अध्याय 18

ट्रेन्ट की महासभा के छठे अधिवेशन पर (भाग 2 / 2)

Acts of the Council of Trent with the Antidote · John Calvin

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ट्रेन्ट की महासभा के छठे अधिवेशन पर (भाग 2 / 2)

पेलागियस के अनुयायियों ने भी अगस्तीन को इसी कुतर्क से तंग किया था। वह मानता है कि यदि परमेश्वर चाहे तो मनुष्यों को पूर्णता की इस सीमा तक उठा सकता है, परन्तु उसने कभी ऐसा किया नहीं, और न कभी करेगा, क्योंकि पवित्रशास्त्र इससे भिन्न शिक्षा देता है। मैं इससे आगे बढ़कर यह कहता हूँ कि जिसके विषय में पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि वह कभी न होगा, वह असम्भव है; यद्यपि, यदि हमें किसी शब्द पर ही विवाद करना हो, तो यही बात पतरस ने (प्रेरितों के काम 15) व्यक्त की थी, जब उसने व्यवस्था के जूए को ऐसा बताया जिसे उनके पूर्वज भी न उठा सके। यह समझना भूल है कि यह केवल रीति-विधियों के विषय में है; क्योंकि रीति-विधियों में ऐसा कौन-सा कठिन भार था कि उसके नीचे मनुष्य का सारा बल टूट जाता? वह निस्सन्देह यह कहना चाहता है कि आदि से सारी मानवजाति व्यवस्था के पालन में असमर्थ रही है और अब भी है, और इसलिए मसीह के अनुग्रह की शरण लेने के सिवा कुछ शेष नहीं रहता, जो हमें व्यवस्था के जूए से छुड़ाकर मानो स्वतन्त्र निगरानी में रखता है। और ध्यान देने योग्य है कि वह नया जन्म पाए हुओं के विषय में बोल रहा है, ऐसा न हो कि ट्रेन्ट के पिता कुतर्क करके कहें कि उसने उस शरीर की निर्बलता की बात कही थी जब आत्मा की सहायता न हो। क्योंकि वह दृढ़ता से कहता है कि भविष्यद्वक्ता, कुलपति और भक्त राजा, चाहे परमेश्वर के आत्मा की कितनी ही सहायता पाए हुए क्यों न हों, व्यवस्था का जूआ उठाने में असमर्थ थे; और वह बिना किसी अस्पष्टता के घोषित करता है कि व्यवस्था का पालन असम्भव था।

परन्तु वे दूसरे पक्ष के साक्षी के रूप में भी पवित्रशास्त्र प्रस्तुत करते हैं; क्योंकि यूहन्ना कहता है कि "उसकी आज्ञाएँ कठिन नहीं हैं।" (1 यूहन्ना 5:3।) मैं यह मानता हूँ, बशर्ते आप पापों की क्षमा के उस सिद्धान्त को बाहर न करें जिसे वह सब आज्ञाओं से पहले रखता है। यदि व्यवस्था का पालन करना कठिन नहीं है, तो आप मुझे ऐसे कई निष्पाप मनुष्य दिखाइए जो परमेश्वर को झूठा ठहराते हैं; जैसा कि यूहन्ना ही कहता है। (1 यूहन्ना 1:8।) परन्तु ये मूर्ख यह नहीं सोचते कि जिस सरलता की बात यूहन्ना करता है वह इस पर निर्भर है कि पवित्र लोगों के पास अपनी कमियों को पूरा करने के लिए उपाय तैयार रहता है — वे क्षमा के लिए शरण लेते हैं। इसी कारण मसीह का जूआ सहज और उसका बोझ हलका है, क्योंकि पवित्र लोग अपनी स्वतन्त्रता में उत्साह अनुभव करते हैं, क्योंकि वे अपने को अब व्यवस्था के अधीन नहीं पाते। पौलुस उन पर उपदेश की यही सबसे उत्तम प्रेरणा लागू करता है। (रोमियों 6:12।) और दाऊद भी सिखाता है, "तेरे यहाँ क्षमा है, ताकि तेरा भय माना जाए।" (भजन संहिता 130:4।) क्षमा की वह आशा मुझसे ले लीजिए, तो व्यवस्था की छोटी-से-छोटी आज्ञा भी एटना पर्वत से भारी बोझ बन जाएगी। परन्तु इन आलसी भिक्षुओं से इसका क्या सम्बन्ध, जिन्होंने यहाँ आज्ञाओं के पालन को, जिसकी सरलता की वे इतने भरोसे से बकबक करते हैं, केवल कनिष्ठा उँगली से छुआ है। वरन् वे इसी एक सिद्धान्त से अपनी अधर्मिता खुलकर प्रकट कर देते हैं। कैसे? यह अद्भुत प्रेरित विलाप करता है कि वह व्यवस्था का जैसा चाहिए वैसा पालन न कर पाने के कारण बन्दी बना हुआ है, और पुकारता है कि यह रोग तब तक नहीं मिट सकता जब तक मृत्यु उसे न मिटाए। (रोमियों 7:23।) ये हृष्ट-पुष्ट आचार्य घमण्ड से मुसकराते हैं और गाते फिरते हैं कि ऐसे विलाप निराधार हैं, क्योंकि मसीह का बोझ हलका है। फिर वे यह जोड़ते हैं, "मसीह के चेले उससे प्रेम रखते हैं, और जो उससे प्रेम रखते हैं वे उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।" (यूहन्ना 14:23।) यह सब सच है। परन्तु मसीह का सिद्ध प्रेम कहाँ है — मेरा अभिप्राय पूरे मन, पूरी बुद्धि और पूरे बल से किए गए प्रेम से है? वहीं, जहाँ शरीर आत्मा के विरुद्ध लालसा नहीं करता और इसलिए इस संसार में तो कहीं भी नहीं। मसीह के चेले उससे सच्चे और हार्दिक स्नेह से प्रेम रखते हैं, और अपने प्रेम के परिमाण के अनुसार उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं। परन्तु उस कठोर सिद्धता की तुलना में, जिसमें कोई कमी नहीं, यह कितना थोड़ा है!

अब समझदार पाठक इन पिताओं के कथनों की संगति पर ध्यान दें। निडरता से यह घोषित करने के बाद कि विश्वासी व्यवस्था को पूरा कर सकते हैं, वे यह भी मानते हैं कि अत्यन्त पवित्र लोग भी कभी-कभी हलके और दैनिक पापों में गिर जाते हैं। पहले मैं पूछता हूँ, क्या कोई ऐसा पाप है, चाहे कितना ही हलका क्यों न हो, जो व्यवस्था के पालन के विपरीत न हो? क्योंकि यदि मनुष्य का मन पूरी तरह परमेश्वर के प्रेम में लगा हो, तो उसमें कौन-सा बुरा विचार रेंगकर आ सकता है? व्यवस्था तब तक सन्तुष्ट नहीं होती जब तक परमेश्वर से पूरे मन से प्रेम न किया जाए। मैं मानता हूँ कि इस कारण मनुष्य धर्मी होना नहीं छोड़ देते। परन्तु ऐसा क्यों, सिवा इसके कि धन्य वे हैं जिनके पाप गिने नहीं जाते? यदि वे कर्मों के द्वारा धर्मी होने पर अड़े रहें, जिन पर उनका विवेक परमेश्वर के सामने विश्राम पा सके, तो वे पहले तो विश्वास को उलट देते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह के साथ असहनीय अन्याय करते हैं; और दूसरे, व्यवस्था के सम्भव पालन के अपने अधर्मी सिद्धान्त को कोई सहारा नहीं दे पाते। यदि वे जिन्हें हलकी चूकें कहते हैं उन्हें कुछ नहीं समझते, तो परम न्यायी का भयानक दण्डादेश गरज उठता है, "जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा।" यद्यपि मैं जानना चाहूँगा कि वे किन पापों को हलका कहते हैं (क्योंकि वे दोष घटाने के लिए ऐसा कहते हैं), और वे यह क्यों कहते हैं कि धर्मी लोग उनमें कभी-कभी गिरते हैं, निरन्तर या बार-बार नहीं; क्योंकि शायद ही कोई क्षण बीतता हो जिसमें हम कोई नया दोष अपने ऊपर न ले लें। उनकी दृष्टि में बुराई की ओर उकसानेवाली सब प्रकार की अभिलाषाएँ हलके पाप हैं, और परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा की ओर धकेलनेवाली सब प्रकार की परीक्षाएँ भी। जो भी हो, यहाँ वे स्पष्ट दुविधा में फँस गए हैं।

