अध्याय 5 · 1800

नया धर्मयुद्ध—श्रीरामपुर और भ्रातृमण्डल

जॉर्ज स्मिथ

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    इंग्लैंड में बैपटिस्टों पर इस समाचार का प्रभाव—स्वदेश की कलीसियाओं पर—लंदन तथा अन्य मिशनरी सोसाइटियों की स्थापना में—स्कॉटलैंड में—हॉलैंड और अमेरिका में—मिशनरी घर—जोशुआ मार्शमैन, विलियम वार्ड और दो अन्य लोग भेजे गए—दक्षिणी एशिया के आयोना पर उतरना—वार्ड और केरी की भेंट—अनार्य पहाड़ी जनजातियों में सुसमाचार प्रचार का पहला प्रयास—परमेश्वर के विधानों द्वारा केरी का श्रीरामपुर की ओर धकेला जाना—हुगली ज़िले की घनी आबादी—वह अपनी साझी सम्पत्ति वाली योजना को नई परिस्थितियों के अनुसार ढालता है—सम्पत्ति की ख़रीद—भ्रातृमण्डल का संविधान—मार्शमैन और वार्ड के साथ उसके सम्बन्ध—हन्ना मार्शमैन, पहली महिला मिशनरी—भाइयों का दैनिक जीवन—समझौता-पत्र—मिशनरी प्रशासन की केरी की आदर्श व्यवस्था पन्द्रह वर्ष तक साकार हुई—भ्रातृमण्डल की आत्मिक वीरता।

    भारत जानेवाले पहले दो अंग्रेज़ मिशनरी, उन्हें भेजनेवालों को ऐसे लगे मानो सदा के लिये लुप्त हो गए हों। धीमी गति से चलनेवाले ईस्ट इंडिया जहाज़ों और फ्रांसीसी समुद्री लुटेरे-जहाज़ों के उन दिनों में, चौदह महीनों तक उनकी कुशलता का कोई समाचार मिडलैंड्स के उन दीन, प्रार्थना करनेवाले लोगों तक नहीं पहुँचा, जिन्होंने साहस बाँधकर इस वीरतापूर्ण उद्यम को आरम्भ किया था। जो रक्षक-जहाज़ डेनिश जहाज़ को फ्रांसीसी तट से भली-भाँति आगे तक छोड़ आया था, वह मौसम के कारण पत्र वापस नहीं ला सका था। अन्त में, 29 जुलाई 1794 को, सचिव फ़ुलर; केरी के प्रिय निजी मित्र पियर्स; ब्रिस्टल में राइलैंड; और लेस्टर की मंडली को यात्रा के रोज़नामचे और वे पत्र मिले जिनमें बालासोर, कलकत्ता, बैंडेल और नदिया में बीते पहले छह सप्ताहों का अनुभव लिखा था—यह उस समय से ठीक पहले का था जब केरी को अपनी आर्थिक दशा की सबसे बुरी स्थिति का पता चला। समिति तुरन्त इकट्ठी हुई। उन्होंने “पवित्र आनन्द के साथ” वह गीत गाया जो तब से मिशनों का जयन्ती-भजन बना हुआ है, अर्थात् विलियम विलियम्स का भजन—

    “अन्धकार की उन उदास पहाड़ियों के ऊपर।”

    उन्होंने “सनातन परमेश्वर का, जिसकी करुणा सदा की है, गम्भीरता से धन्यवाद किया कि उसने आपको समुद्र के संकटों से बचाए रखा और अब तक आपके मार्गों को सफल किया है। आपके परिश्रम का संक्षिप्त वृत्तान्त पढ़ते हुए हम उस आत्मा का कुछ अनुभव करते हैं जिसकी चर्चा भविष्यद्वक्ता ने की है, ‘तेरा हृदय थरथराएगा और आनन्द से भर जाएगा।’ भाषाएँ सीखने में, अनुवाद करने में और प्रेम के हर उस परिश्रम में जिसमें आप लगे हैं, आपकी लगन के लिये हम हृदय से आपका धन्यवाद करते हैं। परमेश्वर के अधीन, अपने परिश्रम के स्थान के विषय में या उसे पूरा करने के साधनों के विषय में हम प्रसन्नता से आपकी बुद्धि, विश्वासयोग्यता और विवेक पर भरोसा रखते हैं। फिर भी, यदि कोई एक स्थान हमें बाकी सब से अधिक महत्त्वपूर्ण लगता है, तो वह नदिया है। परन्तु आपको वहीं जाना चाहिए जहाँ प्रभु आपके लिये द्वार खोले।” जब तक फ़ुलर सचिव रहे, तब तक केरी और समिति के आपसी सम्बन्धों में उदार भरोसे की यही आत्मा बनी रही। जब यह समाचार आया कि मिशनरी नील की खेती करनेवाले बन गए हैं, तो कुछ दुर्बल भाइयों ने, केरी को अपने ही माप से आँकते हुए, सांसारिक प्रलोभनों के विरुद्ध एक नरम-सी चेतावनी भेजी, जिसका उत्तर उसने कुछ मुस्कुराते हुए और स्नेह के साथ दिया। जॉन न्यूटन ने, जो उस समय सेंट मेरी वूलनॉथ के वृद्ध रेक्टर थे, सलाह माँगे जाने पर उन्हें आश्वस्त किया: “यदि हृदय परमेश्वर के लिये उत्साह और आत्माओं के प्रति प्रेम से प्रज्वलित हो,” उन्होंने कहा, “तो परिस्थितियों के अनुसार व्यवसाय पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, वह उसे हानि नहीं पहुँचाएगा।” क्योंकि केरी का, मोरावियनों की भाँति, यह अभिप्राय था कि मिशनरी एक साझे कोष पर जीवन बिताएँ और कभी धन इकट्ठा न करें, इसलिए सबसे दुर्बल व्यक्ति भी उस पौलुस-जैसी उदात्तता को पहचान सकता था जो उसके सारे जीवन की पहचान रही थी—अर्थात् उसने अपना थोड़ा-सा वेतन भी त्याग दिया ताकि वह अफ़्रीका और एशिया के दूसरे मिशनों के काम आ सके।

    वह आत्मिक नियम, जिसे बाद में डफ़ की सफलता ने चाल्मर्स से सूत्र रूप में कहलवाया—कि विदेशी मिशनों का स्वदेशी मिशनों पर प्रभाव उन्हें खाली करके नहीं, वरन् उनमें ख़मीर की भाँति उफान लाकर पड़ता है—अब बड़े पैमाने पर प्रकट होने लगा, और उसका परिणाम इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, आयरलैंड, अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस के इवैंजेलिकल लोगों के उस सार्वभौमिक मिशनरी उद्यम की स्थापना के रूप में हुआ, जो सारी उन्नीसवीं शताब्दी की विशेषता रहा है। यह हमें सबसे पहले स्वयं फ़ुलर में दिखाई देता है। थॉमस को उसकी अत्यन्त निराशा की दशा में सांत्वना देते हुए उन्होंने 1789 के अपने ही रोज़नामचे से उसे आत्मिक निष्क्रियता के एक लम्बे समय का विवरण उद्धृत करके सुनाया, जो तब तक बना रहा जब तक केरी ने उन्हें मिशन में सम्मिलित होने के लिये विवश न कर दिया। “इससे पहले मैं अपनी दुर्दशा पर कुढ़ने के सिवाय कुछ विशेष नहीं करता था, परन्तु जब से मैंने परमेश्वर के लिये अधिक सक्रियता अपनाई है, मेरा बल फिर लौट आया है और मेरा प्राण फिर से भर गया है।” “आपका काम एक महान काम है, और धार्मिक संसार की आँखें आप पर लगी हैं। आपके उद्यम ने, आपके प्रिय सहकर्मी के उद्यम के साथ, बहुतों को उभारा है। मिशनों की आत्मा निकल पड़ी है। मेरी कामना है कि वह तब तक न रुके जब तक सुसमाचार सारे संसार में न भेज दिया जाए।”

