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नियम
I. जो कोई कहे कि मनुष्य अपने कर्मों से, जो या तो मानव स्वभाव की सामर्थ्य से या मसीह के द्वारा ईश्वरीय अनुग्रह के बिना व्यवस्था की शिक्षा से किए जाते हैं, धर्मी ठहराया जा सकता है, वह अभिशापित हो।
II. जो कोई कहे कि यीशु मसीह के द्वारा ईश्वरीय अनुग्रह केवल इसी उद्देश्य से दिया गया है कि मनुष्य धार्मिकता से जी सके और अनन्त जीवन के योग्य ठहर सके, मानो वह इन दोनों को अनुग्रह के बिना स्वतंत्र इच्छा से कर सकता हो, यद्यपि कठिनाई और कठिन परिश्रम से, वह अभिशापित हो।
III. जो कोई कहे कि पवित्र आत्मा की पूर्वगामी प्रेरणा और उसकी सहायता के बिना मनुष्य विश्वास कर सकता, आशा रख सकता, प्रेम कर सकता, या मन फिरा सकता है, इस प्रकार कि धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह उसे दिया जाना उचित हो, वह अभिशापित हो।
IV. जो कोई कहे कि मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा, जो परमेश्वर से प्रेरित और उत्तेजित की गई है, परमेश्वर के उत्तेजित करने और बुलाने में उसके साथ किसी भी प्रकार सहयोग नहीं करती, कि इस प्रकार वह धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह पाने के लिए अपने आपको तैयार और प्रस्तुत करे, और कि वह चाहे भी तो असहमत नहीं हो सकती, वरन् किसी निर्जीव वस्तु के समान कुछ भी नहीं करती, और केवल निष्क्रिय रूप से कार्य करती है, वह अभिशापित हो।
V. जो कोई कहे कि मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा आदम के पाप के बाद खो गई और बुझ गई, या वह केवल नाम की वस्तु है, या बिना वस्तु का नाम है, संक्षेप में, शैतान द्वारा कलीसिया में घुसाई गई एक कल्पना है, वह अभिशापित हो।
VI. जो कोई कहे कि अपने मार्गों को बुरा बनाना मनुष्य के सामर्थ्य में नहीं है, परन्तु परमेश्वर भले कर्मों के समान बुरे कर्मों को भी उत्पन्न करता है, केवल अनुमति देने के रूप में नहीं, वरन् यथार्थ में और स्वयं अपनी ओर से, ऐसा कि यहूदा का विश्वासघात उसका उतना ही निज कार्य है जितना पौलुस की बुलाहट, वह अभिशापित हो।
VII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराए जाने से पहले किए गए सब कर्म, चाहे किसी भी कारण से किए गए हों, सचमुच पाप हैं, और परमेश्वर की घृणा के योग्य हैं, या कि मनुष्य अनुग्रह के लिए अपने आपको जितनी तीव्रता से तैयार करने का यत्न करता है उतना ही अधिक गम्भीर पाप करता है, वह अभिशापित हो।
VIII. जो कोई कहे कि नरक का भय, जिससे हम अपने पापों पर शोक करते हुए परमेश्वर की दया की ओर भागते हैं, या जिससे हम पाप करने से रुकते हैं, पाप है, या पापियों को और बुरा बनाता है, वह अभिशापित हो।
IX. जो कोई कहे कि दुष्ट केवल विश्वास से धर्मी ठहराया जाता है, इस अर्थ में कि धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह पाने के लिए सहयोग के रूप में और कुछ आवश्यक नहीं, और यह कि किसी भी रूप में आवश्यक नहीं कि वह अपनी इच्छा की गति से तैयार और प्रवृत्त किया जाए, वह अभिशापित हो।
X. जो कोई कहे कि मनुष्य मसीह की उस धार्मिकता के बिना धर्मी ठहराए जाते हैं जिसके द्वारा उसने हमारे लिए योग्यता प्राप्त की, या कि उसी धार्मिकता से वे रूपात्मक रीति से धर्मी होते हैं, वह अभिशापित हो।