इसी शीर्षक के अन्तर्गत आगे जो कहा गया है वह उतना ही अप्रासंगिक है जितना यह सिद्ध करने का प्रयास कि पैरों की गति से यह प्रमाणित होता है कि हाथ अनुभव नहीं करते। वे धर्मपरायण जीवन के लिए कुछ उपदेश इकट्ठे करते हैं। वे इनसे, भला, और क्या निकाल पाएँगे, सिवा उसके जो हमारे लेखों और प्रवचनों से, यहाँ तक कि प्रतिदिन की बातचीत से भी, सौ गुना अच्छी तरह और बिलकुल भिन्न प्रभाव के साथ सीखा जा सकता है, अर्थात् यह कि "परमेश्वर ने हमें अशुद्धता के लिए नहीं, पवित्रता के लिए बुलाया है," कि "परमेश्वर का अनुग्रह प्रकट हुआ है, कि हम शरीर की अभिलाषाओं को इनकार करके इस संसार में भक्ति और पवित्रता से जीवन बिताएँ," कि "हम मसीह के साथ जी उठे हैं कि ऊपर की वस्तुओं पर मन लगाएँ:" (1 थिस्सलुनीकियों 4:7; तीतुस 2:11; कुलुस्सियों 3:12।) परन्तु वे समझते हैं कि उन्होंने कोई बड़ा काम कर दिखाया है जब वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जो लोग मसीह के दुःखों में सहभागी होना नहीं चाहते, उनका स्वर्गीय मीरास पर घमण्ड करना व्यर्थ है। हम इस विषय को कितना अधिक अच्छी तरह समझाते हैं, यह हमारे पाठक स्वयं निर्णय करें। एक अन्तर अवश्य है: हम सिखाते हैं कि हमें मसीह के दुःखों में इसलिए सहभागी होना है कि हम उसके धन्य पुनरुत्थान की सहभागिता तक पहुँचें; (रोमियों 8:17;) हम मसीह को स्वयं उसी से अलग नहीं करते। वे भूल से वह निष्कर्ष निकालते हैं जो किसी भी प्रकार नहीं निकलता — कि मनुष्य दुःख उठाकर अनन्त जीवन के योग्य ठहरते हैं, और उनकी धार्मिकता का एक अंश उसी में निहित है, इसलिए वे पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर नहीं रहते।

परन्तु अपने निष्कर्ष में वे और भी अधिक बेतुके हैं। क्योंकि वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जो लोग यह सिखाते हैं कि धर्मी जन हर भले काम में पाप करता है, कम से कम क्षम्य पाप, वे सब मसीही धर्म के शत्रु हैं। मैं जानना चाहूँगा कि किस तर्कशास्त्र ने उन्हें ऐसा निष्कर्ष निकालना सिखाया: "ऐसे दौड़ो कि जीत जाओ" — अतः पवित्र लोगों के भले कामों में ऐसा कुछ नहीं है जो दोष के योग्य हो। क्या मनुष्य तिगुने मूर्ख नहीं होंगे यदि ऐसे लोग उन्हें समझा दें कि ऐसी मूर्खताएँ पवित्र आत्मा से निकली हैं? परन्तु इस बेतुकेपन को छोड़कर, आइए हम मूल बात को देखें।

उन्हें अनिवार्यतः यह मानना पड़ेगा कि कर्मों का मूल्यांकन उस भीतरी मनोभाव से, जिससे वे उत्पन्न होते हैं, और उस लक्ष्य से, जिसकी ओर वे लक्षित होते हैं, किया जाना चाहिए, न कि उस बाहरी मुखौटे से जिसके नीचे वे मनुष्यों को दिखाई देते हैं: क्योंकि परमेश्वर हृदय को देखता है, जैसा शमूएल से कहा गया था, और उसकी आँखें सत्य पर लगी रहती हैं, जैसा यिर्मयाह हमें स्मरण दिलाता है। परन्तु यह बहुत स्पष्ट है कि परमेश्वर की न्यायसंगत आज्ञाओं का पालन करते समय हम कभी परमेश्वर के प्रति सिद्ध प्रेम से प्रेरित और संचालित नहीं होते। नाना वासनाएँ हमें हमारे मार्ग से हटा देती हैं, ऐसा कि जब परमेश्वर हमें पूरी तेज़ी से दौड़ने की आज्ञा देता है तब हम मुश्किल से चलते हैं; जब हमें पूर्णतः उत्साह से भरा होना चाहिए तब हम मुश्किल से गुनगुने होते हैं। यद्यपि आत्म-प्रवंचना के कारण हमें इस कमी का बोध नहीं होता, तथापि परमेश्वर देखता और न्याय करता है: उसकी दृष्टि में तारे भी मलिन हैं, और सूर्य नहीं चमकता। संक्षेप में, रोमियों का सातवाँ अध्याय इस विवाद का निपटारा कर देता है। वहाँ पौलुस अपनी ओर से और सब भक्तों की ओर से स्वीकार करता है कि वह सिद्धता से दूर है, तब भी जब उसकी इच्छा अपनी सर्वोत्तम दशा में है। इसलिए मनुष्य अपने को जितना चाहे बहला ले, अब तक का सबसे उत्तम काम भी, यदि परमेश्वर द्वारा न्याय में लाया जाए, तो किसी न किसी दाग से कलंकित पाया जाएगा। परन्तु ये कर्म परमेश्वर को स्वीकार्य हैं। इससे कौन इनकार करता है? हम केवल यह कहते हैं कि वे क्षमा के बिना उसे प्रसन्न नहीं कर सकते। परन्तु परमेश्वर पाप के सिवा और क्या क्षमा करता है? अतः इसमें कोई बहुत निन्दनीय बात नहीं कि यह कहा जाए कि सब भले कर्म, जो भी हों, यदि कठोर कड़ाई से परखे जाएँ, तो जीवन के प्रतिफल की अपेक्षा अनन्त दण्ड के अधिक योग्य हैं; क्योंकि जहाँ कहीं पाप है, चाहे कितने ही अल्प अंश में हो, वहाँ कोई भी स्वस्थ बुद्धिवाला मनुष्य इससे इनकार नहीं करेगा कि मृत्यु की सामग्री भी वहाँ पाई जाती है। फिर भी परमेश्वर की असीम दया के कारण, कर्मों का स्वर्ग में प्रतिफल मिलता है, यद्यपि वे ऐसी किसी वस्तु के योग्य न थे, वरन् यदि वह अशुद्धता, जिससे वे अन्यथा मलिन हैं, मसीह के द्वारा धो न दी जाती तो उन्हें अनन्त मृत्यु का दण्ड मिलता। इसके अतिरिक्त मैंने अनेक स्थानों पर दिखाया है कि "प्रतिफल" शब्द के प्रयोग से योग्यता या पुण्य का निष्कर्ष निकालनेवाला तर्क कितना बेतुका है। कारण स्पष्ट है। जिस प्रतिफल को सोफिस्ट लोग पुण्य पर आधारित बताते हैं, वह स्वयं निःशुल्क स्वीकृति पर निर्भर है।

