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अध्याय आठ: परमेश्वर की पूर्वनियति और विधान के विषय में (भाग 2/3)
चुनाव, जिसे प्रभु अन्यथा अपने ही भीतर छिपाए रखता है, अन्ततः उसकी बुलाहट के द्वारा प्रकट होता है। इसी कारण मैं बुलाहट को प्रायः चुनाव की साक्षी कहा करता हूँ:
“जिन्हें उसने पहले से चुन लिया, उन्हें पहले से ठहराया भी कि उसके पुत्र के स्वरूप में समान हों; और जिन्हें उसने इस प्रकार पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया, ताकि एक दिन उन्हें महिमा भी दे।”
यद्यपि प्रभु ने अपनों को चुनते समय उन्हें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण कर लिया, तथापि हम देखते हैं कि इतने बड़े आशीर्वाद के अधिकारी वे तब तक नहीं बनते जब तक वह उन्हें बुला न ले। दूसरी ओर, एक बार बुलाए जाने पर वे अपने चुनाव का कुछ-कुछ आनन्द उठाने लगते हैं। इसी कारण सन्त पौलुस उस आत्मा को, जिसे वे पाते हैं, लेपालकपन का आत्मा कहता है, और साथ ही उनकी भावी मीरास की मुहर और बयाना भी, क्योंकि वह अपनी साक्षी के द्वारा उनके हृदयों में उस लेपालकपन की निश्चयता को पक्का करता और उस पर मुहर लगाता है।
इसलिए प्रभु जिन्हें चुनता है और जिनका पिता होना ठहराता है, उन्हें अपनी सन्तान के रूप में चुनता है; परन्तु उन्हें बुलाकर वह उन्हें अपने घराने में ले आता है और अपने आपको उनके साथ साझा करता है। बुलाहट को चुनाव से इस प्रकार जोड़कर पवित्रशास्त्र स्पष्ट दिखा देता है कि उसमें परमेश्वर की निःशुल्क दया को छोड़ और कुछ ढूँढ़ना नहीं चाहिए। क्योंकि यदि हम पूछें कि वह किन्हें और क्यों बुलाता है, तो पवित्रशास्त्र उत्तर देता है: उन्हें जिन्हें उसने चुन लिया है। परन्तु जब हम चुनाव पर आते हैं, तो चारों ओर केवल दया ही दिखाई देती है, जैसा सन्त पौलुस की घोषणा है:
“यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है।”
इसे साधारण रीति से नहीं समझना चाहिए, जिसमें कार्य को परमेश्वर के अनुग्रह और मनुष्य के चाहने और दौड़ने के बीच बाँट दिया जाता है। क्योंकि वे इसका यह अर्थ लगाते हैं कि जब तक परमेश्वर का अनुग्रह सफलता न दे, तब तक मनुष्य की इच्छा और प्रयत्न कुछ सिद्ध नहीं कर सकते, परन्तु यदि परमेश्वर अपनी सहायता जोड़ दे, तो मनुष्य की इच्छा और प्रयत्न दोनों उद्धार पाने में कुछ योगदान देते हैं।
मैं इस बहाने का खण्डन अपने शब्दों की अपेक्षा सन्त अगस्तीन के शब्दों से करना अधिक पसन्द करता हूँ: “यदि प्रेरित का आशय केवल इतना कहना होता कि चाहनेवाले या दौड़नेवाले के सामर्थ्य में सब कुछ तब तक नहीं है जब तक प्रभु अपनी दया से उसकी सहायता न करे, तो हम इस कथन को उलटकर यह भी कह सकते थे कि यह केवल परमेश्वर की दया की बात नहीं है जब तक कि उस दया को मनुष्य के चाहने और दौड़ने से सहायता न मिले। यदि यह स्पष्टतः दुष्टता है, तो हमें सन्देह नहीं करना चाहिए कि प्रेरित का आशय सब कुछ परमेश्वर की दया को सौंपना और हमारी इच्छा या प्रयत्न के लिए कुछ न छोड़ना था।” उस पवित्र पुरुष के ये ही शब्द हैं।
वे जो सूक्ष्मता बताते हैं, कि सन्त पौलुस इस प्रकार तब तक न बोलता जब तक हममें कुछ प्रयत्न और इच्छा न होती, उसका मूल्य मैं तिनके के बराबर भी नहीं समझता। क्योंकि वह यह विचार नहीं कर रहा था कि मनुष्य में क्या हो सकता है। बल्कि यह देखकर कि कुछ लोग मनुष्य के उद्धार का एक भाग अपने ही परिश्रम को देते थे, उसने अपने कथन के पहले भाग में उनकी भूल को सीधे-सीधे दोषी ठहराया; फिर वह दृढ़ता से कहता है कि उद्धार का सम्पूर्ण सार परमेश्वर की दया में है।
और भविष्यद्वक्ता और क्या करते हैं सिवाय इसके कि परमेश्वर की निःशुल्क बुलाहट का निरन्तर प्रचार करें? बुलाहट के सार में भी हम यही देखते हैं, क्योंकि वह वचन के प्रचार और पवित्र आत्मा के प्रकाशन में निहित है। भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि हमारा प्रभु अपना वचन किन्हें देता है:
“जिन्होंने मुझे नहीं खोजा, उन्हें मैं मिल गया; जिन्होंने मुझे नहीं पूछा, उन पर मैं प्रकट हुआ। जिन्होंने मेरा नाम नहीं लिया, उनसे मैंने कहा, ‘मैं यहाँ हूँ।’”
और ऐसा न हो कि यहूदी यह समझ बैठें कि ऐसा अनुग्रह केवल अन्यजातियों का था, प्रभु उन्हें स्मरण दिलाता है कि जब उसने उनके पिता अब्राहम को अपनी कृपा में ग्रहण करना चाहा, तब उसे कहाँ से लिया: उस मूर्तिपूजा के बीच से जिसमें वह अपने सब कुटुम्बियों समेत डूबा हुआ था (यहोशू 24:2–3)। जब परमेश्वर उन्हें भी, जिन्होंने कुछ भी योग्यता अर्जित नहीं की, अपने वचन से प्रकाश देता है, तो वह इस प्रकार अपनी निःशुल्क भलाई का पर्याप्त स्पष्ट चिह्न देता है।
फिर भी, ऐसा न हो कि शरीर यह घमण्ड करे कि बुलाए जाने पर उसने उसे उत्तर दिया, परमेश्वर घोषणा करता है कि हमारे पास न सुनने को कान हैं और न देखने को आँखें, जब तक कि उसने उन्हें हमारे लिए न रचा हो। और वह उन्हें हर एक की योग्यता के अनुसार नहीं, परन्तु अपने चुनाव के अनुसार रचता है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण सन्त लूका में मिलता है, जहाँ कहा गया है कि यहूदियों और अन्यजातियों दोनों ने सन्त पौलुस का प्रचार सुना। यद्यपि सब को एक ही शिक्षा दी गई, फिर भी हम पढ़ते हैं:
“जितने अनन्त जीवन के लिए ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया।”
क्या हमें यह कहने में लज्जा नहीं आनी चाहिए कि बुलाहट निःशुल्क नहीं है, जबकि उसमें आदि से अन्त तक अकेला चुनाव ही राज्य करता है?
