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पाँचवें अधिवेशन का दूसरा आदेश
पवित्र महासभा ने, परम महायाजकों और स्वीकृत महासभाओं के भक्तिपूर्ण विधानों का पालन करते हुए, उन्हें अपनाते हुए और उनमें जोड़ते हुए, ताकि पवित्र पुस्तकों का वह स्वर्गीय भण्डार, जिसे पवित्र आत्मा ने बड़ी उदारता से मनुष्यों को सौंपा है, उपेक्षित पड़ा न रहे, यह ठहराया और आदेश दिया है कि उन कलीसियाओं में जिनमें पवित्र ईश्वरविज्ञान के व्याख्याताओं के लिए प्रेबेन्ड या प्रेस्टिमोनी, या किसी अन्य नाम से पुकारा जानेवाला कोई अन्य वेतन निर्धारित पाया जाए, वहाँ के धर्माध्यक्ष, महाधर्माध्यक्ष, प्राइमेट और अन्य साधारण अधिकारी इस प्रकार के प्रेबेन्ड, प्रेस्टिमोनी या वेतन के धारकों को विवश और बाध्य करेंगे कि वे यदि योग्य हों तो स्वयं पवित्र शास्त्र की व्याख्या और अर्थ-प्रकाशन करें; नहीं तो किसी योग्य स्थानापन्न द्वारा, जिसे उन स्थानों के धर्माध्यक्ष, महाधर्माध्यक्ष, प्राइमेट और अन्य साधारण अधिकारी चुनें, और यह फलों को रोक लेने के दण्ड के अधीन। भविष्य में इस प्रकार के प्रेबेन्ड, प्रेस्टिमोनी और वेतन केवल उन्हीं को दिए जाएँ जो योग्य हों और स्वयं यह पद सँभाल सकें, और जो भी नियुक्ति अन्यथा की जाए वह शून्य और अमान्य हो।
महानगरीय या प्रधान कलीसियाओं में, यदि नगर प्रतिष्ठित या घनी आबादी का हो, और किसी महत्त्वपूर्ण कस्बे में स्थित महाविद्यालयों में भी, चाहे वे धर्मप्रान्त के ही अंग हों, यदि वहाँ पादरी-वर्ग बड़ा हो, जहाँ इस प्रकार का कोई प्रेबेन्ड, प्रेस्टिमोनी या वेतन निर्धारित न पाया जाए, वहाँ किसी भी कारण से रिक्त होनेवाला पहला वेतन, (त्यागपत्र को छोड़कर,) समझा जाए कि वह ipso facto उसी प्रयोजन के लिए सदा के लिए ठहरा और नियत हो गया। और जब कभी स्वयं उन कलीसियाओं में कोई प्रेबेन्ड न हो, या अपर्याप्त हो, तब महानगरीय अधिकारी, या धर्माध्यक्ष, किसी साधारण पद के फलों को नियत करके, (उसके उचित भारों के अधीन रहते हुए,) या अपने नगर या धर्मप्रान्त के पदधारियों के अंशदान से, या अन्य किसी रीति से जो अधिक सुविधाजनक हो, अध्याय-सभा की सलाह से पवित्र शास्त्रों पर व्याख्यान दिए जाने का प्रबन्ध करे, इस बात का सदा ध्यान रखते हुए कि प्रथा या अन्य किसी रीति से नियुक्त अन्य व्याख्यान इस कारण किसी भी रीति से छूट न जाएँ।