    भक्तिवादी (पायटिस्ट) फ़्रैंक का, जिसने 1710 में पहली मिशनरी रिपोर्टें प्रकाशित की थीं, और मोरावियनों का भी अनुसरण करते हुए, फ़ुलर और उनके सहयोगियों ने 1794 के अन्त के निकट क्लिपस्टोन में जे. डब्ल्यू. मॉरिस के छापेखाने से अपने “पीरियोडिकल अकाउंट्स रिलेटिव टू अ सोसाइटी फ़ॉर्म्ड अमंग द पर्टिक्युलर बैपटिस्ट्स फ़ॉर प्रोपेगेटिंग द गॉस्पेल अमंग द हीदन” (अन्यजातियों में सुसमाचार के प्रचार के लिये पर्टिक्युलर बैपटिस्टों के बीच गठित एक सोसाइटी सम्बन्धी सामयिक वृत्तान्त) का अंक 1 निकाला। उसमें सोसाइटी की स्थापना का वृत्तान्त और सुन्दरबन से फ़रवरी 1794 तक लिखे केरी के पत्र थे। वर्ष 1800 तक इनमें से छह वृत्तान्त निकले, और तब उन्हें अनुक्रमणिका और चित्रों सहित एक खण्ड के रूप में प्रकाशित किया गया। वह खण्ड उन कई सुसमाचार-गीतों में से एक के तुकबन्दी वाले अनुवाद के साथ समाप्त होता है जिन्हें केरी ने 1798 में बंगला में लिखा था। इस प्रकार उसने इतने आरम्भिक समय में ही हिन्दुओं के संगीतमय पाठ के प्रेम को मसीह की सेवा में लगा दिया था, जिसे हाल ही में मानो फिर से खोजा गया है और जो देशी वाद्ययन्त्रों के साथ किए जाने पर अब सुसमाचार-प्रचार के काम का एक महत्त्वपूर्ण ढंग बन गया है। केरी द्वारा गढ़ी गई बंगला भाषा के इतिहास में मूल रचना की एक अनोखी रुचि और मूल्य है। संगीत के विषय में उसने लिखा:—“कभी-कभी हमारे यहाँ ऐसी धुन होती है जो मेरे हृदय को आनन्दित करती है, यद्यपि किसी अंग्रेज़ के कानों को वह बेसुरी लगेगी।”

    नवजात बैपटिस्ट सोसाइटी का तत्काल कार्य ऐसा ही था। जिस क्षण डॉ. राइलैंड ने केरी का पत्र पढ़ा, उन्होंने डॉ. बोग और मिस्टर स्टीफ़न को, जो संयोग से ब्रिस्टल में थे, अपने साथ आनन्द मनाने के लिये बुलवा भेजा। तीनों ने परमेश्वर का धन्यवाद किया, और फिर बोग और स्टीफ़न ने एक प्रमुख पादरी मिस्टर हे से मिलकर गैर-बैपटिस्टों के एक वैसे ही संगठन की स्थापना की ओर पहला कदम उठाया, जो तब से लंदन मिशनरी सोसाइटी के नाम से जाना जाता है। तुरन्त ही बोग ने—वह योग्य प्रेस्बिटेरियन, जिसने गॉस्पोर्ट में एक धर्मविज्ञान विद्यालय की अध्यक्षता की थी जहाँ से मिशनरी निकले थे, और जिसने डंडास द्वारा प्रस्तावित एडिनबरा का सबसे अच्छा पादरी-पद भी अस्वीकार कर दिया था—अपना सम्बोधन-पत्र लिखा, जो सितम्बर के “इवैंजेलिकल मैगज़ीन” में छपा, और जिसमें उसने कलीसियाओं से कम से कम बीस या तीस मिशनरी भेजने का आह्वान किया। अगले वर्ष उसने ऊँची वाक्पटुता से भरा जो उपदेश दिया, उसमें उसने घोषणा की कि उस समय का मिशनरी आन्दोलन मानव इतिहास में एक युग का आरम्भ करेगा,—“यह समय हमें सदा स्मरण रहेगा, और आनेवाले युग इसे मसीही परोपकार के युग के रूप में मनाएँ।”

    उसी दिन ऑल सेंट्स, ऑल्डविंकल के रेक्टर, रेवरेंड टी. हॉवीस ने, सैकड़ों पादरियों की ओर संकेत करते हुए, जो यह निर्णय करने के लिये इकट्ठे हुए थे कि पहला मिशन कहाँ भेजा जाए, इस प्रकार उद्गार प्रकट किया: “मुझे ऐसा लगता है मानो मैं वाचा के महान दूत को अपने बीच देख रहा हूँ, जो अपने पंख सँवार रहा है और अपना सनातन सुसमाचार लेकर आकाश के बीचोंबीच होकर हर एक जाति, कुल, भाषा और लोगों के पास उड़ने को तैयार है।” हिन्दुस्तान के विषय में उन्होंने कहा, “हमारे भाई बैपटिस्ट इस समय हमारी इच्छाओं से पहले ही वहाँ पहुँच गए हैं...वहाँ एक हज़ार मिशनरियों के लिये स्थान है, और मेरी कामना है कि हम उस भाग के लिये या पृथ्वी के किसी भी अन्य भाग के लिये एक बड़ी सेना के साथ तैयार रहें।”

    “केरी द्वारा दी गई चुनौती को स्वीकार करनेवाला अगला देश स्कॉटलैंड था। ग्रेविल इविंग ने, जो उस समय एडिनबरा में स्कॉटलैंड की कलीसिया (कर्क) के एक युवा पादरी थे, मार्च 1796 में एडिनबरा या स्कॉटिश मिशनरी सोसाइटी की अपील प्रकाशित की, जिसने बाद में जॉन विल्सन को बम्बई भेजा; और उसके पीछे ग्लासगो सोसाइटी बनी, जिसके हम दक्षिण अफ़्रीका के काफ़िर मिशनों में सबसे सफल मिशन के लिये ऋणी हैं। रॉबर्ट हॉल्डेन ने जब “पीरियोडिकल अकाउंट्स” का पहला अंक पढ़ा, तो अपना सब कुछ बेच डाला और स्वयं के अतिरिक्त छह पादरियों और साधारण सदस्यों का एक प्रेस्बिटेरियन मिशन भेजने के लिये £35,000 दिए, ताकि जो योजना केरी ने मदनाबाटी से बनाई थी वह बनारस से पूरी की जाए; परन्तु पिट ने और डंडास ने भी, यद्यपि वे उसके निजी मित्र थे, उसे कम्पनी के असहिष्णु संसदीय अधिनियम की धमकी दी। चर्च ऑफ़ इंग्लैंड के इवैंजेलिकल पादरियों ने इस नए धर्मयुद्ध में अपना उचित स्थान लिया, और अठारहवीं शताब्दी के समाप्त होने से एक वर्ष पहले उन्होंने वह संस्था बनाई जो तब से चर्च मिशनरी सोसाइटी के रूप में प्रभु की सेना की अगली पंक्ति में रही है; केरी के मित्र टॉमस स्कॉट उसके पहले सचिव थे। यह पवित्र उत्साह एक ओर नीदरलैंड्स तक डॉ. वैन डर केम्प के प्रभाव से फैला, जिन्होंने एडिनबरा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था, और दूसरी ओर न्यू इंग्लैंड के धर्मविज्ञान के विद्यार्थियों तक, जिनमें से एडोनिराम जडसन उसी समय केरी से बर्मा की प्रेरिताई ग्रहण करने के लिये तैयार किए जा रहे थे। शीघ्र ही बंगला बाइबल-अनुवाद भी स्वदेश में वेल्स के लोगों की आवश्यकताओं के साथ मिलकर ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी की स्थापना का कारण बननेवाले थे।

