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सातवें अधिवेशन का प्रतिकारक
किसी भी विवाद में, जहाँ बुरे पक्ष की पैरवी करनी पड़ती है, कितना पसीना बहाना पड़ता है — यह माननीय पिताओं को पिछले अधिवेशन में अनुभव हो चुका था। इसलिए, ताकि वे दूसरे संघर्ष से अपने को थका न लें, उन्होंने मामले को निपटाने की अपनी संक्षिप्त विधि, अर्थात् गर्जन-तर्जन करके शाप सुनाने की विधि, की ओर लौट जाना ही उचित समझा। और सच तो यह है कि कारण बताने का कष्ट उठाना उनके तानाशाही स्वभाव के अनुकूल भी न था। तो फिर क्या! कोरीबान्तेस के पुजारी अपना पीतल बजाते हैं और झंकार को दुगुना कर देते हैं। हे बालको, काँप उठो! जिसमें पुरुषोचित साहस की एक चिनगारी भी है, वह उनकी इन निरर्थक खड़खड़ाहटों को तुच्छ जानेगा, और निश्चिन्त मन से निडर होकर उनके आदेशों की अन्तर्वस्तु की जाँच करेगा। वे कैसी मूर्खतापूर्ण बेतुकी बातों से भरे पड़े हैं, इसे मैं अँगुली रखकर दिखा देने का वचन देता हूँ।
कैनन 1.
वे आग्रह करते हैं कि सातों संस्कार मसीह ने ठहराए थे। तो फिर उन्होंने उसे ऐसा करने का आदेश क्यों नहीं दिया? जिस सात की संख्या को वे शाप के संरक्षण में रखते हैं, उसे न केवल पवित्रशास्त्र का, वरन् किसी मान्य लेखक का भी समर्थन प्राप्त नहीं है। यह तो थोड़ी बात है। जिन संस्कारों को वे गिनाते हैं, उनमें से कुछ, जैसे रोगियों का तेल-अभिषेक, अस्थायी थे, और कुछ, जैसे विवाह, झूठे ही संस्कार कहलाते हैं। जिन तर्कों से हम यह सिद्ध करते हैं, वे स्पष्ट और सुदृढ़ हैं। क्या! क्या वे यह डींग हाँकेंगे कि उनके पास चंगा करने का वरदान है? यदि तेल-अभिषेक उस वरदान का चिह्न है, तो जब वे उसे वास्तविकता के बिना प्रयोग में लाते हैं, तब क्या वे बन्दर के समान नक़ल करनेवाले नहीं ठहरते? फिर, इस रीति में ऐसी कौन-सी प्रतिज्ञा है जो हम पर लागू होती हो? यदि संस्कार आत्मिक अनुग्रह और बाहरी चिह्न से मिलकर बनता है, तो प्रायश्चित्त में वे ऐसी कोई वस्तु कहाँ पाएँगे? विवाह को यह नाम देने का उनके पास उस भिक्षु की घोर अज्ञानता को छोड़ और कोई कारण नहीं, जिसने इफिसियों की पत्री (इफिसियों 5:32) में “भेद” के स्थान पर “संस्कार” शब्द का प्रयोग पढ़ा, और मसीह तथा उसकी कलीसिया के बीच की गुप्त एकता से सम्बन्धित उस शब्द को विवाह पर लागू कर दिया। इन सब बातों के विषय में हमारी रचनाओं में स्पष्ट और विस्तृत प्रमाण मौजूद हैं, जिनका खण्डन ये भले पिता केवल एक शब्द “शापित” से कर देते हैं। यह तो बिना युद्ध के जीत लेना है, या यों कहें कि बिना विजय के विजय-उत्सव मनाना है!
कैनन 2.
चूँकि दोनों वाचाओं के संस्कारों का कर्ता एक ही है, प्रतिज्ञाएँ एक ही हैं, सत्य एक ही है, और मसीह में उनकी पूर्ति भी एक ही है, इसलिए हम उचित ही कहते हैं कि वे बाहरी चिह्नों में एक-दूसरे से भिन्न हैं, परन्तु जिन बातों का मैंने उल्लेख किया है उनमें, अथवा एक शब्द में कहें तो वास्तविकता में, एकमत हैं। क्योंकि जैसे वे शिक्षा के परिशिष्ट हैं, और शिक्षा का सार एक ही है, वैसे ही संस्कारों के विषय में भी वही नियम लागू होता है। यदि मैं संक्षेप में न समझाता, तो सम्भव है कि मेरे पाठक यह समझने की आशा न कर पाते कि ट्रेंट के पिताओं का इस वज्रपात के पीछे क्या उद्देश्य है। सोफिस्टों की एक प्रचलित मान्यता यह है कि मूसा की व्यवस्था के संस्कार अनुग्रह का केवल प्रतिरूप थे, परन्तु हमारे संस्कार उसे प्रदान करते हैं। हम दृढ़ता से कहते हैं कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में सदा सच्चा रहा है, और उसने आरम्भ से कोई ऐसा प्रतिरूप नहीं दिखाया जिसे उसने प्राचीन कलीसिया को वास्तविकता में प्रदान न किया हो; क्योंकि खतने की वास्तविकता मूसा के समय में प्रकट थी। पौलुस गवाही देता है कि उन्होंने तब उसी आत्मिक भोजन और उसी आत्मिक पेय में भाग लिया। (1 कुरिन्थियों 10:3।) इसके उत्तर में वे केवल यही कहते हैं कि पाठशालाओं में तो कुछ और ही सिखाया जाता है। मैं ऐसे विषयों को थोड़े शब्दों में ही छूता हूँ, जिन्हें मेरे पाठक, यदि चाहें, हमारी रचनाओं से पूरी तरह सीख लेंगे। सार यही रहे। संस्कारों में क्या भेद या समानता है, यह हमें परमेश्वर के वचन से सीखना है, रोमवादियों के आदेशों से नहीं। फिर भी हम इससे इनकार नहीं करते कि मसीह के राज्य में अधिक प्रचुर अनुग्रह प्राप्त होता है, और इसी कारण हम दो प्रकार के भेद बताया करते हैं। पहला, कि हमारे संस्कार मसीह को दूर से नहीं दिखाते, मानो वह अनुपस्थित हो, वरन् उसे मानो अँगुली से दिखाकर प्रस्तुत करते हैं। दूसरा, कि जैसे प्रकाशन की रीति अधिक विस्तृत है, वैसे ही अनुग्रह का वितरण भी अधिक प्रचुर है।
कैनन 3.
