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कॉलेज और मिशन की सारी निधियाँ छिन गईं—छह व्यापारिक घरानों का एक करोड़ साठ लाख पाउंड का दिवाला—केरी की सरकारी आय £1560 से घटकर £600 रह गई—इंग्लैंड में उनकी “विचार” और “अपील” का प्रकाशन—सत्तर वर्ष की आयु में उनकी स्फूर्ति—बंगला बाइबल का अन्तिम संशोधन—बंगला नये नियम का अन्तिम संस्करण—लॉर्ड विलियम बेंटिंक की सरकार के सुधारों पर केरी का आनन्द—दासों की मुक्ति पर उनका आनन्द—उनके कम आयु के समकालीनों द्वारा खींचा गया केरी का चित्र—उनके अन्तिम पत्र और मसीही जगत को उनका अन्तिम सन्देश—लेडी विलियम बेंटिंक और बिशप डैनियल विल्सन की भेंटें—मार्शमैन का स्नेह और बगीचे के विषय में उनका वचन—उनकी मृत्यु से एक पखवाड़ा पहले इंग्लैंड की डाक आनन्द का समाचार लाती है—उनका अन्तिम सब्त—उनकी मृत्यु—उनका दफ़न—अपने मसीही बने लोगों के बीच उनकी क़ब्र—उनकी वसीयत—उनकी निर्धनता और निःस्वार्थता पर भारतीय समाचार-पत्र—उनके चरित्र पर डॉ. मार्शमैन और मैक, क्रिस्टोफ़र एण्डरसन और बम्बई के जॉन विल्सन के विचार—मिशनों के संस्थापक के रूप में उनका आज भी बना हुआ प्रभाव—एक मनुष्य के रूप में केरी पर डॉ. कॉक्स और रॉबर्ट हॉल—सुसमाचारीय जागृति और उसके विदेशी मिशनों के पिता के विषय में स्कॉटलैंड का आकलन।
विलियम केरी के अन्तिम दिन उनके सबसे उत्तम दिन थे। उनका सूर्य दमकते विश्वास और धधकते आत्म-बलिदान के पूरे वैभव के साथ अस्त हुआ। न हैकलटन और मौल्टन की कंगाली में, न कलकत्ता और सुन्दरबन की कठिनाइयों में, न दिनापुर के दलदलों के ज्वरों में, न सरकारी असहिष्णुता द्वारा दो बार उत्पन्न की गई आशंकाओं में, और न सबसे कड़वे दुःख में—अर्थात् फ़ुलर की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ भाइयों द्वारा सोलह वर्ष तक किए गए सताव में—आधुनिक मिशनों के पिता की ऐसी परीक्षा हुई थी जैसी 1830-1833 के वर्षों में हुई। एक के बाद एक आघात आते गए, परन्तु केवल इसलिए कि उनके भरोसे, उनकी दीनता और उनके प्रेम का चोखा सोना और भी शुद्ध दिखाई दे।
श्रीरामपुर कॉलेज और मिशन ने भारत में अपनी सारी निधियाँ खो दीं। जिस आर्थिक उथल-पुथल ने पाँच वर्ष पहले यूरोप में बहुत-से घरानों को धराशायी कर दिया था, उसका प्रभाव 1830 तक कलकत्ता के धनी व्यापारियों पर पड़ने लगा। वे छह व्यापारिक घराने, जिन्होंने कम्पनी के एकाधिकारों की अनुमति की सीमा तक उत्तर भारत के व्यापार को बढ़ाया था, जो स्वयं सरकार के, हैदराबाद जैसी रियासतों के, और सब असैनिक और सैनिक अधिकारियों के साहूकार रहे थे, और जिन्होंने आधी शताब्दी तक एक के बाद एक साझेदारों को धनवान बनाया था, एक-एक करके गिर पड़े—सब मिलाकर एक करोड़ साठ लाख पाउंड स्टर्लिंग के घाटे में गिरे। इनमें सबसे बड़ा पामर एण्ड कम्पनी था; इस घराने ने एक समय भारत के इतिहास में, और पार्लियामेंट की बहसों और काग़ज़ात में बड़ी भूमिका निभाई थी। श्रीरामपुर के लोगों के निजी मित्र श्री जॉन पामर ने चार वर्ष पहले, जब सोसाइटी की ग़लतबयानी अपना सबसे बुरा प्रभाव डाल चुकी थी, उन्हें दस प्रतिशत ब्याज पर रुपया उधार दिया था। यूरेशियन स्कूलों के बच्चे, जिन्हें डॉ. और श्रीमती मार्शमैन मिशन के लिए इतने लाभ के साथ चलाते थे, मुख्यतः इसी घराने में जमा की गई निधियों पर निर्भर थे। यह घराना अचानक बीस लाख पाउंड स्टर्लिंग से अधिक के घाटे में डूब गया। यद्यपि इस विपत्ति ने ऋण की उस व्यवस्था का खोखलापन प्रकट कर दिया जिस पर उस समय स्वतंत्र समाचार-पत्रों और समझदार लोकमत के अभाव में व्यापार और साहूकारी चलाई जाती थी, तौभी घबराहट शीघ्र ही शान्त हो गई, और दूसरे घरानों के पास और भी अधिक कारोबार आ गया। परन्तु 1833 का वर्ष आरम्भ ही हुआ था कि पहले अलेक्ज़ेंडर एण्ड कम्पनी का घराना, फिर मैकिन्टॉश एण्ड कम्पनी का, और फिर शेष तीनों बिना किसी चेतावनी के ढह गए। भारत में रहनेवाले अंग्रेज़, अधिकारी और व्यापारी, सब के सब निर्धन हो गए। पूँजी लुप्त हो गई और साख ठीक उसी समय समाप्त हो गई जब पार्लियामेंट 1813 के चार्टर द्वारा दी गई व्यापार की आंशिक स्वतंत्रता को पूरा करने ही वाली थी, अर्थात् वह सब कुछ प्रदान करनेवाली थी जिसके पक्ष में केरी ने तर्क दिए थे, और यूरोपीय लोगों को भूमि रखने की अनुमति देनेवाली थी।
जेस्सोर और दिल्ली के लिए लगाई गई निधियाँ; केरी के पहले मसीही बने व्यक्ति और मिशनरी फ़र्नान्डेज़ की विरासत; उनका अपना दशमांश, जिससे वे इंग्लैंड में अपने तीन वृद्ध सम्बन्धियों का भरण-पोषण करते थे; उनके तीसरे विवाह की संगिनी की सम्पत्ति, जिसके नाम वह धन किया गया था और जो उनके बाद एक वर्ष तक जीवित रहीं; डॉ. मार्शमैन के पास जो थोड़ा-सा था, जिन्होंने इंग्लैंड में सोसाइटी के लिए काम करते समय भी अपना सारा ख़र्च स्वयं उठाया था—सब कुछ बह गया। कॉलेज और मिशन के ख़र्च को पूरा करने के लिए हाथ में जो थोड़ी-सी शेष राशि थी, वह तो गई ही, परन्तु थोड़े समय के लिए भी उधार लेना असम्भव हो गया। फिर डॉ. केरी के पुराने असैनिक विद्यार्थियों में से एक सहायता के लिए आगे आया। श्री गैरेट ने, जो सबसे पहले सण्डे स्कूल आरम्भ करनेवाले रॉबर्ट रेक्स के पोते थे, बैंक ऑफ़ बंगाल में अपनी निजी साख तब तक के लिए गिरवी रख दी जब तक कि लिवरपूल के सैमुएल होप से, जो वहाँ श्रीरामपुर मिशन के कोषाध्यक्ष थे, सम्पर्क न हो सके। इस बीच किसी भी मिशन-केन्द्र को छोड़ देने या कॉलेज को बन्द कर देने के प्रश्न को एक बार भी स्वीकार नहीं किया गया। लीचमैन ने लिखा, “ऐसी विपत्ति के विचार मात्र से मैंने आदरणीय डॉ. केरी के चेहरे पर आँसू बहते देखे हैं; यदि वह आ पड़ती तो हमें शीघ्र ही उन्हें क़ब्र में लिटाना पड़ता।” जब इंग्लैंड से फैलाई गई इस द्वेषपूर्ण बात के कारण कि डॉ. मार्शमैन उस धन को अपने परिवार की समृद्धि बढ़ाने के कामों में लगा सकते हैं, वार्ड द्वारा अमरीका में इकट्ठी की गई निधियों का ब्याज कुछ समय के लिए बन्द हो गया, तब केरी ने ऐसे ही आरोप के समय पौलुस के समान आत्मा में उत्तर दिया: “डॉ. मार्शमैन उतने ही निर्धन हैं जितना मैं हूँ, और मैं यूरोप में अपने तीन या चार निर्धन सम्बन्धियों की सहायता के लिए हर महीने मुश्किल से ही कुछ राशि बचा पाता हूँ। मेरे पास बड़ी सम्पत्ति हो सकती थी, परन्तु जो कुछ मैंने खाया, पिया और पहना, उसे छोड़ मैंने अपना सर्वस्व मिशनों के कार्य को दे दिया है, और डॉ. मार्शमैन ने भी ऐसा ही किया है, और श्री वार्ड ने भी ऐसा ही किया।”
मिशन के लिए और अपने लिए परमेश्वर पर केरी के भरोसे की अभी और भी परीक्षा होनी थी। 12 जुलाई 1828 को हम उन्हें कलकत्ता से जेबेज़ को यों लिखते पाते हैं:--“मैं आज सवेरे लॉर्ड डब्ल्यू. बेंटिंक के पहले दरबार में उपस्थित होने आया। उसमें बहुत लोग आए थे, और मुझे वहाँ बहुत-से ऐसे सज्जनों को देखने का आनन्द मिला जो पहले मेरे अधीन पढ़ चुके थे, और जिनके प्रति मेरे मन में बड़ा सच्चा आदर था। मैंने सुना है कि लेडी बेंटिंक एक भक्त स्त्री हैं, परन्तु मैंने अभी तक उन्हें देखा नहीं है। आज सन्ध्या को उनकी बैठक में उपस्थित होने के लिए मेरे पास निमंत्रण-पत्र है, परन्तु मैं नहीं जाऊँगा, क्योंकि सब्त के लिए, जो कल है, मुझे घर पर होना ही है।” शीघ्र ही लॉर्ड विलियम बेंटिंक को अपने दुर्बल पूर्वाधिकारी के शासन के आर्थिक परिणामों का सामना करना पड़ा। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज की बलि देनी पड़ी। मेटकाफ़ और बेली, केरी के पुराने विद्यार्थी जिन्हें उन्होंने उच्चतर जीवन की ओर स्थायी रूप से प्रभावित किया था, कौंसिल के सदस्य थे, और उन्होंने उनसे अपील की। उन्होंने उन्हें भले गवर्नर-जनरल के पास भेजा, जिनकी सहानुभूति के सामने उन्होंने मिशन के आर्थिक मामलों का सारा अतीत और वर्तमान खोलकर रख दिया। उनसे कहा गया कि वे कोई भय न करें, और वास्तव में कौंसिल ने केवल इसी एक विषय पर लम्बी बैठक की। परन्तु जून 1830 से कॉलेज शिक्षा देनेवाली संस्था न रहकर परीक्षा लेनेवाली संस्था बन गया। जब वेतन 1000 रुपये मासिक से घटाकर आधा कर दिया गया, तब भाईचारा प्रकाश और बल के लिए प्रार्थना करने को इकट्ठा हुआ। जावा के मिशनरी श्री रॉबिन्सन ने, जो श्रीरामपुर से जुड़ गए थे, और जिनके पुत्र ने बहुत समय तक बंगला विद्वान और प्रचारक के रूप में अच्छी सेवा की, उस समय के उसके भीतरी जीवन की यह झलक हमें दी है:-- “प्रार्थना करते समय दोनों बूढ़े आँसुओं में डूब गए, और विशेषकर डॉ. मार्शमैन अपनी भावनाओं को शब्द न दे सके। मिशन के पिता इन भले बूढ़ों को आँसुओं के साथ यह विनती करते देखना सचमुच हृदय को छूनेवाला था कि अब जब उनके बाल पक गए हैं, तो परमेश्वर उन्हें न त्यागे, बल्कि निन्दा करनेवाली जीभ को चुप कराए, और अपने ही कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें साधन प्रदान करे।”
उन्होंने इंग्लैंड को एक अपील भेजी, और केरी ने स्वयं वह प्रकाशित किया जो इस अप्रिय विषय पर उनके सब कथनों में सम्भवतः सबसे उदार, न्यायपूर्ण और वज़नदार है—बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी और श्रीरामपुर मिशनों के अलगाव से उठे विवादों पर विचार। “अपनी आयु और अन्य परिस्थितियों के कारण हमारे अंशदान शीघ्र ही बन्द हो सकते हैं। हमने भारत में एक बड़ा कार्य होते देखा है, और उसका बहुत-सा भाग, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, स्वयं हमारे द्वारा किया गया है। मैं इस कार्य के स्थायित्व के विषय में उदासीन नहीं रह सकता, और मुझे उदासीन रहना भी नहीं चाहिए; और इसलिए हमारे साधनों के पंगु हो जाने की सम्भावना पर जो उल्लास प्रकट किया गया है, उसे मैं इसके सिवा और किसी रूप में नहीं देख सकता कि वह ऐसे शैतानी स्वभाव का है कि कोई भी मनुष्य जिसके हृदय में परमेश्वर का प्रेम है, उस पर बहुत समय तक अड़ा नहीं रह सकता।”