    जब इस सब का समाचार केरी तक दिनाजपुर के दलदलों में उसकी कठिनाइयों और फिर भी विश्वास की विजयों के बीच पहुँचा, और जब उसे पता चला कि शीघ्र ही चार सहकर्मी उसके साथ आ मिलेंगे, जिनमें से एक वार्ड था जिससे उसने स्वयं अपने लिये बंगला बाइबल छापने का वचन लिया था, तो वह जुलाई 1799 में ठीक ही लिख सकता था:—“सुसमाचार की सफलता ने, और अन्य बातों के साथ-साथ इंग्लैंड और सारे पश्चिमी संसार में अब तक न बुझनेवाली मिशनरी ज्वाला ने, हमें कम प्रोत्साहन नहीं दिया है और हमारे हृदयों में उमंग भर दी है।” सटक्लिफ़ को उसने अठारह महीने पहले लिखा था:—“हाल में जो मिशनरी आत्मा निकल पड़ी है उस पर मैं बहुत आनन्दित हूँ: निश्चय ही यह सुसमाचार के सार्वभौमिक प्रसार की भूमिका है! मेरे प्रति जर्मन मोरावियन भाइयों के स्नेहपूर्ण आदर का आपका वृत्तान्त बहुत सुखद है। सामान्य लोग मेरे विषय में जो कहते हैं उससे मैं अधिक प्रभावित नहीं होता; फिर भी भक्ति में प्रसिद्ध लोगों के आदर के प्रति मैं उदासीन नहीं रह सकता...घर पर ही बने रहना अब बहुत से मामलों में पाप बन गया है, और अधिकाधिक बनता जाएगा। सब वरदानों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, और उन्हें दूर-दूर तक फैलाया जाना चाहिए।”

    अब भोर हो रही थी। केरी के काम के लिये धन के साथ-साथ मनुष्य भी अर्पित किए जाने लगे। विशेषकर स्कॉटलैंड में फ़ुलर ने पाया कि उन्हें केवल माँगने की, केवल किसी इवैंजेलिकल मंच पर खड़े होने की देर थी, और उन्हें इतनी रकमें मिल जाती थीं जो, छोटी बातों के उस दिन में, उनके अल्प विश्वास को लज्जित कर देती थीं। अन्त तक स्कॉटलैंड केरी और उसके सहकर्मियों के प्रति निष्ठावान रहा, और मानो इसका पूर्वाभास पाकर उसने 1797 में ही लिखा था:—“स्कॉटलैंड के हमारे भाइयों ने मिशन को प्रोत्साहन देने के लिये इतनी उदारता से कमर कसी है, यह सुनकर मेरा हृदय बहुत आनन्दित होता है।” उन्होंने उसकी योजनाओं को स्वीकार किया, और उसके और उसके काम के लिये प्रार्थना की। जब फ़ुलर सहायता के लिये सेसिल के पास गए, तो उस “कट्टर चर्चवादी” इवैंजेलिकल ने उनसे कहा कि उसकी सब बैपटिस्टों के विषय में बुरी राय है, केवल एक को छोड़कर—उस व्यक्ति को जिसने “द गॉस्पेल वर्दी ऑफ़ ऑल एक्सेप्टेशन” (सुसमाचार सब प्रकार से ग्रहण करने के योग्य) लिखी थी। जब उसे पता चला कि उस पुस्तक का लेखक उसके सामने खड़ा है, तो उस उतावले अपराधी ने क्षमा माँगी और चन्दा देने की पेशकश की। “एक फ़ार्दिंग भी नहीं, महोदय!” उत्तर मिला, “आप विश्वास से नहीं दे रहे हैं;” परन्तु हठी सेसिल ने अपनी बात मनवा ही ली। फिर भी, आधुनिक धर्मयुद्ध की उस आरम्भिक अवस्था में धन से अधिक मनुष्यों की कमी थी। थॉमस और फ़ाउंटेन दोनों ही भूल सिद्ध हुए थे। वैसे ही आरम्भिक अफ़्रीकी मिशनरी भी थे, पहले स्कॉट पीटर ग्रेग को छोड़कर। लंदन मिशनरी सोसाइटी द्वारा “डफ़” जहाज़ में भेजे गए तीस लोगों में से केवल चार ही अभिषेक (ऑर्डिनेशन) के योग्य थे, और उनमें से किसी ने भी कोई उल्लेखनीय नाम नहीं छोड़ा। चर्च मिशन 1815 तक केवल जर्मनों को ही भेजता रहा। शीघ्र ही एक के बाद एक चार युवकों ने बैपटिस्ट सोसाइटी के सामने केरी के सहायक बनकर जाने के लिये अपने आपको प्रस्तुत किया, इस आशा में कि कम्पनी उन्हें वहाँ रहने का अनुबन्ध-पत्र दे देगी—ब्रन्सडन और ग्रांट, जो राइलैंड के ब्रिस्टल के झुंड में से दो थे; जोशुआ मार्शमैन अपनी पत्नी हन्ना मार्शमैन के साथ; और विलियम वार्ड, जिसे स्वयं केरी ने बुलाया था।

    नौ महीने के भीतर फ़ुलर ने उन्हें और उनके परिवारों को एक अमेरिकी जहाज़ “क्राइटीरियन” में रवाना कर दिया, जिसके कप्तान फ़िलाडेल्फ़िया की एक प्रेस्बिटेरियन कलीसिया के प्राचीन, कैप्टन विक्स थे, जिन्होंने उसके बाद सदा संयुक्त राज्य अमेरिका में इस काम को बढ़ावा दिया। चार्ल्स ग्रांट ने उनकी वैसी ही सहायता की जैसी वे अकेले केरी की करते। यद्यपि वे कम्पनी के निदेशकों में सबसे प्रभावशाली थे, फिर भी उनके लिये पारपत्र प्राप्त नहीं कर सके, परन्तु उन्होंने उन्हें ठीक वही परामर्श दिया जो इस नवजात मिशन के लिये रक्षा का जहाज़ (सन्दूक) सिद्ध होनेवाला था: “कलकत्ता में नहीं, बल्कि श्रीरामपुर में उतरो, और वहाँ डेनिश झंडे के संरक्षण में मिस्टर केरी से जा मिलने का प्रबन्ध करो।” पाँच महीने की सकुशल यात्रा के बाद यह दल हुगली पहुँचा। कलकत्ता बन्दरगाह की सीमा में प्रवेश करने से पहले ही कैप्टन विक्स ने उन्हें एक बंगाली लिपिक के मार्गदर्शन में दो नावों में बैठाकर श्रीरामपुर भेज दिया, जो नदी के दाहिने किनारे पर पन्द्रह मील ऊपर है। उन्होंने आपस में यह तय किया था कि वह उनका नाम सहायक खेतिहरों के रूप में नहीं, बल्कि मसीही मिशनरियों के रूप में साहस के साथ दर्ज कराए, और उन्होंने ठीक ही डेनिश संरक्षण पर भरोसा किया। चार्ल्स ग्रांट ने उन्हें अच्छी सलाह दी थी, परन्तु आज भी, जैसा कि 1795 में उनके पूर्ववर्तियों के और 1813 तक उनके उत्तराधिकारियों के मामले में, इस बात पर क्रोध को रोकना आसान नहीं कि ब्रिटिश संसद ने, और विलियम पिट के नेतृत्व वाले दल ने, इतने लम्बे समय तक हिन्दुओं से मसीहियत को दूर रखने के व्यर्थ प्रयास में ईस्ट इंडिया कम्पनी को अपनी सारी शक्ति का बल दिए रखा। वार्ड का रोज़नामचा दक्षिणी एशिया के इस आयोना, इस कैंटरबरी पर मिशनरियों के उतरने की कहानी सरलता से इस प्रकार बताता है:—

    “प्रभु का दिन, 13 अक्टूबर 1799।—भाई ब्रन्सडन और मैं खुले आकाश के नीचे अपने सन्दूकों पर सोए। आज सवेरे पौ फटते ही हम अच्छे स्वास्थ्य और काफ़ी अच्छी मनोदशा में श्रीरामपुर पहुँचे। हम मायर के यहाँ ठहरे, जो एक डेनिश सराय है और जिसकी हमसे सिफ़ारिश की गई थी। आज कोई आराधना नहीं हुई। यहाँ एक पुर्तगाली गिरजे के सिवाय कुछ नहीं है।

