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अध्याय चार: विश्वास के विषय में, जिसमें प्रेरितों के विश्वास-वचन की व्याख्या की गई है (भाग 6 / 6)
शरीर का पुनरुत्थान; अनन्त जीवन
यहाँ हमें अपनी धन्यता का लक्ष्य और उसकी पूर्णता मिलती है। पहले, शरीर के पुनरुत्थान का हमें आश्वासन दिया गया है, जिसके द्वारा हम अनन्त जीवन के अधिकारी बनते हैं, क्योंकि हमारा मांस और लहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न नाशवान अविनाशी का अधिकारी हो सकता है। यदि हम इसे मनुष्य की बुद्धि के अनुसार परखें, तो इसका विश्वास करना केवल कठिन ही नहीं, वरन् सर्वथा अविश्वसनीय है। इसी कारण, यद्यपि बहुत-से दार्शनिक आत्मा की अमरता से पूर्णतः अनजान नहीं थे, फिर भी उनमें से किसी के मन में शरीर के पुनरुत्थान का तनिक भी विचार नहीं आया। क्योंकि कौन कल्पना कर सकता है कि जो देह हमारे पास अब है—जिनमें से कुछ भूमि में सड़ जाती हैं, कुछ को कीड़े खा जाते हैं, कुछ को पक्षी या पशु खा जाते हैं, और कुछ आग से भस्म होकर राख हो जाती हैं—वे किसी दिन पूर्ण रूप से फिर बनाई जाएँगी?
तौभी प्रभु ने इस कठिनाई के विरुद्ध अद्भुत प्रबन्ध किया है; उसने न केवल इस आनेवाले पुनरुत्थान की वचनों में निश्चित साक्षी दी, वरन् यीशु मसीह में हमें इसका प्रत्यक्ष आश्वासन भी दिया। इस प्रकार जो बात अन्यथा अविश्वसनीय प्रतीत होती, वह हमारी आँखों के सामने प्रकट कर दी गई है। इसलिए यदि हम ठीक रीति से समझना चाहते हैं कि यह पुनरुत्थान कैसा होगा, तो हमें सदा यीशु मसीह की ओर देखना चाहिए, जो इसका दर्पण भी है और सार भी। प्रेरित भी हमें यही चिताता है, जब वह हमारी देह की पुनःस्थापना को प्रभु यीशु की महिमामय देह के समरूप होना बताता है।
जैसे वह उसी देह में जिलाया गया जिसमें उसने दुःख उठाया था, यद्यपि पुनरुत्थान के पश्चात् उस देह में ऐसी महिमा थी जो पहले की महिमा से सर्वथा भिन्न थी, वैसे ही हम भी उसी मांस में जी उठेंगे जिसे हम अब धारण किए हुए हैं, और फिर भी पुनरुत्थान के पश्चात् हम वैसे नहीं होंगे जैसे अब हैं। सन्त पौलुस इस भेद को कई उपमाओं से समझाता है। मनुष्यों का मांस और पशुओं का मांस एक ही पदार्थ का है, फिर भी उनके गुण भिन्न हैं। तारे एक ही तत्त्व के हैं, परन्तु एक ही गुण के नहीं। इसी प्रकार हम अपनी देह का पदार्थ तो बनाए रखेंगे, परन्तु उसका गुण बदल जाएगा। इसलिए यह देह जो अब नाशवान है, हमारे पुनरुत्थान में नष्ट नहीं होगी, वरन् नाश को उतारकर अविनाशी बनाई जाएगी; और मरणशीलता को उतारकर अमर बनाई जाएगी।
इसलिए प्रभु के लिए कोई कठिनाई नहीं होगी कि न्याय के दिन से पहले जिन्हें मृत्यु ने निगल लिया है, उन सब को उसी सामर्थ्य से नाश से छुड़ाकर फिर बनाए, जो उसने अपने पुत्र को जिलाने में प्रकट की। क्योंकि जो लोग उस समय जीवित होंगे, वे मृत्यु के साधारण क्रम से नहीं, वरन् अचानक रूपान्तरण के द्वारा अमरता में प्रवेश करेंगे।