यह साक्षी उनका ही नहीं जो मनुष्य को परमेश्वर का साझेदार बनाते हैं कि वह उसकी बुलाहट को पूरा करने में सहयोग दे, परन्तु उनका भी खण्डन करती है जो हमें सिखाते हैं कि चुनाव को अनिश्चित और तब तक लटका हुआ मानो जब तक वह बुलाहट से पक्का न हो जाए। वह बुलाहट से अवश्य पक्का होता है, यदि इस शब्द से हम केवल यह समझें कि चुनाव एक निश्चित साक्षी द्वारा प्रमाणित और मानो मुहरबन्द होता है। परन्तु यह कहना झूठ है कि जब तक हमने सुसमाचार ग्रहण नहीं किया तब तक चुनाव में कोई बल नहीं, या उसकी सामर्थ्य हमारे उसे ग्रहण करने से आती है।
जैसे वे लोग, जो सिखाते हैं कि चुनाव की सामर्थ्य और दृढ़ता उस विश्वास पर निर्भर है जिसके द्वारा हम उसकी सहभागिता में प्रवेश करते हैं, उलटा चलते हैं, वैसे ही दूसरी ओर हम बहुत उत्तम क्रम का पालन करेंगे यदि अपने चुनाव की निश्चयता खोजते समय हम उन चिह्नों पर ठहरें जो उसकी निश्चित साक्षियाँ हैं।
शैतान के पास विश्वासियों को हिला देने के लिए इससे अधिक भारी या खतरनाक परीक्षा कोई नहीं, जब वह उन्हें उनके चुनाव के विषय में सन्देहों से व्याकुल करके मूर्खतापूर्ण लालसा से फुसलाता है कि वे उसे उचित मार्ग से बाहर खोजें। उचित मार्ग से बाहर खोजने से मेरा अभिप्राय यह है कि जब कोई बेचारा मनुष्य ईश्वरीय बुद्धि के अगम्य भेदों में घुसने का यत्न करता है और यह जानने के लिए कि परमेश्वर ने अपने न्याय में उसके विषय में क्या ठहराया है, अनन्तकाल के आरम्भ से खोज करने लगता है।
तब वह डूबने के लिए अपने आपको एक गहरी खाई में सिर के बल गिरा देता है; वह अपने आपको ऐसे फन्दों में उलझा लेता है जिनसे वह कभी छूट न सकेगा; और वह अन्धकार के ऐसे गर्त में प्रवेश करता है जिससे वह कभी निकल न पाएगा। क्योंकि उचित ही है कि मानवीय बुद्धि के दुःसाहस को ऐसे भयानक विनाश का दण्ड मिले जब वह अपनी ही सामर्थ्य से ईश्वरीय बुद्धि की ऊँचाई पर चढ़ने का यत्न करती है।
जिस परीक्षा का मैंने वर्णन किया वह इसलिए और भी घातक है कि हम सब लगभग उसकी ओर झुके रहते हैं। बहुत थोड़े ही ऐसे हैं जिनके हृदय में यह विचार न उठता हो: तेरा उद्धार परमेश्वर के चुनाव को छोड़ और कहाँ से है? और यह चुनाव कैसे प्रकट होता है? जब यह विचार किसी मनुष्य को पकड़ लेता है, तो या तो वह उसे बुरी तरह सताता है, या उसे सर्वथा भौचक्का और निराश कर देता है।
ऐसे लोग पूर्वनियति की कितनी विपरीत धारणा रखते हैं, इसका इससे अधिक उपयुक्त प्रमाण मुझे नहीं मिल सकता। क्योंकि मानव मन किसी घातक भ्रम से इससे अधिक संक्रमित नहीं हो सकता जितना तब, जब विवेक व्याकुल हो जाता है और उस शान्ति और विश्राम से वंचित कर दिया जाता है जो उसे परमेश्वर के साथ मिलना चाहिए। यह विषय एक समुद्र के समान है; यदि हम उसमें नाश होने से डरते हैं, तो हमें सबसे बढ़कर उस चट्टान से सावधान रहना चाहिए जिससे टकराकर कोई बिना विनाश के नहीं बच सकता।
यद्यपि पूर्वनियति की इस चर्चा को एक खतरनाक समुद्र माना जाता है, फिर भी उस पर यात्रा करना सुरक्षित, शान्तिपूर्ण, यहाँ तक कि आनन्दमय है, जब तक कि कोई जान-बूझकर अपने आपको जोखिम में न डाले। क्योंकि जैसे वे लोग जो अपने चुनाव की निश्चयता पाने के लिए परमेश्वर के वचन को छोड़कर उसकी अनन्त युक्ति में प्रवेश करने का यत्न करते हैं, अपने आपको एक घातक गर्त में सिर के बल गिराते हैं, वैसे ही जो चुनाव को ठीक रीति से और उसी क्रम में खोजते हैं जिसमें वह पवित्रशास्त्र में प्रकट किया गया है, वे उससे अनुपम शान्ति पाते हैं।
तो चुनाव की खोज का हमारा मार्ग यह हो: हमें परमेश्वर की बुलाहट से आरम्भ करना और उसी पर समाप्त करना चाहिए, क्योंकि प्रभु चाहता है कि बुलाहट उस चिह्न या निशान का काम दे जिससे हम उन सब बातों के विषय में निश्चित हो जाएँ जिन्हें उसकी युक्ति के विषय में जानना उचित है। और ऐसा न हो कि यह साक्षी किसी को निर्बल प्रतीत हो, आइए विचार करें कि वह हमें कितनी स्पष्टता और निश्चयता देती है।
पहले, यदि हम अपने प्रति परमेश्वर की पितृवत् दया और सद्भावना की निश्चयता चाहते हैं, तो हमें अपनी आँखें मसीह की ओर फेरनी चाहिए, जिसमें अकेले पिता की प्रसन्नता ठहरी हुई है (मत्ती 3:17)। यदि हम उद्धार, जीवन और अमरता चाहते हैं, तो हमें और कहीं भी नहीं जाना चाहिए, क्योंकि मसीह ही जीवन का सोता, उद्धार का बन्दरगाह और स्वर्गीय राज्य का वारिस है।
अब चुनाव का उद्देश्य इसके सिवा और क्या है कि परमेश्वर की सन्तान के रूप में ग्रहण किए जाकर हम उसके अनुग्रह और प्रेम से उद्धार और अमरता पाएँ? कोई चाहे जितना घुमाए, जाँचे या छानबीन करे, यही पाया जाएगा कि हमारे चुनाव का प्रयोजन इससे आगे नहीं जाता।
इसलिए जिन्हें परमेश्वर ने अपनी सन्तान होने के लिए चुना है, उनके विषय में यह नहीं कहा जाता कि वे अपने आप में चुने गए, परन्तु उसके मसीह में, क्योंकि वह उनसे उसमें हुए बिना प्रेम नहीं कर सकता था, और न उन्हें पहले मसीह में सहभागी बनाए बिना अपनी मीरास से सम्मानित कर सकता था (इफिसियों 1:4–5)। यदि हम मसीह में चुने गए हैं, तो हम अपने चुनाव की निश्चयता न अपने आप में पाएँगे, और न परमेश्वर पिता में भी, यदि हम उसकी कल्पना उसके पुत्र से अलग करें।
इसलिए मसीह वह दर्पण है जिसमें हमें अपने चुनाव को देखना चाहिए, और जिसमें हम उसे बिना धोखे के देखेंगे। क्योंकि वही वह है जिसकी देह में स्वर्गीय पिता ने अनादिकाल से उन्हें मिला देना ठहराया जिन्हें वह अपना बनाना चाहता था, ताकि जिन-जिनको वह मसीह के अंग जानता है उन सब को अपनी सन्तान माने; सो यदि हमारी मसीह के साथ सहभागिता है, तो हमारे पास पर्याप्त दृढ़ और स्पष्ट साक्षी है कि हम जीवन की पुस्तक में लिखे हैं।
अब मसीह ने अपने आपको हम पर पर्याप्त रूप से प्रकट कर दिया है, जब सुसमाचार के प्रचार के द्वारा उसने साक्षी दी है कि वह पिता की ओर से हमें दिया गया है कि अपनी सब आशीषों समेत हमारा हो। मैं कहता हूँ कि वह हमें साक्षी देता है कि जो कोई सच्चे विश्वास से उसे ग्रहण करते हैं, वे सब स्वर्गीय पिता की दृष्टि में उसकी सन्तान गिने जाएँगे।
यदि हम परमेश्वर की सन्तान और वारिस होने से बढ़कर कुछ और चाहते हैं, तो हम सचमुच मसीह से भी ऊपर चढ़ने का यत्न कर सकते हैं। परन्तु यदि यही हमारी अन्तिम सीमा है, तो क्या यह निरा पागलपन नहीं कि जो हमें मसीह में पहले ही मिल चुका है और जो केवल उसी में मिल सकता है, उसे हम मसीह से बाहर खोजें? फिर, क्योंकि वह पिता की अनन्त बुद्धि, अटल सत्य और स्थिर युक्ति है, हमें यह डर नहीं होना चाहिए कि जो कुछ वह अपने मुख से हमें बताता है वह उस पिता की इच्छा से ज़रा भी भिन्न है जिसे हम जानना चाहते हैं। वरन् वह उस इच्छा को हम पर विश्वासयोग्यता से प्रकट करता है, जैसी वह आदि में थी और सदा बनी रहेगी।
यह भी हमारे भरोसे को दृढ़ करने में बहुत योगदान देता है: हमारे चुनाव की निश्चयता हमारी बुलाहट से जुड़ी है। जिन्हें मसीह ने अपने ज्ञान से प्रकाशित करके अपनी कलीसिया की सहभागिता में पहुँचाया है, उनके विषय में कहा जाता है कि वह उन्हें अपनी सुरक्षा और देखभाल में ग्रहण करता है। और जिन-जिन को वह ग्रहण करता है, उनके विषय में कहा जाता है कि पिता ने उन्हें उसकी रखवाली में सौंप दिया है, ताकि वह उन्हें अनन्त जीवन तक पहुँचाए।
हम और क्या चाहते हैं? प्रभु यीशु खुलकर घोषणा करता है कि पिता ने उन सब को, जिन्हें वह बचाना चाहता है, उसकी सुरक्षा में सौंप दिया है (यूहन्ना 6:37–40; 10:27–29; 17:6–12)। इसलिए जब हम यह जानना चाहें कि परमेश्वर ने हमारे उद्धार का भार अपने ऊपर लिया है या नहीं, तो हम यह पूछें कि क्या उसने हमें मसीह को सौंपा है, जिसे उसने अपने सब लोगों का एकमात्र रखवाला ठहराया है।
यदि हमें सन्देह हो कि मसीह ने हमें अपनी सुरक्षा और रखवाली में लिया है या नहीं, तो वह अपने आपको हमारा चरवाहा बताकर और यह घोषणा करके कि यदि हम उसका शब्द सुनें तो वह हमें अपनी भेड़ों में गिनेगा, उस सन्देह का उत्तर देता है (यूहन्ना 10:27)। इसलिए आइए हम मसीह को ग्रहण करें, क्योंकि वह हमारे सामने अपने आपको इतनी कृपा से प्रस्तुत करता है और हमें अपनाने को आगे बढ़ आता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह हमें अपने झुण्ड में रखेगा और अपने बाड़े में सुरक्षित रखेगा। परन्तु कोई कहेगा कि हमें इसकी चिन्ता करनी चाहिए कि आगे हम पर क्या बीतेगा, और भविष्य का विचार करते समय हमारी निर्बलता हमें सावधान रहने की चेतावनी देती है। क्योंकि यद्यपि सन्त पौलुस कहता है कि परमेश्वर उन्हें बुलाता है जिन्हें उसने चुना है, फिर भी प्रभु यीशु यह भी कहता है:
“बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए थोड़े हैं।”
इसी प्रकार सन्त पौलुस एक और स्थान पर हमें निश्चिन्तता की असावधानी से रोकता है:
“जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ’, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।”
फिर:
“क्या तू परमेश्वर की कलीसिया में मिला लिया गया है? घमण्डी न हो, परन्तु डर, क्योंकि प्रभु तुझे काट सकता है और तेरी जगह दूसरे को रख सकता है।”
अन्त में, अनुभव हमें दिखाता है कि विश्वास और बुलाहट का मूल्य बहुत कम है जब तक कि उनके साथ अन्त तक स्थिर रहना न जुड़ा हो, और यह दृढ़ता सब को नहीं दी जाती।
मैं उत्तर देता हूँ कि मसीह ने हमें इस उलझन से छुड़ा दिया है, क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये प्रतिज्ञाएँ भविष्य से सम्बन्ध रखती हैं:
“जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, और जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।”
फिर:
“मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है उसमें से मैं कुछ न खोऊँ, परन्तु अन्तिम दिन उसे जिला उठाऊँ।”
फिर:
“मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं और मेरे पीछे चलती हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न सकेगा। मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझे दिया है, सब से बड़ा है; इसलिए कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन न सकेगा।”
मसीह यहाँ हमें और क्या सिखाना चाहता था, सिवाय इसके कि हमें निश्चय दिलाए कि जब हम उसके हो जाएँगे तब हम अनन्त उद्धार के अधिकारी होंगे?