मिशन-केन्द्र के लिए “प्रति वर्ष कुछ सौ पाउंड” के लिए सब मसीहियों से की गई अपील इन शब्दों के साथ समाप्त हुई: “प्रोटेस्टेंट जगत को मिशनरी प्रयास के लिए जागे हुए अभी कुछ ही वर्ष बीते हैं। तब से इस उद्देश्य के लिए इकट्ठा किया जानेवाला वार्षिक राजस्व बढ़कर £400,000 की ऐसी राशि हो गया है जिसकी उस समय कल्पना भी नहीं की गई थी। और क्या यह आशा करना अनुचित है कि इसका कोई नगण्य-सा भाग उसे सौंपा जाए जो इस उद्यम को आरम्भ करनेवालों में सबसे पहले लोगों में से था, और उसके सहकर्मियों को?” भाईचारे ने इस वाक्य के साथ कि “हमारी वर्तमान आय भी अनिश्चित है,” यह अपील इंग्लैंड भेजी ही थी कि आर्थिक कटौती की कैंची ने सरकार के बंगला अनुवादक के रूप में डॉ. केरी का पद काट दिया, जिससे आठ वर्ष से उन्हें 300 रुपये मासिक मिलते थे। परन्तु उनका विश्वास ऐसा था कि इस अन्तिम आघात से उनके मुँह से केवल इतना खेद निकला कि अब उन्हें मिशन के कार्य के लिए अपने अंशदान में उतनी ही कमी करनी पड़ेगी। वे अपने सहकर्मियों के लिए एक आश्चर्य थे, जिन्होंने उनके विषय में लिखा:
“यद्यपि उनकी परिस्थिति इस प्रकार घट गई है, तौभी यह भला मनुष्य, जो अपने सत्तरवें वर्ष में प्रवेश करने ही वाला है, दिन भर प्रसन्न और आनन्दित रहता है। वह हर सवेरे चार या पाँच मील घोड़े पर सैर करने जाता है और सूर्योदय तक घर लौट आता है; दिन-प्रतिदिन अनुवाद का कार्य करता रहता है; कॉलेज में हर सप्ताह धर्मविज्ञान पर दो और प्राकृतिक इतिहास पर एक व्याख्यान देता है; और बंगला तथा अंग्रेज़ी दोनों में अपनी बारी पर प्रचार करता है।”
जब मसीही जनता ने उनकी अपील का हृदय से उत्तर दिया, तो केरी ने ऊँचे स्वर से और बार-बार परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की, जिसने “हमारी बड़ी विपत्ति के समय प्रकट होकर अपने लोगों को उभारा कि वे इस प्रकार स्वेच्छा से अपने कार्य के लिए अपना धन अर्पण करें।” “जहाँ तक मेरी बात है, मैं समझता हूँ कि मेरी दौड़ लगभग पूरी हो चुकी है। हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं, और मैं अब उस आयु से केवल तीन महीने कम हूँ, और पित्त के बार-बार होनेवाले आक्रमणों ने मेरे शरीर को दुर्बल कर दिया है। परन्तु मैं मृत्यु की ओर किसी दुःखदायी आशंका के साथ नहीं देखता। मैं अपने आप को उस प्रायश्चित पर डाल देता हूँ और उसी के प्रभाव की दुहाई देता हूँ, जो आवश्यकता के समय मुझे निराश न करेगा।”
डॉ. मार्शमैन उनका एक और भी उज्ज्वल चित्र हमें देते हैं। “इंग्लैंड में मुझे अपने सत्तरवें वर्ष में ऐसे बहुत ही थोड़े मित्र मिले जो इतने फुर्तीले, बुढ़ापे की दुर्बलताओं से इतने मुक्त, मंच पर इतने रोचक, और बातचीत में इतने पूर्ण रूप से कुशल हों जितने वे अब हैं।” इसका कारण इस बात में मिलता है कि वे अब भी उपयोगी थे, अब भी उस कार्य में व्यस्त थे जिससे वे सबसे अधिक प्रेम करते थे। उन्होंने जून 1832 में बंगला में सम्पूर्ण बाइबल का अपना अन्तिम संशोधन पूरा किया—पुराने नियम का पाँचवाँ संस्करण और नये नियम का आठवाँ। इसके तुरन्त बाद, जब वे श्रीरामपुर की कलीसिया पर डॉ. मार्शमैन और अपने साथ सह-पास्टर के रूप में श्री मैक के अभिषेक की अध्यक्षता कर रहे थे, तब वे जिल्दसाज़ के हाथों से निकली उस पवित्र ग्रन्थ की पहली प्रति अपने साथ मंच पर ले गए, और शमौन के इन शब्दों से मसीही बने लोगों और उनके बच्चों को सम्बोधित किया—“हे प्रभु, अब तू अपने दास को शान्ति से विदा करता है, क्योंकि मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है।” जैसे-जैसे महीने बीतते गए, उन्होंने नये नियम का एक और सुधरा हुआ संस्करण छापेखाने से पूरा करवाया, और तभी उन्होंने अनुभव किया और प्रायः कहा कि उनके हृदय का कार्य पूरा हो गया है।
जब वे वचन पर मनन करते हुए लेटे रहते, और कॉलेज के प्रति और उन मिशन-केन्द्रों के प्रति परमेश्वर की भलाई के लिए उसकी स्तुति करते जिनकी संख्या युवा सर हेनरी हैवलॉक के द्वारा, जिन्होंने आगरा में कलीसिया की स्थापना की, बढ़कर उन्नीस हो गई थी, तब उनके पास पवित्र आनन्द के और भी स्रोत थे। लॉर्ड विलियम बेंटिंक, जिन्होंने अपने शासन का आरम्भ सती के अपराध के उन्मूलन से किया था, केरी के पुराने विद्यार्थियों की सहायता से उन अन्य सुधारों को भी दृढ़ता से लागू कर रहे थे जिनके लिए इस मिशनरी ने अपने सारे भारतीय जीवन में प्रार्थना की थी, प्रचार किया था और लेख प्रकाशित किए थे। न्याय-सेवा का पुनर्गठन इस प्रकार किया गया कि उसमें देशी न्यायाधीश भी सम्मिलित हों। अनुबन्ध-रहित असैनिक सेवा हर मत के सब ब्रिटिश प्रजाजनों के लिए खोल दी गई। इस प्रकार देशी मसीहियों के प्रति न्याय का पहला कार्य किया गया, जिससे उन्होंने कॉलेज के विषय में लिखा:--“विद्यार्थी अब भारत में हर उस क़ानूनी पद के योग्य हैं जिसे कोई देशी व्यक्ति धारण कर सकता है; उनमें से जिनके मन में मसीही सेवकाई के प्रति कोई प्रेम न हो, उनके सामने न्यायालयों में वकीलों के रूप में एक लाभदायक पेशे की सम्भावना है, और अपनी जन्मभूमि में सम्मानित प्रतिष्ठा के पदों तक उठने की आशा है।” उत्तराधिकार के हिन्दू क़ानून को, जिसे पार्लियामेंट के रेग्युलेटिंग एक्ट ने इस प्रकार संरक्षित कर रखा था कि उसका उपयोग मसीही बने लोगों को सब नागरिक अधिकारों से वंचित करने के लिए किया जाता था, उस सीमा तक सुधारा गया जहाँ तक कोई स्थानीय विनियम ऐसा कर सकता था; और केरी ने, हैरिंगटन जैसे अधिकारी विद्वान की सलाह पाकर, प्रेरिताई में अपने उत्तराधिकारी, युवा अलेक्ज़ेंडर डफ़ पर यह दायित्व डाला कि वह न्याय के इस कार्य को पूर्ण रूप से पूरा करवाए, और यह मार्क्विस ऑफ़ डलहौज़ी के अधीन पूरा हुआ। चार्ल्स ग्रांट के पुत्रों द्वारा तैयार किए गए आदेशों ने अन्ततः फ़रवरी 1833 में ग्रेट ब्रिटेन को मन्दिरों और मस्जिदों की जागीरों और तीर्थयात्री-कर के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी के सम्बन्ध के उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया।
उनकी मृत्यु के दो वर्ष बाद उनके पुत्र जोनाथन ने उनके विषय में यह लिखा:--
“सिद्धान्त के मामले में मेरे पिता दृढ़ और अटल थे, और अपने विचारों को स्वीकार करने और उन पर डटे रहने से कभी पीछे नहीं हटते थे। शपथ लेने के विरुद्ध उन्हें विवेक की आपत्ति थी; और जिस ढंग से शपथ दिलाई जाती थी, उसकी वे कड़ी निन्दा करते थे, और इस बात पर ज़ोर देते थे कि उचित यही है कि शपथ को पूरी तरह हटा दिया जाए। मुझे तीन ऐसे अवसर याद हैं जिनमें उन्होंने शपथों के सम्बन्ध में ऐसा उल्लेखनीय भाग लिया जो उनके स्वभाव के अनुरूप था। एक बार, जब फ़ोर्ट विलियम कॉलेज का एक प्रतिष्ठित हिन्दू सेवक, जो डॉ. केरी के विभाग से जुड़ा था, एक दिन भोर को गंगा में स्नान करने जा रहा था, तो उसने सड़क के पास एक लाश पड़ी देखी; परन्तु अँधेरा होने और वहाँ किसी के न होने के कारण वह उस बात पर और ध्यान दिए बिना आगे बढ़ गया। सूर्योदय के बाद जब वह गंगा से लौटा, तो उसने लाश के पास भीड़ देखी, और तब संयोग से वहाँ उपस्थित चौकीदारों में से एक से कह बैठा कि सवेरे उसने लाश को सड़क के दूसरी ओर देखा था। चौकीदार ने उसे कोरोनर के सामने गवाह के रूप में हिरासत में ले लिया; परन्तु जब उसे कोरोनर के सामने लाया गया, तो उसने शपथ लेने से इनकार कर दिया, और परिणामस्वरूप अवमानना के लिए उसे जेल भेज दिया गया। वह हिन्दू एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था और उसने कभी शपथ नहीं ली थी, इसलिए उसने जेल में कुछ भी खाने-पीने से इनकार कर दिया। इसी दशा में वह डेढ़ दिन तक रहा, उस समय मेरे पिता श्रीरामपुर में थे; परन्तु उनके कलकत्ता आने पर उन्हें यह घटना बताई गई। उस मनुष्य का शपथ लेने से इनकार करना ही इस बात के लिए पर्याप्त था कि वे उसकी ओर से प्रयत्न करें। उस मनुष्य के इस संकल्प से वे बहुत प्रसन्न हुए—कि शपथ लेने के बदले वह जेल जाना अधिक पसन्द करता है; और उन्होंने ठान लिया कि उसकी रिहाई करवाने के लिए जो कुछ वे कर सकते हैं, करेंगे। पहले वे कोरोनर के पास गए, परन्तु उसने उन्हें शेरिफ़ के पास भेज दिया। वे उस अधिकारी के पास गए, परन्तु उसने उन्हें बताया कि वह इस विषय में कोई आदेश नहीं दे सकता। तब वे उस समय के मुख्य न्यायाधीश से मिले, जिनके हस्तक्षेप से वह मनुष्य छोड़ दिया गया।
“दूसरा अवसर उनसे व्यक्तिगत रूप से सम्बन्धित है। उनके अन्तिम विवाह के अवसर पर, वह दिन निश्चित किया गया जिस दिन विवाह-संस्कार होना था—मित्रों को निमंत्रित किया गया—और सब आवश्यक प्रबन्ध किए गए; परन्तु निश्चित दिन से तीन या चार दिन पहले उन्हें बताया गया कि उन्हें एक अनुज्ञापत्र लेना आवश्यक होगा, और उसके लिए उन्हें या तो शपथ लेनी होगी या विवाह की घोषणा प्रकाशित करवानी होगी। शपथ लेने पर उन्होंने तुरन्त आपत्ति की, और उस समय के वरिष्ठ न्यायाधीश के पास गए, जिन्होंने उन्हें बताया कि क्योंकि वे क्वेकर नहीं हैं, इसलिए उनकी शपथ अनिवार्य है; परन्तु शपथ लेने के बदले उन्होंने विवाह की घोषणा प्रकाशित करवाने के लिए आवेदन किया, और अपने विवाह के प्रबन्ध को तीन सप्ताह और आगे बढ़ा दिया।
