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त्रेन्त की महासभा का छठा अधिवेशन
चूँकि इस समय, आत्माओं की हानि और कलीसियाई एकता की गम्भीर क्षति के बिना नहीं, धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त के विषय में कुछ भ्रामक मत फैलाए गए हैं, इसलिए त्रेन्त की पवित्र, विश्वव्यापी और सामान्य महासभा, जो पवित्र आत्मा में वैध रूप से एकत्र हुई है, और जिसकी अध्यक्षता परम आदरणीय स्वामी प्रेनेस्ते के अध्यक्ष जॉन मारिया देल मोन्ते तथा यरूशलेम में पवित्र क्रूस की उपाधिवाले मार्सेलस, रोमी कलीसिया के याजकों, कार्डिनलों और प्रेरितीय de latere प्रतिनिधियों ने, मसीह में हमारे परम पवित्र पिता और प्रभु, ईश्वरीय विधान से पोप पौलुस तृतीय के नाम पर की, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की स्तुति और महिमा, कलीसिया की शान्ति और आत्माओं के उद्धार के उद्देश्य से, मसीह के सब विश्वासियों के सामने धर्मी ठहराए जाने का वह सच्चा और खरा सिद्धान्त प्रकट करने का संकल्प करती है, जिसे धार्मिकता के सूर्य मसीह ने, जो हमारे विश्वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला है, सिखाया, प्रेरितों ने सौंपा, और कैथोलिक कलीसिया ने पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में निरन्तर थामे रखा; और किसी को भी इस वर्तमान आज्ञप्ति में निर्धारित और घोषित बातों से भिन्न विश्वास करने, प्रचार करने या सिखाने का दुस्साहस करने से कठोरतापूर्वक रोकती है।
मनुष्यों को धर्मी ठहराने में प्रकृति और व्यवस्था की असमर्थता के विषय में।
II. पवित्र महासभा घोषणा करती है कि धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त को ठीक और शुद्ध रूप में समझने के लिए हर एक को यह मानना और स्वीकार करना आवश्यक है कि जब आदम के अपराध से सब ने अपनी निर्दोषता खो दी, अशुद्ध हो गए, और प्रेरित के कथनानुसार स्वभाव से क्रोध की सन्तान हो गए, जैसा कि मूल पाप विषयक आज्ञप्ति में समझाया जा चुका है, तब वे पाप के ऐसे दास और शैतान तथा मृत्यु के अधिकार में थे कि न केवल अन्यजाति लोग प्रकृति की सामर्थ्य से, वरन् यहूदी भी मूसा की व्यवस्था के अक्षर से, उससे छुटकारा नहीं पा सकते थे और न उठ सकते थे, यद्यपि स्वतंत्र इच्छा उनमें किसी भी प्रकार बुझी नहीं थी, चाहे उसकी शक्तियाँ निर्बल और एक ओर झुकी हुई थीं।
मसीह के आगमन के प्रबन्ध और सेवा के विषय में।
III. इसी कारण हमारे स्वर्गीय पिता ने, जो दया का पिता और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है, जब समयों की वह धन्य परिपूर्णता आई, तब मनुष्यों के पास अपने पुत्र मसीह यीशु को भेजा, जिसके विषय में व्यवस्था से पहले भी और व्यवस्था के समय में भी बहुत से पवित्र पूर्वजों से घोषणा और प्रतिज्ञा की गई थी, कि वह व्यवस्था के अधीन यहूदियों को छुड़ाए, और जो अन्यजाति लोग धार्मिकता का पीछा नहीं करते थे वे धार्मिकता प्राप्त करें, और सब लेपालकपन पाएँ। उसे परमेश्वर ने अपने लहू पर विश्वास के द्वारा हमारे पापों के लिए प्रायश्चित ठहराया, और केवल हमारे ही नहीं, वरन् सारे जगत के पापों के लिए भी।
मसीह के द्वारा कौन धर्मी ठहराए जाते हैं।
