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अध्याय पन्द्रह: कलीसिया का अधिकार (भाग 2 / 2)
यह अन्तिम कथन विशेष रूप से कठोर प्रतीत हो सकता है, फिर भी हमारे पास नीकिया की प्रथम महासभा का एक उल्लेखनीय उदाहरण है, जिसकी प्रतिष्ठा अन्य सब महासभाओं की प्रतिष्ठा से बढ़कर मानी गई है।
वहाँ अध्यक्ष हमारे विश्वास के प्रमुख अंश की रक्षा के लिये एकत्र हुए थे। उन्होंने अरियुस को अपने सामने उपस्थित देखा, जो विवाद के लिये तैयार था, और जानते थे कि उसका खण्डन करने के लिये उन्हें एकजुट रहना आवश्यक है। फिर भी, मानो वे उसी को प्रसन्न करने के लिये जानबूझकर एकत्र हुए हों, और कलीसिया पर मँडराते संकट की कोई चिन्ता किए बिना, वे एक-दूसरे को काटने, दोष लगाने और अपमानित करने लगे। उन्होंने एक-दूसरे के सम्पूर्ण जीवन का भण्डाफोड़ करनेवाले निन्दात्मक आरोप प्रस्तुत किए। संक्षेप में, उन्होंने अरियुस की उपेक्षा कर दी, ताकि एक-दूसरे को नष्ट कर सकें।
वे इतने असंयमी और एक-दूसरे के इतने कटु विरोधी थे कि उनके झगड़े कभी समाप्त न होते, यदि सम्राट कुस्तुन्तीन ने यह कहकर उन्हें न रोका होता कि वह उनका न्यायी नहीं बनेगा। तब यह कितनी अधिक सम्भावना की बात है कि उसके बाद की महासभाएँ भी भूल की सम्भावना से मुक्त न थीं?
कोई मुझे अविवेकी समझ सकता है कि मैं ऐसी त्रुटियाँ गिना रहा हूँ, क्योंकि हमारे विरोधी स्वयं मानते हैं कि जो बातें उद्धार के लिये आवश्यक नहीं हैं, उनमें महासभाएँ भूल कर सकती हैं। फिर भी मैं ऐसा बिना कारण नहीं करता। क्योंकि यद्यपि वे यह बात विवश होकर मानते हैं, तथापि वे आग्रह करते हैं कि महासभा का प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक विषय में, बिना किसी अपवाद के, पवित्र आत्मा के प्रकाशन के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। इसमें वे अपनी स्वीकृति से अधिक माँगते हैं।
इससे वे और क्या चाहते हैं, सिवाय इसके कि हमें यह समझा दें कि महासभाएँ कभी भूल कर ही नहीं सकतीं; या यदि वे भूल करें भी, तो हमें सत्य को पहचानने की अनुमति नहीं, वरन् उनकी भूल से सहमत होना ही होगा?
इसलिये महासभाओं, पास्टरों, अध्यक्षों या कलीसिया के कोई भी पदनाम — जो उचित रीति से भी और झूठ से भी जताए जा सकते हैं — हमें ऐसी चेतावनियाँ पाकर, परमेश्वर के वचन की कसौटी पर हर आत्मा को परखने से न रोकें, कि वह परमेश्वर की ओर से है या नहीं।
“हर एक आत्मा की प्रतीति न करो, वरन् आत्माओं को परखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं।”
जहाँ तक उनके इस दावे का प्रश्न है कि उनकी परम्पराएँ प्रेरितों से चली आई हैं, वह निरा धोखा है। क्योंकि प्रेरितों की सारी शिक्षा इसी ओर लक्षित है कि विवेक नई परम्पराओं के बोझ तले न दबाए जाएँ और मसीही धर्म हमारे गढ़े हुए आविष्कारों से बिगाड़ा न जाए।
इसके अतिरिक्त, यदि प्राचीन इतिहासों पर विश्वास किया जाए, तो जो बातें वे प्रेरितों के नाम मढ़ते हैं, वे प्रेरितों को केवल अज्ञात ही न थीं, उन्होंने तो उनके विषय में कभी सुना भी नहीं।
न ही उन्हें यह बकवाद करना चाहिए कि प्रेरितों की बहुत सी विधियाँ प्रथा के द्वारा स्वीकार की गईं, यद्यपि वे कभी लिखी नहीं गईं — ऐसी बातें जिन्हें प्रेरित, कहा जाता है, यीशु मसीह की मृत्यु से पहले समझ न सकते थे, परन्तु उसके स्वर्गारोहण के बाद पवित्र आत्मा के प्रकाशन से उन्होंने सीखा।
“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह, अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा।”
यह कैसी निर्लज्जता है! मैं सहर्ष मानता हूँ कि जब हमारे प्रभु ने उनसे ये बातें कहीं, तब चेले अभी अनपढ़ और अज्ञानी थे। परन्तु क्या वे उसी अज्ञान में बने रहे, जब उन्होंने अपनी शिक्षा को लिखित रूप दिया, कि बाद में उन्हें अपने लेखों की कमी को मौखिक रीति से पूरा करना पड़ा?
यदि उन्होंने अपनी शिक्षा तब लिखी जब परमेश्वर का आत्मा उन्हें पहले ही सब सत्य का मार्ग बता चुका था, तो उन्हें सुसमाचार की शिक्षा का सम्पूर्ण और सिद्ध ज्ञान लिखित रूप में देने, और उसे हमारे लिये हस्ताक्षरित और मुहरबन्द छोड़ जाने से कौन सी बात रोक सकती थी?
इसके अतिरिक्त, वे अपने आप को हास्यास्पद बनाते हैं, जब यह समझाने का प्रयास करते हुए कि वे बड़े भेद क्या थे जो प्रेरितों से इतने समय तक छिपे रहे, वे कुछ तो यहूदियों और अन्यजातियों में बहुत पहले से प्रचलित रीतियों से उधार ली हुई और मिलाई हुई विधियाँ प्रस्तुत करते हैं, और कुछ मूर्खतापूर्ण आविष्कार और निरर्थक रस्में, जो उन अज्ञानी पुरोहितों को भी कण्ठस्थ हैं जो मुश्किल से चल या बोल पाते हैं। वस्तुतः मूर्ख और बच्चे उनका ऐसा सटीक अनुकरण करते हैं कि कोई समझे कि उनका सारा विज्ञान उनके सिर में ही बसा है।
प्रेरितों का जो उदाहरण वे अपनी निरंकुशता को अधिकार देने के लिये प्रस्तुत करते हैं, वह भी उनके प्रयोजन को उतना ही कम सिद्ध करता है।
वे कहते हैं, “आदिम कलीसिया के प्रेरितों और प्राचीनों ने मसीह की आज्ञा से परे एक विधि बनाई, जिसके द्वारा उन्होंने अन्यजातियों को मूर्तियों के सामने बलि की हुई वस्तुएँ, गला घोंटे हुए पशुओं का मांस और लहू खाने से मना किया। यदि उन्होंने यह वैध रीति से किया, तो उनके उत्तराधिकारी, जब कभी आवश्यकता हो, उनका उदाहरण क्यों न अपनाएँ?”