“तीसरा अवसर इस प्रकार था:--एक विशेष मामले में न्यायालय में एक वसीयत को प्रमाणित करना आवश्यक था, जिसमें श्रीरामपुर के मिशनरियों के साथ निष्पादकों के रूप में डॉ. केरी का नाम उल्लिखित था। उनके सहकर्मियों में से एक ने आवेदन किया, जिसे न्यायालय ने ‘श्रीरामपुर के मिशनरी’ शब्दों की अस्पष्टता के कारण अस्वीकार कर दिया; परन्तु क्योंकि डॉ. केरी का नाम विशेष रूप से उल्लिखित था, इसलिए न्यायालय ने संकेत दिया कि यदि आवेदन उनके द्वारा किया जाए तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। यह सूचना उन्हें दी गई; परन्तु जब उन्हें बताया गया कि शपथ आवश्यक है, तो वे इस विचार से ही घृणा के साथ पीछे हट गए; परन्तु बहुत समझाने-बुझाने के बाद वे इस शर्त पर आवेदन करने को राज़ी हुए कि उन्हें शपथ लेने से छूट दी जाए। वे उपस्थित हुए, और उन्होंने उस समय के मुख्य न्यायाधीश के सामने अपनी आपत्तियाँ रखीं, जो स्वीकार कर ली गईं, और न्यायालय ने उनकी सत्यनिष्ठ प्रतिज्ञा को ग्रहण करके लेखबद्ध कर लिया।
“फ़ोर्ट विलियम कॉलेज से सम्बन्धित कर्तव्यों ने उन्हें दृश्य-परिवर्तन का अवसर दिया, जिससे उनके मन को विश्राम मिलता था, और उन्हें व्यायाम करने के अवसर मिलते थे, और इससे उनके स्वास्थ्य को बहुत लाभ पहुँचा। जितने वर्ष वे कॉलेज में प्रोफ़ेसर के पद पर रहे, कोई भी बात उन्हें अपनी उपस्थिति में चूक करने को विवश न कर सकी; और यद्यपि बेसमय नदी पार करते हुए उन्हें तूफ़ानी मौसम का सामना करना पड़ता था, तौभी वे समय पर उपस्थित होते थे, और उन्होंने कभी छुट्टी के लिए आवेदन नहीं किया। और जब सेवा के नियमों के अनुसार वे अच्छी पेंशन लेकर अवकाश ग्रहण करने के योग्य हो गए, तब भी उन्होंने कॉलेज के हितों को बढ़ाने में सक्रिय रूप से लगे रहना ही पसन्द किया, और जब तक सरकार ने उनका विभाग समाप्त न कर दिया, तब तक वे परिश्रम से अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे। कॉलेज के काम के लिए कलकत्ता में उनकी उपस्थिति आवश्यक होने के कारण वे आने-जाने के ऐसे अभ्यस्त हो गए थे कि उस आयु में, जब उनका पद समाप्त हो गया, तो उन पर थोपे गए उस एकान्त को उन्होंने बड़ी पीड़ा के साथ अनुभव किया। इस घटना के बाद उनका स्वास्थ्य तेज़ी से गिरने लगा; और यद्यपि वे कभी-कभी कलकत्ता जाते थे, तौभी वे अत्यधिक दुर्बलता की शिकायत करते थे। यह दुर्बलता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई, और उन्हें निरन्तर कष्ट देती रही; यहाँ तक कि अन्त में वे अपने घर से बाहर निकलने योग्य न रहे।”
और यह केवल भारत में ही नहीं था कि इस आदरणीय संत को सन्तोष के ऐसे कारण मिले। वे इतने दिन जीवित रहे कि अंग्रेज़ जाति द्वारा दासों की मुक्ति के लिए परमेश्वर का धन्यवाद कर सके, जिसके लिए वे पचास वर्ष से प्रतिदिन प्रार्थना करते आए थे।
अंग्रेज़ी मिशनों के पिता के उनके बाद के वर्षों के हमारे पास ऐसे युवा समकालीनों द्वारा खींचे गए बहुत-से चित्र हैं, जिन्होंने बंगाल में पहली बार पहुँचने पर उन्हें ढूँढ़ निकाला। 1824 में एडिनबरा के एक विद्यार्थी श्री लेस्ली ने, जो भारत में बैपटिस्ट प्रचारकों में अग्रणी बने, और हेनरी हैवलॉक के मन-परिवर्तन का साधन बने, जिन्होंने डॉ. मार्शमैन की सबसे छोटी बेटी से विवाह किया, केरी के भारतीय जीवन की तीसरी बड़ी बीमारी के बाद उनके विषय में यों लिखा:--
“डॉ. केरी, जो बहुत बीमार रहे थे, पूरी तरह स्वस्थ हो गए हैं, और ऐसा लगता है कि वे बहुत वर्ष जीवित रहेंगे; और डॉ. मार्शमैन की बात करें तो भारत में अपने निवास की पूरी अवधि में उन्होंने कभी अस्वस्थता जानी ही नहीं। दोनों इतने सक्रिय हैं कि आप सोचेंगे कि ऐसे देश में यह असम्भव है। डॉ. केरी बड़े शान्त-स्वभाव और प्रसन्नचित्त बूढ़े हैं, उनका चेहरा उस नक़्क़ाशीदार चित्र से बहुत मिलता है जिसमें वे अपने पण्डित के साथ हैं, यद्यपि वे उतने हृष्ट-पुष्ट नहीं हैं जितने वहाँ दिखाई देते हैं। अपने अनुवादों के बाद वनस्पति-विज्ञान उनका मुख्य अध्ययन है। उन्होंने अपने बगीचे में हर वह पौधा और पेड़ इकट्ठा किया है जो भारत में किसी प्रकार उग सकता है, और साथ ही वे इतने वैज्ञानिक हैं कि हर वस्तु को उसके शास्त्रीय नाम से पुकारते हैं। इसलिए यदि मैं कभी भूल से जेरेनियम शब्द बोल बैठूँ, तो वे कहेंगे पेलार्गोनियम, और शायद मुझ पर अज्ञानता का दोष लगाएँगे, या मुझे गँवारपन के लिए दोषी ठहराएँगे। हमें उन्हें रोमियों 7:13 से प्रचार करते सुनने का आनन्द मिला, जब उन्होंने हमें एक उत्तम उपदेश दिया। उनकी शैली बहुत सजीव है, और उनकी भाषा बहुत क्रमबद्ध। वास्तव में वे अपने हर काम में क्रम को ले आते हैं; वर्गीकरण उनका सबसे बड़ा शौक़ है, और जहाँ कहीं किसी वस्तु का वर्गीकरण किया जा सकता है, वहाँ आप डॉ. केरी को पाएँगे; वे केवल पौधों की जड़ों और शब्दों के मूलों का ही वर्गीकरण और क्रम-विन्यास नहीं करते, बल्कि उनके निवास-स्थान पर जाइए तो आप पाएँगे कि उन्होंने खनिजों, पत्थरों, सीपियों आदि से भरी अलमारियाँ सजाकर उनका वर्गीकरण कर रखा है, और पक्षियों से भरे पिंजरे भी रखे हैं। उनसे मिलना बहुत सरल है, और वे बड़ी आत्मीयता से मिलते हैं। उनका लगाव गहरा होता है, और केवल व्यक्तियों से ही नहीं बल्कि स्थानों से भी होता है। लगभग एक वर्ष पहले, जिस घर में वे श्रीरामपुर आने के समय से रहते आए थे, उसका इतना भाग गिर पड़ा कि उन्हें उसे छोड़ना पड़ा, जिस पर वे फूट-फूटकर रोए। एक सवेरे नाश्ते के समय वे हमें स्वर्गीय श्रेष्ठ जॉन थॉर्नटन की उदारता का एक प्रसंग सुना रहे थे, और उनके स्मरण पर उनकी आँख में बड़ा आँसू भर आया। यद्यपि उस आदरणीय पुरुष को रोते देखना हृदय को छूनेवाला दृश्य है; तौभी यह ऐसा दृश्य है जो आपके मन को बहुत आकर्षित करता है, क्योंकि उनके आँसुओं में एक पौरुष है—कुछ ऐसा जो किसी बच्चे के रोने से बहुत भिन्न है।”
जिस घर में वे अपने अन्तिम दस वर्ष रहे, और जहाँ उनकी मृत्यु हुई, वह कॉलेज के नये प्रोफ़ेसरों के लिए योजित दो या तीन घरों में से अकेला था जो पूरा बना। पास के कॉलेज की तुलना में वह ऐसी कठोर सादगी से बनाया गया था कि कहा जाता था कि उसकी रूपरेखा मनुष्यों के लिए नहीं बल्कि स्वर्गदूतों के लिए बनाई गई थी। केरी का कमरा और पुस्तकालय नदी की ओर था, और बीच में कॉलेज के बगीचे का पूरा विस्तार था। दूसरी ओर, ऊपरी बरामदे में, वे सवेरे लगभग अन्त तक अपनी मेज़ पर काम करते रहे, और सन्ध्या को सूर्यास्त की ओर अपने अतिथियों से बातचीत करते थे। 1826 में लंदन मिशनरी सोसाइटी ने अपने प्रतिनिधि-मण्डलों में से पहला कलकत्ता भेजा। डॉ. केरी ने उनके लिए अपनी नाव भेजी, और अपने पति के इंग्लैंड में होने के कारण श्रीमती मार्शमैन ने अतिथियों का सत्कार किया। उन्होंने लिखा:--
“हमने डॉ. केरी को उनके अध्ययन-कक्ष में पाया, और उनके सरल, और हम कह सकते हैं कि प्रेरितों जैसे, रूप को देखकर हम प्रसन्न भी हुए और प्रभावित भी। वे कद में छोटे हैं, उनके बाल सफ़ेद हैं, और उनका मुख नक़्श और भाव दोनों में समान रूप से सौम्य और परोपकारी है। दो हिन्दू पुरुष पास बैठे प्राकृतिक इतिहास के कुछ छोटे विषयों के चित्र बना रहे थे; डॉक्टर के पास, जो अपने अधिक विद्वत्तापूर्ण कार्यों से अलग भी शुद्ध रुचि और अत्यन्त बौद्धिक भावना के व्यक्ति हैं, इन विषयों का नमूनों और चित्रों दोनों में एक उत्तम संग्रह है। वनस्पति-विज्ञान उनका प्रिय अध्ययन है, और उनका बगीचा दुर्लभ वस्तुओं से अनोखे ढंग से समृद्ध है।”
केरी से मिलने के लिए की गई सब भेंटों में से कोई भी भारत की कलीसिया के इतिहासकार के लिए अब उतनी रोचक नहीं है जितनी उस युवक की भेंटें, जो उनका उत्तराधिकारी हुआ, जैसे वे स्वयं श्वार्ट्ज़ के उत्तराधिकारी हुए थे। अलेक्ज़ेंडर डफ़ चौबीस वर्ष के थे जब, 1830 में, उन सब मिशनरियों के अनुभव के विरुद्ध, जिनसे उन्होंने परामर्श किया था, अपनी योजनाओं को पूरा करने के विषय में दुविधा से भरे हुए, उन्हें केवल केरी से ही यह अत्यन्त उत्साहपूर्ण प्रोत्साहन मिला कि वे कलकत्ता में मसीही कॉलेज की उस नीति का अनुसरण करें जो श्रीरामपुर की कम केन्द्रीय बस्ती में इतने अच्छे ढंग से आरम्भ हुई थी। हमने अन्यत्र32 यह कहानी सुनाई है:--
“जुलाई के एक उमस भरे दिन कॉलेज के घाट पर उतरकर, वह अब भी लाल गालोंवाला पहाड़ी स्कॉट लम्बे डग भरता हुआ सीढ़ियों की उस पंक्ति तक पहुँचा जो एशिया के सबसे सुन्दर आधुनिक भवन तक ले जाती है। बाईं ओर मुड़कर, उसने उस घर में—‘स्वर्गदूतों के लिए बनाया गया,’ किसी ने कहा था, इतना सादा है वह—केरी का अध्ययन-कक्ष ढूँढ़ा, जहाँ मिशनरी विद्वानों में सबसे महान अब भी भारत के लिए काम कर रहा था। वहाँ उसने देखा कि सफ़ेद जैकेट पहने एक छोटा-सा पीला-सा बूढ़ा दिखाई देनेवाला व्यक्ति लड़खड़ाता हुआ उस आगन्तुक की ओर आया जिसके विषय में वह पहले ही प्रायः सुन चुका था, और फैलाए हुए हाथों से उसने गम्भीरता के साथ उसे आशीष दी। थोड़े ही समय बाद एक समकालीन ने उस बालक-जैसे संत के विषय में यों लिखा— “’तू हमारे हृदय में बसा है—पतली और पकी लटों के साथ, और उस आँख के साथ जो जीवन की पुस्तक को इतनी भली-भाँति जानती थी, और उस शान्त माथे के साथ, जैसे तू अपने फूलों के बीच विचरा करता था—पतन से पहले के आदम के समान।’ “उस भेंट का परिणाम दोहरी आशीष थी; क्योंकि केरी एक साथ उस विद्वान के प्रभाव से बोल सकते थे जिसने उस समय देश का सबसे उत्तम कॉलेज स्थापित किया था, और उस देशी-भाषाविद् के प्रभाव से भी जिसने आधी शताब्दी तक लोगों को प्रचार किया था। वह युवा स्कॉट उस एकमात्र अधिकारी व्यक्ति का अनुमोदन लेकर उनके सामने से गया जिसकी राय सबसे अधिक मूल्यवान थी...
