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ट्रेंट की महासभा का सातवाँ अधिवेशन
पिछले अन्तिम अधिवेशन में सब पिताओं की एकमत सम्मति से धर्मी ठहराए जाने के विषय में जो हितकारी शिक्षा घोषित की गई थी, उसकी पूर्ति के लिए यह उचित जान पड़ा कि कलीसिया के परम पवित्र संस्कारों का वर्णन किया जाए, जिनके द्वारा सब सच्ची धार्मिकता या तो आरम्भ होती है, या आरम्भ हो जाने पर बढ़ती है, या खो जाने पर पुनः प्राप्त की जाती है। इसलिए पवित्र, विश्वव्यापी और सामान्य ट्रेंट की महासभा ने, जो पवित्र आत्मा में विधिपूर्वक एकत्र हुई है और पवित्र पीठ के पूर्वोक्त प्रतिनिधियों की अध्यक्षता में है, भूलों को दूर करने और उन विधर्मों को जड़ से उखाड़ने के लिए, जो हमारे इस समय में उन प्राचीन विधर्मों से, जिन्हें हमारे पिताओं ने दोषी ठहराया था, फिर उभर आए हैं और परम पवित्र संस्कारों के विषय में नए सिरे से गढ़े गए हैं, और जो कैथोलिक कलीसिया की शुद्धता और आत्माओं के उद्धार में बड़ी बाधा डालते हैं, पवित्र शास्त्र की शिक्षा, प्रेरितीय परम्पराओं तथा महासभाओं और पिताओं की सम्मति का पालन करते हुए इन वर्तमान नियमों को बनाना और ठहराना उचित समझा है, और यह अभिप्राय रखा है कि आगे दिव्य आत्मा की सहायता से शेष वे नियम भी प्रकाशित किए जाएँ जो इस आरम्भ किए हुए कार्य को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं।
सामान्य रूप से संस्कारों के विषय में।
I. जो कोई कहे कि नई व्यवस्था के संस्कार सब के सब हमारे प्रभु यीशु मसीह के ठहराए हुए नहीं हैं, या वे सात से अधिक अथवा कम हैं, अर्थात् बपतिस्मा, पुष्टीकरण, प्रभु-भोज, प्रायश्चित्त, अन्तिम अभिषेक, पदाभिषेक और विवाह, या यह कि इन सातों में से कोई एक भी सचमुच और यथार्थ रूप से संस्कार नहीं है, वह शापित हो।
II. जो कोई कहे कि नई व्यवस्था के ये संस्कार पुरानी व्यवस्था के संस्कारों से भिन्न नहीं हैं, सिवाय इसके कि रीतियाँ भिन्न हैं और बाहरी विधियाँ भिन्न हैं, वह शापित हो।
III. जो कोई कहे कि ये सातों संस्कार आपस में ऐसे समान हैं कि कोई भी किसी अन्य से किसी बात में अधिक प्रतिष्ठा का नहीं है, वह शापित हो।
IV. जो कोई कहे कि नई व्यवस्था के संस्कार उद्धार के लिए आवश्यक नहीं, वरन् अनावश्यक हैं, और यह कि उनके बिना, या उनकी इच्छा के बिना ही, मनुष्य केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह पा लेते हैं, यद्यपि प्रत्येक जन के लिए सब के सब आवश्यक नहीं हैं, वह शापित हो।
V. जो कोई कहे कि ये संस्कार केवल विश्वास को पोषण देने के लिए ठहराए गए थे, वह शापित हो।
VI. जो कोई कहे कि नई व्यवस्था के संस्कारों में वह अनुग्रह निहित नहीं है जिसका वे चिह्न हैं, या कि जो लोग उसमें कोई बाधा नहीं डालते उन्हें वे अनुग्रह स्वयं प्रदान नहीं करते, मानो वे केवल उस अनुग्रह या धार्मिकता के बाहरी चिह्न हैं जो विश्वास से प्राप्त हुई, और मसीही अंगीकार के एक प्रकार के चिह्न-मात्र हैं, जिनसे विश्वासी लोग मनुष्यों के बीच अविश्वासियों से पहचाने जाते हैं, वह शापित हो।