और क्योंकि यह भविष्यद्वाणी कि मृत्यु जय में निगल ली गई, तब पूरी तरह पूरी होगी, इसलिए पुनरुत्थान के साथ अनन्त जीवन का भी उल्लेख किया गया है। यदि मनुष्य की प्रत्येक जीभ इस जीवन की उत्तमता के विषय में जो कुछ कह सकती है सब कह डाले, तो भी उसका अत्यन्त छोटा अंश ही छुआ जाएगा। क्योंकि यद्यपि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि परमेश्वर का राज्य महिमा, आनन्द और धन्यता से परिपूर्ण है, तथापि जो कुछ वह कहता है वह हमारी समझ से बहुत परे है और मानो रूपकों के नीचे ढका हुआ है, जब तक वह दिन न आए जिसमें प्रभु हम पर आमने-सामने प्रकट होगा। इसलिए, क्योंकि भविष्यद्वक्ता इस आत्मिक धन्यता को उसके वास्तविक सार में व्यक्त नहीं कर सकते थे, उन्होंने उसे शारीरिक रूपकों के अधीन चित्रित और वर्णित किया। तथापि, क्योंकि हमारे हृदयों में उसके प्रति प्रेम और उसकी आशा प्रज्वलित होनी चाहिए, हमें मुख्यतः इसी विचार पर ठहरना चाहिए।
वह यह कि, चूँकि परमेश्वर हमारे जीवित सोते के रूप में अपने भीतर हर भलाई की परिपूर्णता रखता है, इसलिए जो परम भलाई और धन्यता के प्रत्येक अंश की अभिलाषा रखते हैं, वे उससे बढ़कर कुछ नहीं चाह सकते। सन्त पतरस घोषणा करता है कि विश्वासी ईश्वरीय स्वभाव के भागी होने के लिए बुलाए गए हैं। यह कैसे? यह इसलिए कि प्रभु अपने सन्तों में महिमा पाएगा और उनमें जिन्होंने उसके सुसमाचार पर विश्वास किया है, आदर पाएगा। यदि प्रभु अपनी महिमा, सामर्थ्य और धार्मिकता अपने चुने हुओं को देगा—वरन् अपने आप को उन्हें देगा—तो हमें समझना चाहिए कि हर भलाई इसी अनुग्रह के अन्तर्गत समाई हुई है। और जब हम इस पर मनन करने में बहुत आगे भी बढ़ चुके हों, तब भी हमें यह समझना चाहिए कि हम अब तक बिलकुल निचले स्थान पर हैं, केवल द्वार की देहली पर खड़े हैं, और इस जीवन में हम इस भेद की महानता के निकट कभी नहीं पहुँचेंगे।
यदि यहाँ न दुष्टों के पुनरुत्थान का और न उनके लिए ठहराई गई अनन्त मृत्यु का उल्लेख है, तो इसमें आश्चर्य नहीं। क्योंकि यहाँ केवल वे ही बातें रखी गई हैं जिनसे विश्वासी के विवेक को सान्त्वना, पोषण और उद्धार के भरोसे में दृढ़ता मिलनी चाहिए। फिर भी जिज्ञासु मन यह कल्पना न करें कि दुष्ट इसलिए नहीं जी उठेंगे कि विश्वास-वचन में उनके पुनरुत्थान की कोई साक्षी नहीं है। इस जीवन के पश्चात् दुष्टों की दशा अन्यत्र पर्याप्त रूप से प्रकट की गई है, और वह सब कुछ जो उन्हें थरथराने वाला है, स्पष्ट रूप से बताया गया है। इसलिए हमें ऐसी बातें विश्वास-वचन में नहीं ढूँढ़नी चाहिए, जिसमें केवल वही विषय है जो हमारे विश्वास को स्थापित करने और बढ़ाने के लिए आवश्यक है।
क्या प्रभु यीशु सार्वभौमिक पुनरुत्थान की पर्याप्त स्पष्ट साक्षी नहीं देता, जब वह कहता है कि वह सब जातियों को अपने सामने इकट्ठा करेगा और उन्हें एक-दूसरे से ऐसे अलग करेगा जैसे चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग करता है? इसी प्रकार एक और स्थान पर:
“जिन्होंने भलाई की है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिए निकलेंगे, और जिन्होंने बुराई की है वे दण्ड के पुनरुत्थान के लिए।”