कौन मनुष्यों की कल्पनाओं को मसीह की विधियों के समान स्तर पर रखने की अपेक्षा नेप्च्यून के वज्र का सामना करना न चुनेगा? हम पढ़ते हैं कि बपतिस्मा की सिफ़ारिश मसीह ने की थी; इसी प्रकार हम पढ़ते हैं कि प्रभु-भोज की भी सिफ़ारिश की गई। (मत्ती 27, 28।) शेष संस्कारों के विषय में हम ऐसा कुछ नहीं पढ़ते; वरन् बहुत युगों बाद तक इन लोगों की शिक्षा अज्ञात ही रही। हमारे उद्धारकर्ता के इस प्रश्न के उद्देश्य और बल के विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता: “यूहन्ना का बपतिस्मा कहाँ से था, स्वर्ग की ओर से या मनुष्यों की ओर से?” क्योंकि उसका आशय यह है कि यदि वह स्वर्ग से न उतरा होता तो वह वैध न होता। इसलिए आओ, हम मसीह के अधिकार पर पूर्ण निश्चिन्तता से यह ठहरा लें कि जो कुछ केवल मनुष्यों के अधिकार से निकला है, उसे ठुकरा देने में कोई जोखिम नहीं। परन्तु सबके लिए समान अधिकार का दावा करके भी वे सन्तुष्ट नहीं हुए; वे अपने दृढ़ीकरण के अभिषेक-तेल को मसीह के बपतिस्मा से ऊपर ठहराते हैं! क्योंकि एक को दूसरे से अधिक प्रतिष्ठित बनाने का उनका उद्देश्य यह नहीं है कि जिनको पवित्रशास्त्र का कोई समर्थन प्राप्त नहीं है उन्हें निचले दर्जे में रखें, वरन् वे उन घृणित निन्दाओं को फिर से दोहराते हैं जो ऑरेलियम की महासभा ने पहले-पहल उगली थीं — कि बपतिस्मा से हम केवल आधे मसीही बनाए जाते हैं, और दृढ़ीकरण से पूरे किए जाते हैं! — और वहाँ कही गई इसी आशय की अन्य बातें भी।
कैनन 4.
मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा कि जो वस्तुएँ मसीह ने हमें उद्धार के सहायक साधन के रूप में दी हैं, उनका प्रयोग आवश्यक है, अर्थात् जब अवसर मिले; यद्यपि विश्वासियों को सदा स्मरण दिलाना चाहिए कि किसी भी संस्कार की आवश्यकता साधन-कारण की आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं है, जिससे परमेश्वर की सामर्थ्य किसी भी प्रकार बँधी नहीं है। प्रत्येक भक्त जन को पूरे हृदय से इस कथन पर काँप उठना चाहिए कि ये वस्तुएँ अनावश्यक हैं। परन्तु यहाँ ये योग्य पिता अपनी सामान्य मूर्खता के कारण यह नहीं देखते कि संस्कारों के द्वारा हमें जो भी अनुग्रह दिया जाता है, उसे फिर भी विश्वास का ही श्रेय माना जाना चाहिए। जो विश्वास को संस्कारों से अलग करता है, वह वैसा ही करता है जैसे कोई शरीर से प्राण निकाल ले। इसलिए, जैसे जब हम कहते हैं कि मसीह का अनुग्रह हमें केवल विश्वास से मिलता है, तब हम सुसमाचार की शिक्षा को अलग नहीं कर देते, वैसे ही हम संस्कारों को भी अलग नहीं करते, जिनका स्वभाव वही है, क्योंकि वे सुसमाचार की मुहरें हैं।
कैनन 5.
हम मानते हैं कि संस्कार केवल विश्वास को बनाए रखने ही के लिए नहीं, वरन् उसे बढ़ाने के लिए भी ठहराए गए हैं। परन्तु ये सींगवाले सज्जन कुछ और ही अर्थ लेते हैं; क्योंकि वे दिखावा करते हैं कि संस्कारों में कोई जादुई सामर्थ्य है, जो विश्वास के बिना भी प्रभावकारी होती है। यह भ्रम उस सम्बन्ध को नष्ट कर देता है जिसे पवित्रशास्त्र संस्कारों और विश्वास के बीच सर्वत्र स्थापित करता है। ताकि मेरे पाठक इसे और स्पष्टता से समझ सकें, उन्हें सदा स्मरण रखना चाहिए कि संस्कार हम पर अनुग्रह उण्डेलने के साधन-कारण मात्र हैं, और वे तभी लाभदायक होते और अपना प्रभाव उत्पन्न करते हैं जब वे विश्वास के अधीन होकर काम करते हैं।
कैनन 6.
यहाँ ये बेतुके लोग चाँदी में खोट मिलाते हैं। इसलिए हमें भेद करना होगा: — पहले तो, यदि कोई यह कहता है कि संस्कारों में वह अनुग्रह निहित नहीं है जिसका वे प्रतिरूप हैं, तो हम उनसे सहमत नहीं हैं। परन्तु जब सींगवाले पिता यह जोड़ते हैं कि संस्कार अपने आप में उन लोगों को अनुग्रह प्रदान करते हैं जो उसके मार्ग में कोई बाधा नहीं डालते, तब वे संस्कारों की पूरी शक्ति को बिगाड़ देते हैं। क्योंकि वे फिर सोफिस्टों के उसी पुराने प्रलाप में जा गिरते हैं कि अविश्वासी भी संस्कारों में दिए गए अनुग्रह को पा लेते हैं, बशर्ते वे अन्य बाधाएँ खड़ी करके उसे ठुकरा न दें — मानो अविश्वास अपने आप में पर्याप्त बाधा न हो। इसलिए हम यह दृढ़ता से मानें कि जब तक हम विश्वास के द्वारा योग्य नहीं बनाए जाते, तब तक संस्कारों में प्रस्तुत अनुग्रह को नहीं पा सकते। जो बात इसके तुरन्त बाद आती है, उसे उन्होंने या तो बहुत द्वेष से, या बहुत बेतुके ढंग से जोड़ा है। वे कहते हैं, “मानो वे केवल बाहरी चिह्न हों”; वे ऐसे बोलते हैं मानो इन दोनों बातों के सिवा कोई तीसरा विकल्प है ही नहीं। जैसे हम उस भिक्षुओं की कल्पना को ठुकराते हैं कि संस्कार विश्वास के सिवा किसी और रीति से प्रभावकारी होते हैं, वैसे ही हम सहर्ष चिह्नों के साथ वास्तविकता के सच्चे प्रदर्शन को जोड़ते हैं, यह मानते हुए कि विश्वास के बिना उनका कोई प्रभाव नहीं, और फिर भी वे किसी दूर के अनुग्रह के खोखले और नग्न चिह्न नहीं हैं।
कैनन 7.
पहले यह परिभाषित करना चाहिए था कि संस्कारों को उचित रीति से ग्रहण करने का अर्थ क्या है। क्योंकि यह सूअरों का झुण्ड विश्वास को छोड़कर और पश्चात्ताप को पीछे धकेलकर — वह रीतिगत पश्चात्ताप नहीं जिसकी वे ऊँचे स्वर में प्रशंसा करते हैं, वरन् हृदय का वह भीतरी पश्चात्ताप जिसके द्वारा सम्पूर्ण मनुष्य परमेश्वर की ओर फिरता है — यह समझता है कि संस्कारों का उचित ग्रहण किसी प्रकार की बनावटी भक्ति में है, जैसा कि वे कहते हैं। परन्तु यदि हम इस पर सहमत होते कि वैध तैयारी किसे कहते हैं, तो फिर उनकी प्रभावकारिता के विषय में कोई और विवाद न रहता। क्योंकि इसमें किसे सन्देह है कि परमेश्वर जिस अनुग्रह की प्रतिज्ञा करता है, वह उन्हें दिया जाता है जो उचित रीति से निकट आते हैं? इसलिए संस्कारों के शुद्ध प्रयोग में जिसे थोड़ी भी शिक्षा मिली है, वह यह देख लेगा कि जब वे कहते हैं कि जहाँ तक परमेश्वर का सम्बन्ध है, अनुग्रह दिया ही जाता है, क्योंकि मनुष्य की अयोग्यता जैसी भी हो, परमेश्वर को तो सदा सच्चा ही रहना है, तब वे एक बेतुका भेद करते हैं। अतः परमेश्वर की ओर से संस्कारों की प्रभावकारिता में से कुछ भी रोका या घटाया नहीं जाता, चाहे मनुष्य के बुरे विवेक के कारण उनका अपवित्र किया जाना कितना ही अशोभनीय क्यों न हो। केवल प्रभाव ही खो जाता है, या कम से कम हम तक पहुँचने से रोक दिया जाता है।
कैनन 8.