VII. जो कोई कहे कि इस प्रकार के संस्कारों के द्वारा अनुग्रह सदा और सब को नहीं दिया जाता, जहाँ तक परमेश्वर की ओर से है, चाहे वे यथाविधि ग्रहण किए गए हों, वरन् कभी-कभी और कुछ ही लोगों को दिया जाता है, वह शापित हो।
VIII. जो कोई कहे कि नई व्यवस्था के इन संस्कारों के द्वारा अनुग्रह ex opere operato, (किए गए कर्म के द्वारा,) प्रदान नहीं किया जाता, वरन् अनुग्रह पाने के लिए केवल दिव्य प्रतिज्ञा पर विश्वास ही पर्याप्त है, वह शापित हो।
IX. जो कोई कहे कि तीन संस्कारों में, अर्थात् बपतिस्मा, पुष्टीकरण और पदाभिषेक में, आत्मा पर कोई छाप, अर्थात् कोई आत्मिक और अमिट चिह्न नहीं लगाया जाता, जिसके कारण उन्हें दोहराया नहीं जा सकता, वह शापित हो।
X. जो कोई कहे कि सब मसीहियों को वचन और सब संस्कारों के संचालन का अधिकार है, वह शापित हो।
XI. जो कोई कहे कि सेवकों में, जब वे संस्कारों को सम्पन्न करते और बाँटते हैं, कम से कम वही करने का अभिप्राय, जो कलीसिया करती है, आवश्यक नहीं है, वह शापित हो।
XII. जो कोई कहे कि कोई सेवक, जो घोर पाप की दशा में है, यदि उसने संस्कार को सम्पन्न करने और देने से सम्बन्धित सब आवश्यक बातों का पालन किया हो, तो भी वह संस्कार को सम्पन्न नहीं करता या नहीं देता, वह शापित हो।
XIII. जो कोई कहे कि कैथोलिक कलीसिया की ग्रहण की हुई और स्वीकृत रीतियाँ, जो संस्कारों के गम्भीर संचालन में प्रयोग की जाती रही हैं, सेवक के द्वारा बिना पाप के इच्छानुसार तुच्छ जानी या छोड़ी जा सकती हैं, या कलीसियाओं के किन्हीं भी पास्टरों के द्वारा अन्य नई रीतियों में बदली जा सकती हैं, वह शापित हो।
बपतिस्मा के विषय में।
I. जो कोई कहे कि यूहन्ना के बपतिस्मा में वही तीनों बातें थीं जो मसीह के बपतिस्मा में हैं, वह शापित हो।
II. जो कोई कहे कि बपतिस्मा में सच्चा और स्वाभाविक जल अनिवार्य नहीं है, और इस प्रकार हमारे प्रभु यीशु मसीह के उन वचनों को,—"जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे,"—कोई लाक्षणिक मोड़ दे, वह शापित हो।
III. जो कोई कहे कि रोमी कलीसिया में (जो सब कलीसियाओं की माता और स्वामिनी है) बपतिस्मा के संस्कार की सच्ची शिक्षा नहीं है, वह शापित हो।
IV. जो कोई कहे कि वह बपतिस्मा, जो विधर्मियों के द्वारा भी पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से, वही करने के अभिप्राय से जो कलीसिया करती है, दिया जाता है, सच्चा बपतिस्मा नहीं है, वह शापित हो।
V. जो कोई कहे कि बपतिस्मा स्वैच्छिक है, अर्थात् उद्धार के लिए आवश्यक नहीं, वह शापित हो।
VI. जो कोई कहे कि बपतिस्मा पाया हुआ मनुष्य अनुग्रह को खो नहीं सकता, चाहे वह खोना भी चाहे, और चाहे जितना पाप करे, यदि वह विश्वास करने से इनकार न करे, वह शापित हो।
VII. जो कोई कहे कि बपतिस्मा पाए हुए लोग बपतिस्मा ही के द्वारा केवल विश्वास के ऋणी हो जाते हैं, परन्तु मसीह की सम्पूर्ण व्यवस्था के पालन के नहीं, वह शापित हो।
VIII. जो कोई कहे कि बपतिस्मा पाए हुए लोग पवित्र कलीसिया की उन सब आज्ञाओं से, जो लिखित रूप में या परम्परा से सौंपी गई हैं, मुक्त हैं, यहाँ तक कि वे उनका पालन करने को बाध्य नहीं हैं, जब तक कि वे स्वेच्छा से उनके अधीन होना न चाहें, वह शापित हो।
