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चौथे अधिवेशन पर
एक पुरानी कहावत है—रोमी बैठे-बैठे जीतते हैं। इसी पर भरोसा करके रोमी पीठ के वे पतित और अवैध पुत्र, अर्थात् वह बड़ी वेश्या, तीसरा अधिवेशन ठहराते समय जीतने के लिए बैठ गए। क्योंकि यदि हम उन्हें वह सब दे दें जो उन्होंने एक ही आदेश में समेट लिया है, तो उन्हें विजय-स्तम्भ खड़ा करने और मनचाही विजय पाकर लौटने से कौन रोकेगा? इसके चार शीर्षक हैं: पहला, वे ठहराते हैं कि सिद्धान्त में हम केवल पवित्रशास्त्र पर खड़े न रहें, वरन् परम्परा से सौंपी हुई बातों पर भी। दूसरा, पवित्रशास्त्र की सूची बनाते समय वे सब पुस्तकों पर एक ही खड़िया से चिह्न लगाते हैं, और अपोक्रिफा को दूसरी पुस्तकों के समान पंक्ति में रखने का हठ करते हैं। तीसरा, अन्य सब अनुवादों को ठुकराकर वे केवल वल्गेट को रखते हैं, और उसे प्रामाणिक ठहराने का आदेश देते हैं। अन्त में, सब अस्पष्ट या सन्देहपूर्ण स्थलों में वे व्याख्या का ऐसा अधिकार जताते हैं जिसे चुनौती न दी जा सके। इन चार बातों के स्थापित हो जाने पर कौन इनकार कर सकता है कि युद्ध समाप्त हो गया? इसलिए उनकी आगे की चर्चाएँ किसी आवश्यकता से नहीं, वरन् दिखावे के लिए अधिक थीं; क्योंकि वे जो कुछ भी प्रस्तुत करें, यदि पवित्रशास्त्र के किसी अधिकार से उसका समर्थन न हो, तो वह परम्पराओं में गिना जाएगा, जिन्हें वे व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं के समान अधिकारवाली मानने का हठ करते हैं। तब किस बात को अस्वीकार करना अनुमत होगा? क्योंकि बुढ़ियों का ऐसा कोई मोटा स्वप्न नहीं जिसका बचाव वे इस बहाने से न कर सकें; वरन् कोई ऐसा अन्धविश्वास नहीं, चाहे वह कितना ही भयानक हो, जिसके आगे वे इसे अजैक्स की ढाल के समान खड़ा न कर सकें। इसमें यह भी जोड़ लो कि अपोक्रिफा पुस्तकों को पूर्ण अधिकार देकर वे अपने लिए नए सहारे जुटा लेते हैं। मक्काबियों की दूसरी पुस्तक से वे शुद्धिस्थान और सन्तों की आराधना सिद्ध करेंगे; तोबित से प्रायश्चित के कर्म, भूत-प्रेत भगाना, और न जाने क्या-क्या। सिराख की पुस्तक से वे कम नहीं उधार लेंगे। भला अपनी तलछट वे इससे अच्छी जगह से कहाँ खींच सकते थे? फिर भी मैं उनमें से नहीं जो उन पुस्तकों को पढ़ने को सर्वथा अस्वीकार करें; परन्तु उन्हें वह अधिकार देने में, जो उनके पास पहले कभी नहीं था, इसके सिवा और क्या उद्देश्य था कि अपनी भूलों को रंगने में नकली रंग का प्रयोग हो सके? परन्तु चूँकि इब्रानी या यूनानी मूल प्रायः पवित्रशास्त्र के उद्धरण में उनकी अज्ञानता को प्रकट करने, उनके दुस्साहस को रोकने और इस प्रकार उनकी डींग-भरी शेखी को दबाने का काम करता है, इसलिए वे इस कठिनाई का सामना भी बड़ी चतुराई से यह ठहराकर करते हैं कि केवल वल्गेट अनुवाद ही प्रामाणिक माना जाए।
