अध्याय 19

ट्रेंट की महासभा के नियमों का प्रतिकारक

Acts of the Council of Trent with the Antidote · John Calvin

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ट्रेंट की महासभा के नियमों का प्रतिकारक

नियम 1, 2 और 3 पर मैं कहता हूँ, आमीन।

नियम 4.

इसका उत्तर ऊपर दिया जा चुका है, जहाँ मैंने समझाया कि स्वतंत्र इच्छा किस प्रकार परमेश्वर की बुलाहट और प्रेरणा पर सहमति देती है। निश्चय ही हम अपनी इच्छा से परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, परन्तु यह उस इच्छा से है जिसे उसी ने हम में रचा है। इसलिए जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह से अलग स्वतंत्र इच्छा को कोई अपनी निज गति देते हैं, वे पवित्र आत्मा को फाड़ने के सिवाय और कुछ नहीं करते। पौलुस यह नहीं कहता कि हमें चाहने की क्षमता दी गई है, परन्तु यह कि स्वयं इच्छा ही हम में रची जाती है, (फिलिप्पियों 2:13,) अतः सही इच्छा की सहमति या आज्ञाकारिता परमेश्वर को छोड़ और किसी से नहीं आती। वह भीतर कार्य करता है, हमारे हृदयों को थामे रहता है, हमारे हृदयों को प्रेरित करता है, और उन झुकावों के द्वारा जो उसी ने हम में उत्पन्न किए हैं, हमें खींचता है। अगस्तीन यही कहता है। (Lib. de Corrupt. et Grat., c. 14.) लोहे के हृदय में कौन-सी तैयारी हो सकती है, जब तक कि एक अद्भुत परिवर्तन से वह मांस का हृदय बनने न लगे? यह, जैसा भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है, पूरी तरह परमेश्वर का ही कार्य है। मनुष्य की इच्छा, सच है, जब तक विपरीत बनी रहती है तब तक परमेश्वर से असहमत ही रहेगी, परन्तु जब वह आज्ञाकारिता के लिए ढाल दी गई हो, तो असहमत होने का खतरा जाता रहता है। और यह कि ईश्वरीय अनुग्रह का प्रभाव ऐसा है कि सारा विरोध कुचल दिया जाता है, और हम जो अनिच्छुक थे आज्ञाकारी बना दिए जाते हैं, इसमें सहमति देनेवाले हम नहीं, परन्तु प्रभु है, जो भविष्यद्वक्ता के द्वारा प्रतिज्ञा करता है कि वह हमें अपनी विधियों पर चलाएगा; और मसीह भी, जब वह कहता है, "जिस किसी ने पिता की सुनी है वह मेरे पास आता है।" (यूहन्ना 6:45।)

नियम 5.

हम शब्द पर झगड़ा खड़ा न करें। परन्तु स्वतंत्र इच्छा से वे जब किसी ऐसी चुनाव-क्षमता को समझते हैं जो दोनों में से किसी भी ओर पूर्णतः स्वतंत्र और निष्पक्ष हो, तो जो लोग कहते हैं कि यह वस्तु-रहित मात्र एक नाम का प्रयोग है, उनके पास मसीह का अधिकार है, जब वह कहता है कि जिन्हें पुत्र स्वतंत्र करता है वे ही स्वतंत्र हैं, और बाकी सब पाप के दास हैं। स्वतंत्रता और दासता निश्चय ही एक-दूसरे के विपरीत हैं। जहाँ तक इस शब्द का सम्बन्ध है, वे अगस्तीन की सुनें, जो दृढ़ता से कहता है कि मनुष्य की इच्छा तब तक स्वतंत्र नहीं जब तक वह उन वासनाओं के अधीन है जो उसे जीतती और दास बनाती हैं। (Epist. 144, ad Anastas.) एक अन्य स्थान पर वह कहता है, "जब इच्छा उस भ्रष्टता से जीत ली गई जिसमें वह गिर पड़ी, तो स्वभाव स्वतंत्रता से रहित है।" (Hom. 3, in Joann.) फिर, "मनुष्य ने स्वतंत्र इच्छा का दुरुपयोग करके अपने आपको और उसे भी खो दिया।" फिर, "जब मनुष्य सृजा गया तो उसने स्वतंत्र इच्छा की बड़ी शक्तियाँ पाईं, पर पाप करके उन्हें खो दिया। मूर्ख लोग यह नहीं सोचते कि स्वतंत्र इच्छा शब्द में स्वतंत्रता निहित है। परन्तु यदि वे पाप के दास हैं, तो स्वतंत्र इच्छा पर क्यों घमण्ड करते हैं? क्योंकि जिससे मनुष्य हार जाता है, उसी का वह दास बन जाता है।" वरन् एक और स्थान पर वह इस नाम का खुलकर उपहास करता है। वह कहता है, "इच्छा स्वतंत्र है, पर स्वतंत्र की हुई नहीं — धार्मिकता के लिए स्वतंत्र, पाप की दासी! तब वे अभागे मनुष्यों को उनकी दासता याद दिलाकर उन्हें इतना क्यों भड़काते हैं, यदि इसलिए नहीं कि वे छुड़ानेवाले की शरण में भागना सीखें?" (Aug. de Perfect. Justit. Lib. de Verb. Apost. Serm. 3; De Spiritu et Litera, c. 30; De Corrupt. et Grat., c. 13.)

नियम 6.

