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अध्याय आठ: परमेश्वर की पूर्वनियति और विधान के विषय में (भाग 3/3)
अब हमारा कर्तव्य स्पष्ट है। यदि प्रभु ने हमारे जीवन को हमारी रखवाली में सौंपा है, तो हम उसकी रक्षा करें। यदि वह हमें ऐसा करने के साधन देता है, तो हम उन्हें काम में लाएँ। यदि वह हमें संकट दिखाता है, तो हम मूर्खता से और बिना कारण उनमें न कूदें। यदि वह उपाय सुझाता है, तो हम उन्हें तुच्छ न जानें।
“परन्तु कोई भी संकट हमारी हानि नहीं कर सकता,” कोई कहेगा, “जब तक कि वह ऐसा करने के लिए ठहराया न गया हो; और यदि ठहराया गया है, तो कोई उपाय उसे रोक नहीं सकता।” पर क्या होगा यदि संकट इसीलिए अजेय नहीं हैं कि प्रभु ने ऐसे उपाय ठहराए हैं जिनसे उन पर जय पाई जा सके?
ज़रा विचार कीजिए कि आपका तर्क परमेश्वर के विधान की व्यवस्था से कितना मेल खाता है। आप यह निष्कर्ष निकालते हैं कि हमें संकटों से अपनी रक्षा करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यदि वे अजेय नहीं हैं तो हम बिना सावधानी बरते भी उनसे बच निकलेंगे। इसके विपरीत प्रभु आपको आज्ञा देता है कि उनसे सावधान रहो, क्योंकि वह चाहता है कि आप उनसे बच निकलें।
ये पागल लोग वह बात नहीं देखते जो स्पष्ट दिखाई देती है: परमेश्वर ने मनुष्यों में विवेक डाला है कि वे विचार करें और अपनी रक्षा करें, ताकि अपने प्राणों की रक्षा करके वे उसके विधान की सेवा करें। इसके विपरीत, लापरवाही और तिरस्कार के द्वारा वे उन दुःखों को अपने ऊपर ले आते हैं जो वह उन पर डालना चाहता है। क्योंकि ऐसा कैसे होता है कि विवेकी मनुष्य अपने कामों को ठीक रीति से व्यवस्थित करके आनेवाली बुराई को टाल देता है, जबकि मूर्ख अपने उतावलेपन से नाश हो जाता है? क्या इसलिए नहीं कि मूर्खता और विवेक दोनों परमेश्वर के शासन के साधन हैं, और प्रत्येक अपना-अपना कार्य पूरा करता है?
इसलिए प्रभु ने चाहा कि सब भावी बातें हमसे छिपी रहें, ताकि यह न जानते हुए कि क्या होगा, हम पहले से सावधानी बरतें और संकटों के विरुद्ध जो उपाय वह हमें देता है उन्हें तब तक काम में लाना न छोड़ें जब तक हम उन पर जय न पा लें, या वे हम पर जय न पा लें।
जो घटनाएँ पूरी हो चुकी हैं और बीत गई हैं, उनके विषय में ये उन्मादी लोग परमेश्वर के विधान को ग़लत और विकृत रीति से देखते हैं। हम कहते हैं कि सब कुछ उसी पर नींव की तरह आधारित है, और इसलिए न चोरी, न व्यभिचार, न हत्या परमेश्वर की इच्छा के सम्बन्ध के बिना होती है।
इसलिए वे पूछते हैं: यदि किसी चोर ने ऐसे व्यक्ति को कंगाल कर दिया जिसे परमेश्वर दरिद्रता के द्वारा ताड़ना देना चाहता था, तो चोर को दण्ड क्यों दिया जाए? यदि किसी हत्यारे ने ऐसे व्यक्ति को मार डाला जिसका जीवन समाप्त करना परमेश्वर ने ठहराया था, तो हत्यारे को दण्ड क्यों दिया जाए? संक्षेप में, यदि ऐसे सब लोग परमेश्वर की इच्छा की सेवा करते हैं, तो उन्हें दण्ड क्यों मिले?
परन्तु मैं इससे इनकार करता हूँ कि वे उसकी सेवा करते हैं। क्योंकि हम यह नहीं कहेंगे कि जो मनुष्य बुरे मन से प्रेरित होकर केवल अपनी दुष्ट अभिलाषा पूरी करना चाहता है, वह परमेश्वर की सेवा में लगा हुआ है। परमेश्वर की आज्ञा वही मानता है जो उसकी इच्छा की शिक्षा पाकर वहाँ जाता है जहाँ वह उसे बुलाती है।
और परमेश्वर हमें अपनी इच्छा की शिक्षा अपने वचन के सिवा और कहाँ देता है? इसलिए जो कुछ हम हाथ में लें, उस सब में हमें परमेश्वर की उस इच्छा को देखना चाहिए जो उसने उस वचन में हम पर प्रकट की है। परमेश्वर हमसे केवल वही चाहता है जिसकी वह आज्ञा देता है।
यदि हम उसकी आज्ञा के विरुद्ध कुछ करते हैं, तो वह आज्ञा-पालन नहीं, वरन हठ और अपराध है। वे उत्तर देते हैं कि यदि वह न चाहता तो हम उसे न करते। यह मैं मानता हूँ। परन्तु क्या हम उसे इसलिए करते हैं कि उसे प्रसन्न करें? वह उसकी आज्ञा नहीं देता। वरन हम यह विचार किए बिना कि परमेश्वर क्या चाहता है, बुराई में हाथ डालते हैं। बल्कि हम अपने असंयम के उन्माद में इस प्रकार बह जाते हैं कि जान-बूझकर उसका विरोध करने का यत्न करते हैं।
इस प्रकार बुराई करते हुए भी हम उसके धर्ममय विधान की सेवा करते हैं, क्योंकि अपनी बुद्धि की अपार महानता के द्वारा वह जानता है कि बुरे साधनों को भलाई पूरी करने के लिए ठीक रीति से कैसे काम में लाया जाए। परन्तु देखिए कि उनका तर्क कितना निर्बुद्धि है। वे हठ करते हैं कि अपराधों को बिना दण्ड के रहने दिया जाए और उनके करनेवालों को छोड़ दिया जाए, क्योंकि ऐसे काम परमेश्वर की व्यवस्था के बिना नहीं होते।