तो उन्हें विदा, जिन्होंने भाषाओं के अध्ययन में बहुत समय और परिश्रम लगाया, ताकि वे पवित्रशास्त्र का सच्चा अर्थ उसके मूल स्रोत पर खोजें! कम से कम इस आदेश के द्वारा यह भली-भाँति प्रबन्ध हो गया है कि वे रोमी मत के अनुयायियों को आगे कोई कष्ट नहीं देंगे। क्या यह यूनान और सारे पूर्व को जीत लेना नहीं है? एक बात की कमी फिर भी थी; क्योंकि अप्रिय लोग सदा उठते रहते थे, जो किसी बात पर प्रश्न उठने पर पवित्रशास्त्र के प्रमाण के बिना सन्तुष्ट नहीं हो सकते थे! और कुछ और भी हैं जो इतने दूरदर्शी हैं कि वल्गेट अनुवाद में भी उन्हें पोप-तन्त्र को सताने के लिए हथियार मिल जाते हैं। इस ओर से हानि न उठानी पड़े, इसके लिए वे एक अति उत्तम उपाय निकालते हैं, जब वे पवित्रशास्त्र की वैध व्याख्या का अधिकार अपने ही नाम कर लेते हैं। अब कौन उनमें कोई अदूरदर्शिता कल्पना कर सकता है? एक ही अनुच्छेद से उन्होंने यह साधन पा लिया कि पवित्रशास्त्र में से जो चाहें सिद्ध करें, और हर उस स्थल से बच निकलें जो उनके विरुद्ध प्रस्तुत किया जा सके। यदि पाप-स्वीकार सिद्ध करना हो, तो वे तैयार हैं—“जाकर अपने आप को याजकों को दिखाओ।” यदि पूछा जाए कि क्या मरे हुओं की मध्यस्थता की शरण लेनी चाहिए, तो तुरन्त यह स्थल सामने आ जाएगा, “किसी एक सन्त की ओर फिर”; और यह भी, “इसके लिए हर पवित्र जन तुझ से प्रार्थना करेगा।” शुद्धिस्थान भी बिना पक्की नींव के नहीं रहेगा, क्योंकि लिखा है, “जब तक तू पाई-पाई न चुका दे तब तक वहाँ से निकलने न पाएगा।” संक्षेप में, किसी भी बात से कुछ भी बनाया जा सकता है! जब वे पहले ऐसे स्थल प्रस्तुत करते थे तब बच्चों के सामने भी हँसी के पात्र बनते थे। अब, यदि उनकी बात मान ली जाए, तो प्राधिकृत व्याख्या का अधिकार हर सन्देह को दूर कर देगा। क्योंकि उनके विरुद्ध ऐसा कौन-सा स्थल इतना स्पष्ट और सबल रखा जा सकता है जिससे वे बच न निकलें? किसी भी प्रकार की चालाकी उन्हें तुरन्त कठिनाई से निकाल लेगी। विरोधी तर्कों के सामने वे यह पीतल की दीवार खड़ी कर देंगे—तुम कौन होते हो कलीसिया की व्याख्या पर प्रश्न उठानेवाले? निःसन्देह, उनमें प्रचलित इस कहावत का यही अर्थ है कि पवित्रशास्त्र मोम की नाक है, क्योंकि उसे हर आकार में ढाला जा सकता है। यदि गणितज्ञों को इस प्रकार की मान्यताएँ दी जाएँ, तो वे न केवल गज को इंच बना देंगे, वरन् यह भी सिद्ध कर देंगे कि एक मील गज से छोटा है, जब तक कि वे सब कुछ को गड़बड़ न कर दें।
तो फिर इस विजयी और अब मानो जय-यात्रा के अधिवेशन का हम क्या करें? बस खड़े रहें और धुएँ को छँट जाने दें। परम्पराओं के विषय में, मैं जानता हूँ कि प्राचीन लेखकों ने उनका बारम्बार उल्लेख किया है, किन्तु इस उद्देश्य से नहीं कि हमारे विश्वास को पवित्रशास्त्र से आगे ले जाएँ, जिसके भीतर वे उसे सदा सीमित रखते हैं। वे केवल इतना कहते हैं कि कुछ रीतियाँ प्रेरितों से ग्रहण की गई थीं। उनमें से कुछ का मूल वैसा ही प्रतीत होता है, परन्तु दूसरी उसके योग्य नहीं। ये थोड़ी ही बातों को छूती हैं, और ऐसी जिन्हें सहा जा सकता है। परन्तु अब हमें विश्वास करने को कहा जाता