अध्याय 15

भारत की जनता के लिए केरी का मसीही विश्वविद्यालय

जॉर्ज स्मिथ

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    डेनमार्क का राजपत्र—ब्रिटिश सन्धि—देशी मसीही समुदाय की बढ़ती—लॉर्ड मिन्टो द्वारा स्वशासन के अधिकारों की स्वीकृति—मद्रास दशवार्षिक सम्मेलन और श्रीरामपुर की उपाधियाँ—बी.डी. और अन्य उपाधियों के लिए शिक्षा देने और परीक्षा लेने के उद्देश्य से कॉलेज के पुनर्गठन का प्रस्ताव—केरी के मसीही विश्वविद्यालय के लिए स्थायी निधियों की अपील

    श्रीरामपुर कॉलेज के लिए केरी द्वारा बनाई गई दूरदर्शी योजनाओं की ओर पहले ही ध्यान दिलाया जा चुका है। यह लिखते हुए प्रसन्नता होती है कि जब यह पुस्तक छप रही है (1909), तब कॉलेज परिषद् केरी के आदर्श के अनुसार कॉलेज के पुनर्गठन की एक योजना को आगे बढ़ा रही है, जिसका उद्देश्य उसे भारतीय कलीसिया की सब शाखाओं के लिए सेवकाई के उच्च प्रशिक्षण का केन्द्र बनाना है।

    स्मरण होगा कि 1827 में कॉलेज को फ़्रेडरिक VI. से एक राजकीय राजपत्र (Royal Charter) प्राप्त हुआ था, जिसने उसे उपाधियाँ प्रदान करने का अधिकार दिया और उसे वे सब अधिकार दिए जो पश्चिमी विश्वविद्यालयों को प्राप्त हैं। 6 अक्टूबर, 1845 की सन्धि के अधीन डेनमार्क के राजा ने £125,000 की राशि के बदले त्रांकेबार, फ़्रेडरिकनगर अर्थात श्रीरामपुर,30 और बालासोर का पुराना कोठी-स्थल भारत के गवर्नर-जनरल, लॉर्ड हार्डिंग, जी.सी.बी., को सौंपना स्वीकार किया। इस सन्धि का अनुच्छेद 6 यह प्रावधान करता है कि “23 फ़रवरी, 1827 के राजकीय राजपत्र द्वारा श्रीरामपुर कॉलेज को दिए गए अधिकारों और विशेष छूटों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, वरन् वे उसी प्रकार लागू रहेंगे मानो वे ब्रिटिश सरकार के राजपत्र द्वारा प्राप्त किए गए हों, ब्रिटिश भारत के सामान्य कानून के अधीन रहते हुए।”31 आवश्यक शिक्षक-वर्ग को बनाए रखने और आवश्यक छात्रवृत्तियाँ स्थापित करने के लिए पर्याप्त स्थायी निधि के अभाव में, कॉलेज का विश्वविद्यालय के रूप में पूरा विकास कभी नहीं हो पाया। 1883 से इसका उपयोग बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी के बंगाल कार्यक्षेत्र के लिए प्रचारकों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करनेवाली संस्था के रूप में होता रहा है। इस बीच, केरी के राजनीतिज्ञ-सरीखे आदर्श की रूपरेखा खींचे जाने के बाद की इस सदी में, परमेश्वर के विधान के अधीन भारतीय जीवन की दशाओं में दो उल्लेखनीय विकास हुए हैं—(1) कन्याकुमारी अन्तरीप से पेशावर तक, भारत के शिक्षित देशी मसीही संख्या में, चरित्र में और प्रभाव में ऐसी तीव्रता से बढ़े हैं और बढ़ते जा रहे हैं, जिसे 1901 की जनगणना के सरकारी प्रतिवेदन ने अद्भुत घोषित किया है;