क्योंकि मुझे विरोधाभास से घृणा है, मैं इस कथन को सहर्ष अस्वीकार करता हूँ कि यहूदा का विश्वासघात उतना ही यथार्थ में परमेश्वर का कार्य है जितना पौलुस की बुलाहट। परन्तु वे किसी भी मनुष्य को कभी यह विश्वास नहीं दिला पाएँगे कि परमेश्वर दुष्टों में केवल अनुमति के रूप में कार्य करता है, सिवाय उसके जो पवित्रशास्त्र की सम्पूर्ण शिक्षा से अनजान हो। जब कहा जाता है कि अस्वीकृत लोग परमेश्वर का कार्य पूरा करने के लिए अलग किए गए हैं; कि फन्दे, तलवारें और कुल्हाड़ियाँ उसी की हैं जो उसके हाथ से चलाई जाती हैं; कि उसकी सीटी उन्हें उभारती है कि जो कुछ उसके हाथ और युक्ति ने ठहराया है उसे पूरा करें; कि मसीह यहूदियों के हाथ से परमेश्वर की ठहराई हुई युक्ति के अनुसार मारा गया, (यशायाह 10:5; यहेजकेल 17:20; 32:2; भजन संहिता 17:13; प्रेरितों के काम 2:4, 23) तो ये शब्द इतने सशक्त हैं कि अनुमति की आड़ लेकर इनसे बचा नहीं जा सकता। अगस्तीन इसकी व्याख्या बेहतर करता है। पवित्रशास्त्र के उन अंशों का हवाला देने के बाद जिनमें कहा गया है कि पिता ने पुत्र को सौंप दिया और मसीह ने अपने आपको सौंप दिया, वह तुरन्त जोड़ता है, "तो यहूदा ने पाप करने के सिवाय और क्या किया?" और उसे इसके लिए उचित रूप से दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता कि वह अन्यत्र कहता है कि "परमेश्वर मनुष्यों के हृदयों में कार्य करता है कि उनकी इच्छाओं को जैसा वह चाहे झुकाए, चाहे भलाई की ओर, अपनी दया से, चाहे बुराई की ओर, उनकी योग्यता के अनुसार, और वह भी अपने न्याय के द्वारा, जो कभी प्रकट, कभी गुप्त, पर सदा धर्ममय होता है;" क्योंकि वह तुरन्त यह सीमा भी जोड़ देता है कि "बुराई उसकी नहीं है।" (De Verb. Dom. Serm. 63.) इसी प्रकार उसने थोड़ा पहले कहा था, "वह दुष्टों को आज्ञा देकर आज्ञा नहीं देता, क्योंकि तब तो आज्ञाकारिता प्रशंसनीय होती, परन्तु अपने गुप्त और धर्ममय न्याय से वह उनकी इच्छा को, जो अपनी ही भ्रष्टता से पहले ही बुरी है, इस या उस कुकर्म की ओर मोड़ देता है।" (Aug. de Gr. et Lib. Arb. c. 21.) क्योंकि यहाँ ऐसा कुछ नहीं है जो पवित्रशास्त्र लगभग इन्हीं शब्दों में नहीं सिखाता, जब वह झुकाने और फेरने, कठोर करने और कार्य करने की बात कहता है।

नियम 7.

निश्चय ही बुरा वृक्ष बुरा ही फल ला सकता है। परन्तु कौन इतना निर्लज्ज होगा कि इनकार करे कि जब तक हम मसीह में कलम नहीं लगाए जाते तब तक हम बुरे वृक्ष हैं? इसलिए यदि मनुष्य में कोई अच्छा फल सराहा जाता है, तो उसकी जड़ विश्वास में ढूँढ़ी जाए, जैसा अगस्तीन चिताता है, (भजन संहिता 31 पर उपदेश 1 में।) वहाँ परमेश्वर बार-बार घोषणा करता है कि वह बाहरी रूप को नहीं देखता, परन्तु हृदय को देखता है। यह यिर्मयाह में स्पष्ट रूप से कहा गया है। (यिर्मयाह 5।) परन्तु उस हृदय की शुद्धता या खराई क्या हो सकती है जिसके विषय में पतरस हमें बताता है कि वह केवल विश्वास से शुद्ध किया जाता है? (प्रेरितों के काम 15:9।) इसलिए अगस्तीन बोनिफेस से बहुत सुन्दर रीति से कहता है, "हमारा धर्म धर्मी को अधर्मी से कर्मों की व्यवस्था से नहीं, परन्तु विश्वास की व्यवस्था से अलग करता है, जिसके बिना वे कर्म जो भले दिखते हैं पाप बन जाते हैं।" वह आगे जोड़ता है, "इसलिए अविश्वासी जो कुछ भी करते हैं उसमें पाप करते हैं, क्योंकि वे अपने कामों को किसी वैध उद्देश्य की ओर नहीं ले जाते।" (Lit. ad Bonif., Lib. 3, c. 5.) जूलियन के विरुद्ध अपनी पुस्तिका में वह इसी विषय पर विस्तार से लिखता है। इसलिए एक अन्य स्थान पर भी वह उनके मार्ग को भटकता हुआ मार्ग बताता है, क्योंकि वे जितने अधिक सक्रिय होते हैं उतना ही लक्ष्य से दूर खिंचते जाते हैं, और इसलिए उनकी दशा उतनी ही अधिक निराशाजनक हो जाती है। अन्त में वह निष्कर्ष निकालता है कि "मार्ग पर लँगड़ाते हुए चलना, मार्ग से बाहर दौड़ते रहने से उत्तम है।" (Praef. in भजन संहिता 31.) और हम इससे अधिक क्या चाहें? वे उस प्रेरित को अभिशापित करें, जो घोषणा करता है कि विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना अनहोना है! (इब्रानियों 11:6।) वे मसीह और पौलुस को अभिशापित करें, जो घोषणा करते हैं कि सब अविश्वासी मरे हुए हैं, और सुसमाचार के द्वारा मृत्यु से जिलाए जाते हैं! (यूहन्ना 5; इफिसियों 2:1।)

नियम 8.

मैं उत्तर देता हूँ: आमीन। और मैं नहीं समझता कि यह बात कभी किसी मनुष्य के मन में आई भी हो। क्योंकि जैसा उन्होंने वर्णन किया है, ऐसा होने पर वह सच्चे पश्चाताप को समाहित करता है और विश्वास से जुड़ा होता है। नरक के उस दासवत् भय के विषय में, जो कुछ हद तक अविश्वासियों को दुष्टता के मार्गों में इतने उग्र और अंधाधुंध वेग से टूट पड़ने से रोके रखता है, हमारे विचार अगस्तीन के समान हैं, जिसके शब्द ये हैं, (Ad. Anast. Ep. 144,) "परमेश्वर के सामने कौन मनुष्य निर्दोष पाया जाता है, जो यदि भय हटा लिया जाए तो वही करे जिसे परमेश्वर मना करता है? वह अपनी इच्छा में दोषी है, क्योंकि वह वह करना चाहता है जो वैध रीति से नहीं किया जा सकता। जहाँ तक उसका सम्बन्ध है, वह यही चाहेगा कि पाप को रोकने और दण्ड देनेवाला कोई न्याय न होता। और इसलिए यदि वह चाहता है कि न्याय न होता, तो कौन सन्देह कर सकता है कि यदि उसके वश में होता तो वह उसे हटा देता? फिर वह धर्मी कैसे हुआ जो धार्मिकता का ऐसा शत्रु है कि यदि उसे शक्ति दी जाती तो वह उसे आज्ञा देते समय हटा देता, और धमकी या न्याय करते समय सह न पाता? इसलिए वह धार्मिकता का शत्रु है जो पाप इसलिए नहीं करता कि उसे दण्ड का भय है। और वास्तव में जब सारी उन्नति यही हो कि पापी आतंक से रोका हुआ परमेश्वर के विरुद्ध बड़बड़ाता है, तो कौन इनकार कर सकता है कि ऐसी हठधर्मिता से वह अपना पाप और बढ़ाता है?"