मैं और भी कहता हूँ: चोर, हत्यारे और अन्य कुकर्मी परमेश्वर के विधान के साधन हैं, जिन्हें प्रभु उन न्यायदण्डों को पूरा करने के लिए काम में लाता है जो उसने ठहराए हैं। फिर भी मैं इससे इनकार करता हूँ कि इस कारण वे कोई बहाना बना सकते हैं। क्योंकि वे करेंगे ही क्या? क्या वे परमेश्वर को अपने ही साथ उसी अधर्म में लपेटेंगे, या अपनी कुटिलता को उसकी धार्मिकता से ढाँकेंगे? वे दोनों में से कुछ नहीं कर सकते। उनका अपना विवेक उन्हें इतनी पूरी रीति से दोषी ठहराता है कि वे अपने आपको निर्दोष नहीं ठहरा सकते। न वे परमेश्वर पर दोष लगा सकते हैं, क्योंकि सारी बुराई उन्हें अपने ही भीतर मिलती है, और उसमें उन्हें अपनी दुष्टता के भले और उचित उपयोग के सिवा कुछ नहीं मिलता।
“तौभी,” कोई कहेगा, “वह उनके द्वारा काम तो करता है।” शव को चीरने और उसके सड़ने लगने के बाद उसमें से दुर्गन्ध कहाँ से उठती है? सब देखते हैं कि सूर्य की किरणें उसे खींच निकालती हैं, फिर भी कोई यह न कहेगा कि किरणें स्वयं दुर्गन्धयुक्त हैं। उसी प्रकार, जब बुराई का सार और उसका दोष दुष्ट मनुष्य में ही रहता है, तो यदि परमेश्वर उस बुराई को अपनी इच्छा के अनुसार काम में लाए, तो उस पर कोई कलंक या दाग़ क्यों लगे?
इसलिए आइए हम इस कुत्तों जैसी ढिठाई को दूर भगाएँ, जो दूर से परमेश्वर की धार्मिकता पर भौंक तो सकती है, पर उसे कभी छू नहीं सकती।
तथापि इन बेतुकी बातों का खण्डन इससे उत्तम या संक्षिप्त रीति से नहीं हो सकता कि हम यह दिखाएँ कि परमेश्वर के विधान पर ठीक रीति से विचार और मनन करने में हमें कौन-सा नियम मानना चाहिए।
मसीही हृदय, इस बात का पूरा विश्वास रखते हुए कि कुछ भी संयोग से नहीं होता, वरन सब कुछ परमेश्वर के विधान से होता है, जो कुछ भी घटित होता है उसमें सदा उसी को प्रधान कारण मानकर उसकी ओर देखेगा। फिर भी साथ ही वह गौण कारणों को उनके उचित स्थान पर विचारना नहीं छोड़ेगा।
इसके अतिरिक्त, विश्वासी को इसमें सन्देह न होगा कि परमेश्वर का विधान उसकी रक्षा पर दृष्टि रखता है और ऐसा कुछ भी होने न देगा जो उसकी भलाई और उद्धार में सहायक न हो। चूँकि उसे पहले मनुष्यों से और फिर अन्य प्राणियों से काम पड़ना है, इसलिए उसे निश्चय रहेगा कि परमेश्वर का विधान सर्वत्र राज्य करता है।
जहाँ तक मनुष्यों का प्रश्न है, चाहे वे भले हों या बुरे, वह पहचान लेगा कि उनकी युक्तियाँ, इच्छाएँ, बल, सामर्थ्य और उद्यम परमेश्वर के हाथ में हैं, ताकि जहाँ चाहे उन्हें मोड़ दे और जब चाहे उन्हें रोक ले, यह उसी का अधिकार है।
ऐसी अनेक स्पष्ट प्रतिज्ञाएँ हैं जो साक्षी देती हैं कि परमेश्वर का विधान विश्वासियों के उद्धार की रक्षा के लिए जागता है और मानो पहरा देता है। उदाहरण के लिए:
“अपना बोझ यहोवा पर डाल दे, वह तुझे सम्हालेगा, क्योंकि वह हमारी चिन्ता करता है।”
फिर:
“जो परमप्रधान के छाए हुए स्थान में बैठा रहता है, वह उसकी शरण में सुरक्षित रखा जाएगा।”
फिर:
“जो तुम्हें छूता है वह मेरी आँख की पुतली को छूता है।”
फिर:
“मैं तेरे लिए ढाल और पीतल की शहरपनाह ठहरूँगा, और तेरे शत्रुओं से लडूँगा।”
फिर:
“चाहे माता अपने बच्चों को भूल जाए, तौभी मैं तुझे कभी न भूलूँगा।”
वस्तुतः पवित्रशास्त्र के इतिहास-वृत्तान्तों का मुख्य प्रयोजन यही दिखाना है कि परमेश्वर अपने सेवकों की इतनी सावधानी से रखवाली करता है कि वह उनके पाँव को पत्थर से ठेस भी लगने नहीं देगा।
यद्यपि मैंने ऊपर उन लोगों की राय को उचित रीति से खण्डित किया है जो परमेश्वर के ऐसे सामान्य विधान की कल्पना करते हैं जो प्रत्येक प्राणी की विशेष देखभाल तक नहीं उतरता, फिर भी हमें सबसे बढ़कर अपने प्रति इस विशेष देखभाल को पहचानना चाहिए। इसीलिए मसीह यह कहने के बाद कि छोटी-से-छोटी गौरैया भी परमेश्वर की इच्छा के बिना भूमि पर नहीं गिरती, तुरन्त इस कथन को हम पर लागू करता है:
“तुम बहुत गौरैयों से बढ़कर मूल्यवान हो। तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं।”
वह ऐसा इसलिए करता है कि हमें निश्चय हो कि जब हम परमेश्वर की दृष्टि में छोटी चिड़ियों से अधिक अनमोल हैं, तो वह उनकी अपेक्षा हमारी अधिक सावधानी से देखभाल करता है, इतनी सावधानी से कि हमारे सिर का एक बाल भी उसकी आज्ञा के बिना नहीं गिर सकता। यदि परमेश्वर की इच्छा के बिना हमारा एक बाल भी नहीं गिर सकता, तो इससे अधिक हम और क्या माँग सकते हैं?