मैं चाहता हूँ कि वे इस विषय में और अन्य सब विषयों में भी प्रेरितों का अनुसरण करें। क्योंकि मैं इनकार करता हूँ कि प्रेरितों ने इस प्रसंग में कोई नई बात स्थापित या निर्धारित की, जैसा कि सरलता से प्रमाणित किया जा सकता है।
उसी प्रसंग में सन्त पतरस घोषणा करता है कि चेलों पर कोई भी बोझ डालना परमेश्वर की परीक्षा करना होगा। इसलिये यदि वह बाद में उन पर बोझ डाले जाने की अनुमति देता, तो वह अपने ही निर्णय का खण्डन करता।
“अब तुम क्यों परमेश्वर की परीक्षा करते हो, कि चेलों की गर्दन पर ऐसा जूआ रखो जिसे न हमारे पूर्वज उठा सके और न हम?”
यदि प्रेरित अपने ही अधिकार से यह ठहरा देते कि अन्यजातियों को मूर्तियों के सामने बलि की हुई वस्तुएँ, गला घोंटे हुए पशुओं का मांस या लहू खाना मना है, तो यह निश्चय ही एक बोझ होता।
फिर भी एक कठिनाई शेष रहती है, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इन बातों को मना किया था। परन्तु यदि उनकी विधि के अर्थ पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाए, तो समाधान सरल है।
उसका पहला और मुख्य बिन्दु यह है कि अन्यजातियों को उनकी स्वतन्त्रता में छोड़ा जाए, और व्यवस्था की रीतियों से उन्हें सताया या दबाया न जाए। जहाँ तक यह बात है, वह विधि सीधे हमारे पक्ष का समर्थन करती है।
मूर्तियों के सामने बलि की हुई वस्तुओं, गला घोंटे हुए मांस और लहू के विषय में जो अपवाद आगे आता है, वह प्रेरितों का बनाया हुआ कोई नया नियम नहीं, वरन् प्रेम को बनाए रखने की माँग करनेवाली परमेश्वर की सनातन आज्ञा है। वह अन्यजातियों की स्वतन्त्रता को किसी भी बात में घटाती नहीं, वरन् केवल उन्हें यह सिखाती है कि वे अपने भाइयों के साथ कैसे तालमेल बिठाएँ, ताकि अपनी स्वतन्त्रता के प्रयोग से ठोकर का कारण न बनें।
इसलिये हम ध्यान दें कि दूसरा बिन्दु यह है: अन्यजातियों की स्वतन्त्रता से उनके भाइयों को न हानि पहुँचनी चाहिए और न ठोकर लगनी चाहिए।
यदि कोई फिर भी आग्रह करे कि प्रेरितों ने कुछ विशेष बातें निर्धारित की थीं, तो मेरा उत्तर यह है कि उन्होंने केवल इतना बताया, जितना उस समय की परिस्थिति की माँग थी, कि किन बातों में अन्यजाति अपने भाइयों के लिये ठोकर का कारण बन सकते हैं, ताकि वे उनसे बचें। उन्होंने परमेश्वर की सनातन व्यवस्था में, जो ठोकर देने को मना करती है, अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।
आज भी स्थिति ऐसी ही है। जिन क्षेत्रों में कलीसियाएँ अभी सुव्यवस्थित नहीं हैं, वहाँ विश्वासयोग्य पास्टर उन लोगों को, जो विश्वास में पहले से दृढ़ हैं, यह निर्देश दे सकते हैं कि वे शुक्रवार को सबके सामने मांस न खाएँ, और पर्व के दिन सबके सामने काम न करें, जब तक कि विश्वास में निर्बल लोग अधिक निश्चित शिक्षा द्वारा दृढ़ न कर दिए जाएँ।
क्योंकि यद्यपि अन्धविश्वास हटा दिए जाने पर ऐसी बातें अपने आप में उदासीन हैं, तथापि जब वे इस रीति से की जाएँ कि निर्बल भाइयों को ठोकर लगे, तो वे पाप से रहित नहीं हैं। और वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि विश्वासी अपने निर्बल भाइयों की उपस्थिति में ये काम उनके विवेक को गम्भीर चोट पहुँचाए बिना नहीं कर सकते।
कौन, जब तक कि वह घोर निन्दा न करना चाहे, यह कहने का साहस करेगा कि इस प्रकार काम करनेवाले विश्वासयोग्य पास्टर कोई नया नियम बना रहे थे, जबकि यह स्पष्ट है कि वे केवल उन ठोकरों को रोक रहे होते, जिन्हें परमेश्वर ने साफ-साफ मना किया है?