नियम 9.

यह नियम नियमसंगत होने से बहुत दूर है; क्योंकि यह उन बातों को जोड़ता है जो परस्पर पूर्णतः विरोधी हैं। वे कल्पना करते हैं कि मनुष्य बिना अपनी इच्छा की किसी गति के विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है, मानो मनुष्य धार्मिकता के लिए मन से विश्वास नहीं करता। उनमें और हममें यह भेद है कि वे अपने आपको समझाते हैं कि वह गति मनुष्य से ही आती है, जबकि हम दृढ़ता से कहते हैं कि विश्वास स्वैच्छिक है, क्योंकि परमेश्वर हमारी इच्छाओं को अपनी ओर खींचता है। इसके अतिरिक्त, जब हम कहते हैं कि मनुष्य केवल विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है, तो हम प्रेम से रहित विश्वास की कल्पना नहीं करते, परन्तु हमारा अर्थ यह है कि धर्मी ठहराए जाने का कारण केवल विश्वास है।

नियम 10.

यदि ये अभिशाप प्रभावी हो सकते, तो वे सब जो कुतर्क की कला में निपुण नहीं हैं अपनी सरलता का भारी दाम चुकाते। पहले उन्होंने अपने आदेशों में यह दावा किया कि परमेश्वर की धार्मिकता ही धर्मी ठहराए जाने का एकमात्र औपचारिक कारण है; अब वे उन्हें अभिशापित करते हैं जो कहते हैं कि हम मसीह की आज्ञाकारिता के द्वारा औपचारिक रूप से धर्मी हैं। परन्तु यह किसी और अर्थ में है। मैं इसे देखता हूँ, या इसकी गन्ध पाता हूँ। परन्तु कितने हैं जो इस द्वयर्थकता से भ्रम में न पड़ेंगे? हो सकता है कि यह मत उन्होंने कहीं देखा हो और समझा न हो, और फिर भी निडर होकर उसकी निन्दा करते हों। क्योंकि जैसे यह कहना अधर्म होगा कि मसीह की धार्मिकता हमारे लिए केवल एक आदर्श या प्रतिरूप है, वैसे ही यदि कोई यह सिखाए कि हम औपचारिक रूप से धर्मी हैं, अर्थात् गुण से नहीं पर आरोपण से, और अर्थ यह हो कि हमारी धार्मिकता केवल सम्बन्ध में है, तो उसमें निन्दा के योग्य कुछ नहीं होगा। "औपचारिक रूप से" क्रिया-विशेषण दोनों अर्थों में प्रयुक्त होता है।

नियम 11.

मैं चाहता हूँ कि पाठक समझे कि इस प्रश्न में जब-जब हम केवल विश्वास का उल्लेख करते हैं, तब-तब हम किसी मृत विश्वास की बात नहीं सोचते, जो प्रेम के द्वारा कार्य नहीं करता, परन्तु विश्वास को ही धर्मी ठहराए जाने का एकमात्र कारण मानते हैं। (गलातियों 5:6; रोमियों 3:22।) इसलिए केवल विश्वास ही धर्मी ठहराता है, और फिर भी जो विश्वास धर्मी ठहराता है वह अकेला नहीं होता: जैसे पृथ्वी को गर्म करनेवाली केवल सूर्य की गर्मी ही है, और फिर भी सूर्य में वह अकेली नहीं है, क्योंकि वह निरन्तर प्रकाश से जुड़ी रहती है। इसलिए हम नया जन्म के सम्पूर्ण अनुग्रह को विश्वास से अलग नहीं करते, परन्तु जैसा उचित है, धर्मी ठहराने की शक्ति और सामर्थ्य पूरी तरह विश्वास के लिए ही मानते हैं। और फिर भी ट्रेंट के ये पिता हमें इतना अभिशापित नहीं करते जितना पौलुस को, जिसके हम इस परिभाषा के ऋणी हैं कि मनुष्य की धार्मिकता पापों की क्षमा में है। ये शब्द रोमियों के चौथे अध्याय में हैं, "दाऊद उस मनुष्य के धन्य होने की बात कहता है जिसके लिए परमेश्वर बिना कर्मों के धार्मिकता गिनता है, जब वह कहता है, धन्य वे हैं जिनके अधर्म क्षमा हुए।" (भजन संहिता 32:1) हम देखते हैं कि पौलुस की दृष्टि में धन्यता और धार्मिकता का अर्थ एक ही है। और वह दोनों को केवल पापों की क्षमा के सिवाय और कहाँ रखता है? उसका आशय वही है जो 2 कुरिन्थियों के पाँचवें अध्याय में है, "परमेश्वर मसीह में होकर जगत का अपने साथ मेल-मिलाप कर रहा था, और उनके अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाता था।" क्योंकि वह तुरन्त समझाता है कि वह मेल-मिलाप हम तक कैसे पहुँचता है: "हम मसीह की ओर से राजदूत हैं, मानो तुमसे विनती करते हैं। जो पाप से अज्ञात था, उसे उसने हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।" देखो, मसीह के बलिदान के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप पाकर हम उसमें धर्मी गिने भी जाते हैं और धर्मी हैं भी। परन्तु एक के बाद एक अंश क्यों उद्धृत करें, जबकि भविष्यद्वक्ता और प्रेरित सब यही शिक्षा एकरूपता से देते हैं?