परमेश्वर का सेवक इन सब प्रतिज्ञाओं और तदनुरूप उदाहरणों से दृढ़ होकर उन साक्ष्यों को भी इनके साथ जोड़ेगा जो घोषित करते हैं कि सब मनुष्य परमेश्वर के अधिकार में हैं, चाहे उनके हृदयों को हमसे प्रेम करने की ओर झुकाना हो या उनकी दुष्टता को रोकना हो कि वह हमारी हानि न कर सके। क्योंकि यह प्रभु ही था जिसने अपने लोगों को अनुग्रह दिलाया, न केवल उनसे जो पहले से उनके प्रति मित्रभाव रखते थे, वरन मिस्रियों से भी (निर्गमन 3:21; 12:36)।
जहाँ तक हमारे शत्रुओं के क्रोध का प्रश्न है, वह उसे अनेक रीतियों से तोड़ना जानता है। कभी वह उन्हें समझ से वंचित कर देता है कि वे सही योजनाएँ न बना सकें। इसी प्रकार उसने अहाब के साथ किया, जब उसके सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह से झूठी आत्मा भेजकर उसे धोखा दिया (1 राजाओं 22:19–23)। रहबाम के साथ भी उसने यही किया, जब जवानों की मूर्खतापूर्ण सम्मति से उसे अन्धा कर दिया कि वह अपने राज्य से वंचित हो जाए (1 राजाओं 12:6–15)।
कभी, उन्हें यह देखने और समझने की बुद्धि देने के बाद कि क्या लाभकारी होगा, वह उनके साहस को ऐसा गिरा देता है और उन्हें ऐसे भय से भर देता है कि वे अपनी सोची हुई बात को करने का साहस नहीं करते। कभी वह उन्हें अनुमति देता है कि वे अपने क्रोध की माँग को पूरा करने का यत्न करें, परन्तु उनकी हिंसा का विरोध करता है और उन्हें अपना उद्देश्य पूरा करने नहीं देता। इसी रीति से उसने अहीतोपेल की सम्मति को समय से पहले निष्फल कर दिया, यद्यपि वह दाऊद के लिए विनाशकारी होती (2 शमूएल 17:14)।
इस प्रकार परमेश्वर अपने लोगों के उद्धार के लिए हर प्राणी को चलाने और निर्देशित करने की चिन्ता करता है, यहाँ तक कि शैतान को भी, जिसने, जैसा हम देखते हैं, अय्यूब के विरुद्ध परमेश्वर की अनुमति और आज्ञा के बिना कुछ भी करने का साहस नहीं किया।
जब हमें यह ज्ञान प्राप्त होगा, तब यह अवश्य ही हर प्रकार की समृद्धि में परमेश्वर की भलाई के प्रति कृतज्ञता, विपत्ति में धैर्य, और भविष्य के विषय में अनुपम भरोसा उत्पन्न करेगा। इसलिए जो कुछ हमारी इच्छा के अनुसार होता है, उसे हम परमेश्वर का ही ठहराएँगे, चाहे हम मनुष्यों के द्वारा उसकी कृपा का अनुभव करें, चाहे वह अपने अन्य प्राणियों के द्वारा हमारी सहायता करे।
हम अपने मन में यह विचार करेंगे: निश्चय ही परमेश्वर ने ही उनके हृदयों को मुझसे प्रेम करने की ओर फेरा और उन्हें मेरे प्रति अपनी कृपा का साधन बनाया। उपज के समयों में हम पहचानेंगे कि यह प्रभु ही था जिसने आकाश को आज्ञा दी कि वह पृथ्वी पर बरसे जिससे वह फल उपजाए। अन्य हर प्रकार की समृद्धि में हम इसमें सन्देह न करेंगे कि परमेश्वर की आशीष ही उसका एकमात्र कारण है। ये चेतावनियाँ हमें कृतघ्न होने न देंगी।
इसके विपरीत, यदि हम पर कोई विपत्ति आए, तो हम तुरन्त अपने हृदयों को परमेश्वर की ओर उठाएँगे, जो अकेला उन्हें धैर्य और शान्ति में ढाल सकता है। यदि यूसुफ अपने भाइयों के विश्वासघात और उनके द्वारा अपने साथ किए गए लज्जाजनक कर्म पर ही ध्यान लगाए रहता, तो वह उनके प्रति कभी भाईचारे की भावना न दिखाता। परन्तु क्योंकि उसने अपने विचार परमेश्वर की ओर फेरे और उनके अपराध को भुला दिया, इसलिए वह कोमलता और दया की ओर प्रेरित हुआ, यहाँ तक कि स्वयं उन्हें सान्त्वना भी दी:
“तुम ने मुझे यहाँ नहीं भेजा, वरन परमेश्वर ने; और तुम्हारी भलाई के लिए मैं तुम्हारे आगे भेजा गया। तुम ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था, परन्तु यहोवा ने उसे भलाई में बदल दिया।”
—उत्पत्ति 45:8; 50:20