यहाँ तो वे अपनी अभक्ति को न केवल और स्पष्टता से, वरन् और भोंडेपन से भी प्रकट करते हैं। ओपुस ओपेराटुम की कल्पना हाल की है, और उन अनपढ़ भिक्षुओं की गढ़ी हुई है जिन्होंने संस्कारों के स्वभाव के विषय में कभी कुछ सीखा ही नहीं। क्योंकि संस्कारों में वास्तव में परमेश्वर ही अकेला कार्य करता है; मनुष्य अपनी ओर से कुछ नहीं लाते, वरन् उन्हें दिए जानेवाले अनुग्रह को ग्रहण करने के लिए निकट आते हैं। इस प्रकार बपतिस्मा में परमेश्वर हमें अपने पुत्र के लहू से धोता है, और अपने आत्मा के द्वारा हमें नया जन्म देता है; प्रभु-भोज में वह हमें मसीह के शरीर और लहू से पोषित करता है। जब सारा कार्य अनुग्रह का ही प्रतीत होता है, तब मनुष्य निन्दा किए बिना उसके किस भाग पर अपना दावा कर सकता है? सेवा-कार्य का मनुष्यों को सौंपा जाना परमेश्वर के कार्य की महिमा को उतना ही कम करता है जितना हाथ कारीगर की महिमा को कम करता है, क्योंकि परमेश्वर ही उनके द्वारा कार्य करता है और सब कुछ वही पूरा करता है। परन्तु वे मूढ़, इस बात को छोड़ भी दें कि वे परमेश्वर के मुफ़्त दानों में मानवीय योग्यता खोज निकालते हैं, यह दिखावा करते हैं कि कुछ न करते हुए भी हम परमेश्वर से योग्यता अर्जित करते हैं और उसे अपना ऋणी ठहराते हैं; और इतने से भी सन्तुष्ट न होकर, परमेश्वर से यह स्वीकार करवाने के लिए कि संस्कारों में वह अकेला कार्य करनेवाला नहीं माना जाना चाहिए, भयंकर शब्द उगलते हैं — अतः उनका अतिरिक्त निष्कर्ष अनिवार्यतः यह निकलता है कि अनुग्रह केवल विश्वास से नहीं पाया जाता। क्योंकि यदि हम उनकी यह मान्यता स्वीकार कर लें कि संस्कारों में अनुग्रह ओपेरे ओपेराटो अर्थात् क्रिया के सम्पन्न होने मात्र से प्राप्त होता है, तो योग्यता का एक भाग विश्वास से अलग हो जाता है, और संस्कारों का प्रयोग अपने आप में उद्धार के लिए प्रभावकारी ठहरता है। परन्तु यदि संस्कारों के विषय में वही कहा जाए जो वचन के विषय में कहा जाता है, तो प्रेरित गवाह है कि जब तक वे विश्वास से ग्रहण न किए जाएँ, वे किसी काम के नहीं।
कैनन 9.
उनकी अमिट छाप की कथा उसी भट्ठी की उपज है। प्राचीन कलीसिया को वह बिलकुल अज्ञात थी, और वह सुसमाचार की खरी शिक्षा की अपेक्षा जादुई मन्त्रों के अधिक योग्य है! इसलिए उसे उतनी ही सरलता से ठुकरा दिया जाएगा जितनी सरलता से वह गढ़ी गई थी। भक्त जन इस पर पर्याप्त सहमत हैं कि बपतिस्मा दोहराया नहीं जाना चाहिए। जो बात बपतिस्मा के विषय में सच थी, उसे उन्होंने बाद में उतावलेपन से अपने दृढ़ीकरण और पदाभिषेक पर लागू कर दिया। जिज्ञासुओं ने कारण ढूँढ़ा। इसलिए कि वे कुछ न कहते हुए न दिखें, उन्होंने यह काल्पनिक छाप गढ़ ली, और अब उन सब पर शाप की घोषणा करते हैं जो उनकी इस कल्पना से सहमत नहीं होते।
कैनन 10.
कोई भी खरा मसीही वचन और संस्कारों की सेवा में सब मनुष्यों को बराबर नहीं ठहराता, न केवल इसलिए कि कलीसिया में सब कुछ शालीनता और क्रम से होना चाहिए, वरन् इसलिए भी कि मसीह की विशेष आज्ञा से सेवक इसी उद्देश्य से नियुक्त किए जाते हैं। इसलिए, जब विशेष बुलाहट आवश्यक है, तब जो बुलाया नहीं गया वह इस सम्मान को अपने ऊपर नहीं ले सकता। इसके अतिरिक्त, जैसा कि वे स्त्रियों को करने की अनुमति देते हैं, बपतिस्मा देने का कार्य स्त्रियों को सौंपा जाना उन्हें कहाँ लिखा मिला?
कैनन 11.
जिस उदारता से वे अपने शाप उण्डेलते हैं, वह दिखाती है कि वे उनका मूल्य बहुत कम आँकते हैं। प्रतिष्ठा-विधि के “अभिप्राय” की उनकी बकवास सोफिस्टों ने बिना किसी तर्क के गढ़ी थी। यद्यपि यह असहनीय है, फिर भी यह उतनी कष्टदायक न होती, यदि यह उस सारी ठोस सान्त्वना को जड़ से न उखाड़ देती जो विश्वासियों को संस्कारों में प्राप्त है, और परमेश्वर के सत्य को मनुष्य की इच्छा पर न लटका देती; क्योंकि यदि सेवक का अभिप्राय आवश्यक है, तो हम में से कोई भी अपने बपतिस्मा के विषय में निश्चित नहीं हो सकता — कोई भी पवित्र प्रभु-भोज के निकट पक्के भरोसे से नहीं आ सकता। मेरा बपतिस्मा हुआ — यदि याजक को ऐसा ही अच्छा लगा हो, जिसकी सच्चाई मुझे किसी हब्शी की सच्चाई से अधिक ज्ञात नहीं है! प्रभु-भोज में मसीह की प्रतिज्ञा मेरे लिए खरी उतरेगी या नहीं, यह एक ऐसे मनुष्य के संकेत पर निर्भर है जिसे मैं जानता तक नहीं। वह कैसा विश्वास होगा जो किसी दूसरे की गुप्त इच्छा पर निर्भर हो? फिर भी यह झुण्ड हमें हवाई शापों की धमकी देने से नहीं डरता, यदि हम तुरन्त ऐसी निन्दाओं पर हस्ताक्षर न कर दें। मसीह की पवित्र विधि के प्रति मेरा आदर ऐसा है कि यदि कोई सुखवादी, जो पूरे अनुष्ठान पर भीतर ही भीतर हँस रहा हो, मसीह की आज्ञा और उसके दिए नियम के अनुसार और उचित रीति से मुझे प्रभु-भोज दे, तो मुझे सन्देह नहीं होगा कि उसके हाथ से बढ़ाई गई रोटी और कटोरा मेरे लिए मसीह की देह और लहू की प्रतिज्ञा-वस्तुएँ हैं। ऐसी मूर्खता पर विचार करना कष्टदायक है, जैसे जब वे कहते हैं, “कम से कम वही करने का, जो कलीसिया करती है।” यहाँ वे अपने स्वामियों के अन्य आदेशों तक पहुँचते हैं। जिसके आँखें हैं, वह कौन नहीं देखता कि यह एक ही शब्द में उस सब कुछ का आदेश देने के बराबर है जो भिक्षुओं ने अपनी कोठरियों में स्वप्न देखा या सोफिस्टों ने अपने झगड़ों में बकबक की? वे चाहे कितने ही मूर्खतापूर्ण और बेतुके क्यों न हों, फिर भी उन्हें दृढ़ और निश्चित बनाए रखना है।
कैनन 12.