यही बात प्रेरितों के विषय में भी कही जा सकती है, जिनका उद्देश्य मात्र परमेश्वर की उस व्यवस्था को थामे रखना था जो ठोकरों से बचने की माँग करती है। मानो उन्होंने कहा हो: “परमेश्वर तुम्हें आज्ञा देता है कि अपने निर्बल भाइयों को ठोकर न खिलाओ। तुम मूर्तियों पर चढ़ाई हुई वस्तुएँ, गला घोंटे हुए पशुओं का मांस या लहू उन्हें ठोकर खिलाए बिना नहीं खा सकते। इसलिये हम तुम्हें परमेश्वर के वचन से आज्ञा देते हैं कि ऐसी वस्तुएँ इस रीति से न खाओ कि ठोकर लगे।”
सन्त पौलुस इस बात की साक्षी देता है कि प्रेरितों का यही उद्देश्य था, जब वह उनकी विधि के अनुसार लिखता है:
“मूरतों के सामने बलि की हुई वस्तुओं के विषय में हम जानते हैं कि जगत में मूरत कुछ नहीं। परन्तु कुछ लोग यह जानते हुए कि वह मूरत को चढ़ाई गई है, उसे खाते हैं, और उनका निर्बल विवेक अशुद्ध हो जाता है। इसलिये चौकस रहो कि तुम्हारी यह स्वतन्त्रता कहीं निर्बलों के लिये ठोकर का कारण न हो जाए।”
—1 कुरिन्थियों 8:4, 7, 9
जो कोई इन बातों पर ध्यानपूर्वक विचार करेगा, वह उन लोगों से सरलता से धोखा न खाएगा जो हमें समझाना चाहते हैं कि प्रेरितों ने इस विधि के द्वारा कलीसिया की स्वतन्त्रता को सीमित करना आरम्भ किया।
यद्यपि जो कुछ यहाँ प्रस्तुत किया जा सकता था वह सब हमने नहीं कहा है, और जो कहा भी है उसे केवल संक्षेप में कहा है, तथापि मैं मानता हूँ कि मैंने अपने विरोधियों का ऐसा पूरा खण्डन कर दिया है कि किसी को अब सन्देह न रहे कि जिस आत्मिक सामर्थ्य पर पोप और उसका सारा राज्य गर्व करता है, वह परमेश्वर के वचन के विरुद्ध ईशनिन्दात्मक निरंकुशता है और उसकी कलीसिया पर अन्यायपूर्ण अत्याचार है।
आत्मिक सामर्थ्य के नाम के अन्तर्गत मैं उनकी इस धृष्टता को सम्मिलित करता हूँ कि वे दीन लोगों को परमेश्वर के वचन की शुद्ध सरलता से फेरने के लिये नई शिक्षाएँ फैलाते हैं; नए नियम बनाने का उनका वह दुस्साहस, जिनके द्वारा उन्होंने दुखी विवेकों को निर्दयता से सताया है; और सारांश यह कि उनका सारा तथाकथित कलीसियाई अधिकार-क्षेत्र, जिसे वे अपने सहायक अध्यक्षों, प्रतिनिधियों, प्रायश्चित्त-अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों के द्वारा चलाते हैं।
क्योंकि यदि हम मसीह को अपने बीच राज्य करने दें, तो यह सारा प्रभुत्व तुरन्त उलट जाता और ध्वस्त हो जाता है।
उनके प्रभुत्व के दूसरे प्रकार का, जो सम्पत्तियों और जागीरों में निहित है, वर्णन करना वर्तमान विषय का अंग नहीं, क्योंकि वह विवेकों पर नहीं चलाया जाता। फिर भी यहाँ भी देखा जा सकता है कि वे पूरी तरह अपने प्रति सच्चे बने रहते हैं — अर्थात् वे उस कलीसिया के पास्टर किसी भी रीति से नहीं हैं, जिसके पास्टर कहलाना वे चाहते हैं।
मैं यहाँ किन्हीं विशेष व्यक्तियों के निजी दोषों की बात नहीं कर रहा, वरन् उनके सारे वर्ग की सामान्य बुराई की बात कर रहा हूँ, क्योंकि वे उसे तब तक उचित रीति से व्यवस्थित नहीं मानते जब तक वह धन-सम्पत्ति और अभिमान में ऊँचा न किया जाए।
पहली बात, क्या अध्यक्षों के लिये उचित था कि वे न्यायिक मामलों में पड़ें, नगरों और देशों का शासन अपने हाथ में लें, और अन्य ऐसे कर्तव्य ग्रहण करें जो उनके हैं ही नहीं, जबकि उनके अपने पद का भार इतना बड़ा है कि यदि वे अपने आप को निरन्तर उसी में लगाए रखते, तो भी उसे मुश्किल से ही निभा पाते?
क्या यह उचित था कि वे अपने सेवकों के लवाजमे में और अपने वस्त्रों, भोजनों और भवनों की भव्यता में राजकुमारों की नकल करें, जबकि उनके जीवन को संयम, मिताचार, विनम्रता और दीनता के उदाहरण होना चाहिए था?
क्या पास्टरों और अध्यक्षों के पद के अनुरूप था कि वे केवल नगरों, कस्बों और किलों ही को नहीं, वरन् बड़ी-बड़ी काउण्टियों और डचियों को भी हथिया लें, और अन्त में राज्यों और साम्राज्यों की ओर भी अपने पंजे फैलाएँ, जबकि परमेश्वर की अटल आज्ञा उन्हें सब प्रकार के लोभ और लालच से रोकती है?
फिर भी वे इतने निर्लज्ज हैं कि अब भी इस बात से कतराने का साहस करते हैं, और डींग मारते हैं कि कलीसिया की गरिमा को ऐसे वैभव से थामे रखना सर्वथा उचित है। साथ ही वे कहते हैं कि ये बातें उन्हें उनके बुलाहट के कर्तव्यों से इतना नहीं भटकातीं कि वे उन्हें ठीक रीति से पूरा न कर सकें।
पहले दावे के विषय में, यदि उनकी गरिमा का उचित आधार यही है कि वे ऐसी ऊँचाइयों तक उठाए जाएँ कि संसार के बड़े से बड़े राजकुमार भी उनसे डरें और भय खाएँ, तो उनके पास यीशु मसीह के विरुद्ध शिकायत का कारण है, जिसने उनके तर्क के अनुसार उनका घोर अनादर किया है।
क्योंकि उनके विचार में, इससे बढ़कर और कौन सी हानि वह उन्हें पहुँचा सकता था कि यह कहे:
“अन्यजातियों के राजा और प्रधान उन पर प्रभुता करते हैं, परन्तु तुम में ऐसा न होगा। वरन् जो तुम में बड़ा है, वह छोटे के समान बने, और जो प्रधान है, वह सेवक के समान हो।”
—मत्ती 20:25–27; लूका 22:25–26
इन वचनों के द्वारा वह उनके पद को इस संसार के सारे ठाठ-बाट और महिमा से बहुत दूर रखता है।
जहाँ तक उनके दूसरे दावे का प्रश्न है, मैं चाहता हूँ कि उसे अनुभव से प्रमाणित करना उनके लिये उतना ही सरल होता जितना उस पर बिना कारण डींग मारना है।
परन्तु यदि प्रेरितों ने दान बाँटने के लिये परमेश्वर के वचन की उपेक्षा करना उचित न समझा, तो इससे सिद्ध होता है कि एक ही मनुष्य एक अच्छे राजकुमार और एक अच्छे अध्यक्ष, दोनों के कर्तव्य ठीक रीति से नहीं निभा सकता।
“यह उचित नहीं कि हम परमेश्वर का वचन छोड़कर भोजन परोसने की सेवा करें।”
प्रेरित, उन उत्तम वरदानों के कारण जो उन्होंने परमेश्वर से पाए थे, उनके किसी भी उत्तराधिकारी से कहीं अधिक बड़ी ज़िम्मेदारियाँ उठाने में समर्थ थे। फिर भी उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे वचन की सेवा और दान के वितरण, दोनों पर एक साथ ध्यान देते हुए बोझ के नीचे असफल हुए बिना नहीं रह सकते। तब ये लोग, जो प्रेरितों की तुलना में कुछ भी नहीं हैं, उनकी लगन को सौ गुना कैसे पार कर सकते थे?