यदि अय्यूब केवल उन कसदियों को देखता जिन्होंने उसके साथ अन्याय किया था, तो वह बदले की इच्छा से भभक उठता। परन्तु क्योंकि उसने परमेश्वर के काम को भी पहचाना, इसलिए उसने इस सुन्दर घोषणा से अपने आपको सान्त्वना दी:
“यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य हो।”
इसी प्रकार, यदि दाऊद पूरी तरह शिमी की दुष्टता में लगा रहता, जो उसका पीछा करते हुए उसे गालियाँ देता और पत्थर मारता था, तो वह अपने जनों को बदले के लिए भड़का देता। परन्तु क्योंकि वह समझता था कि शिमी परमेश्वर के निर्देश के बिना ऐसा नहीं करता, इसलिए उसने उन्हें भड़काने के बजाय शान्त किया:
“उसे छोड़ दो, क्योंकि सम्भव है परमेश्वर ने उसे मेरे विरुद्ध बुरा बोलने की आज्ञा दी हो।”
यदि क्रोध और अधीरता के विरुद्ध इससे उत्तम कोई उपाय नहीं है, तो हमने बहुत लाभ पाया होगा जब हम इस विषय में परमेश्वर के विधान पर इस रीति से मनन करना सीख लें कि अपने विचारों को सदा इस बिन्दु पर लौटा सकें: प्रभु ने यही चाहा; इसलिए इसे धैर्य से सहना चाहिए—केवल इसलिए नहीं कि उसका सामना करना असम्भव है, वरन इसलिए कि वह ऐसा कुछ नहीं चाहता जो न्यायसंगत और हितकर न हो।
इसीलिए पवित्रशास्त्र इस सिद्धान्त को स्थापित करने में इतना परिश्रम करता है। आमोस घोषणा करता है:
“क्या नगर में कोई विपत्ति ऐसी होती है जिसे यहोवा ने न भेजा हो?”
यिर्मयाह भी उन लोगों को डाँटता है जो कल्पना करते हैं कि कोई विपत्ति परमेश्वर की आज्ञा के बिना आ सकती है:
“कौन है जिसके कहने से कुछ हुआ हो, जब कि प्रभु ने उसकी आज्ञा न दी हो?”
यदि हम पर आनेवाली बुराइयाँ मनुष्यों से आती हैं, तो पवित्रशास्त्र कहता है कि परमेश्वर ने उन्हें अपना कार्य पूरा करने के लिए ठहराया है। इसलिए वे जाल, तलवारें और कुल्हाड़ियाँ कहलाते हैं जिन्हें वह अपने हाथ से चलाता है, और उसके क्रोध के यन्त्र, जिन्हें वह केवल सीटी बजाकर बुला लेता है (यशायाह 5:26; 10:5, 15; 13:3; यहेजकेल 12:13)।
इसी प्रकार पिलातुस और हेरोदेस, जब उन्होंने मसीह को मार डालने का षड्यन्त्र रचा, तो कहा गया है कि वे इकट्ठे हुए कि वह सब पूरा करें जो परमेश्वर की युक्ति ने पहले से ठहराया था (प्रेरितों के काम 4:27–28)। इसी अर्थ में कहा गया है कि यहूदियों ने मसीह को उसी के अनुसार मार डाला जो स्वर्गीय पिता ने ठहराया था (प्रेरितों के काम 2:23)।
इस प्रकार उन्होंने वह सब पूरा किया जो उसके विषय में लिखा गया था (प्रेरितों के काम 13:29)। इसी प्रकार सुसमाचार-ग्रन्थ बार-बार दोहराते हैं कि जिन सिपाहियों ने उसे क्रूस पर चढ़ाया, उन्होंने वह सब पूरा किया जो पवित्रशास्त्र में पहले से कहा गया था (यूहन्ना 19:24, 28, 36–37)।
ये सब बातें हमें सिखाती हैं कि जब कभी मनुष्य अपनी दुष्टता से हमें सताएँ, तब हमें परमेश्वर की ओर देखना नहीं छोड़ना चाहिए और इसे निश्चित मानना चाहिए कि यद्यपि वे हमारे साथ अधर्म करते हैं, फिर भी कुछ भी उसके धर्ममय विधान के बिना नहीं होता, कि वह इसी रीति से इसकी अनुमति देता, चाहता और ठहराता है।
इसी प्रकार, यदि मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना कोई विपत्ति हम पर आ पड़े, तो पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि भूमि की बंजरता, अकाल, हर रोग और अन्य बातें जिन्हें हम आकस्मिक मानते हैं, परमेश्वर के श्राप हैं, या कम-से-कम वे ताड़नाएँ हैं जो वह हम पर भेजता है (लैव्यव्यवस्था 26; व्यवस्थाविवरण 28)।