जिन कलीसियाओं की वार्षिक आय अल्प है, और पादरियों और लोगों की संख्या इतनी कम है कि ईश्वरविज्ञान का व्याख्यान-पद सुविधा से स्थापित नहीं हो सकता, वे कम से कम एक गुरु रखें, जिसे धर्माध्यक्ष अध्याय-सभा की सलाह से चुने, जो पादरियों और अन्य निर्धन विद्यार्थियों को निःशुल्क व्याकरण सिखाए, ताकि परमेश्वर की इच्छा से वे आगे चलकर पवित्र शास्त्रों के अध्ययन की ओर बढ़ सकें। इसलिए उस व्याकरण-गुरु को या तो किसी साधारण पद के फल दिए जाएँ, जिन्हें वह तब तक पाता रहे जब तक वह पढ़ाता रहे, इस शर्त के साथ कि उस पद की अपनी नियत सेवा में कमी न की जाए; या अध्याय-सभा या धर्माध्यक्ष की मेज़ से कोई उचित वेतन दिया जाए; या अन्यथा धर्माध्यक्ष स्वयं अपनी कलीसिया और धर्मप्रान्त के अनुकूल कोई योजना अपनाए, ताकि यह भक्तिपूर्ण, उपयोगी और हितकारी प्रबन्ध किसी भी बहाने से उपेक्षित न हो।
इसी प्रकार भिक्षुओं के मठों में भी, जब सुविधा से हो सके, पवित्र शास्त्र का एक व्याख्यान-पद स्थापित किया जाए: यदि इस विषय में मठाधीश उपेक्षा करें, तो धर्मप्रान्त के धर्माध्यक्ष यह देखें कि प्रेरितीय पीठ के प्रतिनिधि उन्हें विवश करने के उचित उपाय करें।
अन्य नियमबद्ध संन्यासियों के उन आश्रमों में जहाँ साहित्यिक कार्य सुविधा से फल-फूल सकते हैं, उसी प्रकार पवित्र शास्त्र का व्याख्यान स्थापित किया जाए, और यह व्याख्यान सामान्य या प्रान्तीय अध्याय-सभाओं द्वारा अधिक योग्य गुरुओं को सौंपा जाए।
सार्वजनिक विद्यालयों में, जहाँ यह आदरणीय और सब से अधिक आवश्यक व्याख्यान-पद अब तक नियुक्त नहीं हुआ है, वहाँ अति धार्मिक राजाओं और राज्यों की भक्ति द्वारा कैथोलिक विश्वास की रक्षा और वृद्धि, और खरी शिक्षा के संरक्षण और प्रसार के लिए वह नियुक्त किया जाए। जहाँ वह नियुक्त था, पर उपेक्षित हो गया है, वहाँ वह पुनः स्थापित किया जाए।
और ताकि भक्ति के दिखावे के नीचे अधर्म न फैले, पवित्र महासभा आदेश देती है कि कोई भी व्यक्ति इस व्याख्यान के पद में प्रवेश न करे, जब तक कि उस स्थान के धर्माध्यक्ष द्वारा जीवन, आचरण और ज्ञान के विषय में पहले परखा और अनुमोदित न हो। तथापि यह भिक्षुओं के आश्रमों के व्याख्याताओं पर लागू नहीं समझा जाए।
इसके अतिरिक्त, जो लोग पवित्र शास्त्र की शिक्षा देते हैं, जब तक वे विद्यालयों में सार्वजनिक रूप से पढ़ाते हैं, और वे विद्यार्थी जो इन विद्यालयों में अध्ययन करते हैं, फलों, प्रेबेन्डों और पदों की प्राप्ति के विषय में सामान्य विधि द्वारा दिए गए सब विशेषाधिकारों को अनुपस्थिति में भी पूर्णतः रखें और भोगें।
परन्तु चूँकि सुसमाचार का प्रचार मसीही समाज के लिए व्याख्यान देने से कम आवश्यक नहीं है, और धर्माध्यक्षों का विशेष कर्त्तव्य है, इसलिए पवित्र महासभा ने ठहराया और आदेश दिया है कि सब धर्माध्यक्ष, महाधर्माध्यक्ष, प्राइमेट और कलीसियाओं के अन्य अधिकारी, यदि कोई वैध बाधा न हो तो, स्वयं यीशु मसीह के पवित्र सुसमाचार का प्रचार करने को बाध्य होंगे।