    (2) भारत की तीस करोड़ जनता को अर्ल ऑफ़ मिन्टो और उनके सलाहकारों की उदार स्वीकृति से, तथा वाइकाउंट मॉर्ले और पार्लियामेंट की अनुमति से, वस्तुतः एक संविधान प्राप्त हुआ है, जो सम्राट एडवर्ड VII. और परिषद्-सहित उनके वायसराय के कृपालु शासन के अधीन स्वशासन के अधिकारों के लिए उनकी योग्यता को मान्यता देता है। केवल मसीही धर्म, और अधिक सच्चे अर्थ में शिक्षित देशी मसीहियों का ख़मीर ही भारत की जनता को नैतिक और राजभक्त बनाएगा, और आनेवाली पीढ़ियों को भौतिक तथा राजनीतिक, दोनों प्रकार की एक स्वस्थ स्वतन्त्रता के लिए तैयार करेगा।

    जिन दिशाओं में ये विकास आगे बढ़े हैं उन पर ध्यान देते हुए, मिशनरी उद्यम के अगुवे अधिकाधिक आश्वस्त होते गए हैं कि केरी के आदर्श को साकार करने में बहुत अधिक देर हो चुकी है, और इसके परिणामस्वरूप भारतीय विचार के बड़े आन्दोलनों पर मसीही समुदाय के प्रभाव को हानि पहुँची है। विशेष रूप से, जबकि भली-भाँति सुसज्जित भारतीय प्रचारकों, सुसमाचार-प्रचारकों और अगुवों की आवश्यकता अब केरी के दिनों से भी कहीं अधिक तीव्र और तात्कालिक है, सब सोसाइटियों के सबसे अनुभवी मिशनरी भारतीय कलीसिया में धर्मविज्ञान की शिक्षा के वर्तमान स्तर से बिल्कुल भी सन्तुष्ट नहीं हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि अब समय आ गया है कि सेवकाई के प्रशिक्षण की सारी व्यवस्था का पुनर्गठन किया जाए, और भारत में मसीही धर्मविज्ञान के अध्ययन के लिए वह शैक्षिक मान्यता प्राप्त की जाए जो उसे पश्चिमी देशों में सदियों से मिलती रही है। चूँकि ब्रिटिश सरकार धार्मिक विषयों में तटस्थ रहने के लिए वचनबद्ध है, इसलिए वह किसी भी सरकारी विश्वविद्यालय में धर्मविज्ञान के संकायों की स्थापना को स्वीकृति नहीं दे सकती। इसी कारण भारत में कार्य कर रही सब प्रोटेस्टेंट मिशनरी सोसाइटियों का प्रतिनिधित्व करनेवाले दशवार्षिक मिशनरी सम्मेलन ने, दिसम्बर 1902 में मद्रास में एकत्र होकर, एक समिति नियुक्त की, कि वह “लंदन बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी की समिति के माध्यम से श्रीरामपुर कॉलेज की परिषद् के साथ परामर्श करे, यह पता लगाने के लिए कि क्या वे उस कॉलेज के राजपत्र की उपाधि प्रदान करने की शक्तियाँ भारत में कार्य कर रही विभिन्न प्रोटेस्टेंट मसीही कलीसियाओं और सोसाइटियों का प्रतिनिधित्व करनेवाली किसी सीनेट या संकाय को सौंपने के लिए तैयार हैं।”

    कॉलेज परिषद् ने (जिसके मास्टर मेरेडिथ टाउनसेंड, एस्क्वायर, और सचिव ऐल्फ़्रेड हेनरी बेन्स, एस्क्वायर, एफ़.आर.जी.एस., हैं) इस अनुरोध पर सावधानी से विचार किया है, और सर्वोच्च कानूनी राय द्वारा यह आश्वासन पाकर कि राजपत्र अब भी वैध है, यह निश्चय किया है कि दशवार्षिक सम्मेलन के सुझावों को कार्यान्वित करने के लिए वह अपनी शक्ति भर सब कुछ करेगी। फिर भी वे यह समझते हैं कि यदि राजपत्र की उपाधि प्रदान करने की शक्तियों का उपयोग करना है, तो स्वयं कॉलेज को एक शिक्षण-संस्था के रूप में कार्यकुशलता के उच्चतम स्तर तक उठाना होगा, और पर्याप्त स्थायी निधि के द्वारा उसके स्थायित्व की गारंटी देनी होगी।