आमीन।
कैनन 13.
कलीसिया की “स्वीकृत और मान्य रीतियों” से उनका क्या तात्पर्य है, यह सब जानते हैं। इसलिए इस सावधानी-वाक्य के द्वारा वे उन सब अन्धविश्वासों को स्थापित कर देते हैं जो मानवीय दुःसाहस ने प्रभु की शुद्ध विधियों के ऊपर लाद दिए हैं। यदि हम देखें कि प्रभु ने क्या आज्ञा दी है, तो बपतिस्मा की सच्ची रीति सरल है, और प्रभु-भोज का संचालन भी सरल है। परन्तु कितने, और कैसे-कैसे परस्पर-विरोधी जोड़ों के नीचे यह सरलता दब गई है! वे कहेंगे कि यदि कोई अति है तो उसे हटाना उचित है — परन्तु केवल तब, जब उन्हें ऐसा लगे। परन्तु जब वे बाक्कुस के उन्माद से, किसी भी ऐसे व्यक्ति पर जो एक छोटी-सी रीति को छोड़ने की छूट अपने को देता है, अपने शाप उगलते हैं, तब वे हमें कौन-सी आशा दिलाते हैं? सब भक्त जन शिकायत करते हैं, या कम से कम खेद करते हैं कि बपतिस्मा में अभिषेक-तेल, मोमबत्ती, नमक और अन्ततः थूक को उस जल-स्नान से अधिक महत्त्व दिया जाता है जिसमें बपतिस्मा की सारी सम्पूर्णता निहित है। वे विलाप करते हैं कि प्रभु-भोज न केवल अशुद्ध जोड़ों से बिगाड़ा गया है, वरन् एक प्रकार के नकली तमाशे में बदल दिया गया है। ट्रेंट के पिताओं के अनुसार, कोई भी बात इतनी भयंकर नहीं हो सकती जितनी यह कि कैथोलिक कलीसिया की स्वीकृत रीतियों के बीच उसे स्थान न मिले। अगस्तीन ने अपने समय में भी शिकायत की थी कि कलीसिया यहूदी दासता के बोझ से दबी है, यद्यपि तब प्रचलित रीतियाँ उन रीतियों का दसवाँ भाग भी मुश्किल से थीं जिनका पालन अब किसी भी मानवीय या ईश्वरीय व्यवस्था के पालन से अधिक कठोरता से माँगा जाता है। ट्रेंट के लोग विचार-विमर्श करते हैं कि क्या किया जाए, और फिर, राहत की कोई आशा दिए बिना, उन सब पर जो निर्धारित रीतियों के एक-एक अंश को स्वीकार नहीं करते, श्राप और कोसने बरसा देते हैं!
बपतिस्मा-विषयक कैनन का प्रतिकारक।
कैनन 1.
निश्चय ही यह निर्णय करने योग्य बड़ी बात है कि जब शिक्षा वही है, प्रस्तुत अनुग्रह वही है, और पालन की जानेवाली रीतियाँ वही हैं, तब समानता है। यदि इन तीनों बातों में मसीह का बपतिस्मा यूहन्ना के बपतिस्मा से किसी भी बात में भिन्न है, तो मैं मान लूँगा कि उन्होंने बाज़ी जीत ली; परन्तु यदि ये सब दोनों में समान हैं, तो वे व्यर्थ ही अपना पित्त उगलते हैं। कोई भी शान्त चित्तवाला व्यक्ति नहीं डरेगा। यदि उन्होंने सोचा होता कि निर्णय तर्क से होना है, तो वे कहीं अधिक संयमी होते।
कैनन 2.
वे पहले विषय पर प्रश्न क्यों उठाते हैं, यह मैं नहीं जानता, जब तक कि सम्भवतः सोरबोनवादियों की ओछी बारीकियों को रोकने में बुद्धिमान बनने की उनकी यही एक रीति न हो। परन्तु जो उनसे किसी एक अंश की व्याख्या में मतभेद रखते हैं, उन सब पर गर्जन करने में वे बहुत उतावले हैं, विशेषकर तब जब कोई प्राचीन लेखक उद्धृत नहीं किया जा सकता जिसने इन शब्दों को, “जब तक कि मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे,” रूपक के अर्थ में लिया हो। परन्तु जैसा मैंने आरम्भ में कहा, जब उनके पास कोसनों का इतना भरा-पूरा भण्डार है, तब यदि वे उन्हें उदारता से बाँटते हैं तो आश्चर्य की बात नहीं।
कैनन 3.
उन्होंने इसी से आरम्भ क्यों नहीं किया, क्योंकि इसे नींव बनाकर वे चाहे जो ढाँचा खड़ा कर सकते थे? क्योंकि यदि वे जो कुछ सिखाते हैं सब सच है, तो हम अब भी क्यों लड़ रहे हैं? परन्तु हमारी रचनाएँ स्पष्ट दिखाती हैं कि बपतिस्मा की उनकी सारी शिक्षा कुछ अंश में खण्डित है और कुछ अंश में दूषित। अब, जब वे हमारे तर्कों का खण्डन नहीं कर सकते, तब शाप की चमक के नीचे छिप जाने की सोचना व्यर्थ है! जब वे रोम को गर्व से सब कलीसियाओं की माता और साक्षी कहते हैं, तो यह कैसा ढीठपन है? क्या उसने मसीह में यूनानी और पूर्वी कलीसियाओं को जन्म दिया, जिनसे तो वह स्वयं जन्मी है? उसकी कौन-सी शिक्षा उन अन्य कलीसियाओं तक पहुँच सकती थी जिनके अध्यक्ष कहीं अधिक विद्वान थे? वे अपने सब सबसे प्रतिष्ठित पुरुषों को सामने लाएँ जो उनके यहाँ कभी हुए हैं; क्या वे सारी सूची में से एक को भी सिप्रियन, या अम्ब्रोस, या अगस्तीन के बराबर दिखा सकेंगे?
कैनन 4.