परन्तु यदि ऐसा हो कि उपर्युक्त धर्माध्यक्ष और अन्य लोग किसी वैध बाधा के कारण रोक दिए जाएँ, तो सामान्य महासभा के रूप के अनुसार वे इस प्रचार के कर्त्तव्य को उचित रीति से निभाने के लिए योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करने को बाध्य होंगे। यदि कोई हठपूर्वक आज्ञा मानने से इनकार करे, तो उसे कठोर दण्ड दिया जाए।
प्रधान याजक, पुरोहित, ग्रामीण पासबान, या अन्य किसी रूप में प्राणों की देखभाल का भार सँभालनेवाले भी, चाहे वे अपनी कलीसियाओं को जिस भी अधिकार से धारण करते हों, स्वयं, या यदि वैध बाधा हो तो योग्य व्यक्तियों द्वारा, कम से कम प्रभु के दिन और पर्वों के गम्भीर दिनों में, अपने सुपुर्द किए हुए लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार उद्धारकारी वचनों से चराएँ, उन्हें वे बातें सिखाकर जिन्हें उद्धार पाने के लिए सब को जानना आवश्यक है, और संक्षेप में तथा सरल भाषा में उन्हें वे दोष बताकर जिनसे बचना है और वे गुण बताकर जिनका अनुसरण करना है, ताकि वे अनन्त दण्ड से बचें और स्वर्गीय महिमा पाएँ। यदि कोई इस कर्त्तव्य को निभाने में उपेक्षा करे, चाहे वह किसी न किसी आधार पर धर्माध्यक्ष के अधिकार-क्षेत्र से छूट का दावा करे, या चाहे यह कहा जाए कि वे कलीसियाएँ किसी रीति से मुक्त हैं या किसी मठ से, चाहे वह धर्मप्रान्त के बाहर ही स्थित हो, जोड़ी और मिलाई गई हैं, तो भी, यदि वे स्थान की दृष्टि से धर्मप्रान्त के भीतर हैं, तो धर्माध्यक्षों की सावधान पासबानी देखरेख में कमी न हो, ऐसा न हो कि यह वचन पूरा हो, “बालकों ने रोटी माँगी, पर कोई उन्हें तोड़कर देनेवाला न था।” इसलिए, यदि धर्माध्यक्ष द्वारा चेताए जाने के बाद वे तीन महीने तक अपने कर्त्तव्य में चूकते रहें, तो उन्हें कलीसियाई दण्डों से, या धर्माध्यक्ष के विवेक के अनुसार किसी अन्य रीति से विवश किया जाए, ताकि यदि वह ऐसा उचित समझे तो कोई शोभनीय वेतन पद के फलों में से किसी दूसरे को दिया जाए जो उस कर्त्तव्य को तब तक पूरा करे जब तक मुख्य व्यक्ति पश्चाताप न करे और अपना कार्य न निभाए।
यदि कोई ग्रामीण कलीसियाएँ ऐसे मठों के अधीन पाई जाएँ जो किसी धर्मप्रान्त के भीतर नहीं हैं, और यदि मठाधीश और नियमबद्ध अधिकारी उपर्युक्त बातों में लापरवाह हों, तो उन्हें उन महानगरीय अधिकारियों द्वारा विवश किया जाए जिनके प्रान्तों में वे धर्मप्रान्त स्थित हैं, इस विषय में quoad hoc प्रेरितीय पीठ के प्रतिनिधि के रूप में। और कोई प्रथा, या छूट, या अपील, या आपत्ति, या वसूली की कार्यवाही इस आदेश के क्रियान्वयन को रोकने का प्रभाव न रखे, जब तक कि किसी सक्षम न्यायाधीश द्वारा, जो तथ्यों की साधारण जाँच पर संक्षिप्त रूप से आगे बढ़ सकता है, मामले की जाँच और निर्णय न हो जाए।