यह आपत्ति उठाई जाएगी कि प्रतिदिन कुछ लोग, जो मसीह के प्रतीत होते थे, गिरकर नाश हो जाते हैं। निश्चय, जिस स्थान पर वह कहता है कि पिता के दिए हुओं में से कोई नाश नहीं हुआ, वहाँ वह विनाश के पुत्र को अलग रखता है। यह सच है, परन्तु यह भी उतना ही निश्चित है कि ऐसे लोग कभी मसीह से हृदय के उस भरोसे के साथ नहीं जुड़े थे जिससे, जैसा हम कहते हैं, हमारा चुनाव हमारे लिए निश्चित होता है।
सन्त यूहन्ना कहता है, “वे हम में से निकले तो, परन्तु हम में से न थे; क्योंकि यदि वे हम में से होते तो हमारे साथ बने रहते।”
मैं इससे इनकार नहीं करता कि उनके पास चुने हुओं जैसे चिह्न होते हैं, परन्तु मैं उन्हें अपने चुनाव की वह दृढ़ नींव नहीं देता जो विश्वासियों को, जैसा मैं कह चुका हूँ, सुसमाचार के वचन से प्राप्त करनी चाहिए।
इसलिए ऐसे उदाहरण हमें विचलित न करें और न प्रभु यीशु की उन प्रतिज्ञाओं पर निश्चिन्त विश्राम करने से रोकें जिनमें वह घोषणा करता है कि पिता ने उन सब को उसे दे दिया है जिनसे वह सच्चे विश्वास में ग्रहण किया जाता है, और उनमें से कोई नाश न होगा, क्योंकि वह उनका रखवाला और रक्षक है। यहूदा की चर्चा कहीं और की जाएगी।
जहाँ तक सन्त पौलुस का सम्बन्ध है, वह हमारी सब प्रकार की निश्चिन्तता को नहीं रोकता, परन्तु उस शारीरिक असावधानी को रोकता है जो अपने साथ घमण्ड, दुःसाहस और दूसरों के प्रति तिरस्कार लाती है, नम्रता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा को बुझा देती है, और हमें उसका अनुग्रह भुला देती है। क्योंकि उस स्थान पर वह अन्यजातियों से बात करता है और उन्हें चेतावनी देता है कि वे यहूदियों का घमण्ड और निर्दयता से अपमान न करें, केवल इसलिए कि वे उस स्थान पर रखे गए हैं जहाँ से दूसरे हटाए गए थे।
इसी प्रकार वह ऐसा भय नहीं माँगता जो हमें आतंक में डगमगा दे, परन्तु ऐसा जो हमें नम्रता से परमेश्वर के अनुग्रह का आदर करना सिखाकर उस भरोसे को ज़रा भी घटाता नहीं जो हमें उस पर है, जैसा कि अन्यत्र कहा जा चुका है।
जहाँ तक मसीह के इस कथन का सम्बन्ध है कि बुलाए हुए बहुत हैं पर चुने हुए थोड़े, वह उस अर्थ से बहुत दूर है जो वे उसे देते हैं। उसे ठीक समझने के लिए हमें ध्यान देना चाहिए कि बुलाहट दो प्रकार की है। एक सार्वभौमिक बुलाहट है, जो सुसमाचार के बाहरी प्रचार में निहित है, जिसके द्वारा प्रभु सब मनुष्यों को बिना भेद के अपनी ओर बुलाता है—उन्हें भी जिनके लिए वह उसे मृत्यु की गन्ध और अधिक कठोर दण्ड का कारण बनाकर प्रस्तुत करता है।
एक और विशेष बुलाहट भी है, जिसमें वह साधारणतः केवल विश्वासियों को सहभागी बनाता है, जब अपने आत्मा के भीतरी प्रकाशन से वह शिक्षा को उनके हृदयों में जड़ पकड़वाता है। फिर भी कभी-कभी वह ऐसी बुलाहट उनके प्रति भी काम में लाता है जिन्हें वह कुछ समय के लिए प्रकाशित करता है और बाद में, उनकी कृतघ्नता के कारण, त्यागकर और भी बड़े अन्धेपन में डाल देता है।
प्रभु यीशु ने देखा कि सुसमाचार उस समय बहुतों को सुनाया जा रहा था, पर बहुतों ने उसे ठुकराया, औरों ने तुच्छ जाना, और बहुत थोड़ों ने उसका आदर किया। इसलिए वह परमेश्वर को हमारे सामने एक राजा के रूप में प्रस्तुत करता है, जो एक भव्य भोज रखना चाहता था और बड़ी भीड़ को बुलाने के लिए अपने सेवकों को इधर-उधर भेजता है। परन्तु शायद ही कोई आने की प्रतिज्ञा करता है, क्योंकि हर एक कोई न कोई बाधा बताता है। उनके इनकार के कारण वह हर एक को, जो गलियों में मिल सके, बुलाने को विवश होता है। सब स्पष्ट देख सकते हैं कि यहाँ तक दृष्टान्त को बाहरी बुलाहट के विषय में समझना चाहिए।
फिर वह यह जोड़ता है कि परमेश्वर, अतिथियों का स्वागत करनेवाले गृहस्वामी के समान, मेज़-मेज़ जाकर उन सब का स्वागत और सम्मान करता है जिन्हें उसने भीतर आने दिया है। यदि वह किसी को बिना विवाह-वस्त्र के पाता है, तो घोषणा करता है कि वह उसे अपने भोज का अनादर नहीं करने देगा, परन्तु बाहर निकाल देगा।
मैं मानता हूँ कि इस भाग को उन्हीं के विषय में समझना चाहिए जो विश्वास का अंगीकार करते हैं और इसलिए कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं, परन्तु मसीह की पवित्रता का वस्त्र नहीं पहने हैं। इसलिए यह घोषित किया गया है कि प्रभु ऐसे कलंकों को सदा सहन न करेगा, जो उसकी कलीसिया पर लज्जा ही लाते हैं, परन्तु उनकी निर्लज्जता के योग्य उन्हें बाहर निकाल देगा।
इस प्रकार बुलाए गए बड़ी भीड़ में से थोड़े ही चुने जाते हैं, परन्तु यह वह बुलाहट नहीं जिससे हम विश्वासियों को अपना चुनाव पहचानना सिखाते हैं। क्योंकि वहाँ जिस बुलाहट की चर्चा है वह दुष्टों तक भी पहुँचती है, जबकि दूसरी अपने साथ नया जन्म देनेवाले आत्मा को लाती है, जो भावी मीरास का बयाना और मुहर है और जिसके द्वारा हमारे हृदयों पर पुनरुत्थान के दिन तक छाप लगाई जाती है।
यही कारण है कि मसीह उपर्युक्त अपवाद रखता है जब कहता है कि यहूदा को छोड़ उसकी भेड़ों में से कोई नाश नहीं हुआ। यहूदा मसीह की भेड़ों में गिना गया, इसलिए नहीं कि वह सचमुच भेड़ था, परन्तु इसलिए कि उनके बीच उसका एक स्थान था। जब प्रभु अन्यत्र कहता है कि उसने उसे अन्य प्रेरितों के साथ चुना था, तो इसे केवल उसके पद के विषय में समझना चाहिए:
“क्या मैंने तुम बारहों को नहीं चुना? तौभी तुम में से एक शैतान है।”
अर्थात् उसने उसे प्रेरित ठहराया था। परन्तु जब मसीह उद्धार के लिए चुनाव की बात करता है, तो यहूदा को चुने हुओं की गिनती से अलग कर देता है:
“मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता; जिन्हें मैंने चुन लिया है उन्हें मैं जानता हूँ।”
यदि कोई इन स्थानों में चुनाव के अर्थ को गड्ढमड्ड करे, तो वह अपने आपको बुरी तरह उलझा लेगा। यदि वह भेद करना जानता है, तो इससे सरल कुछ नहीं।
इसलिए सन्त ग्रेगोरी ने बहुत बुरा कहा जब उसने कहा कि हम अपनी बुलाहट को तो जान सकते हैं परन्तु अपने चुनाव के विषय में अनिश्चित रहते हैं। इससे उसने लोगों को भय और थरथराहट के लिए उकसाया, यह तर्क देकर कि हम जानते हैं कि आज हम क्या हैं पर नहीं जानते कि कल क्या होंगे। फिर भी उसके तर्क का क्रम स्पष्ट दिखाता है कि वह इस भूल में कैसे पड़ा। क्योंकि उसने चुनाव की नींव कर्मों की योग्यता पर रखी, इसलिए लोगों को डराने और अविश्वासी बनाने के लिए उसके पास भरपूर कारण थे, परन्तु वह उन्हें दृढ़ नहीं कर सका क्योंकि उसने उन्हें परमेश्वर की भलाई पर भरोसा रखने की ओर नहीं ले चलाया।