सेवक क्या करने का अभिप्राय रखता है, इसका हमारे लिए बहुत कम महत्त्व है, बशर्ते कि कार्य स्वयं शिक्षा और रीति दोनों में मसीह की सच्ची विधि के अनुरूप हो। इसलिए हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है कि हमारा बपतिस्मा पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से हुआ, चाहे हमें बपतिस्मा देनेवालों की अज्ञानता या अभक्ति कैसी भी रही हो। मनुष्य तो केवल हाथ है; सच्चे और यथार्थ रूप में बपतिस्मा देनेवाला मसीह ही है।
कैनन 5.
ताकि अनजान लोग धोखा न खाएँ, हमें उन्हें बताना चाहिए कि जिस अर्थ में रोमवादी “आवश्यक” शब्द का प्रयोग करते हैं, उसमें “स्वतन्त्र” और “आवश्यक” के बीच एक मध्य स्थान है। हम भी मानते हैं कि बपतिस्मा का प्रयोग आवश्यक है, ताकि कोई भी उसे लापरवाही या तिरस्कार के कारण न छोड़े। इस अर्थ में हम उसे किसी प्रकार भी ऐच्छिक नहीं बनाते। और हम विश्वासियों को उसके पालन के लिए कड़ाई से बाँधते ही नहीं, वरन् यह भी मानते हैं कि वह हमें धोने और नया बनाने में, संक्षेप में हमें उद्धार पहुँचाने में, परमेश्वर का सामान्य साधन है। हम केवल यह अपवाद रखते हैं कि परमेश्वर के हाथ को साधन से बाँधा नहीं जाना चाहिए। वह स्वयं ही उद्धार सम्पन्न कर सकता है। क्योंकि जब बपतिस्मा का अवसर नहीं मिलता, तब अकेली परमेश्वर की प्रतिज्ञा ही पर्याप्त से कहीं अधिक है। परन्तु इस विषय में पिछले अधिवेशन में कुछ कहा जा चुका है।
कैनन 6.
जिस विरोधाभास की वे निन्दा करते हैं, उसे हम भी ठुकराते हैं, चाहे केवल इसी एक कारण से कि वह विश्वास के जीवन को बुझा देता है।
कैनन 7.
यदि वे समझते कि मसीह की व्यवस्था क्या है, तो शेष बातों में वे बिना कठिनाई के सहमत हो जाते; परन्तु जिस रीति से वे मसीह की व्यवस्था के विषय में बोलने के आदी हैं, उससे वे इसी एक बात में दिखा देते हैं कि वे बपतिस्मा के सच्चे ज्ञान से कितनी दूर हैं। और मैं यह भी नहीं भूला हूँ कि उन्हें किस बात ने भटकाया है। क्योंकि जैसे पौलुस सिखाता है कि खतने के द्वारा मनुष्य मूसा की व्यवस्था का पालन करने के लिए बँध जाता था, (गलातियों 5:30) वैसे ही वे बपतिस्मा में मसीह की व्यवस्था के सम्बन्ध में वैसा ही बन्धन ठहराते हैं। और यह तुलना ठीक बैठती यदि वे, यों कहें, देहरी पर ही ठोकर न खाते: क्योंकि वे यह सोचकर बहुत भूल करते हैं कि पौलुस वहाँ खतने के प्रयोग के विषय में बोल रहा है, न कि उसके दुरुपयोग के विषय में। क्योंकि यदि सब खतना किए हुए लोग सारी व्यवस्था का पालन करने के ऋणी थे, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि वे श्राप के भागी थे। परन्तु पौलुस तो बहुत भिन्न बात सिखाता है जब वह खतने को विश्वास की धार्मिकता की मुहर कहता है। (रोमियों 4:11।) जो लोग कर्म को पुण्यदायक ठहराने का दिखावा करते थे, वे व्यवस्था-पालन का दावा करते थे। आज हमारे लिए बपतिस्मा क्या है? यद्यपि वह हमारे और परमेश्वर के बीच पारस्परिक बन्धन का एक अनुबन्ध है, फिर भी उसकी यह विशेषता है कि वह हमें पापों की मुफ़्त क्षमा और गोद लिए जाने के सतत वरदान का निश्चय दिलाता है। यह ट्रेंट के कथन के उतना ही विपरीत है जितनी स्वतन्त्रता दासता के विपरीत है।
कैनन 8.
याकूब कहता है कि व्यवस्था देनेवाला एक ही है, जो बचाने और नष्ट करने में समर्थ है। जब वे यह दिखा दें कि यह झूठ है, तब हम उनकी व्यवस्थाओं से अपने को बाँधने से इनकार नहीं करेंगे। परन्तु जब तक यह प्रकट रहे कि परमेश्वर ने भक्तों के विवेक को अपने वचन के शासन में ले लिया है और इसे अपना अधिकार ठहराता है, तब तक हम निश्चिन्त होकर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ऐसी कोई पवित्र कलीसिया नहीं जो अन्य व्यवस्थाओं से विवेक को जकड़ने का प्रयास करे।
कैनन 9.
सबसे पहले यह निर्धारित करना चाहिए था कि वैध मन्नतें कौन-सी हैं। यह ठहर जाता तो बहुत थोड़ा या कोई विवाद न रहता। परन्तु अब तो जिन मन्नतों के अधीन अभागी आत्माओं को रखा जाता है, या कहें कि गला घोंटा जाता है, वे न केवल अन्धविश्वास से भरी हैं, वरन् मसीही जीवन के सही नियम से सर्वथा विपरीत हैं। इसलिए, किसी मन्नत को बाध्यकारी बनाने के लिए उसकी माँग बपतिस्मा के अंगीकार के समय की जानी चाहिए। यदि ऐसा है, तो आज पोप-तन्त्र में प्रचलित मन्नतों में से एक भी ऐसी नहीं जो अमान्य न ठहरे।
कैनन 10.
