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बाइबल केरी का मिशनरी हथियार—देशी भाषाओं के अन्य अनुवादक—केरी द्वारा अपने परिश्रम का विनम्र किन्तु यथार्थ वर्णन—उनकी भाषा-वैज्ञानिक कुंजी—एक हिन्दू लोहार द्वारा टाइप की कटाई और ढलाई—पूर्व में कागज़ और भाप-इंजनों का पहला निर्माण—1808 के आरम्भ में केरी अनुवाद-कार्य का लेखा-जोखा लेते हैं—उनकी कार्यशाला में—बाइबल-अनुवादकों की एक पाठशाला—विलियम येट्स, मोची, बंगला बाइबल का कवरडेल—वेंगर—एक बंगाली लूथर की आवश्यकता—केरी की बंगला बाइबल—नया नियम कैसे छापा गया—पहली प्रति परमेश्वर को अर्पित—लॉर्ड स्पेन्सर और जॉर्ज तृतीय द्वारा ग्रन्थ का स्वागत—पहले संस्करण की स्वयं-प्रमाणित करनेवाली सामर्थ—उड़िया में बाइबल—मगधी, असमिया, खासी और मणिपुरी में—मराठी, कोंकणी और गुजराती संस्करण—हिन्दी और उसकी अनेक बोलियों में अनुवाद—द्रविड़ भाषाओं के अनुवाद—पश्तो बाइबल की कहानी—सिख और बाइबल—पहला बर्मी संस्करण और छापाखाना—ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी—1812 में मृत्युएँ, भूकम्प और आग—छापेखाने का विनाश—धुआँ उगलते खण्डहरों का टॉमसन द्वारा वर्णन—अपनी पाण्डुलिपियों के विषय में केरी की वीरता—भारत और मसीही जगत की उत्साहपूर्ण सहानुभूति—फ़ीनिक्स और उसके पंख।
संसार का प्रत्येक महान सुधार आरम्भ में किसी एक व्यक्ति का कार्य रहा है, जिसने—चाहे वह अपने युग की कितनी ही उपज क्यों न रहा हो—उस आन्दोलन की कल्पना की और उसे कार्यान्वित करना आरम्भ किया जो समाज का रूपान्तर कर देता है। यह बात इतिहास की नैतिक और भौतिक दोनों प्रकार की शक्तियों पर समान रूप से लागू होती है, उन समकालीनों पर भी जो चरित्र और उद्देश्यों में इतने विपरीत प्रतीत होते हैं जैसे एक ओर केरी और क्लार्कसन, और दूसरी ओर नेपोलियन और वेलिंग्टन। केरी अपने इस अडिग निश्चय में अकेले खड़े थे कि कलीसिया को संसार में सुसमाचार पहुँचाना ही चाहिए। उस साधन के विषय में भी वे उतने ही अनोखे थे जिस पर वे उस सुसमाचार-प्रचार की पहली अनिवार्य शर्त के रूप में ज़ोर देते थे—अर्थात् बाइबल का देशी भाषाओं में अनुवाद। जब वे अभी अठारह वर्ष के एक मज़दूर मोची ही थे, तभी केवल पवित्रशास्त्र से “उन्होंने अपनी विचार-पद्धति बना ली थी,” और वे दिव्य मिशनरी विचार से भर गए थे। यह 1780 में पहली बाइबल सोसाइटी के गठन से, जो सैनिकों और नाविकों में अंग्रेज़ी बाइबल बाँटने के लिए बनी थी, एक वर्ष पहले की बात है; और उस समय से चौथाई शताब्दी पहले की, जब स्वयं उनकी सफलता के परिणामस्वरूप 1804 में ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी का गठन हुआ। अपनी युवावस्था से, जब उन्होंने बाइबल की स्वयं-प्रमाणित करनेवाली सामर्थ को पहचाना, केरी का अटूट नियम था कि वे हर सुबह का आरम्भ बाइबल का एक अध्याय पढ़कर करते थे—पहले अंग्रेज़ी में, और फिर उन सब भाषाओं में से प्रत्येक में जो उन्होंने स्वयं सीखी थीं और जिनकी संख्या शीघ्र ही छः हो गई।
इसलिए 1793 में, जब उन्होंने बंगला सीखी, उसी समय से भारत और पूर्वी एशिया की सब भाषाओं और प्रमुख बोलियों में बाइबल का अनुवाद ही वह कार्य था जिसमें केरी ने, अन्य सब कार्यों से बढ़कर, अपने आप को लगा दिया। उन्होंने प्रचार किया, उन्होंने शिक्षा दी, उन्होंने उस समय के हर उचित और सम्भव रूप में, और अपने स्वामी के मिशनरी आदेश के पूर्णतम अर्थ में, “चेले बनाए।” परन्तु सबसे अधिक आवश्यक और स्थायी महत्त्व का एक रूप—वह शर्त जिसके बिना न सच्चा विश्वास, न सच्चा विज्ञान, न सच्ची सभ्यता उस संकीर्ण दायरे के बाहर, जहाँ तक एक अकेले प्रचारक की आवाज़ पहुँच सकती है, टिक सकती थी या फैलाई जा सकती थी—यह था कि दिव्य सन्देश को एशिया के करोड़ों पुरुषों और स्त्रियों, लड़कों और लड़कियों की मातृभाषाओं में, और उनके अगुवों और पुरोहितों की विद्वत्-भाषाओं में भी प्रकाशित किया जाए। विक्लिफ़ ने सबसे पहले यह कार्य सब युगों की अंग्रेज़ी पढ़नेवाली जातियों के लिए, लातीनी से अनुवाद करके, किया था, और इस प्रकार न केवल ब्रिटेन में वरन् पश्चिमी मसीही जगत में धार्मिक और राजनीतिक धर्मसुधार का आरम्भ किया था। इरैस्मस और लूथर उनके पीछे चले—पहले ने अपने यूनानी और लातीनी नये नियम में, और “स्त्रियों और मोचियों, गँवारों, कारीगरों, और तुर्कों तक” के लिए लिखी वचन की अपनी व्याख्यात्मक टीका में; दूसरे ने इरैस्मस के संस्करण के अपने महान देशी-भाषा अनुवाद में—उन्हीं इरैस्मस के, जो अपने समकालीनों से पवित्रशास्त्र का “सब भाषाओं में” अनुवाद करने का आग्रह करते कभी नहीं थके। टिंडेल ने सबसे पहले इंग्लैंड को इब्रानी और यूनानी से बाइबल दी थी। और अब इन्हीं मोचियों में से एक को उस आत्मा ने, जो पवित्रशास्त्र में निहित सत्य का रचयिता है, प्रेरित और समर्थ किया कि वह दक्षिण और पूर्वी एशिया को वे पवित्र पुस्तकें दे जिन्हें एशिया के ही सीरियाई पुत्रों ने, मूसा और एज्रा से लेकर पौलुस और यूहन्ना तक, सब जातियों और सब युगों के लिए प्रेरणा पाकर लिखा था। निश्चय ही केरी और उनके बाद के सहकर्मी ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी के उन शब्दों के योग्य हैं जो उसने 1827 में, अनुवाद-कार्य के लिए श्रीरामपुर को धन का अन्तिम अनुदान देते समय कहे थे—“आनेवाली पीढ़ियाँ उन पर अंग्रेज़ी बाइबल के अनुवादकों के ये शब्द लागू करेंगी—‘इसलिए धन्य हैं वे, और अति सम्मानित हों उनके नाम, जो उस कार्य में बर्फ़ तोड़ते और आगे बढ़कर पहल करते हैं जिसने लोगों को प्राणों के उद्धार की ओर आगे बढ़ाया। और इसके लिए इससे बढ़कर उपयोगी क्या हो सकता है कि परमेश्वर की पुस्तक परमेश्वर के लोगों को ऐसी भाषा में सौंपी जाए जिसे वे समझते हैं?’” दूसरे कामों में लगे होने पर केरी व्यवधान सह लेते थे, परन्तु चालीस वर्ष तक उन्होंने किसी भी बात को बाइबल-कार्य के लिए निर्धारित समय को घटाने नहीं दिया। “महोदया,” उन्होंने 1797 में एक महिला को—जैसे अनेक अन्य पत्र-व्यवहारियों को—लिखा, “आप मेरी संक्षिप्तता को क्षमा करेंगी जब मैं आपको बताऊँ कि पत्र लिखने का मेरा सारा समय पवित्रशास्त्र को बंगला भाषा में उतारने के कार्य से चुराया जाता है।”
केवल विनम्रता के कारण नहीं, वरन् पिछली शताब्दी के आरम्भ में विद्वत्ता और समालोचना की स्थिति के सटीक आकलन के आधार पर, केरी सदा इस बात पर ज़ोर देते थे कि वे एक अग्रदूत मात्र हैं, जो येट्स, वेंगर और राउज़ जैसे उत्तराधिकारियों के लिए मार्ग खोल रहे हैं, और इन उत्तराधिकारियों का स्थान भी, अपनी बारी में, भारत की कलीसिया में पूर्णतः देशी टिंडेल और लूथर लेंगे। उन्होंने एक से अधिक बार इस चर्चा को अनुचित ठहराया कि उन्होंने बाइबल का चालीस भाषाओं और बोलियों में अनुवाद किया है।16 जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन-सा कार्य उन्होंने अपने हाथ से किया, कौन-सा उनके सहकर्मियों ने पूरा किया, सहकर्मियों और पण्डितों दोनों के कार्य में से कौन-सा उन्होंने संशोधित और सम्पादित किया, और कौन-सा उन्होंने दूसरों के लिए वार्ड की देखरेख में श्रीरामपुर छापेखाने में सुधारकर छापा। चालीस अनुवादों सम्बन्धी दावा ठीक-ठीक इन्हीं चार प्रकार के कार्यों पर लागू होता है, जो उन्हीं में केन्द्रित थे, जैसे कि उनमें से अधिकांश मूल रूप से उन्हीं की कल्पना और समर्थन से आरम्भ भी हुए थे। बंगला, हिन्दी, मराठी और संस्कृत अनुवाद उनके अपने थे। इसी प्रकार चीनी अनुवाद मार्शमैन का कार्य था। हिन्दी के संस्करणों का, उसकी अनेक बोलियों में, और उड़िया संस्करण का प्रारूप उनके सहकर्मियों और पण्डितों ने तैयार किया। हिन्दुस्तानी, फ़ारसी, मलय, तमिल और अन्य संस्करणों को—चाहे वे सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के हों या उसके अंशों के—उन्होंने अपनी देखरेख में छपवाया। वे रात-दिन इसी प्रयत्न में लगे रहे कि किसी भी प्रकार, प्रेममय उदारता के साथ, परमेश्वर का वचन करोड़ों लोगों को दिया जा सके।