है कि रोमी मत के अनुयायी जो कुछ भी हम पर थोपना चाहें, वह परम्परा से प्रेरितों से चला आया है; और वे इतने निर्लज्ज हैं कि बिना कोई भेद किए वे इस श्रेणी में वे बातें भी रख लेते हैं जो थोड़े ही समय पहले अज्ञान के अन्धकार में घुस आईं। इसलिए यद्यपि हम मान लें कि प्रभु के प्रेरितों ने आनेवाली पीढ़ियों को कुछ ऐसी रीतियाँ सौंपीं जिन्हें उन्होंने कभी लिखा नहीं; तो भी, पहला, इसका विश्वास के सिद्धान्त से कोई सम्बन्ध नहीं (क्योंकि उसके विषय में हम उनसे एक मात्रा भी नहीं निकाल सकते), वरन् केवल उन बाहरी रीतियों से है जो शिष्टता या अनुशासन के काम आती हैं; और दूसरा, उनके लिए फिर भी यह सिद्ध करना आवश्यक है कि जिस-जिस बात को वे यह नाम देते हैं वह सचमुच प्रेरितों की परम्परा है। इसलिए जैसा वे समझते हैं, वैसा उन्हें यहाँ कुछ ऐसा नहीं मिल सकता जो उनके अपने विधानों के अत्याचार को स्थापित करने में उनका समर्थन करे, जिनसे वे विवेकों को दयनीय रूप से नष्ट करते हैं, या उनके अन्धविश्वासों को ढाँपने में, जो स्पष्टतः सब युगों और जातियों की दूषित रीतियों से बटोरी हुई खिचड़ी हैं। हम विशेष रूप से उनकी उस इच्छा को ठुकराते हैं कि सिद्धान्त की निश्चयता उतनी ही उस पर निर्भर हो जिसे वे अलिखित (ἄγραφα) कहते हैं, जितनी पवित्रशास्त्र पर। हमें सदा अगस्तीन के इस नियम पर दृढ़ रहना चाहिए, “विश्वास पवित्रशास्त्र से उपजता है।”
उनके सब पुस्तकों को बिना भेद के प्रामाणिक सूची में स्वीकार करने के विषय में मैं इतना ही कहता हूँ कि यह आदि कलीसिया की सहमति के विरुद्ध किया गया है। यह भली-भाँति ज्ञात है कि जेरोम पहले के समयों की सामान्य राय के रूप में क्या कहता है। और रूफ़िनस भी, इस विषय को ऐसे बताते हुए जैसे उस पर कोई विवाद ही न हो, जेरोम के साथ घोषणा करता है कि सिराख की पुस्तक, सुलैमान की बुद्धि, तोबित, यहूदित और मक्काबियों का इतिहास, पिताओं द्वारा प्रामाणिक नहीं, वरन् कलीसियाई पुस्तकें कहलाती थीं, जिन्हें लोगों को पढ़कर सुनाया तो जा सकता था, परन्तु जो सिद्धान्त स्थापित करने के योग्य नहीं थीं। फिर भी मैं इससे अनजान नहीं कि जिस मत पर अब ट्रेंट के पिता अड़े हैं वही कार्थेज की महासभा में माना गया था। वही अगस्तीन ने भी अपने मसीही सिद्धान्त पर ग्रन्थ में अपनाया; परन्तु चूँकि वह स्वयं गवाही देता है कि उसके युग के सब लोगों का यही मत नहीं था, इसलिए हम मान लें कि उस समय यह बात अनिर्णीत थी। परन्तु यदि इसका निर्णय स्वयं विषय से निकाले गए तर्कों द्वारा होना हो, तो भाषा-शैली के अतिरिक्त और भी बहुत सी बातें दिखाएँगी कि जिन पुस्तकों को ट्रेंट के पिता इतना ऊँचा उठाते हैं उन्हें नीचे स्थान पर उतरना ही होगा। और बातों को छोड़ भी दें, तो जिसने भी मक्काबियों का इतिहास लिखा, वह अन्त में इच्छा प्रकट करता है कि उसने अच्छा और उचित लिखा हो; पर यदि नहीं, तो वह क्षमा माँगता है। पवित्र आत्मा की महिमा से यह स्वीकारोक्ति कितनी भिन्न है!