IX. जो कोई कहे कि मनुष्यों को उनके पाए हुए बपतिस्मा की स्मृति में इस प्रकार लौटाया जाना चाहिए कि वे समझें कि बपतिस्मा के बाद की गई सब मन्नतें उस बपतिस्मा में की गई प्रतिज्ञा के बल से व्यर्थ हैं, मानो वे मन्नतें उस विश्वास से, जिसका उन्होंने अंगीकार किया था, और स्वयं बपतिस्मा से कुछ घटाती हों, वह शापित हो।
X. जो कोई कहे कि बपतिस्मा के बाद किए गए सब पाप पाए हुए बपतिस्मा की केवल स्मृति और विश्वास से या तो क्षमा हो जाते हैं या क्षम्य बना दिए जाते हैं, वह शापित हो।
XI. जो कोई कहे कि सच्चा और यथाविधि दिया हुआ बपतिस्मा उस मनुष्य को दोहराया जाना चाहिए जिसने अविश्वासियों के बीच मसीह के विश्वास का इनकार किया हो, जब वह मन फिराव की ओर लौटे, वह शापित हो।
XII. जो कोई कहे कि किसी मनुष्य को बपतिस्मा नहीं दिया जाना चाहिए, सिवाय उस आयु के जिसमें मसीह ने बपतिस्मा लिया था, या ठीक मृत्यु के क्षण में, वह शापित हो।
XIII. जो कोई कहे कि शिशु, इस कारण कि उनमें विश्वास करने की कोई क्रिया (क्षमता) नहीं होती, बपतिस्मा पाने के बाद विश्वासियों में गिने नहीं जाने चाहिए, और इसलिए जब वे विवेक की आयु को पहुँचें तब उन्हें फिर से बपतिस्मा दिया जाना चाहिए, या यह कि उनका बपतिस्मा छोड़ देना इससे उत्तम है कि वे अपनी ही क्रिया से विश्वास न करते हुए केवल कलीसिया के विश्वास में बपतिस्मा पाएँ, वह शापित हो।
XIV. जो कोई कहे कि ऐसे शिशुओं से, जब वे बड़े हों, यह पूछा जाना चाहिए कि जब उन्हें बपतिस्मा दिया गया था तब उनके धर्म-माता-पिताओं ने उनके नाम से जो प्रतिज्ञा की थी उसे वे स्थिर करना चाहते हैं या नहीं; और जब वे उत्तर दें कि वे नहीं चाहते, तो उन्हें उनकी अपनी इच्छा पर छोड़ दिया जाना चाहिए और इस बीच किसी दण्ड के द्वारा उन्हें मसीही जीवन के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए, केवल इसके सिवाय कि जब तक वे मन न फिराएँ तब तक उन्हें प्रभु-भोज और अन्य संस्कारों के ग्रहण से रोक रखा जाए, वह शापित हो।
पुष्टीकरण के विषय में।
I. जो कोई कहे कि बपतिस्मा का पुष्टीकरण एक निकम्मी रीति है, और सच्चा तथा यथार्थ संस्कार नहीं है, या यह कि प्राचीन काल में वह एक प्रकार की धर्म-शिक्षा के सिवाय और कुछ न था, जिसमें किशोरावस्था के निकट पहुँचे हुए लोग कलीसिया के सामने अपने विश्वास का कारण समझाते थे, वह शापित हो।
II. जो कोई कहे कि जो लोग पुष्टीकरण के संस्कार में पवित्र तेल को कोई सामर्थ्य देते हैं, वे पवित्र आत्मा का अपमान करते हैं, वह शापित हो।
III. जो कोई कहे कि पवित्र पुष्टीकरण का सामान्य सेवक केवल अध्यक्ष (बिशप) नहीं, वरन् कोई भी साधारण याजक है, वह शापित हो।
सुधार के आदेश।
उसी पवित्र महासभा ने, उन्हीं प्रतिनिधियों की अध्यक्षता में, निवास और सुधार का वह कार्य, जो पहले से आरम्भ हो चुका है, परमेश्वर की स्तुति और मसीही धर्म की वृद्धि के लिए आगे बढ़ाने का अभिप्राय रखकर यह ठहराना उचित समझा है, और सदा प्रेरितीय पीठ के अधिकार पर कोई हानि आए बिना, इस प्रकार ठहराया है।