इससे विश्वासी उस बात का कुछ अनुभव कर सकते हैं जो हमने आरम्भ में कही थी: पूर्वनियति, जब उसे ठीक रीति से विचारा जाए, विश्वास को न तो व्याकुल करती है न हिलाती है, वरन् उसे अत्यन्त दृढ़ता से स्थापित करती है।
चुने हुए सब के सब माता के गर्भ से ही प्रभु की बुलाहट के द्वारा मसीह के झुण्ड में नहीं इकट्ठे किए जाते, और न वे सब एक ही समय बुलाए जाते हैं, परन्तु जैसा परमेश्वर को उन पर अपना अनुग्रह बाँटना भाता है। परम चरवाहे की ओर फिरने से पहले वे औरों के समान भटकते हैं और संसार की सार्वभौमिक अव्यवस्था में बिखरे रहते हैं। वे औरों से किसी बात में भिन्न नहीं सिवाय इसके कि परमेश्वर अनुपम दया से उन्हें अनन्त विनाश में गिरने से बचाए रखता है।
इसलिए यदि हम उन्हें अपने आप में देखें, तो हम आदम की सन्तान को देखेंगे, जो अपनी उत्पत्ति की विकृति के सिवा और कुछ प्रकट नहीं कर सकती। वे जो निराशाजनक अभक्ति में नहीं गिरते, यह किसी स्वाभाविक भलाई से नहीं होता, परन्तु इसलिए कि प्रभु की आँख उनके उद्धार पर लगी रहती है और उसका हाथ उन्हें उसकी ओर ले जाने को बढ़ा रहता है।
जो लोग कल्पना करते हैं कि चुनाव का कोई रहस्यमय बीज जन्म से उनके हृदयों में जमा है, जो उन्हें निरन्तर परमेश्वर के भय की ओर झुकाता रहता है, उनके पास अपने मत को सिद्ध करने के लिए पवित्रशास्त्र का कोई अधिकार नहीं है, और अनुभव ही उनका खण्डन करता है। वे कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं यह सिद्ध करने के लिए कि चुने हुओं में से कुछ ठीक रीति से प्रकाशित होने से पहले धर्म से सर्वथा रहित नहीं थे। वे दावा करते हैं कि सन्त पौलुस अपने फरीसीपन में निर्दोष था, और सूबेदार कुरनेलियुस अपनी प्रार्थनाओं और दान-पुण्य के कारण परमेश्वर को भाता था (प्रेरितों के काम 10:1–4)।
सन्त पौलुस के विषय में, जो वे कहते हैं उसे मैं मान लेता हूँ। कुरनेलियुस के विषय में, मैं कहता हूँ कि वे भूल में हैं, क्योंकि वह तो पहले ही नया जन्म पा चुका और प्रकाशित हो चुका था; उसमें सुसमाचार के अधिक स्पष्ट प्रकाशन के सिवा और कुछ घटता नहीं था।
परन्तु यदि हम ऐसे दर्जन भर उदाहरण भी मान लें, तो अन्त में उन्हें क्या मिलेगा? क्या वे यह निष्कर्ष निकालेंगे कि परमेश्वर के सब चुने हुओं का स्वभाव एक-सा था? यह वैसा ही होगा जैसे कोई सुकरात, अरिस्टाइडीज़, ज़ेनोक्रेटीज़, स्कीपियो, क्यूरियस, कैमिलस और अन्य अन्यजातियों की सत्यनिष्ठा सिद्ध करके यह निष्कर्ष निकालना चाहे कि मूर्तिपूजा से अन्धे हुए सब लोग पवित्र और निर्दोष जीवन बिताते थे।
इसके अतिरिक्त कि उनका तर्क निकम्मा है, पवित्रशास्त्र अनेक स्थानों पर खुलकर उनका विरोध करता है। क्योंकि इफिसियों के नया जन्म पाने से पहले की जिस दशा का वर्णन सन्त पौलुस करता है, वह इस बीज का एक दाना भी नहीं दिखाती।
वह कहता है, “तुम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे, जिनमें तुम इस संसार की रीति पर और शैतान के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न माननेवालों में कार्य करता है। उन्हीं में हम सब भी पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे और जो कुछ हमें अच्छा लगता वही करते थे; और हम सब भी औरों के समान स्वभाव से परमेश्वर के क्रोध की सन्तान थे।”
फिर:
“स्मरण रखो कि तुम उस समय संसार में न आशा रखते थे और न परमेश्वर को जानते थे।”
फिर:
“तुम तो पहले अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो; ज्योति की सन्तान के समान चलो।”
वे शायद कहें कि इसे केवल सत्य की अज्ञानता के विषय में समझना चाहिए, जिसमें, वे सहर्ष मानते हैं, विश्वासी अपनी बुलाहट से पहले रखे जाते हैं। फिर भी यह ढिठाई भरा बहाना है, क्योंकि सन्त पौलुस इसी शिक्षा से यह निष्कर्ष निकालता है कि इफिसियों को अब न झूठ बोलना चाहिए न चोरी करनी चाहिए।
परन्तु यदि हम उन्हें यह भी मान लें, तो वे अन्य स्थानों के विषय में क्या उत्तर देंगे? उदाहरण के लिए, कुरिन्थियों से यह कहकर कि मूर्तिपूजक, व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, लौण्डेबाज, पुरुषगामी, चोर और लोभी परमेश्वर के राज्य के अधिकारी न होंगे, वह तुरन्त जोड़ता है कि वे मसीह को जानने से पहले इन अपराधों में फँसे थे, परन्तु अब उसके लहू से शुद्ध किए गए और उसके आत्मा से छुड़ाए गए हैं:
“तुम में से कितने ऐसे ही थे; परन्तु तुम प्रभु यीशु के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, पवित्र किए गए और धर्मी ठहराए गए।”
इसी प्रकार वह रोमियों से कहता है:
“जैसे तुमने पहले अपने अंगों को अशुद्धता और अधर्म के दास होने के लिए सौंपा था, वैसे ही अब उन्हें धार्मिकता के दास होने के लिए सौंप दो। क्योंकि जिन बातों से अब तुम लज्जित होते हो, उनसे उस समय तुम्हें क्या फल मिला?”
—रोमियों 6:19, 21
मैं पूछता हूँ, चुनाव का कौन-सा बीज उनमें फल ला रहा था जो सर्वथा दुष्ट और लज्जाजनक जीवन बिताते हुए और लगभग निराशाजनक द्वेष से काम करते हुए संसार के सबसे घृणित पापों में अपने आपको सौंप चुके थे?
यदि प्रेरित इन नए शिक्षकों की रीति से बोलना चाहता, तो उसे उन्हें स्मरण दिलाना चाहिए था कि वे परमेश्वर के कितने ऋणी हैं कि उसने उन्हें ऐसी दुर्दशा में गिरने नहीं दिया। सन्त पतरस को भी उन्हें, जिन्हें वह लिख रहा था, यह उपदेश देना चाहिए था कि वे परमेश्वर का धन्यवाद करें कि उसने आरम्भ से उन्हें पवित्रता का बीज देकर उनकी रक्षा की। परन्तु इसके विपरीत वह उन्हें चेतावनी देता है:
“तुम्हारे लिए बीता हुआ समय बहुत है कि तुमने हर प्रकार की बुरी लालसा को खुली छूट दी।”
और यदि हम उदाहरणों की ओर मुड़ें तो क्या? विश्वास करने से पहले वेश्या राहाब में कौन-सा बीज था? या मनश्शे में, जब वह भविष्यद्वक्ताओं का लहू यहाँ तक बहा रहा था कि यरूशलेम नगर भर गया? या उस चोर में जो अपनी अन्तिम साँस लेते समय मन फिराव में आया?