    “14 अक्टूबर।—आज दोपहर बाद लंदन मिशनरी सोसाइटी से सम्बन्धित कलकत्ता के मिशनरी मिस्टर फ़ोर्सिथ ने आकर हमें चकित कर दिया। वे पूरी तरह अपरिचित थे, परन्तु शीघ्र ही भली-भाँति परिचित हो गए। उन्होंने हमें बहुत-सी रोचक जानकारी दी। वे भाई केरी से मिल चुके थे, जिन्होंने उन्हें अपने घर आमंत्रित किया था, उन्हें अपने मुंशी की सहायता देने का प्रस्ताव किया था, इत्यादि।

    “16 अक्टूबर।—कप्तान ने कलकत्ता हो आने के बाद आकर हमें बताया कि जब तक हम उपस्थित न हों, उसका जहाज़ दर्ज नहीं किया जा सकता। भाई ब्रन्सडन और मैं कलकत्ता गए, और अगले दिन हमें बताया गया कि जहाज़ को प्रवेश मिल गया है, इस शर्त पर कि हम पुलिस कार्यालय में उपस्थित हों, या फिर श्रीरामपुर में ही रहें। सब बातों पर विचार करके हमने दूसरी बात को ही चुना, जब तक कि खिदिरपुर से हमारे वे मित्र न आ जाएँ जिन्हें हमने पत्र लिखे थे। कैप्टन विक्स रेवरेंड मिस्टर ब्राउन से मिले, जिन्होंने बड़ी कृपा से हमारे लिये अपनी शक्ति भर कुछ भी करने की पेशकश की। नागरिक शासन के प्रति हमारे आचरण के विषय में हमें दिए गए निर्देश उन्हें पढ़कर सुनाए गए। उन्होंने वचन दिया कि वे बाद में पुलिस कार्यालय जाएँगे और अधिकारी को सूचित करेंगे कि हम तब तक श्रीरामपुर में रहना चाहते हैं जब तक हमें देश के भीतरी भाग में जाने की अनुमति न मिल जाए। बाद में कैप्टन विक्स कार्यालय गए, और वे उनके द्वारा दिए गए हमारे वक्तव्य से पूरी तरह सन्तुष्ट दिखाई दिए। दोपहर बाद हम श्रीरामपुर चले गए।

    “19 अक्टूबर।—आज मैंने गवर्नर को एक पत्र लिखा, जिसमें उनसे अपने “पीरियोडिकल अकाउंट्स” का नवीनतम अंक स्वीकार करने की विनती की, और उन्हें सूचित किया कि हम कल अपने घर में आराधना करने का विचार रखते हैं, जिससे हम किसी भी व्यक्ति को वंचित नहीं रखना चाहते।

    “प्रभु का दिन, 20 अक्टूबर।—आज सवेरे गवर्नर ने हमारी आराधना का समय पूछने के लिये सन्देश भेजा। लगभग साढ़े दस बजे वे कई सज्जनों और उनके अनुचरों के साथ हमारे घर आए। मैंने प्रेरितों के काम 20:24 से उपदेश दिया। यूरोपियनों की एक बहुत ध्यान से सुननेवाली मंडली थी: कई लोग प्रभावित दिखाई दिए, जिनमें गवर्नर भी थे।”

    यह पाठ बहुत अच्छा चुना गया था—पौलुस के वे शब्द जो उसने इफिसुस के प्राचीनों से कहे थे, जब उसने अपना मुँह उन बन्धनों और क्लेशों की ओर किया जो उसकी बाट जोह रहे थे—“परन्तु इन बातों में से कोई भी मुझे विचलित नहीं करती, और न मैं अपने प्राण को कुछ प्रिय जानता हूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को आनन्द के साथ, और उस सेवकाई को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।” यह उन तीन व्यक्तियों का इतिहास सिद्ध हुआ, जो तब से श्रीरामपुर मिशनरियों के नाम से सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए। मिशन के साहित्यिक सदस्य वार्ड ने भी एक भजन रचा, जो इस प्रकार समाप्त होता था:—

    “हाँ, हम तेरी छाया तले सुरक्षित हैं, और भारत की तपन के बीच भी ऐसे ही रहेंगे:

    एक मिशनरी किस बात से डरे, जबकि दुष्टात्माएँ यीशु के चरणों में दुबकी पड़ी हैं।

    “वहाँ, हे परम मधुर उद्धारकर्ता! तेरा क्रूस बहुत से हिन्दू हृदयों को तेरे लिये जीत ले; यही हर हानि की भरपाई कर देगा, जबकि तू अनन्तकाल तक हमारा है।”

    हल में एक मित्र को लिखे अपने पहले पत्र में वार्ड ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया जिसने अनजाने में ही मिशन के भविष्य की भविष्यवाणी कर दी:— “बाइबल और छापेखाने के साथ, आनेवाली पीढ़ियाँ देखेंगी कि एक मिशनरी का परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा, भारत में भी नहीं।” परन्तु इसी बीच उनमें से एक, ग्रांट, मृत्यु द्वारा उठा लिया गया; और जब वे एक महीने तक प्रतीक्षा करते रहे, तो केरी ब्रिटिश क्षेत्र में उन्हें अपने सहायकों के रूप में बसाने की अनुमति प्राप्त करने में असफल रहा। उसने मिस्टर ब्राउन से, और वनस्पति उद्यान के प्रभारी अपने मित्र डॉ. रॉक्सबर्ग से, अपील की थी कि वे प्राच्य विद्वान कोलब्रुक के द्वारा, जो उस समय सरकारी सेवा में ऊँचे पद पर थे, सरकार पर अपना प्रभाव डालें। परन्तु यह व्यर्थ रहा। पुलिस ने झुंझलाहट के साथ देखा था कि गवर्नर-जनरल की उदारता के कारण मिशनरी उसके हाथ से निकल गए थे—उसी गवर्नर-जनरल के विषय में केरी ने एक वर्ष पहले राइलैंड को लिखा था: “कलकत्ता में मैंने बहुत दुराचार देखा; फिर भी मुझे लगता है कि पहले से कम है। लॉर्ड मॉर्निंगटन ने प्रभु के दिन खेल-तमाशों, जुए, घुड़दौड़ और काम-धन्धे का कड़ा विरोध किया है; जिसके परिणामस्वरूप ये घृणित प्रथाएँ पहले से कम हो गई हैं।” इसके अतिरिक्त, आरम्भ में मिशनरियों की सूचना बैपटिस्ट के रूप में नहीं, बल्कि “पोपपन्थी” (पैपिस्ट) के रूप में दी गई थी, और फ्रांस के गुप्तचरों से, जिनके विषय में यह माना जाता था कि वे हर जगह हैं, सावधान रहना आवश्यक था। उस साहसी छोटे गवर्नर ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों को लंदन में डेनिश वाणिज्यदूत ने उसकी देखरेख में सौंपा था, उनकी वह अन्त तक रक्षा करेगा। अतः वार्ड ने एक डेनिश पारपत्र प्राप्त किया, ताकि वह दिनाजपुर जाकर केरी से परामर्श कर सके।