प्रधान कलीसियाओं के संचालन के लिए कोई भी, जब तक वह वैध विवाह से उत्पन्न न हो, और परिपक्व आयु, चाल-चलन की गम्भीरता और विद्या की निपुणता से युक्त न हो, तृतीय अलेक्ज़ेंडर के उस विधान के अनुसार, जो "क्योंकि सब में" से आरम्भ होता है और लातेरान की महासभा में घोषित हुआ था, योग्य न माना जाए।
कोई भी मनुष्य, चाहे वह पद, श्रेणी या श्रेष्ठता में कितना ही विख्यात हो, पवित्र नियमों की व्यवस्थाओं के विरुद्ध एक से अधिक महानगरीय या प्रधान कलीसिया को एक ही समय में पदनाम से या in Commendam या किसी अन्य नाम से स्वीकार करने या रखने का साहस न करे, क्योंकि वह अत्यन्त भाग्यवान गिना जाना चाहिए जिसके भाग में यह आया है कि वह एक कलीसिया का भली-भाँति और फलदायी रीति से, और अपने सौंपे हुए प्राणों की सुरक्षा के साथ संचालन करे। जो लोग अब इस वर्तमान आदेश के आशय के विरुद्ध कई कलीसियाएँ रखते हैं, वे जिसे रखना चाहें उसे चुन लेने के बाद शेष को छह महीने के भीतर छोड़ने को बाध्य हों, यदि वे प्रेरितीय पीठ के स्वतन्त्र अधिकार में हों, या यदि ऐसा न हो तो एक वर्ष के भीतर। नहीं तो केवल सबसे अन्त में प्राप्त की हुई को छोड़कर शेष कलीसियाएँ स्वयं ही ipso facto रिक्त मानी जाएँ।
निम्न कलीसियाई वृत्तियाँ, विशेषकर वे जिनके साथ आत्माओं की देखभाल जुड़ी है, योग्य और उपयुक्त व्यक्तियों को दी जाएँ, जो वहीं निवास कर सकें और स्वयं उपस्थित रहकर उस देखभाल का निर्वाह कर सकें, तृतीय अलेक्ज़ेंडर के उस विधान के अनुसार जो लातेरान की महासभा में है और "जैसे कि कुछ" से आरम्भ होता है, तथा ग्रेगरी के एक अन्य विधान के अनुसार जो ल्यों की सामान्य महासभा में प्रकाशित हुआ और "यद्यपि नियम" से आरम्भ होता है। जो भी नियुक्ति या प्रावधान अन्य रीति से किया जाए वह रद्द और निष्फल माना जाए, और नियुक्ति देनेवाला साधारण अधिकारी जान ले कि वह सामान्य महासभा के उस विधान के दण्ड का भागी होगा जो "अति भारी" से आरम्भ होता है।
जो कोई आगे को कई देखभाल-पद, या अन्यथा परस्पर असंगत कलीसियाई वृत्तियाँ, चाहे आजीवन संयोग के रूप में, चाहे स्थायी Commendam के रूप में, चाहे किसी अन्य नाम और पदवी से, पवित्र नियमों के रूप के विरुद्ध, और विशेषकर तृतीय इन्नोसेंट के उस विधान के विरुद्ध जो "बहुत" से आरम्भ होता है, एक ही समय में स्वीकार करने और रखने का साहस करे, वह उस विधान की व्यवस्था के अनुसार ipso jure, और इस वर्तमान नियम के बल से भी, उन वृत्तियों से वंचित किया जाए।
स्थानों के साधारण अधिकारी उन सब लोगों को, जो कई देखभाल-पद या अन्यथा परस्पर असंगत कलीसियाई वृत्तियाँ रखते हैं, अपनी विशेष अनुमतियाँ दिखाने को विवश करें, और अन्य बातों में दशम ग्रेगरी के उस विधान के अनुसार कार्यवाही करें जो ल्यों की सामान्य महासभा में प्रकाशित हुआ और "साधारण अधिकारी" से आरम्भ होता है, जिस विधान को यह पवित्र महासभा नवीकृत करने योग्य समझती है, और उसका नवीकरण करती है; और इसके अतिरिक्त यह जोड़ती है कि वे साधारण अधिकारी स्वयं भी, योग्य प्रतिनिधि-पादरियों की नियुक्ति और फलों के उपयुक्त भाग के निर्धारण के द्वारा, हर प्रकार से ध्यान रखें कि आत्माओं की देखभाल में किसी रीति से कोई अनदेखी न हो और वृत्तियाँ स्वयं उचित सेवाओं से कम से कम वंचित न की जाएँ,—और पूर्वोक्त विषयों में किसी के लिए भी अपीलें, विशेषाधिकार और किसी भी प्रकार की छूटें, चाहे विशेष न्यायियों की नियुक्ति के साथ हों, और उनके द्वारा लगाए गए प्रतिबन्ध, कुछ काम के न हों।