1904 में ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी की शताब्दी पर लिखते हुए, भारतीय भाषा सर्वेक्षण के प्रमुख श्री जॉर्ज ए. ग्रियर्सन, सी.आई.ई., पीएच.डी., डी.लिट्., केरी और उनके सहायकों के कार्य का प्रामाणिक सार इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं: “श्रीरामपुर के मिशनरियों के उस उदार-हृदय दल ने चालीस से अधिक भाषाओं में बाइबल या नये नियम के अनुवाद प्रकाशित किए। उनसे पहले भारत की बोलियों में बाइबल के प्रोटेस्टेंट संस्करणों की संख्या एक हाथ की उँगलियों पर गिनी जा सकती थी। सीलोन के डच लोगों ने 1688 में एक तमिल नये नियम का कार्य हाथ में लिया, जिसके बाद 1715 में ज़ीगेनबाल्ग की लेखनी से एक और संस्करण निकला। प्रसिद्ध मिशनरी शुल्त्ज़ ने 1727 और 1732 के बीच एक तेलुगु संस्करण तैयार किया जो कभी छपा नहीं, और बाद में, 1745 और 1758 के बीच, उन्होंने हाले में नये नियम का और उत्पत्ति के एक अंश का हिन्दुस्तानी अनुवाद प्रकाशित किया। 1791 में थॉमस ने बंगला में बाइबल के कुछ अंशों का एक हस्तलिखित संस्करण तैयार किया; और फिर 1801 में प्रकाशित केरी के बंगला नये नियम के साथ श्रीरामपुर की महान श्रृंखला आरम्भ हुई। यह सच है कि श्रीरामपुर के इनमें से अधिकांश संस्करण पहले प्रयास थे और उनका स्थान अधिक शुद्ध संस्करणों ने ले लिया है, परन्तु पहला कदम सदा सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, और वह कदम केरी और उनके भाइयों ने उठाया।”
इस विषय में और शुद्ध विद्वत्तापूर्ण विषयों में केरी के पत्र-व्यवहारी डॉ. राइलैंड थे, जो ब्रिस्टल कॉलेज के प्रमुख और उस समय के हिसाब से एक निपुण इब्रानी-विद्वान तथा बाइबल-समालोचक थे। केरी के पत्र, जिनमें इब्रानी और यूनानी शब्द भरपूर बिखरे हुए हैं, दिखाते हैं कि वे दिव्य सन्देश को सटीक रूप में पहुँचाने के लिए कितनी सजग सावधानी से प्रयत्न करते थे, और किस अथक उत्तरदायित्व-भावना के अधीन कार्य करते थे। बाइबल-समालोचना, चाहे वह मूल पाठ के विषय में हो या पवित्र लेखों की व्याख्या के विषय में, इतना नया विज्ञान है कि अब इन पत्रों में केवल ऐतिहासिक रुचि रह गई है। परन्तु राइलैंड को भेजा गया यह पत्र दिखाता है कि वे आरम्भ से ही किस प्रकार कार्य करते थे:—
“कलकत्ता, 14 दिसम्बर 1803।—कुछ समय पहले हमने एक ऐसा कार्य हाथ में लिया था जिसके विषय में हमारा विचार था कि जब तक वह पूरा न हो जाए, कुछ न कहें; परन्तु एक अप्रत्याशित ईश्वरीय विधान ने उसे प्रकट करना हमारे लिए आवश्यक कर दिया। वह इस प्रकार है: लगभग डेढ़ वर्ष पहले श्री गिलक्रिस्ट को पवित्रशास्त्र के हिन्दुस्तानी भाषा में अनुवाद के कार्य में लगाने के कुछ प्रयत्न किए गए थे। किसी न किसी कारण से वह बात टल गई। उसी समय फ़ारसी की भी बहुत चर्चा हुई, परन्तु वह छोड़ दी गई, या यों कहें कि उसे हाथ में ही नहीं लिया गया। उस समय कई बातों ने हमें प्रेरित किया कि हम चुपचाप इन भाषाओं में अनुवाद करने में लग जाएँ। तदनुसार हमने इसमें सहायता के लिए दो मुंशी रखे, और हम में से प्रत्येक ने अपना-अपना भाग ले लिया;
भाई मार्शमैन ने मत्ती और लूका लिए; भाई वार्ड ने मरकुस और यूहन्ना; और मैंने नये नियम का शेष भाग हिन्दुस्तानी में करने के लिए लिया। फ़ारसी का कोई भाग मैंने नहीं लिया; परन्तु उसके बदले मैं उसका अनुवाद महाराष्ट्र भाषा में, जिसे साधारणतः मराठी भाषा कहते हैं, करने में लग गया, क्योंकि जो व्यक्ति हिन्दुस्तानी में मेरी सहायता करता है वह एक मराठा है। भाई मार्शमैन ने मत्ती पूरा कर लिया है, और लूका के बदले प्रेरितों के काम आरम्भ किया है। भाई वार्ड ने यूहन्ना का कुछ भाग किया है, और मैंने पत्रियाँ और प्रकाशितवाक्य के लगभग छः अध्याय कर लिए हैं; और संशोधन में मैं कुरिन्थियों की दूसरी पत्री तक पहुँच गया हूँ: उन्होंने फ़ारसी में कुछ अध्याय किए हैं, और मैंने मराठी में कुछ। बात यहीं तक पहुँची थी कि कुछ दिन पहले श्री बुकानन ने मुझे बताया कि एक सैनिक अधिकारी सज्जन ने सुसमाचारों का हिन्दुस्तानी और फ़ारसी में अनुवाद किया है और उन्हें कॉलेज को भेंट कर दिया है, और कॉलेज की परिषद् ने उन्हें छापने का निर्णय किया है। इस कारण मेरे लिए यह बताना आवश्यक हो गया कि हम क्या कर रहे थे; और यदि यह परिस्थिति न होती तो हम तब तक कुछ न कहते जब तक नये नियम की छपाई कम से कम काफ़ी आगे न बढ़ जाती। मुझे बहुत प्रसन्नता है कि मेजर कोलब्रुक ने यह कार्य किया है। जो दूसरे नहीं करते, वह हम सहर्ष करेंगे, और जो कोई भी इस दिशा में कुछ करता है, उसकी शीघ्र सफलता की कामना करते हैं। यदि हमारे साधन पर्याप्त हों, तो लगभग पन्द्रह वर्ष के भीतर परमेश्वर के वचन को पूर्व की सब भाषाओं में अनुवादित और मुद्रित करवा देना हमारे वश में है। हमारी स्थिति ऐसी है कि हमें विभिन्न देशों के निवासियों से उत्तम सहायता मिल सकती है। हम सब भिन्न-भिन्न लिपियों के टाइप यहीं ढलवा सकते हैं; और लगभग 700 रुपये प्रति मास—जिसका कुछ भाग, मुझे आशा है, हम स्वयं जुटा सकेंगे—इस कार्य को पूरा कर देंगे। वे भाषाएँ ये हैं: हिन्दुस्तानी (हिन्दी), महाराष्ट्र, उड़िया, तेलिंगा, भोटान, बर्मी, चीनी, कोचीन-चीनी, तोंकिनी और मलय। इस महान कार्य पर हमने अपनी दृष्टि लगा रखी है। परमेश्वर हमें इसे, या इसके किसी बड़े भाग को, पूरा करने में समर्थ करेगा या नहीं, यह अनिश्चित है।”
परन्तु ये सब सुविधाएँ—भाषाओं के लिए उनकी अपनी प्रतिभा, दिव्य प्रेरणा से संचालित उनका अजेय अथक परिश्रम, उनके सहकर्मियों का सहयोग, विद्वत् संस्थाओं और जनता का प्रोत्साहन, और फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के कारण बढ़ी हुई पण्डितों और मुंशियों की संख्या—पवित्रशास्त्र के लिए पूर्व का द्वार खोलने में असफल रहतीं, यदि संस्कृत की भाषा-वैज्ञानिक कुंजी न होती या खोजी न गई होती। अपने संस्कृत व्याकरण की भूमिका में, जिसे क्वार्टरली रिव्यू ने बड़ी प्रशंसा के साथ उद्धृत किया, केरी ने लिखा कि इससे उन्हें भारत की सम्पूर्ण जनता की प्रमुख भाषाओं के प्रत्येक पाँच में से चार शब्दों का अर्थ मिल गया:—“इनमें से किसी भी एक भाषा का विशिष्ट व्याकरण एक-दो महीने में सीखा जा सकता है, और तब वह भाषा विद्यार्थी के सामने खुल जाती है। पाँच में से चार शब्दों का ज्ञान उसे आनन्द के साथ पढ़ने योग्य बना देता है, और थोड़े-से नए शब्दों तथा मुहावरेदार अभिव्यक्तियों को सीखना परिश्रम के बजाय आनन्द का विषय बना देता है। इस प्रकार उड़िया, यद्यपि उसका व्याकरण और लिपि अलग है, अभिव्यक्ति में ही बंगला से इतनी मिलती-जुलती है कि एक बंगाली पण्डित उड़ीसा के प्रूफ़-पत्र को सुधारने में लगभग समर्थ होता है; और जब मैंने पहली बार गुजराती का एक पृष्ठ पढ़ा तो उसका अर्थ इतना स्पष्ट प्रतीत हुआ कि पण्डित से प्रश्न पूछना अनावश्यक हो गया।”
टाइप, कागज़ और छपाई का यान्त्रिक साधन भी उसी ईश्वरीय पूर्वदृष्टि से प्रदान किया गया प्रतीत होता है जिससे बौद्धिक और आत्मिक साधन प्रदान किए गए थे। हम देख चुके हैं कि जब केरी अपने अनुवाद में काफ़ी आगे बढ़ चुके थे, तब दिनाजपुर के दलदलों के बीच से उन्होंने छापाखाने, टाइप, कागज़ और मुद्रक के लिए इंग्लैंड की ओर दृष्टि लगाई। इनमें से अन्तिम—विलियम वार्ड—उन्हें मिल गए, जो उनके अपने चुने हुए व्यक्ति और उनके सहकर्मी होने के योग्य थे। परन्तु अपना पत्र भेजते ही उन्होंने बाकी सब कुछ स्वयं बंगाल में ही पा लिया या बना लिया। कलकत्ता में खरीदे गए, मदनाबाटी में लगाए गए और श्रीरामपुर ले जाए गए उसी पुराने छापेखाने से बंगला नये नियम का पहला संस्करण छापा गया। उसकी गिनी-चुनी दुर्लभ और आदरणीय प्रतियों में अब ग्रन्थ-विज्ञान की दृष्टि से विशेष रुचि है; टाइप और कागज़ दोनों ही मोटे और धुँधले हैं।
भारत के कैक्सटन, सर चार्ल्स विल्किन्स ने अपने हाथों से वे ठप्पे काटे और टाइप ढाले थे जिनसे हालहेड का बंगला व्याकरण 1778 में हुगली में छापा गया था। उन्होंने यह कला एक देशी लोहार, पंचानन, को सिखाई, जो काम की खोज में श्रीरामपुर ठीक उसी समय पहुँचा जब केरी अपने संस्कृत व्याकरण के लिए पवित्र देवनागरी टाइप के एक फ़ाउंट के लिए, और बंगला के अतिरिक्त उन अन्य भाषाओं के फ़ाउंटों के लिए जो पहले कभी छापी नहीं गई थीं, निराश हो रहे थे। 1807 में प्रकाशित “अनुवादों सम्बन्धी स्मृति-पत्र” में वे यह कथा इस प्रकार बताते हैं:—