XI. जो कोई कहे कि मनुष्य केवल मसीह की धार्मिकता के आरोपण से, या केवल पापों की क्षमा से, उस अनुग्रह और प्रेम को छोड़कर जो पवित्र आत्मा के द्वारा उनके हृदयों में उण्डेला जाता है और उनमें बसा रहता है, धर्मी ठहराए जाते हैं, या यह भी कि जिस अनुग्रह से हम धर्मी ठहराए जाते हैं वह केवल परमेश्वर की कृपा है, वह अभिशापित हो।
XII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहरानेवाला विश्वास उस ईश्वरीय दया पर भरोसे के सिवा और कुछ नहीं जो मसीह के द्वारा पापों को क्षमा करती है, या कि यही भरोसा एकमात्र वस्तु है जिससे हम धर्मी ठहराए जाते हैं, वह अभिशापित हो।
XIII. जो कोई कहे कि किसी मनुष्य के लिए पापों की क्षमा पाने को यह निश्चय से और बिना किसी हिचकिचाहट के विश्वास करना आवश्यक है, अपनी निर्बलता और अनिच्छा के होते हुए भी, कि उसके पाप क्षमा हो गए हैं, वह अभिशापित हो।
XIV. जो कोई कहे कि मनुष्य अपने पापों से मुक्त, या धर्मी ठहराया, केवल इस बात से हो जाता है कि वह निश्चय से विश्वास करता है कि वह मुक्त या धर्मी ठहराया गया है, या कि कोई मनुष्य सचमुच धर्मी नहीं ठहरता सिवाय उसके जो विश्वास करता है कि वह धर्मी ठहराया गया है, और कि छुटकारा और पापमुक्ति केवल विश्वास से पूरी होती है, वह अभिशापित हो।
XV. जो कोई कहे कि नया जन्म पाया हुआ या धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य विश्वास से यह मानने को बाध्य है कि वह निश्चय ही पूर्वनियत लोगों की गिनती में है, वह अभिशापित हो।
XVI. जो कोई कहे कि वह इसे पूर्णतः और अचूक रूप से निश्चित मानता है कि उसे अन्त तक स्थिर रहने का महान दान मिलेगा, यदि उसने यह विशेष प्रकाशन से नहीं सीखा है, वह अभिशापित हो।
XVII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह केवल उन्हीं को मिलता है जो जीवन के लिए पूर्वनियत हैं, और बाकी सब जो बुलाए गए हैं वे बुलाए तो जाते हैं पर अनुग्रह नहीं पाते, क्योंकि वे ईश्वरीय सामर्थ्य द्वारा बुराई के लिए पूर्वनियत हैं, वह अभिशापित हो।
XVIII. जो कोई कहे कि परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन धर्मी ठहराए हुए और अनुग्रह के अधीन ठहराए गए मनुष्य के लिए भी असम्भव है, वह अभिशापित हो।
XIX. जो कोई कहे कि सुसमाचार में विश्वास के सिवा और कुछ आज्ञापित नहीं है; कि अन्य बातें उदासीन हैं, न आज्ञापित न वर्जित, वरन् स्वतंत्र; या कि दस आज्ञाएँ मसीहियों पर लागू नहीं होतीं, वह अभिशापित हो।
XX. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य, चाहे कितना ही सिद्ध हो, परमेश्वर और कलीसिया की आज्ञाओं के पालन के लिए बाध्य नहीं है, वरन् केवल विश्वास करने के लिए, मानो सुसमाचार आज्ञाओं के पालन की शर्त के बिना अनन्त जीवन की एक नंगी और निरपेक्ष प्रतिज्ञा हो, वह अभिशापित हो।
XXI. जो कोई कहे कि यीशु मसीह परमेश्वर की ओर से मनुष्य को छुड़ानेवाले के रूप में दिया गया है जिस पर वे भरोसा करें, परन्तु व्यवस्था देनेवाले के रूप में नहीं जिसकी वे आज्ञा मानें, वह अभिशापित हो।
XXII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य परमेश्वर की विशेष सहायता के बिना भी पाई हुई धार्मिकता में स्थिर रह सकता है, या परमेश्वर की सहायता से भी नहीं रह सकता, वह अभिशापित हो।
XXIII. जो कोई कहे कि एक बार धर्मी ठहराया गया मनुष्य फिर पाप नहीं कर सकता या अनुग्रह नहीं खो सकता, और इसलिए जो गिरता या पाप करता है वह कभी सचमुच धर्मी ठहराया ही नहीं गया था, या कि वह अपने सारे जीवन में सब पापों से, क्षम्य पापों से भी, बच सकता है, सिवाय परमेश्वर के विशेष विशेषाधिकार के, जैसा कलीसिया धन्य कुँवारी के विषय में मानती है, वह अभिशापित हो।