“जो लोग उनकी अन्तिम बीमारी में उनसे मिलने आए, उनमें स्कॉटलैंड के मिशनरी अलेक्ज़ेंडर डफ़ भी थे। उन अन्तिम अवसरों में से एक पर जब उन्होंने उन्हें देखा—यदि वह बिलकुल अन्तिम अवसर न था—वे कुछ समय तक मुख्यतः केरी के मिशनरी जीवन के विषय में बातें करते रहे, यहाँ तक कि अन्त में मरते हुए व्यक्ति ने धीमे से कहा, प्रार्थना कीजिए। डफ़ ने घुटने टेककर प्रार्थना की, और फिर विदा ली। जब वे कमरे से बाहर जा रहे थे, तो उन्हें लगा कि उन्होंने एक क्षीण स्वर को अपना नाम लेते सुना है, और मुड़कर उन्होंने पाया कि उन्हें वापस बुलाया गया है। तदनुसार वे लौट आए, और उन्होंने अनुग्रहपूर्ण गम्भीरता के साथ कहे गए ये शब्द सुने: ‘श्री डफ़, आप डॉ. केरी, डॉ. केरी के विषय में बातें करते रहे हैं; जब मैं चला जाऊँ, तो डॉ. केरी के विषय में कुछ न कहिएगा—डॉ.
केरी के उद्धारकर्ता के विषय में कहिएगा।’ डफ़ झिड़की पाकर और श्रद्धा से भरकर चले गए, और अपने
हृदय में एक ऐसा पाठ लेकर गए जिसे वे कभी नहीं भूले।”33
अपने पुराने मित्रों के साथ होने पर वे अतीत की बातों पर बहुत देर तक विचार करते थे। मई 1832 के विषय में लिखते हुए डॉ. मार्शमैन ने उल्लेख किया: “कल रात मैंने प्रिय भाई केरी के साथ, जो अब सत्तर वर्ष और नौ महीने के हैं, चाय पर एक घण्टा बिताया। उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छी दशा में था, और वे भारत और अन्यजातियों के विषय में अपनी पहली भावनाओं की चर्चा कर रहे थे, और उस रीति की भी जिससे परमेश्वर ने उन भावनाओं को जीवित रखा, जब फ़ुलर भी अभी उनमें सहभागी न हो सके थे, और भले बूढ़े जॉन राइलैंड (डॉक्टर के पिता) ने उन्हें पवित्रशास्त्र के विरुद्ध कहकर उनकी निन्दा की थी। यदि वे भावनाएँ मर गई होतीं, तो आज भारत कैसी भिन्न दशा में होता!” उसी वर्ष सितम्बर में, श्रीमती वार्ड को दफ़नाते समय, क़ब्र पर दिए गए अपने सम्बोधन में वे उन मित्रों के साथ फिर से संगति की लालसा करते हुए दिखाई दिए जो प्रभु के आनन्द में प्रवेश करने में उनसे आगे निकल गए थे।
श्री लीचमैन जब उनके सहकर्मी होने के लिए स्कॉटलैंड से आए, तो उन्होंने अप्रैल 1833 में भी उस बूढ़े पुरुष को इस प्रकार बलवन्त पाया, या यदि “थके-माँदे, तौभी खदेड़ते हुए”:--
“हमारे आदरणीय डॉ. केरी उत्तम स्वास्थ्य में हैं, और हमारी सब सार्वजनिक सभाओं में अपनी बारी लेते हैं। ठीक चालीस वर्ष पहले, इसी महीने की पहली तारीख़ को, उन्होंने लेस्टर की कलीसिया को प्रभु-भोज दिया था, और अगले दिन भारत के लिए जहाज़ पर चढ़ने को चल पड़े थे। सम्मानपूर्ण परिश्रम की इस लम्बी अवधि में प्रभु ने दया करके उन्हें सुरक्षित रखा है; और इसी महीने की पहली तारीख़ को हुई हमारी मिशनरी प्रार्थना-सभा में उन्होंने हमें प्रभु के कार्य में लगे रहने के लिए प्रोत्साहित करने को एक रोचक सम्बोधन दिया। हमारी एक निजी मासिक प्रार्थना-सभा भी डॉ. केरी के अध्ययन-कक्ष में होती है, जो मेरे लिए असाधारण रुचि की सभा है। इन अवसरों पर हम विशेष रूप से अपनी सार्वजनिक और निजी परीक्षाओं को प्रभु के सामने फैलाते हैं—वे भी जो मसीह के उस कार्य के कारण हम पर आती हैं जिससे जुड़े रहना हमारा सम्मान और सौभाग्य है, और वे भी जिन्हें हमें व्यक्तिगत रूप से सहना पड़ता है। हमारी पिछली सभा में डॉ. केरी ने गिदोन के इतिहास का एक भाग पढ़ा, और उस प्रोत्साहन पर गहरी भावना के साथ टिप्पणी की जो वह इतिहास देता है, कि परमेश्वर का कार्य दुर्बल और देखने में अयोग्य साधनों के द्वारा भी विजय और जयजयकार तक पहुँचाया जा सकता है।”
केरी के उत्तराधिकारी मैक ने दस महीने बाद क्रिस्टोफ़र एण्डरसन को यों लिखा:--
“श्रीरामपुर, 31 जनवरी 1834।—हमारे आदरणीय पिता, डॉ. केरी, अभी तक हमारे बीच बने हुए हैं, परन्तु उसी दशा में जिसमें वे पिछले लगभग तीन महीनों से हैं। वे काम करने में बिलकुल असमर्थ हैं, और बहुत दुर्बल हैं। वे एक बार में केवल कुछ ही गज़ चल सकते हैं, और दिन लाभ और मनोरंजन के लिए पढ़ने में, और बीच-बीच में ऊँघने और सोने में बिताते हैं। उनका मन पूर्ण रूप से शान्त है। उनकी कल्पना महिमा की सजीव प्रत्याशाओं में बहुत ऊँची नहीं उड़ती; और न वह परमेश्वर में उनके उत्तराधिकार के विषय में बेचैन शंकाओं से उन्हें कभी व्याकुल करती है। उनके लिए यही सब कुछ है कि सुसमाचार सत्य है, और वे उस पर विश्वास करते हैं; और, जैसा वे कहते हैं, यदि वे कह सकते हैं कि वे कुछ जानते हैं, तो यह जानते हैं कि वे उस पर विश्वास करते हैं। जब उनका ध्यान पृथ्वी से अपनी विदाई की ओर, या महिमा की अपनी आशा की ओर दिलाया जाता है, तो उनकी भावनाएँ कोमल और मधुर होती हैं। वे बहुत सरल भी होती हैं, और कुछ छोटे और सारगर्भित वाक्यों में प्रकट होती हैं। मिशन के सब मामलों में उनकी रुचि कम नहीं हुई है, और यद्यपि वे अब न तो विचार-विमर्श में और न सामूहिक प्रार्थना में हमारे साथ सम्मिलित हो सकते हैं, तौभी जो कुछ होता है उसकी सूचना उन्हें अवश्य दी जाती है, और हम जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका हृदय पूरी तरह हमारे साथ रहता है। मैं नहीं समझता कि आनेवाली गर्मी की ऋतु के पार वे जीवित रह सकें, परन्तु हो सकता है कि वे रहें, और प्रभु इस बात में भी, जैसे और सब बातों में, वही करेगा जो सबसे उत्तम है।
“जब हमारी तंगी चरम सीमा पर पहुँच रही थी, तो मैंने निश्चय किया कि मुझे खाने के लिए भोजन पाने को श्रीरामपुर छोड़ना होगा, और मैंने चेरापूँजी को अपना भावी निवास-स्थान चुना। मैंने वहाँ एक उच्च श्रेणी का स्कूल स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, और फिर कुछ उत्साही कल्पना के साथ मैं खासिया पहाड़ियों पर श्रीरामपुर के एक प्रकार के दूसरे संस्करण की आशा करने लगा, जो पश्चिमी प्रान्तों में प्रकाश फैलाने का केन्द्र हो। मैं अपनी कल्पना के उस छायाचित्र पर सचमुच कुछ मोहित हो गया था, परन्तु वह होना नहीं था। यहाँ के भाइयों ने उसे उस दृष्टि से न देखा जिससे मैंने देखा था।”
श्री गोगर्ली का यह अन्तिम चित्र, जिन्हें लंदन मिशनरी सोसाइटी ने 1819 में भेजा था, हमें अन्त के और भी निकट ले आता है:--
“इसी समय मैं उनसे अन्तिम बार मिलने गया। वे अध्ययन-कक्ष में अपनी मेज़ के पास बैठे थे, अपनी सामान्य स्वच्छ वेशभूषा में; उनकी आँखें बन्द थीं, और उनके हाथ आपस में जुड़े हुए थे। उनकी मेज़ पर नये नियम के अन्तिम अध्याय का प्रूफ़-पत्र रखा था, जिसे उन्होंने कुछ दिन पहले संशोधित किया था। वहाँ बैठे हुए उनका रूप, उनके आदरणीय माथे को सुशोभित करनेवाली थोड़ी-सी सफ़ेद लटों और उनके शान्त, रंगहीन चेहरे के साथ, मुझे एक प्रकार के भय और श्रद्धा से भर गया; क्योंकि वे ऐसे दिखाई देते थे मानो उसी समय स्वामी की पुकार सुन रहे हों, और विदा होने की प्रतीक्षा कर रहे हों। मैं उनकी उपस्थिति में लगभग आधे घण्टे तक बैठा रहा, और एक शब्द भी नहीं बोला गया; क्योंकि मैं उस गम्भीर मौन को तोड़ने से, और उस प्राण को पृथ्वी पर वापस बुलाने से डरता था जो लगभग स्वर्ग में पहुँचा हुआ लगता था। परन्तु अन्त में मैं बोला; और मुझे हमारे बीच हुए ठीक वे ही शब्द भली-भाँति याद हैं, यद्यपि तब से छत्तीस वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। मैंने कहा, ‘मेरे प्रिय मित्र, स्पष्ट है कि आप अनन्त लोक की सीमा पर खड़े हैं; इसलिए यदि मैं पूछूँ तो इसे अनुचित न समझिए कि मृत्यु की निकट सम्भावना में आपकी भावनाएँ क्या हैं?’ इस प्रश्न ने उन्हें उनकी प्रत्यक्ष तन्द्रा से जगा दिया, और अपनी थकी आँखें खोलकर उन्होंने गम्भीरता से उत्तर दिया, ‘जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत उद्धार का सम्बन्ध है, मुझे सन्देह की छाया तक नहीं है; मैं उसे जिसकी मैंने प्रतीति की है, जानता हूँ, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी थाती की उस दिन तक रखवाली कर सकता है; परन्तु जब मैं सोचता हूँ कि मैं एक पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में प्रकट होनेवाला हूँ, और अपने सब पापों और अनेक अपूर्णताओं को स्मरण करता हूँ—तो मैं काँप उठता हूँ।’ वे और कुछ न कह सके। आँसू उनके गालों पर बह निकले, और कुछ देर बाद वे फिर उसी मौन की दशा में लौट गए जिससे मैंने उन्हें जगाया था।