“यह स्पष्ट होगा कि भारत में वर्तमान परिस्थिति में अनेक दशाओं में इनमें से कई भाषाओं में टाइप के नए फ़ाउंट ढालना आवश्यक था। हमारे लिए और सम्पूर्ण भारत के लिए यह सौभाग्य की बात है कि इस क्षेत्र में विल्किन्स ने मार्ग दिखाया था; और सामग्री तथा कारीगरों के सम्बन्ध में बड़ी से बड़ी कठिनाइयों के बीच, ऐसे अध्यवसायपूर्ण परिश्रम से, जिसका मूल्य आँकना कठिन है, उन्होंने बंगला टाइप को पूर्णता की उच्च श्रेणी तक पहुँचा दिया था। श्रीरामपुर में हमारे बसने के शीघ्र बाद, परमेश्वर का विधान ठीक उसी कारीगर को हमारे पास ले आया जिसने उस कार्य में विल्किन्स के साथ काम किया था, और बहुत हद तक उनके विचारों को आत्मसात् कर लिया था। उसकी सहायता से हमने एक टाइप-ढलाईघर स्थापित किया; और यद्यपि अब उसकी मृत्यु हो चुकी है, तो भी उसने अपनी कला कई दूसरे लोगों को इतनी पूरी तरह सिखा दी थी कि वे टाइप ढालने का, और यहाँ तक कि मैट्रिक्स (साँचे) काटने का कार्य भी ऐसी सटीकता से आगे बढ़ाते हैं जिससे यूरोपीय कारीगरों की भी प्रतिष्ठा कम न होती। इन्होंने हमारे लिए बंगला के दो-तीन फ़ाउंट ढाले हैं; और अब हम उन्हें एक ऐसी बनावट का फ़ाउंट ढालने में लगा रहे हैं जिससे पूरी आशा है कि लिपि की पठनीयता पर प्रभाव डाले बिना कागज़ का खर्च और पुस्तक का आकार कम से कम एक-चौथाई घट जाएगा। देवनागरी लिपि का भी हमने एक पूरा नया फ़ाउंट ढाला है, जो भारत में अपनी तरह का सबसे सुन्दर माना जाता है।
इसमें अक्षरों के लगभग 1000 भिन्न-भिन्न संयोग हैं, इस कारण केवल नमूने काटने का खर्च ही, धातु और ढलाई को छोड़कर, 1500 रुपये हुआ।
“उड़िया में भी हमें टाइप का एक नया फ़ाउंट ढालने को विवश होना पड़ा है, क्योंकि उस लिपि में पहले कोई फ़ाउंट था ही नहीं। इस फ़ाउंट में लगभग 300 अलग-अलग संयोग हैं, और काटने और ढालने का कुल खर्च कम से कम 1000 रुपये हुआ है। यह लिपि, यद्यपि स्पष्ट है, मध्यम आकार की है, और सम्पूर्ण नया नियम लगभग 700 अठपेजी पृष्ठों में आ जाएगा, जो बंगला से लगभग एक-चौथाई कम है। यद्यपि मराठा प्रदेश में शिक्षित लोग देवनागरी लिपि से भली-भाँति परिचित हैं, तो भी व्यापारी वर्ग में एक ऐसी लिपि प्रचलित है जो कहीं छोटी है और आकार में नागरी से काफ़ी भिन्न है, यद्यपि अक्षरों की संख्या और उनके ध्वनि-मान लगभग एक-से हैं। हमने इस लिपि में एक फ़ाउंट ढाला है, जिसमें हमने मराठी नया नियम और साथ ही एक मराठी शब्दकोश छापना आरम्भ कर दिया है। यह लिपि मध्यम आकार की, स्पष्ट और सुन्दर है। इसमें नया नियम शायद उड़िया से भी कम पृष्ठों में आ जाएगा। ढलाई आदि का खर्च लगभग उतना ही हुआ है। हमें तीन और फ़ाउंटों की आवश्यकता है; एक बर्मी में, दूसरा तेलिंगा और कर्नाटा में, और तीसरा सिखों की लिपि में। ये, चीनी अक्षरों के साथ, हमें यह कार्य पूरा करने में समर्थ करेंगे। प्रिय भाइयो, फ़ारसी का एक उत्तम और विस्तृत फ़ाउंट हमें पिछले वर्ष आपसे प्राप्त हुआ।”
पंचानन का शागिर्द, मनोहर, चालीस वर्ष से अधिक समय तक मिशन के लिए और दूसरों को बेचने के लिए सब पूर्वी भाषाओं में टाइप के सुरुचिपूर्ण फ़ाउंट बनाता रहा, और इस प्रकार वह न केवल साहित्य का वरन् मसीही सभ्यता का भी इतना बड़ा उपकारी बना जिसका उसे स्वयं भान न था, क्योंकि वह लोहार जाति का हिन्दू ही बना रहा।
1839 में, जब वे एक युवा मिशनरी के रूप में पहली बार भारत गए, रेवरेंड जेम्स केनेडी17 ने उसे—जैसे वर्तमान लेखक ने उसके बाद अक्सर उसके उत्तराधिकारी को देखा है—बाइबलों के लिए मैट्रिक्स काटते या टाइप ढालते देखा, जबकि वह अपनी प्रिय मूर्ति के नीचे उकड़ूँ बैठा रहता था, क्योंकि वह केवल उसी के संरक्षण में काम करता था। 1860 तक श्रीरामपुर पूर्व का प्रमुख प्राच्य टाइप-ढलाईघर बना रहा।18 समय के साथ मिशन ने कागज़ के निर्माण में भी लगभग उतनी ही बड़ी सेवा की, और श्रीरामपुर का नाम कागज़ की एक ऐसी किस्म को दे दिया जो सारे भारत में जानी जाती है। आरम्भ में केरी को अपना बंगला नया नियम एक मटमैले, छिद्रयुक्त, खुरदरे पदार्थ पर छापना पड़ा जिसे पटना कागज़ कहते थे। फिर वे इंग्लैंड से आनेवाली आपूर्ति पर निर्भर रहने लगे, जो उन दिनों अनियमित समयों पर छापेखाने तक पहुँचती थी, जिससे अक्सर काम में बाधा पड़ती थी, और जो अत्यन्त महँगी थी। इतना ही नहीं। देशी कागज़, चाहे मिल का बना हो या हाथ का, चावल की लेई से माँड़ा जाता था, इसलिए वह किताबी कीड़ों और दीमक को आकर्षित करता था, यहाँ तक कि जो ग्रन्थ छापेखाने में देर तक पड़ा रहता, उसके पहले पन्ने कभी-कभी अन्तिम पन्ने छपने से पहले ही इन कीड़ों द्वारा चट कर लिए जाते थे। केरी अपनी सबसे मूल्यवान पाण्डुलिपियों को संखिया-मिश्रित कागज़ पर लिखकर सुरक्षित रखते थे, जो भद्दे पीले रंग का हो जाता था; तो भी केवल इसी के कारण बाइबल-अनुवाद कार्य के लिए तैयार किए गए उनके बहुभाषी शब्दकोश के पाँच विशाल खण्ड श्रीरामपुर कॉलेज के पुस्तकालय में सुरक्षित रह पाए हैं। कागज़ की कठिनाई को हल करने के लिए मिशनरियों ने अनेक और लम्बे प्रयोग किए, जिनका अन्त पैरों से चलाई जानेवाली एक चक्की के निर्माण में हुआ, जिस पर चालीस देशी लोगों की बारी-बारी से काम करनेवाली टोलियाँ कागज़-यन्त्र में कच्चे माल को पीसती थीं, जब तक कि उनमें से एक दुर्घटना में मारा न गया।
श्री विलियम जोन्स के उद्यम ने, जिन्होंने सबसे पहले रानीगंज कोयला-क्षेत्र में खनन किया, भाप-इंजन के प्रयोग के रूप में इसका उपाय सुझाया। बोल्टन के मेसर्स थ्वेट्स एंड रॉथवेल से बारह अश्वशक्ति का एक इंजन मँगाया गया। यह भारत में लगाया गया सबसे पहला भाप-इंजन था, और यह पूर्णतः एक मिशनरी इंजन था। “आग की मशीन,” जैसा वे उसे कहते थे, देशी लोगों की भीड़ों को मिशन में खींच लाई, जिनकी जिज्ञासा ने उसे चलाने के लिए बाहर से बुलाए गए इंजन-चालक के धैर्य की परीक्षा ली; जबकि बहुत-से यूरोपीय, जिन्होंने भाप से चलनेवाली मशीनें कभी नहीं देखी थीं, उसका अध्ययन करने और उसकी नकल करने आए। वह तारीख 27 मार्च 1820 थी, जब “इंजन आज वास्तव में चल पड़ा।” उस समय से 1865 तक श्रीरामपुर, आयातित और पूर्णतः देशी हाथ के बने कागज़ से भिन्न, स्थानीय कागज़ की आपूर्ति का एकमात्र स्रोत बना रहा। यहाँ तक कि 1857 के विद्रोह में कुख्यात हुए कारतूस भी इसी कारखाने के थे, यद्यपि तब तक मिशन से उसका सम्बन्ध बहुत पहले समाप्त हो चुका था।
डॉ. केरी ने डॉ. राइलैंड को लिखे एक पत्र में अनुवाद-उद्यम का लेखा-जोखा इस प्रकार लिया:—
“22 जनवरी 1808।—पिछला वर्ष उन सबसे महत्त्वपूर्ण वर्षों में गिना जा सकता है जो इस मिशन ने देखे हैं—देशी लोगों में से मसीही बननेवालों की संख्या के कारण नहीं, क्योंकि वे पिछले कुछ वर्षों की अपेक्षा कम रहे हैं, वरन् उस अनुग्रहपूर्ण देखभाल के कारण जो परमेश्वर ने हमारे प्रति दिखाई है। हमें कई भाषाओं में परमेश्वर के वचन का अनुवाद और मुद्रण जारी रखने की सामर्थ दी गई है। छपाई अब छः भाषाओं में चल रही है और अनुवाद छः और भाषाओं में। बंगला पूरी छप चुकी है, केवल न्यायियों 7 से एस्तेर के अन्त तक को छोड़कर; संस्कृत नया नियम प्रेरितों के काम 27 तक; उड़िया यूहन्ना 21 तक; मराठी, दूसरा संस्करण, मत्ती के अन्त तक; हिन्दुस्तानी (नया संस्करण) मरकुस 5 तक; और गुजराती में मत्ती आरम्भ हो गया है। चीनी, तेलिंगा, कुरनाटा और सिखों की भाषा में अनुवाद लगभग यूहन्ना के अन्त तक पहुँच गया है। फ़ारसी में यह काफ़ी आगे तक पहुँच गया है और बर्मी में आरम्भ हो गया है। सम्पूर्ण बाइबल कुछ वर्ष पहले बटाविया में मलय भाषा में छपी थी। सम्पूर्ण बाइबल तमिल में छप चुकी है, और त्रावणकोर के सीरियाई बिशप अब सीरियाई भाषा से मलयालम में एक अनुवाद का निरीक्षण कर रहे हैं। इस सप्ताह मुझे पता चला कि कश्मीर की भाषा एक अलग भाषा है।