वल्गेट को छोड़ सब अनुवादों को दोषी ठहराने में, जैसे भूल अधिक मोटी है, वैसे ही आज्ञा अधिक बर्बर है। परमेश्वर के पवित्र वचन मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा इब्रानी में, और प्रेरितों के द्वारा यूनानी में दिए गए। ताकि संसार का कोई कोना इतने बड़े भण्डार से वंचित न रहे, अनुवाद का वरदान भी जोड़ दिया गया। ऐसा हुआ—मैं नहीं जानता किस रीति से, परन्तु निश्चय ही न किसी विवेक से, न किसी उचित चुनाव से—कि अलग-अलग अनुवादों में से एक अनपढ़ों का, या कम से कम उनका प्रिय बन गया जो भाषाओं का कोई ज्ञान न रखते हुए अपनी अज्ञानता के लिए किसी प्रकार की सहायता चाहते थे। दूसरी ओर, जो भाषाओं से परिचित हैं वे देखते हैं कि यह अनुवाद असंख्य भूलों से भरा है; और वे इसे अत्यन्त स्पष्ट प्रमाण से प्रकट कर देते हैं। इसके विपरीत, ट्रेंट के पिता यह हठ करते हैं कि यद्यपि विद्वान इस प्रकार स्वयं स्रोत से शुद्ध जल निकालते हैं, और अचूक वल्गेट को असत्य का दोषी ठहराते हैं, तो भी उनकी नहीं सुननी चाहिए। साधारण बुद्धि रखनेवाले किसी मनुष्य ने कभी परमेश्वर की कलीसिया को विद्या के लाभ से वंचित करने का साहस नहीं किया। प्राचीन लोगों ने, यद्यपि वे भाषाओं से, विशेषकर इब्रानी से अपरिचित थे, सदा खुले मन से माना कि सच्चा और यथार्थ अर्थ पाने के लिए मूल का परामर्श लेने से उत्तम कुछ नहीं। मैं और आगे जाऊँगा। साधारण योग्यता का ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो वल्गेट अनुवाद की कुछ दूसरों से तुलना करने पर यह सरलता से न देख ले कि जो बहुत सी बातें उसमें अनुचित रीति से अनूदित थीं वे इनमें सुखद रीति से सुधार दी गई हैं। फिर भी महासभा हठ करती है कि हम ज्योति की ओर से अपनी आँखें मूँद लें, ताकि हम अपनी ही इच्छा से भटक जाएँ।
किसने कल्पना की होगी कि वे इतने निर्बुद्धि होंगे कि भले मनुष्यों के निर्णयों को इस प्रकार निडर होकर तुच्छ जानेंगे, और सब की दृष्टि में घृणित और निन्दनीय बनने में संकोच न करेंगे? जो जानते थे कि उनके सामने कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं है, वे भी यही समझते थे कि वे संसार को दिखाने के लिए कुछ तो करेंगे, और अपने किसी शपथबद्ध अनुयायी को नया अनुवाद तैयार करने का काम सौंपेंगे। परन्तु इस बार वे कोई छल नहीं करते। वे न केवल हमें एक अत्यन्त दोषपूर्ण अनुवाद से सन्तुष्ट रहने का आदेश देते हैं, वरन् इस बात का भी हठ करते हैं कि हम उसकी आराधना करें, मानो वह स्वर्ग से उतरा हो; और जब उसके दोष सब को स्पष्ट दिखाई देते हैं, तब वे हमें किसी भी सुधार की इच्छा करने से रोकते हैं। देखो वे लोग जिनके निर्णय पर कलीसिया का नवीनीकरण निर्भर है!