IV. परन्तु यद्यपि वह सब के लिए मरा, तथापि सब उसकी मृत्यु का लाभ नहीं पाते, केवल वे जिन्हें उसके दुःखभोग की योग्यता पहुँचाई जाती है। क्योंकि जैसे मनुष्य, यदि वे आदम के वंश से उत्पत्ति द्वारा उत्पन्न न होते, तो अधर्मी उत्पन्न न होते, जबकि उस उत्पत्ति से, केवल गर्भ में आने के तथ्य से ही, वे अपना निज अधर्म ग्रहण करते हैं; वैसे ही यदि वे मसीह में नया जन्म न पाते, तो कभी धर्मी न ठहरते, क्योंकि नया जन्म उन्हें उसके दुःखभोग की योग्यता से, उस अनुग्रह के द्वारा दिया जाता है जिससे वे धर्मी बनाए जाते हैं। इसी लाभ के लिए प्रेरित हमें उस पिता का सदा धन्यवाद करने का उपदेश देता है जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में भागी हों, और हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रविष्ट कराया, जिसमें हमें छुटकारा, अर्थात् पापों की क्षमा, मिलती है।
भक्तिहीन के धर्मी ठहराए जाने का निहित वर्णन, और अनुग्रह की अवस्था में उसकी रीति।
V. इन शब्दों में भक्तिहीन के धर्मी ठहराए जाने का एक निहित वर्णन है, अर्थात् यह कि वह उस अवस्था से, जिसमें मनुष्य, पहले आदम का पुत्र होकर, उत्पन्न होता है, अनुग्रह की अवस्था में, और हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह द्वारा, जो दूसरा आदम है, पुत्रों के लेपालकपन में, स्थानान्तरण है; यह स्थानान्तरण, सुसमाचार की घोषणा के बाद, नया जन्म पाने की व्यवस्था या उसकी इच्छा के बिना नहीं हो सकता; जैसा लिखा है, "जब तक कोई नए सिरे से जन्म न ले," इत्यादि।
वयस्कों में धर्मी ठहराए जाने के लिए तैयारी की आवश्यकता, और वह कहाँ से होती है।
VI. महासभा घोषणा करती है कि वयस्कों में इस धर्मी ठहराए जाने का आरम्भ यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के पूर्वगामी अनुग्रह से निकलना चाहिए; अर्थात् उसकी बुलाहट से, जिसके द्वारा वे बिना अपनी किसी वर्तमान योग्यता के बुलाए जाते हैं, ताकि जो पापों के कारण परमेश्वर से दूर हो गए थे, वे उसके प्रेरक और सहायक अनुग्रह से, उसी अनुग्रह को स्वतंत्रता से मानकर और उसके साथ सहयोग करके, अपने धर्मी ठहराए जाने के लिए फिरने को तैयार किए जाएँ। इस प्रकार, जब परमेश्वर अपने आत्मा के प्रकाश से मनुष्य के हृदय को छूता है, तब मनुष्य स्वयं उस प्रेरणा को ग्रहण करने में कुछ भी नहीं करता, क्योंकि वह उसे ठुकरा सकता है; और फिर भी वह परमेश्वर के अनुग्रह के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा से उसके सम्मुख धर्मी ठहराए जाने की ओर कोई गति नहीं कर सकता। इसलिए पवित्रशास्त्र में, जब कहा जाता है, "तुम मेरी ओर फिरो, तो मैं तुम्हारी ओर फिरूँगा," तब हमें हमारी स्वतंत्रता का स्मरण कराया जाता है; और जब हम उत्तर देते हैं, "हे यहोवा, हमें अपनी ओर फिरा, तो हम फिर जाएँगे," तब हम स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का अनुग्रह हमसे आगे चलता है।
धर्मी ठहराए जाने की रीति।
VII. मनुष्य धार्मिकता के लिए तब तैयार होते हैं जब वे ईश्वरीय अनुग्रह से जगाए और सहायता पाए हुए होते हैं, और सुनने से विश्वास ग्रहण करके स्वतंत्रता से परमेश्वर की ओर प्रेरित होते हैं, उन बातों को सत्य मानते हुए जो ईश्वरीय रीति से प्रकट और प्रतिज्ञात हुई हैं, और विशेषकर इसे कि दुष्ट उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, परमेश्वर के अनुग्रह से धर्मी ठहराया जाता है; और अपने आपको पापी जानते हुए, ईश्वरीय न्याय के भय से फिरकर, जिससे वे हितकारी रीति से डरकर परमेश्वर की दया पर विचार करने लगते हैं, वे आशा में उठाए जाते हैं, इस भरोसे में कि परमेश्वर मसीह के द्वारा उन पर प्रसन्न होगा, और वे उससे सारी धार्मिकता के स्रोत के रूप में प्रेम करने लगते हैं; और इस प्रकार वे पाप के विरुद्ध किसी घृणा और तिरस्कार से प्रेरित होते हैं, अर्थात् उस