अध्याय 10

चौथे अधिवेशन का दूसरा आदेश

Acts of the Council of Trent with the Antidote · John Calvin

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चौथे अधिवेशन का दूसरा आदेश

इसके अतिरिक्त, उपर्युक्त पवित्र महासभा ने यह विचार करके कि यदि प्रचलित पवित्र पुस्तकों के सब लैटिन संस्करणों में से यह बताया जाए कि कौन-सा प्रामाणिक माना जाए, तो परमेश्वर की कलीसिया को कुछ कम लाभ न होगा, यह ठहराया और घोषित किया है कि वह प्राचीन वल्गेट संस्करण, जो कलीसिया में इतनी शताब्दियों के दीर्घ प्रयोग से प्रमाणित हो चुका है, सार्वजनिक व्याख्यानों, वाद-विवादों, उपदेशों और व्याख्याओं में प्रामाणिक माना जाए; और कोई भी मनुष्य किसी भी बहाने से उसे अस्वीकार करने का साहस या दुस्साहस न करे।

इसके अतिरिक्त, उद्दण्ड मनों पर अंकुश लगाने के लिए महासभा यह आदेश देती है कि कोई भी मनुष्य अपनी ही बुद्धि पर भरोसा करके, विश्वास और अनुशासन के उन विषयों में जो मसीही शिक्षा की उन्नति से सम्बन्ध रखते हैं, पवित्र शास्त्र को अपने ही अर्थ में तोड़-मरोड़कर, उस अर्थ के विरुद्ध पवित्र शास्त्र की व्याख्या करने का साहस न करे जो पवित्र माता कलीसिया ने, जिसका काम पवित्र शास्त्रों के सच्चे अर्थ और व्याख्या का न्याय करना है, धारण किया है और धारण करती है, या पिताओं की सर्वसम्मति के भी विरुद्ध, चाहे ये व्याख्याएँ कभी प्रकाशित न की जानेवाली हों। जो इसके विरुद्ध चलें, उनकी सूचना साधारण अधिकारियों द्वारा दी जाए, और उन्हें विधि द्वारा निर्धारित दण्ड दिए जाएँ।

छापनेवालों को भी इस विषय में, जैसा उचित है, नियन्त्रण में लाने की इच्छा करते हुए, जो अब बिना किसी नियन्त्रण के, अर्थात् अपने आपको मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र समझते हुए, अपने कलीसियाई अधिकारियों की अनुमति के बिना पवित्र शास्त्र की पुस्तकें, और इसके अतिरिक्त हर प्रकार की टिप्पणियाँ और व्याख्याएँ, प्रायः छापेखाने का नाम बताए बिना, या कोई कल्पित नाम देकर, और (जो इससे भी बुरा है) लेखक के नाम के बिना छापते हैं, और इस प्रकार की पुस्तकें अन्यत्र भी बिक्री के लिए अन्धाधुन्ध छपवाते हैं; महासभा ठहराती और आदेश देती है कि आगे से पवित्र शास्त्र, और विशेषकर प्राचीन वल्गेट संस्करण, यथासम्भव शुद्ध छापा जाए, और किसी को भी पवित्र विषयों की कोई पुस्तक लेखक के नाम के बिना छापने या छपवाने की, और आगे उन्हें बेचने या अपने पास रखने की भी अनुमति न हो, जब तक कि पहले साधारण अधिकारी द्वारा उनकी जाँच और अनुमोदन न हो गया हो, अभिशाप के दण्ड के और पिछली लातेरान महासभा के नियम में उल्लिखित दण्ड के अधीन। यदि वे व्यक्ति नियमबद्ध संन्यासी हों, जो जाँच और अनुमोदन की इस रीति के अधीन नहीं हैं, तो वे अपने वरिष्ठों से अनुमति प्राप्त करने को बाध्य होंगे, जब उन पुस्तकों को उनके द्वारा अपने ही विधानों के रूप के अनुसार जाँच लिया गया हो।

जो लोग इन रचनाओं को जाँच और अनुमोदन से पहले हस्तलिखित रूप में उधार देते या बाँटते हैं, वे छापनेवालों के समान ही दण्ड के भागी होंगे; और जिनके पास ये रही हों, या जिन्होंने इन्हें पढ़ा हो, यदि वे लेखक को सौंप न दें, तो वे स्वयं लेखक माने जाएँगे। इस प्रकार की पुस्तकों का अनुमोदन लिखित रूप में दिया जाना चाहिए, और पुस्तक, या हस्तलिपि, या छपी प्रति के आरम्भ में प्रमाणित होकर दिखाई देना चाहिए। यह सारा कर्त्तव्य, अर्थात् जाँच और अनुमोदन, निःशुल्क होना चाहिए, ताकि जो अनुमोदन के योग्य है वह अनुमोदित हो, और अस्वीकृति की बात अस्वीकृत की जाए।

इसके अतिरिक्त, उस ढिठाई को दबाने की इच्छा करते हुए जिसके द्वारा पवित्र शास्त्र के वचनों को हर प्रकार की अपवित्रता के लिए मोड़ा और तोड़ा-मरोड़ा जाता है—भाँडपन, कथा-कहानी, व्यर्थता, चापलूसी, निन्दा, अधर्मी अन्धविश्वासों, शैतानी मन्त्रों, भविष्य-कथन, पासे डालने, और अपमानजनक लेखों के लिए—महासभा ऐसी अनादरशीलता और तिरस्कार का अन्त करने, और आगे किसी को भी इन और ऐसे ही कामों के लिए किसी भी रीति से पवित्र शास्त्र के वचनों का प्रयोग करने का साहस करने से रोकने के लिए आदेश और आज्ञा देती है कि इस प्रकार के सब लोग, परमेश्वर के वचन के सब भ्रष्ट करनेवाले और अपमान करनेवाले, अपने धर्माध्यक्षों द्वारा वैधानिक और विवेकाधीन दण्ड से नियन्त्रित किए जाएँ।

इसी प्रकार पवित्र महासभा ने ठहराया और आदेश दिया है कि अगला अधिवेशन आनेवाले परम पवित्र पिन्तेकुस्त के पर्व के पाँचवें दिन बाद आयोजित और सम्पन्न किया जाए।

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