जिन स्थलों का अनुवाद भूल और बेतुकेपन से हुआ है उन्हें चिह्नित करना असीम रूप से थका देनेवाला होगा। पूरे पृष्ठ की तो बात ही क्या, ऐसे तीन लगातार पद भी कठिनता से मिलेंगे जिनमें कोई प्रसिद्ध भूल न हो। उदाहरण के लिए भजन संहिता की पुस्तक पर्याप्त होगी, जिसमें से मैं चलते-चलते कुछ उदाहरण छूऊँगा, पूरी जानकारी देने के लिए उतना नहीं जितना अपने पाठकों को एक नमूना देने के लिए, जिससे वे स्वयं जाँचने के लिए प्रेरित हों। दूसरे भजन में प्रसिद्ध उपदेश है, “पुत्र को चूमो।” इसके स्थान पर वल्गेट में है, “शिक्षा को पकड़े रहो!” इनमें कोई समानता नहीं। जब पहला स्पष्टतः सही है, तो दूसरे को अधिक प्रामाणिक क्यों माना जाए? वल्गेट का अनुवादक कहता है, “हे मनुष्य के पुत्रो, तुम कब तक भारी मन से?” जबकि इब्रानी में ऐसा कुछ नहीं, वरन् है, “तुम कब तक मेरी महिमा को लज्जा में बदलते रहोगे?” (भजन संहिता 4:3।) जहाँ दाऊद शिकायत करता है कि उसका रस ग्रीष्मकाल की तपन में बदल गया, (भजन संहिता 32:4,) वहाँ अनुवादक ने रख दिया है, “मैं अपने शोक में तब तक फिरा जब तक काँटा न गड़ गया।” फिर, एक और पद में, “उनके मुँह में लगाम और बाग है ताकि वे तेरे पास आने न पाएँ;” परन्तु अनुवादक कहता है, “अंकुश और रास से उनके जबड़ों को रोक, जो तेरे निकट नहीं आते।” और भजन संहिता 38 में “भ्रमों से भरे फेफड़े” का हम क्या अर्थ समझें?
परन्तु एक असीम वन में प्रवेश करके मैं अविवेक का काम करता हूँ; इसलिए मैं अपने को एक ही भजन तक सीमित रखूँगा। वह अड़सठवाँ होगा। वहाँ दाऊद, परमेश्वर की अन्य स्तुतियों के बीच, यह भी बताता है कि वह अकेले को घर में बसाता है, अर्थात् अकेले और निःसन्तान को परिवार से समृद्ध करता है। अनुवादक इसकी जगह रखता है कि वह उन्हें “एक ही रीति का” बनाता है। अगले शब्द हैं, “वह हठीलों को सूखी झुलसी भूमि में रखता है।” इसके लिए अनुवादक के पास है, “वैसे ही उनको जो क्रोध दिलाते हैं; जो कब्रों में रहते हैं।” आगे, जहाँ दाऊद के शब्दों में अर्थ पूर्णतः स्पष्ट है, वहाँ अनुवादक एक ऐसी पहेली बना देता है जो ओडिपस को भी चकरा दे। दाऊद कहता है, “सेनाओं के राजा भाग गए, भाग गए, और घर में रहनेवाली, अर्थात् जो स्त्रियाँ घर पर रह गई थीं, उन्होंने लूट बाँट ली।” अनुवादक कहता है, “राजा, प्रियतम की सामर्थ्य, प्रियतम, और दिखावे के घर, ने लूट बाँट ली।” थोड़ा आगे, “यद्यपि तुम चूल्हों के बीच सोए हो;” अनुवादक, “पादरियों के बीच!” “ऊँचे लदे पर्वतों को ताकने” को वह इसकी जगह रखता है, “उपजाऊ पर्वतों से डाह करने।” जहाँ इब्रानी मूल में है, “हठीले भी, कि परमेश्वर यहोवा वास करे,” वहाँ अनुवादक के पास है, “उनके भी जो विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर यहोवा वास करता है।” फिर, जब शाब्दिक अर्थ है, “मैं बाशान से लौटा लाऊँगा, मैं समुद्र की गहराइयों से लौटा लाऊँगा,” तब अनुवादक ठीक उलटा देता है, “मैं बाशान से फिर जाऊँगा, मैं समुद्र की गहराई में फिर जाऊँगा।” फिर, “वहाँ छोटा बिन्यामीन उनका शासक है।” अनुवादक (मैं नहीं जानता कि वह क्या सोच रहा था) कहता है, “मन की अधिकता में।” मैं उस भजन के आधे से, वरन् उससे कुछ अधिक पर चल चुका हूँ। मेरे पाठक अब तक कैसी-कैसी विकृतियाँ देख चुके हैं!
