, न घटा था, वरन् वह प्रार्थना में लगा रहा। और अन्त में वह यह निष्कर्ष निकालता है कि जब परमेश्वर उसे ऐसे पुनः स्थापित करेगा और मानो मृत्यु में से जिला उठाएगा, तब वह परमेश्वर के वचन को और भी अच्छी रीति से स्मरण रखेगा। तो आओ, ध्यान दें कि दाऊद यहाँ एक विशेष रीति और क्रम बताता है, ताकि हमें दिखाए कि जब बाहरी दिखावे में परमेश्वर हम से दूर हुआ-सा लगे, तब भी हमें सावधान रहना चाहिए कि यही बात हमें उसकी शरण में आने से न रोक दे। अब यह बहुत सम्भव है कि कभी-कभी ऐसा प्रतीत हो कि परमेश्वर हमारी सुधि नहीं लेता, विशेषकर जब वह दुष्टों को जहाँ चाहें दौड़ने देता और जो चाहें करने देता है।

अब यह एक भयानक परीक्षा है। और क्यों? क्योंकि एक ओर हम सोचते हैं कि यदि परमेश्वर हमें अपनी सन्तान समझता और हम से प्रेम रखता जैसा वह गवाही देता है, तो क्या वह तुरन्त हमारे दुःखों पर तरस न खाता? क्या वह हमारी सहायता के लिये अपना हाथ न बढ़ाता? तो जब वह हमें इस प्रकार अन्याय से पैरों तले रौंदे जाने देता है, तो यह इस बात का चिह्न है कि उसने हमें त्याग दिया है, और उसे न हमारी चिन्ता है, न हमारे कुशल की।

देखो, यह बहुत कठिन और भारी परीक्षा है। और दूसरी यह कि प्रतीत होता है कि परमेश्वर अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा। यह कैसे? देखो, अभक्त लोग उससे कैसे झगड़ पड़ते हैं, मानो वे उसे खुली चुनौती दे रहे हों। क्योंकि क्या यह उससे युद्ध करना नहीं है जब वे अपने आप को दुष्टता करने की छूट देते हैं, कि चाहे उनसे कुछ भी कहा जाए, वे कभी भलाई की ओर नहीं लाए जा सकते? और तौभी परमेश्वर ऐसा बर्ताव करता है मानो उसे उनके दुष्ट कामों की कोई चिन्ता नहीं। हम देखते हैं कि ये दो अद्भुत रूप से खतरनाक परीक्षाएँ हैं। और इसी कारण विशेष रूप से दाऊद ने यहाँ उन सतावों का वर्णन किया है जो उसने दुष्टों के हाथों सहे।

अब ऐसा है कि वह ऐसे संघर्षों में पड़ा हुआ, इन दोनों परीक्षाओं से, जिनका मैंने उल्लेख किया, लड़ते हुए, भली-भाँति दिखाता है कि वह फिर भी विजयी बना रहा। और देखो, वह क्यों कहता है, "तेरे दास के कितने दिन रह गए हैं? तू मेरे सतानेवालों से कब बदला लेगा?" दाऊद यह जताता है कि उसने यह निवेदन तब तक नहीं किया जब तक वह इस चरम सीमा तक न पहुँच गया कि वह और सह न सकता था। मानो वह कह रहा हो, "हाय, मेरे भले परमेश्वर, क्या तू मेरे मर जाने के बाद मेरी सहायता करेगा? क्योंकि तू देखता है कि मैं पहले ही इतना सह चुका हूँ कि और सहना सम्भव नहीं; तू मुझे कब्र के किनारे पर देखता है: अब समय है, नहीं तो कभी नहीं, सहायता करने का। परन्तु तौभी मुझे तुझ से कोई सहायता आती दिखाई नहीं देती। और इसका क्या कारण है? तू यह कब करेगा?" यह अनिवार्य है कि जब दाऊद ने इस रीति से परमेश्वर को पुकारा, तब उसका क्लेश मानो असह्य था। इसलिये हमें इस स्थान पर और भी अधिक मनन करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमें केवल थोड़े समय के लिये ही क्लेश सहने देता है, तौभी वह हमारे लिये इतना लम्बा लगता है कि हम पूरी तरह सताए जाकर कहेंगे, "मैं नहीं जानता मैं कहाँ हूँ, और इसमें क्या करूँ।" परमेश्वर अपनी सहायता में इतना विलम्ब क्यों करता है? क्योंकि उसे पुकारने के बदले इसमें सन्देह नहीं कि हम उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं, वरन् मानो छिपकर कराहते भी हैं। अब इन परीक्षाओं को जीतने का, और अपने क्लेशों में परमेश्वर के विरुद्ध ऐसे कुड़कुड़ाने से बचने का सही उपाय यह है: पूरे निश्चय के साथ उसे पुकारना, और उससे बिनती करना कि वह हमें अपना अनुग्रह दे, कि उन सब क्लेशों के होते हुए भी जो वह हम पर डालता है, वह हमें उस बात की आशा रखने से न छोड़े जिसकी उसने हम से प्रतिज्ञा की है। और यही बात दाऊद और भी पूरी रीति से बताता है, जब यह कहने के बाद कि अभक्तों ने उसके लिये गड़हे खोदने का यत्न किया है, जो उसकी व्यवस्था के अनुसार नहीं हैं, वह आगे कहता है,