ऐसा कुछ करने का प्रयास करना भी निश्चय ही अत्यन्त दुस्साहसपूर्ण काम था, फिर भी वह प्रयास किया गया। उसका परिणाम क्या निकला, यह सब देख सकते हैं, और वस्तुतः कोई और परिणाम सम्भव ही न था: इन लोगों ने दूसरों का काम करने के लिये अपनी ही बुलाहट को छोड़ दिया।
जिन राजकुमारों ने अध्यक्षों को धनी बनाने के लिये अपनी इतनी सम्पत्ति उन्हें दे डाली, उन्होंने सम्भवतः भक्ति के किसी उत्साह से ऐसा किया। परन्तु इस अत्यधिक उदारता से उन्होंने कलीसिया के हित का अत्यन्त निकृष्ट प्रबन्ध किया, जिसकी सच्ची और प्राचीन खराई को उन्होंने बिगाड़ दिया — या यों कहें कि पूरी तरह नष्ट कर दिया।
और अध्यक्षों ने, जिन्होंने राजकुमारों की उदारता का अपने लाभ के लिये शोषण किया, इससे पर्याप्त रूप से दिखा दिया है कि वे अध्यक्ष हैं ही नहीं।
उन दोनों प्रकार की सामर्थ्य के विषय में, जिन्हें बचाए रखने के लिये वे अब इतने जोर से झगड़ रहे हैं, संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि वे क्या चाहते हैं, यह देखना सरल है। यदि वे अपना आत्मिक राज्य त्यागकर उसे यीशु मसीह को सौंप देते, तो परमेश्वर की महिमा, खरी शिक्षा या कलीसिया के कल्याण को कोई खतरा न होता।
इसी प्रकार यदि वे अपनी सांसारिक सत्ता छोड़ देते, तो कलीसिया के सामान्य कल्याण की कोई हानि न होती। परन्तु क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि जब तक वे — जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है — कठोरता और बल से राज्य न करें, तब तक कुछ भी फल-फूल नहीं सकता, इसलिये वे प्रभुत्व की अतृप्त लालसा में बह जाते हैं और अन्धे हो जाते हैं।
“तुम ने उन पर कठोरता और बल से प्रभुता की है।”
परन्तु कलीसिया की सांसारिक सम्पत्ति के विषय में प्रसंगवश इतना कहना पर्याप्त है। अब मैं आत्मिक राज्य की ओर लौटता हूँ, जो यथार्थ में विचाराधीन विषय है।
जब वे अपने आप को इस राज्य के हर तर्कसंगत बचाव से वंचित पाते हैं, तो इस अन्तिम और दयनीय शरणस्थल में भाग जाते हैं। वे कहते हैं कि यद्यपि वे समझ में अज्ञानी और मन में भ्रष्ट हैं, तथापि परमेश्वर का वचन अब भी प्रभावी है, जो हमें अपने से बड़ों की आज्ञा मानने का आदेश देता है। और यद्यपि वे कठोर और अन्यायपूर्ण नियम थोपते हैं, तथापि हमारा प्रभु हमें आज्ञा देता है कि जो कुछ शास्त्री और फरीसी कहें, वह सब करें, चाहे वे ऐसे असहनीय बोझ बाँधते हों जिन्हें वे स्वयं उँगली से भी छूना न चाहें।
“शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं। इसलिये जो कुछ वे तुम से कहें, वह करना और मानना; परन्तु उनके से काम मत करना, क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं। वे भारी और असहनीय बोझ बाँधकर मनुष्यों के कन्धों पर रखते हैं, परन्तु आप उन्हें अपनी उँगली से भी सरकाना नहीं चाहते।”
तो क्या? यदि हमें प्रत्येक पास्टर की शिक्षा बिना भेद के ग्रहण करनी होती, तो परमेश्वर के वचन में हमें इतनी बार और इतने ध्यान से यह चेतावनी क्यों दी जाती कि झूठे भविष्यद्वक्ताओं और झूठे पास्टरों की शिक्षा न सुनें?
प्रभु कहता है:
“उन भविष्यद्वक्ताओं की बातें जो तुम से भविष्यद्वाणी करते हैं, मत सुनो; क्योंकि वे तुम्हें झूठ सिखाते हैं, और अपने ही मन के दर्शन की बातें सुनाते हैं, यहोवा के मुँह की बातें नहीं।”
फिर:
“झूठे भविष्यद्वक्ताओं से सावधान रहो, जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास आते हैं, परन्तु अन्दर से फाड़नेवाले भेड़िये हैं।”
और सन्त यूहन्ना भी बिना कारण हमें यह चेतावनी न देता कि आत्माओं को परखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं।
“हर एक आत्मा की प्रतीति न करो, वरन् आत्माओं को परखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं।”
शैतान के दूत इस जाँच से मुक्त नहीं हैं, क्योंकि स्वर्ग के स्वर्गदूत भी इसके अधीन हैं।
इसके अतिरिक्त, क्या हमारे प्रभु की यह घोषणा कि यदि एक अन्धा दूसरे अन्धे को मार्ग दिखाए तो दोनों गड्ढे में गिरेंगे, हमें पर्याप्त रूप से नहीं दिखाती कि हमें ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए कि हम किन पास्टरों की सुनें, और यह कि उन सब की बिना भेद के सुनना अविवेक है?