“वह भेंट अत्यन्त गम्भीर थी, और उस समय मुझे जो शिक्षा मिली वह बड़ी महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ वे व्यक्ति थे जो मेरे जाने हुए सब लोगों में सबसे पवित्र और निष्कपट लोगों में से एक थे—जो चालीस वर्ष से अधिक समय तक निन्दा की साँस तक से ऊपर रहकर जीए थे, यद्यपि वे यूरोपियनों और देशी लोगों, दोनों में से ऐसे बहुत-से लोगों से घिरे और उनके निकट सम्पर्क में रहे थे जो उनके आचरण में कोई भी असंगति देखकर आनन्दित होते, परन्तु जो उनकी खराई और मसीही चरित्र की प्रशंसा करने को विवश थे—और यद्यपि वे उस उद्धारकर्ता की योग्यता के द्वारा, जिसका उन्होंने प्रचार किया था, अपने उद्धार की निश्चितता के विषय में इस प्रकार आश्वस्त थे, तौभी पाप की अत्यधिक पापमयता का उन पर ऐसा गहरा प्रभाव था कि एक पवित्र परमेश्वर के सामने उपस्थित होने के विचार से वे काँप उठते थे! इस घटना के कुछ दिन बाद डॉ. केरी अपने बिछौने पर जा लेटे, जिससे वे फिर कभी न उठे।”
इससे बहुत पहले, 17 मार्च 1802 को, केरी ने डॉ. राइलैंड को अपने विषय में इस प्रकार लिखा था:--“एक वर्ष या उससे कुछ अधिक समय पहले आपने, या मेरे किसी और प्रिय मित्र ने, परस्पर मसीही प्रेम की गवाही के रूप में उपदेशों का एक खण्ड प्रकाशित करने के विचार का उल्लेख किया था, और चाहा था कि मैं उस प्रयोजन के लिए एक-दो उपदेश भेजूँ। मैंने गम्भीरता से ऐसा करने का विचार किया, और एक से अधिक बार उसे पूरा करने बैठा भी, परन्तु हर बार उससे हटा दिया गया। आलस्य मेरा प्रधान पाप है, और उसके साथ अब अनेक ऐसे काम भी आ जुड़े हैं जिनके विषय में मैंने कभी सोचा भी न था; मुझे निरन्तर यह भय भी बना रहता है कि कहीं अन्त में मैं किसी न किसी प्रकार ऐसा गिर न पड़ूँ कि सुसमाचार का अनादर हो, इसलिए मैंने बहुधा यह चाहा है कि मेरा नाम विस्मृति में दफ़न हो जाए; और सचमुच मेरे पास इन भयों का कारण है, क्योंकि मैं पाप की ओर इतना झुका हुआ हूँ कि हर रात मुझे आश्चर्य होता है कि दिन भर मैं घोर अपराधों से बचा रहा, और जब मैं किसी परीक्षा से बच निकलता हूँ तो उसे अनुग्रह का एक आश्चर्यकर्म मानता हूँ जिसने मुझे बचाए रखा। मुझे कभी इतना पूरा निश्चय नहीं हुआ था जितना अब है कि धार्मिकता की कोई भी आदत घोर से घोर अपराधों में गिरने से सुरक्षा नहीं है, और मुझे हर क्षण परमेश्वर की तत्काल सहायता की आवश्यकता है। मैं मानता हूँ कि अपने निरन्तर संकट के बोध ने मुझ पर इतना प्रबल प्रभाव डाला है कि मैं चाहता हूँ कि जब तक मैं जीवित हूँ, धार्मिक स्वरूप की कोई भी रचना मेरे नाम से प्रकाशित न की जाए। एक और कारण यह है कि मुझे बोध है कि मैं किसी भी विषय के साथ न्याय करने में, या अच्छी समझ की बात लिखने में भी, असमर्थ हूँ। यह सच है कि मुझे विवश होकर कई चीज़ें प्रकाशित करनी पड़ी हैं, और मैं कह सकता हूँ कि आवश्यकता के सिवा और कुछ भी मुझसे ऐसा नहीं करवा सकता था। फिर भी वे केवल व्याकरण-सम्बन्धी रचनाएँ हैं, और यदि मैं अपने लिए स्वयं चुन सकता, तो निश्चय ही ये वे अन्तिम चीज़ें होतीं जिन्हें मैं लिखता।”
15 जून 1833 को भी वह वृद्ध पुरुष दूसरों के साथ आनन्द मनाने में समर्थ थे। उन्होंने अपने पुत्र जोनाथन को वह एकमात्र छोटा-सा पत्र लिखा जो वर्तमान लेखक के पास उनकी लेखनी से है, और उसकी लिखावट उतनी ही स्पष्ट है जितनी पच्चीस वर्ष पहले की थी:--
“मेरे प्रिय जोनाथन—तुम्हें जो शुभ समाचार मिला है, उसके लिए मैं तुम्हें बधाई देता हूँ। परन्तु मुझे दुःख है कि लूसी अब भी इतनी बीमार है। मैं इतना दुर्बल हूँ कि इससे अधिक नहीं लिख सकता कि तुम्हारी माँ उतनी ही अच्छी हैं जितनी इस मौसम में आशा की जा सकती है। पिछले पखवाड़े में मेरी जो दशा रही है, उससे अधिक बुरी दशा में मैं जीवित रह ही नहीं सकता था।—तुम्हारा स्नेही पिता, डब्ल्यू. केरी।”
गर्मी की ऋतु तब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी।
उनके अन्तिम पत्र इंग्लैण्ड में रहनेवाली उनकी दो बहनों के नाम प्रेम और आशा के छोटे-छोटे सन्देश थे। 27 जुलाई 1833 को उन्होंने उन्हें लिखा:--
“लगभग एक सप्ताह पहले मुझमें इतना बड़ा परिवर्तन हुआ कि मैंने समझा कि यह मृत्यु का तत्काल प्रहार है, और मेरे सब बच्चों को इसकी सूचना दी गई और वे सब मुझे देखने यहाँ आए। तब से मैं लगभग चमत्कारिक रीति से फिर सँभल गया हूँ, नहीं तो मैं यह न लिख पाता। परन्तु मैं आशा नहीं कर सकता कि यह दशा बनी रहेगी। प्रभु की इच्छा पूरी हो। विदा, जब तक मैं तुमसे एक बेहतर संसार में न मिलूँ।—तुम्हारा स्नेही भाई, “डब्ल्यू. केरी।”
दो महीने बाद वे अपने पुराने काम में लगे थे, और “कभी-कभी पवित्रशास्त्र का एक प्रूफ़-पन्ना पढ़ने” में समर्थ थे।
“श्रीरामपुर, 25 सितम्बर 1833।
“मेरी प्रिय बहनो—अब तुम्हें लिख पाना मेरे लिए बिलकुल अप्रत्याशित है, और मेरा विश्वास है कि बाकी सबके लिए भी; परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर की इच्छा है कि मैं थोड़ा समय और बना रहूँ। वह समय कितना लम्बा होगा, यह मैं पूरी तरह उसी पर छोड़ता हूँ, और केवल इतना ही कह सकता हूँ, ‘मैं अपनी कठिन सेवा के सारे दिन तब तक आशा लगाए रहूँगा, जब तक मेरा छुटकारा न हो।’ दो महीने या उससे कुछ अधिक पहले मैं दुर्बलता की ऐसी दशा में पहुँच गया था कि ऐसा लगता था मानो मेरा मन बुझ गया हो; और मेरी शारीरिक दुर्बलता, और अत्यधिक थकान और क्षीणता का बोध ऐसा था कि मैं मुश्किल से बोल पाता था, और ऐसा लगता था कि मृत्यु एक कुर्सी से दूसरी कुर्सी पर हटाए जाने से अधिक अनुभव न होगी। अब मैं अपनी आरामकुर्सी पर बैठ और लेट सकता हूँ, और कभी-कभी पवित्रशास्त्र का एक प्रूफ़-पन्ना पढ़ सकता हूँ। मैं इतना दुर्बल हूँ कि घर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक से अधिक नहीं चल सकता, और न ही बिना सहारे के कुछ मिनट भी खड़ा रह सकता हूँ। दयालु मित्र जो भी सुख-सुविधा दे सकते हैं, वह सब मुझे प्राप्त है, और सामान्यतः मेरा मन शान्त रहता है। मुझे भरोसा है कि बड़ी बात तय हो चुकी है, और मैं कूच करने को तैयार हूँ; परन्तु कब, यह मैं परमेश्वर पर छोड़ता हूँ।
“3 अक्टूबर।—जब मैंने यह पत्र आरम्भ किया था, उससे अब मेरी दशा बुरी नहीं है।—मैं हूँ, तुम्हारा अत्यन्त स्नेही भाई, विलियम केरी।”
मसीही जगत के नाम उनका अन्तिम सन्देश 30 सितम्बर को भेजा गया, और अत्यन्त उपयुक्त रूप से क्रिस्टोफ़र एंडरसन को:--“चूँकि ईश्वरीय प्रतिज्ञाओं की पूर्ण पूर्ति से सम्बन्धित हर बात परमेश्वर की सर्वशक्तिमान सामर्थ पर निर्भर है, इसलिए प्रार्थना कीजिए कि मैं और वचन के सब सेवक उसकी सामर्थ को थाम लें, और अपने काम में इस पूरी आशा के साथ लगें कि वे सब प्रतिज्ञाएँ पूरी होंगी, और चाहे यह कितना ही कठिन और असम्भव क्यों न लगे, यह निश्चित है, क्योंकि परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में ‘हाँ’ हैं, और उसी में आमीन हैं।” तो क्या उन्होंने अपने सारे जीवन-काल में बड़ी-बड़ी बातों की आशा नहीं की थी और बड़े-बड़े काम करने का प्रयत्न नहीं किया था?
उन्होंने अपने ही निर्देशानुसार बनवाए गए एक छोटे-से चबूतरे पर एक कुर्सी जड़वा ली थी, ताकि उन्हें पहियों के सहारे उनके बगीचे में घुमाया जा सके। अन्य समयों पर प्रधान माली हुल्लोधर उन्हें पौधों के संग्रह की दशा का समाचार देता था, जिनकी संख्या तब लगभग 2000 थी। डॉ.