यह देखना सार्थक है कि वे पवित्रशास्त्र को अपने प्रयोजन के अनुकूल कितनी चतुराई से ढालते हैं। वे कहते हैं कि उस प्रेम को बाहर नहीं रखना चाहिए जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में उण्डेला गया है। इस प्रकार वे एक अंश को दूसरे से बिगाड़ते हैं। प्रसंग दिखाता है कि पौलुस वहाँ हमारे अपने प्रेम की नहीं, परन्तु हमारे प्रति परमेश्वर के पैतृक प्रेम की बात करता है; क्योंकि वह इसे विपत्ति की सब परिस्थितियों में सान्त्वना की नींव के रूप में प्रस्तुत करता है, कि आत्मा हमारे प्रति ईश्वरीय कृपा का प्रमाण सुझाता है। इसके विपरीत यह सूअरों का झुण्ड इसे इस अर्थ में मरोड़ देता है कि हम आशा रखने में लज्जित नहीं होते क्योंकि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं। और जैसे ही वे ये शब्द मुँह से निकालते हैं, वैसे ही अड़ जाते हैं कि उन्हें आकाशवाणी माना जाए! इसी प्रकार के विकृत भाव से वे धर्मी ठहरानेवाले अनुग्रह को एक आदत बना देते हैं, और इनकार करते हैं कि वह परमेश्वर की सेंत-मेंत की कृपा से आता है। पवित्रशास्त्र के वचन उनके विरुद्ध दिन के समान स्पष्ट हैं। क्योंकि जब पौलुस कहता है कि विश्वासियों के लिए प्रतिफल कर्ज के रूप में नहीं, परन्तु अनुग्रह से गिना जाता है; और फिर यह कि मीरास विश्वास से है कि वह अनुग्रह से हो, (रोमियों 4:4,) तो उसकी व्याख्या करते हुए सेंत-मेंत की कृपा के सिवाय उसे कोई और अर्थ देना कैसे सम्भव है? अनुग्रह के संकल्प से और क्या अभिप्राय है? सबसे प्रभावशाली अंशों में से एक इफिसियों का पहला अध्याय है, जहाँ वह शब्द-दर-शब्द आगे बढ़ते हुए हमें बताता है कि पिता ने हमें पुत्र में अपने लिए ग्रहणयोग्य बनाया है।

नियम 12.

आदरणीय पिता यह स्वीकार नहीं करेंगे कि धर्मी ठहरानेवाले विश्वास की परिभाषा उस भरोसे के रूप में की जाए जिससे हम परमेश्वर की उस दया को ग्रहण करते हैं जो मसीह के कारण पाप क्षमा करती है। परन्तु पवित्र आत्मा को यही अच्छा लगा, जो पौलुस के मुख से यों कहता है, "उसके अनुग्रह से, उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं, जिसे परमेश्वर ने उसके लहू के कारण विश्वास के द्वारा प्रायश्चित ठहराया, कि पिछले किए हुए पापों की क्षमा के लिए हो।" (रोमियों 3:24।) और जो कुछ वह आगे कहता है, अर्थात् यह कि "विश्वास से धर्मी ठहरकर हमें परमेश्वर के साथ मेल है," उसकी भी कोई भिन्न व्याख्या करना सम्भव नहीं। (रोमियों 5:1।) और कैसे, सिवाय इसके कि हमारे विवेक तब तक कभी चैन नहीं पाते जब तक वे परमेश्वर की दया में विश्राम न करें? इसे वह तुरन्त बाद स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है, जब वह कारण जोड़ता है कि परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में उण्डेला गया है, जो हमारे सेंत-मेंत के लेपालकपन का गवाह है, और केवल गवाह ही नहीं, वरन् बयाना और मुहर भी। फिर, "हमें उसमें विश्वास के द्वारा हियाव और भरोसे के साथ पहुँच प्राप्त है।" इसी कारण वह व्यवस्था को नहीं, बल्कि सुसमाचार को "विश्वास की शिक्षा" कहता है। इसके अतिरिक्त वह घोषणा करता है कि सुसमाचार "मेल-मिलाप का सन्देश" है।

नियम 13.

परन्तु पौलुस का आशय यही है जब वह निष्कर्ष निकालता है कि यदि विश्वास व्यर्थ ठहराया जाए तो प्रतिज्ञा निरर्थक हो जाती है। (रोमियों 4:14।) उस शब्द का भी यही अर्थ है जिसे पौलुस कभी-कभी प्रयोग करता है। इसलिए वह हमारे मन की आँखों को तब तक ठीक रीति से प्रकाशित नहीं मानता जब तक हम न जान लें कि हमारी मीरास की आशा क्या है। ऊपर के अंशों से यह भी पर्याप्त स्पष्ट है कि विश्वास तब तक सही नहीं जब तक हम शान्त मन से अपने आपको ईश्वरीय उपस्थिति में खड़ा करने का साहस न करें। क्योंकि, जैसा बर्नार्ड ने उत्कृष्ट रूप से कहा है, (Super Cantic. Sermon 16 c. 3, 10,) "यदि विवेक व्याकुल हो, तो वह सीमा से बढ़कर व्याकुल न होगा, क्योंकि उसे हमारे प्रभु के वचन स्मरण रहेंगे। उनमें निर्बल लोगों को दृढ़ विश्राम और सुरक्षा मिलती है।" जकर्याह के शब्द भी इसी आशय के हैं, "तब हर एक अपनी दाखलता और अपने अंजीर के वृक्ष के तले निश्चिन्त बैठेगा, जब देश का अधर्म क्षमा किया जा चुका होगा।"

नियम 14.

मुझे समझ नहीं आता कि वे एक ही बात की दो बार निन्दा क्यों करते हैं, सिवाय इसके कि उन्हें डर था कि उनका पहला वज्र बिना चोट किए गिर गया! परन्तु वे सौ बार भी गरजें, तो परमेश्वर के इस स्पष्ट सत्य के विरुद्ध ज़रा भी सफल न होंगे। मसीह कहता है, "हे पुत्र, ढाढ़स बाँध, तेरे पाप क्षमा हुए।" इस वचन से ये सींगवाले पिता घृणा करते हैं, जब भी कोई सिखाता है कि दोषमुक्ति केवल विश्वास से पूरी होती है। फिर भी भक्त पाठक को स्मरण रहे कि हम पश्चाताप को, जो नितान्त आवश्यक है, बाहर नहीं रखते, परन्तु केवल विश्वास का उल्लेख तब करते हैं जब प्रश्न दोषमुक्ति के कारण का हो। और हम ऐसा उचित ही करते हैं। क्योंकि कोई सचमुच परमेश्वर का भय मानना कैसे आरम्भ कर सकता है जब तक उसे विश्वास न हो कि परमेश्वर उस पर कृपालु है? और यह विश्वास दोषमुक्ति के भरोसे के सिवाय और कहाँ से आता है?