    परिषद् ने अनुभव किया है कि इन दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति भारत में कार्य कर रही विभिन्न प्रोटेस्टेंट मसीही कलीसियाओं की शक्तियों के एक होने से ही सम्भव है। इसका परिणाम पुनर्गठन की एक बुद्धिमत्तापूर्ण और व्यापक योजना को अपनाना हुआ है, जिसके अधीन यह आशा की जाती है कि श्रीरामपुर विश्वविद्यालय-स्तर का एक महान अन्तर-सम्प्रदायी कॉलेज बन जाएगा, जो लंदन की बी.डी. के स्तर तक धर्मविज्ञान का प्रशिक्षण देगा, धर्मविज्ञान की अपनी उपाधियाँ प्रदान करेगा, और कला तथा विज्ञान का एक विभाग भी चलाएगा, जो कम से कम अभी के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध रहेगा। यह दावा उचित ही किया जाता है कि श्रीरामपुर में ऐसा मसीही विश्वविद्यालय भारतीय कलीसिया में धर्मविज्ञान की शिक्षा को एकरूप भी करेगा और उसके स्तर को ऊँचा भी उठाएगा, और मसीही विचार और जीवन की पूर्वी इमारत को परमेश्वर के वचन, यीशु मसीह की एकमात्र नींव पर खड़ा करने में सहायता करेगा।

    परिषद् ने जिस योजना को स्वीकृति दी है, उसमें आवश्यक प्राध्यापक-पदों और छात्रवृत्तियों के लिए स्थायी निधि की व्यवस्था का विचार है। कॉलेज के भवन में कक्षाओं के लिए पर्याप्त स्थान होगा, परन्तु अतिरिक्त भूमि प्राप्त करना, और शिक्षक-वर्ग के लिए घर तथा छात्रों के लिए छात्रावास बनाना आवश्यक होगा। कला और विज्ञान के एक प्रारम्भिक विभाग के साथ धर्मविज्ञान का एक सुसज्जित संकाय स्थापित करने के उद्देश्य से £250,000 की तात्कालिक स्थायी निधि का लक्ष्य रखा गया है। फिर भी परिषद् को यह आशा है कि उचित समय पर श्रीरामपुर में एक महान मसीही विश्वविद्यालय का केरी का उदात्त दर्शन, जो न केवल धर्मविज्ञान में बल्कि उपयोगी विद्या की सब शाखाओं में अपनी उपाधियाँ प्रदान करे, पश्चिम के किसी न किसी बड़े व्यापारी-धनकुबेर के हृदय को प्रबल रूप से छू सकेगा। अनुमान है कि इस बड़े पैमाने पर विश्वविद्यालय की इस साज-सज्जा और स्थायी निधि के लिए £2,000,000 की राशि आवश्यक होगी। बड़ी मिशनरी कलीसियाएँ और सोसाइटियाँ उस प्रस्ताव को, जिसे उनके अपने ही मिशनरियों ने आरम्भ किया है, अनुकूल दृष्टि से देखती हैं, कि वे केरी के अधिक निकट प्रतिनिधियों के साथ मिलकर उनके आदर्श को साकार करने और लागू करने में सहयोग करें, वह आदर्श जो भारत के मसीही बनते जाने के साथ-साथ अवश्य ही फैलेगा और बढ़ेगा।

    कॉलेज परिषद् के सदस्यों का मत है कि विलियम केरी द्वारा आरम्भ किए गए आधुनिक मिशनरी आन्दोलन के विश्वव्यापी प्रभाव को देखते हुए—एक ऐसा आन्दोलन जो स्वदेश की कलीसिया और गैर-मसीही जातियों, दोनों के लिए इतना लाभदायक रहा है—आधुनिक परोपकार पर श्रीरामपुर से बढ़कर ऐतिहासिक और आत्मिक दावा रखनेवाली कोई संस्था नहीं है; और उनका विश्वास है कि ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका, भारत और अन्य देशों में बहुत बड़ी संख्या में ऐसे पुरुष और स्त्रियाँ हैं जो इसे एक पवित्र सौभाग्य समझेंगे कि श्रीरामपुर कॉलेज की दीवारों पर केरी, मार्शमैन और वार्ड के नामों के साथ उसके दूसरे संस्थापकों के रूप में उनके नाम भी अंकित किए जाएँ।