तेरहवें शीर्षक के विषय में: यदि वे केवल वही करते जो शीर्षक कहता है, तो मैं उन्हें अपनी सहमति दे देता। परन्तु जब वे उतावलेपन और ढिठाई को रोकने का दावा करते हुए, अपना सारा प्रयास इसी में लगाते हैं कि भक्तों के मन से उनके चुने जाने का सारा भरोसा मिटा दें, तब मुझे उनका विरोध करना पड़ता है, क्योंकि पवित्रशास्त्र स्पष्टतः उनका विरोध करता है। क्योंकि पौलुस इफिसियों की पत्री के पहले अध्याय में परमेश्वर के अनन्त चुनाव पर इतना विस्तार से क्यों बोलता है, सिवा इसके कि उन्हें यह विश्वास दिलाए कि वे उसी के द्वारा अनन्त जीवन के लिए चुने गए हैं? और अनुमान की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि वह इफिसियों को बार-बार आज्ञा देता है कि वे यह बात अपने मन में दृढ़ रखें कि वे बुलाए गए हैं और सुसमाचार के भागी बनाए गए हैं, क्योंकि वे जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में चुने गए थे। इसी प्रकार रोमियों के आठवें अध्याय में वह चुनाव के सिद्धान्त को विश्वास की निश्चयता के साथ स्पष्ट रूप से जोड़ता है।

मैं स्वीकार करता हूँ, और हम सब यह सिखाने में सावधान हैं, कि इस उद्देश्य से परमेश्वर की गुप्त मन्त्रणा की खोज करने से अधिक हानिकारक कुछ नहीं कि हम उसके द्वारा अपने चुने जाने का ज्ञान पाएँ — यह एक ऐसा भँवर है जिसमें हम निगल लिए जाएँगे और नष्ट हो जाएँगे। परन्तु जब हमारा स्वर्गीय पिता मसीह में हमारे अनन्त लेपालकपन का दर्पण हमारे सामने रखता है, तो मसीह के द्वारा हमें जो दिया गया है उसे सचमुच वही थामे हुए है जो यह निश्चय रखता है कि मसीह स्वयं पिता की ओर से उसे दिया गया है कि वह नाश न हो। क्या! क्या ये वचन केवल शब्दाडम्बर हैं? "पिता, जिसने हमें अपने पुत्र की सुरक्षा और विश्वास के अधीन रखा है, सबसे बड़ा है।" "पुत्र किसी वस्तु को खोने न देगा।" (यूहन्ना 6:39; 10:28।) ये बातें इसलिए कही गई हैं कि वे सब जो परमेश्वर की सन्तान हैं, अपने उद्धार के ऐसे रक्षक पर भरोसा रखें, और संकट के बीच सुरक्षित अनुभव करें; वरन् जब वे असंख्य जोखिमों से घिरे हों, तब भी यह भरोसा रखें कि उनका उद्धार सुरक्षित है क्योंकि वह परमेश्वर के हाथ में है।

परन्तु वे दृढ़ता से कहते हैं कि विशेष प्रकाशन के बिना यह जानना असम्भव है कि परमेश्वर ने किसे चुना है। मैं यह मानता हूँ। और इसी कारण पौलुस कहता है कि हमने संसार की आत्मा नहीं, परन्तु वह आत्मा पाया है जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें जो परमेश्वर ने हमें दी हैं। इस दान की व्याख्या वह दूसरी जगह लेपालकपन के रूप में करता है, जिसके द्वारा हम उसकी सन्तानों में गिने जाते हैं, और जिसे वह इतना निश्चित मानता है कि हम उस पर ऊँचे स्वर से गर्व कर सकते हैं। परन्तु मैं अनजान नहीं हूँ कि वे विशेष प्रकाशन से क्या अभिप्राय रखते हैं। मैं तो उससे वह अभिप्राय रखता हूँ जो हमारा स्वर्गीय पिता अपनी सन्तानों को विशेष रूप से प्रदान करना उचित समझता है। और यह मेरी अपनी कोई कल्पना नहीं है।

पौलुस के ये शब्द सुविदित हैं, "जो बातें मनुष्य की समझ से छिपी हैं, उन्हें परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रकट किया है, जो परमेश्वर की गहरी बातों को भी जाँचता है।" फिर, "प्रभु का मन किसने जाना, या कौन उसका सलाहकार हुआ? परन्तु हमारे पास मसीह का मन है।"

अतः कुल मिलाकर हम देखते हैं कि जिसे ये आदरणीय पिता उतावला और निन्दनीय दुस्साहस कहते हैं, वह और कुछ नहीं, वरन् मसीह के द्वारा हम पर प्रकट किए गए अपने लेपालकपन का वह पवित्र भरोसा है, जिसके लिए परमेश्वर अपने लोगों को सर्वत्र प्रोत्साहित करता है।

चौदहवें शीर्षक के अन्तर्गत वे किसी को यह पूर्ण निश्चय रखने से मना करते हैं कि परमेश्वर उसे अन्त तक स्थिर रहने का वरदान देगा, फिर भी वे परमेश्वर में इसकी अत्यन्त दृढ़ आशा रखने को अनुचित नहीं ठहराते। परन्तु पहले वे हमें यह दिखाएँ कि वे किस प्रकार के गारे से ऐसी परस्पर विरोधी बातों को जोड़ सकते हैं जैसे अत्यन्त दृढ़ आशा और संदिग्ध प्रत्याशा। क्योंकि निश्चय ही, जिसकी अनन्त जीवन की प्रत्याशा पूर्ण निश्चयता पर आधारित नहीं, वह नाना सन्देहों से विचलित होगा। यह उस प्रकार की आशा नहीं है जिसका वर्णन पौलुस करता है, जब वह कहता है कि उसे निश्चय है कि न जीवन, न मृत्यु, न वर्तमान, न भविष्य की बातें उस प्रेम को तोड़ सकेंगी जिससे परमेश्वर मसीह में उसे गले लगाता है। वह ऐसा न कहता यदि मसीही आशा की निश्चयता जीवन की अन्तिम घड़ी से परे न पहुँचती। और प्रतिज्ञाएँ कैसी भाषा बोलती हैं? आत्मा केवल यही घोषित नहीं करता कि धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा, वरन् यह भी कि वह जीवित रहेगा। (हबक्कूक 2:4।) आशा को यहाँ तक पहुँचना चाहिए। पौलुस भी यही दिखाता है जब वह आशा का वर्णन उन बातों की धीरज से प्रतीक्षा के रूप में करता है जो अभी छिपी हैं।