पश्चाताप से जो बपतिस्मा से पहले किया जाना चाहिए; संक्षेप में, जब वे बपतिस्मा लेने, नया जीवन आरम्भ करने और ईश्वरीय आज्ञाओं का पालन करने का संकल्प करते हैं। इसी तैयारी के विषय में लिखा है, "जो परमेश्वर के पास आता है, उसे विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है;" और, "हे पुत्र, ढाढ़स बाँध, तेरे पाप क्षमा हुए;" और, "यहोवा का भय पाप को दूर करता है;" "मन फिराओ, और तुम में से हर एक यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले, तो तुम पापों की क्षमा पाओगे, और पवित्र आत्मा का दान पाओगे;" "जाओ, सब जातियों को चेला बनाओ, और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सिखाओ कि उन सब बातों को मानें जिनकी मैंने तुम्हें आज्ञा दी है;" और अन्त में, "अपने मन को यहोवा के लिए तैयार करो," इत्यादि।
भक्तिहीन मनुष्य का धर्मी ठहराया जाना क्या है, और उसके कारण क्या हैं।
VIII. इस तैयारी या प्रवृत्ति के बाद धर्मी ठहराया जाना आता है, जो केवल पापों की क्षमा नहीं, वरन् पवित्रीकरण और भीतरी मनुष्य का नवीकरण भी है, अनुग्रह और दानों को स्वेच्छा से ग्रहण करने के द्वारा; जिससे मनुष्य अधर्मी से धर्मी, बैरी से मित्र बन जाता है, कि अनन्त जीवन की आशा के अनुसार वारिस हो। धर्मी ठहराए जाने के कारण ये हैं: — अन्तिम कारण परमेश्वर और मसीह की महिमा और अनन्त जीवन है: निमित्त कारण दयालु परमेश्वर है, जो सेंतमेंत धोता और पवित्र करता है, और प्रतिज्ञा के पवित्र आत्मा से, जो हमारी मीरास का बयाना है, मुहर लगाता और अभिषेक करता है: योग्यता का कारण उसका प्रिय, एकलौता पुत्र, हमारा प्रभु यीशु मसीह है, जिसने, जब हम बैरी थे, उस बड़े प्रेम के कारण जिससे उसने हमसे प्रेम किया, क्रूस की लकड़ी पर अपने परम पवित्र दुःखभोग से धर्मी ठहराए जाने की योग्यता प्राप्त की, और हमारे लिए पिता को सन्तुष्ट किया: साधन कारण बपतिस्मा का संस्कार है, जो विश्वास का संस्कार है, जिसके बिना धर्मी ठहराया जाना कभी प्राप्त नहीं होता: अन्त में, एकमात्र रूपात्मक कारण परमेश्वर की धार्मिकता है, वह नहीं जिससे वह स्वयं धर्मी है, परन्तु वह जिससे वह हमें धर्मी बनाता है, अर्थात् जिसे वह हमें देता है और जिससे हम अपने मन की आत्मा में नए किए जाते हैं, और केवल धर्मी गिने ही नहीं जाते, वरन् सचमुच धर्मी कहलाते और होते हैं, हममें से हर एक अपनी धार्मिकता को अपने भीतर उस माप के अनुसार पाता है जो पवित्र आत्मा हर एक को अपनी इच्छा से बाँटता है, और हर एक की उचित प्रवृत्ति और सहयोग के अनुसार। क्योंकि यद्यपि कोई मनुष्य तब तक धर्मी नहीं हो सकता जब तक मसीह के दुःखभोग की योग्यता उसे पहुँचाई न जाए, तथापि भक्तिहीन के इसी धर्मी ठहराए जाने में यह तब होता है जब उसी पवित्र दुःखभोग की योग्यता से परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा धर्मी ठहराए हुओं के हृदयों में उण्डेला जाता है और उनमें बस जाता है। इसलिए धर्मी ठहराए जाने में ही, पापों की क्षमा के साथ, मनुष्य यीशु मसीह के द्वारा, जिसमें वह कलम लगाया जाता है, ये सब बातें एक ही समय में उण्डेली हुई पाता है, अर्थात् विश्वास, आशा और प्रेम; क्योंकि विश्वास, यदि उसमें आशा और प्रेम न मिलें, तो न मसीह से पूर्ण रूप से जोड़ता है और न उसकी देह का जीवित अंग बनाता है; इसी कारण यह अत्यन्त सत्य कहा गया है कि विश्वास कर्मों के बिना मरा हुआ और निष्क्रिय होगा, और यह कि मसीह यीशु में न खतना कुछ काम का है न खतनारहित होना, परन्तु वह विश्वास जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है। यह विश्वास बपतिस्मा के संस्कार से पहले, प्रेरितों की परम्परा के अनुसार, बपतिस्मा के उम्मीदवार कलीसिया से माँगते हैं जब वे अनन्त जीवन उत्पन्न करनेवाला विश्वास माँगते हैं; जिस जीवन को विश्वास आशा और प्रेम के बिना उत्पन्न नहीं कर सकता। इसलिए वे तुरन्त मसीह के ये शब्द भी सुनते हैं, "यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को मान।" अतः सच्ची और मसीही धार्मिकता को पहले वस्त्र के रूप में ग्रहण करके, उस वस्त्र के स्थान पर जो आदम ने अपनी अवज्ञा से खो दिया — अपने लिए भी और हमारे लिए भी खो दिया — एक सुन्दर और निष्कलंक वस्त्र, जो उन्हें यीशु मसीह ने दिया है, जिसे नया जन्म पाने पर उन्हें सँभालकर रखने का आदेश दिया जाता है, ताकि वे उसे हमारे प्रभु यीशु मसीह के न्याय-आसन के सामने प्रस्तुत करें और अनन्त जीवन पाएँ।
इसे किस रीति से समझना चाहिए कि भक्तिहीन मनुष्य विश्वास से और सेंतमेंत धर्मी ठहराया जाता है।
IX. जब प्रेरित कहता है कि मनुष्य विश्वास से और सेंतमेंत धर्मी ठहरता है, तो इन शब्दों को उस अर्थ में समझना चाहिए जिसे कैथोलिक कलीसिया के निरन्तर अर्थ ने थामा और व्यक्त किया है, अर्थात् यह कि हम इसलिए विश्वास से धर्मी ठहराए जाने वाले कहलाते हैं कि विश्वास उद्धार का आरम्भ, सारे धर्मी ठहराए जाने की नींव और जड़ है, जिसके बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना और परमेश्वर के पुत्र की सहभागिता तक पहुँचना असम्भव है। और हम सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाने वाले इसलिए कहलाते हैं कि धर्मी ठहराए जाने से पहले की कोई भी बात, चाहे विश्वास हो या कर्म, स्वयं धर्मी ठहराए जाने के अनुग्रह के योग्य नहीं ठहराती; क्योंकि यदि यह अनुग्रह से है, तो फिर कर्मों से नहीं, नहीं तो अनुग्रह फिर अनुग्रह न रहा।
विधर्मियों के व्यर्थ भरोसे के विरुद्ध।
X. परन्तु यद्यपि यह विश्वास करना आवश्यक है कि पाप मसीह के द्वारा ईश्वरीय दया से सेंतमेंत ही क्षमा होते हैं, न कभी अन्यथा क्षमा हुए हैं, तथापि अपने पापों की क्षमा के भरोसे और निश्चय का घमण्ड करनेवाले किसी भी व्यक्ति से यह नहीं कहना चाहिए कि उसके पाप क्षमा हो गए हैं या क्षमा हो चुके हैं; क्योंकि यह व्यर्थ भरोसा, जो भक्ति से सर्वथा दूर है, विधर्मियों और फूट डालनेवालों में हो सकता है, बल्कि हमारे अपने समय में है, और कैथोलिक कलीसिया के प्रति बड़ी शत्रुता के साथ सराहा जाता है। न ही यह कहना चाहिए कि जो सचमुच धर्मी ठहराए गए हैं, उन्हें अपने मन में बिना किसी प्रकार के सन्देह के यह ठहरा लेना शोभा देता है कि वे सचमुच धर्मी ठहराए गए हैं, और कोई मनुष्य पाप से मुक्त और धर्मी ठहराया नहीं जाता सिवाय उसके जो निश्चय से विश्वास करता है कि वह छुड़ाया गया और धर्मी ठहराया गया है, और कि छुटकारा और धर्मी ठहराया जाना केवल इसी विश्वास से मिलता है; मानो जो कोई इसे विश्वास नहीं करता वह परमेश्वर की प्रतिज्ञा और मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान की प्रभावशीलता पर सन्देह कर रहा हो। क्योंकि जैसे किसी भक्त मनुष्य को परमेश्वर की दया, मसीह की योग्यता, और संस्कारों के गुण और प्रभाव पर सन्देह नहीं करना चाहिए, वैसे ही हर एक, अपनी निर्बलता और अनिच्छा को देखते हुए, अपनी अनुग्रहपूर्ण अवस्था के विषय में भय और भयभीत होने की दशा में हो सकता है; क्योंकि कोई मनुष्य विश्वास के उस निश्चय से यह नहीं जान सकता, जिसमें कोई छिपी भूल न हो सकती हो, कि उसने परमेश्वर का अनुग्रह पाया है।