"तेरी सब आज्ञाएँ सच्ची हैं; वे मुझे झूठ-मूठ सताते हैं, तू मेरी सहायता कर।"

यहाँ वह बताता है कि उन्होंने उसके साथ कैसे अन्याय और अत्याचार किए। वह कहता है, "उन्होंने मेरे लिये गड़हे खोदे हैं," वरन् वह गवाही देता है कि उन्होंने यह अन्याय से किया, कि उसने दुष्टों को हानि पहुँचाने का कभी कोई अवसर न दिया, वरन् वह भले और शुद्ध विवेक से चलता रहा। तौभी, वह कहता है, "उन्होंने मुझे चारों ओर से घेरकर फँसाने का यत्न किया है।" तो हम देखते हैं कि दाऊद पर छोटे आक्रमण नहीं हुए थे, वरन् ऐसे जो प्राणघातक थे, कि बिना किसी सन्देह के उसका पूरी तरह घबरा जाना अनिवार्य था। वरन् यद्यपि उसने उनमें से किसी को कभी हानि न पहुँचाई थी कि यह कहा जा सके कि उसने उन्हें अन्याय से सताया है, तौभी वह सदा परमेश्वर की शरण में आता रहा। तो अब हम उस शिक्षा में और भी दृढ़ किए जा सकते हैं जिसकी हम पहले चर्चा कर चुके हैं: अर्थात् हमारे क्लेशों में हम चाहे जिस चरम सीमा तक धकेले जाएँ, तौभी हम उन्हें बहुत अच्छे अन्त तक पहुँचाएँगे, जब हम परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य से सुरक्षित होकर उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर दृष्टि रखें। अब देखें कि वह क्यों आगे कहता है, "तेरी आज्ञाएँ सच्ची हैं, वे मुझे झूठ-मूठ सताते हैं, हे मेरी सहायता कर।" दाऊद यहाँ तीन बातें रखता है। एक यह कि परमेश्वर सच्चा है, फिर वह अपने भले आचरण और चाल-चलन की, और अपने विरोधियों की द्वेषपूर्णता की गवाही देता है। तीसरे, वह अपने क्लेशों में परमेश्वर को पुकारता है।