तथापि हम गौण कारणों की ओर से आँखें बन्द न करेंगे। यद्यपि जिनसे हमें कोई उपकार मिलता है उन्हें हम परमेश्वर की कृपा के सेवक मानेंगे, तो भी हम उन्हें ऐसे तुच्छ न जानेंगे मानो उनकी कृपा के लिए वे हमारी कृतज्ञता के योग्य ही न थे। वरन हम उनके प्रति अपना ऋण स्वीकार करेंगे और उसे स्वेच्छा से मानेंगे, और अवसर मिलने पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसे चुकाने का यत्न करेंगे।
संक्षेप में, हम परमेश्वर को हर भलाई का प्रधान कर्ता मानकर उसका आदर करेंगे, और साथ ही मनुष्यों को उसके उपकारों के सेवक और बाँटनेवाले जानकर उनका भी सम्मान करेंगे। हम पहचानेंगे कि उसने हमें उनका ऋणी ठहराना चाहा, क्योंकि उसने उन्हीं के हाथों से अपने आपको हमारा उपकारी दिखाया।
यदि अपनी असावधानी या लापरवाही से हमें कोई हानि उठानी पड़े, तो हम यह तो पहचानेंगे कि वह परमेश्वर की इच्छा से हुई, फिर भी दोष अपने ऊपर लेना न छोड़ेंगे। यदि हमारे कुटुम्बियों या मित्रों में से कोई, जिसकी देखभाल हमें सौंपी गई थी, ठीक सेवा-टहल के बिना मर जाए, तो यद्यपि हम जानेंगे कि वह उस सीमा तक पहुँच चुका था जिसे वह लाँघ नहीं सकता था, फिर भी इससे हम अपने अपराध को कम न करेंगे। क्योंकि हमने अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया, इसलिए हम उसकी मृत्यु को अपने ही दोष से हुई मानेंगे।
इसलिए बहुत अधिक, यदि हत्या या चोरी करने में छल या जान-बूझकर की गई दुर्भावना थी, तो हमें ऐसे अपराधों को परमेश्वर के विधान के बहाने क्षमा नहीं करना चाहिए। वरन उसी कार्य में हम परमेश्वर की धार्मिकता और मनुष्य के अधर्म दोनों पर विचार करेंगे, जैसा कि प्रत्येक अपने आपको स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।
जहाँ तक भावी बातों का प्रश्न है, हम मुख्यतः उन गौण कारणों से आरम्भ करेंगे जिनकी चर्चा हम कर चुके हैं। क्योंकि यदि परमेश्वर हमें ऐसे मानवीय साधन देता है जिनसे हम अपना पोषण और रक्षा कर सकें, तो हम उसे परमेश्वर की आशीष मानेंगे। इसलिए हम अपनी सामर्थ्य के अनुसार विचार करेंगे कि हमें क्या करना चाहिए, और उन लोगों की सहायता लेने में संकोच न करेंगे जिन्हें हम अपनी सहायता करने में समर्थ देखते हैं।
वरन यह पहचानते हुए कि हर वह प्राणी जो हमें लाभ पहुँचा सकता है, परमेश्वर ही हमारे अधिकार में रखता है, हम उन्हें उसके विधान के वैध साधन मानकर काम में लाएँगे। और क्योंकि हम निश्चित नहीं जानते कि हमारे उद्यमों का परिणाम क्या होगा, केवल इतना कि हमें दृढ़ भरोसा है कि परमेश्वर हर बात में हमारी भलाई का प्रबन्ध करेगा, इसलिए जहाँ तक हमारी समझ देख सके, जो हमें लाभदायक प्रतीत हो उसका पीछा करेंगे।
तथापि अपनी योजनाएँ बनाने में हम केवल अपने ही विवेक पर न चलेंगे, वरन अपने आपको परमेश्वर की बुद्धि को सौंप देंगे और उसके अधीन करेंगे कि वह हमें ठीक मार्ग दिखाए। अन्त में, हमारा भरोसा मनुष्यों की सहायता और साधनों पर ऐसा न टिकेगा कि जब वे उपलब्ध हों तो हम उन्हीं में विश्राम पाएँ या जब वे हमें छोड़ दें तो साहस खो बैठें। क्योंकि हमारी समझ केवल परमेश्वर के विधान पर ही टिकी रहेगी, और वर्तमान परिस्थितियों का विचार हमें उसे निहारने से विचलित न करेगा।
यहाँ हम विश्वासियों की अनुपम धन्यता को देख सकते हैं। मानव-जीवन असंख्य दुःखों से घिरा हुआ, लगभग घेराबन्दी में है। और दूर जाने की आवश्यकता नहीं; हमारा शरीर हज़ार रोगों का पात्र है और उनके कारणों को अपने भीतर ही पोसता है, इसलिए मनुष्य जहाँ भी जाता है, अपने साथ मृत्यु के अनेक रूप लिए फिरता है। इस प्रकार उसका जीवन मानो मृत्यु में लिपटा हुआ है। क्योंकि और क्या कहा जाए, जब हम बिना जोखिम के ठण्डे भी नहीं हो सकते और पसीना भी नहीं बहा सकते?