इसलिए आइए हम इन निकम्मी कल्पनाओं को छोड़ दें जिन्हें कुछ जिज्ञासु मन पवित्रशास्त्र से बाहर गढ़ते हैं। वरन् जो पवित्रशास्त्र में है वही दृढ़ बना रहे:
“हम सब भेड़ों के समान भटक गए थे, हम में से हर एक अपने-अपने मार्ग की ओर फिर गया।”
अर्थात् हर एक विनाश की ओर फिर गया। विनाश की इस खाई से प्रभु जिन्हें चाहता है उन्हें निकालता है—सब को एक साथ नहीं, परन्तु अपने ठहराए हुए समय तक विलम्ब करके। इस बीच वह उन्हें बचाए रखता है कि वे अक्षम्य निन्दा में न गिर पड़ें।
जैसे प्रभु अपनी बुलाहट की सामर्थ्य से अपने चुने हुओं को उस उद्धार तक पहुँचाता है जिसके लिए उसने उन्हें अपनी अनन्त युक्ति में पहले से ठहराया था, वैसे ही वह त्यागे हुओं पर अपने न्याय भी प्रकट करता है, जिनसे वह उसे पूरा करता है जो उसने उनके विषय में ठहराया है। इसलिए जिन्हें उसने विनाश और अनन्त मृत्यु के लिए रचा, ताकि वे उसके क्रोध के पात्र और उसकी कठोरता के उदाहरण हों, उन्हें वह उनके ठहराए हुए अन्त तक या तो उन्हें अपना वचन सुनने के अवसर से वंचित करके पहुँचाता है, या उसके प्रचार के द्वारा उन्हें और अन्धा और कठोर करके।
पहली प्रकार के हमारे पास असंख्य उदाहरण हैं, परन्तु हम एक चुनेंगे जो विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मसीह के आगमन से चार हज़ार वर्ष से भी अधिक तक प्रभु अपनी उद्धार देनेवाली शिक्षा के प्रकाश को सब जातियों से निरन्तर छिपाए रहा। यदि कोई कहे कि उसने उस समय के लोगों को इतने बड़े आशीर्वाद में इसलिए सहभागी नहीं किया कि उसने उन्हें उसके योग्य नहीं समझा, तो उनके उत्तराधिकारी उनसे अधिक योग्य न थे। तब उसने यह अनुग्रह कुछ को दिया और औरों को क्यों नहीं?
यदि कोई यहाँ परमेश्वर की गुप्त और छिपी हुई युक्ति से ऊँचा कारण ढूँढ़े, तो वह व्यर्थ अपने आपको सताएगा। और न हमें यह डर होना चाहिए कि पोर्फिरी का कोई चेला या कोई अन्य निन्दक परमेश्वर की धार्मिकता की निन्दा करने पाएगा, केवल इसलिए कि हम कोई और उत्तर नहीं देते। क्योंकि जब हम यह कहते हैं कि कोई भी बिना योग्य हुए नाश नहीं होता, और कुछ लोग केवल परमेश्वर की निःशुल्क उदारता से दण्ड से छुड़ाए जाते हैं, तो परमेश्वर की महिमा बनाए रखने के लिए यही पर्याप्त है और उसकी रक्षा के लिए हमारे बहानों की आवश्यकता नहीं।
इसलिए प्रभु अपनी पूर्वनियति को इस प्रकार पूरा करता है कि जिन्हें उसने त्याग दिया है उन्हें अपने सत्य के प्रकाश से वंचित करके अन्धेपन में छोड़ देता है।
दूसरी प्रकार का अनुभव हम प्रतिदिन करते हैं, और पवित्रशास्त्र में उसके अनेक उदाहरण हैं। सौ लोग एक ही उपदेश सुन सकते हैं: बीस उसे विश्वास की आज्ञाकारिता से ग्रहण करेंगे, जबकि शेष या तो उसकी उपेक्षा करेंगे, उसका उपहास करेंगे, उसे ठुकराएँगे या उसे दोषी ठहराएँगे। यदि कोई कहे कि यह भिन्नता उनकी अपनी दुष्टता और हठ से उत्पन्न होती है, तो यह पर्याप्त नहीं। क्योंकि वही दुष्टता उन सब के मनों में रहती यदि प्रभु कुछ को अपने अनुग्रह से न सुधारता।
तो वह एक पर अनुग्रह क्यों करता है और दूसरे को पीछे छोड़ देता है? सन्त लूका उनके विषय में, जिन्हें वह बुलाता है, कारण यह बताता है कि वे पहले से जीवन के लिए ठहराए गए थे (प्रेरितों के काम 13:48)। तब हम औरों के विषय में और क्या सोचें सिवाय इसके कि वे उसके क्रोध के पात्र हैं, जो अनादर के लिए ठहराए गए हैं?
इसलिए आइए हम सन्त अगस्तीन के साथ यह कहने में लज्जित न हों: “परमेश्वर निश्चय दुष्टों की इच्छा को भलाई की ओर फेर सकता था, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। इसमें कोई सन्देह नहीं। तब वह ऐसा क्यों नहीं करता? क्योंकि वह चाहता नहीं। वह क्यों नहीं चाहता, यह उसी के भीतर छिपा है, क्योंकि हमें उचित से अधिक जानना नहीं चाहिए।”
यह क्राइसोस्टम के साथ यह कहकर बात टाल देने से कहीं अच्छा है कि परमेश्वर उसे खींचता है जो उसे पुकारता है और सहायता के लिए हाथ बढ़ाता है, जिससे भेद परमेश्वर के न्याय में नहीं परन्तु मनुष्य की इच्छा में ठहरता है।
इसमें निश्चय ही कोई सन्देह नहीं हो सकता कि प्रभु अपना वचन कुछ लोगों को भेजता है जिनके विषय में वह जानता है कि वे उससे और अन्धे हो जाएँगे। उसने फिरौन के पास इतने सन्देश क्यों भेजे? क्या इसलिए कि वह एक के बाद एक दूतावास भेजकर उसका मन नरम करने की आशा रखता था? आरम्भ करने से पहले ही वह जानता था कि परिणाम क्या होगा और उसने उसे पहले से कह दिया था:
उसने मूसा से कहा, “जा, और उसे मेरी इच्छा बता। परन्तु मैं उसके मन को कठोर कर दूँगा, और वह आज्ञा न मानेगा।”
इसी प्रकार यहेजकेल को खड़ा करते समय परमेश्वर ने उसे चेतावनी दी कि वह उसे एक विद्रोही और हठीले लोगों के पास भेज रहा है, ताकि जब वह उनके कान बहरे पाए तो चकित न हो (यहेजकेल 3:7–9)। उसने इसी प्रकार यिर्मयाह को पहले से बताया कि उसकी शिक्षा आग के समान होगी, जो लोगों को तिनकों के समान भस्म करके बिखेर देगी (यिर्मयाह 5:14)।
परन्तु यशायाह की भविष्यद्वाणी इस बात को और भी ज़ोर से रखती है, क्योंकि प्रभु उसे इस आज्ञा के साथ भेजता है:
“जाकर इस्राएलियों से कह: ‘सुनते तो रहो, परन्तु समझो नहीं; देखते तो रहो, परन्तु बूझो नहीं। इन लोगों के मन को मोटा कर, उनके कानों को भारी कर, और उनकी आँखों को बन्द कर, ऐसा न हो कि वे देखें, सुनें और समझें, और फिरें और उद्धार पाएँ।’”
इस प्रकार वह अपना वचन उन्हें सुनाता है, परन्तु उन्हें और बहरा करने के लिए। वह ज्योति जलाता है, परन्तु उन्हें और अन्धा करने के लिए। वह अपनी शिक्षा उनके सामने रखता है, परन्तु उन्हें और जड़ बनाने के लिए। वह उन्हें औषधि देता है, परन्तु इसलिए कि वे चंगे न हों।
सन्त यूहन्ना इस भविष्यद्वाणी का हवाला देकर कहता है कि यहूदी मसीह की शिक्षा पर विश्वास नहीं कर सके क्योंकि परमेश्वर का यह श्राप उन पर ठहरा हुआ था (यूहन्ना 12:39–40)। और इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि जब परमेश्वर किसी को प्रकाशित करना नहीं चाहता, तब वह अपनी शिक्षा उसके सामने परदे में रखता है, ताकि उससे उसे लाभ न हो, परन्तु वह और भी बड़ी घबराहट और जड़ता में गिर पड़े। क्योंकि मसीह साक्षी देता है कि जो दृष्टान्त उसने लोगों के बीच कहे थे उन्हें वह केवल अपने प्रेरितों को समझाता है, क्योंकि प्रेरितों को उसके राज्य के भेद जानने का अनुग्रह दिया गया था, पर औरों को नहीं (मत्ती 13:10–11)।
जब प्रभु उन्हें शिक्षा देता है जिनसे वह इस बात का ध्यान रखता है कि वे समझे न जाएँ, तो उसका अभिप्राय क्या है? देखो कि दोष कहाँ है, तो प्रश्न समाप्त हो जाएगा। क्योंकि शिक्षा में चाहे जितना अँधेरा हो, दुष्टों के विवेक को दोषी ठहराने के लिए सदा पर्याप्त प्रकाश रहता है।