अब जहाँ तक पहली बात का सम्बन्ध है, वह हमें दिखाता है कि यद्यपि शैतान हमें हिला देने और अन्त में बिलकुल बहा ले जाने के लिये चालाकी और धूर्तता से हमें धोखा देने का यत्न करता है, हमें इसके विपरीत यह सीखना चाहिए कि उसकी घातों को कैसे पहचानें और उनसे अपने आप को कैसे बचाएँ। तो जितनी बार हम विपत्ति और क्लेश से दुःखी हों, हमें कहाँ से आरम्भ करना चाहिए? देखो, शैतान कैसे अपने जाल बिछाता है और घात लगाता है कि हमें उनमें आने के लिये फुसलाए और मनाए। वह कहता है, क्या तू नहीं देखता कि तेरे परमेश्वर ने तुझे त्याग दिया है? वे प्रतिज्ञाएँ कहाँ हैं जिन पर तूने भरोसा रखा था? अब यहाँ तू अपने आप को अभागा और निराश्रय प्राणी देखता है। तो तू ठीक देखता है कि परमेश्वर ने तुझे धोखा दिया, और जिन प्रतिज्ञाओं पर तूने भरोसा रखा था उनका तुझ से कोई सम्बन्ध नहीं। देखो, यह शैतान की धूर्तता है। अब क्या करना चाहिए? हमें दाऊद के साथ यह निष्कर्ष निकालना चाहिए और कहना चाहिए, तौभी परमेश्वर सच्चा और विश्वासयोग्य है। मैं कहता हूँ, हम परमेश्वर की सच्चाई को ढाल के समान स्मरण रखें, जिससे हम उन सब बातों को पीछे हटा दें जो शैतान हम पर दोष लगाने के लिये रख सकता है, जब वह हमें अपने विश्वास का इन्कार कराने का यत्न करे, जब वह हमारे विषय में झूठ भी बोले कि हमें विश्वास दिलाए कि परमेश्वर को अब हमारी चिन्ता नहीं, या फिर यह कि उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखना हमारे लिये व्यर्थ है। परन्तु हम इसके बिलकुल विपरीत जानें कि जो कुछ परमेश्वर हम से कहता है वह बिलकुल स्पष्ट और खरा सत्य है। चाहे शैतान हम पर कितने ही तीर चलाए, चाहे उसके पास हमारे विरुद्ध कितने ही अत्यधिक उपाय हों, चाहे कभी बल से, कभी धूर्तता और चतुराई से, हमें सचमुच ऐसा प्रतीत हो कि वह हम पर प्रबल हो जाएगा: तौभी वह कभी ऐसा न कर पाएगा कि परमेश्वर का सत्य हमारे हृदयों में निश्चित और दृढ़ न रहे। और पहली बात के विषय में इतना ही।

दाऊद जो गवाही देता है, वह हमें इसके लिये उभारे कि हम अपने पड़ोसियों के साथ ऐसी रीति से चलें कि उन्हें हमें हानि पहुँचाने का कोई अवसर न दें; वरन् एक दूसरे के साथ सीधाई और सरलता से जीवन बिताएँ। दुष्ट लोग एक दूसरे को हानि पहुँचा सकते हैं, वरन् अपना ही नाश भी कर सकते हैं; परन्तु इस बीच परमेश्वर की सन्तान के पास सदा यह गवाही होनी चाहिए कि वे न तो उनकी कोई हानि करेंगे, न करवाएँगे, वरन् उन्हें सीधे विनाश की ओर दौड़ते देखकर दुःखी और शोकित होंगे।

जब हम में यह मन होगा, तब हमारे पास परमेश्वर को पुकारने के लिये उत्तम प्रवेश होगा; परन्तु इसके विपरीत यदि हम अपने शत्रुओं से सताए जाने पर बुराई के बदले बुराई करें, और वैसा ही करने को स्वयं को विवश करें, और उनसे (जैसा हम कहते हैं) हिसाब बराबर कर दें, तो हमारा पक्ष पूरी तरह गिर जाएगा। और ऐसा क्यों? क्योंकि यदि हम ऐसे बदला लेनेवाले होंगे, तो हमारे लिये यह विश्वास करना और भरोसा रखना असम्भव है कि परमेश्वर हमारी सहायता करेगा। वरन् तब भी, मैं कहता हूँ, जब हमारा पक्ष अच्छा और न्यायसंगत हो। क्योंकि यदि हमारा विवेक शुद्ध न होगा तो परमेश्वर हमें दोषी ठहराएगा; और यद्यपि कुछ ऐसे लोग हैं जो हमारी हानि चाहते और करते हैं, हमें कहना चाहिए, हे प्रभु, यह अन्याय और झूठ से किया जा रहा है। परन्तु (जैसा मैं पहले छू चुका हूँ) हमारे हृदयों में ऐसी गवाही हो कि यद्यपि जो हमें सताते हैं वे शैतान के औज़ार और अंग हैं और केवल द्वेष से ऐसा करते हैं, तो भी हम उलटे उन्हें कोई हानि या अप्रसन्नता न पहुँचाएँ। तब हम दाऊद के साथ परमेश्वर को पुकार सकते हैं, यह जानकर कि वह उन्हें कभी न त्यागेगा जो अन्याय से सताए जाते हैं। तो देखो, इन तीन बातों का क्या अर्थ है जिनका यहाँ उल्लेख हुआ है। अब दाऊद यह कह चुकने के बाद आगे कहता है,

"उन्होंने मुझे पृथ्वी पर से प्रायः मिटा ही डाला था; परन्तु मैंने तेरे आदेशों को नहीं छोड़ा।"