“आज मैं उस सबसे विद्वान हिन्दू से मिलने गया जो इस समय जीवित हैं; वे केवल संस्कृत बोलते हैं, अस्सी वर्ष से अधिक आयु के हैं, उनके सब दर्शन-सम्प्रदायों (जिन्हें साधारणतः वेद के दर्शन कहा जाता है) के ग्रन्थों से परिचित हैं और उनके विचारों का अध्ययन कर चुके हैं। वे मुझे बताते हैं कि यह सोलहवीं बार है जब उन्होंने रामेश्वरम से हरहु तक (अर्थात् प्रायद्वीप के अन्तिम अन्तरीप से बनारस तक) यात्रा की है। वे कहते हैं कि जब अंग्रेज़ों ने पहली बार मद्रास पर अधिकार किया, तब वे मद्रास के निकट थे। इन सज्जन ने स्त्रियों को जलाने के विरोध में अपनी सम्मति दी है।”
चार वर्ष बाद, राइलैंड को लिखे एक अन्य पत्र में, वे हमें और अधिक पूरी तरह अपने विश्वास में लेते हैं, और हमें न केवल अपनी कार्यशाला दिखाते हैं, वरन् निष्कपट भाव से अपनी विनम्रता और अपना पवित्र आत्म-बलिदान भी प्रकट करते हैं:—“10 दिसम्बर 1811।—इधर मेरे मन पर इस बात के अत्यधिक महत्त्व की गहरी छाप पड़ी है कि पूर्व में बाइबल-समालोचना की नींव डाली जाए—उन विभिन्न भाषाओं के व्याकरण तैयार करके जिनमें हमने बाइबल का अनुवाद किया है या कर सकते हैं। ऐसे किसी कदम के बिना, जो हमारे बाद आएँगे उन्हें केवल उसी भूमि पर खड़े होने के लिए, जिस पर मैं अब खड़ा हूँ, उसी परिश्रम में से होकर गुज़रना पड़ेगा जिसमें से मैं गुज़रा हूँ। परन्तु यदि प्रारम्भिक पुस्तकें उपलब्ध करा दी जाएँ, तो परिश्रम बहुत घट जाएगा; और कोई भी व्यक्ति थोड़े ही समय में वह प्राप्त कर सकेगा जिसके लिए मुझे वर्षों का अध्ययन और कठोर परिश्रम करना पड़ा है।
“इतनी अधिक भाषाएँ सीखने की जो आवश्यकता मुझ पर है, वह मुझे विवश करती है कि मैं उनमें से प्रत्येक के व्याकरण का अध्ययन करूँ और उसे लिख डालूँ, और उनकी अनियमितताओं और विशेषताओं पर बारीकी से ध्यान दूँ। इसलिए मैं उनमें से तीन के व्याकरण पहले ही प्रकाशित कर चुका हूँ; अर्थात् संस्कृत, बंगला और मराठी। इनमें मैंने तेलिंगा, कुरनाटा, उड़िया, पंजाबी, कश्मीरी, गुजराती, नेपाली और असमिया भाषाओं के व्याकरण जोड़ने का निश्चय किया है। इनमें से दो अब छप रहे हैं, और मुझे आशा है कि अगले वर्ष के अन्त तक इनमें से दो-तीन और निकाल दूँगा।
“यह न केवल उस प्रकार उपयोगी हो सकता है जैसा मैंने बताया है, वरन् उस प्रश्न का उत्तर देने में भी सहायक हो सकता है जो एक से अधिक बार दोहराया गया है, ‘ये लोग इतनी अधिक भाषाओं में अनुवाद कैसे कर सकते हैं?’ बहुत कम लोग जानते हैं कि क्या कुछ किया जा सकता है, जब तक वे प्रयत्न न करें, और जो कुछ हाथ में लें उसमें लगे न रहें।
“अब मैं बंगला का एक शब्दकोश छाप रहा हूँ, जो काफ़ी बड़ा होगा, क्योंकि मैं चौपेजी आकार के पृष्ठ 256 तक पहुँच गया हूँ, और अभी पहले अक्षर के भी अन्त के निकट नहीं हूँ। तो भी, उस अक्षर से किन्हीं भी दो अन्य अक्षरों की अपेक्षा अधिक शब्द आरम्भ होते हैं।
“अनुवादों की क्रमिक पूर्णता सुनिश्चित करने के लिए, मेरे मन में ‘संस्कृत से उत्पन्न प्राच्य भाषाओं का एक सार्वभौमिक शब्दकोश’ भी है, और वास्तव में मैं बहुत समय से उसके लिए सामग्री एकत्र करता रहा हूँ। मेरा विचार है कि आधार के रूप में निस्सन्देह संस्कृत को लूँ, और जॉन्सन की रीति पर प्रत्येक शब्द के विभिन्न अर्थ, उनके प्रयोग के उदाहरणों सहित, दूँ, और फिर संस्कृत से उत्पन्न विभिन्न भाषाओं में उसके पर्यायवाची शब्द, उनके समकक्ष इब्रानी और यूनानी शब्दों सहित, दूँ; सदा संस्कृत शब्द से निकले शब्द को पहले रखूँ, और फिर उन शब्दों को जो अन्य स्रोतों से निकले हैं। मेरा इरादा है कि संस्कृत शब्द की व्युत्पत्ति सदा दूँ, जिससे सजातीय भाषाओं में उससे निकले शब्दों की व्युत्पत्ति स्वतः स्पष्ट हो जाए। यह कार्य बड़ा होगा, और सन्देह है कि मैं इसे पूरा करने तक जीवित रहूँगा; परन्तु मेरा विचार है कि जैसे ही मेरा बंगला शब्दकोश पूरा हो जाए, मैं उस सामग्री को व्यवस्थित करना आरम्भ कर दूँ जो मैं कुछ वर्षों से इस प्रयोजन के लिए एकत्र करता रहा हूँ। यदि मैं इसे, और हाथ में लिए हुए अनुवादों को, पूरा करने तक जीवित रहा, तो मैं समझता हूँ कि तब मैं कह सकूँगा, ‘हे स्वामी, अब तू अपने दास को शान्ति से विदा करता है।’”
उस उत्साही विद्वान के सामने इस आनन्ददायक कार्य में अभी तेईस वर्ष का परिश्रम शेष था। परन्तु यह बात वे नहीं जानते थे, जबकि प्रत्येक वर्ष परिश्रम बढ़ता जाता था, और यह आशंका भी बढ़ती जाती थी कि वे और उनके सहकर्मी किसी भी समय, कोई प्रशिक्षित उत्तराधिकारी छोड़े बिना, उठा लिए जा सकते हैं। स्वाभाविक रूप से उन्होंने अनुवादकों के लिए सबसे पहले मिशन के पुत्रों की ओर देखा, जैसा कि वे प्रचारकों के लिए पहले ही कर चुके थे।
फिर भी, डॉ. केरी के लिए व्यक्तिगत रूप से एक ऐसे युवा मिशनरी की शिक्षा और भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी, जो अनुवादक और अनुवादों के सम्पादक के रूप में उनका उत्तराधिकारी बनने के लिए विशेष रूप से योग्य हो। ऐसा व्यक्ति विलियम येट्स में मिला, जिनका जन्म 1792 में उसी काउंटी, लेस्टरशायर, में हुआ था जिसमें केरी ने बैपटिस्ट मिशन को जन्म दिया था। येट्स भी अपने आरम्भिक वर्षों में मोची थे, और हार्वे लेन में केरी की पुरानी कलीसिया के सदस्य थे, जब वह महान रॉबर्ट हॉल के अधीन थी, जिन्होंने उस युवक के पिता से कहा था, “महाशय, आपका पुत्र एक बड़ा विद्वान और एक अच्छा प्रचारक होगा, और वह एक पवित्र युवक है।” 1814 में वे उन युवा मिशनरियों में अन्तिम बने जिन्हें फ़ुलर ने—जो शीघ्र ही संसार से विदा होनेवाले थे—तथा राइलैंड और हॉल ने इस कार्य के लिए समर्पित किया। येट्स को श्रीरामपुर में आए अभी अधिक महीने नहीं हुए थे कि अपने भाइयों की स्वीकृति से केरी ने 17 मई 1815 को फ़ुलर को लिखा:—“मेरा बहुत मन है कि अनुवादों में उन्हें अपने साथ जोड़ लूँ। मेरा परिश्रम पहले किसी भी समय से अधिक है। अब हमारे यहाँ सत्ताईस भाषाओं में बाइबल के अनुवाद चल रहे हैं, जिनमें से दो-तीन को छोड़ सब छप रहे हैं। उन सबको सुधारने और संशोधित करने का परिश्रम मुझ पर है।” सितम्बर तक हम येट्स को यह लिखते पाते हैं:—“डॉ. केरी बंगला के सब प्रूफ़ मेरे पास जाँचने के लिए भेजते हैं। मैं उन्हें पढ़ता हूँ, और यदि कोई बात मेरी समझ में नहीं आती, या मुझे गलत लगती है, तो उस पर चिह्न लगा देता हूँ। फिर हम उस पर बातचीत करते हैं, और यदि वह गलत हो तो वे उसे बदल देते हैं; परन्तु यदि नहीं, तो वे मुझे कारण दिखाते हैं कि वह क्यों सही है, और इस प्रकार वे मुझे भाषाओं में उतनी तेज़ी से प्रवीण करेंगे जितनी तेज़ी से मैं उन्हें सीख सकूँ। वे चाहते हैं कि मैं बहुत जल्दी हिन्दी आरम्भ करूँ। जब से मैं यहाँ आया हूँ, मैंने बंगला में तीन ग्रन्थ पढ़े हैं, और गद्य में उनके पास केवल छः ही महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। संस्कृत में तो बहुतायत से हैं।” “डॉ. केरी ने मेरे साथ अत्यन्त स्नेह और कृपा का व्यवहार किया है, और मुझसे कहा है कि जो भी जानकारी वे दे सकते हैं, देंगे, और मेरी प्रसन्नता बढ़ाने के लिए जो कुछ उनके वश में है, करेंगे।” जो बारूक यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के लिए था, वही येट्स केरी के लिए हो सकते थे, जिन्होंने उनसे जीवन भर श्रीरामपुर में रहने का आग्रह करते हुए यहाँ तक कहा कि “यदि वे यह सेवा स्वीकार न करें, तो उनके विचार में यह ईश्वरीय विधान के विरुद्ध कार्य करना होगा, और तब परमेश्वर की आशीष की आशा नहीं की जा सकती।” येट्स ने अपना भाग उन युवा लोगों के साथ जोड़ा जिन्होंने फ़ुलर की मृत्यु के बाद कलकत्ता में, श्रीरामपुर मिशन से अलग, सोसाइटी का मिशन आरम्भ किया। यदि केरी बंगला और संस्कृत बाइबल के विक्लिफ़ और टिंडेल थे, तो येट्स उसके कवरडेल थे। उनके उत्तराधिकारी वेंगर उन दोनों के योग्य थे। बंगाल अब भी उस महान कार्य के पहले देशी संशोधन की प्रतीक्षा कर रहा है जिसे इन क्रमिक अग्रदूतों ने धीरे-धीरे सुधारा है। बंगाल अपना लूथर कब देखेगा?