मार्शमैन अपने मित्र से प्रतिदिन, कभी-कभी दिन में दो बार, मिलते थे, और उन्होंने उन्हें सदा वैसा ही पाया जैसा लॉर्ड हेस्टिंग्स ने उनका वर्णन किया था—“वह प्रसन्नचित्त वृद्ध पुरुष।” केवल एक ही अवसर पर वे उदास दिखाई दिए, और तब डॉ. मार्शमैन ने कमरे से जाते हुए मुड़कर उसका कारण पूछा। गहरी भावना के साथ उस मरणासन्न विद्वान ने दूसरों की ओर देखा और कहा, “मेरे चले जाने के बाद भाई मार्शमैन मेरे बगीचे में गायें छोड़ देंगे।” उत्तर तुरन्त आया, “ऐसा मुझसे कदापि न होगा; यद्यपि मुझमें आपकी जैसी वनस्पति-विज्ञान की रुचि नहीं है, तौभी जिस बगीचे में आपने इतना आनन्द लिया है, उसकी देखभाल करना मेरे लिए एक पवित्र कर्तव्य होगा।”34 अपरिचितों में उनसे सबसे अधिक मिलने आनेवाली गवर्नर-जनरल की पत्नी, लेडी विलियम बेंटिंक थीं। उनके पति दक्षिण भारत में थे, और वे अपना अधिकांश समय केरी के घर के सामने बैरकपुर पार्क के विश्राम-स्थल में बिताती थीं। उनके जीवन-काल में भी और अब भी उनसे बार-बार वार्तालाप करके उन्होंने मरने की कला सीखी। कलकत्ता के बिशप डैनियल विल्सन ने अपने लम्बे धर्माध्यक्षीय कार्यकाल के लगभग आरम्भ से ही श्रीरामपुर में आनन्द लेना सीख लिया था, और बाद के वर्षों में वे कलकत्ता से अधिक वहीं रहते थे। 14 फ़रवरी 1833 को वे पहली बार केरी से मिलने आए, और “उनसे उनकी भेंट, जब वे अपने कमरे तक सीमित थे और प्रत्यक्षतः स्वर्गीय लोक की दहलीज़ पर थे, विशेष रूप से मर्मस्पर्शी थी।” बाद की भेंटों में से अन्तिम में उस युवा बिशप ने मरणासन्न मिशनरी से आशीर्वाद माँगा। सबके साथ बातचीत एक-सी थी—परमेश्वर की इच्छा के प्रति नम्र समर्पण, पापियों के छुड़ानेवाले पर दृढ़ भरोसा, और उसके राज्य की अद्भुत प्रगति के लिए आनन्दपूर्ण कृतज्ञता। उनके भाइयों ने उनके देहान्त से छह सप्ताह पहले स्वदेश को यह कैसा चित्र भेजा! “हमारे वृद्ध और आदरणीय भाई अनुभव करते हैं कि वे धीरे-धीरे और दुर्बल होते जा रहे हैं। वे मुश्किल से अपनी आरामकुर्सी से उठ पाते हैं, और बड़ी कठिनाई से उन्हें प्रतिदिन हवा खिलाने के लिए बाहर ले जाया जाता है। फिर भी रोग के विषय में वे सब पीड़ा से मुक्त हैं, और उनका मन अत्यन्त शान्त और आनन्दित दशा में है। उनकी सब मानसिक शक्तियाँ पूरी तरह बनी हुई हैं, और यद्यपि दुर्बलता के कारण कठिनाई से, तौभी वे अब भी दिन-प्रतिदिन अपने मित्रों से बातचीत करते हैं।”
वर्ष की सबसे गर्म ऋतु मई के महीने और जून के पहले सप्ताह में थकाते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई। हर रात वे अच्छी तरह सोते थे, और हर दिन उन्हें हवा के लिए भोजन-कक्ष में उनकी आरामकुर्सी पर ले जाया जाता था। वहाँ वे लेटे रहते, एक-दो शब्दों से अधिक बोल पाने में असमर्थ, परन्तु अपने आनन्दित चेहरे से प्रार्थना में सहभागिता और बातचीत में रुचि प्रकट करते हुए। 22 मई को अंग्रेज़ी डाक श्री होप की ओर से आनन्ददायक समाचार लेकर आई—परमेश्वर के लोग मिशन के लिए नए सिरे से प्रार्थना कर रहे थे और दान दे रहे थे। विशेष रूप से उनके अपने सबसे नए स्टेशन चेरापूँजी को स्मरण किया गया था। जब उन्हें बताया गया कि एक महिला ने, अपना नाम बताए बिना, उस मिशन के लिए £500, कॉलेज के लिए £500, अनुवादों के लिए £500, और सामान्य रूप से मिशन के लिए £100 देने का प्रस्ताव किया है, तो उन्होंने अपने सूखे हुए हाथ स्वर्ग की ओर उठाए और धीमे स्वर में परमेश्वर की स्तुति की। जब प्रस्थान से पहले का प्रलाप आया, तो वे अपनी लिखने की मेज़ तक पहुँचने का प्रयत्न करते थे ताकि धन्यवाद का एक पत्र लिख सकें, विशेषकर चेरा के लिए। फिर वे इस बात को स्मरण करते कि जो छोटी-सी कलीसिया उन्होंने आरम्भ में स्थापित की थी, वह बढ़कर छब्बीस कलीसियाओं में फैल गई थी, जिनमें सुसमाचार की विधियाँ नियमित रूप से पूरी की जाती थीं, और वे फुसफुसाते, “परमेश्वर ने क्या ही विचित्र काम किया है!”
अन्तिम विश्रामदिन आ पहुँचा था—और अन्तिम पूरा दिन। सदा साथ रहनेवाले मार्शमैन उनके पास थे। “वे मुश्किल से बोल पाते थे, और थोड़ी बातचीत के बाद मैंने उनकी आरामकुर्सी के पास घुटने टेके और उनके साथ प्रार्थना की। मैंने पाया कि मेरा मन अप्रत्याशित रूप से परमेश्वर को उसकी भलाई के लिए धन्य कहने की ओर खिंच गया, कि उसने उन्हें चालीस वर्ष से अधिक समय तक भारत में सुरक्षित रखा और आशीष दी, और उन्हें अपनी कलीसिया के लिए भलाई का ऐसा साधन बनाया; और यह विनती करने की ओर भी कि उनके घर बुला लिए जाने पर उनकी आत्मा का दूना भाग उन पर ठहरे जो पीछे रह जाएँगे; यद्यपि वे बोल नहीं सकते थे, तौभी उन्होंने अपने चेहरे से भली-भाँति प्रकट कर दिया कि वे इस प्रार्थना में कितने हार्दिक रूप से सम्मिलित थे। तब मैंने श्रीमती केरी से पूछा कि क्या उनके विचार में वे अब मुझे देख सकते हैं। उन्होंने कहा हाँ, और मुझे निश्चय दिलाने के लिए उनसे कहा, ‘श्री मार्शमैन जानना चाहते हैं कि क्या आप अब उन्हें देख रहे हैं?’ उन्होंने इतने ऊँचे स्वर में उत्तर दिया कि मैं सुन सका, ‘हाँ, देख रहा हूँ,’ और बड़ी हार्दिकता से मेरा हाथ मिलाया। तब मैं उनके पास से चला गया, और मेरे अन्य कर्तव्यों ने मुझे उस दिन फिर उनके पास पहुँचने न दिया। अगली सुबह, जब मैं सूर्योदय से पहले घर लौट रहा था, तो मुझे हमारे भाई मैक और लीचमैन अपनी सुबह की घुड़सवारी पर मिले, और मैक ने मुझे बताया कि हमारे प्रिय भाई सारी रात कुछ अधिक बीमार रहे थे, और वे उन्हें अभी-अभी बहुत बीमार दशा में छोड़कर आए हैं। मैं तुरन्त घर की ओर जल्दी से चला, उस कॉलेज में से होकर जिसमें वे इन दस वर्षों से रह रहे थे, और जब मैं उनके कमरे में पहुँचा, तो पाया कि वे अभी-अभी अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश कर चुके थे—उस समय श्रीमती केरी, उनका पुत्र जेबेज़, मेरा पुत्र जॉन, और श्रीमती मैक उपस्थित थे।”
वह सोमवार, 9 जून 1834 का दिन था, साढ़े पाँच बजे, जब भोर का सूर्य पूरे दिन की ओर आकाश में चढ़ रहा था। अगली सुबह, जब वे विलियम केरी को नए विश्वासियों के कब्रिस्तान में ले गए और बड़ा विलाप किया, तब वर्षा के बादल फट पड़े और उन्होंने देश को उदासी से ढक दिया। उन दिनों सूचना इतनी कम अवधि की थी कि बहुत-से लोग कलकत्ता से न आ सके। “स्कॉटिश चर्च के श्री डफ़ ने एक अत्यन्त कृपापूर्ण पत्र उत्तर में भेजा।” सर चार्ल्स मेटकाफ़ और बिशप ने बड़ी भावना के साथ उत्तर लिखा। लेडी बेंटिंक ने गवर्नर-जनरल और अपनी ओर से प्रतिनिधित्व करने के लिए रेवरेंड श्री फ़िशर को भेजा, और साथ ही “एक अत्यन्त कृपापूर्ण और भावपूर्ण उत्तर भी, क्योंकि वे उस आदरणीय पुरुष से सचमुच प्रेम करती थीं,” और वे उदास होकर शोक करनेवालों को देखती रहीं जब वे उस सादी शवयात्रा के पीछे-पीछे हुगली के दाहिने किनारे पर, कॉलेज और मिशन-चैपल के पास से होकर, ऊपर की ओर जा रहे थे। श्री येट्स ने, जिन्होंने उस विद्वान से प्रेमपूर्वक विदा ली थी जिनका उत्तराधिकारी बनने में वे हिचकिचाते थे, छोटे भाइयों का प्रतिनिधित्व किया; और लाक्रोआ, मीकायाह हिल और गोगर्ली ने लंदन मिशनरी सोसाइटी का। ऐसा प्रतीत होता है कि कोरी और डील्ट्री समय पर उस स्थान तक नहीं पहुँच पाए। डेनिश गवर्नर, उनकी पत्नी, और परिषद् के सदस्य वहाँ उपस्थित थे, और झण्डा आधा झुका हुआ था, जैसा किसी गवर्नर की मृत्यु के अवसर पर होता है। मार्ग के दोनों ओर वे गरीब लोग, हिन्दू और मुसलमान, खड़े थे जिनके लिए उन्होंने इतना कुछ किया था। जब सब लोग वर्षा में चलते हुए खुली कब्र तक पहुँच गए, तो सूर्य निकल आया, और लीचमैन ने पुनरुत्थान का आनन्दमय भजन, “हम विदा होते मित्रों के लिए शोक क्यों करें?” गाने में उनकी अगुवाई की। मार्शमैन ने लिखा, “तब मैंने उपस्थित लोगों को सम्बोधित किया, और भाई मैक की इस भविष्यवाणी के विपरीत कि मैं आँसुओं के कारण कभी अपनी बात पूरी न कर पाऊँगा, मैंने एक भी आँसू नहीं बहाया। तब भाई मैक से देशी सदस्यों को सम्बोधित करने के लिए कहा गया, परन्तु उन्होंने यह देखकर कि समय बहुत बीत चुका है, सबके सामने कहा कि वे गाँव में ऐसा करेंगे। तब भाई रॉबिन्सन ने प्रार्थना की, और रोते हुए—तब न मैं, और न ही कुछ और लोग, अपने को रोक सके।” संध्या को जाननगर गाँव के चैपल में बंगला का अन्त्येष्टि-भजन, Pœritran Christer Morone, “मसीह की मृत्यु के द्वारा उद्धार,” गाया गया, और सबसे पुराने चेले प्राण कृष्ण ने अपने देशवासियों की प्रार्थना में अगुवाई की। तब मैक ने रोते हुए नए विश्वासियों से उनकी अपनी मधुर देशी भाषा की सारी करुणा के साथ इन शब्दों पर बात की, “क्योंकि दाऊद तो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपने समय में सेवा करके सो गया।” क्या केरी का जीवन-क्रम एक राजसी जीवन-क्रम नहीं था—हाँ, परमेश्वर के लिए एक राजा और याजक का जीवन-क्रम?