देखो, यह एक ऐसा वचन है जिसे भली-भाँति तौलना चाहिए। यह बहुत सच है कि दाऊद उसी को दुहराता है जो वह पहले कह चुका था: वह कहता है, "हे प्रभु, मैंने तेरी आज्ञाओं को नहीं छोड़ा, यद्यपि मैं बिलकुल सूखे हुए के समान और पूरी तरह निराश्रय मनुष्य के समान था, तौभी मैंने तेरी आज्ञाओं को नहीं छोड़ा।" अब यह अनिवार्य है कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता में ऐसे दृढ़ और स्थिर बने रहने में दाऊद ने दो परीक्षाओं का सामना किया। पहली यह कि वह किसी संकट में पड़ सकता था। दूसरी यह कि वह दुष्टता करने की ओर झुक सकता था। और ऐसा क्यों? क्योंकि दुष्टों ने उसे अन्याय से सताया था, वह उनसे बदला ले सकता था। देखो, ये दो आक्रमण थे जिन्हें सहना और टालना उसके लिये उचित था। इसी प्रकार हमें भी उसके उदाहरण पर चलना चाहिए: क्योंकि जब मनुष्य हमें अन्याय से सताएँ और दुःख दें, और वे हमारे साथ केवल एक अन्याय न करें, वरन् दो या तीन करें; परन्तु हमारा क्लेश बिना अन्त और बिना विराम के चलता रहे, तौभी हम धीरज धरना सीखें। और विशेषकर जब बात थोड़ी हानि, या छोटे दुःख को सहने की न हो, वरन् हम पर प्राणघातक सताव आए और हमारा जीवन भी मानो निराशाजनक हो, मानो हम पहले ही भेड़िये के गले में हों, वरन् मानो पहले ही निगल लिये गए और खा लिये गए मनुष्यों के समान हों। जब हम ऐसी दशा तक पहुँचा दिए जाएँ, तब भी हम दाऊद के साथ यह कहने से न रुकें,

"मैंने तेरे आदेशों को नहीं छोड़ा।"

और इसलिये कि हम इस शिक्षा का बेहतर अभ्यास कर सकें और इसे अपने उपयोग और लाभ में ला सकें, तो आओ, हम अपने सब क्लेशों में परमेश्वर की शरण में आना सीखें, और उसे अपना जमानती और रक्षक होने के लिये पुकारें। और इस बीच, यद्यपि हम अन्याय से सताए जाएँ, तौभी हम उससे बिनती करें कि वह हमें अपना अनुग्रह दे कि हम उस बात के अधीन हो जाएँ जिसकी उसने हमें आज्ञा दी है: अर्थात् अपने शत्रुओं से प्रेम रखें, उनकी भलाई करें जो हमारी जितनी हानि कर सकते हैं करने का यत्न करते हैं, उनके लिये प्रार्थना करें जो हमारी निन्दा करते हैं और हमारा जितना बुरा हो सके चाहते हैं। देखो, हमें यहाँ परमेश्वर की आज्ञाओं पर मनन करना है, चाहे हम पृथ्वी पर मानो मिटा ही दिए जाएँ।