    रविवार का सवेरा था जब वह मदनाबाटी की कोठी के निकट पहुँचा, “बड़ी असामान्य भावनाओं का अनुभव करता हुआ,” अत्यन्त उत्तेजित। “अन्ततः मैंने केरी को देखा! वह मेरी आशा से कम बदला है: इंग्लैंड में रहते समय से वह कुछ अधिक भरा-पूरा है, और परमेश्वर धन्य है! वह अब भी जवान है।” अपने अग्रणी मिशन का, £500 मूल्य की सम्पत्ति का, पाठशाला का, कलीसिया का, खोज करनेवालों का बलिदान करना बड़ा कष्टदायक था, परन्तु उसने संकोच नहीं किया। उसने दूसरे पक्ष की बात इस प्रकार रखी:—“श्रीरामपुर में हम मिशनरियों के रूप में बस सकते हैं, जिसकी यहाँ अनुमति नहीं है; और मिशन के महान उद्देश्य, विशेषकर पवित्रशास्त्र का छापना, इस स्थान की अपेक्षा उस स्थान पर कहीं अधिक पूरे होते दिखाई देते हैं। वहाँ भाई वार्ड छापेखाने की देखरेख भी कर सकेगा; जबकि यहाँ हम उसकी महत्त्वपूर्ण सहायता से वंचित रहेंगे। देश के उस भाग में निवासी इस भाग की अपेक्षा कहीं अधिक हैं; और वहाँ दूसरे मिशनरियों को भी हमारे साथ आ मिलने की अनुमति मिल सकती है, जो यहाँ, ऐसा लगता है, नहीं मिलेगी।” नीचे की ओर आते हुए, राजमहल की पहाड़ियों की यात्रा के समय, जिनके चारों ओर विशाल गंगा घूमकर बहती है, केरी और वार्ड ने संथाल तथा अन्य सरल आदिवासी जनजातियों में सुसमाचार प्रचार का पहला प्रयास किया, जिन्हें ब्राउन और क्लीवलैंड नामक अधिकारियों ने कुछ हद तक वश में कर लिया था। उस समय के पहाड़ियों का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वे जाति, पुरोहितों या सार्वजनिक धर्म से रहित थे, मक्का खाकर और शिकार करके जीते थे, जिसके लिये वे धनुष-बाण रखते थे। “भाई केरी उनसे बातचीत कर सके।” फिर, अगले रविवार को नावों पर से हुई बंगला आराधनाओं पर वार्ड की टिप्पणी है, “साधारण लोग आश्चर्य करते हैं कि भाई केरी शास्त्रों के विषय में इतना कुछ कैसे जान सकते हैं।” केरी ने उसी स्थान से अपने नए सहकर्मियों को लिखा, “मेरी बड़ी लालसा है कि मैं यहीं रहूँ और इन मिलनसार और अशिक्षित अन्यजातियों को स्वर्ग का शुभ समाचार सुनाऊँ। मुझे दृढ़ विश्वास है कि मरते हुए उद्धारकर्ता का सिद्धान्त, पवित्र आत्मा के प्रभाव के अधीन, उनके हृदयों को पिघला देगा।” उस स्थान के निकट तालझेरी और पोखुरिया से लेकर पारसनाथ, राँची और उड़ीसा तक, तब से हज़ारों संथाल और कोल परमेश्वर के राज्य में इकट्ठे किए जा चुके हैं।

    10 जनवरी 1800 को केरी श्रीरामपुर में आकर रहने लगा; 11 तारीख़ को उसे गवर्नर के सामने प्रस्तुत किया गया, और “वह बाहर गया और देशी लोगों को प्रचार किया।” उसकी शिक्षार्थी-अवस्था समाप्त हो चुकी थी; इस प्रकार उसकी पूर्ण प्रेरिताई आरम्भ हुई—समय और असमय तैयार रहनेवाली—जो केवल चौंतीस वर्ष बाद उसके जीवन के साथ ही समाप्त होनी थी।

    इस प्रकार कदम-कदम करके, उस मार्ग से जिसे वह नहीं जानता था, वह मोची लड़का—जिसने ताहिती तक सुसमाचार ले जाने के लिये अपने आपको शिक्षित किया था, जिसे उस कम्पनी के बावजूद बंगाल भेजा गया था जिसने उसे अपने जहाज़ से निकाल दिया था, जिसने कलकत्ता में भूख सही थी, जिसने डेल्टा के जंगलों में अपने लिये लकड़ी की झोंपड़ी बनाई थी, जो दिनाजपुर के दलदलों में नील की खेती करनेवाला बन गया था ताकि बिना किसी हस्तक्षेप के मसीह का प्रचार कर सके, जिसे हिमालय के दलदली प्रदेश में एक बौद्ध का संरक्षण ढूँढ़ने की बात सोचने के लिये विवश होना पड़ा था—अब ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे घने बसे भाग के ठीक हृदय में नए सिरे से आरम्भ करने के लिये धकेल दिया गया, उस विदेशी यूरोपीय शक्ति की सतर्क देखरेख में जिसने एक शताब्दी पहले ट्रांकेबार में मिशनरी भेजे थे और ज़िनज़ेनडॉर्फ़ और मोरावियनों को राज्य का ईश्वरीय नियम सिखाया था; और उसे एक ऐसे गवर्नर, कर्नल बी, का प्रोत्साहन मिला जो स्वयं श्वार्ट्ज़ का शिष्य था। विशेष ईश्वरीय विधानों की इस सूची को पूरा करने के लिये हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यदि फ़ुलर ने थोड़ी-सी भी और देर कर दी होती, तो श्रीरामपुर भी मिशनरियों के लिये बन्द मिलता। क्योंकि उसके अगले वर्ष, जब नेपोलियन के कार्यों ने हमें डेनमार्क से युद्ध करने के लिये विवश कर दिया, तो लॉर्ड मिंटो के पुत्र के अधीन ब्रिटिश सैनिकों की एक टुकड़ी ने बिना किसी विरोध के फ़्रेडरिक्सनगर पर—जैसा कि श्रीरामपुर का सरकारी नाम था—और वहाँ खड़े डेनिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के जहाज़ पर अधिकार कर लिया।

    कलकत्ता और बैरकपुर के सामने स्थित हुगली और हावड़ा का ज़िला या परगना, जिसका केन्द्रीय बन्दरगाह श्रीरामपुर है, एक ऐसी आबादी से भरा हुआ है—मुख्यतः हिन्दू, परन्तु कुछ मुसलमान भी—जिसकी घनता संसार के किसी भी अन्य भाग में नहीं पाई जाती। यदि वर्षों तक विनाशकारी ज्वर के प्रकोप के बाद भी उसके 1701 वर्ग मील में से प्रत्येक वर्ग मील अब भी लगभग एक हज़ार मनुष्यों का, अर्थात् बेल्जियम के अनुपात के दुगने का, भरण-पोषण करता है, तो हम यह विश्वास नहीं कर सकते कि शताब्दी के आरम्भ में वह बहुत कम घना रहा होगा। कलकत्ता के “सरे-पक्ष” हावड़ा से लेकर ज़िले के मुख्य नगर हुगली तक, नदी और पश्चिम की ओर गंगा की पुरानी धारा के बीच की मिट्टी की ऊँची पट्टी ने सब बंगालियों में सबसे धनी और बौद्धिक रूप से सबसे सक्रिय लोगों को आकर्षित किया है। इसी कारण पुर्तगालियों और डचों, फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों, और डेनों ने यहीं अपनी आरम्भिक कोठियाँ स्थापित कीं। मुर्शिदाबाद की मरणासन्न मुसलमान सरकार से बीस एकड़ का स्थान प्राप्त करनेवाला अन्तिम देश डेनमार्क था, प्लासी से दो वर्ष पहले। आधी शताब्दी में ट्रांकेबार से भेजे गए पहले गवर्नर की झोंपड़ी बढ़कर वह “सुन्दर छोटा नगर” बन गई थी जिसने पहले बैपटिस्ट मिशनरियों को मोहित कर लिया। उसके निवासी, जो 1845 से केवल ब्रिटिश प्रशासन के अधीन हैं, अब 45,000 हैं। तब वे बहुत कम थे, परन्तु तब अब से भी अधिक यह नगर जगन्नाथ की विष्णु-पूजा का केन्द्र था, जो सारे भारत में केवल पुरी के बाद दूसरे स्थान पर था। पास ही, और अब रेल द्वारा बन्दरगाह से जुड़ा हुआ, तारकेश्वर का घिनौना मन्दिर है, जो हज़ारों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है, जिनमें बहुत-सी विधवाएँ होती हैं, जो स्नान से टपकते हुए अपने शरीरों को भूमि पर दण्डवत् लिटा-लिटाकर मार्ग नापती हैं। व्यापार में श्रीरामपुर कभी-कभी स्वयं कलकत्ता से भी आगे निकल जाता था, क्योंकि अमेरिकी और फ्रांसीसी युद्धों के समय सारा विदेशी यूरोपीय व्यापार उसी में केन्द्रित था, और अंग्रेज़ सिविल अधिकारी अपनी बचत स्वदेश भेजने के सबसे अच्छे साधन के रूप में उसके निवेशों का उपयोग करते थे। जब मिशनरी उतरे तब बस्ती में एक पुर्तगाली कैथोलिक गिरजे के सिवाय कुछ न था, और गवर्नर उस सुन्दर भवन के लिये चन्दा इकट्ठा कर रहे थे जिसमें केरी अपनी मृत्यु तक प्रचार करता रहा, और कहा जाता है कि उसकी मीनार गवर्नर-जनरल ने सामने बैरकपुर में स्थित अपने ग्रीष्म-महल की खिड़कियों से नगर का दृश्य सुन्दर बनाने के लिये बनवाई थी।