डॉ. मार्शमैन ने क्रिस्टोफ़र एंडरसन को लिखा, “हमने एक मिशन के रूप में यह व्यय अपने ऊपर लिया, उनके परिवार को ऐसा करने नहीं दिया, जैसे हम उनके लिए स्मारक बनवाने का व्यय भी उठाएँगे। उनकी मृत्यु से बहुत पहले हमने, हम सबके हस्ताक्षरों वाले एक पत्र द्वारा, उन्हें निश्चय दिला दिया था कि इंग्लैण्ड और फ़्रांस में रहनेवाले प्रिय सम्बन्धियों की पेंशनें ऐसे ही जारी रहेंगी मानो वे जीवित हों, और कि श्रीमती केरी को विधवा के रूप में, मैकिन्टॉश के घर से उन्हें चाहे जो भी मिले, प्रतिमास 100 रुपये मिलेंगे।”
बाईस वर्ष पहले, जब चेम्बरलेन इस बात की शिकायत कर रहे थे कि मिशन के कब्रिस्तान में न कोई पत्थर है, न ईंट, न कोई अभिलेख, तब केरी ने कहा था, “हमें क्यों स्मरण किया जाए? मेरे विचार में जब मैं मर जाऊँ, तो जितनी जल्दी मुझे भुला दिया जाए उतना ही अच्छा।” डॉ. जॉन्स ने कहा कि यह स्वयं उन व्यक्तियों की नहीं, परन्तु उनके मित्रों की उनके प्रति इच्छा होती है, जिस पर केरी ने उत्तर दिया, “उस विषय में मैं दूसरों के बारे में भी वैसा ही सोचता हूँ जैसा अपने बारे में।” जब उनकी दूसरी पत्नी उनसे छीन ली गईं, तब उनका स्नेह इतना प्रबल हुआ कि उन्होंने एक स्मारक-पत्थर खड़ा किया, और अपनी वसीयत में अपने निष्पादकों, मैक और विलियम रॉबिन्सन, के लिए यह “आदेश” छोड़ा: “मैं निर्देश देता हूँ कि मेरी अन्त्येष्टि यथासम्भव सादी हो; कि मुझे मेरी दूसरी पत्नी, शार्लट एमिलिया केरी, के बगल में दफ़नाया जाए; और कि जो पत्थर उनकी स्मृति में है, उस पर, ऊपर या नीचे, जहाँ भी स्थान हो, निम्नलिखित अभिलेख और इससे अधिक कुछ नहीं खोदा जाए, अर्थात्:--
विलियम केरी, जन्म 17 अगस्त 1761; मृत्यु
एक दीन, दरिद्र और असहाय कीड़ा, तेरी दयालु बाँहों पर मैं गिरता हूँ।”
ऐसा प्रतीत होता है कि जीवित बचे भाइयों ने वह छोटा आयताकार पत्थर लेकर, उस पर निर्देशानुसार अभिलेख जोड़कर, उसे ईंट और सफ़ेद पलस्तर के उस गुम्बदवाले चौकोर ढाँचे के दक्षिणी ओर लगा दिया—जिसका समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा है—जो उस ‘परमेश्वर की भूमि’ के बाएँ कोने में खड़ा है, जो अब मिशनरियों, नए विश्वासियों और मसीही लोगों की चार पीढ़ियों की मिली-जुली धूल से पवित्र हो चुकी है। वार्ड का स्मारक बीच में खड़ा है, और मार्शमैन परिवार का स्मारक दाहिनी ओर। साढ़े तीन वर्ष बाद जोशुआ मार्शमैन भी केरी के पीछे चले गए; हन्ना मार्शमैन को अस्सी वर्ष के एक उदात्त जीवन के बाद 1847 में जाकर उनके बगल में लिटाया गया। मैक उससे एक वर्ष पहले, वार्ड की भाँति हैज़े से उठा लिए गए थे। परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि भ्रातृमण्डल का अन्त तब तक हुआ जब तक कि जॉन मार्शमैन, सी.एस.आई., का 1877 में लंदन में देहान्त न हो गया। आरम्भ से अन्त तक इन तीनों परिवारों ने अपनी ही कमाई में से परमेश्वर के काम के लिए नब्बे हज़ार पाउण्ड दिए, और यदि एंड्रयू फ़ुलर के उत्तराधिकारियों की ओर से उस प्रेम का अभाव न होता जो डाह नहीं करता, तो संसार को यह बात कभी पता न चलती।
केरी की अन्तिम वसीयत इन शब्दों से आरम्भ होती है: “श्रीरामपुर की उस सम्पत्ति पर, जो मिशन-सम्पत्ति कहलाती है, और उसके हर भाग और अंश पर, मैं किसी भी प्रकार के अधिकार या स्वत्व का पूर्णतः त्याग करता हूँ; और इसके द्वारा घोषित करता हूँ कि मेरा ऐसा कोई अधिकार या स्वत्व कभी नहीं था, और न ही मैंने कभी अपने को ऐसा अधिकार या स्वत्व रखनेवाला समझा। मैं श्रीरामपुर कॉलेज को अपना सम्पूर्ण संग्रहालय देता और वसीयत करता हूँ, जिसमें खनिज, सीपियाँ, मूँगे, कीट और अन्य प्राकृतिक दुर्लभ वस्तुएँ, और एक Hortus Siccus सम्मिलित हैं; साथ ही Hortus Woburnensis का फ़ोलियो संस्करण, जो लॉर्ड हेस्टिंग्स ने मुझे भेंट किया था; टेलर का हिब्रू कॉनकॉर्डेंस, विदेशी भाषाओं की बाइबलों का मेरा संग्रह, और इतालवी और जर्मन भाषाओं की मेरी सब पुस्तकें भी।” उनकी विधवा ग्रेस के पास, जो उनके बाद थोड़े ही समय तक जीवित रहीं, वह छोटी-सी पूँजी थी जो उनसे विवाह से पहले उनकी अपनी थी, और उन्होंने इच्छा प्रकट की कि उनके पुस्तकालय में से जो भी अंग्रेज़ी पुस्तकें उन्हें मूल्यवान लगें, वे चुन लें। उनके सबसे छोटे पुत्र जोनाथन को धन की कमी नहीं थी। फ़ेलिक्स और विलियम को उन्होंने अपने जीवन-काल में ही 1500-1500 रुपये दे दिए थे। जेबेज़ के लिए भी उतनी ही राशि छोड़ने के लिए उन्होंने इस प्रकार प्रबन्ध किया: “अपने पहले के इरादों को पूरा करने के लिए धन के अभाव के कारण, मैं निर्देश देता हूँ कि मेरा पुस्तकालय बेच दिया जाए।” मरने में भी वे जीने के समान ही हैं— दूसरों के प्रति न्यायी, क्योंकि वे उसके प्रति आत्म-समर्पित थे जिसके हाथ में उन्होंने इस प्रकार विधिवत् अपने आप को वसीयत कर दिया था, “तेरी दयालु बाँहों पर मैं गिरता हूँ।”
भारत के समाचार-पत्र उस मिशनरी की प्रशंसा से गूँज उठे जिसकी बालक-सी नम्रता और सच्चाई, देशभक्ति और विद्वत्ता ने बहुत समय से भारत को उस पर गर्व करने का कारण दिया था। अपने आप को दे देने के बाद विलियम केरी इतनी गरीबी में मरे कि उनके एक पुत्र के लिए £187 10s. जुटाने हेतु उनकी पुस्तकें बेचनी पड़ीं। एक लेखक ने दावा किया कि इस व्यक्ति ने श्रीरामपुर मिशन से जुड़े रहते हुए मसीह के काम के लिए “सोलह लाख रुपये” दिए थे, और यह कथन सब जगह दोहराया गया। इस पर डॉ. मार्शमैन ने वास्तविक तथ्य प्रकाशित किए, “क्योंकि यदि डॉ. केरी स्वयं जीवित होते, तो मसीही जनता को इस प्रकार धोखा देने के ऐसे प्रयत्न से किसी को भी उनसे अधिक घृणा न होती।” उस समय, जब पुराना सिक्का रुपया आधे क्राउन के बराबर था, केरी को श्रीरामपुर में अपने निवास के साढ़े चौंतीस वर्षों में, फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में अपनी नियुक्ति की तिथि से, £45,000 मिले।35 इसमें से उन्होंने उस अवधि में £7500 अपने वनस्पति उद्यान पर व्यय किए। यदि ऐसे प्रश्न में, जिसमें एक जिज्ञासापूर्ण जीवनी-सम्बन्धी रुचि से अधिक कुछ नहीं है, यथार्थता का कोई मूल्य है, तो हमें 1801 से पहले के सात वर्ष भी जोड़ने होंगे, और तब हम पाएँगे कि हैकलटन के उस मोची ने अपने और अपने परिवार के लिए उस सोसाइटी से, जिसे उन्होंने अस्तित्व में लाया था और जिसने उन्हें भेजा था, कुल £600 पाए, जबकि उन्होंने भारत को मसीही बनाने और सभ्य बनाने पर नील के निर्माता के रूप में प्राप्त £1625, और संस्कृत, बंगला और मराठी के प्रोफ़ेसर तथा सरकार के बंगला अनुवादक के रूप में प्राप्त £45,000, अर्थात् कुल £46,625 व्यय किए।
डॉ. मार्शमैन ने लिखा, “यह सम्भव है कि यदि डॉ. केरी इस प्रकार श्रीरामपुर में अपने भाइयों के साथ परमेश्वर और उसके काम के लिए जीने के बजाय, कॉलेज के दूसरे प्रोफ़ेसरों की भाँति कलकत्ता में पूरी तरह अपने और अपने परिवार के लिए जीते, तो जिन तीस वर्षों तक वे सरकार की सेवा में रहे, उनमें वे उनके लिए एक लाख रुपये बचा लेते, और यदि वे बहुत कंजूस होते, तो शायद डेढ़ लाख। परन्तु कौन है जो ऐसे जीवन के सुखों की तुलना उन सुखों से करे जो डॉ. केरी ने अपने ही धन से ऐसी हर योजना को बढ़ावा देने में पाए जिससे उनके चारों ओर के देशी लोगों के बीच मसीहियत के रोपे जाने की सम्भावना थी—और ऐसा करने में उन्हें अपने उन दो एकमन भाइयों के सिवा किसी से परामर्श नहीं करना पड़ता था, जिन्होंने छुड़ानेवाले के काम में उतना ही योगदान दिया जितना उन्होंने स्वयं—और जिसका फल उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले ही लगभग आठ सौ मील के क्षेत्र में भारत में स्थापित छब्बीस सुसमाचार-प्रचारक कलीसियाओं में, और उनके बीच उसी स्थान पर खड़े किए गए चालीस से अधिक परिश्रम करनेवाले भाइयों में देख लिया था—और फिर बाद वाले जीवन को न चुने? उस मनुष्य की मृत्यु-शय्या पर क्या भावनाएँ रही होंगी जो पूरी तरह अपने लिए ही जीया हो, जब उनकी तुलना उस आनन्दमय शान्ति से की जाए जो अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश करने की आशा में केरी के प्राण में भरी हुई थी, और सबसे बढ़कर उससे जो उन्होंने तब अनुभव किया जब अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले उन्होंने चौंतीस वर्ष के अपने सहकर्मी से कहा: ‘मुझे कोई भय नहीं; मुझे कोई सन्देह नहीं; मेरी कोई भी इच्छा अपूर्ण नहीं रह गई है।’”
श्रीरामपुर के डेनिश चर्च में, और मिशन-चैपल में, और बाद में कलकत्ता के यूनियन चैपल में, डॉ. मार्शमैन और श्री मैक ने विलियम केरी पर उपदेश दिए। ये, और 30 नवम्बर को एडिनबरा के शार्लट चैपल में क्रिस्टोफ़र एंडरसन द्वारा दिया गया प्रवचन, अगले पच्चीस वर्षों तक वे एकमात्र सामग्री थे जिनसे केरी और उनके काम का उचित मूल्यांकन किया जा सकता था। ये सब, और विशेषकर अन्तिम, अपने विषय के उतने ही योग्य थे जितनी ऐसी परिस्थितियों में कही गई प्रशस्तियाँ हो सकती हैं। मार्शमैन ने उस पाठ पर प्रचार किया जिसे केरी ने स्वयं अपनी मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले इसलिए चुना था कि उसमें उनकी आशा की नींव और उनके शान्त और स्थिर निश्चय का स्रोत था—“क्योंकि अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।” मैक ने, जैसे उन्होंने बंगाली गाँव में किया था, फिर पौलुस के इन शब्दों में प्रेरणा पाई—“दाऊद तो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपने समय में सेवा करके सो गया।” एडिनबरा के प्रचारक ने यशायाह के उस सन्देश की ओर ध्यान दिया जिससे केरी अपने आरम्भिक अकेलेपन में अपने को सान्त्वना दिया करते थे, और जिसे रिवाइज़्ड वर्ज़न इस प्रकार प्रस्तुत करता है—“अपने मूलपुरुष अब्राहम पर ध्यान करो; क्योंकि जब वह अकेला था, तब मैंने उसको बुलाया, और उसे आशीष दी, और उसे बहुत कर दिया।” और बम्बई में उस युवा समकालीन मिशनरी ने, जो व्यक्तिगत पवित्रता, विद्वत्ता और आत्म-समर्पण में केरी से सबसे अधिक मिलता-जुलता था, अर्थात् जॉन विल्सन ने, इस प्रकार लिखा:-- “डॉ. केरी, जीवित मिशनरियों में सबसे अग्रणी, प्रेरितों के समय से सबसे अधिक सम्मानित और सबसे अधिक सफल, ने अपना लम्बा और प्रभावशाली जीवन-क्रम समाप्त कर दिया है। सचमुच उनकी आत्मा, उनका जीवन और उनके परिश्रम सच्चे अर्थों में प्रेरितों के समान थे...परमेश्वर का आत्मा, जो उनमें था, उन्हें बल पर बल पाते हुए आगे ले चला, अभाव में उन्हें सँभाले रहा, और उन्हें एक ऐसी लड़ाई में जय पाने के योग्य बनाया जो आशाहीन प्रतीत होती थी। उस प्रिय चेले के समान, जिससे वे मन की सरलता में, और पापियों को पूरी तरह प्रेम की डोरियों से मसीह की ओर खींचने के प्रयत्न में मिलते-जुलते थे, वे अपनी परीक्षाओं के बाद भी जीवित रहे, ताकि एक शान्त और सम्मानित बुढ़ापे का आनन्द लें, यह जानें कि उनके स्वामी का काम उन्नति कर रहा है, और कि उनका अपना नाम हर उस देश में, जहाँ कोई मसीही रहता है, आदर और आशीष के साथ लिया जाता है। शायद किसी भी मनुष्य ने किसी महान उद्देश्य पर भलाई के लिए इससे बड़ा प्रभाव कभी नहीं डाला। जिसने भी उन्हें, गरीब और विद्या के केन्द्रों में अशिक्षित, ऐसे साहसिक काम में लगते देखा, क्या वह कभी स्वप्न में भी सोच सकता था कि चालीस वर्ष से कुछ ही अधिक समय में मसीही जगत उसी आत्मा से अनुप्राणित हो जाएगा, हज़ारों लोग उनके उदाहरण पर चलने के लिए सब कुछ छोड़ देंगे, और जीवन का वचन लगभग हर भाषा में अनुवादित होगा और पृथ्वी के लगभग हर कोने में प्रचारित होगा?”
