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मूडी साहब जब अपनी विशाल सभाओं के सामने अपने किस्से सुनाते थे, तब लोग साँस रोककर उन्हें सुनते थे, और मानव-हृदय पर उनका अद्भुत प्रभाव पड़ता था। इसी बात ने संकलनकर्ता को इस पुस्तक का विचार दिया, और उसे यह विश्वास और आशा दिलाई कि यदि इन्हें ठीक-ठीक वर्गीकृत करके पुस्तक के रूप में सजाया जाए, तो ये आम पाठक के लिए भी भलाई की अपनी मूल सामर्थ का कुछ अंश अब भी बनाए रखेंगे। सबसे अच्छे किस्से चुने गए हैं और उन्हें उपयुक्त शीर्षकों के अन्तर्गत, वर्णानुक्रम में सजाकर, सावधानी से संकलित किया गया है, ताकि ये अनेक कहानियाँ निजी पाठक और सार्वजनिक शिक्षक दोनों को सहज ही उपलब्ध हो सकें। मूडी साहब की बोलचाल की शैली को पूरी तरह ज्यों-का-त्यों रखा गया है। कहानी वे स्वयं सुनाते हैं। पूरी पुस्तक में जगह-जगह “सोना” बिखरा हुआ मिलेगा, जिसमें अनेक बहुमूल्य और समयोचित सच्चाइयों के विषय में मूडी साहब के संक्षिप्त और सारगर्भित कथन सम्मिलित हैं।
संकलनकर्ता शिकागो के दैनिक समाचार-पत्रों में छपी टैबरनेकल सभाओं की विस्तृत रिपोर्टों से, न्यूयॉर्क के समाचार-पत्रों में छपी हिप्पोड्रोम की सभाओं की रिपोर्टों से, और मूडी साहब द्वारा संशोधित उपदेशों के संग्रह से मिली सहायता को कृतज्ञता से स्वीकार करता है। इस सच्ची प्रार्थना के साथ कि इन कहानियों के पढ़ने के साथ परमेश्वर की आशीष भी हो—वे कहानियाँ जिन्होंने उस महान सुसमाचार-प्रचारक के होंठों से निकलते समय हज़ारों-हज़ार लोगों को आशीष दी—संकलनकर्ता यह पुस्तक जनता को समर्पित करता है,
जे. बी. मैक्लूर, 30 जनवरी, 1877, शिकागो, इलिनॉय।