इसके अतिरिक्त, हम जिस ओर भी मुड़ें, हमारे चारों ओर की हर वस्तु केवल सन्देहजनक ही नहीं, वरन खुलकर हमें धमकाती है, मानो हम पर मृत्यु लाने का ठान रखा हो। यदि हम जहाज़ पर चढ़ें, तो हमारे और मृत्यु के बीच बमुश्किल एक पाँव का अन्तर होता है। यदि हम घोड़े पर सवार हों, तो उसे केवल एक पाँव से ठोकर खानी है और हमारी गर्दन टूट सकती है। यदि हम गलियों में चलें, तो छतों की हर खपरैल हम पर लटके खतरे का रूप है। यदि हम तलवार पकड़ें, या हमारे पास कोई पकड़े हो, तो ज़रा-सी हलचल हमें घायल कर सकती है।
हर जंगली, अदम्य या बेकाबू पशु जो हम देखते हैं, हमारे विरुद्ध सशस्त्र है। यदि हम किसी सुन्दर बाग़ में, जो केवल आनन्द से भरा हो, अपने को बन्द कर लें, तो वहाँ भी साँप छिपा हो सकता है। जिन घरों में हम रहते हैं, उनमें निरन्तर आग लगने का खतरा रहता है: दिन में वे हमें कंगाल कर देने की और रात में हम पर गिर पड़ने की धमकी देते हैं। हमारे पास जो भी भूमि है, चूँकि वह ओलों, पाले, सूखे और अन्य आँधियों के सामने खुली है, वह हमें बंजरता का और परिणामस्वरूप अकाल का भय दिलाती है।
मैं विष देने, घात लगाने और आक्रमणों की बात छोड़ देता हूँ, जिनसे मानव-जीवन कुछ घर में और कुछ खुले देहात में संकट में रहता है। ऐसी उलझनों के बीच क्या मनुष्य दयनीय से भी बढ़कर दयनीय नहीं होना चाहिए? जीते हुए भी वह केवल अधमरा है, शिथिलता और कष्ट के बीच बमुश्किल अपने आपको सम्हाले हुए, मानो वह हर क्षण अपने गले पर छुरी टिकी देखता हो।
कोई कहेगा कि ये बातें कम ही होती हैं, या कम-से-कम सदा सब के साथ नहीं होतीं, और ये सब एक साथ कभी नहीं हो सकतीं। मैं यह मानता हूँ। परन्तु क्योंकि दूसरों के उदाहरण हमें चेतावनी देते हैं कि ये हम पर भी आ सकती हैं, और हमारे जीवन को इनमें से किसी से भी मुक्त नहीं समझना चाहिए, इसलिए हम इनसे ऐसे डरे बिना नहीं रह सकते मानो ये हम पर आने ही वाली हों।
इससे बड़ी दुर्दशा क्या कल्पना की जा सकती है कि मनुष्य निरन्तर ऐसी थरथराहट और पीड़ा में जिए? इसके अतिरिक्त, यह कहना कि उसने अपनी सृष्टि के सबसे श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य को भाग्य की अनिश्चितता पर छोड़ दिया है, परमेश्वर का अपमान करना होगा। परन्तु यहाँ मेरा उद्देश्य केवल उस दुर्दशा को बताना है जिसमें मनुष्य जीता, यदि उसका जीवन संयोग से चलता।
इसके विपरीत, यदि परमेश्वर का विधान विश्वासी के हृदय में प्रकाशमान हो, तो वह न केवल उस भय और पीड़ा से छुड़ाया जाएगा जो पहले उसे दबाए रखती थी, वरन हर अनिश्चितता से भी मुक्त हो जाएगा। क्योंकि जिस प्रकार यदि भाग्य हम पर शासन करता तो हमारा उससे डरना उचित होता, उसी प्रकार हमारे पास परमेश्वर पर निडर होकर भरोसा रखने का उत्तम कारण है।
इसलिए यह समझना अद्भुत सान्त्वना है कि प्रभु सब वस्तुओं को अपने सामर्थ्य में ऐसा थामे हुए है, अपनी इच्छा से उन पर ऐसा शासन करता है और अपनी बुद्धि से उन्हें ऐसा चलाता है कि जैसा उसने ठहराया है उसके सिवा कुछ नहीं होता। इसके अतिरिक्त, उसने हमें अपनी सुरक्षा में ले लिया है और हमें अपने स्वर्गदूतों की देखरेख में सौंप दिया है, कि न जल, न आग, न तलवार, न कोई और वस्तु हमें हानि पहुँचा सके, केवल उतनी जितनी उसकी भली इच्छा अनुमति दे।
क्योंकि भजन में लिखा है:
“वह तुझे बहेलिये के फन्दे से और नाश करनेवाली महामारी से छुड़ाएगा। वह तुझे अपने पंखों की आड़ में ले लेगा, और तू उसके परों के नीचे सुरक्षित रहेगा। उसकी सच्चाई तेरे लिए ढाल होगी। तू न रात के भय से डरेगा, न दिन को उड़नेवाले तीर से, न उस मरी से जो अन्धकार में फैलती है, न उस विनाश से जो दोपहर को उजाड़ता है।”
इसी से वह भरोसा उत्पन्न होता है जिस पर सन्त घमण्ड करते हैं:
“यहोवा मेरा सहायक है; मैं किसी बात से न डरूँगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?”
फिर:
“यहोवा मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ है, मैं किस से डरूँ? चाहे सेना मेरे विरुद्ध छावनी डाले, तौभी मैं न डरूँगा।”
—भजन संहिता 27:1, 3
फिर:
“चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी घाटी में होकर चलूँ, तौभी आशा रखना न छोड़ूँगा।”
विश्वासी ऐसा अटल निश्चय कहाँ से पा सकता है, यदि वहाँ जहाँ संसार संयोग से उलट-पुलट होता प्रतीत होता है, वह यह न पहचाने कि परमेश्वर उसे चलाने के लिए कार्य कर रहा है, और दृढ़ आशा से परमेश्वर के सब कामों से अपने उद्धार की भलाई की अपेक्षा न रखे?
यदि वह अपने आपको शैतान या दुष्ट मनुष्यों से आक्रान्त या सताया हुआ देखे, तो क्या उसे तब विशेष रूप से परमेश्वर के विधान को स्मरण करके अपने आपको दृढ़ करने की आवश्यकता नहीं, जिसके बिना वह केवल निराश ही हो सकता?