पिछले चालीस वर्षों के भीतर के स्थायी संयोगों की जाँच साधारण अधिकारी प्रेरितीय पीठ के प्रतिनिधि के रूप में कर सकते हैं, और जो छल से या छिपाव से प्राप्त किए गए हों वे रद्द घोषित किए जाएँ। जो पूर्वोक्त अवधि के भीतर दिए गए, पर अब तक पूर्ण या आंशिक रूप से प्रभावी नहीं हुए हैं, और जो आगे किसी व्यक्ति के अनुरोध पर किए जाएँ, उन्हें, जब तक यह प्रकट न हो कि वे वैध या अन्यथा उचित कारणों से किए गए थे, जिन्हें स्थान के साधारण अधिकारी के सामने, इच्छुक पक्षों को बुलाकर, प्रमाणित किया जाए, छल से प्राप्त किया हुआ मान लिया जाए; और इसलिए वे सर्वथा बलहीन हों, जब तक कि प्रेरितीय पीठ के द्वारा अन्यथा घोषित न हुआ हो।
देखभाल-सहित वे कलीसियाई वृत्तियाँ, जो प्रधान, सामूहिक या अन्य कलीसियाओं से, और मठों, वृत्तियों या महाविद्यालयों से, या किन्हीं भी भक्ति-स्थानों से स्थायी रूप से जुड़ी और संलग्न पाई जाती हैं, स्थानों के साधारण अधिकारियों के द्वारा प्रति वर्ष देखी जाएँ, जो यत्नपूर्वक यह प्रबन्ध करें कि आत्माओं की देखभाल योग्य स्थायी पादरियों के द्वारा सराहनीय रीति से की जाए, (जब तक कि उन साधारण अधिकारियों को कलीसियाओं के सुशासन के लिए कोई भिन्न प्रबन्ध उचित न जान पड़े,) जिन्हें वे ही उन कलीसियाओं में नियुक्त करें, और फलों के तिहाई भागों में से एक भाग (उन साधारण अधिकारियों के विवेक के अनुसार कम या अधिक) किसी निश्चित विषय पर ठहराया जाए,—और पूर्वोक्त विषयों में अपीलें, विशेषाधिकार, छूटें, चाहे न्यायियों की नियुक्ति के साथ हों, और उनके कोई भी प्रतिबन्ध निष्फल हों।
स्थानों के साधारण अधिकारी सब कलीसियाओं को, चाहे वे कितनी ही छूट-प्राप्त हों, वर्ष में एक बार प्रेरितीय अधिकार से देखने को बाध्य हों; और व्यवस्था के उपयुक्त उपायों से यह प्रबन्ध करें कि जिन बातों को सुधार की आवश्यकता है वे सुधारी जाएँ, और कलीसियाओं को आत्माओं की देखभाल (यदि वह उनकी है) और अन्य उचित सेवाओं से किसी रीति से वंचित न किया जाए; अपीलें, विशेषाधिकार, रीतियाँ, चाहे वे अनादि काल की प्रथा का बल रखती हों, न्यायियों की नियुक्तियाँ और उनके प्रतिबन्ध सर्वथा वर्जित हों।
जो बड़ी कलीसियाओं में पदोन्नत हों वे व्यवस्था के ठहराए हुए समय के भीतर अभिषेक की विधि ग्रहण करें, और छह महीने से आगे दी गई अवधि-वृद्धियाँ किसी के लिए भी काम की न हों।
जब कोई पीठ रिक्त हो, तब रिक्त होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर मण्डली के लिए यह उचित न हो कि वह पदाभिषेक की अनुमति या अनुमतिपत्र, या "आदरणीय" पत्र (जैसा कि कुछ लोग उन्हें कहते हैं), सामान्य व्यवस्था के प्रबन्ध के अनुसार भी और किसी भी विशेषाधिकार या प्रथा के बल से भी, ऐसे किसी को दे जिसे पाई हुई या पाई जानेवाली कलीसियाई वृत्ति के अवसर ने विवश न किया हो। यदि अन्यथा किया जाए, तो विरुद्ध आचरण करनेवाली मण्डली कलीसियाई प्रतिबन्ध की भागी हो; और इस प्रकार अभिषिक्त हुए लोग, यदि निम्न पदों में हों, तो किसी याजकीय विशेषाधिकार का, विशेषकर अपराध सम्बन्धी विषयों में, उपभोग न करें, और यदि उच्च पदों में हों, तो भावी अध्यक्ष की इच्छा के अनुसार ipso jure पद के निर्वाह से निलम्बित हों।