    एक बंगाली गाँव की ग्रामीण गुमनामी से, जहाँ घर, वस्त्र और रहन-सहन का ख़र्च थोड़ा था, राजधानी के पड़ोस के एक ऐसे नगर में लाए जाने पर जहाँ यूरोपियनों का बहुत आना-जाना था, केरी ने तुरन्त अपने साझी सम्पत्ति वाले भ्रातृमण्डल के व्यावहारिक विवरणों को नई परिस्थितियों के अनुसार ढाल लिया। इसमें मार्शमैन और वार्ड के व्यावसायिक अनुभव ने उसकी ऐसी बुद्धिमानी से सहायता की कि एक ऐसी बस्ती बन गई जो मिशन की तीव्र वृद्धि के अनुरूप सहज ही विकसित हो सकती थी। आरम्भ में इस समुदाय में दस वयस्क और नौ बच्चे थे। ग्रांट उनके पहले निवास-स्थान की सीलन से उत्पन्न ज्वर से चल बसा था। होनहार ब्रन्सडन भी शीघ्र ही उस यकृत-रोग से उठा लिया गया जो उसे छापेखाने के बिना चटाई वाले फ़र्श पर खड़े रहने से लगा था। फ़ाउंटेन, जिसने पहले दिनाजपुर में मिशन जारी रखा था, शीघ्र ही वहीं आनन्दपूर्ण मृत्यु को प्राप्त हुआ। थॉमस बीरभूम में बस गया था, परन्तु समय रहते श्रीरामपुर के भाइयों से आ मिला और अच्छी यद्यपि थोड़े समय की सेवा कर सका, इससे पहले कि वह भी उठा लिया गया। परन्तु, जैसा भविष्य के लिये सौभाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ, केरी को आरम्भ में ही पाँच परिवारों का प्रबन्ध करना पड़ा, और यह इस प्रकार किया गया, जैसा वार्ड ने वर्णन किया है:—

    “एक या अधिक घर किराये पर लेना हमें बरबाद कर देता। इसलिए हमने आशा की थी कि हम भूमि ख़रीद कर उस पर चटाई के घर बना सकेंगे; परन्तु उचित स्थान पर हमें कोई भूमि नहीं मिल सकी। परिणामस्वरूप हमने गवर्नर के भतीजे से नगर के बीच में एक बड़ा घर Rs.6000, अर्थात् लगभग £800 में ख़रीद लिया है; चार वर्ष का किराया ख़रीद के मूल्य के बराबर हो जाता। इसमें एक विशाल बरामदा (पोर्टिको) और एक बड़ा कमरा है, जिसके दोनों ओर दो-दो कमरे हैं। कुछ और आगे की ओर दो अन्य अलग कमरे हैं, और एक ओर एक भण्डार-घर है, वह भी अलग, जो छापाखाना बनेगा। यह नदी के किनारे काफ़ी बड़े भू-भाग पर खड़ा है, जो चारों ओर दीवार से घिरा है, पिछले छोर पर एक बाग़ है, और बीच में एक सुन्दर तालाब या जलाशय है। मूल्य ने हमें घबरा दिया, परन्तु हमारे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था; और हमें आशा है कि यह एक आरामदायक मिशनरी बस्ती बनेगी। कलकत्ता के निकट होने के कारण यह हमारी पाठशाला, हमारे छापेखाने और इंग्लैंड के साथ हमारे सम्बन्ध के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।”

    “यहीं से सुसमाचार निकले और सारे भारत में फैल जाए,” उन्होंने फ़ुलर को लिखा। “हम एक पाठशाला चलाने और अपने छापेखाने से जितना हो सके उतना कमाने का विचार रखते हैं। सारा काग़ज़ आ पहुँचा है, और छापाखाना भी, टाइपों आदि सहित, पूरा है। कुछ अध्यायों को छोड़कर सारी बाइबल का अनुवाद हो चुका है, इसलिए हम तुरन्त छापना आरम्भ करने का विचार रखते हैं, पहले नया और फिर पुराना नियम। हम अपने काम से प्रेम करते हैं, और आपका ख़र्च हलका करने के लिये जो कुछ हम कर सकते हैं वह सब करेंगे।”

    यह घर-प्रार्थनालय, दो एकड़ बाग़ की भूमि और दोनों ओर के अलग कमरों सहित, 1875 तक उस बस्ती का केन्द्र बना रहा जो बाद में सारे दक्षिण एशिया और मसीही जगत में प्रसिद्ध हुई। वह प्रार्थनालय आज भी परमेश्वर की आराधना के लिये पवित्र है। बाईं ओर के, हुगली की ओर मुख किए हुए अलग कमरे बढ़कर मिस्टर जॉन मार्शमैन, सी.एस.आई., और “फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया” में उनके दो उत्तराधिकारियों का भव्य निवास बन गए; जबकि उससे आगे कन्या-पाठशाला थी, जो अब हटा दी गई है, डॉ. जोशुआ मार्शमैन का उनकी मृत्यु से पहले का निवास था, और वह बालक-पाठशाला थी जो डेनमार्क के राजा ने मिशन को भेंट की थी। दाईं ओर के अलग कमरे बढ़कर छापाखाना बन गए; नदी के और नीचे की ओर लेडी रूमोर का घर था, जो केरी की दूसरी पत्नी बनीं, और उसके पीछे बड़ी काग़ज़-मिल थी; और उससे भी आगे वह दूसरा उद्यान था जिसमें श्रीरामपुर कॉलेज बनाया गया, प्रधानाचार्य के उस निवास सहित जिसमें केरी की मृत्यु हुई, और उसके पीछे देशी मसीही विद्यार्थियों के लिये एक छात्रावास था। अन्ततः पूरी बस्ती हुगली के दाहिने किनारे पर लगभग महल जैसे भवनों सहित कम से कम पाँच एकड़ का एक खण्ड बन गई; और हुगली, जो बाढ़ के समय आधा मील चौड़ी हो जाती है, उसके और गवर्नर-जनरल के ग्रीष्म-निवास तथा बैरकपुर के अंग्रेज़ी ढंग के उद्यान के बीच बहती है। मूल दो एकड़ भूमि केरी का वनस्पति उद्यान बन गई; घरों को उसने महोगनी के वृक्षों से घेर दिया और आपस में जोड़ दिया, जो बढ़कर घनी छाया वाले सुन्दर वृक्ष बन गए। प्रार्थनालय और मिल के बीच, और अन्ततः कॉलेज तक, उसका प्रिय टहलने का मार्ग उसके अपने लगाए हुए वृक्षों की एक वीथी के नीचे था, जो बहुत समय तक “केरी की सैरगाह” (“केरीज़ वॉक”) के नाम से जाना जाता रहा।