इससे अधिक स्पष्ट हम क्या माँग सकते हैं कि यहूदिया के हाकिम फेलिक्स के सामने सन्त पौलुस ने यह अंगीकार किया कि वह दुष्टों और धर्मियों दोनों के आनेवाले पुनरुत्थान की प्रतीक्षा करता है? इसलिए जब सार्वभौमिक पुनरुत्थान इतनी साक्षियों से इतनी दृढ़ता से स्थापित है, तो ओछे मन की भीड़ को उस पर सन्देह नहीं करना चाहिए। वस्तुतः धर्मियों का प्रतिफल और दुष्टों का दण्ड ऐसे घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं कि एक अनिवार्य रूप से दूसरे को अपने साथ ले आता है। इसलिए जो भी यह साक्षी देता है कि एक होगा, वह उसी समय दूसरे को मानकर चलता है। प्रभु भविष्यद्वक्ता के द्वारा यह स्पष्ट बताता है:
“पलटा लेने का दिन मेरे मन में था, और मेरे छुड़ाए हुओं का वर्ष आ पहुँचा।”
इसी प्रकार एक और स्थान पर:
“तुम देखोगे, और तुम्हारा हृदय आनन्दित होगा, और तुम्हारी हड्डियाँ हरी घास के समान लहलहाएँगी; और यहोवा का हाथ उसके दासों पर प्रकट होगा, और उसका क्रोध उसके शत्रुओं पर।”
क्योंकि यह इस संसार में केवल धुँधले रूप से होता है और यहाँ कभी पूर्ण रूप से पूरा नहीं होता, इसलिए यह उचित रूप से प्रतिफल के उस अन्तिम दिन से सम्बन्ध रखता है, जब परमेश्वर का न्याय और उसकी धार्मिकता प्रकट होगी।
परन्तु क्योंकि कोई भी वर्णन यह दिखाने के लिए पर्याप्त नहीं कि दुष्टों के दण्ड कितने भयानक होंगे, इसलिए जो यातनाएँ उन्हें सहनी होंगी वे हमें शारीरिक वस्तुओं के द्वारा दर्शाई गई हैं: अन्धकार, रोना, दाँत पीसना, अनन्त आग, और हृदय को निरन्तर कुतरते कीड़े। क्योंकि यह निश्चित है कि ऐसे वचनों के द्वारा पवित्र आत्मा का अभिप्राय एक ऐसे चरम आतंक को सूचित करना था जो सब शक्तियों को दबा देता है। इसीलिए वह कहता है कि उनके लिए अनादिकाल से एक गहरा नरक (गेहेन्ना) तैयार किया गया है, जो आग से जलता है, और जिसमें उसे बनाए रखने के लिए लकड़ी सदा तैयार रहती है, और परमेश्वर का श्वास गन्धक की धारा के समान उसे सुलगाता है।
यद्यपि ऐसे वचनों को हमें दुष्टों की दयनीय दशा की कुछ धारणा कराने की शिक्षा देनी चाहिए, तथापि हमें मुख्यतः इसी पर विचार टिकाना चाहिए: परमेश्वर की सब संगति से अलग किया जाना कितनी बड़ी दुर्दशा है। और केवल यही नहीं, वरन् उसकी महिमा को अपने विरुद्ध अनुभव करना भी—ऐसी महिमा जिससे हम भाग नहीं सकते, परन्तु जो निरन्तर हमारा पीछा करती है। क्योंकि पहले तो उसका क्रोध धधकती आग के समान है जो अपने स्पर्श मात्र से सब कुछ भस्म और निगल जाती है। फिर सारी सृष्टि उसके क्रोध की कठोरता को पूरा करने में उसकी ऐसी सेवा करती है कि जिन पर परमेश्वर ने अपना कोप प्रकट किया है, वे सब आकाश, पृथ्वी, समुद्र, प्रत्येक पशु और अन्य सब वस्तुओं को अपने विनाश और सत्यानाश के लिए शस्त्र-सज्जित अनुभव करते हैं।
इसलिए प्रेरित ने कोई छोटी बात नहीं कही जब उसने कहा कि अविश्वासी लोग प्रभु के सम्मुख से और उसकी सामर्थ्य की महिमा से अनन्तकाल तक दण्ड पाएँगे। क्योंकि यदि बेचारा विवेक, अपने आप को परमेश्वर की उपस्थिति में देखकर और उसका क्रोध अनुभव करके, इतना फटता, बिंधता, कुचलता, पीड़ित होता, छिदता, चूर-चूर और टूटता है कि हज़ार अथाह गड्ढों में निगल लिया जाना इस यातना को एक क्षण भी सहने से अधिक मधुर होता, तो परमेश्वर के क्रोध के नीचे सदा और बिना रुके बन्द रहना कितना भारी होगा?