फिर भी यह पूछना शेष रहता है कि प्रभु ऐसा क्यों करता है, क्योंकि यह निश्चित है कि वह ऐसा करता है। यदि उत्तर दिया जाए कि वह ऐसा इसलिए करता है कि मनुष्यों ने अपनी हठ और कृतघ्नता से उसे कमाया है, तो उत्तर सच्चा और उचित होगा। परन्तु क्योंकि इस भिन्नता का कारण प्रकट नहीं होता—कि वह कुछ को आज्ञाकारिता की ओर क्यों झुकाता है और औरों को कठोरता में क्यों बने रहने देता है—इस बात को ठीक रीति से सुलझाने के लिए हमें उस पर आना चाहिए जो सन्त पौलुस मूसा की साक्षी से निकालता है:
“मैंने तुझे इसी लिए खड़ा किया है कि तुझ में अपनी सामर्थ्य दिखाऊँ, और मेरा नाम सारी पृथ्वी पर प्रसिद्ध हो।”
इसलिए जब त्यागे हुए लोग, परमेश्वर का राज्य उनके लिए खुला होने पर भी, आज्ञा नहीं मानते, तो इसे ठीक ही उनकी अपनी हठ और दुष्टता का परिणाम ठहराना चाहिए, बशर्ते हम यह जोड़ें कि वे इस हठ के दास इसलिए बनाए गए कि परमेश्वर के धर्ममय परन्तु अगम्य न्याय से वे उनके दण्ड में उसकी महिमा प्रकट करने के लिए खड़े किए गए थे।
इस प्रकार जब एली के पुत्रों के विषय में कहा गया है कि उन्होंने अपने पिता की उद्धार देनेवाली चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि प्रभु उन्हें नाश करना चाहता था, तो इसका यह अर्थ नहीं कि उनका हठ उनकी अपनी दुष्टता से उत्पन्न नहीं हुआ। यह इसकी भी व्याख्या करता है कि वे उस हठ में क्यों छोड़ दिए गए, जबकि परमेश्वर उनके मन नरम कर सकता था: अर्थात् इसलिए कि परमेश्वर की अटल आज्ञा ने उन्हें एक बार और सदा के लिए विनाश के लिए ठहरा दिया था (1 शमूएल 2:25)।
जब दुष्ट यह सुनते हैं, तो शिकायत करते हैं कि परमेश्वर अपने बेचारे प्राणियों के साथ दुर्व्यवहार करता है, और निरंकुश सामर्थ्य के प्रयोग से उन्हें निर्दयता से खिलौना बनाता है। परन्तु हम, जो जानते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने इतने प्रकार से दोषी हैं कि यदि वह उनसे हज़ार बातें पूछे तो वे एक का भी उत्तर नहीं दे सकते, यह मानते हैं कि त्यागे हुए लोग कुछ ऐसा नहीं सहते जो उसके धर्ममय न्याय के अनुसार न हो। क्योंकि हम उसका कारण नहीं समझते, हमें इसे धीरज से सहना चाहिए और वहाँ अनजान बने रहने से इनकार नहीं करना चाहिए जहाँ परमेश्वर की बुद्धि हमारी पहुँच से ऊपर उठ जाती है।
परन्तु पवित्रशास्त्र के कुछ स्थान हमारे विरुद्ध प्रस्तुत किए जाते हैं जिनमें प्रभु यह अस्वीकार करता प्रतीत होता है कि दुष्ट उसकी आज्ञा से नाश होते हैं, मानो उन्होंने उसका विरोध करके अपने लिए मृत्यु कमाई हो। हमें इन स्थानों की संक्षेप में व्याख्या करनी चाहिए ताकि दिखा सकें कि वे किसी रीति से कही गई बातों के विरोध में नहीं हैं।
प्रेरित की ये घोषणाएँ प्रस्तुत की जाती हैं:
“परमेश्वर चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो और वे सत्य की पहचान तक पहुँचें।”
फिर:
“उसने सब को अनाज्ञाकारिता में बन्द कर दिया, ताकि वह सब पर दया करे।”
इसी प्रकार प्रभु अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा घोषणा करता है:
“मैं पापी की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता, परन्तु इससे कि वह फिरकर जीवित रहे।”
सन्त पौलुस का पहला वचन यहाँ अनुचित रीति से लागू किया जाता है, क्योंकि उसके तर्क का क्रम आसानी से दिखाता है कि वह हर एक मनुष्य के विषय में नहीं, परन्तु सब वर्गों और दशाओं के मनुष्यों के विषय में बोल रहा है। उसने तीमुथियुस को राजाओं और शासकों के लिए गम्भीर प्रार्थनाएँ करने की आज्ञा दी थी। क्योंकि मनुष्यों के ऐसे वर्ग के लिए, जो लगभग निराशाजनक माना जाता था, परमेश्वर से प्रार्थना करना कुछ अटपटा प्रतीत हो सकता था—क्योंकि वे विश्वासियों की सहभागिता से बाहर ही नहीं थे परन्तु अपनी पूरी शक्ति से मसीह के राज्य को दबाने का यत्न कर रहे थे—इसलिए वह जोड़ता है कि यह उस परमेश्वर को भाता है जो चाहता है कि सब मनुष्यों का उद्धार हो।
इससे उसका अभिप्राय इसके सिवा और कुछ नहीं कि परमेश्वर ने मनुष्यों के किसी वर्ग को उद्धार के मार्ग से रोका नहीं, परन्तु अपनी दया को इस प्रकार फैलाया है कि वह चाहता है कि सब वर्ग उसमें सहभागी हों।
अन्य साक्षियाँ यह नहीं घोषित करतीं कि प्रभु ने अपने गुप्त न्याय में क्या ठहराया है, परन्तु केवल यह बताती हैं कि क्षमा उन सब पापियों के लिए तैयार है जो उसे सच्चे पश्चाताप में खोजते हैं। यदि कोई इस कथन में कि परमेश्वर सब पर दया करना चाहता है, सब शब्द पर अड़ा रहे, तो मैं अन्यत्र पाई जानेवाली घोषणा से उत्तर दूँगा:
“हमारा परमेश्वर स्वर्ग में है, और जो कुछ उसे भाता है वही वह करता है।”
इसलिए पहले कथन की व्याख्या इस दूसरी घोषणा के अनुकूल करनी चाहिए:
“मैं जिस पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस पर तरस खाना चाहूँ उस पर तरस खाऊँगा।”
क्योंकि वह उन्हें चुनता है जिन पर दया करेगा, इसलिए वह सब पर दया नहीं करता।
परन्तु कोई मुझसे कहेगा कि यदि ऐसा है, तो सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं में बहुत कम निश्चयता होगी, क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा के विषय में साक्षी देती हैं, पर वे यह घोषणा करतीं कि वह उसके विपरीत कुछ चाहता है जो उसने गुप्त रूप से ठहराया है। मैं उत्तर देता हूँ कि यह परिणाम नहीं निकलता। क्योंकि यद्यपि उद्धार की प्रतिज्ञाएँ सार्वभौमिक हैं, फिर भी वे त्यागे हुओं की पूर्वनियति के किसी रीति से विरोध में नहीं हैं, बशर्ते हम उनकी पूर्ति पर विचार करें।
हम जानते हैं कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए तब प्रभावकारी होती हैं जब हम उन्हें विश्वास से ग्रहण करते हैं। इसके विपरीत, जब विश्वास नहीं होता, तो प्रतिज्ञाएँ निष्फल रहती हैं। यदि उनका स्वभाव यही है, तो अब विचार करें कि क्या वे परमेश्वर की पूर्वनियति के विरोध में हैं। कहा जाता है कि परमेश्वर ने आदि से ठहराया कि वह किसे अनुग्रह में ग्रहण करेगा और किसे त्याग देगा, और फिर भी वह सब को बिना भेद के उद्धार की प्रतिज्ञा करता है। मैं कहता हूँ कि ये बातें पूरी तरह मेल खाती हैं। क्योंकि इस रीति से उद्धार की प्रतिज्ञा करके प्रभु का केवल यही अभिप्राय है कि उसकी दया उन सब को दी जाती है जो उसे खोजते हैं।
फिर भी कोई उसे नहीं खोजता सिवाय उनके जिन्हें उसने प्रकाशित किया है, और वह उन्हें प्रकाशित करता है जिन्हें उसने उद्धार के लिए पहले से ठहराया है। ये प्रतिज्ञाओं की सच्चाई को पक्की और निश्चित पाते हैं, ताकि परमेश्वर के अनन्त चुनाव और विश्वासियों को अपने अनुग्रह की साक्षी देने के बीच कोई विरोध नहीं बताया जा सकता।
तो वह सब मनुष्यों की बात क्यों करता है? इसलिए कि खरे विवेक अधिक निश्चिन्तता से विश्राम करें, यह देखकर कि जब विश्वास हो तो पापियों में कोई भेद नहीं; और दूसरी ओर, इसलिए कि दुष्ट यह दावा न करें कि उनकी दुर्दशा से बचने का उनके पास कोई शरण नहीं, क्योंकि अपनी कृतघ्नता से वे उस शरण को ठुकरा देते हैं जो उन्हें दी गई है।