    वे नए सहकर्मी, जिन्हें उसके साथ प्रेमपूर्ण भाईचारे में तब तक रहना था जब तक कि 1837 में मृत्यु ने उनमें से अन्तिम को उठा न लिया, उसे अपनी ओर आकर्षित करने में देर न लगी। वे दोनों उसके साथ जुड़ने के योग्य थे, और उन्होंने उसकी अपनी कमियों को इतनी भली-भाँति पूरा किया कि यह भ्रातृमण्डल भारत में सबसे प्रबल और स्थायी शक्ति बन गया। उसने प्रेमपूर्ण आत्म-हीनता के साथ उनके विषय में अपनी पहली धारणाएँ फ़ुलर को इस प्रकार लिखीं:—“भाई वार्ड ठीक वही व्यक्ति है जिसकी हमें आवश्यकता थी: वह अपने सारे प्राण से काम में लग जाता है। मुझे उससे बहुत प्रसन्नता है, और मैं उससे बहुत आशा रखता हूँ। भाई मार्शमैन परिश्रम और विवेक का एक चमत्कार है, और उसकी पत्नी भी विवेक में ऐसी ही है: भाषा सीखना उसके लिये मात्र खेल है; जितना मैंने उससे दुगने समय में सीखा था, उतना वह अभी से सीख चुका है।” आठ महीने के अध्ययन और सुसमाचार-प्रचार के काम के बाद उनका वर्णन इस प्रकार किया गया है:—“हमारा भाई मार्शमैन, जो एक सच्चा मिशनरी है, थोड़ा-बहुत बोल लेता है; वह बार-बार, वरन् लगभग प्रतिदिन बाहर जाता है और शैतान के गढ़ पर धावा बोलता है। भाई ब्रन्सडन भी थोड़ा बोल लेता है, यद्यपि मार्शमैन जैसा नहीं। भाई वार्ड एक बड़ी निधि है; वह भाषा उतनी शीघ्रता से नहीं सीखता, परन्तु वह इतना पवित्र, इतना आत्मिक मनुष्य है, और बच्चों के बीच इतना उपयोगी है।”

    इतने आरम्भ में ही केरी ने भारत की पहली महिला मिशनरी हन्ना मार्शमैन के मूल्य को पहचान लिया था। विल्टशायर में क्रॉकर्टन के बैपटिस्ट पादरी की पोती, वह छियालीस वर्षों तक एक साथ प्रेमपूर्ण पत्नी भी सिद्ध हुई, और उन तीन मिशनरियों के बराबर की सहभागी भी—जो मसीह के और सभ्यता के मिशनरी थे—जिनकी उसने साझे घर में, पाठशालाओं में, मंडली में, देशी मसीही परिवारों में, और उस आरम्भिक समय में भी विशुद्ध हिन्दू समाज के बीच सहायता की। उसके बिना मिशन सचमुच एकांगी रह जाता। उसके घरेलू हिसाब की पुस्तकों को देखना हमें एक मार्मिक रुचि देता है, जिनमें हम प्रेमपूर्ण सावधानी और विचारशील मितव्ययिता के साथ दर्ज किए गए वे सब दैनिक विवरण पाते हैं, जो एक ओर मूल्यों के इतिहास में एक मूल्यवान योगदान हैं, और दूसरी ओर दिखाते हैं कि किस प्रकार उसके “विवेक” ने सबके वीरतापूर्ण आत्म-त्याग के साथ मिलकर श्रीरामपुर मिशन को भारत की ज्योति बना दिया। वार्ड का रोज़नामचा इस भ्रातृमण्डल का यह पहला चित्र प्रस्तुत करता है, जिन्होंने प्रोटेस्टेंट, रोमी या यूनानी सन्त-चरित्रों में सम्भवतः किसी भी समुदाय से बढ़कर यरूशलेम के प्रेरितिक समुदाय के जीवन को साकार किया:—

    “18 जनवरी 1800।—इस सप्ताह हमने परिवार के संचालन के लिये नियमों का एक समूह अपनाया है। सब बारी-बारी से प्रचार और प्रार्थना करते हैं; एक व्यक्ति एक महीने तक परिवार के कामकाज की देखरेख करता है, और फिर दूसरा; भाई केरी कोषाध्यक्ष हैं, और दवाइयों की पेटी का प्रबन्ध भी उन्हीं के हाथ में है; भाई फ़ाउंटेन पुस्तकालयाध्यक्ष हैं। शनिवार की सन्ध्या मतभेदों को सुलझाने और एक दूसरे से प्रेम करने की प्रतिज्ञा करने के लिये समर्पित है। हमारे संकल्पों में से एक यह है कि हम में से कोई भी निजी व्यापार में न लगे; परन्तु सब कुछ मिशन के लाभ के लिये किया जाए...

    “1 अगस्त।—अब हमारे प्रतिदिन के परिश्रम नियमित रूप से व्यवस्थित हैं। लगभग छह बजे हम उठते हैं; भाई केरी अपने बाग़ में; भाई मार्शमैन सात बजे अपनी पाठशाला में; भाई ब्रन्सडन, फ़ेलिक्स और मैं छापेखाने में। आठ बजे पारिवारिक आराधना के लिये घण्टी बजती है: हम बड़े कमरे में इकट्ठे होते हैं; गाते, पढ़ते और प्रार्थना करते हैं। नाश्ता। इसके बाद भाई केरी अनुवाद या प्रूफ़ पढ़ने के काम में जाते हैं: भाई मार्शमैन पाठशाला में, और बाकी लोग छापेखाने में। हमारा कम्पोज़िटर (अक्षर-योजक) हमें छोड़ गया है, इसलिए हम उसके बिना काम चलाते हैं: हम सप्ताह में 2000-2000 प्रतियों के तीन आधे-शीट छापते हैं; हमारे पास पाँच छपाई करनेवाले, एक तह करनेवाला और एक जिल्दसाज़ है। बारह बजे हम हलका भोजन करते हैं; फिर हम में से अधिकतर लोग दाढ़ी बनाते और स्नान करते हैं, और भोजन से पहले पढ़ते और सोते हैं, जो हम तीन बजे करते हैं। भोजन के बाद हम किसी पद या प्रश्न पर अपने विचार प्रकट करते हैं: यह हमें बहुत लाभदायक लगता है। भाई और बहन मार्शमैन दो बजे के बाद तक अपनी पाठशालाएँ चलाते हैं। दोपहर बाद, यदि कार्यालय का काम पूरा हो गया हो, तो मैं पढ़ता हूँ और ब्राह्मण के साथ बंगला बोलने का प्रयत्न करता हूँ। लगभग सात बजे हम चाय पीते हैं, और रात का भोजन बहुत थोड़ा या बिलकुल नहीं करते। सप्ताह में एक या दो बार हमारे यहाँ बंगला में प्रचार होता है, और गुरुवार की सन्ध्या को हम अनुभव-सभा करते हैं। शनिवार की सन्ध्या को हम मतभेद सुलझाने और कामकाज निपटाने के लिये मिलते हैं, प्रार्थना के बाद, जो सदा चाय के तुरन्त बाद होती है। फ़ेलिक्स छापेखाने में बहुत उपयोगी है;

    विलियम पाठशाला जाता है, और दिन के कुछ भाग में जिल्दसाज़ी सीखता है। महीने के पहले सोमवार को हम नाश्ते से दो घण्टे पहले मिलते हैं, और हर एक बंगाल के अन्यजातियों के उद्धार के लिये प्रार्थना करता है। रात को हम सुसमाचार के सार्वभौमिक प्रसार के लिये मिलकर प्रार्थना करते हैं।”