पाए हुए धर्मी ठहराए जाने की वृद्धि के विषय में।
XI. इस प्रकार धर्मी ठहराए जाकर और परमेश्वर के मित्र और घराने के लोग बनकर, बल पर बल पाते हुए वे, प्रेरित के कथनानुसार, दिन-प्रतिदिन नए किए जाते हैं, अर्थात् अपने शरीर के अंगों को मारते हुए, और परमेश्वर से पवित्रीकरण के लिए पाए हुए धार्मिकता के उन हथियारों को दिखाते हुए, यीशु मसीह के अनुग्रह से, धार्मिकता में ही परमेश्वर और कलीसिया की आज्ञाओं के पालन के द्वारा। विश्वास भले कर्मों के साथ सहयोग करता हुआ, वे अधिकाधिक बढ़ते और धर्मी ठहराए जाते हैं, जैसा लिखा है, "जो धर्मी है वह और भी धर्मी बनता जाए;" और फिर, "मृत्यु तक भी धर्मी ठहराए जाने से मत डर;" और फिर, "तुम देखते हो कि मनुष्य केवल विश्वास से नहीं वरन् कर्मों से धर्मी ठहरता है।" धार्मिकता की इसी वृद्धि के लिए पवित्र कलीसिया प्रार्थना करती है, जब वह कहती है, "हे प्रभु, हमारा विश्वास, आशा और प्रेम बढ़ा," इत्यादि।
आज्ञाओं के पालन के विषय में — उसकी आवश्यकता और सम्भावना।
XII. कोई मनुष्य, चाहे कितना ही धर्मी ठहराया गया हो, अपने को आज्ञाओं के पालन से मुक्त न समझे; कोई मनुष्य वह दुस्साहसी कथन न कहे जो पिताओं द्वारा अभिशाप के अधीन वर्जित किया गया है, कि धर्मी ठहराए हुए मनुष्य के लिए परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन असम्भव है; क्योंकि परमेश्वर असम्भव का आदेश नहीं देता, परन्तु आदेश देकर तुझे चिताता है कि जो तू कर सकता है वह कर, और जो नहीं कर सकता वह माँग, और सहायता करता है कि तू कर सके। उसकी आज्ञाएँ भारी नहीं हैं; उसका जूआ सहज और उसका बोझ हलका है। क्योंकि जो परमेश्वर के हैं वे मसीह से प्रेम करते हैं, और जो उससे प्रेम करते हैं, जैसा वह स्वयं गवाही देता है, वे उसकी आज्ञाओं को मानते हैं, जैसा कि वे ईश्वरीय सहायता से सचमुच कर सकते हैं। क्योंकि इस नश्वर जीवन में, वे कितने ही धर्मी और पवित्र क्यों न हों, हलके और दैनिक पापों में गिर सकते हैं, जिन्हें क्षम्य भी कहा जाता है; और जब वे गिरते हैं तब वे इससे धर्मी होना नहीं छोड़ते, क्योंकि ये शब्द धर्मी लोग कहते हैं, और ये नम्र भी हैं और सत्य भी, "हमारे अपराध क्षमा कर।" इससे यह निकलता है कि धर्मियों को अपने ऊपर धार्मिकता के मार्ग पर चलने का और भी बड़ा दायित्व समझना चाहिए, कि पाप से छूटकर और परमेश्वर के दास बनकर, संयम, धार्मिकता और भक्ति से जीते हुए, वे यीशु मसीह के द्वारा, जिसके द्वारा उन्हें उस अनुग्रह में पहुँच मिली है, उन्नति कर सकें: क्योंकि परमेश्वर उन्हें, जो एक बार उसके अनुग्रह से धर्मी ठहराए गए, नहीं त्यागता, जब तक कि वे पहले उसे न त्याग दें।
इसलिए किसी मनुष्य को केवल विश्वास पर अपने आपको बहलाना नहीं चाहिए, यह सोचकर कि केवल विश्वास से वह वारिस ठहराया गया है और मीरास पाएगा, चाहे वह मसीह के साथ दुःख न उठाए, कि उसके साथ महिमा भी पाए। क्योंकि मसीह ने स्वयं, परमेश्वर का पुत्र होते हुए भी, आज्ञाकारिता उन दुःखों से सीखी जो उसने उठाए; और सिद्ध किया जाकर, उन सब के लिए जो उसकी आज्ञा मानते हैं, अनन्त उद्धार का कर्ता बन गया। इसी प्रकार प्रेरित स्वयं धर्मी ठहराए हुओं को चिताता है, यह कहकर, "क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ में दौड़नेवाले सब तो दौड़ते हैं, परन्तु इनाम एक ही पाता है? तुम ऐसे दौड़ो कि जीतो। इसलिए मैं तो इस रीति से दौड़ता हूँ, परन्तु बे-ठिकाने नहीं; मैं मुक्कों से लड़ता हूँ, परन्तु