बंगला बाइबल अनुवादों में पहली थी, जैसे वह सबसे महत्त्वपूर्ण भी थी। उस प्रान्त, या लेफ़्टिनेंट-गवर्नरशिप, का क्षेत्रफल तब फ़्रांस के बराबर था, और उसकी जनसंख्या फ़्रांस की दुगुनी से भी अधिक, अर्थात् आठ करोड़ थी। तीन प्रमुख देशी भाषाओं में से बंगला साढ़े चार करोड़ हिन्दुओं और मुसलमानों द्वारा बोली जाती है। बंगाल के और दक्कन (“दक्षिण”) पठार के उत्तर में स्थित भारत के सब निवासियों के लिए, परन्तु विशेषकर बंगला-भाषी लोगों के लिए, विलियम केरी ने एक शताब्दी पहले एक साहित्यिक भाषा की रचना की।
सम्पूर्ण नये नियम का पहला बंगला संस्करण केरी ने 1796 के अन्त से पहले मूल यूनानी से अनुवादित कर लिया था। जिस एकमात्र अंग्रेज़ी टीका का प्रयोग किया गया वह डॉड्रिज की “फ़ैमिली एक्सपोज़िटर” थी, जो 1738 में प्रकाशित हुई थी, और उस समय उस भाषा की सबसे समालोचनात्मक टीका थी। उन्होंने हाथ में यूनानी शब्दानुक्रमणिका लेकर चार बार पाण्डुलिपि का संशोधन किया, और उन्होंने इसका प्रयोग न केवल अपने पास बैठे राम बसु के साथ—जो आरम्भिक बंगला विद्वानों में सबसे निपुण थे—वरन् अपने चारों ओर के सब वर्गों के देशी लोगों के साथ भी किया। 1800 तक वार्ड मुद्रक के रूप में आ चुके थे, श्रीरामपुर में छापाखाना पूर्ण रूप से तैयार हो गया था, और सात वर्षों के परिश्रम का फल फ़रवरी 1801 में 2000 प्रतियों के पहले संस्करण के रूप में प्रकट हुआ, जिसकी लागत £612 थी। छपाई में नौ महीने लगे। टाइप वार्ड और केरी के पुत्र फ़ेलिक्स ने अपने हाथों से जमाया; “आरम्भ में लगभग एक महीने तक हमारे पास एक ब्राह्मण कम्पोज़िटर था, परन्तु हम उससे बिलकुल ऊब गए। हमने चार प्रेस-कर्मियों को निरन्तर काम में लगाए रखा।” सम्पूर्ण बंगला बाइबल के लिए 32 रुपये, अर्थात् उस समय की विनिमय-दर के अनुसार एक प्रति के £4, पर एक सार्वजनिक चन्दा-सूची खोली गई थी, और लगभग पचास प्रतियों के लिए तुरन्त नाम लिखा दिए गए थे। यही संस्करण था जिसके कारण तुरन्त केरी की नियुक्ति फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हुई, और उसी नियुक्ति ने केरी को भाषा-वैज्ञानिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया कि वे सुदूर पूर्व की जातियों को उनकी अपनी भाषा में बाइबल दे सकें।
बंगला नये नियम के पहले संस्करण के साथ कुछ प्रिय स्मृतियाँ जुड़ी हैं जिन्हें एकत्र करना उचित है। मंगलवार, 18 मार्च 1800 को वार्ड की डायरी19 में लिखा है: “भाई केरी ने छापेखाने पर मत्ती के पहले पृष्ठ की छाप निकाली।” अनुवादक स्वयं ही प्रेस-कर्मी थे। जैसे ही यह पूरा सुसमाचार तैयार हुआ, तुरन्त वितरण के लिए इसकी 500 प्रतियाँ छापी गईं, “जिसे हमने महत्त्वपूर्ण समझा, क्योंकि इसमें छुड़ानेवाले का सम्पूर्ण जीवन-वृत्तान्त है।” चार दिन बाद सरकारी “कलकत्ता गज़ट” में छपे एक विज्ञापन ने, जिसमें घोषणा की गई थी कि मिशनरियों ने श्रीरामपुर में एक छापाखाना स्थापित किया है और वे बंगला में बाइबल छाप रहे हैं, लॉर्ड वेलेज़ली को भड़का दिया, जिन्होंने ब्रिटिश भारत में प्रेस पर बेड़ियाँ डाल रखी थीं। श्री ब्राउन गवर्नर-जनरल को यह बता सके कि इसी श्रीरामपुर छापेखाने ने अंग्रेज़ी सरकार पर एक राजनीतिक आक्रमण छापने से इनकार कर दिया था, और कि उसका उद्देश्य केवल देशी लोगों की आत्मिक शिक्षा है। इस पर उस उदार राजनेता ने यह आश्वासन दिया कि वे व्यक्तिगत रूप से अन्यजातियों के मसीही बनने के पक्ष में हैं। जब उन्हें आगे यह बताया गया कि ऐसा प्राच्य छापाखाना फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के लिए अमूल्य होगा, तो उन्होंने न केवल अपना विरोध वापस ले लिया, वरन् केरी को बंगला का पहला शिक्षक बना दिया। 7 फ़रवरी 1801 को अन्तिम सुधारों सहित अन्तिम पन्ना केरी के हाथों में रखा गया। जब एक खण्ड की जिल्द बँध गई, तो उसे चैपल की प्रभु-भोज की मेज़ पर रखकर श्रद्धापूर्वक परमेश्वर को अर्पित किया गया, और मिशन के परिवार तथा नए-नए मसीही बने लोग उसके चारों ओर एकत्र हुए और कृष्ण पाल की अगुवाई में परमेश्वर को गम्भीर भाव से धन्यवाद दिया। केरी ने इन शब्दों पर प्रचार किया (कुलुस्सियों 3:11): “मसीह के वचन को सारे ज्ञान सहित अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो।” 1901 में कलकत्ता में डॉ. राउज़ की अगुवाई में इसकी शताब्दी मनाई गई, जिनकी उत्तम विद्वत्ता ने अभी-अभी इस अनुवाद का संशोधन किया था।
जब पहली प्रतियाँ इंग्लैंड पहुँचीं, तो एंड्रयू फ़ुलर ने एक प्रति दूसरे अर्ल स्पेन्सर को भेजी—वह सामन्त जिसने मार्लबरो की डचेस सारा की सम्पत्ति का उपयोग ऑलथॉर्प के महान पुस्तकालय का संग्रह करने में किया था। केरी कभी उनके एक निर्धन काश्तकार रहे थे, यद्यपि अर्ल यह नहीं जानते थे। जब बंगला नया नियम, अपनी कहानी सहित, उनके पास पहुँचा, तो उन्होंने पुराने नियम के अनुवाद में सहायता के लिए £50 का एक चेक भेजा, और इस बात का ध्यान रखा कि एक प्रति जॉर्ज तृतीय को, मानो स्वयं उनके अनुरोध पर, भेंट की जाए। एक सुबह विंडसर में श्री बोयर को भेंट के लिए बुलाया गया, और उन्होंने ग्रन्थ के साथ एक अभिनन्दन-पत्र भेंट किया जिसमें यह कामना व्यक्त की गई थी कि महामहिम इसके सिद्धान्तों को अपने सारे पूर्वी राज्य में सर्वत्र प्रबल होते देखने तक जीवित रहें। इस पर सेवा में उपस्थित लॉर्ड ने धीरे से यह सन्देह प्रकट किया कि यह पुस्तक उचित माध्यम से आई है या नहीं। राजा ने तुरन्त उत्तर दिया कि बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल का इससे कोई लेना-देना नहीं है, और श्री बोयर की ओर मुड़कर कहा, “मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता है कि मेरी प्रजा में से कुछ लोग इस प्रकार के कार्य में लगे हुए हैं।”
यह अब दुर्लभ ग्रन्थ, जो श्रीरामपुर कॉलेज पुस्तकालय की अलमारियों में मिलता है, जहाँ वह केरी के अनुवादों की विशाल पंक्ति में सबसे आगे रखा है, अपने नवीनतम उत्तराधिकारियों की तुलना में देखने में खुरदरा और अनाकर्षक है। वास्तव में दूसरा संस्करण, जो 1806 में प्रकाशित हुआ, लगभग एक नया अनुवाद ही था। उनके सहकर्मियों और दूसरों की, विशेषकर डॉ. मार्शमैन जैसे परिपक्व यूनानी-विद्वान की आलोचना ने, देशी कलीसिया की बढ़ती ने, और बंगला के साथ-साथ संस्कृत और मराठी के प्रोफ़ेसर के रूप में उनके अपने अनुभव ने केरी को उस भाषा को उन ईश्वरीय विचारों के अनुरूप ढालने की नई सामर्थ दी, जिनका माध्यम उन्होंने उसे बनाया था। परन्तु पहला संस्करण भी अपनी स्वयं को प्रमाणित करनेवाली सामर्थ से रहित नहीं था। सत्रह वर्ष बाद, जब मिशन ढाका की पुरानी राजधानी तक फैला, तब हिन्दू घरानों में जन्मे किसानों के कई गाँव मिले जिन्होंने मूर्तिपूजा छोड़ दी थी, जो अपनी सत्यवादिता के लिए प्रसिद्ध थे, और परमेश्वर की ओर से आए हुए सच्चे गुरु की खोज में होने के कारण स्वयं को “सत्य-गुरु” कहते थे। वे अपने नए विश्वास का स्रोत एक बहुत घिसी हुई पुस्तक को बताते थे जो उनके एक गाँव में लकड़ी के सन्दूक में रखी हुई थी। कोई नहीं बता सकता था कि वह कहाँ से आई थी; वे बस इतना जानते थे कि वह बहुत वर्षों से उनके पास थी। वह हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के नए नियम का केरी का पहला बंगला अनुवाद था। हिन्दू धर्म की विस्तृत और लचीली सीमाओं के भीतर, और जैसा हम आगे देखेंगे, सीमा के पार कट्टर मुसलमानों के बीच भी, बिना किसी शिक्षक के धुँधले रूप में समझी गई बाइबल ने इस प्रकार के शुद्धतावादी (प्यूरिटन) पन्थों को जन्म दिया है, जैसे उसने रानी कन्दाके के मंत्री जैसे सच्चे जिज्ञासुओं को राह दिखाई।