अब यहाँ हमें यह ध्यान देना है कि दाऊद ने जो कहा कि वह प्रायः मिटा दिया गया था, वह निराधार नहीं था: क्योंकि हम में भी ऐसा ही होगा जब मनुष्य हमारा न्याय करेंगे और हमें दोषी ठहराएँगे, और हम अपने भीतर ही मृत्युदण्ड पा चुके होंगे: जैसा सन्त पौलुस 2 कुरिन्थियों में कहता है। इसी प्रकार दाऊद, मानो मृत्युदण्ड पाए हुए के समान, और छुटकारे की कोई सम्भावना न देखते हुए भी, परमेश्वर को पुकारने से न रुका। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए, यह जानकर कि वह हमें कभी न त्यागेगा: क्योंकि देखो, इसका क्या कारण है कि परमेश्वर प्रायः अपना सहायक हाथ हम से रोके रखता है, वरन् तब जब हम अपनी ही हल्केपन और अस्थिरता के कारण उसके आगे-आगे दौड़ पड़ते हैं। क्योंकि जैसे ही हम सामान्य से कुछ अधिक दुःखी होते हैं, हम तुरन्त निष्कर्ष निकाल लेते और कहते हैं, "हाय, सब कुछ व्यर्थ है; हम बिलकुल नष्ट हो गए; सारी आशा जाती रही।" जब हम इस प्रकार उसके आगे-आगे दौड़ते हैं, तो यह उस मनुष्य के समान है जो मरने से पहले ही अपने आप को कब्र में डाल दे और इस प्रकार अपना दम घोंट ले। मैं कहता हूँ, इसी रीति से हम उस सहायता के आगे-आगे दौड़ पड़ते हैं जिसे परमेश्वर ने तब तक के लिये रोक रखा है जब तक वह समय न आ जाए जिसे वह सब से उचित जानता है। तो आओ, भली-भाँति विचार करें कि जब परमेश्वर वह सहायता रोके रखे जो वह हमें देना चाहता है, तब भी, चाहे हम मरे हुओं के समान दिखाई दें और हमारा जीवन निराशाजनक प्रतीत हो, वह घड़ी भर में हमें फिर बहाल कर सकता है; चाहे मनुष्यों की दृष्टि में हम मृत्यु की मूर्तियों के समान ही हों, तौभी वह हमें भीतर से जीवन-रहित नहीं छोड़ता। क्योंकि जैसे जाड़े में हम पेड़ों को मानो मरा हुआ देखते हैं कि न रस, न पत्ता, न कुछ और दिखाई देता है, तौभी उनमें जीवन छिपा रहता है। हमारा भी यही हाल है: क्योंकि जब हम चुपचाप और शान्त होकर परमेश्वर के हाथों से सहायता की प्रतीक्षा करें, तो हमें निश्चय है कि जब जाड़ा बीत जाएगा, अर्थात् हमारे क्लेशों का समय, तब परमेश्वर हमें वह जीवन देगा जो पहले मानो छिपा हुआ था। अब भजन को समाप्त करते हुए वह कहता है,

"अपनी करुणा के अनुसार मुझे जिला; तब मैं तेरे मुँह की चितौनियों को माना करूँगा।"

हम यहाँ देखते हैं कि दाऊद ऐसे बोलता है जैसे कोई मरा हुआ हो; जब वह कहता है, "हाय, मुझे जिला," तो वह दिखाता है कि उसे छड़ी से हल्के हाथ नहीं मारा गया था, न किसी साधारण क्लेश से, वरन् उसे चरम सीमा तक दण्ड दिया गया था। क्योंकि वह ऐसा सूख गया था, जैसा हम पहले कह चुके हैं, कि उसमें कोई सार बचा ही नहीं था। देखो, दाऊद ने इस रीति से अपनी विनती क्यों की।

तो आओ, हम यह सीखें कि जब प्रभु हमारा परमेश्वर हम पर किसी छोटे से क्लेश से भी आए, तब हम अपनी चापलूसी न करें, मानो हम पर्याप्त कर चुके हों यदि हमने उसे पुकार लिया: परन्तु यदि हम यह एक लाख गुना और भी कर चुके हों, तौभी हमें प्रार्थना करने और उसे पुकारने से रुकना नहीं चाहिए। और इसी में मनुष्यों का कपटपूर्ण व्यवहार देखा जा सकता है: क्योंकि वे ऐसे स्त्रैण मन और कोमल हृदय के हैं कि जब उन्होंने थोड़ा-सा भी, वरन् घड़ी भर के मोल का भी क्लेश सहा हो, तो वे समझते हैं कि उन्होंने दस लाख चमत्कार कर डाले।

और फिर, यदि वे किसी क्लेश से दब जाएँ, तो वे समझते हैं कि उन्हें साहस है कि परमेश्वर और उसके वचन दोनों को बिलकुल भुला दें। परन्तु हमारा भला परमेश्वर नहीं चाहता कि हम ऐसे चलें: क्योंकि वह यहाँ हमारी शिक्षा के लिये दाऊद का उदाहरण हमारे सामने रखता है, परन्तु उसने इसे हमारे सामने इसी अभिप्राय और उद्देश्य से रखा है कि हम अपने क्लेशों में उसे पुकारते रहने से न रुकें: वरन् हमारे क्लेश चाहे कितने ही बड़े हों और कितने ही लम्बे चलें, तौभी हम निरन्तर प्रार्थना में दृढ़ बने रहें।

संक्षेप में, हम यह समझें कि दाऊद ने यह प्रार्थना उस समय की जब उसे आशा न थी कि वह और जीवित रहेगा, वरन् वह मरे हुए के समान था, जब वह कहता है, "हाय, मुझे जिला।"