आधुनिक मिशनों के संस्थापक और पिता के रूप में विलियम केरी का चरित्र और जीवन-क्रम हर वर्ष उस प्रगति में, और अब तक उस पवित्रता में, प्रकट हो रहा है जिसके साथ कलीसिया और अंग्रेज़ी-भाषी जातियों का विस्तार संसार के उन दो-तिहाई भाग में हो रहा है जो अब भी मसीही जगत से बाहर है। केटरिंग के £13:2:6 उनकी मृत्यु से पहले £400,000 हो गए, और अब प्रतिवर्ष £5,000,000 हैं। वह एक अभिषिक्त अंग्रेज़ मिशनरी अब रिफ़ॉर्म्ड कलीसियाओं की 558 संस्थाओं द्वारा भेजे गए 20,000 पुरुषों और स्त्रियों का एक दल बन गया है। वे इक्के-दुक्के नए विश्वासी, जिनमें से हर एक का अपने लोगों, या देश, या पीढ़ी पर कोई प्रभाव न था, अब केवल भारत में ही 3,000,000 का, और मसीही जगत से बाहर के सब देशों में 5,000,000 का समुदाय बन गए हैं, जिनमें से 80,000 अपने ही देशवासियों के बीच मिशनरी हैं, और बहुत-से देशी समुदायों के अगुवे हैं। जब से शताब्दी के आरम्भ में बंगला नए नियम का पहला संस्करण प्रकट हुआ, तब से पवित्रशास्त्र की 250,000,000 प्रतियाँ छापी जा चुकी हैं, जिनमें से आधी संसार की 370 गैर-अंग्रेज़ी भाषाओं में हैं। मदनाबाटी की बंगला पाठशाला ने, और श्रीरामपुर के मसीही कॉलेज ने, ऐसी शैक्षिक शक्तियों को गति दी है जो राष्ट्रों को जन्म की ओर ला रही हैं, और मानवजाति की साँवली जातियों के दस लाख से अधिक लड़के-लड़कियों, युवकों और युवतियों को प्रतिदिन बाइबल की शिक्षा में से होकर ले जा रही हैं।
शैफ़्ट्सबरी के सातवें अर्ल ने, जो विलियम विल्बरफ़ोर्स के बाद उन्नीसवीं शताब्दी के सबसे महान और सबसे व्यावहारिक इवैंजेलिकल थे, अपनी डायरी में उस वर्ग के विषय में, जिसके अगुवे अठारहवीं शताब्दी में केरी थे, और जिसका स्मरण वर्ड्सवर्थ ने इन शब्दों में किया है—“सब बैठे-बैठे नहीं रहते, कुछ ऐसे हैं जो घूमते फिरते हैं बर्बर तटों पर जीवन के बीज बिखेरने को”—इस प्रकार लिखा: राइड, 30 अगस्त 1847।—“विलियम्स की ‘मिशनरी एंटरप्राइज़ेज़’ पढ़ रहा हूँ...उत्साह, भक्ति, आनन्द, हृदय की सरलता, विश्वास, प्रेम; और हम यहाँ इतना स्नेह भी मुश्किल से रखते हैं कि परमेश्वर को धन्यवाद दें कि ऐसे काम किए गए हैं। ‘भलाई करने’ और ‘अपनी पीढ़ी में उपयोगी होने’ की बात करते हैं, अरे, इन प्रशंसनीय पुरुषों ने एक महीने में उससे अधिक कर दिखाया जितना मैं या बहुत-से और लोग पूरे जीवन में करेंगे!”
वाक्पटु डॉ. रिचर्ड विंटर हैमिल्टन ने यह सोचते हुए कि वीरों को बलि सूर्यास्त के बाद ही अर्पित की जाती है, विलियम केरी की मृत्यु के आठ वर्ष बाद उनका स्मरण इस प्रकार किया कि वे “एक ऐसी शक्ति का प्रयोग करते थे जिसके आगे सब कठिनाइयाँ झुक गईं, परन्तु वह शक्ति प्रकृति के नियम के समान निःशब्द थी; कल्पना में भी उतने ही महान जितने कार्य में; उतने ही गहन जितने भाषा के वे गहरे संयोग जिनमें भारतीय दर्शन और बहुदेववाद अपने को छिपाते हैं, परन्तु उस फूल के समान कोमल जिसे अपने थोड़े-से विश्राम के समय वे उगाना पसन्द करते थे; ऋषि के समान भय-मिश्रित आदर जगानेवाले, बालक के समान सरल; पूर्वी संसार में शायद उतनी भाषाओं में बोलनेवाले जितनी ‘आग की सी फटती हुई जीभें’ दर्शाती थीं; जब तक गंगा बहती रहेगी, तब तक स्मरण किए जाने और धन्य कहे जाने योग्य!”
बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी के इतिहासकार ने, और रॉबर्ट हॉल ने, जिन्हें सर जेम्स मैकिन्टॉश ने सबसे महान अंग्रेज़ वक्ता घोषित किया था, दोनों ने केरी की प्रतिभा और प्रभाव का मूल्यांकन करने का प्रयत्न किया है। डॉ. एफ़. ए. कॉक्स कहते हैं:--“यदि वे सोलहवीं शताब्दी में जन्मे होते, तो वे यूरोप को प्रोटेस्टेंट मत देने के लिए एक लूथर हो सकते थे; यदि उन्होंने अपना विचार और अवलोकन केवल प्राकृतिक दर्शन की ओर लगाया होता, तो वे एक न्यूटन हो सकते थे; परन्तु उनकी शक्तियों ने, जो धर्म द्वारा एक और भी ऊँचे उद्देश्य के लिए समर्पित थीं, उन्हें पवित्रशास्त्र के अनुवादक और एशिया के उपकारक होने का उदात्त गौरव दिलाया है।” रॉबर्ट हॉल ने केरी के जीवन-काल में उनके विषय में इस प्रकार कहा:--“वह असाधारण मनुष्य, जो अत्यन्त निम्न अज्ञात दशा और गरीबी से, बिना किसी सहायता के, अथक परिश्रम के बल पर साहित्य के सर्वोच्च सम्मानों तक उठा, प्राच्य विद्या के अग्रणी विद्वानों में से एक, मिशनरियों में सबसे अग्रणी, और अपने समकालीनों के बीच इतने धार्मिक ज्ञान को फैलाने का साधन बना जितना धर्मसुधार के समय से किसी भी व्यक्ति के भाग्य में नहीं आया; एक ऐसा मनुष्य जो अत्यन्त गहन और विविध उपलब्धियों के साथ एक सुसमाचार-प्रचारक का उत्साह, एक संत की भक्ति, और एक बालक की सरलता को मिलाए हुए है।”
लंदन के चित्र और कलकत्ता की आवक्ष प्रतिमा को छोड़कर, कोई भी स्मारक—राष्ट्रीय, सार्वभौमिक या साम्प्रदायिक—केरी के काम को चिह्नित नहीं करता। इस बीच वह काम श्रीरामपुर के देशी लोगों के लिए बने कॉलेज में, लाल बाज़ार चैपल में, और कलकत्ता के गरीबों के लिए बनी बेनेवॉलेंट इंस्टिट्यूशन में, अत्यन्त उपयुक्त रूप से साकार है। इंग्लैण्ड की कलीसिया ने, जिसे उन्होंने जॉन वेस्ली के समान छोड़ दिया था, ब्रिस्टल के ई. एस. रॉबिन्सन, एस्क्वायर, को अनुमति दी है कि वे उनके जन्म-ग्राम के गिरजाघर के प्रवेश-मण्डप में, उस पत्थर के बगल में जो उन्होंने अपने पिता, पैरिश-क्लर्क एडमण्ड, की समाधि पर खड़ा किया था, पीतल पर एक अभिलेख लगाएँ:--“परमेश्वर की महिमा के लिए और मिशनरी तथा प्राच्यविद् डॉ. विलियम केरी की स्मृति में।”
न बैपटिस्ट और न ऐंग्लिकन होते हुए भी, वर्तमान जीवनी-लेखक उस देश के नाम पर, जो केरी के प्रेरितीय कार्य के पूरे इकतालीस वर्षों तक केरी और श्रीरामपुर के समर्थन में दृढ़ खड़ा रहा, यह अन्तिम प्रशस्ति जोड़ना चाहेगा, जो एडिनबरा के सेंट जॉर्ज फ़्री चर्च में उस मनुष्य के विषय में कही गई थी जिसने किसी भी और से बढ़कर और सबसे पहले, अंग्रेज़ी-भाषी जातियों द्वारा आधुनिक संसार के सभ्य बनाए जाने को एक मसीही शक्ति बना दिया।36 केरी, जो अपनी नम्रता में बालक के समान थे, सारी संत-गाथाओं में, चाहे प्रोटेस्टेंट हों या रोमन कैथोलिक, प्रभु की उस घोषणा का सबसे उल्लेखनीय उदाहरण हैं जो उसने बारहों से तब की थी जब उसने एक छोटे बालक को उनके बीच में खड़ा किया था, “जो कोई अपने आप को इस बालक के समान छोटा करेगा, वह स्वर्ग के राज्य में बड़ा होगा।” फिर भी हम, उनके हिन्दुस्तान में सुसमाचार लेकर जाने के लगभग एक शताब्दी बाद, साहस करके उन्हें वहाँ रख सकते हैं जहाँ भविष्य का कलीसिया-इतिहास उन्हें सम्भवतः रखेगा—मनुष्यों के उन बिना मुकुट के राजाओं के बीच जिन्होंने परमेश्वर के अधीन मसीही इंग्लैण्ड को वह बनाया है जो वह अपने लोगों के लिए और आधी मानवजाति के लिए है। ये हैं चॉसर, अंग्रेज़ी पद्य के पिता; विक्लिफ़, सब देशों में इवैंजेलिकल धर्मसुधार के पिता; हूकर, अंग्रेज़ी गद्य के पिता;
शेक्सपियर, अंग्रेज़ी साहित्य के पिता; मिल्टन, अंग्रेज़ी महाकाव्य के पिता; बनयन, अंग्रेज़ी रूपक-कथा के पिता; न्यूटन, अंग्रेज़ी विज्ञान के पिता; केरी, विदेशी मिशनों के द्वारा दूसरे धर्मसुधार के पिता।