जहाँ तक सहस्रवादियों (Chiliasts) की भूल का प्रश्न है, जिन्होंने मसीह के राज्य और शैतान तथा उसके अंगों के पराजय को एक हज़ार वर्ष तक सीमित कर दिया है, वह इतनी ओछी और बचकानी है कि उसके खण्डन की न आवश्यकता है और न वह खण्डन के योग्य ही है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र ऊँचे और स्पष्ट स्वर से घोषित करता है कि न चुने हुओं की धन्यता का कभी अन्त होगा और न दुष्टों की यातना का। या तो हमें उन बातों के विषय में, जो आँख से अदृश्य हैं और मनुष्य की बुद्धि से समझी नहीं जा सकतीं, अपनी निश्चयता परमेश्वर के वचन से लेनी चाहिए, या फिर उनके विषय में कुछ भी विश्वास नहीं करना चाहिए।
जो लोग परमेश्वर की सन्तानों के लिए आनेवाले जीवन की धन्यता केवल एक हज़ार वर्ष ठहराते हैं, वे नहीं देखते कि वे मसीह और उसके राज्य दोनों की कितनी हानि करते हैं। क्योंकि यदि विश्वासियों को अमरता का वस्त्र नहीं पहनाया जाना है, तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि मसीह—जिसकी महिमा के समरूप वे होंगे—अमर महिमा में ग्रहण नहीं किया गया। यदि उनकी धन्यता का अन्त है, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि मसीह का राज्य, जिसमें वे निवास करते हैं, क्षणिक है। सारांश यह कि ऐसे लोग या तो ईश्वरीय बातों से सर्वथा अनजान हैं, या फिर बड़ी दुर्भावना से परमेश्वर के सारे अनुग्रह और मसीह की सामर्थ्य को उलट देने का यत्न करते हैं, जिसकी सिद्धि तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक पाप मिटाया न जाए, मृत्यु निगल न ली जाए, और अनन्त जीवन पूर्ण रूप से बहाल न किया जाए।
जहाँ तक उनके इस भय का प्रश्न है कि यह कहने से कि दुष्ट अनन्त यातना पाएँगे, परमेश्वर पर अत्यधिक निर्दयता का आरोप लगेगा, अन्धे भी देख सकते हैं कि यह कैसी मूर्खता है—मानो प्रभु ने बड़ा अन्याय किया हो, जब उसने उन्हें अपने राज्य से बाहर रखा जिन्होंने अपनी कृतघ्नता से अपने आप को उसके अयोग्य बना लिया है। वे कहते हैं, “परन्तु उनके पाप तो क्षणिक हैं।” मैं उन्हें यह मान लेता हूँ; परन्तु परमेश्वर की महिमा, जिसे उन्होंने ठेस पहुँचाई है, अनन्त है। इसलिए उचित है कि उनके अधर्म की स्मृति कभी नष्ट न हो। वे कहते हैं, “परन्तु यदि ऐसा है, तो दण्ड पाप के परिमाण से बढ़ जाएगा।” मैं उत्तर देता हूँ कि यह असह्य निन्दा है: परमेश्वर की महिमा को इतना हल्का समझना कि उसकी अवहेलना किसी प्राण के विनाश से कम गम्भीर मानी जाए। इसलिए आओ, ऐसे बकवादियों को छोड़ दें, ऐसा न हो कि उन्हें उत्तर देकर हम, जो हमने आरम्भ में कहा था उसके विपरीत, उन्हें उत्तर के योग्य ठहराते प्रतीत हों।