    परिषद् कॉलेज को यथासम्भव व्यापकतम आधार पर पुनर्गठित करने के लिए अपनी शक्ति भर सब कुछ कर रही है, यह विश्वास करते हुए कि ऐसी प्रेरणादायक परम्पराओं और स्मृतियों से जुड़ी संस्था का उपयोग केवल एक सम्प्रदाय के हित में नहीं, वरन् भारत की सम्पूर्ण कलीसिया और राष्ट्र के हित में होना चाहिए। अब तक परिषद् ने, यद्यपि वह कानूनी रूप से पूर्णतः एक स्वतन्त्र निकाय है, बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी की समिति के साथ घनिष्ठतम सम्बन्ध में कार्य किया है। परन्तु अब कार्यक्षेत्र के बैपटिस्ट मिशनरियों और इंग्लैंड की समिति, दोनों की पूरी सहानुभूति के साथ, वह श्रीरामपुर कॉलेज के कार्य में सब इवैंजेलिकल मसीही निकायों के सहयोग को भी आमन्त्रित कर रही है। वह अन्य इवैंजेलिकल मिशनों के प्रतिनिधियों का कला और धर्मविज्ञान में कॉलेज के पूर्ण प्राध्यापकों के रूप में स्वागत करने को तैयार है, जो अपने-अपने सम्प्रदायों के छात्रों की विशेष देखरेख करेंगे, और उन्हें ऐसी पूरक शिक्षा देने के लिए स्वतन्त्र होंगे जो आवश्यक समझी जाए। सम्प्रदाय के भेदभाव के बिना सब प्राध्यापक कॉलेज के कार्यों के स्थानीय प्रबन्ध में समान रूप से भागी होंगे। राजपत्र के अनुसार अन्तिम अधिकार कॉलेज परिषद् के ही हाथों में रहना चाहिए, परन्तु सहयोग करनेवाले विभिन्न इवैंजेलिकल निकायों को परिषद् में उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए, परिषद् के वर्तमान सदस्यों ने, बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी की समिति की हार्दिक सहमति से, इस सुझाव को स्वीकार किया है कि परिषद् की सदस्य-संख्या बढ़ाने की शक्तियों के लिए भारतीय विधान-मण्डल से आवेदन किया जाए।

    कॉलेज परिषद् के अवैतनिक सचिव, ए. एच. बेन्स, एस्क्वायर, 19 फ़र्निवल स्ट्रीट, लंदन, ई.सी., अधिक जानकारी देने या कॉलेज की स्थायी निधि और साज-सज्जा के कोष के लिए दान प्राप्त करने में प्रसन्न होंगे।

    भारत में इस समय विद्यमान दशाओं को देखते हुए, यह अपील न केवल मसीही मिशनों के मित्रों के लिए, वरन् सामान्य रूप से सब परोपकारियों के लिए रुचिकर होनी चाहिए, क्योंकि केरी द्वारा निर्धारित व्यापक और उदार सिद्धान्तों पर चलाया जानेवाला एक मसीही विश्वविद्यालय, जो वर्तमान विश्वविद्यालयों का पूरक होगा परन्तु किसी भी प्रकार उनका विरोधी नहीं, भारत के युवाओं के राजनीतिक और सामाजिक आदर्शों में मसीह की आत्मा को व्याप्त करने का एक अत्यन्त प्रभावशाली साधन होगा। यह ऐसा विषय है जिससे न केवल मिशनरी का, वरन् राजनेता का, व्यापारी का, और किसी भी जाति या मत के भारत के सब सच्चे मित्रों का गहरा सम्बन्ध है।

    आयोना से लेकर कैंटरबरी तक, मसीही मिशनों के सारे रोमांचक इतिहास में, कलीसिया के साथ परमेश्वर के आत्मा के कार्य करने का इससे अधिक स्पष्ट उदाहरण कोई नहीं है, जितना केरी की बुलाहट और डेनमार्क के राजपत्र तथा ब्रिटिश सन्धि के अधीन श्रीरामपुर कॉलेज की स्थापना में दिखाई देता है, जिसने उसे पूर्ण शक्तियों से युक्त एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय बना दिया है जो भारत की सम्पूर्ण सुधारवादी (रिफ़ॉर्म्ड) कलीसिया को अपनी धर्मविज्ञान-व्यवस्था और मसीही जीवन को स्वयं विकसित करने में समर्थ बना सके।

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