“यदि अन्धा अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड्ढे में गिरेंगे।”
इसलिये वे हमें अपने अधिकार के पदनामों से डरा नहीं सकते और अपने अन्धेपन में नहीं खींच सकते। इसके विपरीत, हम देखते हैं कि हमारा प्रभु हमें कितनी सावधानी से चेताता है, कि हम दूसरों की भूल से सहज ही भटकाए न जाएँ, चाहे उसे ढकनेवाला पदनाम कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो। क्योंकि यदि उसका वचन सच्चा है, तो सब अन्धे मार्गदर्शक — चाहे वे अध्यक्ष कहलाएँ, प्रधान याजक या महायाजक — अपने अनुयायियों को उसी विनाश में खींचने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।
उनका एक और दावा उन नियमों के विषय में शेष है जिनका पालन, वे कहते हैं, तब भी करना चाहिए जब वे सौ गुना दुष्ट और अन्यायपूर्ण हों। वे तर्क देते हैं कि प्रश्न यह नहीं कि हम भूलों से सहमत हों, वरन् केवल यह कि अधीन होने के कारण हम अपने बड़ों की कठोर आज्ञाओं का पालन करें, जिन्हें ठुकराने की हमें अनुमति नहीं।
परन्तु हमारा प्रभु अपने वचन की सच्चाई से हमें इस कुतर्क से पूरी तरह बचाता है और हमें दासत्व से छुड़ाता है, और हमें उस स्वतन्त्रता में बनाए रखता है जिसे उसने अपने पवित्र लहू से हमारे लिये मोल लिया। क्योंकि यह सच नहीं है — जैसा वे दुर्भावना से दिखावा करते हैं — कि मामला केवल हमारे शरीरों पर किसी कठोर अत्याचार को सहने का है। उनका उद्देश्य हमारे विवेकों को उनकी स्वतन्त्रता से, अर्थात् उस फल से जो वे मसीह के लहू के द्वारा पाते हैं, वंचित करना और उन्हें दयनीय दासत्व में तड़पाना है।
फिर भी हम इस बात को ऐसे छोड़ दें मानो यह तुच्छ महत्त्व की हो। क्या हम यह थोड़ी बात समझते हैं कि परमेश्वर को उसके राज्य से लूटा जाए, जिसे वह सब बातों से बढ़कर अपने ही लिये बनाए रखना चाहता है? परन्तु जब कभी मनुष्यों के गढ़े हुए नियमों के अनुसार उसकी उपासना की जाती है, तब वह उससे लूटा जाता है, क्योंकि वह अपनी उपासना और सेवा का एकमात्र व्यवस्थापक होना चाहता है।
ताकि कोई इसे तुच्छ महत्त्व की बात न समझे, वह सुने कि हमारा प्रभु इसे कितना बड़ा मानता है:
“इसलिये कि ये लोग मनुष्यों की आज्ञाओं और शिक्षाओं के अनुसार मेरी उपासना करते हैं, देखो, मैं इन लोगों के बीच फिर एक अद्भुत और आश्चर्यजनक काम करूँगा; और उनके बुद्धिमानों की बुद्धि नष्ट होगी, और उनके समझदारों की समझ जाती रहेगी।”
दूसरे स्थान पर:
“ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।”
बहुत से लोगों को यह अनोखा लगता है कि हमारा प्रभु किसी जाति पर ऐसा अद्भुत न्याय लाने की धमकी देता है क्योंकि उन्होंने मनुष्यों की आज्ञाओं और शिक्षाओं के अनुसार उसकी उपासना की, और ऐसी उपासना को व्यर्थ ठहराता है। परन्तु यदि वे समझते कि धर्म के विषयों में, अर्थात् स्वर्गीय ज्ञान के विषयों में, केवल परमेश्वर के मुख पर निर्भर रहने का क्या अर्थ है, तो वे यह भी देखते कि प्रभु के पास मनुष्यों की मूर्ख अभिलाषाओं के अनुसार अपने को चढ़ाई गई हर अव्यवस्थित उपासना से घृणा करने का कोई साधारण कारण नहीं है।
यद्यपि इस रीति से उपासना करनेवाले, उसके सम्मान के लिये मानवीय नियमों के अधीन होकर, नम्रता का कुछ दिखावा रखते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के सामने तनिक भी नम्र नहीं हैं। वरन् वे उस पर वही नियम थोप देते हैं जिनका वे स्वयं पालन करते हैं।
इसी कारण सन्त पौलुस इतने यत्न से हमें चेताता है कि मानवीय परम्पराओं से धोखा न खाएँ। वह एक अत्यन्त उपयुक्त यूनानी शब्द का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है “स्वेच्छा-उपासना” — अर्थात् परमेश्वर के वचन के बिना मनुष्यों की इच्छा से गढ़ी गई उपासना।
“इन बातों में स्वेच्छा-उपासना और दिखावटी नम्रता के कारण ज्ञान का दिखावा तो है।”
यह निश्चित है कि हमारी अपनी बुद्धि और सब मनुष्यों की बुद्धि हमारे लिये मूर्खता बन जानी चाहिए, ताकि हम केवल परमेश्वर को ही बुद्धिमान मानें। जो लोग यह कल्पना करते हैं कि मानवीय रुचि के अनुसार गढ़ी गई रीतियों से वे उसे प्रसन्न करते हैं, वे इस मार्ग से बहुत दूर हैं।
यह बहुत युगों से होता आया है, हमारी अपनी स्मृति में भी, और आज भी उन देशों में जारी है जहाँ सृष्टि को सृजनहार से अधिक अधिकार प्राप्त है। उनका धर्म — यदि उसे धर्म कहलाने का अधिकार है — मूर्तिपूजक देवपूजा में कभी जितने रहे उनसे भी अधिक और मूर्खतापूर्ण अन्धविश्वासों से गड्डमड्ड है। क्योंकि मानव मन शारीरिक और मूर्खतापूर्ण बातों के सिवा और क्या उत्पन्न कर सकता है, जो उस रचयिता को स्पष्ट प्रकट कर देती हैं जिससे वे निकली हैं?