XXIV. जो कोई कहे कि पाई हुई धार्मिकता भले कर्मों से परमेश्वर की दृष्टि में सुरक्षित नहीं रखी जाती और बढ़ती भी नहीं, कि कर्म स्वयं केवल प्राप्त हुए धर्मी ठहराए जाने के फल और चिह्न हैं, उसे बढ़ाने का कारण नहीं, वह अभिशापित हो।
XXV. जो कोई कहे कि हर किसी भी कर्म में धर्मी मनुष्य कम से कम क्षम्य रूप से पाप करता है, या, जो और भी असह्य है, घातक रूप से, और इस कारण अनन्त दण्ड के योग्य ठहरता है, वह अभिशापित हो।
XXVI. जो कोई कहे कि धर्मी लोगों को, उन भले कर्मों के लिए जो परमेश्वर में किए गए हों, यदि वे भला करने और ईश्वरीय आज्ञाओं के पालन में अन्त तक स्थिर रहें, तो परमेश्वर से उसकी दया और यीशु मसीह की योग्यताओं के द्वारा अनन्त प्रतिफल की अपेक्षा और आशा नहीं करनी चाहिए, वह अभिशापित हो।
XXVII. जो कोई कहे कि अविश्वास के पाप के सिवा और कोई घातक पाप नहीं है, और कि अविश्वासिता के पाप के सिवा किसी भी पाप से, चाहे वह कितना ही गम्भीर और भारी हो, एक बार पाया हुआ अनुग्रह खोया नहीं जा सकता, वह अभिशापित हो।
XXVIII. जो कोई कहे कि पाप से अनुग्रह के खो जाने पर विश्वास भी उसी समय और सदा के लिए खो जाता है, या कि जो विश्वास बना रहता है वह सच्चा विश्वास नहीं है, चाहे वह जीवित न हो, या कि जिसके पास प्रेम के बिना विश्वास है वह मसीही नहीं है, वह अभिशापित हो।
XXIX. जो कोई कहे कि जो बपतिस्मा के बाद गिर गया है वह परमेश्वर के अनुग्रह से फिर उठ नहीं सकता, या कि उठ तो सकता है, परन्तु मन फिराव के संस्कार के बिना केवल विश्वास से खोई हुई धार्मिकता पुनः पा सकता है, जैसा कि प्रभु मसीह और उसके प्रेरितों से शिक्षा पाई हुई पवित्र रोमी और सार्वभौम कलीसिया ने अब तक स्वीकार किया, माना और सिखाया है, वह अभिशापित हो। XXX. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह पाने के बाद दोष या अनन्त दण्ड का दायित्व हर मन फिरानेवाले पापी के लिए ऐसे क्षमा हो जाता है कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश पाने से पहले, या तो इस संसार में या आनेवाले संसार में शोधन-स्थान में, चुकाने के लिए सामयिक दण्ड का कोई दायित्व नहीं रह जाता, वह अभिशापित हो।
XXXI. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य तब पाप करता है जब वह अनन्त प्रतिफल को दृष्टि में रखकर भले कर्म करता है, वह अभिशापित हो।
XXXII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराए हुए मनुष्य के भले कर्म इस अर्थ में परमेश्वर के दान हैं कि वे स्वयं धर्मी ठहराए हुए मनुष्य की अपनी भली योग्यताएँ नहीं हैं, या कि धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य उन भले कर्मों से जो उसके द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह और यीशु मसीह की योग्यताओं से, जिसका वह जीवित अंग है, किए जाते हैं, अनुग्रह की वृद्धि, अनन्त जीवन, और, यदि वह अनुग्रह में मरे तो, अनन्त जीवन की वास्तविक प्राप्ति, साथ ही महिमा की वृद्धि के सचमुच योग्य नहीं ठहरता, वह अभिशापित हो।
XXXIII. जो कोई कहे कि धर्मी ठहराए जाने का यह कैथोलिक सिद्धान्त, जो पवित्र महासभा ने इस वर्तमान आज्ञप्ति में व्यक्त किया है, किसी भी बात में परमेश्वर की महिमा या हमारे प्रभु यीशु मसीह की योग्यताओं को घटाता है, और हमारे विश्वास के सत्य को, अर्थात् परमेश्वर और यीशु मसीह की महिमा को, अधिक प्रकाशित नहीं करता, वह अभिशापित हो।