और फिर भी, सच कहें तो, लैटिन अनुवादक के लिए तो क्षमा का कारण है, जिसने यूनानी अनुवाद का अर्थ जितना सही हो सके उतना दिया। परन्तु उन भूल करनेवालों को कौन सह सकता है, जो कलीसिया से अनुवाद का वरदान छीनना चाहते हैं, और इस प्रकार मानो प्रवेश-द्वार बन्द कर देते हैं कि कोई दाऊद के शुद्ध अर्थ तक पहुँच न पाए? इसमें यह भी जोड़ो कि वे न केवल अपने अनुवादकों की अज्ञानता और भूलों को दूसरों के सच्चे अनुवादों से बढ़कर मानते हैं, वरन् कोई ऐसा भ्रम नहीं, चाहे कितना ही मोटा हो, जिसे वे ईश्वरीय वाणी की शक्ति न दे दें। इसका एक उदाहरण भजन संहिता 132 में है। वहाँ प्रभु प्रतिज्ञा करता है कि वह अपने लोगों के भोजन को आशीष देगा। कोई रसीला छोटा-मोटा पादरी c और t को एक अक्षर समझकर पढ़ता हुआ शब्द vidum बना देता है; परन्तु चूँकि ऐसा कोई शब्द है ही नहीं, इस एक अक्षर के जोड़ने से एक नया पाठ चल पड़ा जो सारे पोप-तन्त्र में प्रचलित है, और इसलिए इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी में एक भी कलीसिया नहीं जिसमें वे ऊँचे स्वर में चिल्लाकर यह न गाते हों, “उसकी विधवा को आशीष देता हुआ, मैं आशीष दूँगा।” और वे इतने सावधान और दूरदर्शी हैं कि उनमें से किसी ने इस हास्यास्पद बिगाड़ को नहीं देखा। परन्तु यह कोई आश्चर्य नहीं कि जब वे हमसे रोटी का शब्द छीनते हैं, तो विधवापन का उल्लेख घुसा देते हैं, क्योंकि जिस उद्देश्य में वे पूरी तरह लगे हैं वह यही है कि प्राणों को स्वर्गीय जीवन की रोटी से निर्दयतापूर्वक वंचित कर दें। क्या! क्या उन्हें लज्जा नहीं आती कि नए नियम के वल्गेट अनुवाद को अधिकार-सम्पन्न बनाते हैं, जबकि वल्ला, फेबर और इरैस्मस की रचनाएँ, जो सब के हाथों में हैं, उँगली रखकर, बच्चों तक को, दिखा देती हैं कि वह असंख्य स्थानों पर बिगड़ा हुआ है? रोमियों के पहले अध्याय में अनुवादक मसीह को “परमेश्वर का पूर्वनियत पुत्र” कहता है। जो यूनानी से अपरिचित हैं वे इस शब्द की व्याख्या करने में चकरा जाते हैं, क्योंकि ठीक कहें तो केवल वे ही वस्तुएँ पूर्वनियत होती हैं जो अभी अस्तित्व में नहीं हैं; जबकि मसीह परमेश्वर का अनन्त पुत्र है। यूनानी शब्द में कोई कठिनाई नहीं, जिसका अर्थ है “प्रकट किया गया।” मैंने एक उदाहरण दिया है। दूसरे देना व्यर्थ परिश्रम होगा। एक शब्द में, यदि महासभा के इस आदेश को स्वीकृति मिल जाए, तो उसका सीधा परिणाम यही होगा कि ट्रेंट के पिता संसार को खुली आँखों से देखने पर विवश कर देंगे, और फिर भी जो ज्योति उसके सामने रखी गई है उसे वह न देखे।