इसलिए, क्योंकि परमेश्वर की दया सुसमाचार के द्वारा दोनों के सामने रखी जाती है, विश्वास—अर्थात् परमेश्वर का प्रकाशन—ही है जो विश्वासियों और अविश्वासियों में भेद करता है, ताकि पहले सुसमाचार की प्रभावकारिता का अनुभव करें जबकि दूसरों को उससे कोई लाभ न मिले। और यह प्रकाशन परमेश्वर के अनन्त चुनाव से संचालित होता है।
अब हमें परमेश्वर के विधान की चर्चा करनी चाहिए, जो इस सारे संसार के संचालन तक फैला है। यद्यपि वह, ठीक रीति से समझे जाने पर, विश्वास को दृढ़ करने में अद्भुत योगदान देता है, बहुत थोड़े ही उसे ठीक से समझते या उस पर मनन करते हैं।
अधिकांश लोग इस विषय में परमेश्वर के नंगे पूर्वज्ञान से अधिक कुछ नहीं सोचते, यह कभी विचार नहीं करते कि सब कुछ उसकी इच्छा और आज्ञा से संचालित होता है। अन्य लोग उसे कुछ संचालन का श्रेय देते तो हैं, परन्तु केवल एक अस्पष्ट और सामान्य संचालन का—अर्थात् यह कि सारे संसार का ढाँचा, अपने सब अंगों समेत, उसी से थमा और चलाया जाता है। परन्तु वे यह नहीं मानेंगे कि वह हर एक प्राणी के कार्यों को निर्देशित करता है।
वे इसे सार्वभौमिक विधान कहते हैं, जो, उनके अनुसार, प्राणियों को संयोग से इधर-उधर बहने से नहीं रोकता, और न मनुष्य को अपनी स्वतंत्र इच्छा से जिधर चाहे उधर मुड़ने से। क्योंकि वे कार्य को परमेश्वर और मनुष्य के बीच इस प्रकार बाँटते हैं कि मानते हैं कि परमेश्वर केवल अपनी सामर्थ्य से मनुष्य में चलने की शक्ति फूँक देता है, ताकि वह वह सब करे जो उसका स्वभाव करने दे, जबकि मनुष्य अपने कार्यों का संचालन अपनी ही युक्ति से करता है।
संक्षेप में, साधारण मत यह है कि संसार, मानवीय बातें और स्वयं मनुष्य परमेश्वर की सामर्थ्य से संचालित होते हैं, परन्तु ऐसे विचारपूर्ण विधान से नहीं जिसमें वह ठहराता है कि क्या-क्या किया जाना है।
मैं एपिक्यूरियों को छोड़ देता हूँ—जिनकी महामारी से संसार सदा भरा रहा है—जो एक निकम्मे परमेश्वर की कल्पना करते हैं जिसे किसी बात की चिन्ता नहीं। मैं उन्हें भी छोड़ देता हूँ जो कम मूर्ख नहीं, जिन्होंने परमेश्वर को केवल वायु के मध्य मण्डल के ऊपर की बातों का संचालन सौंपा है और उसके नीचे सब कुछ भाग्य के हाथ छोड़ दिया है। प्राणी स्वयं ऊँचे और स्पष्ट शब्दों में ऐसे पागलपन को दोषी ठहराते हैं।
जहाँ तक परमेश्वर के सार्वभौमिक विधान के विषय में उस मत का सम्बन्ध है जिसका मैंने वर्णन किया, उसे लगभग सब स्वीकार करते हैं। यद्यपि उसमें सच्चाई का कुछ आभास है, वह न सच्चा है न सहने योग्य। क्योंकि वह परमेश्वर को केवल अन्धी और अविचारित गति देता है, वह उससे वह छीन लेता है जो सबसे आवश्यक है: कि वह बुद्धि से हर एक वस्तु को उसके ठहराए हुए अन्त की ओर निर्देशित और व्यवस्थित करता है।
इस प्रकार वह परमेश्वर को संसार का शासक केवल नाम से बनाता है, वास्तव में नहीं, क्योंकि वह उसे निश्चित संचालन से वंचित करता है। क्योंकि शासन करना और क्या है सिवाय इसके कि इस प्रकार अध्यक्षता करे कि जो वस्तुएँ किसी के अधिकार में हैं वे क्रम और व्यवस्था से निर्देशित हों?
वास्तव में, पवित्रशास्त्र सर्वत्र परमेश्वर के विशेष विधान को इतने यत्न से दिखाता है कि आश्चर्य होता है कि किसी ने कभी उस पर सन्देह किया। प्रेरित कहता है:
“उसी में हम जीवित रहते, चलते-फिरते और अस्तित्व रखते हैं।”
मसीह भी साक्षी देता है:
“मेरा पिता अब तक कार्य करता है, और मैं भी कार्य करता हूँ।”
यद्यपि ये कथन सिद्ध करते हैं कि प्रभु अपने रचे हुए सब कार्यों में निरन्तर कार्य करता है, वे उन्हें केवल सार्वभौमिक विधान से जोड़ते हैं।
परन्तु इससे स्पष्ट साक्षियाँ हैं जिन्हें ऐसे बहानों से टाला नहीं जा सकता। भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह पुकारता है:
“हे यहोवा, मैं जान गया हूँ कि मनुष्य का मार्ग उसके अपने वश में नहीं है, और न मनुष्य के हाथ में है कि वह अपने कदमों को स्थिर करे।”
इसी प्रकार सुलैमान कहता है:
“मनुष्य के पग यहोवा की ओर से स्थिर होते हैं; तब मनुष्य अपना मार्ग कैसे समझ सकता है?”
अब वे कहें कि मनुष्य परमेश्वर से अपने स्वभाव की प्रवृत्ति के अनुसार चलाया जाता है, परन्तु वह उस गति को जिधर चाहे मोड़ देता है। यदि यह ठीक कहा गया होता, तो मनुष्य को अपने मार्गों पर अधिकार होता। शायद वे इसका खण्डन इस आधार पर करें कि वह परमेश्वर की सामर्थ्य के बिना कुछ नहीं कर सकता। परन्तु क्योंकि स्पष्ट है कि भविष्यद्वक्ता और सुलैमान परमेश्वर को केवल कार्य करने की सामर्थ्य ही नहीं, वरन् वह चयन और विधान भी सौंपना चाहते थे जिससे वह सब कुछ अपनी इच्छा के अनुसार करता है, वह उत्तर प्रश्न को हल नहीं करता।
वास्तव में, सुलैमान अन्यत्र उन मनुष्यों की उतावली को स्पष्ट रूप से डाँटता है जो परमेश्वर का ध्यान किए बिना अपनी योजनाएँ बनाते हैं, मानो वे उसके हाथ से निर्देशित नहीं हैं:
“मन की युक्तियाँ मनुष्य के वश में होती हैं, परन्तु जीभ का उत्तर यहोवा की ओर से होता है।”
यह सचमुच हास्यास्पद पागलपन है कि मनुष्य परमेश्वर के बिना वह करने की योजना बनाएँ जिसे वे अपने मुख से भी तब तक बोल नहीं सकते जब तक वह न चाहे।
इसके अतिरिक्त, यह और स्पष्टता से व्यक्त करने के लिए कि इस संसार में परमेश्वर की आज्ञा के बिना बिलकुल कुछ नहीं होता, पवित्रशास्त्र उन घटनाओं को भी, जो सबसे अधिक आकस्मिक प्रतीत होती हैं, स्पष्ट रूप से उसके अधीन करता है। क्योंकि इससे अधिक आकस्मिक हम किसे कहेंगे कि किसी वृक्ष की डाली एक राही पर गिरकर उसे मार डाले? फिर भी परमेश्वर बहुत भिन्न रीति से बोलता है, यह घोषित करके कि उसने मारे गए को उसके हाथ में कर दिया जिसके द्वारा वह मारा गया (निर्गमन 21:13)।
इसी प्रकार, पासे डालने को भाग्य की अनियमितता का श्रेय देने से कौन न चूकेगा? परन्तु प्रभु यह होने नहीं देता, क्योंकि वह दृढ़ता से कहता है कि निर्णय उसी का है:
“चिट्ठी गोद में डाली जाती है, परन्तु उसका सारा निर्णय यहोवा की ओर से होता है।”
वह केवल यह नहीं कहता कि चिट्ठियाँ पात्र में डाली और निकाली जाती हैं तो वह उसकी सामर्थ्य से है। वरन् वही परिणाम, जो आकस्मिक प्रतीत होता था—कि चिट्ठी इस ओर गिरे या उस ओर—वह अपने विधान को सौंपता है।
जो इस शिक्षा को घृणित बनाना चाहते हैं, वे इसकी निन्दा स्तोइकों के उस विरोधाभास के रूप में करते हैं कि सब कुछ अनिवार्यता से होता है। यही दोष सन्त अगस्तीन पर भी लगाया गया था। हमारे विषय में, यद्यपि हम शब्दों पर विवाद करना पसन्द नहीं करते, तथापि हम स्तोइकों द्वारा प्रयुक्त शब्द, अर्थात् भाग्य, को स्वीकार नहीं करते। हम उसे दो कारणों से अस्वीकार करते हैं: एक तो वह उस प्रकार के नए शब्दों में आता है जिनसे बचना सन्त पौलुस हमें सिखाता है, और दूसरे इसलिए कि हमारे शत्रु उस शब्द से घृणा के द्वारा परमेश्वर के सत्य को बदनाम करने का यत्न करते हैं।