नियम 15.

यह सच है कि इस विषय में अत्यधिक बारीकी से कुरेदना हानिकारक है, और इसलिए त्याज्य है; परन्तु पूर्वनियति का वह ज्ञान जिसकी पौलुस सिफ़ारिश करता है, न नेपच्यून के कठोर त्रिशूल से डरता है, न ऐओलस की सब आँधियों से, न साइक्लोप्स की गर्जनाओं से, न तूफानों के किसी भी प्रकोप से। क्योंकि वह चाहता है कि इफिसियों को यह मालूम और निश्चित हो कि वे मसीह में स्वर्गीय अनुग्रह के सहभागी बनाए गए हैं, जैसे कि वे जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुने गए थे। (इफिसियों 1:4।) इसलिए सब विश्वासियों को अपने चुनाव का निश्चय रखना शोभा देता है, ताकि वे उसे मसीह में दर्पण के समान देखना सीखें। और यह भी व्यर्थ नहीं कि मसीह अपने अनुयायियों को इस सान्त्वनादायक विचार से उत्साहित करता है कि जिन्हें पिता ने उसे दिया है उनमें से एक भी नाश न होगा। (यूहन्ना 6:39।) हे भले महाशयो, हमारी पूर्वनियति का निश्चित ज्ञान उस लेपालकपन की गवाही के सिवाय और क्या है जिसे पवित्रशास्त्र सब भक्तों के लिए समान ठहराता है?

नियम 16.

ताकि मुझे बार-बार एक ही बात दोहराने को विवश न होना पड़े, जिसकी वे यहाँ निन्दा करते हैं वह उसके सिवाय और कुछ नहीं जो मैं पहले दिखा चुका हूँ कि पवित्र आत्मा के उन्हीं आकाशवचनों द्वारा सिखाया गया है।

नियम 17.

लूका के शब्द ये हैं, "जितने अनन्त जीवन के लिए ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया।" (प्रेरितों के काम 13:48।) वह संकेत देता है कि एक ही श्रोता-समूह में ऐसा भेद क्यों था कि कुछ ने विश्वास किया और दूसरे अपनी हठ पर अड़े रहे। इसी प्रकार पौलुस घोषणा करता है कि वे ही बुलाए जाते हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से चुन लिया है। (रोमियों 8:29।) क्या अस्वीकृत लोग भी नहीं बुलाए जाते? प्रभावी रूप से नहीं। क्योंकि परमेश्वर की बुलाहट में यह भेद है कि वह अपने वचन के द्वारा सब को बिना भेदभाव के न्योता देता है, जबकि भीतर से केवल चुने हुओं को बुलाता है, जैसा मसीह कहता है, "जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा।" (यूहन्ना 6:37।) संक्षेप में, यदि कोई यह नहीं जानता कि नया जन्म की आत्मा नया जन्म पानेवालों को छोड़ किसी को नहीं दी जाती, तो मैं नहीं जानता कि वह पवित्रशास्त्र का कौन-सा भाग मानता है।

नियम 18.

यदि नया जन्म इसी जीवन में सिद्ध हो जाता तो व्यवस्था का पालन सम्भव होता। परन्तु जब विश्वासी, जब तक यहाँ जीवित हैं, लक्ष्य को केवल दूर से देखते हैं और बड़ी कठिनाई से उसकी ओर हाँफते हुए बढ़ते रहते हैं, तो आज्ञाकारिता की वह सिद्धता, जिसके स्वप्न वे लोग देखते हैं, कहाँ मिलेगी? परन्तु इसमें आश्चर्य नहीं कि वे उन बातों पर इतने साहस से बकवास करते हैं जिन्हें वे जानते नहीं। युद्ध उन्हें प्रिय लगता है जिन्होंने उसे कभी आज़माया नहीं।

नियम 19.

आमीन।

नियम 20.

जबकि कोई भी समझदार मनुष्य विश्वासियों के कन्धों से परमेश्वर का जूआ नहीं उतारेगा, मानो उन्हें उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं करना है, फिर भी यह समझना चाहिए कि उद्धार की निश्चयता किसी भी प्रकार उनके पालन पर निर्भर नहीं करती। क्योंकि पौलुस के शब्द सदा सत्य ठहरते हैं कि व्यवस्था और सुसमाचार में यही भेद है कि सुसमाचार, व्यवस्था की नाईं, कर्मों की शर्त पर जीवन की प्रतिज्ञा नहीं करता, परन्तु विश्वास से करता है। इस प्रतिपक्ष से अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है — "व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यह लिखा है, कि जो मनुष्य इन बातों को करेगा वह उनके कारण जीवित रहेगा। परन्तु जो धार्मिकता विश्वास से है, वह यों कहती है, जो कोई विश्वास करे," आदि। (रोमियों 10:5।) यही आशय इस दूसरे अंश का भी है, "यदि मीरास व्यवस्था से है, तो विश्वास व्यर्थ ठहरा और प्रतिज्ञा निरर्थक हुई। इसलिए वह विश्वास से मिलती है, कि अनुग्रह के रूप में हो, ताकि प्रतिज्ञा हर एक विश्वास करनेवाले के लिए पक्की रहे।" (रोमियों 4:14।) जहाँ तक कलीसियाई व्यवस्थाओं का प्रश्न है, उन्हें वे स्वयं देखें: हम एक ही व्यवस्थापक को मानते हैं, जिसका काम जीवन का नियम देना है, क्योंकि हमारा जीवन उसी से है।

नियम 21.