अधिकार-पत्र de paromovendo किसी के भी द्वारा प्राप्त न किए जाएँ, सिवाय उनके जिनके पास इसका वैध कारण है कि वे अपने ही अध्यक्षों के द्वारा अभिषिक्त नहीं हो सकते, जो पत्रों में व्यक्त किया जाए; और तब भी वे अभिषिक्त न किए जाएँ, सिवाय अपने धर्मप्रान्त में निवास करनेवाले अध्यक्ष के द्वारा, या उसके स्थान पर महायाजकीय कार्य करनेवाले के द्वारा; और पहले सावधानी से जाँच कर लेने के बाद।
अधिकार-पत्र de non promovendo, उनके सिवाय जो व्यवस्था में बताए गए मामलों में दिए गए हों, केवल एक वर्ष तक प्रभावी रहें।
किन्हीं भी कलीसियाई व्यक्तियों के द्वारा, यहाँ तक कि प्रेरितीय पीठ के दूतों के द्वारा भी, प्रस्तुत किया हुआ या चुना हुआ या नामित किया हुआ कोई भी व्यक्ति, अनादि काल से चली आई किसी विशेषाधिकार या प्रथा के बहाने भी, किसी कलीसियाई वृत्ति में स्थापित, पुष्ट या प्रवेशित न किया जाए, जब तक कि स्थान के साधारण अधिकारियों के द्वारा पहले उसकी जाँच न की जा चुकी हो और वह योग्य न पाया गया हो; और वे किसी अपील के द्वारा परीक्षा से गुज़रने के दायित्व से अपने को बचा न सकें,—केवल उन्हें छोड़कर जो सामान्य विद्या के विश्वविद्यालयों या महाविद्यालयों के द्वारा प्रस्तुत, चुने या नामित किए गए हों।
छूट के मामलों में चतुर्थ इन्नोसेंट के उस विधान का पालन किया जाए जो "चाहते हुए" से आरम्भ होता है और ल्यों की सामान्य महासभा में प्रकाशित हुआ था, जिस विधान का नवीकरण करना वर्तमान पवित्र महासभा ने उचित समझा है, और वह उसका नवीकरण करती है: और इसके अतिरिक्त यह जोड़ती है कि मज़दूरी सम्बन्धी दीवानी मामलों में, और दरिद्र लोगों के, लौकिक पादरियों के, या मठों में न रहनेवाले नियमबद्ध साधुओं के मामलों में, चाहे वे कितने ही छूट-प्राप्त हों, यद्यपि उनके लिए वहीं प्रेरितीय पीठ का नियुक्त किया हुआ कोई निश्चित न्यायी हो; और इन मामलों में, यदि उनके पास ऐसा कोई न्यायी न हो, तो वे उस सीमा के साधारण अधिकारियों के सामने बुलाए जाएँ, जो उक्त पीठ के द्वारा इस कार्य के लिए प्रतिनिधि ठहराए गए हैं, और वैध उपायों से ऋण चुकाने को विवश और बाध्य किए जाएँ,—पूर्वोक्त के विरुद्ध कोई भी विशेषाधिकार, छूट, रक्षकों की नियुक्तियाँ और उनके प्रतिबन्ध किसी काम के न हों।
साधारण अधिकारी यह ध्यान रखें कि सब अस्पताल अपने प्रबन्धकों के द्वारा, वे किसी भी नाम से पुकारे जाएँ या कितनी ही छूट-प्राप्त हों, विश्वासयोग्यता और सावधानी से चलाए जाएँ; वियेन की महासभा के उस विधान के रूप का पालन करते हुए जो "जैसा कि होता है:" से आरम्भ होता है, जिस विधान का नवीकरण करना पवित्र महासभा ने उचित समझा है, और वह उसका नवीकरण करती है, उसमें दिए गए अपवादों के साथ।