बंगला नए नियम का तीसरा संस्करण 1811 में फ़ोलियो आकार में उन देशी मण्डलियों के उपयोग के लिए प्रकाशित हुआ जो तब तक बन चुकी थीं। चौथा, जिसकी 5000 प्रतियाँ थीं, 1816 में निकला, और आठवाँ 1832 में। उस आदरणीय विद्वान ने, जैसे इओना में कोलम्बा ने चौंतीसवें भजन पर और जैरो में बीडा ने यूहन्ना रचित सुसमाचार के छठे अध्याय पर कहा था, वैसे ही अन्तिम पन्ने को सुधारते हुए—चालीस वर्षों के विश्वासयोग्य और आनन्दमय परिश्रम के बाद वह अन्तिम पन्ना—कहा: “मेरा काम पूरा हो गया; अब मुझे प्रभु की इच्छा की बाट जोहने के सिवा और कुछ नहीं करना है।” इब्रानी से पुराना नियम 1802 से 1809 तक भागों में प्रकाशित हुआ। अनुवादक का उत्साह ऐसा था कि उन्होंने जनवरी 1794 में ही उत्पत्ति के पहले अध्याय के अपने अनुवाद का सुधार पूरा कर लिया था। जब उन्होंने उसे नदिया के दो पण्डितों को पढ़कर सुनाया, तो—जैसा उन्होंने उस महीने की अपनी डायरी में फ़ुलर को बताया—वे सृष्टि के वृत्तान्त से बहुत प्रसन्न दिखाई दिए, परन्तु उन्होंने पाताल के, जो पृथ्वी के नीचे का उनका काल्पनिक लोक है, छूट जाने पर आपत्ति की, और उनके विचार में उसका उल्लेख होना चाहिए था। इस आरम्भिक काल में ही केरी ने एक तथाकथित ईश्वरीय प्रकाशन के रूप में हिन्दू धर्म की दुर्बलता को, झूठे भौतिक-विज्ञान के साथ उसके एकरूप हो जाने के कारण, पहचान लिया था, ठीक वैसे ही जैसे बाद में डफ़ ने उसे देखा और बड़े ज़बरदस्त प्रभाव के साथ उसका उपयोग किया; और उन्होंने लिखा:—“उन्हें भूगोल और कालक्रम से सम्बन्धित कई बातें समझाने की आवश्यकता है, क्योंकि इन विषयों पर उनके बहुत से अन्धविश्वासी मत हैं जो उनकी मूर्तिपूजा की व्यवस्थाओं से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।” बंगला बाइबल पन्द्रह वर्षों के मधुर परिश्रम का फल थी, जिसमें मार्शमैन यूनानी पढ़ते थे और केरी बंगला; उनके हर सहकर्मी ने प्रूफ़ के पन्ने जाँचे, और अन्त में केरी ने अपनी ही कलम से पाँचों अष्टपेजी (ऑक्टेवो) खण्डों को पूरा लिखा। अपने मिशनरी जीवन के चालीस वर्षों में केरी ने बंगला में पुराने नियम के पाँच और नए नियम के आठ संस्करण तैयार किए और उन्हें छपवाया।
संस्कृत अनुवाद मूल भाषा से किया गया था, और उस परिश्रमी विद्वान ने स्वयं उसे अपने हाथ से लिखा था। कहा जाता है कि सर विलियम जोन्स अपने पहले पण्डित की सहायता केवल 500 रुपये मासिक, अर्थात् £700 वार्षिक देकर ही प्राप्त कर सके थे। केरी ने अपने अनेक पण्डितों को उस राशि के बीसवें भाग पर नियुक्त किया और प्रशिक्षित किया। वे भली-भाँति जानते थे कि ब्राह्मण साधारण लोगों की भाषा में लिखी पुस्तक को तुच्छ समझेंगे। जिस एक व्यक्ति को हिन्दी अनुवाद दिया गया, उसने कहा, “क्या! यदि इन पुस्तकों में ईश्वरीय ज्ञान हो भी, तो भी हमारे लिए ये कुछ नहीं हैं। इनमें निहित परमेश्वर का ज्ञान हमारे लिए कुत्ते की खाल के बर्तन में रखे दूध के समान है, जो पूरी तरह अशुद्ध है।” परन्तु भारत में बाइबल-अनुवादों का इतिहास लिखनेवाले लिखते हैं कि केरी के संस्कृत अनुवाद का ब्राह्मणों ने हार्दिक स्वागत किया। 1812 की आग में नष्ट हो जाने पर पुराने नियम की ऐतिहासिक पुस्तकों का फिर से अनुवाद किया गया, और वे 1815 में प्रकाशित हुईं। 1827 में उस वृद्ध संत में इतनी शक्ति थी कि उन्होंने एक गहन संशोधन का पहला खण्ड निकाला, और अपनी मृत्यु पर दूसरे खण्ड की पाण्डुलिपि अपने उत्तराधिकारियों, येट्स और वेंगर, के लिए विरासत के रूप में छोड़ गए। वेदों और उपनिषदों, ब्राह्मण-ग्रन्थों और महाकाव्यों के सामने उन्होंने संस्कृत बाइबल खड़ी कर दी।
केरी ने पवित्रशास्त्र के जितने पूर्ण रूप से अनूदित और प्रकाशित संस्करण निकाले, उनकी कुल संख्या अट्ठाईस थी। इनमें से सात में पूरी बाइबल थी, और इक्कीस में नए नियम की पुस्तकें थीं। हर अनुवाद का अपना एक इतिहास है, अपनी एक आत्मिक रोमांचक कथा। हर अनुवाद लगभग तुरन्त ही एशिया के लोगों के बीच एक मौन परन्तु प्रभावशाली मिशनरी बन गया, और साथ ही उन बाद के संस्करणों और अनुवादों का विद्वत्तापूर्ण और साहित्यिक अग्रदूत भी, जिनसे सुदूर एशिया की देशी कलीसियाएँ अपनी सजीव बढ़ती की सामग्री प्राप्त करती हैं।
बंगला के बाद आरम्भ किए गए अनुवादों में उड़िया अनुवाद लगभग पहला था; बंगला से उड़िया का वही सम्बन्ध है जो ग्रामीण स्कॉटिश बोली का अंग्रेज़ी से है, यद्यपि उसकी अपनी एक अलग लिपि है। बंगाल का वह भाग जो अब उड़ीसा प्रमण्डल है, और जो बंगाल को दक्षिण-पश्चिम में मद्रास से अलग करता है, 1803 में साम्राज्य में जोड़ा गया। इस बात ने, और इस तथ्य ने कि उसका पुरी ज़िला, सदियों की सूर्य-पूजा और फिर शिव-पूजा के बाद, जगन्नाथ और उसके रथ के वैष्णव सम्प्रदाय का ऊँचा स्थान बन गया था, जो प्रति वर्ष लाखों तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता था और अक्सर उनके प्राण भी ले लेता था, केरी को तुरन्त उड़िया बाइबल को छपाई के लिए तैयार करने को प्रेरित किया। मुख्य पण्डित मृत्युंजय ने, जो दोनों बोलियों में निपुण थे, पहले बंगला अनुवाद को उड़िया लोगों की भाषा के अनुरूप ढाला, जो उनकी अपनी भाषा थी। फिर केरी ने पाण्डुलिपि लेकर उसे मूल यूनानी से मिलाया और पद-पद करके सुधारा। नया नियम 1809 में तैयार हो गया, और पुराना नियम 1815 में; पूरी बाइबल चार खण्डों में थी। बड़े-बड़े संस्करण शीघ्र ही ख़रीद लिए गए और फैल गए। इन्हीं के परिणामस्वरूप राजधानी कटक में जनरल बैपटिस्ट सोसाइटी के मिशनरी स्थापित हुए।
1814 में श्रीरामपुर के बाइबल-अनुवाद महाविद्यालय ने—जैसा हम उसे कह सकते हैं—मागधी में नए नियम की तैयारी आरम्भ की, जो बंगला से सम्बन्धित भाषाओं में से एक और भाषा है और संस्कृत से पाली के द्वारा निकली है; यह इसलिए किया गया क्योंकि वही बौद्ध धर्म के मूल स्थान में उसकी लोकभाषा थी; 1000 प्रतियों का एक संस्करण 1824 में प्रकाशित हुआ। बिहार की मैथिली भाषा में, जिसका साहित्य चौदहवीं शताब्दी तक पीछे जाता है, एक अनुवाद प्रकाशित करने का विचार था, ताकि हर वर्ग के लोगों के पास उनकी अपनी बोली में परमेश्वर का वचन हो। परन्तु तब तक केरी के साहित्यिक उत्साह और विद्वत्ता ने शुद्ध बंगला की शक्ति को विकसित करने और फैलाने में इतना कुछ कर दिया था कि वह ऐसी सब बोलियों का स्थान लेने लगी थी, सिवाय उड़िया के और ब्रह्मपुत्र घाटी की उत्तरी लोकभाषाओं के। 1810 में श्रीरामपुर छापाखाने ने अपनी उपलब्धियों में असमिया नया नियम भी जोड़ा। 1819 में पहला संस्करण प्रकाशित हुआ, 1826 में वह प्रान्त अंग्रेज़ी राज्य में आ गया, और 1832 में केरी को पुराना नियम प्रकाशित करने का, और वहाँ बस चुके एक स्कॉटिश सैनिक श्री रे को गौहाटी में पहले मिशनरी के रूप में अलग करने का सन्तोष मिला। इनके साथ, बंगला लिपि में होने पर भी अनार्य भाषाओं के अनुवादों के रूप में, खासी और मणिपुरी के अनुवाद भी जोड़े जाने चाहिए—पहला खासी पहाड़ियों की लोकतान्त्रिक जनजातियों के लिए, जिनके बीच तब से वेल्स के कैल्विनवादियों ने काम किया है, और दूसरा बर्मा की सीमा पर बसे उन विचित्र हिन्दू नाग-लोगों के लिए, जिन्होंने यूरोप को पोलो का खेल सिखाया है।
बंगला अनुवाद के तुरन्त बाद आनेवाला एक और अनुवाद मराठी था, जिसके प्रोफ़ेसर भी केरी फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में थे। 1804 तक वे स्वयं इस अनुवाद पर परिश्रम से काम कर रहे थे, 1811 तक नए नियम का पहला संस्करण प्रकाशित हो गया, और 1820 तक पुराना नियम छापेखाने से निकल गया। यह नागपुर की एक विशेष बोली में था, और आरम्भ में वहाँ की सेना में लेफ़्टिनेंट मॉक्सन द्वारा बड़े पैमाने पर बाँटा गया। 1812 में केरी ने मिशनरी अरातून को बम्बई और सूरत भेजा, ठीक उसके बाद जब हेनरी मार्टिन ने लिखा था कि उस नगर में उनके सुसमाचारीय उपदेश को समझनेवाला एकमात्र मसीही एक रस्सी बनानेवाला था जो अभी-अभी इंग्लैंड से आया था। उसी समय वे कोंकण की बोली में एक अनुवाद पर लगे हुए थे—कोंकण बम्बई नगर के दक्षिण का घनी आबादीवाला तटीय ज़िला है, जिसमें मुख्यतः भारत की सबसे योग्य ब्राह्मण जाति बसती है। 1819 में इस अनुवाद में नया नियम प्रकाशित हुआ, जो ग्यारह वर्षों से श्रीरामपुर में तैयार हो रहा था। इस प्रकार केरी ने उन एक करोड़ बीस लाख हिन्दुओं को मसीह की ओर फेरने का प्रयत्न किया जिन्होंने पश्चिमी भारत से, सह्याद्रि अर्थात् “रमणीय” पर्वत कहलानेवाली महान तटीय पर्वतमाला के ऊपर और नीचे से निकलकर, लगभग पूरे प्रायद्वीप को मुसलमानों से छीन लिया था, और पहले पानीपत में और फिर असाई में, अंग्रेज़ों के जीवनदायी शासन से लगभग पहले ही बाज़ी मार ली थी। इस बीच नए मिशनरी उन पश्चिमी ज़िलों पर अधिकार करते जा रहे थे जहाँ श्रीरामपुर के लोगों ने पहला बीज बोया था और पहला फल काटा था। 1813 के चार्टर ने अमेरिकी मिशनरियों के लिए वहाँ उतरना, और स्थानीय बाइबल सोसाइटी का अस्तित्व में आना सम्भव कर दिया। डॉ. जॉन विल्सन और उनके स्कॉटिश सहकर्मी उनके पीछे आए। केरी और उनके भाइयों ने इनका स्वागत किया और उस क्षेत्र से हट गए; अगले सात वर्षों में उन्होंने स्वयं को केवल उत्तरी बम्बई के लाखों लोगों के लिए, जिनमें आशाजनक पारसी भी सम्मिलित थे, एक गुजराती अनुवाद उपलब्ध कराने तक सीमित रखा, और 1820 में नया नियम प्रकाशित करने के बाद वह काम भी लन्दन मिशनरी सोसाइटी को सौंप दिया।