    वह “समझौता-पत्र”, जो भ्रातृमण्डल की सामाजिक व्यवस्था और आत्मिक उद्यम का, और इंग्लैंड की बैपटिस्ट सोसाइटी के साथ उसके कानूनी सम्बन्धों का भी नियमन करता था, अपनी ईश्वरीय निःस्वार्थता, अपने ऊँचे उद्देश्यों और अपनी स्नेहपूर्ण व्यावहारिक समझ के कारण अध्ययन के योग्य है। फ़ुलर ने 1798 में सोसाइटी की ओर से वचन दिया था कि छह मिशनरियों, उनकी पत्नियों और बच्चों के संयुक्त परिवार के लिये प्रति वर्ष £360 भेजे जाएँगे। श्रीरामपुर के घर और भूमि पर सोसाइटी का Rs.6000 ख़र्च हुआ। ग्रांट की मृत्यु पर, जो एक विधवा और दो बच्चे छोड़ गया, पाँचों मिशनरियों ने पहला स्वैच्छिक समझौता किया, जिसमें “यह व्यवस्था की गई कि कोई भी अपने निजी लाभ के लिये व्यापार न करे, और उनके परिश्रम की उपज एक साझा कोष बने, जिसे बहुमत की इच्छा के अनुसार उनके अपने-अपने परिवारों के भरण-पोषण में, उनके चारों ओर परमेश्वर के काम में, और मृत्यु द्वारा उठा लिए जानेवालों की विधवा और परिवार के लिये लगाया जाए।” पहले वर्ष पाठशालाओं और छापेखाने के कारण भ्रातृमण्डल अपना ख़र्च स्वयं उठाने से भी अधिक कमा सका। दूसरे वर्ष फ़ोर्ट विलियम कॉलेज से केरी के वेतन ने, और पाठशालाओं तथा छापेखाने की वृद्धि ने, उन्हें मिशन के विस्तार के लिये अतिरिक्त धन दिया। उन्होंने न केवल ऐसे विस्तार के लिये आवश्यक दो अतिरिक्त घरों और भूमि का मूल्य चुकाया, बल्कि अगले छह वर्षों में सोसाइटी को वह सब भी लौटा दिया जो उसने पहली ख़रीद के लिये अग्रिम दिया था। उन्होंने श्रीरामपुर मिशन के लिये सारी सम्पत्ति प्राप्त की, और समय-समय पर स्वदेश की समिति को विधिवत् सूचित करते रहे, और 1815 में फ़ुलर की मृत्यु तक उन्होंने उस पर सारा अधिकार सोसाइटी को सौंपे रखा, “ताकि वह परिसर बेचा न जाए या परिवारों की निजी सम्पत्ति न बन जाए।” परन्तु “उनमें अपना शान्तिपूर्ण निवास सुरक्षित रखने के लिये, और उन्हें उन लोगों के हाथों में छोड़ सकने के लिये जिन्हें वे अपने काम में अपने साथ सम्मिलित करें, उन्होंने अपने आपको स्वामी नहीं, बल्कि न्यासी (ट्रस्टी) घोषित किया।”

    1800 का समझौता, जब मिशन का आत्मिक पक्ष बढ़ गया, तो 1805 के “समझौता-पत्र” में विस्तारित किया गया। उनके अपने प्रामाणिक वक्तव्य को, जैसा ऊपर दिया गया है, फ़ुलर ने प्रेमपूर्वक मान्यता दी। 1817 में, और फिर 1820 में, वृद्ध और निर्धन सम्बन्धियों के दावों ने, और प्रत्येक भाई के इस कर्तव्य ने कि वह अपनी विधवा और अनाथों के लिये प्रबन्ध करे, और कभी-कभी दया और मानवता की पुकारों ने, भ्रातृमण्डल को यह सहमति करने के लिये प्रेरित किया कि “प्रत्येक व्यक्ति इन उद्देश्यों के लिये अपने हाथ में एक कोष बनाने हेतु अपने परिश्रम की शुद्ध उपज का दसवाँ भाग नियमित रूप से अलग करे।” मिशनों के इतिहास में, चाहे वे मठवासी हों या इवैंजेलिकल, हम ऐसी किसी बात को नहीं जानते जो प्रशासनिक पूर्णता में, और मसीह-समान आत्म-बलिदान में भी, इसके तनिक भी निकट पहुँचती हो। यह आत्मा को सांसारिक होने से रोकता है, हर प्रकार की सक्रियता को प्रेरित करता है, स्थानीय योग्यता और अनुभव को पूरा अवसर देता है, अधिक से अधिक स्थानीय सहायता और प्रसार को उभारता है, स्वदेश की कलीसिया को नए क्षेत्रों में निरन्तर प्रवेश करने के लिये स्वतंत्र करता है, कार्य में स्थायित्व के साथ-साथ विविधता और नई परिस्थितियों के अनुसार ढलने की क्षमता प्रदान करता है, और सबको प्रार्थनापूर्ण सहयोग और प्रेमपूर्ण भाईचारे के एक पवित्र बन्धन में बाँधता है। यह समझौता सत्रह वर्षों तक इंग्लैंड और भारत में ऐसी सफलता के साथ चलता रहा जिसका वृत्तान्त हम आगे देंगे—अर्थात् तब तक, जब तक फ़ुलर, राइलैंड और सटक्लिफ़ “रस्सियाँ थामे रहने” के लिये जीवित रहे, जबकि केरी, मार्शमैन और वार्ड हिन्दू धर्म की खान खोदते रहे।

    समझौते का आत्मिक पक्ष हमें उस रूप में मिलता है जिसे इन तीनों ने 1805 में तैयार किया था, ताकि उसे उनके सब केन्द्रों पर प्रति वर्ष तीन बार, प्रभु के दिन, सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाए। यह केरी के प्रतिदिन के परिश्रम और समर्पित प्रतिभा के पहले ग्यारह वर्षों का पका हुआ फल है, जैसा वार्ड की उत्साही लेखनी ने लिखा। केरी का सारा जीवन इसी के प्रकाश में पढ़ा जाना चाहिए। इन समापन वाक्यों में लेखक स्वयं केरी का चित्र खींचता है:—“आइए, हम बार-बार अमेरिका के वनों में ब्रेनर्ड की ओर देखें, जो नाश होते हुए अन्यजातियों के लिये परमेश्वर के सामने अपना प्राण ही उण्डेल देता था, जिनके उद्धार के बिना कोई भी वस्तु उसे सुखी नहीं कर सकती थी। प्रार्थना—गुप्त, उत्कट, विश्वासपूर्ण प्रार्थना—सारी व्यक्तिगत भक्ति की जड़ में है। जहाँ मिशनरी रहता है वहाँ प्रचलित भाषाओं का पर्याप्त ज्ञान, नम्र और मन को जीत लेनेवाला स्वभाव, और एकान्त की भक्ति में परमेश्वर को सौंपा हुआ हृदय—ये, ये ही वे उपलब्धियाँ हैं, जो सब ज्ञान से या अन्य सब वरदानों से बढ़कर हमें मनुष्यजाति के छुटकारे के महान काम में परमेश्वर के साधन बनने के योग्य बनाएँगी। अन्त में, आइए हम अपने आपको बिना किसी संकोच के इस महिमामय कार्य के लिये सौंप दें। हम कभी यह न सोचें कि हमारा समय, हमारे वरदान, हमारा बल, हमारे परिवार, या वे वस्त्र भी जो हम पहनते हैं, हमारे अपने हैं। आइए हम उन सबको परमेश्वर और उसके कार्य के लिये पवित्र करें। ओह! कि वह हमें अपने काम के लिये पवित्र करे। आइए हम अपने लिये या अपने बच्चों के लिये एक कौड़ी (दमड़ी) भी इकट्ठी करने के विचार को सदा के लिये त्याग दें। यदि हम उस संकल्प को छोड़ दें जो निजी व्यापार के विषय में उस समय लिया गया था जब हम पहली बार श्रीरामपुर में एक हुए थे, तो उसी घड़ी से मिशन एक हारा हुआ कार्य है। आइए हम निरन्तर सांसारिक आत्मा के विरुद्ध चौकस रहें, और हर प्रकार के भोग-विलास के प्रति मसीही उदासीनता विकसित करें। वरन् आइए हम यीशु मसीह के अच्छे योद्धाओं की नाईं कठिनाई सहें। किसी भी निजी परिवार ने, सांसारिक समृद्धि की सबसे अनुकूल हवा में भी, उतना अधिक सुख नहीं भोगा जितना हमने तब से भोगा है जब से हमने सब वस्तुएँ साझी रखने का निश्चय किया। यदि हम इन्हीं सिद्धान्तों में स्थिर बने रहने की सामर्थ्य पाएँ, तो हम आशा कर सकते हैं कि असंख्य मन फिराए हुए प्राणियों के पास इस देश में अपना सुसमाचार भेजने के लिये सारी अनन्तता तक परमेश्वर को धन्य कहने का कारण होगा।”

    ऐसी थी श्रीरामपुर भ्रातृमण्डल की नैतिक वीरता, ऐसा था उसका आत्मिक लक्ष्य; उसने काम कैसे आरम्भ किया?

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