कोई ऐसा नहीं कहता। इसलिए पिता अपनी ही गढ़ी हुई कल्पनाओं को अभिशापित कर रहे हैं, सिवाय इसके कि शायद वे इससे नाराज़ हों कि हम इनकार करते हैं कि मसीह ने व्यवस्थापक के रूप में जगत को नई व्यवस्थाएँ दीं। कि उसने ऐसा किया, यह उन्होंने मूर्खता से कल्पना कर ली। न मूसा ने व्यर्थ गवाही दी कि जो व्यवस्था वह लाया वह जीवन और मृत्यु का मार्ग है, (व्यवस्थाविवरण 30:19;) और फिर, "मार्ग यही है, इसी पर चलो;" न भविष्यद्वक्ता और प्रेरित व्यर्थ हमें व्यवस्था की ओर लौटाते हैं, जब भी वे धार्मिकता की सच्ची और सम्पूर्ण सिद्धता की चर्चा करते हैं; न मसीह ने फरीसी को व्यर्थ उत्तर दिया, "यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को मान।" (मत्ती 19:17; लूका 18:20।) इसलिए जब पौलुस व्यवस्था पर दुर्बलता का आरोप लगाता है, तो वह दोष उसकी शिक्षा में नहीं रखता, मानो वह जीवन नहीं दे सकती, परन्तु हमारे शरीर में रखता है। (रोमियों 7:8।)

नियम 22.

आमीन।

नियम 23.

हम उन्हें दोषी ठहराते हैं जो कहते हैं कि एक बार धर्मी ठहराया गया मनुष्य पाप नहीं कर सकता, और उन्हें भी जो इनकार करते हैं कि सचमुच धर्मी ठहराए हुए लोग कभी गिरते हैं; उन्हें भी जो दावा करते हैं कि परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाया हुआ मनुष्य छोटे से छोटे पापों से भी बचा रह सकता है। ये उन उन्मादियों के बहके हुए स्वप्न हैं जो या तो शैतानी अहंकार से धोखा देते हैं, या कपट से मनुष्यों के मन को मोह लेते हैं, या उन्हें निराशा के गड्ढे की ओर ले जाने का षड्यन्त्र रचते हैं। रही कुँवारी मरियम के विशेष विशेषाधिकार की बात, जब वे स्वर्गीय अधिकार-पत्र प्रस्तुत करेंगे तब हम उनकी बात पर विश्वास करेंगे: क्योंकि यहाँ वे "कलीसिया" का नाम किसे देते हैं, सिवाय क्लेरमॉन्ट की महासभा के? अगस्तीन निश्चय ही कलीसिया का सदस्य था, और यद्यपि एक स्थान पर निन्दा से बचने के लिए वह धन्य कुँवारी के विषय में चुप रहना ही चुनता है, फिर भी वह एकरूपता से, उसे अपवाद बनाए बिना, आदम की सारी जाति को पाप में फँसा हुआ बताता है। वरन् वह लगभग स्पष्ट शब्दों में उसे पापियों में गिन लेता है, जब मार्सेलिनस को लिखते हुए वह कहता है, वे बहुत भूल करते हैं जो मानते हैं कि मसीह को छोड़ पवित्र लोगों में से किसी को भी यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं, "हमारे अपराध क्षमा कर।" ऐसा करके वे उन पवित्र लोगों को, जिनकी वे स्तुति करते हैं, किसी प्रकार प्रसन्न नहीं करते। क्रिसोस्तम और अम्ब्रोस, जो उसके विषय में सन्देह करते हैं कि वह महत्त्वाकांक्षा की परीक्षा में पड़ी थी, कलीसिया के सदस्य थे। ये सब बातें मैं और किसी उद्देश्य से नहीं, केवल इसलिए कहता हूँ कि मेरे पाठक समझ लें कि कोई कल्पना इतनी निकम्मी नहीं कि इन मूर्खों द्वारा विश्वास के अनुच्छेदों में न गिन ली जाए।

नियम 24.

हम इनकार नहीं करते कि परमेश्वर भक्तों के भले कर्मों को प्रतिफल देता है, और पहले अनुग्रह पर नया और अधिक अनुग्रह जोड़ता है। परन्तु जो कोई यह दावा करता है कि कर्मों का प्रभाव धर्मी ठहराए जाने को बढ़ाना है, वह न यह समझता है कि धर्मी ठहराए जाने का अर्थ क्या है, न उसका कारण। कि हम तब धर्मी गिने जाते हैं जब परमेश्वर हमें ग्रहण करता है, यह पहले ही सिद्ध किया जा चुका है। कर्म भी जो कुछ अनुग्रह रखते थे, इसी ग्रहण किए जाने से पाते हैं।

नियम 25.

सुलैमान ठीक कहता है कि "मनुष्य का सारा चालचलन अपनी दृष्टि में तो ठीक होता है, परन्तु यहोवा मन को जाँचता है।" (नीतिवचन 16:2।) क्योंकि ट्रेंट के सींगवाले लोग यह कोसना क्यों उगलते हैं, सिवाय इसके कि वे वस्तुओं को परमेश्वर के बाटों से नहीं, अपनी ही राय के झूठे तराजू से तौलते हैं? परमेश्वर के न्याय में कुछ भी खरा और भला नहीं, सिवाय उसके जो उसके प्रति सिद्ध प्रेम से निकलता है। यदि मनुष्य का हृदय इस जीवन में कभी इतना सुधारा नहीं जाता कि वह अनेक दोषों से मुक्त हो, और विविध वासनाओं से विचलित न हो, और संसारी लुभावनों से प्रायः धोखा न खाए, तो कर्मों के साथ कुछ न कुछ कलंक अनिवार्य रूप से लगा रहेगा। इसलिए कोई ऐसा कर्म नहीं जो पाप न हो, जब तक कि सेंत-मेंत के मूल्यांकन के कारण उसका मूल्य न बन जाए।

नियम 26.

ऐसा साहस उन मनुष्यों में आश्चर्यजनक नहीं जिन्होंने ईश्वरीय न्याय का कभी कोई गम्भीर भय नहीं माना। वे चाहें तो अपने भले कर्मों के कारण अनन्त जीवन की आशा रखें; हम तो पौलुस के अधिकार पर उसकी आशा परमेश्वर के अनुग्रह से रखें। परन्तु कहा जा सकता है कि अनुग्रह की बात इस प्रकार करके वे उसे उलटते नहीं। यद्यपि वे अनुग्रह का नाम कुछ हद तक रहने देते हैं, फिर भी जब तक विवेक उद्धार का कारण खोजते हुए कर्मों की ओर देखते हैं, उन पर हाय! यदि वे थरथराते हुए डगमगाएँ, तो वे विश्वास की निश्चयता से गिर गए: और फिर हाय, यदि वे अपने लिए किसी निश्चयता की प्रतिज्ञा करने का साहस करें, क्योंकि वे शैतानी दुस्साहस से फूले हुए हैं! इसलिए पौलुस का यह कथन अटल रहे — कि "मीरास व्यवस्था से नहीं, परन्तु विश्वास से है, कि अनुग्रह के अनुसार प्रतिज्ञा हर एक विश्वास करनेवाले के लिए पक्की हो।" (रोमियों 4:14।)

नियम 27.