श्री क्रिस्टोफ़र एंडरसन आधी शताब्दी पहले प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ़ द इंग्लिश बाइबल’ में ठीक ही कहते हैं:—“समय दिखाएगा, और बड़े अनोखे ढंग से दिखाएगा, कि केरी के हाथों से निकले हर अनुवाद का, बिना किसी अपवाद के, एक ऐसा मूल्य है जिसे वर्तमान पीढ़ी, जो मानो किसी वस्तु के बहुत निकट खड़ी है, अभी आँकने या पहचानने में समर्थ नहीं है। अब से पचास वर्ष बाद इस असाधारण और नम्र व्यक्ति के चरित्र का अधिक सही मूल्यांकन होगा।”
संस्कृत से निकली भाषाओं के किसी भी वर्ग में केरी और उनके साथियों का उत्साह इतना उल्लेखनीय नहीं था जितना हिन्दी में। 1796 में ही उन्होंने संस्कृत की इस सबसे व्यापक सन्तान के विषय में लिखा:—“मैंने हिन्दी इतनी सीख ली है कि उसमें बातचीत कर सकूँ और कुछ समय तक समझ में आने योग्य ढंग से प्रचार कर सकूँ...यह राजमहल से दिल्ली तक, और सम्भवतः उससे भी आगे, पूरे पश्चिम की प्रचलित भाषा है। इसके द्वारा मैं लगभग पूरे हिन्दुस्तान में समझा जा सकता हूँ।” जब तक उन्होंने अनुवादों का छठा विवरण-पत्र (मेमॉयर) निकाला, तब तक उत्तर-पश्चिमी भारत में चेम्बरलेन के अनुभवों के आधार पर केरी ने लिखा कि उन्होंने हिन्दी की बीस बोलियों के अस्तित्व का पता लगाया है, जिनकी शब्दावली एक ही है परन्तु प्रत्ययों के समूह अलग-अलग हैं। ब्रज या ब्रजभाषा के सुसमाचार 1813 में पूरे हुए, चेम्बरलेन के आगरा में बसने के दो वर्ष बाद, और नया नियम उसके नौ वर्ष बाद पूरा हुआ। सुसमाचारों के इसी अनुवाद ने ब्राह्मण पुरोहित आनन्द मसीह को मसीह के पास पहुँचाया। 1818 में प्रकाशित पुराने नियम की एक प्रति पाने की उत्सुकता में बहुत से सिपाही अपने कमांडिंग अफ़सरों से प्रमाण-पत्र लेकर आए, और एक ही वर्ष में वह अठारह नए विश्वासियों को मसीह के पास ले आया। हिन्दी की अन्य बोलियाँ, जिनमें पूरा नया नियम या सुसमाचार प्रकाशित हुए, पृष्ठ 177 पर मिलेंगी {पाद-टिप्पणी संख्या 16 देखें}। मूल हिन्दी अनुवाद केरी ने 1802 और 1807 के बीच अपने ही हाथ से मूल भाषाओं से किया था, और उसके बहुत से बड़े संस्करण निकले, जब तक कि 1819 में स्वयं केरी ने श्री चेम्बरलेन के अनुवाद को उससे अधिक पसन्द नहीं किया।
हम द्रविड़ अनुवादों की कथा को—तेलुगु20 नया नियम और पंचग्रन्थ, और कन्नड़—छोड़कर आगे बढ़ सकते हैं। न ही हमें सिंहली अनुवाद का, जो टॉलफ़्री द्वारा “डॉ. केरी के पिछले परिश्रम से तैयार किया गया” था, और फ़ारसी, मलयालम और अन्य अनुवादों का, जो दूसरों ने किए परन्तु जिनका सम्पादन केरी ने किया या जिन्हें उन्होंने सावधानी से छपवाया, उल्लेख करने से अधिक कुछ करने की आवश्यकता है। उनके बाइबल-कार्य की अद्भुत कथा का सुन्दर उदाहरण एक ऐसे व्यक्ति से मिलता है जो, लॉरेंस बन्धुओं के बाद, पंजाब की सीमा पर शासन करनेवाले अंग्रेज़ों में सबसे महान था—श्री रस्किन की पुस्तक ‘ए नाइट्स फ़ेथ’ का नायक। उसके जीवन के उस भाग में, जिसे सर हर्बर्ट एडवर्ड्स ने 1848-49 में ‘ए ईयर ऑन द पंजाब फ़्रंटियर’ (पंजाब सीमा पर एक वर्ष) शीर्षक से संसार के सामने रखा, और जिसमें वे बन्नू की जंगली घाटी पर अपनी रक्तहीन विजय का वर्णन करते हैं, हमें यह रत्न जड़ा हुआ मिलता है। लेखक उस समय गण्डापुर देश में थे, जिसका व्यापार-केन्द्र कुलाची है, जो ग़्वालरी के अफ़ग़ान दर्रे और डेरा इस्माइल ख़ान के बीच स्थित है, जहाँ अब सर हेनरी ड्यूरंड की देह की धूल विश्राम करती है:—“भारतीय व्यापार से जुड़ी एक अत्यन्त रोचक घटना मेरे ध्यान में आई। वर्तमान सरदार गुलदाद ख़ान के चाचा, अली ख़ान गण्डापुर, ने मुझे बताया कि उन्हें भली-भाँति याद है कि युवावस्था में उनके पिता और बड़े भाई ने उन्हें काबुली घोड़ों की एक क़तार के साथ गंगा के किनारे हरद्वार के मेले में भेजा था। उन्होंने मुझे श्रीरामपुर में 1818 में छपी बाइबल का एक पश्तो अनुवाद भी दिखाया, जो उनके कहने के अनुसार तीस वर्ष पहले हरद्वार में एक अंग्रेज़ सज्जन ने उन्हें दिया था, और उनसे कहा था कि ‘इसे सँभालकर रखना, और न इसे आग में फेंकना न नदी में; परन्तु उस दिन के लिए इसे सहेजकर रखना जब अंग्रेज़ उसके देश के शासक होंगे!’ अली ख़ान ने अपने पास यह पुस्तक होने के विषय में किसी से अधिक कुछ नहीं कहा, परन्तु उसे सावधानी से एक लिनन के आवरण में रख दिया, और जब मैं उनके भतीजे के देश का राजस्व निश्चित करने आया, तब उन्होंने बड़े रहस्यमय ढंग से उसे निकाला, ‘यह सोचकर कि उस अंग्रेज़ द्वारा बताया गया समय आ पहुँचा है!’ मेरे विचार में, जिस एकमात्र व्यक्ति को उन्होंने वह ग्रन्थ दिखाया था, वह एक मुल्ला था, जिसने पुराने नियम के कई अंश पढ़े और अली ख़ान से कहा कि ‘यह एक सच्ची कथा है, और इसमें सब कुछ उनके अपने मुसलमानी नबियों, पिता मूसा और पिता नूह, के विषय में है।’ “मैंने बड़ी रुचि से उस पुस्तक की जाँच की। वह फ़ारसी लिपि में नहीं छपी थी, परन्तु अफ़ग़ानिस्तान की सामान्य पश्तो भाषा में थी; और लिखित रूप में उतारी गई पश्तो का यह एकमात्र नमूना था जो मैंने कभी देखा था। ऐसे अनुवाद का पूरा होना श्रीरामपुर मिशन के उत्साह और परिश्रम का अत्यन्त सम्माननीय प्रमाण था; और यदि ये पृष्ठ कभी श्रीरामपुर के श्री जॉन मार्शमैन21 की दृष्टि में आएँ, जिनकी अपनी कलम सदा नागरिक व्यवस्था और धार्मिक सत्य के प्रेम से निर्देशित होती है, तो वे सम्भवतः उस ‘अंग्रेज़ सज्जन’ को पहचान सकें, जिसने बत्तीस वर्ष पहले गंगा के तट पर, ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सीमा पर, दूर सिन्धु के पार से आए एक युवा अफ़ग़ान सरदार को उसकी अपनी असभ्य भाषा में एक बाइबल दी, और उस दिन को पहले से देख लिया जब ‘दाऊद के पुत्र’ के अनुयायी अपना प्रभुत्व ‘सुलैमान के सिंहासन’ तक फैलाएँगे।”
हरद्वार, वह स्थान होने के कारण जहाँ गंगा मैदानों में उतरती है, भारत के सबसे बड़े तीर्थ-मेले का स्थल है, विशेषकर हर बारहवें वर्ष। तब तीस लाख लोग इकट्ठे हुआ करते थे, और बहुधा पूरे एशिया में हैज़ा फैला देते थे, जो यूरोप तक पहुँच जाता था। मिशनरियों ने अधिकांश तीर्थस्थानों की तरह इसे भी प्रचार और बाइबल-वितरण का केन्द्र बनाया, और निस्सन्देह पश्तो बाइबल की यह प्रति दिल्ली में केरी के मिशनरी थॉम्पसन से ही प्राप्त हुई थी। इसका आरम्भ डॉ. लेडन ने किया था, और उसी अफ़ग़ान मौलवी ने केरी के निर्देशन में अरबी लिपि में सात वर्ष तक इसे जारी रखा। पंजाबी बाइबल, जो लगभग पूरी थी और पहली बार 1815 में निकली, 1820 तक इतनी लोकप्रिय हो गई थी कि केरी ने सिखों के विषय में यह रिपोर्ट दी कि भारत की किसी भी जाति ने पवित्रशास्त्र के लिए इस साहसी जाति से अधिक तीव्र लालसा प्रकट नहीं की। अमृतसर और लाहौर में “यीशु की पुस्तक की चर्चा होती है, वह पढ़ी जाती है, और उसने लोगों के मन में काफ़ी हलचल मचा दी है।” एक ठग से जब पूछा गया कि वह इतनी हत्याएँ कैसे कर सका, तो उसने उस पुस्तक की ओर संकेत करके कहा, “यदि मेरे पास यह पुस्तक होती तो मैं ऐसा न कर पाता।” लुधियाना से चालीस मील दूर एक फ़क़ीर ने वह पुस्तक पढ़ी, ‘साची पिते ईसा’ के उपासकों का समुदाय स्थापित किया, और एक देशी रियासत में बहुत सताव सहा।
जब फ़ेलिक्स केरी 1812 में मत्ती रचित सुसमाचार का अपना बर्मी अनुवाद और अपना बर्मी व्याकरण छपवाने के लिए श्रीरामपुर लौटे, तो उनके पिता ने निश्चय किया कि जिस छापेखाने पर वे पूरे हुए थे उसे रंगून भेज दें। तीनों मिशनरियों ने उसके साथ आवा के राजा के नाम एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने “अपने प्रिय भाइयों को, जो महाराज की प्रजा के प्रति प्रेम के कारण स्वेच्छा से उनकी सुरक्षा में रहने गए थे, ताकि वहाँ रहते हुए वे बाइबल, अर्थात् स्वर्ग की पुस्तक, का अनुवाद करें, जो ग्रहण की जाती और आदर पाती है” यूरोप और अमेरिका के सब देशों में “उस स्रोत के रूप में जिससे सद्गुण और धर्म का सारा ज्ञान लिया गया है,” राजा की देखरेख में सौंपा। राजा ने तुरन्त श्रीरामपुर से अपने आवा के महल के लिए रंगून के छापेखाने जैसा एक छापाखाना, उसे चलानेवाले कारीगरों सहित, मँगवाया। इसमें केरी ने बर्मी राजधानी में एक मिशन का आरम्भ देखा, परन्तु परमेश्वर की कुछ और ही योजनाएँ थीं, जिन्हें अमेरिका के बेटे और बेटियाँ, सबसे पहले जडसन के पीछे चलकर, रंगून से करेन्नी, स्याम और चीन तक, आज भी शानदार ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं। वह जहाज़ जिस पर छापाखाना था, रंगून नदी में डूब गया, और शीघ्र ही पहला बर्मी युद्ध छिड़ गया।