अब मैं व्याख्या करने के उस अधिकार पर आता हूँ जिसे वे अर्थ के सन्देहपूर्ण होने पर अपने लिए हथिया लेते हैं। वे कहते हैं कि पवित्रशास्त्र का अर्थ बताना उनका काम है, और हमें मान लेना होगा। क्योंकि जो कुछ वे कलीसिया को देते हैं वह सब अपने ही को देते हैं। मैं मानता हूँ कि जैसे पवित्रशास्त्र मनुष्य की निजी इच्छा से नहीं आया, (2 पतरस 1:21) वैसे ही उसे किसी मनुष्य के निजी अर्थ की ओर मरोड़ना अनुचित है। वरन् किसी अस्पष्ट स्थल में, जब सन्देह हो कि कौन-सा अर्थ ग्रहण करना चाहिए, तब सच्चे अर्थ तक पहुँचने का इससे अच्छा कोई मार्ग नहीं कि भक्त शिक्षक आपस में धार्मिक चर्चा करके मिलकर खोज करें। परन्तु अब प्रश्न यह नहीं है। वे अपने अत्याचारी आदेश से कलीसिया को सारी स्वतन्त्रता से वंचित करना और अपने लिए असीम छूट हथिया लेना चाहते हैं; क्योंकि पवित्रशास्त्र पर वे जो भी अर्थ थोपें, उसे तुरन्त मान लेना होगा। इसके अतिरिक्त, उनके सिवा किसी को भी पवित्रशास्त्र से कुछ सिद्ध करने की अनुमति नहीं होगी। काश वे इतने बड़े काम के योग्य होते! परन्तु बैल रास पर अधिकार जमा लेते हैं, या कहें गधे सितार पर। संक्षेप में, उनका लक्ष्य यह है कि सब लोग उस पवित्रशास्त्र का आदर करें जो सिरीस के भेदों के समान अन्धकार में छिपा है, और कोई उसे समझने की आकांक्षा करने का साहस न करे।
यदि मैं वे सब उदाहरण इकट्ठे करने लगूँ जिनसे मेरे पाठकों पर स्पष्ट हो जाए कि इस आदेश द्वारा अन्यायपूर्ण और असह्य दासता की कैसी बेड़ियाँ गढ़ी जाती हैं, तो उनका अन्त न होगा। इसलिए मैं केवल एक महासभा का नमूना दूँगा। सन् 800 के लगभग नीसिया की एक महासभा हुई, जिसने उन मूर्तियों को, जो लियो के अधीन गिराई गई थीं, पुनः स्थापित किया और यह भी ठहराया कि उनकी आराधना की जाए। उस महासभा को, क्योंकि वह मूर्तिपूजा का समर्थन करती है, पोप के अनुयायी पवित्र और वैध मानते हैं। इसलिए उनके अपने स्वयंसिद्ध के अनुसार वह पवित्रशास्त्र की व्याख्या में भूल नहीं कर सकती। परन्तु यदि पवित्र बातों के ऐसे व्याख्याताओं की सुननी हो, (यह कहना घृणित है कि सुननी चाहिए,) तो मिस्रियों का धर्म मसीही धर्म से श्रेष्ठ ठहरेगा। यह सिद्ध करने के लिए कि कलीसियाओं को मूर्तियों और चित्रों से सजाना उचित था, निम्नलिखित स्थल प्रस्तुत किए गए:—“परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप और समानता में सृजा;” “यहोशू ने बारह पत्थर खड़े किए;” “कोई मनुष्य दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं रखता;” जिससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि मूर्तियाँ वेदियों पर रखी जानी चाहिए! फिर, “तेरे मुख की ज्योति हम पर अंकित की गई है:” “जैसा हमने सुना, वैसा ही देखा भी;” “हे प्रभु, मैं तेरे भवन की शोभा से प्रेम रखता हूँ;” “मुझे अपना मुख दिखा, क्योंकि वह मनोहर है।” आराधना के समर्थन में उन्होंने ये स्थल मरोड़े:—“अब्राहम ने देश के लोगों को दण्डवत् किया;” “याकूब ने एक लेख खड़ा किया, और आशीष दी।” फिर, “उसने अपने पुत्र यूसुफ़ की लाठी के सिरे को दण्डवत् किया;” “लोगों में जितने धनवान हैं वे तेरे मुख की मिन्नत करेंगे;” “उसके पाँव की चौकी को दण्डवत् करो;” “परमेश्वर अपने सन्तों में आश्चर्यजनक है।” और ताकि उनकी ढिठाई के मुकुट में कोई कमी न रह जाए, उन्होंने किसी और भजन में से जोड़ दिया, “उसके सन्त जो पृथ्वी पर हैं।” इसे उन्होंने मूर्तियों पर लगा दिया!