जो मानते हैं कि पाप केवल बपतिस्मा के स्मरण से मिट जाते हैं, उनका अर्थ नग्न या ठण्डा स्मरण नहीं, वरन् ऐसा स्मरण है जो विश्वास और पश्चात्ताप से जुड़ा हो। बपतिस्मा का मुख्य दृष्टिकोण भी ऐसा ही है। क्योंकि हमें केवल जल के छिड़काव की ओर ही नहीं, वरन् उस आत्मिक वास्तविकता की ओर भी अपना ध्यान लगाना चाहिए जो, जैसा पतरस कहता है, यीशु मसीह के पुनरुत्थान के द्वारा शुद्ध विवेक का भरोसा उत्पन्न करती है। (1 पतरस 3:21।) मैं कहता हूँ कि ऐसा स्मरण पापों को केवल क्षम्य ही नहीं बनाता, वरन् उन्हें सर्वथा मिटा देता है। जब भी प्रश्न पापों की क्षमा का हो, हमें बपतिस्मा की ओर भागना चाहिए, और उसी से क्षमा की पुष्टि चाहनी चाहिए। क्योंकि जैसे परमेश्वर सुसमाचार की दैनिक प्रतिज्ञाओं के द्वारा हमें अपने साथ मिलाता है, वैसे ही इस मेल-मिलाप का विश्वास और निश्चय, जो जीवन के अन्त तक प्रतिदिन दोहराया जाता है, वह बपतिस्मा के द्वारा हमारे लिए मुहरबन्द करता है। हमारा बपतिस्मा तो एक ही बार हुआ, परन्तु मसीह में क्षमा और मुफ़्त प्रायश्चित्त की एक निरन्तर गवाही बनी रहती है।
माननीय पिता क्या कहते हैं? सोफिस्टों के घिसे-पिटे प्रलापों के आधार पर वे बपतिस्मा की प्रतिज्ञाओं को केवल बीते हुए समय तक सीमित कर देते हैं, और जिस क्षण कोई पाप कर बैठे, बपतिस्मा की सारी स्मृति को दफ़ना कर उसे प्रायश्चित्त के काल्पनिक संस्कार में विश्राम करने का आदेश देते हैं — मानो बपतिस्मा स्वयं प्रायश्चित्त का उचित संस्कार न हो। और फिर भी वे डींग मारेंगे कि बपतिस्मा के विषय में उनकी शिक्षा खरी है, जबकि वे उसकी सारी शक्ति को अनुग्रह की एक क्षणिक और लुप्त हो जानेवाली प्रतिज्ञा में समेट देते हैं।
अगले तीन विषयों पर मैं अनिच्छा से नहीं, वरन् सहर्ष हस्ताक्षर करता हूँ। चौथे पर मैं उनसे यहाँ तक सहमत हूँ, परन्तु चाहूँगा कि मेरे पाठक देखें कि उन्होंने शापों की कैसी बाढ़ उण्डेल दी है। जिसे वे अस्वीकार करते हैं, वह सम्भवतः किसी अवसर पर बिना बहुत सोचे इरैस्मस के मुँह से निकल गया था। इसे मैं अस्वीकार नहीं करता, फिर भी एक सहृदय व्याख्याकार केवल शब्दों में कुछ सुधार चाहेगा, और यह निष्कर्ष निकालेगा कि उनके लेखक को कलीसिया के संचालन का पूरा अनुभव नहीं था। कोई भी न्यायप्रिय और संयमी मनुष्य तुरन्त शाप के आतंक की ओर नहीं दौड़ेगा।
दृढ़ीकरण-विषयक कैनन का प्रतिकारक।
कैनन 1.
चूँकि इस शाप की दो धारें हैं, इसलिए पहली धार से कटने से बचने के लिए मैं तुरन्त घोषणा करता हूँ कि मैं निश्चय ही उनमें से नहीं हूँ जो समझते हैं कि रोमी पोप-तन्त्र के अधीन जिस रूप में दृढ़ीकरण का पालन किया जाता है, वह एक निकम्मी रीति है, क्योंकि मैं तो उसे शैतान की सबसे घातक चालों में से एक मानता हूँ। आओ, स्मरण रखें कि यह कथित संस्कार पवित्रशास्त्र में कहीं भी न इस नाम से, न इस अनुष्ठान से, न इस अर्थ से अनुशंसित है। अब आओ सुनें कि वे अपनी इस कल्पना को किन उपाधियों से सजाते हैं। पोप मेल्कियादेस के नाम से (De Consecrat. Dist. 5) वे घोषणा करते हैं कि आत्मा बपतिस्मा में निर्दोषता के लिए दिया जाता है, और दृढ़ीकरण में अनुग्रह की वृद्धि के लिए — कि जो तुरन्त मरनेवाले थे उनके लिए बपतिस्मा पर्याप्त है, परन्तु दृढ़ीकरण के द्वारा वे लोग जिन्हें विजयी होना है इस प्रकार शस्त्र-सज्जित किए जाते हैं कि संघर्ष को सह सकें। इस प्रकार बपतिस्मा की प्रभावकारिता का आधा भाग काट दिया जाता है, मानो यह व्यर्थ ही कहा गया हो कि बपतिस्मा में पुराना मनुष्यत्व इसलिए क्रूस पर चढ़ाया गया कि हम नए जीवन की सी चाल चलें। (रोमियों 6:6।) वे इसके अतिरिक्त यह भी जोड़ते हैं कि यद्यपि दोनों में से कोई भी दूसरे के बिना सिद्ध नहीं, फिर भी दृढ़ीकरण को बपतिस्मा से अधिक श्रद्धा की दृष्टि से देखना चाहिए। क्योंकि ऑरेलियम की महासभा का एक आदेश है कि जिसका अध्यक्षीय अभिषेक नहीं हुआ, उसे मसीही न गिना जाए। ये शब्द तो बच्चों को खेल-खेल में सुनाने योग्य हैं। ऐसा अपवित्र कर्म, जो घृणित निन्दा से भरा है, निकम्मी रीति से निश्चय ही बहुत भिन्न है।
इस विषय की दूसरी शाखा के विषय में मैं क्या कहूँ, सिवाय इसके कि अपने शापों के प्रभाव के विषय में उनका विचार कम नहीं है: वे उन्हें ऐसी सहजता से उण्डेलते हैं मानो सोचते हों कि वे अभी काले को सफ़ेद कर देंगे। परन्तु सच्चाई यह है कि उस विस्मय से, या कहें उस जड़ता से, जिसके साथ उन्होंने अपने रहस्यों को अब तक साधारण जन से देखा जाते हुए देखा है, उन्होंने कल्पना कर ली है कि उनकी सारी बकवास भी वैसे ही ग्रहण की जाएगी। इसी से उनका यह अत्यधिक आत्मविश्वास है। वे कभी अपनी बेतुकी बातों को निपट गँवार किसान के निर्णय के सामने रखने का साहस न करते, यदि उन्हें यह आशा न होती कि महासभा का मुखौटा सबकी आँखों में धूल झोंक देगा।
कैनन 2.
प्रश्न यह है कि क्या तेल, उस क्षण के बाद जब उन्होंने उसे अभिषेक-तेल कहना चाहा, मनुष्य की इच्छा से आत्मा की कोई नई और गुप्त शक्ति पा लेता है? किसी भी प्राचीन मसीही लेखक ने तेल का उल्लेख नहीं किया, वरन् मध्य युग के किसी भी लेखक ने नहीं किया, जिसमें अनेक भ्रम फैले हुए थे। इसलिए वे जो चाहें करें, इससे इनकार करके वे कुछ न पाएँगे कि जब वे परमेश्वर के आत्मा की शक्ति को घिनौने तेल में आरोपित करते हैं तब वे उसका अपमान करते हैं।
कैनन 3.
सच है कि सींगवाला और मुकुटधारी झुण्ड ऐसे विशेषाधिकार के योग्य है। क्योंकि वे और कर ही क्या सकते थे, जब वे अध्यक्षीय कार्य करने के उतने ही अयोग्य हैं जितने सूअर गाने के? सच कहूँ तो मैं उनसे ईर्ष्या नहीं करता; वे बस अपनी अशुद्धताओं को अपनी मदिरालयों तक सीमित रखें, और उन्हें परमेश्वर की कलीसिया से बाहर रखें। परन्तु वे यह कैसे सिद्ध करेंगे कि यह कार्य दूसरे याजकों की अपेक्षा अध्यक्षों के अधिक योग्य है, सिवाय इसके कि कुछ अज्ञात लेखकों को ऐसा अच्छा लगा हो? यदि पवित्रशास्त्र से कारण खोजा जाए, तो सब मानते हैं कि वह अध्यक्ष और प्राचीन में कोई भेद नहीं करता। फिर पौलुस को आज्ञा दी जाती है कि वह हनन्याह से, जो चेलों में से एक था, हाथ रखवाए। (प्रेरितों के काम 9:17।) यदि हाथ रखना ही उनका दृढ़ीकरण है, तो वे परमेश्वर पर क्रम-भंग का, और प्राचीन तथा अध्यक्ष को एक में मिलाकर रहस्य को अपवित्र करने का आरोप क्यों नहीं लगाते? संक्षेप में, उनकी शिक्षा को या तो परमेश्वर की व्यवस्था का समर्थन प्राप्त है या मानवीय आदेश का। यदि परमेश्वर की व्यवस्था का, तो वे उसे तोड़ने से क्यों नहीं डरते? क्योंकि वे प्राचीनों को असाधारण अवसरों पर दृढ़ीकरण करने का अधिकार देते हैं। जब वे एक मानवीय आदेश के पक्ष में इस प्रकार गरज रहे हैं, तो कौन डरेगा?