जहाँ तक स्तोइकों की शिक्षा का सम्बन्ध है, वह झूठे और द्वेषपूर्ण ढंग से हम पर लगाई जाती है। क्योंकि हम स्तोइकों के समान सब वस्तुओं के निरन्तर सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाली प्रकृति में निहित किसी अनिवार्यता की कल्पना नहीं करते। वरन् हम परमेश्वर को सब वस्तुओं का स्वामी और शासक ठहराते हैं। हम कहते हैं कि आदि से उसने अपनी बुद्धि में ठहराया कि वह क्या करेगा, और अब वह अपनी सामर्थ्य से वह सब पूरा करता है जो उसने ठहराया है।
इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि न केवल आकाश, पृथ्वी और सब निर्जीव प्राणी उसके विधान से संचालित हैं, परन्तु मनुष्यों की युक्तियाँ और इच्छाएँ भी, ताकि वह उन्हें उस अन्त की ओर निर्देशित करे जो उसने ठहराया है।
कोई पूछेगा, “तब क्या? क्या कुछ भी संयोग या आकस्मिकता से नहीं होता?” मैं उत्तर देता हूँ कि बासिल महान ने बहुत अच्छा कहा जब उसने लिखा कि भाग्य और आकस्मिकता अन्यजातियों के शब्द हैं जिनका अर्थ किसी विश्वासी के हृदय में कभी प्रवेश नहीं करना चाहिए। क्योंकि यदि सब समृद्धि परमेश्वर की आशीष है और सब विपत्ति उसका श्राप, तो मनुष्यों पर जो कुछ बीतता है उसमें भाग्य के लिए कोई स्थान नहीं बचता।
फिर भी, क्योंकि हमारी निर्बलता परमेश्वर के विधान की ऊँचाई के नीचे डूब जाती है, मैं उसकी सहायता के लिए एक भेद प्रस्तुत करूँगा। इसलिए हम कहेंगे कि यद्यपि सब कुछ परमेश्वर की आज्ञा से होता है, तथापि वह हमारे सम्बन्ध में आकस्मिक है।
इसका यह अर्थ नहीं कि हम मानते हैं कि भाग्य मनुष्यों पर राज्य करता और उतावली से सब कुछ उलट-पलट कर देता है। ऐसी कल्पना मसीही हृदय से दूर रहनी चाहिए। वरन् इसलिए कि घटनाओं का क्रम, कारण, अन्त और अनिवार्यता अधिकतर परमेश्वर की युक्ति में छिपी रहती हैं और मानवीय बुद्धि की समझ में नहीं आतीं, इसलिए जिन बातों को हम निश्चित जानते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा से आती हैं, वे भी हमें आकस्मिक दिखाई देती हैं। क्योंकि अपने स्वभाव में देखे जाने पर या हमारे ज्ञान और समझ के अनुसार आँके जाने पर वे और कोई रूप नहीं दिखातीं।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कोई व्यापारी अच्छे और विश्वासयोग्य साथियों के साथ जंगल में प्रवेश करता है, मार्ग से भटक जाता है, और अपनी भूल से डाकुओं के हाथ पड़ता है जो उसका गला काट देते हैं। उसकी मृत्यु परमेश्वर को केवल पहले से दिखाई नहीं दी थी, वरन् उसकी इच्छा से ठहराई गई थी। क्योंकि पवित्रशास्त्र केवल यह नहीं कहता कि परमेश्वर ने पूर्वज्ञान से जाना कि हर एक का जीवन कितना लम्बा होगा, परन्तु यह कि उसने उसकी सीमाएँ ठहराईं और नियत कीं:
“मनुष्य के दिन नियत हैं, और उसके महीनों की गिनती तेरे पास है; तूने उसकी सीमाएँ ठहराई हैं जिन्हें वह पार नहीं कर सकता।”
फिर भी, जहाँ तक हमारी समझ देख सकती है, ऐसी मृत्यु से जुड़ी हर बात आकस्मिक प्रतीत होती है। तब एक मसीही क्या सोचेगा? निश्चय वह उसे अपने बाहरी स्वभाव के अनुसार आकस्मिक समझेगा, फिर भी वह सन्देह नहीं करेगा कि परमेश्वर के विधान ने उस पर अध्यक्षता की और जो संयोग प्रतीत होता था उसे उसके ठहराए हुए अन्त की ओर निर्देशित किया।
यही सिद्धान्त भावी घटनाओं पर भी लागू होता है। क्योंकि सब आनेवाली बातें हमारे लिए अनिश्चित हैं, हम उन्हें अधर में रखते हैं, मानो वे इस रीति से या उस रीति से हो सकती हैं। फिर भी यह बात हमारे हृदयों में स्थिर रहती है: कुछ भी नहीं होगा जिसे परमेश्वर ने न ठहराया हो।
इसलिए परमेश्वर के विधान पर विचार करते समय हमें कुछ मूर्खों की अनेक कल्पनाओं में पड़ने से सावधान रहना चाहिए, जो इस रीति से उसकी बकवास करते हैं कि आकाश और पृथ्वी को गड्ढमड्ड कर देते हैं। वे यह तर्क करते हैं: यदि परमेश्वर ने हमारी मृत्यु का क्षण ठहराया है, तो हम उससे बच नहीं सकते; इसलिए अपनी रक्षा का हर प्रयत्न व्यर्थ है।
कुछ लोग यात्रा करने का साहस नहीं करेंगे जब सुनते हैं कि डाकुओं के हाथ मारे जाने का खतरा है। कुछ बीमारी में वैद्यों को बुलाते और औषधियाँ काम में लाते हैं। अन्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए भारी भोजन से परहेज़ करते हैं। अन्य उन घरों में रहने से डरते हैं जो गिरने के खतरे में हैं। साधारणतः हर कोई अपने उद्देश्य पूरे करने के साधन खोजता है। ये मूर्ख तर्क देते हैं कि या तो ये सब निकम्मे उपचार हैं जिनसे मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को सुधारने का यत्न करते हैं, या फिर सब कुछ उसकी इच्छा और आज्ञा से नहीं होता।
क्योंकि, वे कहते हैं, ये दो कथन परस्पर असंगत हैं: कि जीवन और मृत्यु, स्वास्थ्य और रोग, शान्ति और युद्ध, धन और निर्धनता परमेश्वर की ओर से हैं; और यह कि मनुष्य अपने परिश्रम से इन्हें टालते या पाते हैं, जैसा वे इनसे घृणा या इनकी इच्छा करते हैं।
इसके अतिरिक्त, वे कहते हैं कि विश्वासियों की प्रार्थनाएँ न केवल अनावश्यक हैं परन्तु विकृत भी, क्योंकि उनके द्वारा विश्वासी परमेश्वर से उन बातों का प्रबन्ध माँगते हैं जिन्हें उसने अनन्तकाल से पहले ही ठहरा दिया है। संक्षेप में, वे भावी बातों के विषय में सब सोच-विचार को परमेश्वर के विधान के विरुद्ध मानकर मिटा देते हैं, जिसने एक बार और सदा के लिए ठहरा दिया कि वह क्या होना चाहता है, हमें सलाह में बुलाए बिना।
इसके अतिरिक्त, वे जो कुछ होता है उस सब का श्रेय परमेश्वर के विधान को इस रीति से देते हैं कि उस मनुष्य का कोई ध्यान नहीं रखते जिसने वह कार्य किया। यदि कोई दुष्ट किसी भले मनुष्य की हत्या करता है, तो वे कहते हैं कि उसने परमेश्वर की युक्ति पूरी की। यदि कोई चोरी या व्यभिचार करता है, तो वे उसे परमेश्वर के विधान का सेवक कहते हैं क्योंकि उसने वही किया जो परमेश्वर ने पहले से देखा था। यदि कोई पुत्र अपने पिता को बिना सहायता दिए मरने देता है, तो वे कहते हैं कि वह परमेश्वर का विरोध नहीं कर सकता था, जिसने ऐसा ठहराया था। इस प्रकार वे हर पाप को पुण्य में बदल देते हैं क्योंकि वह परमेश्वर की आज्ञा की सेवा करता है।
जहाँ तक भावी घटनाओं का सम्बन्ध है, सुलैमान उनके विषय में मनुष्यों के सोच-विचार का परमेश्वर के विधान से मेल सरलता से बैठा देता है। क्योंकि जैसे वह उन लोगों के दुःसाहस का उपहास करता है जो परमेश्वर के बिना हर वह बात निडर होकर करने लगते हैं जो उनकी कल्पना में आती है, मानो वे उसके हाथ से संचालित नहीं हैं, वैसे ही अन्यत्र वह इस प्रकार कहता है:
“मनुष्य का मन अपने मार्ग पर विचार करता है, परन्तु यहोवा ही उसके पग को स्थिर करता है।”
इससे वह यह सूचित करता है कि परमेश्वर की अनन्त आज्ञा हमें उसकी भली इच्छा के अधीन अपने लिए प्रबन्ध करने और अपने कार्यों को व्यवस्थित करने से नहीं रोकती। कारण स्पष्ट है। क्योंकि जिसने हमारे जीवन की सीमाएँ ठहराई हैं, उसी ने उसकी देखभाल भी हमें सौंपी है, उसे बचाए रखने के साधन दिए हैं, हमें खतरों को पहले से देखने की योग्यता दी है ताकि वे हमें अचानक न पकड़ें, और उपचार जुटाए हैं जिनसे हम उनका सामना कर सकें।