परन्तु कहा जा सकता है कि वे आशा को नहीं छीनते, केवल पूर्ण निश्चयता को छीनते हैं। क्या! जब पौलुस निडरता से घोषित करता है कि उसके लिए धार्मिकता का मुकुट रखा हुआ है, तो क्या उसमें सन्देह या अनिश्चितता का कोई चिह्न है? (1 तीमुथियुस 4:8।) जब वह घोषित करता है कि हमें हमारे लेपालकपन का बयाना दिया गया है, कि हम ऊँचे स्वर से परमेश्वर को अपना पिता कहने का साहस कर सकें, तो क्या उन शब्दों में कोई शर्त है? वे उसी निस्सार कुतर्क की शरण लेते हैं जिसमें से मैं उन्हें पहले ही खदेड़ चुका हूँ, अर्थात् यह कि पौलुस को यह विशेष प्रकाशन से मिला था। परन्तु वह अपने लिए ऐसा कुछ विशेष दावा नहीं करता जिसमें सब विश्वासियों का भाग न हो, जब वह उनकी ओर से भी उतना ही जितना अपनी ओर से, निडरता से मृत्यु और जीवन, वर्तमान और भविष्य पर जयजयकार करता है। न यूहन्ना अपने लिए अकेले उस ज्ञान का दावा करता है जिस पर वह गर्व करता है, जब वह कहता है, "हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के समान होंगे, क्योंकि हम उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।" (1 यूहन्ना 3:2।) और न पौलुस, जब वह कहता है, "हम परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करते हैं;" और फिर, "हम जानते हैं कि जब यह पार्थिव तम्बू गिराया जाएगा, तो स्वर्ग में हमारे लिए एक भवन तैयार है।" (रोमियों 5:2; 2 कुरिन्थियों 5:1।)

वे 1 कुरिन्थियों के दसवें अध्याय के इस कथन की मनमानी व्याख्या करते हैं, "जो समझता है कि मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।" इसका दोहरा समाधान है। पौलुस वहाँ केवल शारीरिक अहंकार को रोकता है, जिसका आशा की निश्चयता से कोई सम्बन्ध नहीं; न वह केवल विश्वासियों को सम्बोधित करता है, वरन् अन्यजातियों में से उन सबको जिन्होंने मसीह का नाम धारण कर लिया था, जिनमें अनेक ऐसे हो सकते थे जो व्यर्थ भरोसे से फूले हुए थे। क्योंकि वहाँ यहूदियों और अन्यजातियों के बीच जो तुलना की गई है, वह केवल चुने हुओं तक सीमित नहीं, वरन् उन सबको सम्मिलित करती है जो नाम मात्र से कलीसिया के थे। फिर भी मैं इसी एक उत्तर से सन्तुष्ट हूँ, क्योंकि यह पर्याप्त है, अर्थात् यह कि जिस भय की आज्ञा दी गई है वह ऐसा नहीं जो विश्वास या आशा की निश्चयता को ज़रा भी घटाए, वरन् केवल वह है जो हमें परमेश्वर के भय में सावधान रखता है।

नया जन्म पाए हुए लोग अभी महिमा में नहीं हैं, वरन् केवल महिमा की आशा में हैं, और संघर्ष का बहुत भाग अभी शेष है। इसलिए यदि वे यह निष्कर्ष निकालते कि सुस्ती को झटक देना चाहिए और किसी अहंकारपूर्ण निश्चिन्तता में नहीं पड़ना चाहिए, तो कोई समझदार मनुष्य उनसे सहमत हुए बिना न रहता। परन्तु जब वे इस अंश को मेढ़ा बनाकर हमारी आशा की दृढ़ता को हिलाने और हमें औंधे मुँह गिराने के लिए प्रयोग करते हैं, तब उनका आचरण किसी प्रकार सहन करने योग्य नहीं। पौलुस के विचार को सीमित करके और उसका यह अर्थ बनाकर कि परमेश्वर ने उद्धार का जो कार्य आरम्भ किया है वह हममें तभी पूरा होगा जब हम उसके अनुग्रह में कमी न करें, वे बड़ी अज्ञानता से काम लेते हैं, क्योंकि वे यह नहीं देखते कि अनुग्रह का एक भाग यही है कि परमेश्वर हमारे साथ उपस्थित रहे ताकि हम उसके अनुग्रह में कमी न करें। इस सिद्धान्त से आलस्य को अवसर नहीं मिलना चाहिए; इसे तो उन्हें केवल यह पहचानने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि उन्होंने परमेश्वर से क्या पाया है और उससे क्या आशा रखते हैं।

यदि मैं साहस कर पाता तो बहुत सी बातों को बिना कलंक लगाए छोड़ देना चाहता। परन्तु क्या करूँ? शायद ही कोई पंक्ति ऐसी हो जिसमें कोई उल्लेखनीय भूल या बेईमानी का संकेत न हो। पन्द्रहवें शीर्षक में, जहाँ वे पतन के बाद पुनः प्राप्ति की चर्चा करते हैं, वे कहते हैं कि जेरोम ने पश्चाताप की सटीक परिभाषा दी जब उसने उसे जहाज़ डूबने के बाद की दूसरी तख़्ती कहा। यदि मैं जेरोम के कथन की आलोचना करने पर उतारू होता, तो पूछता कि वह उसे दूसरी तख़्ती क्यों कहता है, तीसरी या चौथी क्यों नहीं? क्योंकि कितने कम लोग हैं जो जीवन में एक से अधिक बार जहाज़ नहीं डुबोते। वरन् ऐसा कौन मनुष्य पाया गया जिसे परमेश्वर के अनुग्रह ने प्रतिदिन के जहाज़ डूबने से न बचाया हो? परन्तु इस समय मुझे जेरोम से कोई काम नहीं।

ट्रेन्ट के पिता पश्चाताप की नहीं, वरन् प्रायश्चित्त के संस्कार की चर्चा करते हैं, जिसके विषय में वे बहाना करते हैं कि उसे मसीह ने ठहराया था। कब? जब उसने कहा, पवित्र आत्मा लो; जिनके पाप तुम क्षमा करो, वे उनके लिए क्षमा किए जाएँगे। (यूहन्ना 20:22।) पहली बात, क्योंकि मसीह ने प्रेरितों को यह अधिकार दिया, तो क्या इसलिए यह संस्कार है? चिह्न कहाँ है? रूप कहाँ है? दूसरी बात, कौन नहीं जानता कि यह कार्य प्रेरितों को इसलिए सौंपा गया था कि वे इसे बाहरवालों के प्रति करें? ये पिता कितने गधे होंगे कि एक स्वप्नदर्शी भिक्षु की ऐसी बेतुकी बकवास को बिना विरोध के यों निकल जाने दिया! मसीह उस गवाही की पुष्टि करता है जो प्रेरितों को पापों की क्षमा के विषय में संसार के सामने देनी थी। सुसमाचार जो सन्देश पहुँचाता है वह यही है, और वह भी उनके लिए जो अभी कलीसिया में चुने नहीं गए। महासभा पर शासन करनेवाले भिक्षुओं में से किसी बकवादी ने, जिसने शायद उस अंश को कभी देखा तक नहीं, और निश्चय ही कभी मनन नहीं किया, अपनी ही टीका पढ़ सुनाई कि वहाँ एक सूत्र निर्धारित किया गया है जिसके द्वारा बपतिस्मा के बाद गिरे हुए लोगों को अनुग्रह की दशा में पुनः लाया जाना था। मूर्ख पिताओं ने सिर हिलाकर सहमति दे दी। फिर भी वह अंश स्वयं घोषित करता है कि उसे बेशर्मी से तोड़ा-मरोड़ा गया है। वे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि किसी मसीही मनुष्य का पतन के बाद का पश्चाताप बपतिस्मा के समय के पश्चाताप से बहुत भिन्न है: मानो मसीह ने केवल एक ही प्रकार की ओर संकेत किया हो, और स्पष्ट रूप से यह अपेक्षा न की हो, जैसा लूका के चौबीसवें अध्याय में हमें बताया गया है, कि उसके नाम से पापों की क्षमा के साथ-साथ पश्चाताप का भी प्रचार किया जाए।