निवास-विषयक आगामी कैनन का प्रतिकारक।
मैं कभी-कभी आश्चर्य करता हूँ कि सुसमाचार के ऐसे प्रकाश में भी वे वैसे ही बेतुके कैसे बने हुए हैं जैसे वे घने अन्धकार में हुआ करते थे। परन्तु मैं तुरन्त परमेश्वर के उस अद्भुत न्याय पर विचार करने लगता हूँ जिसके कारण निश्चित है कि वे ऐसे अन्धे और जड़ हो गए हैं कि दृष्टि और संवेदना दोनों खोकर वे सारी लज्जा त्याग बैठे हैं और अपनी ही लज्जा पर निर्लज्जता से घमण्ड करते हैं। जब से कलीसिया के वे प्रबन्ध, जो बहुत पहले पासबानों के भरण-पोषण के लिए ठहराए गए थे, निठल्ले लोगों की आय बनने लगे हैं, और कलीसिया के व्यय से पलनेवाले लोग सोचते हैं कि उन पर कोई दायित्व नहीं, तब से वे दावा करते हैं कि उन्होंने इस बड़े अन्याय के सुधार के लिए अपने को तैयार कर लिया है। जब वे विषय में उतरते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे कुछ कह रहे हैं। जहाँ भ्रष्टता इतनी बेलगाम है, वहाँ मैं मानता हूँ कि यह छोटी बात नहीं कि दो अध्यक्ष-पद एक ही मनुष्य के पास न रहें। और इसी प्रकार की अन्य बातें भी हैं, जो उस स्वेच्छाचार पर लगाम लगाने के लिए बनाई गई हैं जो अब खुला घूम रहा है, यद्यपि अपने किसी भी सुधार-प्रयास में वे, मैं यह नहीं कहता कि उस आदिम और कठोर अनुशासन से, जो एक हज़ार वर्ष पहले फल-फूल रहा था, वरन् भक्तिपूर्ण और सुव्यवस्थित शासन की किसी भी सहनीय अवस्था से बहुत दूर हैं। वे अध्यक्ष को अपने धर्मप्रान्त से आधे वर्ष से अधिक अनुपस्थित रहने से रोकते हैं। यह छुट्टी काफ़ी उदार है, जो उन लोगों को बारह में से छः महीने की छुट्टी देती है जिन्हें दिन और रात निरन्तर झुण्ड की रखवाली करनी चाहिए। परन्तु यहाँ भी एक आरक्षण जोड़ दिया गया है — जब तक कि उनके पास अनुपस्थित रहने का कोई उचित बहाना न हो। वे ऐसे बहाने से कब रहित होंगे? और फिर भी, मान लें कि वे यहाँ निर्धारित बात का अत्यन्त कठोरता से पालन करते हैं, तो क्या लाभ होगा, सिवाय इसके कि सम्भवतः वे उस पद से मिलनेवाला सारा धन ज़िले से बाहर न ले जा सकेंगे? यदि वे नगर को चाहते हैं तो उनके महल होंगे जहाँ, सारे कोलाहल से दूर, वे पहले की तरह पीएँगे, जुआ खेलेंगे और सोएँगे; यदि वे देहात को पसन्द करते हैं तो उनकी जागीरों और गढ़ों में सुहावने विश्राम-स्थल होंगे। इस प्रकार वे कुछ न करते हुए भी अपना कार्य पूरा करेंगे और फिर भी वास्तविक निवास भी दिखाएँगे।
जहाँ तक पल्लियों का सम्बन्ध है, वे पाठशालाओं के विशेषाधिकारों की पुष्टि करते हैं, ताकि अध्ययन का बहाना अनुपस्थिति को क्षम्य ठहरा दे। इस बीच, जब वह युवा और कच्चा नौसिखिया पासबान का अभिनय करना सीखता है, तब भी वह उस झुण्ड का दूध दुहता रहेगा जो बिना पासबान के छोड़ दिया जाएगा। मान लें कि इसे सहा जा सकता है, तो भी कौन नहीं जानता कि पाठशालाओं के विशेषाधिकारों का आनन्द केवल आलसी रसोइए ही उठाते हैं? परिणाम यह होगा कि अभागी कलीसियाओं को दो भेड़िए पालने पड़ेंगे, एक घर में और एक बाहर। de non promovendo की छूटों को भविष्य में एक वर्ष से अधिक प्रभावी न करने का संकल्प, मैं चतुराई से अनुमान लगाता हूँ, उन्हीं के सुझाव पर लिया गया जो ये छूटें देते हैं। क्योंकि यदि हर वर्ष नया विशेषाधिकार खरीदना पड़े तो उनके लाभ में कितनी वृद्धि हो जाएगी! संक्षेप में, उनकी एकमात्र चिन्ता यह प्रतीत होती है कि सार्वभौमिक अव्यवस्था की दशा में न्याय का कोई दिखावा बना रहे।
परन्तु यदि उनके नियम एक-एक मात्रा तक भी सिद्ध होते, तो भी भले लोग किसी बेहतर स्थिति की सम्भावना पर अपने को बधाई नहीं दे सकते थे। क्योंकि कोई भी व्यवस्था बनाने से पहले वे सब व्यवस्थाओं को एक ही शब्द में एक साथ रद्द कर देते हैं, या कम से कम ऐसी विधि बता देते हैं जिससे वे सब रद्द की जा सकें: क्योंकि वे प्रतिज्ञा करते हैं कि जो कुछ वे कहें उसमें से कुछ भी प्रेरितीय पीठ को अपने अधिकार को अक्षुण्ण बनाए रखने से नहीं रोकेगा। अब कोई अपने मन में विचार करे कि उस अधिकार की सीमाएँ क्या हैं, या वह कहाँ तक फैला है। क्या इस प्रकार की भूमिका का यही अर्थ नहीं कि पोप जो चाहें उसे वैध ठहराने का आदेश दे सकते हैं? ऐसा करके वे क्या उपचार लाते हैं? जिन बातों को सुधारने का वे बीड़ा उठाते हैं, उनमें से किसी का भी अब तक सामान्य कानून के द्वारा अनुमत बात के रूप में पालन नहीं हुआ, वरन् जो कानूनों द्वारा निषिद्ध था वह छूटों के द्वारा बिना दण्ड के किया जाता रहा। इसलिए दुरुपयोग करनेवाले कभी यह नहीं कहते थे कि वे कड़े नियम का पालन करते हैं, वरन् व्यवस्था से मुक्त किए जाने पर वे सोचते थे कि जो अपने आप में अन्यथा वैध न होता वह भी वे कर सकते हैं। अब नेप्च्यून के पिता प्रावधान करते हैं कि भविष्य कुछ बेहतर न हो, यह विशेष शर्त रखकर कि रोमी दरबार की शक्ति में कोई कमी न आए। क्योंकि चाहे व्यवस्थाओं की हज़ार गाँठें बाँध दी जाएँ, सिकन्दर की तलवार उन सबको एक साथ काटने के लिए म्यान से बाहर है। क्या वे मसीही जगत का इससे अधिक खुला उपहास कर सकते थे? उपहास क्यों कहूँ? क्या वे भले लोगों की आशा का इससे अधिक भोंडा अपमान कर सकते थे, जब वे इतने स्पष्ट रूप से, और बर्बर अहंकार के साथ, यह घोषित करते हैं कि वे पोप के निरंकुश अत्याचार की कोई सीमा नहीं बाँधेंगे?