इसके विपरीत, जब वह पहचानता है कि शैतान और दुष्टों की सारी मण्डली परमेश्वर के हाथ में लगाम की भाँति कसकर थामी हुई है, कि वे न कोई बुराई सोच सकते हैं, न सोचने के बाद उसे करने की युक्ति निकाल सकते हैं, न युक्ति निकालने के बाद उसे पूरा कर सकते हैं, यहाँ तक कि उँगली भी नहीं हिला सकते, केवल उतना जितनी परमेश्वर आज्ञा दे—तो उसके पास भरपूर सान्त्वना है।
क्योंकि जैसे उनके क्रोध को हथियारबन्द करना और उसे जहाँ चाहे मोड़ना और चलाना अकेले परमेश्वर का अधिकार है, वैसे ही उन्हें रोक लेना भी उसी के सामर्थ्य में है, ताकि वे अपने असंयम की पूरी माप के अनुसार कार्य न कर सकें।
इसी कारण रसीन और इस्राएल का राजा, यद्यपि उन्होंने यहूदा के देश को नष्ट करने का षड्यन्त्र रचा था और ऐसी जलती मशालें प्रतीत होते थे जो सारे देश में आग लगा सकें, फिर भी कहे गए कि वे धुआँ उठाते हुए अधजले लुकाठों के सिवा कुछ नहीं हैं जिनसे थोड़ा-सा धुआँ ही उठ सकता है (यशायाह 7:4)।
संक्षेप में, इस विषय पर और न ठहरते हुए, मैं कहता हूँ कि मनुष्य जो सबसे बड़ी दुर्दशा भोग सकता है वह परमेश्वर के विधान से अनजान रहना है, जबकि उसे ठीक रीति से जानना अनुपम धन्यता है।
परमेश्वर के विधान और पूर्वनियति के विषय में, विश्वासियों की शिक्षा और सान्त्वना के लिए जितना आवश्यक है, उतना हम अब तक कह चुके होते—क्योंकि मूर्खों की जिज्ञासा को कभी कोई बात सन्तुष्ट नहीं कर सकती, और न हमें उसे सन्तुष्ट करने का कष्ट उठाना चाहिए—यदि पवित्रशास्त्र के कुछ अंश यह सूचित करते हुए प्रतीत न होते कि परमेश्वर की युक्ति, जैसा हमने कहा, दृढ़ और अटल नहीं है, वरन गौण कारणों की दशा के अनुसार बदलती है।
पहली बात, पवित्रशास्त्र कभी-कभी परमेश्वर के पछतावे की चर्चा करता है। इस प्रकार कहा गया है कि वह मनुष्य को बनाने से, शाऊल को राजगद्दी पर बैठाने से पछताया, और यह कि जो बुराई उसने अपने लोगों पर भेजने को ठहराई थी, जब वह उनमें कुछ सुधार देखेगा तो उससे पछताएगा (उत्पत्ति 6:6; 1 शमूएल 15:11; यिर्मयाह 18:8)।
इसके अतिरिक्त, हम पढ़ते हैं कि उसने जो ठहराया था उसे रद्द और वापस ले लिया। योना के द्वारा उसने नीनवे के लोगों को घोषणा की थी कि उनका नगर चालीस दिन के बाद नाश हो जाएगा, फिर भी बाद में उनके मन-फिराव ने उसे दया करने को प्रेरित किया (योना 3:4, 10)। इसी प्रकार यशायाह के मुँह से उसने हिजकिय्याह को मृत्यु की घोषणा की थी, परन्तु उसके आँसुओं से द्रवित होकर उसे टाल दिया (यशायाह 38:1–5)।
इन अंशों से बहुत लोग यह तर्क करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्यों के प्रति जो करना था उसे अनन्त आज्ञा से नहीं ठहराया, वरन दिन-प्रतिदिन और घड़ी-घड़ी वही ठहराता है जो वह भला और उचित जानता है, जैसा प्रत्येक के कर्मों की योग्यता माँगती है।
जहाँ तक पछतावे शब्द का सम्बन्ध है, हमें इस निष्कर्ष को दृढ़ता से थामे रहना चाहिए: पछतावा परमेश्वर पर उतना ही लागू नहीं हो सकता जितना अज्ञान, भूल या दुर्बलता। क्योंकि कोई भी जान-बूझकर और स्वेच्छा से अपने आपको पछताने की आवश्यकता में नहीं डालता, इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर पछताता है, बिना यह मान लिए कि या तो वह नहीं जानता था कि क्या होगा, या उसे रोकने में असमर्थ था, या उसने बिना उचित विचार के उतावली से अपनी योजना बनाई।
परन्तु यह पवित्र आत्मा के अभिप्राय से इतना दूर है कि उसी अंश में जो परमेश्वर के पछताने की बात कहता है, वह इनकार करता है कि परमेश्वर पछता सकता है, क्योंकि वह मनुष्य नहीं है (1 शमूएल 15:29)। इसलिए यह निश्चित है कि मानवीय बातों पर परमेश्वर का शासन स्थिर, निरन्तर और मन के हर परिवर्तन से मुक्त है।
वस्तुतः, कि उसकी स्थिरता पर सन्देह न किया जाए, उसके विरोधियों को भी इसकी साक्षी देने को विवश होना पड़ा। चाहे वह चाहता या न चाहता, बिलाम यह कहे बिना न रह सका:
“परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और न आदम की सन्तान है कि अपनी बात बदले। इसलिए जो कुछ उसने कहा है वह अवश्य पूरा होगा।”
तो फिर इस शब्द पछतावे का क्या अर्थ है? मैं उत्तर देता हूँ कि इसका वही अर्थ है जो उन सब अन्य कथन-शैलियों का है जो परमेश्वर का वर्णन मानवीय रूप में करती हैं। क्योंकि हमारी दुर्बलता उसकी ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकती, इसलिए उसका जो वर्णन दिया जाता है वह हमारी क्षमता के अनुसार झुककर किया जाना चाहिए ताकि हम उसे समझ सकें। वह यह इस रीति से करता है कि उसे वैसा नहीं दिखाता जैसा वह अपने आप में है, वरन वैसा जैसा हम उसे अनुभव करते हैं।
