विषय 24 (28 में से)

स्वतंत्रता

डी. एल. मूडी · संकलन: रेव. जे. बी. मैक्लूर

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    बूढ़ा साम्बो और “मालिक”

    मेरे एक मित्र ने बताया कि युद्ध से पहले वह नैचेज़ में था, और एक शनिवार को वह और उसका एक मित्र घोड़ागाड़ी में घूमने निकले — पूरे सप्ताह वे स्कूल में पढ़ाते थे — और वे नैचेज़ से पीछे की ओर देहात में निकल गए। बड़ा सुहावना दिन था, और उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा गुलाम चला आ रहा है, और उन्होंने सोचा कि ज़रा मज़ा लिया जाए। वे अभी ऐसी जगह पहुँचे ही थे जहाँ सड़क दो भागों में बँटती थी, और वहाँ एक पट्टिका लगी थी जिस पर लिखा था, “लिबर्टी (आज़ादी) 40 मील।” उनमें से एक युवक ने उस बूढ़े काले गाड़ीवान से कहा, “साम्बो, तुम्हारी उमर कितनी है?” “हम ना जानी, मालिक। हमरा ख्याल है कि हम कोई अस्सी बरस के होंगे।” “क्या तुम पढ़ सकते हो?” “नाहीं, सरकार; ई देस में हम लोग नाहीं पढ़त। ऊ कानून के खिलाफ है।” “क्या तुम बता सकते हो कि उस पट्टिका पर क्या लिखा है?” “हाँ, सरकार; ऊ पर लिखा है कि लिबर्टी (आज़ादी) 40 मील है।” मेरे मित्र ने कहा, “तो अब, तुम उस सड़क पर चलकर अपनी आज़ादी क्यों नहीं पा लेते? वहाँ लिखा है, ‘आज़ादी सिर्फ़ 40 मील।’ तो तुम वह सड़क पकड़कर वहाँ क्यों नहीं चले जाते?” बूढ़े का चेहरा बदल गया, और उसने कहा, “अरे, छोटे मालिक, ऊ सब तो छलावा है। अगर ऊ खम्भा ऊ आज़ादी का रास्ता दिखाता जो परमेस्वर देत है, तो हम ओको आजमा के देखते। ओमें कोनो छलावा नाहीं हो सकत।” मेरे मित्र ने कहा कि उसने किसी प्रचारक के होंठों से भी इससे अधिक प्रभावशाली बात कभी नहीं सुनी थी। परमेश्वर चाहता है कि उसके सब पुत्रों को स्वतंत्रता मिले।

    “अभी और सदा के लिए स्वतंत्रता।”

    जब मिस स्माइली पढ़ाने के लिए दक्षिण में गईं, तो वे एक होटल में ठहरीं और उन्होंने पाया कि हर चीज़ गन्दगी से ढकी है। मेज़ें गन्दी थीं, बरतन गन्दे, बिस्तर गन्दे। तब उन्होंने उस घर में रहनेवाली एक बूढ़ी काली स्त्री को बुलाया और कहा, “देखो, तुम जानती हो कि उत्तर के लोगों ने तुम्हें आज़ाद किया है। मैं उत्तर से आई हूँ और मुझे गन्दगी पसन्द नहीं, इसलिए मैं चाहती हूँ कि तुम घर साफ़ करो।” वह बूढ़ी काली स्त्री काम में जुट गई, और ऐसा लगा मानो उसने उस आधे दिन में उससे भी अधिक काम कर डाला जितना उसने उससे पहले एक महीने में किया था। जब वह महिला लौटीं, तो वह काली स्त्री उनके पास आई और बोली, “अब बताइए, हम आज़ाद हैं कि नाहीं? जब हम अपने पुराने मालिक के पास जात हैं तो ऊ कहत हैं कि हम आज़ाद नाहीं हैं, और जब हम अपने लोगन के पास जात हैं तो ऊ कहत हैं कि हम आज़ाद हैं, और हमका नाहीं मालूम कि हम आज़ाद हैं कि नाहीं। कुछ लोग हमसे कहे कि अब्राहम लिंकन ने एक घोषणा पर दस्तखत किए हैं, पर मालिक कहत हैं कि ऊ नाहीं किए; ओको ऐसा करने का कोनो हक नाहीं रहा।” इसी तरह मसीही लोग भी यह जाने बिना चलते रहते हैं कि वे स्वतंत्र हैं या नहीं। अरे, जब उनमें पवित्र आत्मा होता है, तो वे हवा के समान स्वतंत्र होते हैं। मसीह इसी के लिए आया। वह हमें स्वतंत्र करके फिर दासत्व में छोड़ देने नहीं आया। वह हमें अभी और सदा के लिए स्वतंत्रता देने आया।