परन्तु किसी भी संघ के नियमबद्ध संन्यासी, जब तक कि उनके वरिष्ठों द्वारा जीवन, आचरण और ज्ञान के विषय में उनकी जाँच और अनुमोदन न हो गया हो, और उन्होंने उनसे अनुमति न ले ली हो, अपने ही संघों की कलीसियाओं में भी प्रचार न करें। इस अनुमति के साथ उन्हें स्वयं धर्माध्यक्षों के सामने उपस्थित होना और प्रचार आरम्भ करने से पहले उनसे आशीर्वाद माँगना होगा। परन्तु जो कलीसियाएँ उनके संघों की नहीं हैं, उनमें उन्हें अपने वरिष्ठों की अनुमति के अतिरिक्त धर्माध्यक्ष की अनुमति भी लेनी होगी, जिसके बिना वे अपने संघों से बाहर की कलीसियाओं में किसी भी प्रकार प्रचार न करें। धर्माध्यक्षों को यह अनुमति निःशुल्क देनी होगी। यदि कोई प्रचारक (जो परमेश्वर न करे) लोगों में भ्रम या ठोकरें फैलाए, चाहे वह अपने या किसी दूसरे संघ के मठ में प्रचार करे, तो धर्माध्यक्ष उसे प्रचार करने से रोक दे; और यदि उसने झूठी शिक्षा का प्रचार किया हो, तो उसके विरुद्ध विधि की उचित प्रक्रिया से, या उस स्थान की प्रथा के अनुसार कार्यवाही करे, चाहे प्रचारक सामान्य या विशेष विशेषाधिकार से छूट का दिखावा करे, जिस स्थिति में धर्माध्यक्ष प्रेरितीय अधिकार से, प्रेरितीय पीठ के प्रतिनिधि के रूप में कार्यवाही करे। परन्तु धर्माध्यक्ष यह ध्यान रखें कि किसी प्रचारक पर झूठी सूचना या किसी अन्य रीति से निन्दापूर्वक आक्रमण न किया जाए, और न उसे शिकायत का कोई उचित आधार मिले।
धर्माध्यक्ष इसके अतिरिक्त इस बात से भी सावधान रहें कि वे उनमें से किसी को भी, जो नाम से तो नियमबद्ध संन्यासी हैं परन्तु आश्रम के बाहर रहते हैं और उसके नियमों के अधीन नहीं, या साधारण पुरोहितों में से, जब तक वे उन्हें व्यक्तिगत रूप से ज्ञात और प्रमाणित विद्या और चरित्र के न हों, किसी भी विशेषाधिकार के बहाने भी, अपने नगर या धर्मप्रान्त में प्रचार करने की अनुमति न दें, जब तक कि धर्माध्यक्षों ने इस विषय में पवित्र प्रेरितीय पीठ से परामर्श न कर लिया हो, जिससे यह सम्भव नहीं कि अयोग्य व्यक्तियों ने ऐसे विशेषाधिकार सत्य को छिपाकर, या सीधे झूठ बोलकर के सिवा, हथिया लिए हों।
दान माँगनेवाले याचक, जो साधारणतः क्वेस्टुआरी कहलाते हैं, वे चाहे किसी भी दशा के हों, किसी भी प्रकार स्वयं या दूसरों को लगाकर प्रचार करने का साहस न करें। ऐसा करनेवालों को उन स्थानों के धर्माध्यक्ष और साधारण अधिकारी सब प्रकार से उचित उपायों द्वारा रोकें, चाहे उसके विपरीत कोई भी विशेषाधिकार हो।
यह पवित्र महासभा ठहराती और आदेश देती है कि अगला अधिवेशन प्रेरित सन्त याकूब के पर्व के बाद के बृहस्पतिवार को आयोजित और सम्पन्न किया जाए।