जैसे हम मानते और अनुभव करते हैं कि हर पाप, क्योंकि वह परमेश्वर की व्यवस्था से दोषी ठहराया गया है, मृत्युदायक है, वैसे ही पवित्र आत्मा सिखाता है कि सब पाप अविश्वास से, या कम से कम विश्वास की कमी से निकलते हैं। अनन्त मृत्यु निश्चय ही वह श्राप है जो परमेश्वर व्यभिचारियों, चोरों और झूठे गवाहों के विरुद्ध घोषित करता है; परन्तु जहाँ कहीं विश्वास राज्य करता है वहाँ वह सब पाप को निकाल देता है, और इस प्रकार ईश्वरीय क्रोध को उसी रीति से टाल देता है जैसे ईंधन हटाकर आग बुझाई जाती है।

नियम 28.

मैं इनकार नहीं करता कि अत्यन्त भारी पतनों के समय भी विश्वास का कुछ बीज बना रहता है, चाहे दबी हुई दशा में। चाहे वह कितना ही छोटा हो, मैं मानता हूँ कि उसमें सच्चे विश्वास का स्वभाव है: मैं जोड़ता हूँ, जीवित विश्वास का, क्योंकि अन्यथा उससे कोई फल नहीं आ सकता। परन्तु क्योंकि वह कुछ समय तक प्रकट नहीं होता, न सामान्य चिह्नों से अपने आपको दिखाता है, इसलिए हमारी इन्द्रियों की दृष्टि में वह मानो मरा हुआ है। परन्तु इस प्रकार की कोई बात पिताओं या उनके तानाशाह भिक्षुओं के मन में नहीं आई। वे केवल अपना यह निरर्थक सिद्धान्त स्थापित करना चाहते थे कि विश्वास अनौपचारिक भी होता है और औपचारिक भी। इसलिए वे उस विश्वास को सच्चा ठहराते हैं जो स्पष्टतः मृत है; मानो विश्वास प्राण का जीवन हो सकता है, (जैसा अगस्तीन ने, पवित्रशास्त्र की एकरूप शिक्षा के अनुसार, उसे सुन्दरता से कहा है,) और फिर भी स्वयं जीवित न हो। इसी आशय से वे दावा करते हैं कि मनुष्य मसीही हैं चाहे उनमें प्रेम न हो, और जो अन्यथा सोचते हैं उन्हें अभिशापित करते हैं; दूसरे शब्दों में, उनके अनुसार, यदि हम मसीही धर्म के झूठे अंगीकार का उपहास करें और उसे तुच्छ जानें तो हम पवित्र आत्मा को अभिशापित करते हैं। पौलुस ने उन्हें इस्राएली नहीं ठहराया जो सचमुच अब्राहम की सन्तान नहीं थे। इसके अतिरिक्त वह सच्चे मसीही धर्म की परिभाषा "पुराने मनुष्यत्व को उतार डालने" में करता है; और वह घोषणा करता है कि परमेश्वर का इनकार वे करते हैं "जो भक्ति से नहीं जीते।"

नियम 29.

पहले अनुच्छेद को उसके रचयिता नोवेटस के साथ हम भी घृणित मानते हैं। दूसरे के विषय में, यदि गिरे हुए लोग केवल पश्चाताप के संस्कार के द्वारा ही अनुग्रह में बहाल हो सकते हैं, तो पतरस का क्या होगा, जिसे अपने भयानक पतन के बाद उस उपाय तक पहुँच ही नहीं थी जिसे वे परम आवश्यक बताते हैं? वरन् उन युगों के हज़ारों-लाखों का क्या होगा जो उस कान-में-पाप-स्वीकार के विषय में कुछ नहीं जानते थे, जिसे वे अब उद्धार का द्वार बताते हैं? मसीह और उसके प्रेरितों की शिक्षा पर उनका घमण्ड करना अत्यन्त ढिठाई है, क्योंकि उन्हीं के इतिहासकारों से स्पष्ट है कि चार सौ वर्ष तक पाप-स्वीकार के विषय में कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए यदि वे अपनी दुष्ट कल्पनाओं के लिए विश्वसनीयता चाहते हैं, तो उन्हें न केवल प्राचीन काल के सब स्मारकों को मिटाना पड़ेगा, वरन् मनुष्य जाति को सारी समझ और विवेक से भी वंचित करना पड़ेगा!

नियम 30.

वे समझते हैं कि दोष क्षमा हो जाने के बाद भी दण्ड का दायित्व बना रहता है। परन्तु पवित्रशास्त्र सर्वत्र क्षमा किए गए दोष का फल यह बताता है कि परमेश्वर अपनी ताड़नाएँ हटा लेता है, और अपने क्रोध और बदले को भूलकर हमें आशीष देता है। और जब दाऊद उन्हें धन्य घोषित करता है "जिनके लिए प्रभु पाप नहीं गिनता," तो वह केवल दोष की क्षमा का नहीं, वरन् मुख्य रूप से दण्ड का उल्लेख करता है। और कृपया बताओ, यदि परमेश्वर उन पापों का दण्ड माँगना आरम्भ करे जो गिनती में अनन्त और भार में इतने भारी हैं कि उनका सौवाँ भाग भी हमें अधोलोक की तह तक डुबो दे, तो उसका अन्त या सीमा क्या होगी? शैतानी दुस्साहस से मतवाले पिताओं के लिए सांसारिक दण्ड की माँग करना सचमुच सरल है। उनके लिए हत्या से कम शायद ही कुछ पाप है; व्यभिचार एक तुच्छ भूल है — घिनौनी से घिनौनी वासनाएँ सद्गुण की प्रशंसनीय परीक्षाएँ, विवेक का एक गुप्त घाव, एक निरी तुच्छ बात। परन्तु हमारे लिए, जो लम्बी जाँच के बाद, मानो घबराए और दबे हुए, अन्त में दाऊद के साथ ये शब्द कहने को विवश होते हैं, "अपनी भूलों को कौन समझ सकता है?" बच निकलने का मार्ग इतना सरल नहीं। फिर भी हम इनकार नहीं करते कि कभी-कभी दोष क्षमा होने के बाद भी परमेश्वर हमें ताड़ना देता है, परन्तु वह चेतावनी और सुधार के रूप में है — बदले के रूप में नहीं। उनका यह विचार कि दण्ड परमेश्वर के न्याय के द्वारा माँगा जाता है, इसलिए एक अपवित्र कल्पना है। सब का दण्ड एक ही रीति से नहीं होता, न उनके दोषों के अनुपात में; परन्तु ठीक वैसे जैसे परमेश्वर जानता है कि छड़ी का प्रयोग आवश्यक है, ताकि हर एक अनुशासन की शिक्षा पाकर आगे अधिक बुद्धिमानी से चले।