मैं जानता हूँ कि जो वृत्तान्त मैं अब दे रहा हूँ वह मुश्किल से विश्वसनीय प्रतीत होगा। जब मैंने इसे पढ़ा तो मैं स्वयं चकित रह गया, यद्यपि हमारे कान तो उनकी ओर से बहुत पहले ही किसी भी बेतुकेपन के लिए, चाहे वह कितना ही भारी हो, तैयार हो जाने चाहिए थे। यदि मैं उनकी सब व्याख्याएँ इकट्ठी करूँ, जिन पर बच्चे भी हँसेंगे, और सब भी नहीं, केवल वे जो किसी विशेष बेतुकेपन से अलग दिखती हैं, तो मुझे बाइबल से तिगुना बड़ा ग्रन्थ बनाना पड़ेगा।
सार यह है कि ट्रेंट की आत्मा इस आदेश से यह चाहती थी कि पवित्रशास्त्र हमारे लिए केवल वही अर्थ रखे जो स्वप्न देखनेवाले भिक्षु चुन लें। क्योंकि कलीसिया से उनका और क्या तात्पर्य है? यदि रोमी धर्माध्यक्ष, अर्थात् वे सब जो उस मसीह-विरोधी पीठ के झण्डे और छत्र-छाया में सेवा करते हैं, संसार के हर कोने से एकत्र भी हो जाएँ, तो बताओ, वे सिर जोड़कर हमारे लिए कोई उचित अनुवाद कैसे गढ़ सकेंगे? उनमें से बहुत से व्याकरण के आरम्भिक सिद्धान्त भी कठिनता से जानते हैं। कम से कम वे इनकार करने का साहस नहीं करेंगे कि सौ में एक भी मुश्किल से ऐसा मिलेगा जिसने भविष्यद्वक्ताओं की कोई पूरी पुस्तक, या प्रेरितों की कोई पत्री, या कोई सुसमाचार पढ़ा हो। वे दूसरी चिन्ताओं में इतने लगे हैं कि पवित्र साहित्य के लिए उनके पास कोई अवकाश नहीं। एकमात्र उपाय यह है कि यह विशेषाधिकार प्रेरितीय पीठ के लिए सुरक्षित रखा जाए, और कहा जाए कि पवित्रशास्त्र की व्याख्या पौलुस फ़ार्नीज़ के पवित्र मुख से माँगनी चाहिए! नहीं तो वे हमें कोई ऐसी कलीसिया दिखाएँ जो इतने बड़े भार को उठाने में समर्थ ठहराई जा सके। क्योंकि रोमी पीठ की वे जितनी भी प्रशंसा करें, वे कुछ लोगों को कभी यह विश्वास नहीं दिला सकते कि कैफ़ा उसका प्रधान है, या यह कि पवित्र और निष्कलंक विवाह वह शारीरिक जीवन है जो परमेश्वर की दृष्टि में शापित है। ये दोनों बातें पोप के उत्तरों में कही गई हैं। वे चिल्लाते हैं कि यदि कलीसिया को पवित्रशास्त्र की व्याख्या का अधिकार न दिया जाए तो उसका सारा अधिकार ढह जाएगा—कि इस प्रकार कामुक मनों के लिए द्वार खुल जाएगा, और वे हर रोक को तोड़ डालेंगे। वरन् हमें बदनाम करने के लिए वे हम पर यह दोष लगाने के आदी हैं कि हम पवित्रशास्त्र की व्याख्या अपने ही लिए हथियाते हैं, ताकि हमारी स्वच्छन्दता पर कोई रोक न रहे। लज्जा मुझे हमारे विषय में वैसा बोलने नहीं देती जैसा तथ्य उचित ठहराते; फिर भी मैं अत्यन्त सत्यता से घोषित करूँगा कि पोप-तन्त्र के आरम्भ से अब तक उसके अधीन जितने शिक्षक हुए हैं उन सब से अधिक प्रकाश हमने पवित्रशास्त्र पर डाला है। यह प्रशंसा वे स्वयं भी हमसे छीनने का साहस नहीं करते। फिर भी हममें से ऐसा कोई नहीं जो अपनी रात-रात की खोजों को स्वेच्छा से कलीसिया के निर्णय के अधीन न रखे। इसलिए हम न तो कलीसिया के अधिकार को तुच्छ जानते हैं, न उसे घटाते हैं; और न मनुष्यों को खुली छूट देते हैं कि वे जो चाहें करने का साहस करें। मैं चाहता हूँ कि वे हमें ऐसी कलीसिया दिखाएँ जैसी पवित्रशास्त्र स्वयं चित्रित करता है; तब उसके योग्य आदर के विषय में हम सरलता से एकमत हो जाएँगे। परन्तु जब वे झूठमूठ कलीसिया का नाम धारण करके उन लूट की वस्तुओं को हथिया लेते हैं जो उन्होंने उससे छीनी हैं, तो हम विरोध करने के सिवा और क्या कर सकते हैं?