पोप-तन्त्र के अधीन जीनेवाले सभी बुराइयों के प्रति इतने कठोर-हृदय हो गए हैं कि कहा जा सकता है कि इस एक विषय में वे अपनी दासता को भूल गए थे, मेरा तात्पर्य यह है कि उन्होंने न केवल खुलकर विलाप किया, वरन् ऊँचे स्वर में पुकारा कि कलीसिया छूटों के कारण बर्बाद हो गई है। सब की आँखें माननीय पिताओं की ओर लगी थीं, जो इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कठोर और उत्साही निरीक्षकों के समान बैठे थे। अठारह महीने सोच-विचार करने के बाद वे घोषणा करते हैं कि वे प्राचीन अनुशासन का अनुमोदन करते हैं, बशर्ते रोम की पीठ पहले की तरह छूट देने का अपना अधिकार बनाए रखे। दूसरे शब्दों में, कानूनों को इस सीमा तक लागू किया जाना है कि उन्हें तोड़ने की स्वतन्त्रता मुफ़्त न मिले, वरन् खरीदी जा सके। और ताकि पोप को लज्जा इस शक्ति का निर्भीकता से प्रयोग करने से रोक न सके, वे उसे सार्वभौमिक अध्यक्ष की उपाधि में दृढ़ करते हैं, जिसे ग्रेगोरी अधर्मी, निन्दात्मक, घृणित और मसीह-विरोधी का अग्रदूत कहता है, जबकि वे अध्यक्षों के लिए उसके प्रतिनिधि होने के सिवा और कुछ नहीं छोड़ते। वह समानता कहाँ है जिसकी घोषणा जेरोम करता है, जब वह रोम के अध्यक्ष की तुलना युगुबियुम के अध्यक्ष से करता है? (Hierom. ad Evag.) सिप्रियन की वह शिक्षा कहाँ है कि मसीह का अध्यक्ष-पद एक है, और उसका एक भाग प्रत्येक अध्यक्ष के पास सम्पूर्ण रूप से (in solidum) है? (Cyp. de Simplic. Prelat.) बर्नार्ड लिखता है कि उसके समय में यह एक सामान्य शिकायत थी कि कलीसियाएँ अंग-भंग और विकृत हो गई हैं, क्योंकि रोम का अध्यक्ष सारी शक्ति अपने पास खींचकर पदों को गड्डमड्ड कर देता है। (Bernard. de Consid. ad Eng. lib. 3.) इस बुराई को दूर करने के लिए पवित्र महासभा अध्यक्षों को पोप का प्रतिनिधि बनने का आदेश देती है।
मैं उनकी ढिठाई को उजागर करने में और समय नहीं लगाऊँगा। परन्तु चूँकि सब देखते हैं कि वे निराशाजनक से भी बदतर हैं, इसलिए प्रत्येक बुद्धिमान जन भविष्य में उनके आदेशों की उपेक्षा करेगा और उनके विषय में किसी सन्देह में नहीं रहेगा। निश्चय ही यह अत्यन्त वांछनीय होता कि जिन मतभेदों से कलीसिया अब विचलित है, वे किसी भक्त महासभा के अधिकार से सुलझाए जाते, परन्तु जैसी स्थिति है उसमें हम अभी इसकी आशा नहीं कर सकते। इसलिए, चूँकि कलीसियाएँ भयंकर रीति से बिखरी हुई हैं, और उन्हें एकत्र करने की कोई आशा मनुष्यों से नहीं दिखाई देती, इसलिए प्रत्येक के लिए इससे उत्तम और कुछ नहीं कि वह उस झण्डे के चारों ओर इकट्ठा होने को शीघ्रता करे जिसे परमेश्वर का पुत्र हमारे सामने उठाए हुए है। यह एक-दूसरे की प्रतीक्षा करने का समय नहीं है। जैसे ही कोई पवित्रशास्त्र का प्रकाश चमकता हुआ देखे, वह तुरन्त उसका अनुसरण करे। कलीसिया की सम्पूर्ण देह के विषय में हम उसे उसके प्रभु की देखभाल में सौंपते हैं। इस बीच, हम न तो आलसी हों और न निश्चिन्त। प्रत्येक अपना भरसक करे। परामर्श, विद्या और क्षमताओं में जो कुछ हम में है, उसे कलीसिया के खण्डहरों को बनाने में लगाएँ। परन्तु ऐसे निराशाजनक कार्यों में, हमें इस प्रतिज्ञा से सम्भाला और उत्साहित किया जाए कि, जब मनुष्यों में से कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जो पुरुषोचित और वीरोचित मन से इस कार्य को उठाए, तब प्रभु अपनी ही धार्मिकता से सज्जित होकर और अपनी ही भुजा के बल से स्वयं अकेला सब कुछ पूरा करेगा।
विषय-सूची
जॉन कैल्विन की ओर से भक्तिमान पाठक के नाम।
प्रेरितीय पीठ के प्रतिनिधियों की ओर से ट्रेंट की महासभा के पिताओं को चेतावनी और उपदेश। प्रतिकारक की कैल्विन-कृत भूमिका।
प्रथम अधिवेशन में प्रतिनिधियों के प्रारम्भिक भाषण और महासभा के अन्य आरम्भिक विषयों पर।
ट्रेंट की पवित्र महासभा के दूसरे अधिवेशन में प्रकाशित आदेश।
दूसरे अधिवेशन के आदेश पर।
ट्रेंट की महासभा के तीसरे अधिवेशन में प्रकाशित प्रथम आदेश।
तीसरे अधिवेशन के आदेश पर।
ट्रेंट की महासभा के चौथे अधिवेशन का प्रथम आदेश।
चौथे अधिवेशन का दूसरा आदेश।
चौथे अधिवेशन पर।
ट्रेंट की महासभा के पाँचवें अधिवेशन का प्रथम आदेश।
पाँचवें अधिवेशन का दूसरा आदेश।
पाँचवें अधिवेशन के प्रथम आदेश पर।
पाँचवें अधिवेशन के दूसरे आदेश पर।
ट्रेंट की महासभा का छठा अधिवेशन।
कैनन।
ट्रेंट की महासभा के छठे अधिवेशन पर।
ट्रेंट की महासभा के कैनन का प्रतिकारक। ट्रेंट की महासभा का सातवाँ अधिवेशन।
सातवें अधिवेशन का प्रतिकारक