उसके समान नहीं जो हवा को पीटता है; परन्तु मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में लाता हूँ, ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके मैं आप ही निकम्मा ठहरूँ।" फिर, प्रेरितों का प्रधान पतरस कहता है, "भले कर्मों के द्वारा अपनी बुलाहट और चुने जाने को सुदृढ़ करने का यत्न करो, क्योंकि ऐसा करने से तुम कभी पाप नहीं करोगे।" इससे प्रकट है कि वे लोग धर्म के सच्चे सिद्धान्त का विरोध करते हैं जो कहते हैं कि हर भले कर्म में धार्मिक मनुष्य कम से कम क्षम्य पाप तो करता ही है, या, जो और भी असह्य है, अनन्त दण्ड के योग्य ठहरता है; वैसे ही वे भी जो मानते हैं कि धर्मी सब कर्मों में पाप करते हैं, यदि अपनी सुस्ती को जगाते हुए और अपने आपको दौड़ दौड़ने का उपदेश देते हुए, यद्यपि वे मुख्यतः यह इसलिए करते हैं कि परमेश्वर की महिमा हो, वे अनन्त प्रतिफल पर भी दृष्टि रखते हैं; क्योंकि लिखा है, "मैंने तेरे धर्म के कार्यों को करने के लिए अपना मन झुकाया है, प्रतिफल के कारण;" और प्रेरित मूसा के विषय में कहता है, कि "उसकी आँखें प्रतिफल पर लगी थीं।"
पूर्वनियति के विषय में, उतावले दुस्साहस से सावधान रहना आवश्यक है।
XIII. कोई मनुष्य भी, जब तक वह इस नश्वर जीवन में जीता है, पूर्वनियति के गुप्त भेद पर इतना भरोसा न करे कि निश्चय से ठहरा ले कि वह स्वयं पूर्वनियत लोगों की गिनती में है; मानो यह सच हो कि धर्मी ठहराया हुआ मनुष्य फिर पाप नहीं कर सकता, या, यदि पाप करे, तो अपने लिए निश्चित मन फिराव की प्रतिज्ञा कर सकता है। क्योंकि विशेष प्रकाशन के बिना यह नहीं जाना जा सकता कि वे कौन हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपने लिए चुना है।
अन्त तक स्थिर रहने के दान के विषय में।
XIV. अन्त तक स्थिर रहने के दान के विषय में भी यही सत्य है, जिसके विषय में लिखा है, "जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा:" यह ऐसी बात है जो उसके सिवा कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती जो खड़े हुए को स्थिरता से खड़ा रखने और गिरे हुए को उठाने में समर्थ है। कोई मनुष्य किसी बात की पूर्ण निश्चयता अपने लिए वचन न दे, यद्यपि सब को परमेश्वर की सहायता में सबसे दृढ़ आशा रखनी और विश्राम करना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर, यदि वे स्वयं उसके अनुग्रह में कमी न करें, जैसे उसने भले कार्य का आरम्भ किया है वैसे उसे पूरा भी करेगा, उनमें इच्छा और काम दोनों करने का प्रभाव डालते हुए। फिर भी जो समझते हैं कि वे खड़े हैं, वे चौकस रहें कि कहीं गिर न पड़ें, और भय और काँपते हुए अपने उद्धार का कार्य परिश्रम में, जागरण में, और दान में, प्रार्थनाओं और भेंटों में, उपवासों और पवित्रता में पूरा करें। क्योंकि यह जानते हुए कि वे महिमा की आशा के लिए नया जन्म पा चुके हैं, परन्तु अभी महिमा के लिए नहीं, उन्हें उस संघर्ष के विषय में भयभीत रहना चाहिए जो शैतान, संसार और शरीर के साथ शेष है; जिसमें वे तब तक विजयी नहीं हो सकते जब तक वे परमेश्वर के अनुग्रह से उस प्रेरित की आज्ञा न मानें जो कहता है, "हम शरीर के कर्जदार नहीं कि शरीर के अनुसार जीवन बिताएँ; क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार जीओगे तो मरोगे, परन्तु यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मार डालोगे तो जीवित रहोगे।"
पतित लोगों और उनकी पुनःप्राप्ति के विषय में।