इससे भी बुरी बात यह है। जब मनुष्य इन व्यर्थ परम्पराओं में धर्म को स्थापित करने लगते हैं, तो उस विकृति के पीछे तुरन्त वह घृणित भ्रष्टता आ जाती है जिसकी मसीह ने फरीसियों में भर्त्सना की थी: मनुष्यों की आज्ञाओं को बनाए रखने के लिये परमेश्वर की आज्ञा को तुच्छ जाना और रद्द कर दिया जाता है।
“तुम ने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया।”
मैं हमारे वर्तमान विधि-निर्माताओं के विरुद्ध केवल अपने शब्दों से नहीं लडूँगा। यदि वे सिद्ध कर सकें कि मसीह का यह दोषारोपण उन पर लागू नहीं होता, तो मैं उन्हें विजय सौंप देता हूँ।
परन्तु वे अपना बचाव कैसे करेंगे, जब उनके यहाँ यह सौ गुना अधिक भयानक पाप माना जाता है कि वर्ष में एक बार पुरोहित के कान में पाप-स्वीकार न किया जाए, बजाय इसके कि पूरे वर्ष दुष्टता से जीवन बिताया जाए; शुक्रवार को जीभ की नोक से मांस को छू लिया जाए, बजाय इसके कि प्रतिदिन व्यभिचार से अपने शरीर के हर अंग को अशुद्ध किया जाए; पर्व के दिन किसी उचित परिश्रम में हाथ लगाया जाए, बजाय इसके कि पूरे सप्ताह अपने सारे शरीर को दुष्ट कामों में लगाए रखा जाए; किसी पुरोहित का वैध विवाह में जुड़ना, बजाय इसके कि वह हज़ार व्यभिचारों से कलंकित हो; तीर्थयात्रा की मन्नत पूरी न करना, बजाय इसके कि अपनी हर प्रतिज्ञा में विश्वास तोड़ा जाए; अपना धन उनके कलीसिया-भवनों की अपव्ययी भव्यता पर खर्च न करना, बजाय इसके कि किसी दरिद्र को अत्यन्त विपत्ति में छोड़ दिया जाए; किसी मूर्ति के सामने से टोपी उतारे बिना निकल जाना, बजाय इसके कि संसार के हर मनुष्य को तुच्छ जाना जाए; या निर्धारित घण्टों पर लम्बे और अर्थहीन शब्द न बुदबुदाना, बजाय इसके कि सच्चे प्रेम से कभी प्रार्थना ही न की जाए?
मनुष्यों की परम्पराओं के लिये परमेश्वर की आज्ञा को रद्द करने का अर्थ यदि यह नहीं है, तो और क्या है?
वे परमेश्वर की आज्ञाओं के पालन की ठण्डे मन से, मानो मात्र औपचारिक कर्तव्य निभाते हुए, सराहना करते हैं, जबकि अपनी आज्ञाओं के लिये पूर्ण आज्ञाकारिता ऐसी गम्भीरता से माँगते हैं मानो भक्ति की सारी सामर्थ्य उन्हीं में हो।
परमेश्वर की व्यवस्था के उल्लंघनों को वे तुच्छ प्रायश्चित्तों के दण्ड से दण्डित करते हैं, पर अपने किसी एक आदेश के उल्लंघन को कारावास, आग या तलवार से कम दण्ड नहीं देते। परमेश्वर को तुच्छ जाननेवालों को क्षमा करने को वे पर्याप्त तैयार रहते हैं, परन्तु जो उनके अधिकार को तुच्छ जानते हैं, उनका वे मृत्यु तक अटल घृणा से पीछा करते हैं।
जिन्हें वे अज्ञानता में बन्दी बनाए रखते हैं, उन्हें वे ऐसी शिक्षा देते हैं कि वे परमेश्वर की सारी व्यवस्था को उलट जाते देखना स्वीकार कर लें, पर जिसे वे कलीसिया की आज्ञाएँ कहते हैं, उसके एक बिन्दु को भी नहीं।
पहली बात, यह पहले ही सही मार्ग से गम्भीर भटकाव है कि तुच्छ बातों पर, जो परमेश्वर के मानक से आँकने पर उदासीन हैं, एक मनुष्य दूसरे को तुच्छ जाने, दोषी ठहराए और ठुकराए। फिर भी, मानो यह बुराई पर्याप्त बड़ी न हो, संसार की ये निर्बल और निर्धन आदि-शिक्षाएँ, जैसा सन्त पौलुस उन्हें कहता है, अब परमेश्वर की स्वर्गीय विधियों से अधिक मूल्यवान ठहराई जाती हैं।
“तुम उन निर्बल और निर्धन आदि-शिक्षाओं की ओर क्यों फिरते हो, जिनके तुम फिर से दास होना चाहते हो?”
मनुष्य व्यभिचार से तो मुक्त कर दिया जाता है, परन्तु जो वह खाता है उसके लिये दोषी ठहराया जाता है। जिसे वेश्या रखने की अनुमति है, उसके लिये वैध पत्नी वर्जित है। ऐसी भ्रष्ट आज्ञाकारिता का यही फल है: वह जितना मनुष्यों के आगे झुकती है, उतना ही परमेश्वर से दूर हटती जाती है।
वे पूछते हैं, “तो फिर मसीह ने मनुष्यों को शास्त्रियों और फरीसियों के लादे हुए असहनीय बोझ उठाने की आज्ञा क्यों दी?”
परन्तु मैं उनसे उलटकर पूछता हूँ: मसीह ने दूसरे स्थान पर हमें फरीसियों के खमीर से सावधान रहने की आज्ञा क्यों दी, और उनके खमीर को — जैसा सुसमाचार लेखक सन्त मत्ती समझाता है — उस सब को कहा जो उन्होंने अपनी शिक्षा में से परमेश्वर के शुद्ध वचन में मिला दिया था?