    लिब्बी जेल से छुटकारा

    जब मैं फिलाडेल्फिया में था, तो कैप्टन ट्रम्बुल ने मुझे एक कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि जब वे लिब्बी जेल में थे, तो समाचार आया कि उनकी पत्नी वॉशिंगटन में है, और उनका छोटा बच्चा मर रहा है: और उसके बाद जो समाचार आया वह यह था कि उनका बच्चा मर गया है, और माँ इस आशा में वॉशिंगटन में ही रुकी हुई है कि उसका पति उसके साथ आ सकेगा और उस बच्चे को न्यू इंग्लैण्ड ले जाकर दफ़नाएगा; पर उसके बाद उन्हें कोई समाचार नहीं मिला। एक दिन जेल में समाचार पहुँचा कि सिटी पॉइंट से एक नाव आई है, और जेल में नौ सौ से अधिक लोग एक साथ आनन्द मनाने लगे। उन्हें किसी शुभ समाचार की आशा थी। फिर यह समाचार आया कि उन सब में से केवल एक ही आदमी छोड़ा जाएगा, और सब कहने लगे, “वह कौन है?” वह कोई ऐसा व्यक्ति था जिसका वॉशिंगटन में कोई प्रभावशाली मित्र था, जिसने सरकार को मना लिया था कि वह उसमें रुचि ले और उसे छुड़वा दे। पूरी जेल में हलचल मच गई। आख़िरकार एक अफ़सर आया और उसने पूरे ज़ोर से पुकारा, “हेनरी क्ले ट्रम्बुल!” उन पादरी ने मुझे बताया कि उनका नाम उन्हें कभी इतना मीठा नहीं लगा था जितना उस दिन लगा। वह तो चुनाव था, पर बाइबल में आपको कहीं कोई हेनरी क्ले ट्रम्बुल नहीं मिलेगा। बाइबल में कोई विशेष मामला नहीं है। परमेश्वर की घोषणाएँ सब पापियों के लिए हैं। जो कोई जेल से बाहर निकलना चाहे, निकल सकता है। कठिनाई यह है कि वे निकलना ही नहीं चाहते। वे किसी प्यारे पाप के बन्दी बने रहना अधिक पसन्द करते हैं।

    एक सम्राट ने चार करोड़ गुलामों को स्वतंत्र किया

    एक बार रूस के सम्राट ने एक योजना बनाई जिसके द्वारा वह उस देश के भूदासों को स्वतंत्र करनेवाला था। उनकी संख्या चार करोड़ थी। उनमें से कुछ का सारा समय बिका हुआ था, और दूसरों का केवल कुछ भाग। सम्राट ने अपनी परिषद् को अपने पास बुलाया, और चाहा कि वे गुलामों को स्वतंत्र करने का कोई उपाय निकालें। छह महीने तक इस विषय पर विचार-विमर्श करने के बाद, एक रात परिषद् ने अपना निर्णय मुहरबन्द करके भेजा कि उनके विचार में यह उचित नहीं है। उस रात सम्राट यूनानी कलीसिया के गिरजाघर में गया और प्रभु-भोज में भाग लिया, और उसने अपने घर का प्रबन्ध ठीक किया, और अगली सुबह सेंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर सिपाहियों के कदमों की धमक सुनाई दे रही थी। सम्राट ने अपने अंगरक्षकों को बुलाया, और दोपहर से पहले पैंसठ हज़ार लोग उस महल को घेरे खड़े थे। ठीक आधी रात को एक घोषणा निकली कि रूस का हर गुलाम सदा के लिए स्वतंत्र कर दिया गया है। घोषणा जारी हो चुकी थी, और राज्य के सब गुलामों ने उस पर विश्वास किया। तब से वे स्वतंत्र हैं। मान लीजिए उन्होंने उस पर विश्वास न किया होता? तब उन्हें उसका लाभ कभी न मिलता। यदि एक मनुष्य चार करोड़ लोगों को स्वतंत्र कर सकता है, तो क्या परमेश्वर में हर बन्दी को स्वतंत्र करने की सामर्थ नहीं है?

    “कर्तव्य” पर मूडी — वे अपनी माँ से कैसा प्रेम करते हैं

    कनेक्टिकट के पहाड़ों में दूर मेरी एक बूढ़ी माँ है, और बीस वर्षों से मेरा यह नियम रहा है कि मैं हर वर्ष उनसे मिलने जाता हूँ। मान लीजिए मैं वहाँ जाकर कहूँ, “माँ, जब मैं छोटा था तब आप मुझ पर बहुत दयालु थीं — आपने मेरे साथ बहुत भलाई की; जब पिताजी मर गए तो आपने हम सबको एक साथ रखने के लिए कड़ी मेहनत की, इसलिए मैं आपसे मिलने आया हूँ क्योंकि यह मेरा कर्तव्य है।” तब तो मैं केवल इसलिए गया कि यह मेरा कर्तव्य था। तब वे मुझसे कहेंगी, “अच्छा, बेटा, यदि तुम मुझसे केवल इसलिए मिलने आते हो कि यह तुम्हारा कर्तव्य है, तो तुम्हें फिर आने की आवश्यकता नहीं।” और परमेश्वर के बहुत-से सेवकों का भी यही हाल है। वे उसके लिए इसलिए काम करते हैं कि यह उनका कर्तव्य है — प्रेम के कारण नहीं। आइए, हम इस “कर्तव्य” शब्द को मिटा दें, और यह अनुभव करें कि परमेश्वर के लिए काम करना केवल एक सौभाग्य है, और यह याद रखने का प्रयत्न करें कि जो काम केवल कर्तव्य की भावना से किया जाता है, वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य नहीं है।

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