वे और आगे बढ़कर कहते हैं कि यह प्रायश्चित्त, जिससे वे खिलवाड़ करते हैं, केवल हृदय के पश्चाताप में ही नहीं, वरन् मुँह के अंगीकार और कर्मों के प्रायश्चित्त में भी निहित है: यद्यपि निर्दयी न दिखने के लिए वे अपनी व्यवस्था की कठोरता को कुछ कम कर देते हैं जब वे अंगीकार करने की इच्छा से ही अपने को शान्त हो जाने देते हैं। मैं यहाँ लम्बा विवाद क्यों आरम्भ करूँ? मुद्दा पापों की क्षमा का है: जो उद्धार का ज्ञान है। (लूका 1:77।) परमेश्वर इसे मसीह के लहू में हमें मुफ़्त देने की प्रतिज्ञा करता है: कर्णगोचर अंगीकार के विषय में वह एक शब्द भी नहीं कहता। ये नए व्यवस्थापक परमेश्वर की आज्ञा के विपरीत क्षमा को अंगीकार के एक सूत्र से बाँध देते हैं, और घोषित करते हैं कि वह प्रायश्चित्त के द्वारा मोल ली जाती है। दुखी विवेकों के लिए क्या शेष रहेगा, यदि वे परमेश्वर का वचन छोड़ने और मनुष्यों के आदेशों के आगे झुकने को विवश किए जाएँ?

मैं अपने उद्धार के विषय में निश्चय पाना चाहता हूँ। परमेश्वर के वचन में मुझे एक सीधा मार्ग दिखाया जाता है, जो मुझे इस महान वरदान के पूर्ण और शान्तिमय अधिकार तक सीधे पहुँचाएगा। मैं और कुछ नहीं कहूँगा। मनुष्य आते हैं और मुझ पर हाथ डालते हैं, और मुझे अंगीकार की उस आवश्यकता से बाँध देते हैं जिससे मसीह मुझे मुक्त करता है। वे मुझ पर प्रायश्चित्त का बोझ लादते हैं, आज्ञा देते हैं कि मैं अपने हाथ से वह जुटाऊँ जिसे मसीह मुझे दिखाता है कि केवल उसके लहू से ढूँढ़ा जाना चाहिए। क्या मैं देर तक सोच सकता हूँ कि क्या करना उचित है? वरन् सब हिचकिचाहट दूर हो, जब हमें हमारे उद्धार के एकमात्र कर्ता से दूर ले जाने का प्रयास किया जाए। वे चाहे जितना खोजें, एक अक्षर भी न मिलेगा जिसमें मसीह हमें आज्ञा देता हो कि हम अपने पाप किसी मनुष्य के कान में अंगीकार करें। पापों की क्षमा से सम्बन्धित सब प्रतिज्ञाओं में ऐसी बात का तनिक भी उल्लेख नहीं। यह व्यवस्था प्रेरितों को बिलकुल अज्ञात थी। समस्त पूर्वी कलीसिया में इसका प्रयोग शायद ही कभी हुआ। वरन् एक हज़ार वर्ष से अधिक समय तक हर जगह यह पालन स्वतन्त्र था, जब तक कि इनोसेंट तृतीय ने अपने कुछ सींगवाले दल के साथ मसीही लोगों को इस जाल में नहीं फँसा दिया, जिसे ट्रेन्ट के पिता अब और कसकर बाँधना चाहते हैं। मैं जो कहता हूँ उसकी प्राचीन इतिहास भरपूर गवाही देता है। हमारी पुस्तकें प्रमाणों से भरी हैं। उनमें से कोई भी उन लोगों से अज्ञात नहीं जिन्होंने महासभा को यह प्रसिद्ध सूत्र लिखवाया; फिर भी वे इतने ढीठ हैं कि एक ही शब्द से हमें समझाना चाहते हैं कि उद्धार का द्वार बन्द है, और केवल कल्पित अंगीकार की कुंजी से ही खुल सकता है। परन्तु मसीह की प्रतिज्ञाओं को, अपनी इच्छा की कोई भी शर्त लगाकर, सीमित करने की छूट उन्हें कौन देगा?

मैं इस समय यह नहीं कहता कि इनोसेंट की वह व्यवस्था, जिसे वे फिर से घोषित करते हैं, विवेकों को यातना देने और तड़पाने के लिए कितनी क्रूर जल्लाद है; उसने कितनों को औंधे मुँह निराशा में धकेला है; दूसरों को सुलाने के लिए वह कपट की कैसी अफ़ीम रही है; उससे कितनी भयानक दुष्टताएँ उपजी हैं! वरन् हम यह मान भी लें, जैसा कि वे स्वयं झूठमूठ कहते हैं, कि उससे कुछ लाभ होता है: यह प्रसंग से बाहर की बात है। प्रश्न यह है कि जो परमेश्वर के अनुग्रह से गिर गए हैं वे उसमें कैसे पुनः स्थापित किए जाते हैं। पवित्रशास्त्र सर्वत्र यह विधि दिखाता है, परन्तु अंगीकार का कोई उल्लेख नहीं करता, जो बहुत बाद में मनुष्यों के मस्तिष्क में गढ़ा गया। कैसी ढिठाई! कि क्षमा पाने की आशा के मार्ग को बन्द कर दिया जाए, जब तक कि वह अंगीकार पहले न हो जिसे उन्होंने ठहरा देना उचित समझा। प्रश्न पश्चाताप का है। उसकी सारी शक्ति और स्वभाव का चित्रण पवित्र आत्मा ने व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और सुसमाचारों में इतनी बार, इतने विस्तार से और इतनी स्पष्टता से किया है कि कोई सिद्धान्त इससे अधिक स्पष्ट रूप से नहीं समझाया गया। जैसे अंगीकार का वे दावा करते हैं, उसके विषय में सर्वत्र गहरा मौन है। तब कौन उन पर विश्वास करेगा जब वे कहते हैं कि उस उपांग के बिना, वरन् जब तक वह उसमें सम्मिलित न हो, कोई पश्चाताप सच्चा नहीं?

मेरे लिए ये दो बातें जान लेना पर्याप्त है — पहली, कि वे ऐसा पश्चाताप गढ़ते हैं जो उस पश्चाताप से बिलकुल भिन्न है जिसकी पवित्रशास्त्र में हमें सिफ़ारिश की गई है; और दूसरी, कि वे पापों की क्षमा पाने के लिए ऐसी शर्त ठहराते हैं जिससे वह, जिसे अकेले क्षमा करने का अधिकार है, हमें मुक्त रखना चाहता था। यह तो ऐसा ही है मानो वे परमेश्वर को अपनी अनुमति के बिना उद्धार की प्रतिज्ञा करने से मना कर रहे हों, या कम से कम उस उद्धार की प्रतिज्ञा की, जो उसने दी है, पूर्ति में बाधा डाल रहे हों। क्योंकि वे उसे हमारे पाप क्षमा करने नहीं देते, जब तक हम ऐसा अनुष्ठान पूरा न करें जिसे केवल वे ही बाध्यकारी बनाते हैं।

प्रायश्चित्त (पाप का दण्ड चुकाने) के विषय में वे समझते हैं कि वे एक सूक्ष्म भेद कर रहे हैं जब वे सोफिस्टों की घटिया टीकाओं की तलछट बटोरते हैं, — कि अनन्त दण्ड की नहीं, वरन् अस्थायी दण्ड की भरपाई प्रायश्चित्त से होनी है। कौन नहीं जानता था कि यही सोफिस्टों की बकवास थी? और फिर भी जब वे बहाना करते हैं कि अनन्त दण्ड, दोष के साथ, अंगीकार से या अंगीकार करने की इच्छा से हमारे लिए क्षमा किया जाता है, तो उनका अर्थ इसके सिवा और क्या है कि हम कर्मों से उसके योग्य ठहरते हैं जिसे देने की परमेश्वर मुफ़्त में प्रतिज्ञा करता है?