और फिर, हम देख सकते हैं कि उसकी दृढ़ता हवा के झोंके के समान न थी, वरन् वह उसमें बना रहा। क्योंकि यद्यपि उसके संकटों के कारण वह मानो बहुत गहरे गड्ढे में था जिसमें से वह निकल नहीं सकता था, तौभी वह इस भरोसे से कभी न रुका कि परमेश्वर उसे उसमें से निकालेगा: और इसी पर उसने उसे पुकारा और बड़ा साहस पाया। विशेष रूप से वह परमेश्वर की करुणा के अनुसार जिलाए जाने की इच्छा करता है। क्योंकि यदि हम चाहते हैं कि हमारी सुनी जाए, तो हमें भी इस बात पर होना चाहिए कि जानें कि परमेश्वर केवल अपने अनुग्रह और कृपा से हमारे प्रति बँधा है: और यह भी कि यदि हम चाहते हैं कि वह अपनी प्रतिज्ञाएँ हमारे लिये पूरी करे, तो हमें उसी की शरण में आना होगा। इसलिये मनुष्यों को अपने आप को धोखा नहीं देना चाहिए कि अपने ही कामों को देखें, न संसारी साधनों पर ध्यान दें: वरन् वे उसे परमेश्वर में और उसकी केवल भलाई और सेंत-मेंत दान में ढूँढ़ें, जिसके कारण वह उनकी सुनेगा और उन्हें अपने पास भी ग्रहण करेगा। अन्त में दाऊद गवाही देता है कि वह परमेश्वर के मुँह की चितौनियों को मानेगा। अब हम इससे यह न समझें कि उसने उन्हें पहले नहीं माना था: क्योंकि हम इसके बिलकुल विपरीत देख चुके हैं। परन्तु यह इस बात को जताने के लिये है कि जब उन क्लेशों के बीच जो मैंने सहे, तूने सदा मुझे विश्वास में स्थिर रहने का अनुग्रह दिया, और मैं निरन्तर तुझ पर लगा रहा, शैतान ने मुझे डिगाकर दुष्टता करने पर नहीं उतारा, तो हे प्रभु, जब तूने मुझे उस समय ऐसी दृढ़ता दी जब तू मुझ से दूर हुआ-सा था: तो और भी प्रबल कारण से, जब तू मेरा सहायक और रक्षक होगा, और मुझे बहाल करेगा, तब मुझ में तेरे मुँह की चितौनियों को मानने की कहीं अधिक दृढ़ता होगी। तो देखो, हमारे सब क्लेशों के बीच हमें किस प्रकार परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए, उसके विश्वासयोग्य व्यवहार पर सन्देह न करते हुए कि जो कुछ उसने प्रतिज्ञा की है वह पूरा करेगा, अन्त में हम पर दया करेगा, और हमें अपने मुँह की चितौनियों को मानने में और अधिक दृढ़ करता जाएगा: यह जानते हुए कि वह हमारे साथ वही करता रहेगा जो वह पहले एक बार हमें दिखा चुका है।

और इस शिक्षा के अनुसार, आओ हम अपने भले परमेश्वर की उपस्थिति में दण्डवत् करें, अपने अपराधों को मानते हुए: उससे बिनती करते हुए कि वह प्रसन्न होकर हमारी आँखें और अच्छी रीति से खोल दे कि हम उसके वचन की सामर्थ्य और शक्ति को देख सकें, और उस पर टिके रहें: हम से वह सारा हल्कापन और अस्थिरता दूर करके जो हमें उससे फेर सकती है; यह भी चाहते हुए कि वह हमें इधर-उधर भटकने न दे, जैसा हम सामान्यतः भटकने के आदी हैं, कि हम सीधे मार्ग से फिर जाएँ, क्योंकि हम स्वभाव से इस ओर बहुत झुके हुए हैं: परन्तु पूरी तरह निश्चय करते हुए कि जो उसने हम से कहा है वह व्यर्थ नहीं है, कि वह हमारी सब आवश्यकताओं में, जो हम सच्चे विश्वास से उससे माँगें, हमारी सहायता करेगा: वरन् केवल हमारे छोटे और साधारण क्लेशों में नहीं: परन्तु तब भी जब वह समझे कि हम बिलकुल उलट दिए जाने वाले हैं: यह जानते हुए कि जिस किसी की हम आशा रखें और विश्वास की आँखों से देखें, उसे वह हमारे लाभ और कुशल के लिये पूरा करेगा। आओ हम उससे बिनती करें कि वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी की सब जातियों और लोगों को भी दे। इत्यादि।

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