XV. जो लोग धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह पाने के बाद पाप में गिर गए हैं, वे फिर धर्मी ठहराए जा सकते हैं, जब परमेश्वर उन्हें मन फिराव के संस्कार द्वारा जगाए और वे मसीह की योग्यता से खोए हुए अनुग्रह को पुनः पाने में सफल हों। क्योंकि पतितों की यह बहाली धर्मी ठहराए जाने की एक रीति है, और पिताओं ने इसे खोए हुए अनुग्रह के जहाज़ डूबने के बाद की दूसरी तख्ती उचित ही कहा है। क्योंकि उनके लिए जो बपतिस्मा के बाद पाप में गिरते हैं, मसीह यीशु ने मन फिराव का संस्कार ठहराया, जहाँ वह कहता है, "पवित्र आत्मा लो: जिनके पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिए क्षमा किए गए हैं, और जिनके तुम रखो वे रखे गए हैं।" इससे यह निकलता है कि गिरने के बाद एक मसीही मनुष्य का मन फिराव बपतिस्मा-सम्बन्धी मन फिराव से बहुत भिन्न है; और उसमें केवल पाप से रुकना और उससे घृणा करना, या दीन और टूटा हुआ मन ही नहीं, वरन् पाप का संस्कार-सम्बन्धी अंगीकार भी है, जो कम से कम इच्छा में और अपने समय पर किया जाना चाहिए, और याजकीय पापमुक्ति भी; साथ ही उपवास, दान, प्रार्थना और आत्मिक जीवन के अन्य भक्तिपूर्ण अभ्यासों द्वारा प्रायश्चित: अनन्त दण्ड के लिए नहीं, जो संस्कार की इच्छा मात्र से भी दोष के साथ क्षमा हो जाता है, परन्तु सामयिक दण्ड के लिए, जो, जैसा पवित्रशास्त्र कहता है, उन लोगों को, जो परमेश्वर के पाए हुए अनुग्रह के प्रति कृतघ्न होकर पवित्र आत्मा को शोकित करते हैं और परमेश्वर के मन्दिर को अशुद्ध करने से नहीं डरते, बपतिस्मा की तरह सदा पूरी तरह क्षमा नहीं किया जाता । इसी मन फिराव के विषय में लिखा है, "स्मरण कर कि तू कहाँ से गिरा है, और मन फिरा और पहले के समान काम कर।" फिर, "जो उदासी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होती है वह ऐसा मन फिराव उत्पन्न करती है जिसका परिणाम स्थिर उद्धार है।" और फिर, "मन फिराओ, और मन फिराव के योग्य फल लाओ।"
किसी भी घातक पाप से अनुग्रह खो जाता है, परन्तु विश्वास नहीं।
XVI. कुछ लोगों की चालाकी के विरुद्ध, जो चिकनी-चुपड़ी बातों और मीठे शब्दों से भोले लोगों के हृदयों को बहकाते हैं, यह कहना चाहिए कि न केवल अविश्वास से, जिससे स्वयं विश्वास भी खो जाता है, वरन् किसी भी अन्य घातक पाप से भी, यद्यपि विश्वास नहीं खोता, धर्मी ठहराए जाने में पाया हुआ अनुग्रह खो जाता है: इस प्रकार ईश्वरीय व्यवस्था के उस सिद्धान्त की रक्षा करते हुए जो स्वर्ग के राज्य से न केवल अविश्वासियों को, वरन् उन विश्वासियों को भी बाहर रखता है जो व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, लौण्डेबाज़, पुरुषगामी, चोर, लोभी, पियक्कड़, गाली देनेवाले, अन्धेर करनेवाले, और अन्य सब हैं जो घातक पाप करते हैं, जिनसे वे ईश्वरीय अनुग्रह की सहायता से बच सकते हैं, और जिनका प्रभाव उन्हें मसीह के अनुग्रह से अलग कर देना है।
धर्मी ठहराए जाने के फल के विषय में, अर्थात् भले कर्मों की योग्यता और स्वयं योग्यता के स्वरूप के विषय में।
XVII. इस प्रकार धर्मी ठहराए हुए मनुष्यों के सामने, चाहे उन्होंने पाए हुए अनुग्रह को निरन्तर बनाए रखा हो या खोकर फिर पाया हो, प्रेरित के ये शब्द रखे जाएँ, "हर एक भले कार्य में बढ़ते जाओ, यह जानकर कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है; क्योंकि परमेश्वर अन्यायी नहीं कि तुम्हारे काम और उस प्रेम को भूल जाए जो तुमने उसके नाम के लिए दिखाया:" और "अपना हियाव न छोड़ो, जिसका प्रतिफल बड़ा है।" इसलिए जो अन्त तक भला काम करते और परमेश्वर में आशा रखते