परन्तु अब हम इस भेद की शक्ति देखें। जब भविष्यद्वक्ता पापों की निःशुल्क क्षमा का उल्लेख करते हैं, तो यह सच है कि वे सामान्यतः उसके दूसरे परिणाम की ओर संकेत करते हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर शान्त हो जाएगा, और अपने लोगों के पापों का फिर बदला न लेगा और न उन्हें अपनी छड़ी से दण्ड देगा। जो कोई पवित्रशास्त्र से थोड़ा भी परिचित है वह मेरे कथन की पूर्ण सटीकता को स्वीकार करेगा कि जो दण्ड हमारे योग्य थे वे घटाए गए, खोले गए, अन्ततः मिटा दिए गए, क्योंकि परमेश्वर हमें अपने किसी पुण्य के कारण क्षमा नहीं करता, मानो वह भरपाई से शान्त हुआ हो, वरन् इसलिए कि वह केवल अपनी ही दया से प्रेरित है। बाबुल की बन्धुआई एक अस्थायी दण्ड थी। इस्राएली उससे कहीं अधिक समय के योग्य थे, फिर भी सत्तर वर्ष में उसके अन्त को परमेश्वर अपनी निःशुल्क दया का फल बताता है। जब कभी वे ताड़नाएँ, जिनकी परमेश्वर ने धमकी दी थी, हटा ली जाती हैं, तो उसे सदा निःशुल्क मेल-मिलाप का परिणाम बताया गया है। निश्चय ही यह अस्थायी दण्ड में ढील है जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर इन शब्दों में करता है, "मैं यह तुम्हारे कारण नहीं, वरन् अपने नाम के कारण करूँगा।" और यशायाह, जब वह बताता है कि हमारी शान्ति का प्रायश्चित्त या मूल्य मसीह पर डाला गया, तो हमें स्मरण दिलाता है कि हम न केवल उसकी मध्यस्थता से दण्ड से मुक्त हुए हैं, वरन् उसने हमारे लिए वे सब पीड़ाएँ सह लीं जिनसे परमेश्वर हमारे पापों का बदला लेता या हमें ताड़ना देता है, ताकि हम, चाहे कितने ही अयोग्य क्यों न हों, इस वर्तमान जीवन की भी सब आशीषों का आनन्द उठा सकें। (यशायाह 48:9; 53:5।) परन्तु तो भी परमेश्वर विश्वासियों को ताड़ना देता है। मैं यह मानता हूँ। परन्तु किस उद्देश्य से? क्या इसलिए कि वह दण्ड देकर अपना और अपने न्याय का देय चुका ले? बिलकुल नहीं; वरन् इसलिए कि वह उन्हें अपने क्रोध के भय से मारकर दीन करे, उनमें पश्चाताप की गम्भीर भावना उत्पन्न करे, और उन्हें आगे के लिए अधिक सावधान बनाए। परन्तु ऐसे उपाय हैं जिनसे वे इन दण्डों को टाल सकते हैं; मेरा अभिप्राय है कि जब वे अपनी इच्छा से उनसे पहले ही सुधर जाते हैं, तो परमेश्वर के लिए उन्हें मानो ज़बरदस्ती घसीटने का कोई कारण नहीं रह जाता। छड़ी की आवश्यकता कब होती है, सिवा तब जब स्वैच्छिक सुधार का अभाव हो? इसीलिए प्रेरित हमें बताता है कि जो अपने आप को परख लेंगे, वे प्रभु द्वारा परखे न जाएँगे। (1 कुरिन्थियों 11:31।)

परन्तु इससे प्रायश्चित्त का निष्कर्ष निकालना कितना उलटा है! अधिकांश विश्वासियों ने प्रार्थना के द्वारा उस ताड़ना को टाल दिया है जिसके वे योग्य ठहर चुके थे। वरन् अहाब ने भी, जब उसने स्वेच्छा से अपने को दीन किया, परमेश्वर के हाथ को अपने ऊपर हलका पड़ता अनुभव किया। (1 राजाओं 21:29।) पवित्र लोग जो विनतियाँ प्रस्तुत करते थे, वे निःशुल्क प्रायश्चित्त के सबसे निर्णायक साक्षी हैं। परन्तु लगता है कि इन पिताओं ने कुछ भी ऐसा प्रस्तुत नहीं किया जिसे वे पवित्रशास्त्र के अंशों से प्रमाणित न कर सकें; क्योंकि पौलुस सिखाता है कि वह शोक जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है, ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिससे उद्धार मिलता है और जिससे पछताना नहीं पड़ता। (2 कुरिन्थियों 7:10।) क्या! क्या पौलुस यहाँ हमें प्रायश्चित्त की ओर बुला रहा है? मुझे उसका एक शब्द भी सुनाई नहीं देता। वे बेईमानी से हमें भ्रम में डाल रहे हैं। आगे वे ऐसा और भी अधिक करते हैं, जब वे हमें बताते हैं कि यूहन्ना के इन शब्दों में भी उसी पश्चाताप का उल्लेख समझना चाहिए, "मन फिराओ, और मन फिराव के योग्य फल लाओ।" (लूका 3:8।) परन्तु यूहन्ना ने इन शब्दों में किसे सम्बोधित किया? क्या वे ऐसे लोग नहीं थे जो बपतिस्मा के लिए अपने को प्रस्तुत करते थे, जबकि वे अभी मसीह के विश्वास से परिपूर्ण नहीं हुए थे? इससे कुछ भिन्न, पर उतना ही बेतुका, प्रकाशितवाक्य के दूसरे अध्याय से उनका यह उद्धरण है, "स्मरण कर कि तू कहाँ से गिरा है, और पहले काम कर;" जबकि सही पाठ है, "पहले के काम कर," अर्थात् पूर्व के काम। लेखक इफिसियों को उनके पूर्व के जीवन की दशा में लौट आने का उपदेश देता है। इसे प्रायश्चित्त तक खींचने का साहस किस मुँह से किया जाता है? जब उन्होंने इतनी ढिठाई से काले को सफ़ेद कहा, तो क्या उन्होंने सोचा कि उनकी धोखेबाज़ी को पकड़ने के लिए आँखें न होंगी? लिसैण्डर ने एक बार उन प्रतिनिधियों से, जिन्होंने मित्र-राज्यों की सभा में आवश्यकता से अधिक रोब से बात की थी, कहा था कि उन्हें ऐसे नगर की आवश्यकता है जो उनके प्रति बहुत उदार हो। इन आचार्यों को बैलों के एक झुण्ड की आवश्यकता होगी, यदि वे ऐसे श्रोता चाहते हैं जिन्हें वे जो चाहें उस पर विश्वास करने के लिए मना सकें। वे जाकर घमण्ड करें कि पवित्र आत्मा उन्हें सीधे चला रहा है, जबकि वे पवित्र लेखों के प्रत्यक्ष जालसाज़ हैं।