यद्यपि वह हर प्रकार की उथल-पुथल से मुक्त है, फिर भी कहा जाता है कि वह पापियों पर क्रोधित है। इसलिए जब हम सुनते हैं कि परमेश्वर क्रोधित है, तो हमें यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि उसके भीतर कोई आन्दोलन है। वरन हमें पहचानना चाहिए कि यह कथन हमारे अपने अनुभव से लिया गया है, क्योंकि जब वह अपने न्याय की कठोरता को प्रयोग में लाता है, तो वह क्रोधित मनुष्य का-सा रूप धारण करता है।
इसी प्रकार, पछतावे शब्द के अन्तर्गत हमें उसके कामों में परिवर्तन के सिवा और कुछ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि जब मनुष्य अपने काम बदलते हैं, तो वे गवाही देते हैं कि वे काम उन्हें अप्रिय हैं। चूँकि मनुष्यों में हर परिवर्तन किसी अप्रिय बात का सुधार है, और सुधार पछतावे से आता है, इसलिए परमेश्वर अपने कामों में जो परिवर्तन करता है वह पछतावे शब्द से सूचित होता है।
इस बीच उसकी युक्ति उलटी नहीं जाती, उसकी इच्छा पलटी नहीं जाती, न उसका स्वभाव बदलता है। वरन वह बिना किसी परिवर्तन के निरन्तर वही पूरा करता है जिसे उसने अनादि काल से पहले देखा, स्वीकार किया और ठहराया, यद्यपि मानवीय बोध में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है।
इसलिए जब पवित्रशास्त्र वर्णन करता है कि जो विपत्ति योना ने नीनवे के लोगों को सुनाई थी वह टल गई और हिजकिय्याह का जीवन मृत्यु का सन्देश पाने के बाद बढ़ाया गया, तो वह यह नहीं दर्शाता कि परमेश्वर ने अपनी आज्ञाएँ रद्द कर दीं। जो ऐसा सोचते हैं वे चेतावनियों को ग़लत समझते हैं। यद्यपि वे बिना शर्त के कही गई हैं, तथापि उनमें एक निहित शर्त होती है, जैसा उस उद्देश्य से समझा जा सकता है जिसके लिए वे दी गई थीं।
क्योंकि परमेश्वर ने योना को नीनवे के लोगों के पास उनके नगर के विनाश की भविष्यद्वाणी करने के लिए क्यों भेजा? उसने यशायाह के द्वारा हिजकिय्याह की मृत्यु की घोषणा क्यों की? वह निश्चय ही उन्हें कोई सन्देश भेजे बिना भी नाश कर सकता था।
इसलिए उसके सामने उन्हें केवल उनके आनेवाले विनाश की पूर्व-चेतावनी देने के सिवा एक और उद्देश्य था। वह उन्हें नाश नहीं होने देना चाहता था, वरन यह चाहता था कि वे अपना जीवन सुधारें ताकि नाश न हों। इस प्रकार योना ने भविष्यद्वाणी की कि नीनवे चालीस दिन के बाद नाश हो जाएगा, ठीक इसीलिए कि वह नाश न हो। हिजकिय्याह को और अधिक जीने की आशा से वंचित किया गया ताकि वह अधिक लम्बा जीवन पाए।
अब कौन नहीं देखता कि ऐसी धमकियों से परमेश्वर का अभिप्राय उन्हें, जिन्हें उसने धमकाया, मन-फिराव की ओर प्रेरित करना था, ताकि वे उस न्यायदण्ड से बच निकलें जिसके वे अपने पापों के कारण योग्य थे? यदि यह सच है, तो बात का स्वाभाविक क्रम हमें एक निहित शर्त जोड़ने की ओर ले जाता है, यद्यपि वह इन चेतावनियों में स्पष्ट रूप से नहीं कही गई।
हम इसे इसी प्रकार के उदाहरणों से पुष्ट कर सकते हैं। जब प्रभु ने राजा अबीमेलेक को अब्राहम की पत्नी को ले लेने के कारण डाँटा, तो उसने ये शब्द कहे:
“देख, जिस स्त्री को तू ने रख लिया है उसके कारण तू मर जाएगा, क्योंकि वह सुहागिन है।”
जब अबीमेलेक ने अपना बचाव किया, तो परमेश्वर ने उत्तर दिया:
“इसलिए उस पुरुष की पत्नी को उसे लौटा दे, और वह तेरे लिए प्रार्थना करेगा, और तू जीवित रहेगा। नहीं तो जान ले कि तू निश्चय मर जाएगा, तू और तेरा सब कुछ।”
क्या हम स्पष्ट नहीं देखते कि पहली घोषणा में वह अबीमेलेक के हृदय को भयभीत करने और इस प्रकार उसे अपना कर्तव्य अधिक प्रभावी रीति से करने के लिए प्रेरित करने के निमित्त अधिक कठोरता से बोलता है, और फिर बाद में अपना अभिप्राय स्पष्ट रूप से समझा देता है?
चूँकि अन्य अंशों का भी यही अर्थ है, इसलिए उनसे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि परमेश्वर ने जो पहले घोषित किया था उसे रद्द करके अपनी मूल युक्ति से किसी भी बात में हट गया। इसके विपरीत, वह अपनी अनन्त युक्ति और विधान की पूर्ति का मार्ग तैयार करता है, जब उन दण्डों की घोषणा करके जो उन पर आते यदि वे अपने पापों में बने रहते, वह उन्हें जिन्हें वह क्षमा करना चाहता है मन-फिराव तक लाता है।
इसलिए वह अपनी इच्छा को, यहाँ तक कि अपने वचन को भी, बदलने से इतना दूर है। वह केवल अपने अभिप्राय को अक्षर-अक्षर करके नहीं समझाता, यद्यपि फिर भी उसे समझना सरल है। इसलिए यशायाह की यह घोषणा दृढ़ बनी रहनी चाहिए:
“सेनाओं के यहोवा ने यह ठाना है, तो उसे कौन टाल सकता है? उसका हाथ बढ़ा हुआ है, तो उसे कौन रोक सकता है?”