हैं, उनके सामने अनन्त जीवन रखा जाए, दोनों रूपों में, यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की सन्तानों से दया से की गई प्रतिज्ञा के दान के रूप में, और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार उनके भले कर्मों और योग्यताओं के लिए विश्वासयोग्यता से चुकाए जानेवाले प्रतिफल के रूप में। क्योंकि यही धार्मिकता का मुकुट है, जो उनके संघर्ष और दौड़ के बाद, जैसा प्रेरित कहता है, उनके लिए रखा हुआ है, कि धर्मी न्यायी उन्हें दे, और केवल उन्हें नहीं, वरन् उन सब को जो उसके प्रकट होने की बाट जोहते हैं। क्योंकि इसे देखते हुए कि स्वयं मसीह, जैसे सिर अंगों में और दाखलता डालियों में, धर्मी ठहराए हुओं में निरन्तर अपना गुण उण्डेलता रहता है — ऐसा गुण जो उनके भले कर्मों से सदा पहले चलता, साथ रहता और पीछे आता है, और जिनके बिना वे कर्म किसी प्रकार परमेश्वर को ग्रहणयोग्य और योग्यतापूर्ण नहीं हो सकते — यह विश्वास करना चाहिए कि धर्मी ठहराए हुओं में और कुछ भी घटता नहीं कि वे उन कर्मों से जो परमेश्वर में किए जाते हैं, इस जीवन की अवस्था के अनुसार ईश्वरीय व्यवस्था को पूरी रीति से पूरा करें, और यथासमय अनन्त जीवन की प्राप्ति के सचमुच योग्य ठहरें, बशर्ते कि वे अनुग्रह में मरें: क्योंकि हमारा उद्धारकर्ता मसीह कहता है, "यदि कोई उस जल में से पीए जो मैं उसे दूँगा, तो वह कभी प्यासा न होगा, वरन् वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिए उमड़ता रहेगा।" इस प्रकार न तो हमारी अपनी धार्मिकता ऐसे स्थापित होती है मानो वह यथार्थ में हम से हो, और न परमेश्वर की धार्मिकता की उपेक्षा या अस्वीकार किया जाता है: क्योंकि जो धार्मिकता हमारी कहलाती है, क्योंकि उसके हममें बसने से हम धर्मी ठहराए जाते हैं, वही परमेश्वर की भी धार्मिकता है, क्योंकि वह मसीह की योग्यताओं के द्वारा परमेश्वर से हममें उण्डेली गई है।
फिर भी इसे छोड़ना नहीं चाहिए। यद्यपि पवित्रशास्त्र में भले कर्मों को इतना कुछ दिया गया है कि मसीह प्रतिज्ञा करता है कि जो उसके चेलों में से किसी को एक कटोरा ठण्डा पानी देगा वह अपना प्रतिफल न खोएगा, और प्रेरित गवाही देता है कि हमारा क्षणिक और हलका क्लेश हमारे लिए अत्यन्त महान, अनन्त महिमा का भार उत्पन्न करता जाता है; तथापि किसी मसीही मनुष्य के लिए यह दूर की बात है कि वह अपने आप पर भरोसा करे या अपने आप पर घमण्ड करे, प्रभु पर नहीं, जिसकी भलाई सब मनुष्यों के प्रति इतनी बड़ी है कि वह अपने ही दानों को उनकी योग्यता गिनने में प्रसन्न है। और चूँकि हम सब बहुत बातों में चूकते हैं, इसलिए हम में से हर एक को दया और भलाई के अतिरिक्त न्याय और कठोरता भी अपनी आँखों के सामने रखनी चाहिए; और किसी को, भले ही वह अपने विषय में कुछ न जानता हो, अपना न्याय नहीं करना चाहिए, क्योंकि मनुष्यों के सारे जीवन की परख और न्याय मानवीय न्याय से नहीं, परन्तु परमेश्वर के न्याय से होना है, जो अन्धकार की छिपी बातों को उजागर करेगा और मनों की युक्तियाँ प्रकट करेगा: और तब हर एक की प्रशंसा परमेश्वर की ओर से होगी, जो, जैसा लिखा है, हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा।
धर्मी ठहराए जाने के इस कैथोलिक सिद्धान्त के बाद, जिस पर यदि कोई विश्वासयोग्यता और दृढ़ता से विश्वास न करे तो वह धर्मी नहीं ठहर सकता, पवित्र महासभा को यह उचित लगा कि आगे दिए गए नियम जोड़े जाएँ, ताकि सब जान लें कि उन्हें क्या मानना और अपनाना चाहिए, और किससे बचना और दूर रहना चाहिए।