सारांश यह है — यद्यपि विश्वासियों को निरन्तर पश्चाताप के विषय में सोचते रहना चाहिए, ये पवित्र पिता उसे कोई अवर्णनीय और विरल घटित होनेवाली वस्तु मानते हैं — जबकि पवित्रशास्त्र पश्चाताप को सम्पूर्ण मनुष्य का नवीकरण बताता है — जबकि वह उसके मूल स्रोत को बताता है, अर्थात् परमेश्वर के न्याय के सच्चे बोध से उत्पन्न भय — जबकि वह उसके अंगों को गिनाता है, अर्थात् आत्म-त्याग, जो पाप से घृणा और अपनी भ्रष्टता से असन्तोष में निहित है, और जीवन का नवीकरण या आत्मा का नया जन्म, जो परमेश्वर के स्वरूप की पुनःस्थापना के सिवा और कुछ नहीं — जबकि वह उसके परिणामों को सावधानी से चिह्नित करता है, और उसके सम्पूर्ण स्वभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, — आदरणीय पिता केवल उन्हीं निस्सार खोखली बातों को प्रस्तुत करते हैं जिनसे पोप-तन्त्र के अधीन पश्चाताप का सिद्धान्त बिगाड़ा गया है। कलीसियाई लेखकों ने बाहरी अनुशासन के विषय में जो कहा, जो पश्चाताप के औपचारिक अंगीकार से सम्बन्धित था, उसे वे अज्ञानता से आत्मिक नवीकरण की ओर खींच लाते हैं जो उनके प्रवचन का विषय था। प्रत्येक बात की समीक्षा करके पाठकों को थकाए बिना, कोई भी उनकी रातों की मेहनत की तुलना हमारे लेखों से करे, तो वह पाएगा और मानेगा कि उन्होंने उजियाले को अन्धकार बना दिया है।

मैंने अब तक दोषारोपण किए बिना निन्दा करने का प्रयास किया है; और निष्पक्ष पाठक देखेंगे कि मैं किसी बात की निन्दा तभी करता हूँ जब मुझे विवश किया जाता है। परन्तु कोई वाक्य ऐसा नहीं जो मुझसे इससे अधिक न निकलवाए जितना मैं चाहता हूँ। इसी प्रकार का वह कथन है जो सोलहवें शीर्षक के अन्तर्गत है, कि धर्मी ठहराए जाने का अनुग्रह केवल अविश्वास से ही नहीं, वरन् किसी भी घातक पाप से खो जाता है। यदि उनका अर्थ यह होता कि बुरे विवेक के कारण हम इस महान आशीष के अधिकार (भोग) से निकाल दिए जाते हैं, तो मैं उनका ज़रा भी विरोध न करता, मेरा अभिप्राय है जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर हमें त्यागता नहीं, तथापि बुरा विवेक उससे ऐसा अलगाव है जो हमें अपने प्रति उसके पितृवत् प्रेम के जीवित और धर्मी ठहरानेवाले ज्ञान के आनन्द से वंचित कर देता है। परन्तु वे उलटे हैं, पहले तो इस बात में कि वे किसी पाप को घातक नहीं मानते जब तक वह स्थूल और प्रत्यक्ष न हो, जबकि अधिकांश भीतरी पाप मन को कहीं अधिक गहरा, यहाँ तक कि प्राणघातक घाव देते हैं; और दूसरे, इस बात में कि वे यह नहीं देखते कि शुद्ध विवेक विश्वास का अविभाज्य साथी है। यदि ऐसा न होता, तो यह कैसे कहा जाता कि हमारे हृदय विश्वास से शुद्ध किए जाते हैं, कि मसीह विश्वास के द्वारा हमारे हृदयों में बसता है, कि यही वह जय है जिससे हम संसार पर जय पाते हैं, शैतान के आक्रमणों को रोकने की ढाल है, और कि परमेश्वर की सामर्थ्य से हम विश्वास के द्वारा उद्धार के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं? (प्रेरितों के काम 15:9; इफिसियों 3:17; 1 यूहन्ना 5:4; इफिसियों 6:16; 1 पतरस 5:9; 1:5।) अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब कभी मनुष्य किसी परीक्षा से इस प्रकार पराजित हो जाता है कि वह परमेश्वर का भय छोड़ दे, तब उसमें विश्वास दब और गड़ जाता है। क्योंकि पवित्रता का आत्मा विश्वास से उतना ही अलग नहीं किया जा सकता जितना स्वयं मसीह। फिर भी मैं यह नहीं कहता कि जब हम प्रभु का भय छोड़ देते हैं तो हममें विश्वास बिलकुल बुझ जाता है। परन्तु जैसे भ्रष्ट वासनाओं से परमेश्वर का भय दब जाता है, वैसे ही मैं कहता हूँ कि विश्वास का गला घुट जाता है, और उस समय के लिए वह अपनी शक्ति उतनी ही नहीं दिखाता मानो वह किसी रीति से मर गया हो। पवित्र पिता चालाकी से एक बिल खोदकर निकालने का प्रयास करते हैं जिसमें वे अपने अधर्मी सिद्धान्त को छिपा सकें कि हम केवल विश्वास से धर्मी नहीं ठहरते। इसमें सफल न होने पर वे दूसरा तरीका आज़माते हैं।

अब हम अन्तिम शीर्षक पर आते हैं, जो कर्मों की योग्यता के विषय में है। यहाँ हमारे बीच इस पर कोई विवाद नहीं कि विश्वासियों को भले कामों के लिए उपदेश देना आवश्यक है, और प्रतिफल दिखाकर उन्हें उकसाना भी। तो फिर क्या? पहले, मैं उनसे इसमें भिन्न मत रखता हूँ कि वे अनन्त जीवन को प्रतिफल बनाते हैं; क्योंकि यदि परमेश्वर कर्मों को अनन्त जीवन से प्रतिफल देता है, तो वे तुरन्त यह सिद्ध कर देंगे कि विश्वास ही वह प्रतिफल है जो चुकाया जाता है, जबकि पवित्रशास्त्र सदा यह घोषित करता है कि वह मीरास है जो हमें निःशुल्क लेपालकपन के अधिकार के सिवा किसी और अधिकार से प्राप्त नहीं होती। परन्तु खण्डन के लिए इससे भी बड़ा आधार तब है जब वे यह कहने में नहीं लजाते कि विश्वासियों को व्यवस्था को पूरा करने से, कम से कम वर्तमान दशा के अनुपात में एक मात्रा तक, और अनन्त जीवन के योग्य ठहरने से कुछ नहीं रोकता। तब उस धन्यता का क्या होगा जिसकी बात दाऊद करता है, (भजन संहिता 32,) और जिसके बिना हम सब तिगुने अभागे हैं? हाय उन अभागों पर जो यह नहीं देखते कि जो सिद्धता के सबसे निकट पहुँचा है वह भी अभी आधे मार्ग तक नहीं बढ़ा! जिनका विवेक अभ्यस्त है वे सब अगस्तीन के इस कथन की कठोर सच्चाई अनुभव करते हैं, "इस जीवन में पवित्र लोगों की धार्मिकता गुणों की सिद्धता में कम, पापों की क्षमा में अधिक निहित है।" (Lib. de Civit. Dei, 19 c. 27.) एक और अंश, जिसे मैंने उद्धृत किया, और भी अधिक सटीक है, कि "जब तक वे शरीर की निर्बलता के नीचे कराहते हैं, उनके लिए एकमात्र आशा यही शेष है कि मसीह में उनका एक मध्यस्थ है जिसके द्वारा वे परमेश्वर से मेल-मिलाप पाते हैं।" (Lib. ad Bon., 3. c. 5.)