“फरीसियों और सदूकियों के खमीर से सावधान रहो।”
“तब उनकी समझ में आया कि उसने उन्हें रोटी के खमीर से नहीं, परन्तु फरीसियों और सदूकियों की शिक्षा से सावधान रहने को कहा था।”
जब हमें उनकी सारी शिक्षा से भागने और अपने आप को बचाए रखने की आज्ञा दी गई है, तो हमें और क्या चाहिए? इसलिये यह पूर्णतः स्पष्ट है कि दूसरे प्रसंग में हमारे प्रभु का आशय यह नहीं था कि उसकी प्रजा के विवेक फरीसियों की अपनी परम्पराओं से दबाए जाएँ।
स्वयं शब्द, जब तक उन्हें कुतर्क से मोड़ा न जाए, ऐसे अर्थ के निकट भी नहीं जाते। हमारा प्रभु फरीसियों के दुष्ट जीवन के विरुद्ध सार्वजनिक रूप से बोलने को था। इसलिये उसने पहले अपने श्रोताओं को यह सिखाया कि यद्यपि वे फरीसियों के आचरण में अनुकरण के योग्य कुछ नहीं देखते, तथापि फरीसी जब मूसा की गद्दी पर बैठकर, अर्थात् व्यवस्था की व्याख्या करते हुए, जो कुछ मौखिक रूप से सिखाते हैं, उसे वे ठुकराएँ नहीं।
“शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं। इसलिये जो कुछ वे तुम से कहें, वह करना और मानना; परन्तु उनके से काम मत करना, क्योंकि वे कहते तो हैं पर करते नहीं।”
कुछ सरल लोग यह सुनकर कि विश्वासियों के विवेक मानवीय परम्पराओं से बाँधे न जाएँ और परमेश्वर की उनके द्वारा की गई उपासना व्यर्थ है, यह मान बैठते हैं कि यही बात कलीसिया में व्यवस्था बनाए रखने के लिये स्थापित नियमों के विषय में भी कही जानी चाहिए। इसलिये हमें उनकी भूल सुधारनी चाहिए।
यह माना कि यहाँ भूल होना सरल है, क्योंकि पहली दृष्टि में इन दो प्रकार के नियमों का अन्तर प्रकट नहीं होता।
परन्तु हम पूरे विषय को इतने स्पष्ट रूप से समझाएँगे कि उनकी समानता से कोई आगे धोखा न खाए।
आइए इस विचार से आरम्भ करें: यदि हम मानते हैं कि हर मानव समाज को शान्ति और मेल बनाए रखने के लिये किसी न किसी प्रकार का शासन चाहिए, और हर कार्य को सार्वजनिक शिष्टता और मनुष्यों के बीच मूल सभ्यता बनाए रखने के लिये कोई व्यवस्था चाहिए, तो इन बातों का पालन कलीसियाओं में विशेष रूप से होना चाहिए। कलीसियाएँ अच्छी व्यवस्था से बनी रहती हैं और फूट से पूरी तरह बिखर जाती हैं।
इसलिये यदि हम कलीसिया की रक्षा का उचित प्रबन्ध करना चाहते हैं, तो हमें यत्नपूर्वक यह देखना चाहिए कि सब कुछ शिष्टता और अच्छी व्यवस्था से किया जाए, जैसा सन्त पौलुस आज्ञा देता है।
“सब कुछ शिष्टता और क्रमानुसार किया जाए।”
क्योंकि मानव मनों और विचारों में इतनी विविधता है, इसलिये उनके बीच कोई भी शासन-प्रणाली तब तक टिक नहीं सकती जब तक वह निश्चित नियमों से स्थापित न की जाए, और कोई व्यवस्था बिना किसी स्थिर रूप के उचित रीति से बनाए नहीं रखी जा सकती।
इस उद्देश्य के लिये बनाए गए नियमों की निन्दा करना तो दूर, हम यह पुष्टि करते हैं कि उनके बिना कलीसियाएँ तुरन्त अव्यवस्थित और विकृत हो जाएँगी। क्योंकि सन्त पौलुस की यह अपेक्षा कि सब कुछ शिष्टता और क्रम से हो, तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक किसी स्थिर रूप के द्वारा व्यवस्था और औचित्य बनाए न रखे जाएँ।
फिर भी हमें सदैव बड़ी सावधानी रखनी चाहिए कि ऐसे पालन उद्धार के लिये आवश्यक न माने जाएँ और इस प्रकार विवेकों पर बन्धन न बन जाएँ, और न परमेश्वर का सम्मान और उपासना उन्हीं में रखी जाए मानो सच्ची भक्ति उनके पालन में निहित हो।
केवल यही भेद उन शापित विधानों को, जिनके द्वारा, जैसा हमने कहा, सच्चा धर्म धुँधला किया जाता है और विवेक विनाश में डुबाए जाते हैं, कलीसिया की उन पवित्र विधियों से अलग करता है, जिनका लक्ष्य सदा दो में से एक होता है: या तो विश्वासियों की संगति में शिष्टता बनाए रखना, या उनके बीच शान्ति और मेल बनाए रखना।
जब यह समझ लिया जाए कि कोई नियम औचित्य के मानक के रूप में स्थापित किया गया है, तो वह अन्धविश्वास दूर हो जाता है जिसमें वे पड़ते हैं जो परमेश्वर की उपासना को मानवीय आविष्कारों में रखते हैं। इसके अतिरिक्त, जब यह समझ लिया जाए कि नियम का लक्ष्य केवल मनुष्यों का सामान्य हित है, तो बाध्यता और आवश्यकता की वह झूठी धारणा उलट जाती है — वह धारणा जो परम्पराओं को उद्धार के लिये आवश्यक मानने पर विवेकों को व्याकुल करती है।
इस भेद को पहचानने का उद्देश्य केवल इतना है कि हम एक-दूसरे की सेवा करके आपस में प्रेम को पोषित करें।
पहले प्रकार के उदाहरण हमें सन्त पौलुस में मिलते हैं, जब वह स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से शिक्षा देने से रोकता है और उन्हें निर्देश देता है कि वे सिर ढके बिना प्रकट न हों।
“स्त्रियाँ कलीसियाओं में चुप रहें, क्योंकि उन्हें बातें करने की अनुमति नहीं।”
“जो स्त्री उघाड़े सिर प्रार्थना या भविष्यद्वाणी करती है, वह अपने सिर का अनादर करती है।”
हमारे बीच भी दैनिक जीवन के उदाहरण हैं: सार्वजनिक रूप से घुटनों के बल और खुले सिर प्रार्थना करना; मृतकों को कफन में लपेटे बिना न गाड़ना; और प्रभु के संस्कारों को अनादर या अशिष्टता से न बरतना।
तो क्या? क्या स्त्री के सिर ढकने में इतना बड़ा भेद है कि उसका खुले सिर सड़क पर जाना गम्भीर अपराध हो? क्या उसे मौन रहने की ऐसी निरपेक्ष आज्ञा है कि बोलने पर वह घोर अपराध की दोषी हो? क्या घुटने टेकने या शव को लपेटने में ऐसी अन्तर्निहित पवित्रता है कि इन रीतियों को छोड़ना पाप हो?