तथापि पिता यहाँ दिखाते हैं कि वे कितने परिश्रमी निर्माता हैं। एक छोटे-से शब्द से वे हज़ार भूलभुलैयाओं से बनी भूलभुलैया खड़ी कर देते हैं। जिस अथाह गड्ढे ने, उनके कथनानुसार, सब आत्माओं को निगल लिया, वह निश्चय ही विशाल होगा। हम सचमुच देखते हैं कि संसार की सारी धन-सम्पत्ति उसमें समा जाती है! उन्हें निर्माण में कम से कम थोड़ा और परिश्रम करना चाहिए था। पवित्रशास्त्र के किसी भी भाग में शुद्धिस्थान का कोई उल्लेख है ही नहीं। परन्तु जैसा अगस्तीन कहता है, (Ep. 157, ad Optat.,) जब कोई स्वभाव से अस्पष्ट विषय हमारी समझ में नहीं आ सकता, और पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से हमारी सहायता को नहीं आता, तब मानवीय अनुमान का कोई निर्णय देना दुस्साहस है। तब हमारा निष्कर्ष और क्या हो सकता है, सिवाय इसके कि ये लोग दुस्साहस करते हैं जब अपने ही मस्तिष्क से एक ऐसी इमारत खड़ी करने का साहस करते हैं जिसकी परमेश्वर के वचन में कोई नींव नहीं? जब तक कि शायद वे चाहते हों कि हम उनके शुद्धिस्थान के आविष्कार को पेटबोलेपन से निकली किसी भविष्यवाणी के रूप में मान लें; क्योंकि उनके पेट भरने में इतना काम और कुछ नहीं आता! पर इससे क्या? शुद्धिस्थान पवित्रशास्त्र के सारे सत्य को नष्ट किए बिना टिक नहीं सकता। इसका प्रमाण देना लम्बा होगा, पर वह हमारे लेखों में स्पष्ट दिया गया है। संक्षेप में, जब प्रायश्चित्त-कर्म उखाड़ दिए जाते हैं, तब शुद्धिस्थान अनिवार्य रूप से उन्हीं के साथ गिर पड़ता है।

नियम 31.

मैं मानता हूँ कि जो सचमुच धर्मी ठहराया गया है वह यह नहीं भूलेगा कि उसके लिए प्रतिफल रखा है, वरन् उससे भले कार्य के सर्वोत्तम प्रेरक के रूप में प्रेरित होगा। फिर भी वह केवल इसी पर दृष्टि न रखेगा; क्योंकि यह देखकर कि परमेश्वर अपनी सन्तानों से निष्कपट आज्ञाकारिता चाहता है, वह इस प्रकार के दासवत् पालन को न केवल अस्वीकार करेगा, वरन् पूरी तरह ठुकरा देगा। इसलिए पवित्र आत्मा, पवित्रशास्त्र के हर भाग में, और उन शब्दों में भी जो वह इफिसियों के पहले अध्याय में पौलुस के मुँह में डालता है, भक्ति और पवित्रता के जीवन का एक बहुत भिन्न उद्देश्य बताता है।

नियम 32.

मसीह का आत्मा हम में जो भले कर्म करता है वे किस अधिकार से या किस अर्थ में हमारे कहलाते हैं, यह अगस्तीन संक्षेप में सिखाता है जब वह प्रभु की प्रार्थना से एक उपमा लेता है: वह कहता है कि जो रोटी हम वहाँ माँगते हैं उसे "हमारी" इसी आधार पर कहा जाता है कि वह हमें दी जाती है, और किसी आधार पर नहीं। इसलिए, जैसा वही लेखक अन्यत्र सिखाता है, कोई मनुष्य मसीह के दानों को तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक वह अपने पुण्य को भूल न जाए। वह कभी-कभी कारण भी देता है: क्योंकि जिसे पुण्य कहा जाता है वह परमेश्वर के सेंत-मेंत दान के सिवाय और कुछ नहीं। इसलिए हम इन पिताओं को चिल्लाने दें कि पुण्य को अनुग्रह से अलग करके हम उसे दुष्टता से चीर रहे हैं जो वास्तव में एक है। जिसने हमारी पिछली बातों से सीख लिया है कि कर्मों का पुण्य किस में है, वह इस वर्तमान अभिशाप की ध्वनि से अधिक नहीं घबराएगा।

नियम 33.

कैसी चतुर सावधानी! जो हर मनुष्य देखता है उसे कोई मनुष्य न देखे! वे लगभग परमेश्वर की महिमा और मसीह के अनुग्रह दोनों को व्यर्थ करने की सीमा तक पहुँच जाते हैं। इस बीच जो कोई यह सोचने का साहस करे कि वे इनमें से किसी का भी किसी रीति से अनादर करते हैं, उस पर वे भयंकर कोसना बरसाते हैं। यह ठीक वैसा है मानो कोई मनुष्य खुले बाज़ार में सब के देखते दूसरे की हत्या कर दे, और फिर भी किसी को यह विश्वास करने से मना करे कि जो हत्या सब को प्रकट है वह सचमुच की गई है। इसके अतिरिक्त, यहाँ चूहे अपने ही विरुद्ध मुखबिर बन जाते हैं, ऐसे सब लोगों के विरुद्ध भय दिखाने को अभिशाप की धमकी देकर, जो उस अधर्म को देखने का साहस करें जिसका बोध उन्हें स्वयं है।

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