परन्तु यह आश्चर्य की बात नहीं कि मूढ़ भिक्षु, जिन्होंने विवेक के किसी संघर्ष का कभी अनुभव नहीं किया, और जो महत्त्वाकांक्षा, या ठूँस-ठूँसकर खाने और मतवालेपन से मतवाले होकर केवल अपने देवता की दृष्टि में अपने को ऊँचा उठाना चाहते हैं, इस प्रकार व्यवस्था की सिद्धता की बकवास करें। इसी भरोसे से वे भाड़े के स्वर्ग की बातें करते हैं, जबकि वे स्वयं वर्तमान भाड़े में, जिसके लिए वे सदा मुँह बाए रहते हैं, डूबे रहते हैं। परन्तु उन सुन्दर रंगों से, जिन्हें वे बाद में प्रयोग करते हैं जब वे किसी को कर्मों पर घमण्ड या भरोसा करने से मना करते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के दान हैं, उन आँखों को चौंधियाने का प्रयास व्यर्थ है जो पूरी तरह अन्धी नहीं। यह न कहें कि जिन्हें वे अब परमेश्वर के दान स्वीकार करते हैं, उन्हीं पर उन्होंने पहले मानवीय सामर्थ्य का अधिक दावा किया था, उनके आदेश में तीन भूलें हैं जो सहन नहीं की जा सकतीं। यद्यपि वे प्रसंगवश यह उल्लेख करते हैं कि भक्तों के भले काम मसीह की योग्यता से पुण्यकारी हैं, तथापि वे सबसे आवश्यक भाग छोड़ देते हैं, अर्थात् यह कि कोई काम अशुद्धता से अछूता नहीं, जब तक वह मसीह के लहू से धो न दिया जाए। वरन् वे कर्मों को झूठी प्रतिष्ठा जोड़ देते हैं, मानो वे क्षमा के बिना प्रसन्न कर सकते हों। यह टीका कि वे सब मसीह के आत्मा से निकलते हैं, निश्चय ही आकर्षक है। परन्तु पवित्र आत्मा की पूर्ण सामर्थ्य कहाँ पाई जाएगी? क्या वह हर एक को नाप से बाँटी नहीं गई? (1 कुरिन्थियों 12:11।) अतः उन्हें यह देखना चाहिए था कि वह सदा हमारी खोट से मिली रहती है जो उसकी शुद्धता को कलंकित करती है। परन्तु जब हमारी अन्तर्निहित भ्रष्टता हमसे उत्पन्न हर प्रकार के काम को परमेश्वर की दृष्टि में दूषित बना देती है, तब हमारे कर्मों के लिए एकमात्र उपाय यही बचता है कि वे उस अनुग्रह को, जो उनमें स्वयं नहीं है, निःशुल्क स्वीकृति द्वारा पुनः प्राप्त करें। यह तब होता है जब वे कर्म, जिन्हें स्वीकार किया गया है कि उनका अपने में कोई मूल्य नहीं, अपना मूल्य मसीह से उधार लेते हैं और मानो माँगते हैं।

यह सचमुच एक घोर और अधर्मी भ्रम है कि यह स्वीकार न किया जाए कि हमसे उत्पन्न हर काम के स्वीकार होने का केवल एक ही मार्ग है, अर्थात् जब उसमें जो कुछ दूषित था वह पितृवत् दया से क्षमा कर दिया जाए। इसी के लगभग समान एक और भ्रम यह है कि वे यह नहीं सोचते कि यदि हम किसी एक काम से कुछ पुण्य कमा भी लें, तो विरोधी अपराध से वह सारा पुण्य, चाहे जितना हो, नष्ट हो जाता है। "जो एक बात में चूकता है वह सब का दोषी ठहरा है।" (याकूब 2:10) जब केवल अनन्त मृत्यु का दायित्व ही उत्पन्न होता है, तब तुम अपने लिए कौन-सा प्रतिफल चाहते हो? वे इस बात में भी भूल करते हैं कि वे एकमात्र उपाय की शरण नहीं लेते, और यह मानकर कि उनमें कोई अच्छी वस्तु है, परमेश्वर से उसकी भलाई के कारण यह माँगते हैं कि वह उस पर कृपादृष्टि करे, और उन बुरी बातों को न गिने जो भार और संख्या दोनों में उससे कहीं अधिक हैं।

परन्तु तीसरी भूल सबसे बुरी है, मेरा अभिप्राय उनके उद्धार की निश्चयता को कर्मों के देखने पर निर्भर बनाने से है। एक ओर तो वे हमें अपने ऊपर भरोसा रखने से मना करते हैं, परन्तु जब वे फिर हमें कहते हैं कि उद्धार की निश्चित आशा पाने के लिए अपने कर्मों की ओर देखो, तो उनमें हमें आशा के कौन-से आधार मिल सकते हैं? क्या वे स्पष्टतः हमारा सारा भरोसा हम ही पर नहीं रखते? इसलिए वे एक ऐसा खण्ड जोड़ देते हैं जो केवल ऐसे ही सिद्धान्त के योग्य है। वह यह है कि इस जीवन में हम ऐसा युद्ध लड़ते हैं जिसका परिणाम अनिश्चित है, और निश्चयता तब तक प्राप्त नहीं कर सकते जब तक परमेश्वर हर एक को उसके कर्मों के अनुसार प्रतिफल न दे। इससे वे हमारे विश्वास का सारा भरोसा उलट देते हैं, या पौलुस के शब्दों में, विश्वास को ही व्यर्थ ठहराते हैं। (रोमियों 4:14।)

परन्तु पौलुस घोषित करता है कि वह इसलिए धर्मी नहीं ठहरता क्योंकि वह अपने में किसी बात का दोषी नहीं पाता। (1 कुरिन्थियों 4:4।) यह सच है, और इसलिए ताकि हमारी धार्मिकता का अधिकार स्थिर और शान्तिमय हो, हमारा कर्तव्य है कि कर्मों का सारा उल्लेख छोड़ दें, और अपने न्यायी से विनती करें कि वह हमारे साथ न्याय में न बैठे। (भजन संहिता 143:2।) हम सुरक्षा के बन्दरगाह तक तभी पहुँचते हैं जब परमेश्वर न्यायी का रूप त्याग देता है और अपने को हमारे सामने पिता के रूप में प्रकट करता है।

और फिर भी वे सूअर जैसे मनुष्य सीधे-सादे लोगों को डराने के लिए क्रूर धमकी गरजाने में नहीं लजाते कि कोई मनुष्य धार्मिकता पाने के योग्य नहीं जो उनके हर आदेश पर दृढ़ता से न टिके। क्या! क्या धर्मी ठहराए जाने की कोई नई विधि हाल ही में प्रकट हुई है? या वरन्, क्योंकि उद्धार एक ही है, क्या हम सब उसी एक मार्ग से उस तक नहीं पहुँचते? उन भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों का क्या होगा जिन्होंने ऐसे आचार्यों पर ध्यान नहीं दिया? इसलिए ट्रेन्ट की महासभा की कोई परवाह किए बिना, हम उस दृढ़ विश्वास को थामे रहें जो भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों ने मसीह के आत्मा के द्वारा हमें सौंपा, यह जानते हुए कि हमने उसे कहाँ से सीखा। परन्तु आदरणीय पिता, मानो किसी के लिए भी इसमें सन्देह करना असम्भव कर देने को कि वे उन लोगों में से हैं जिनका मुँह, जैसा दाऊद पुकारता है, (भजन संहिता 4:7) श्राप और कड़वाहट से भरा है, क्रूर धौंस के साथ आगे बढ़ते हैं और अपने बीच जितने व्यक्ति हैं लगभग उतने ही अभिशाप निकालते हैं, और उन्हें "विधान" का लुभावना और आदरणीय नाम देते हैं! फिर भी, ताकि मैं द्वेष से काम करता न दिखूँ, मानो उस संयम को भूल गया होऊँ जो मैंने अब तक रखा है, मैं पहले तीन से सहर्ष सहमत हूँ। शेष पर मैं संक्षिप्त टिप्पणियाँ लगाऊँगा।

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