निश्चय ही नहीं। यदि उसके पड़ोसी की तत्काल आवश्यकता स्त्री को सिर ढकने का समय न दे, तो खुले सिर उसकी सहायता को दौड़ जाने में उसे कोई पाप न होगा। ऐसे अवसर भी होते हैं जब उसके लिये चुप रहने से बोलना अच्छा होता है। घुटने न टेक सकनेवाले रोगी को सीधे खड़े होकर प्रार्थना करने से कुछ नहीं रोकता। अन्त में, यदि शव को लपेटने के लिये कपड़ा उपलब्ध न हो, तो उसे बिना गाड़े छोड़ने से नग्न गाड़ देना उत्तम है।
फिर भी इन बातों में अपने आचरण को नियमित करते हुए हमें उस देश के रीति-रिवाजों और नियमों का, जिसमें हम रहते हैं, और लज्जाशीलता के उस स्थिर नियम का भी पालन करना चाहिए जो हमें दिखाता है कि क्या करना और क्या त्यागना उचित है।
यदि कोई इन बातों में भूल या असावधानी से चूक जाए, तो पाप नहीं। यदि वह तिरस्कार से ऐसा करे, तो उसका हठ दोषी ठहराए जाने के योग्य है। यदि कोई तर्क करना और जितना उचित है उससे अधिक बुद्धिमान दिखना चाहे, तो वह विचार करे कि क्या वह परमेश्वर के सामने अपने आप को निर्दोष ठहरा सकता है।
जहाँ तक हमारा प्रश्न है, सन्त पौलुस के शब्द हमें सन्तुष्ट करें:
“हमारी ऐसी रीति नहीं, और न परमेश्वर की कलीसियाओं की है।”
दूसरे प्रकार के उदाहरणों में सार्वजनिक प्रार्थनाओं, उपदेश और बपतिस्मों के निर्धारित समय; इन कामों के लिये ठहराए गए स्थान; भजन या स्तोत्र गाना; प्रभु-भोज ग्रहण करने के लिये ठहराए गए दिन; बहिष्कार करने की रीति; और ऐसी ही अन्य बातें सम्मिलित हैं।
इससे कोई मूल अन्तर नहीं पड़ता कि कौन से दिन या घण्टे चुने जाएँ, भवन का आकार कैसा हो, या किसी दिन कौन से भजन गाए जाएँ। फिर भी निश्चित दिन और घण्टे ठहराए जाने चाहिए, और स्थान इतना बड़ा होना चाहिए कि मण्डली को समा सके, यदि शान्ति और मेल बनाए रखना है।
क्योंकि यदि हर एक को अपनी रुचि के अनुसार सार्वजनिक व्यवस्था की बातें बदलने की अनुमति हो, तो कितने विवाद और गड़बड़ी उत्पन्न होंगी! यदि ऐसी बातें अनिश्चित और हर एक की इच्छा के अधीन छोड़ दी जाएँ, तो कोई एक प्रबन्ध कभी सब को प्रसन्न नहीं करेगा।
इसलिये हमें यत्नपूर्वक ध्यान रखना चाहिए कि इस रीति की शुद्ध खराई को धुँधला या दूषित करने के लिये कोई भूल उत्पन्न न हो। यह तब हो सकता है जब प्रयोग की जानेवाली हर रस्म में कोई स्पष्ट उपयोगिता हो, थोड़ी ही रस्में अपनाई जाएँ, और विशेषकर जब पास्टर खरी शिक्षा द्वारा सब झूठे मतों का मार्ग बन्द करने के लिये जागरूक रहे।
ऐसा ज्ञान इन सब बातों में हम में से प्रत्येक की पूर्ण स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखेगा। फिर भी हर कोई स्वेच्छा से अपनी स्वतन्त्रता पर कुछ अंकुश लगाएगा, जब कभी वह औचित्य या प्रेम, जिनकी हमने बात की, इसकी माँग करे।
यह हमें इन रीतियों का पालन बिना अन्धविश्वास के करने के योग्य भी बनाएगा और हमें दूसरों से उनका पालन अत्यधिक कठोरता से करवाने से रोकेगा। हम यह कल्पना नहीं करेंगे कि रस्मों की भरमार से परमेश्वर की उपासना बेहतर होती है, और न एक कलीसिया बाहरी रूपों के भेद के कारण दूसरी को तुच्छ जानेगी।
अन्त में, ऐसे विषयों में कोई सनातन नियम स्थापित करने के बदले, हम रस्मों के सारे उद्देश्य और प्रयोग को कलीसिया की उन्नति की ओर निर्देशित करेंगे। उस उन्नति की आवश्यकता के अनुसार हमें न केवल किसी एक रस्म में परिवर्तन, वरन् पहले पालन की जानेवाली सब रस्मों को हटाने और समाप्त करने की अनुमति देने को भी तैयार रहना चाहिए।
वर्तमान युग इसका निश्चित प्रमाण देता है कि समय की आवश्यकता के अनुसार, कुछ ऐसी रीतियों को समाप्त कर देना प्रायः अत्यन्त लाभकारी होता है जो अपने आप में न अशोभनीय हैं और न बुरी।
पूर्वकाल में ऐसा अन्धापन और अज्ञान छाया हुआ था कि कलीसियाएँ रस्मों से इतनी भ्रष्ट धारणा और इतने हठी उत्साह के साथ चिपकी रहीं कि वे उन भयानक अन्धविश्वासों से, जिनमें वे दबी हुई थीं, तब तक ठीक रीति से शुद्ध नहीं की जा सकतीं जब तक बहुत सी रस्में हटा न दी जाएँ — वे रस्में जो आरम्भ में अच्छे कारणों से स्थापित की गई होंगी और जो अपने आप में निन्दनीय नहीं हैं।
यदि कोई हठपूर्वक उनकी रक्षा करने पर अड़ा रहे, तो उसका हठ दुष्ट भी होगा और हानिकारक भी। अपने आप में देखें तो हम पहले ही मान चुके हैं कि उनमें कुछ बुरा नहीं। परन्तु उनकी परिस्थितियों के साथ विचार करने पर प्रकट होता है कि रस्मों के दुरुपयोग ने मनुष्यों के हृदयों में ऐसी भूल जड़ पकड़ा दी है कि उसे तब तक सरलता से सुधारा नहीं जा सकता जब तक वे वस्तुएँ हटा न दी जाएँ जो भूल के अवसर को निरन्तर नया करती रहती हैं।
इसी कारण हिजकिय्याह की पवित्र आत्मा की साक्षी से प्रशंसा की गई कि उसने वह पीतल का साँप तोड़कर नष्ट कर दिया जिसे मूसा ने परमेश्वर की आज्ञा से खड़ा किया था।
“उसने पीतल के साँप को, जिसे मूसा ने बनाया था, टुकड़े-टुकड़े कर दिया, क्योंकि उन दिनों तक इस्राएली उसके लिये धूप जलाते थे।”
यदि वह लोगों की मूर्तिपूजा का साधन न बनने लगा होता, तो उसे परमेश्वर के अनुग्रह की स्मृति के रूप में सुरक्षित रखने में कुछ बुरा न था। परन्तु चूँकि भले राजा के पास उस साँप के दुरुपयोग से लोगों द्वारा किए गए अधर्म को सुधारने का और कोई उपाय न था, इसलिये उसके पास उसे नष्ट करने का उतना ही कारण था जितना मूसा के पास उसे खड़ा करने का था।
क्योंकि भ्रष्ट मानवीय विवेक के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा दुर्बल पेट के साथ किया जाता है, जिससे कठिनाई से पचनेवाले भोजन रोक लिए जाते हैं, यद्यपि वही भोजन सबल और स्वस्थ पेट के लिये हितकर होते।