जहाँ कहीं यह जीवित विश्वास है, वहाँ यह असम्भव है कि वह सदा अनन्त उद्धार की आशा को साथ न रखे—या यों कहें, कि वह उसे उत्पन्न और पैदा न करे। क्योंकि यदि यह आशा हम में नहीं है, तो चाहे हम विश्वास के विषय में कितनी ही वाक्पटुता से बोलें, और हमारे शब्द कितने ही सजे हों, यह निश्चित है कि हम में उसका कुछ भी नहीं है। क्योंकि यदि विश्वास, जैसा कहा जा चुका है, परमेश्वर की सच्चाई का दृढ़ निश्चय है—कि यह सच्चाई झूठ नहीं बोल सकती, धोखा नहीं दे सकती, निराश नहीं कर सकती—तो जिसने यह निश्चय पा लिया है वह प्रभु से उसकी प्रतिज्ञाओं के पूरा होने की भी आशा रखता है, जिन्हें वह सच मानता है। इस प्रकार, संक्षेप में, आशा उन भली वस्तुओं की प्रतीक्षा के सिवा और कुछ नहीं जिनके विषय में विश्वास ने माना है कि परमेश्वर ने उनकी सच्ची प्रतिज्ञा की है।
विश्वास मानता है कि परमेश्वर सच्चा है; आशा प्रतीक्षा करती है कि ठीक समय पर वह अपनी सच्चाई प्रकट करेगा। विश्वास मानता है कि वह हमारा पिता है; आशा प्रतीक्षा करती है कि वह हमारे प्रति अपने आप को वैसा ही दिखाएगा। विश्वास मानता है कि अनन्त जीवन हमें दिया जा चुका है; आशा प्रतीक्षा करती है कि एक दिन हम उसके अधिकारी होंगे। विश्वास वह नींव है जिस पर आशा टिकी है; आशा विश्वास को पोषण देती और थामे रखती है। क्योंकि जैसे कोई मनुष्य परमेश्वर से कुछ भी आशा नहीं रख सकता जब तक उसने पहले उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास न किया हो, वैसे ही बदले में हमारे विश्वास की दुर्बलता को धीरज भरी प्रतीक्षा और आशा से थामे रखना आवश्यक है, ऐसा न हो कि वह गिर जाए।
इसलिए सन्त पौलुस अत्यन्त उचित बात कहता है जब वह घोषणा करता है कि हमारा उद्धार आशा में है। परमेश्वर की चुपचाप बाट जोहने के द्वारा आशा विश्वास को रोके रखती है, ऐसा न हो कि वह अत्यधिक उतावली से ठोकर खाए। वह विश्वास को दृढ़ करती है, ऐसा न हो कि वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विषय में डगमगाए या उनके प्रति कोई सन्देह रखे। वह विश्वास को तरोताज़ा करती और सान्त्वना देती है, ऐसा न हो कि वह थक जाए। वह विश्वास को उसके अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाती है, ऐसा न हो कि वह बीच मार्ग में या आरम्भ ही में विफल हो जाए। अन्ततः, दिन-प्रतिदिन विश्वास को नया करने और पुनः स्थापित करने के द्वारा आशा उसे निरन्तर टिके रहने की शक्ति देती है।
हम और भी स्पष्टता से देखेंगे कि विश्वास को आशा के द्वारा कितनी रीतियों से दृढ़ किए जाने की आवश्यकता है, यदि हम विचार करें कि जिन्होंने एक बार परमेश्वर का वचन ग्रहण किया है उन पर कितनी प्रकार की परीक्षाएँ आक्रमण करती हैं। पहले, अपनी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति में विलम्ब करके प्रभु प्रायः हमें हमारी इच्छा से अधिक देर तक प्रतीक्षा में रखता है। यहाँ विश्वास का काम वही करना है जो भविष्यद्वक्ता कहता है:
“यदि उस प्रतिज्ञा के पूरा होने में देर भी हो, तौभी उसकी बाट जोहते रहना।”
कभी-कभी परमेश्वर हमें केवल तरसता हुआ ही नहीं छोड़ता, वरन् ऐसा प्रतीत भी होता है मानो वह हम से क्रोधित हो। यहाँ विश्वास को हमारी सहायता करनी चाहिए, ताकि, एक और भविष्यद्वक्ता के वचनों के अनुसार, जब उसने हम से अपना मुँह छिपा लिया हो तब भी हम प्रभु की बाट जोहते रहें।
ठट्ठा करनेवाले भी उठ खड़े होते हैं, जैसा सन्त पतरस कहता है, जो पूछते हैं:
“उसके आने की प्रतिज्ञा कहाँ गई? क्योंकि जब से जगत की सृष्टि हुई है, सब कुछ वैसा ही चला आता है।”
वस्तुतः शरीर और संसार स्वयं ही यह विचार हमारे मन में डालते हैं। यहाँ आशा से सँभाले और थामे गए विश्वास को परमेश्वर के राज्य की अनन्तता पर दृढ़ता से स्थिर रहना चाहिए, ताकि वह एक हज़ार वर्ष को एक दिन के समान समझे।
इस सम्बन्ध और समानता के कारण पवित्रशास्त्र कभी-कभी विश्वास और आशा इन दो शब्दों को लगभग एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग करता है। इसीलिए जब सन्त पतरस कहता है कि परमेश्वर की सामर्थ्य विश्वास के द्वारा हमें उद्धार के प्रकट होने तक सुरक्षित रखती है, तब वह विश्वास को वह बात सौंपता है जो अधिक उचित रीति से आशा की प्रतीत होती है। फिर भी यह बिना कारण नहीं है, क्योंकि हम दिखा चुके हैं कि आशा विश्वास की दृढ़ता और स्थिरता के सिवा और कुछ नहीं।
अब यह देखना सरल है कि वाक्यों का गुरु (Master of the Sentences) कितनी बुरी तरह भूल करता है जब वह आशा की दोहरी नींव ठहराता है: परमेश्वर का अनुग्रह और कर्मों का पुण्य। आशा का कोई और विषय नहीं हो सकता जो विश्वास का नहीं है। परन्तु हम स्पष्ट दिखा चुके हैं कि विश्वास का एकमात्र विषय परमेश्वर की दया है, वह पूर्णतः उसी पर टिका है, और कहीं और नहीं देखता।
फिर भी यह सुनने योग्य है कि वह कैसा सुन्दर तर्क प्रस्तुत करता है:
“यदि तुम बिना योग्य ठहरे किसी बात की आशा करने का साहस करते हो, तो यह आशा नहीं, वरन् ढिठाई है।”
मुझे बताओ, मेरे मित्रो, ऐसे पशुओं को कौन कोसे बिना रह सकता है, जो यह मानना कि परमेश्वर सच्चा है, दृढ़ता से मानना, उतावली और ढिठाई समझते हैं? क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि हम अपनी सब आशा उसकी भलाई से रखें, वे उस भलाई पर विश्राम करने और भरोसा रखने को ढिठाई कहते हैं। परन्तु ऐसा गुरु उन चेलों के योग्य ही है जो उसने सोफिस्टों की पाठशालाओं में, अर्थात् सोरबोनवादियों में, तैयार किए हैं।
हम, इसके विपरीत, यह देखकर कि परमेश्वर खुल्लमखुल्ला पापियों को आज्ञा देता है कि वे उद्धार की दृढ़ आशा रखें, उसकी सच्चाई पर इतना भरोसा करते हैं कि उसकी दया पर टिककर और अपने कर्मों पर सारा भरोसा त्यागकर, जो कुछ उसने हम से प्रतिज्ञा की है उसकी बिना किसी सन्देह के आशा रखते हैं।