सुदूर पूर्व की सब भाषाओं में बाइबल का अनुवाद करने की वह पूर्ण और भव्य योजना, जिसे बनाने के लिए केरी को उनके दो सहकर्मियों की सहायता और फ़ोर्ट विलियम कॉलेज ने प्रेरित किया था, नॉर्थैम्पटनशायर में फ़ुलर के सामने रखे जाने के तीन महीने बाद लन्दन में ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी की स्थापना हुई। जोसेफ़ ह्यूज़, एक नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट, जो उसके पहले सचिव थे, वेल्स के लोगों की अपनी भाषा में बाइबल की आवश्यकता से प्रेरित हुए थे। परन्तु भूतपूर्व गवर्नर-जनरल लॉर्ड टेनमाउथ उसके पहले अध्यक्ष बने, और श्रीरामपुर के अनुवादकों ने तुरन्त सहायता के लिए उस नए संगठन की ओर रुख़ किया, जिसका काम केरी व्यक्तिगत रूप से दस वर्ष से अपने दोनों साथियों के और अपने ख़र्च पर करते आ रहे थे। उस सर्वव्यापी भावना वाली बाइबल सोसाइटी ने तुरन्त केरी के पुराने मित्र श्री उडनी से, जो उस समय कलकत्ता में सरकार के सदस्य थे, अनुरोध किया कि वे वहाँ एक पत्राचार-समिति बनाएँ, जिसमें तीनों मिशनरी, उनके पादरी मित्र ब्राउन और बुकानन, और वे स्वयं हों। पादरियों ने समिति के गठन को 1809 तक टाल दिया, परन्तु इस बीच श्रीरामपुर से जारी की गई अन्य अपीलों के प्रसार में उदारता से सहायता की, और यहाँ तक कि वह प्रस्ताव भी रखा जिसके परिणामस्वरूप डॉ. मार्शमैन का चीनी भाषा में बाइबल का अद्भुत अनुवाद और वार्ड के चीनी छपाई में किए गए सुधार सामने आए। डॉ. बुकानन ने भारत के प्रमुख अधीनस्थ राजाओं को अब तक प्रकाशित देशी भाषाओं के पवित्रशास्त्र की प्रतियाँ भेजीं।
1809 से 1830 तक, अर्थात् व्यावहारिक रूप से केरी के शेष जीवन भर, श्रीरामपुर और बाइबल सोसाइटी का सहयोग दोनों के लिए सम्मानजनक रहा। केरी उस समय भी निष्ठा से उससे जुड़े रहे जब 1811 में, “मसीही भारत” पर हेनरी मार्टिन के उपदेश के प्रभाव में आकर, पादरियों ने उसकी पत्राचार-समिति का स्थान लेने के लिए कलकत्ता सहायक बाइबल सोसाइटी स्थापित की। श्रीरामपुर छापेखाने में उस नई सहायक संस्था ने, मूल सोसाइटी के समान, सिंहली, मलयालम और तमिल में नए नियम के संस्करण प्रकाशित करने का सबसे सस्ता और उत्तम साधन पाया। उस छापेखाने ने फ़ारसी नया नियम भी छापा—पहले रोमन कैथोलिक मिशनरी सेबास्टियानी का—“यद्यपि वह त्रुटियों से पूरी तरह मुक्त नहीं है, फिर भी निस्सन्देह वह बहुत भलाई करेगा,” डॉ. मार्शमैन ने फ़ुलर को लिखा—और फिर हेनरी मार्टिन का, जिनके सहायक सबात को श्रीरामपुर में प्रशिक्षित किया गया था। श्रीरामपुर के उन तीनों में मसीह के समान सहनशीलता थी, जो उनके इस दृढ़ निश्चय के ईश्वरीय प्रेम से उपजी थी कि वे केवल इसलिए जीएँ कि परमेश्वर का वचन पूरे एशिया में गूँज उठे। जब 1830 में इस सहायक संस्था ने— जिसने आरम्भ में सब मिशनरियों को अपनी कार्यकारिणी से बाहर रखने का प्रयत्न किया था ताकि सिडनी स्मिथ के भाई, बंगाल के एडवोकेट-जनरल, जैसे लोगों को प्रसन्न रखे—“बपतिस्मा” के लिए यूनानी शब्दों के अनुवाद या लिप्यन्तरण के कारण केरी और येट्स के अनुवादों का उपयोग करने से इनकार किया, और एलर्टन के एक पुराने अनुवाद की ओर झुकी, तब इन दोनों विद्वानों ने इस प्रकार व्यवहार किया, जैसा बाइबल सोसाइटी के इतिहासकार ने वर्णन किया है—उन्होंने “एक ऐसी उदारता के साथ, जो उनके लिए सम्मान की बात है, बंगला पवित्रशास्त्र के अपने-अपने अनुवादों का उपयोग करने की अनुमति दे दी, ‘बपतिस्मा’ के लिए विवादित शब्द में ऐसे परिवर्तनों के साथ जो आवश्यक समझे गए, और यह माना गया कि वे किसी भी रूप में ऐसे परिवर्तनों के पक्षकार नहीं हैं।” आरम्भ से अन्त तक ब्रिटिश एंड फ़ॉरेन बाइबल सोसाइटी को, उसी के शब्दों में, “अनुदानों द्वारा श्रीरामपुर के भाइयों की सहायता करने का सौभाग्य मिला, जो कुल मिलाकर £13,500 से कम नहीं थे।” इसमें से £1475 लीड्स के एक सर्जन श्री विलियम हे, एफ़.आर.एस., ने इकट्ठे किए थे, जो 1816 के अनुवाद-विवरण से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने भारत की किसी भी बोली में नए नियम के हर स्वीकृत पहले अनुवाद की एक हज़ार प्रतियों के प्रकाशन के लिए £500 देने का प्रस्ताव रखा। इसी सहायता से अधिकांश हिन्दी अनुवाद, और पश्तो और पंजाबी अनुवाद तैयार हुए।
1811-12 का शीतकाल सदा स्मरणीय रहनेवाला था। सात मिशनरियों के दल में से हर एक के घर में मृत्यु ने प्रवेश किया और पत्नी या बच्चों को उठा ले गई। असाधारण प्रचण्डता के एक भूकम्प ने देशी लोगों को भयभीत कर दिया। डॉ. केरी ने एक पोते को दफ़नाया था, और वे कलकत्ता के कॉलेज में अपने साप्ताहिक काम पर थे। 11 मार्च 1812 की सन्ध्या को सूरज अभी-अभी डूबा था, और देशी टाइप ढालनेवाले, कम्पोज़िटर, छपाई करनेवाले, जिल्दसाज़ और लिपिक जा चुके थे। केवल वार्ड ढलते प्रकाश में अपनी मेज़ पर रुके हुए कुछ सेवकों का हिसाब निपटा रहे थे। उनके दो कमरे लम्बे छापेखाने के उत्तरी सिरे पर थे। दक्षिणी कमरे काग़ज़ और छपी सामग्री से भरे थे। उनके ठीक आगे काग़ज़ की मिल थी। बाइबल-प्रकाशन का काम अपने शिखर पर था। पूर्वी टाइपों के चौदह फ़ॉन्ट, इब्रानी, यूनानी और अंग्रेज़ी टाइपों का नया भण्डार, बाइबल सोसाइटी से आया काग़ज़ का विशाल भण्डार, छापे की मशीनें, शब्दकोशों, व्याकरणों और अनुवादों की अमूल्य पाण्डुलिपियाँ, और सबसे बढ़कर पूर्वी अक्षरों के इस्पात के पंच—ये सब वहाँ थे, सम्पत्ति के दस्तावेज़ों और हिसाब-बहियों के साथ, और नोटों और रुपयों से भरी लोहे की तिजोरी के साथ। दम घोंटनेवाला धुआँ लम्बे टाइप-कक्ष से फूटकर दफ़्तर में भर आया। आग का स्रोत देखने के लिए उसमें से दौड़ते हुए वे दक्षिणी कमरों के पास काग़ज़ के भण्डार के कारण रुक गए। कठिनाई से लौटकर, और मार्शमैन तथा देशी लोगों के साथ मिलकर, उन्होंने हर दरवाज़ा और खिड़की बन्द करवा दी, और फिर दक्षिणी छत पर चढ़कर उन्होंने चार घण्टे तक उसमें से जलते हुए ढेर पर पानी डलवाया, और विनाश को रोक लेने की बड़ी आशा बँध गई थी। जब वे मार्शमैन के साथ उत्तरी सिरे से काग़ज़-पत्र हटाने में लगे थे, तब किसी ने एक खिड़की खोल दी, और हवा लगते ही पूरी इमारत धधक उठी। आधी रात तक छत अपनी पूरी लम्बाई में गिर पड़ी, और आग का स्तम्भ आकाश की ओर उछल पड़ा। “गम्भीर शान्ति” के साथ मिशन-परिवार के सदस्य उस उजाड़ के सामने बैठे रहे।
अगली सन्ध्या जब डॉ. केरी कलकत्ता से पहुँचे, जहाँ इस दुःखद समाचार की चर्चा चारों ओर गूँज रही थी, तब भी खण्डहरों से धुआँ उठ रहा था। उस आदरणीय विद्वान की सबसे अधिक हानि हुई थी, क्योंकि पाण्डुलिपियाँ उन्हीं की थीं; इस्पात के पंच सुरक्षित मिले। सिख और तेलुगु व्याकरण और छपाई में लगे दस बाइबल-अनुवाद नष्ट हो गए। कन्फ़्यूशियस के, ‘चीनी भाषा पर एक निबन्ध’ के, और वार्ड की हिन्दुओं पर पुस्तक के दूसरे संस्करण, और छोटी रचनाएँ नष्ट हो गईं। रामायण का अनुवाद, जिस पर वे और मार्शमैन एक वर्ष से लगे हुए थे, सदा के लिए रुक गया; पचास वर्ष बाद वर्तमान लेखक को चौथे खण्ड के कुछ झुलसे हुए पन्ने मिले, जो छपाई में थे और बचा लिए गए थे। अप्रैल 1812 का परिपत्र (सर्कुलर लेटर) ऐसे काग़ज़ पर छपा है जो किनारों पर झुलसा हुआ है। सबसे बुरी हानि संस्कृत से निकली सब भाषाओं के उस बहुभाषी शब्दकोश की थी, जो, यदि केरी में इस संसार की कोई भी महत्वाकांक्षा होती, तो उनके नाम को भाषाविज्ञानियों की प्रथम पंक्ति में अमर कर देता।
अपनी उस कोमल संवेदनशीलता के साथ जो सदा उनकी विशेषता थी, डॉ. मार्शमैन अगली सुबह स्वयं कलकत्ता गए ताकि केरी को यह समाचार दें, जिन्होंने उसे रुँधे कण्ठ से सुना। फिर दोनों मित्र पादरी टॉमसन से मिलने गए, जो फूट-फूटकर रो पड़े। जब दोपहर के ज्वार के कारण तीनों, बाढ़ के विरुद्ध दो घण्टे तक कठिन खेवाई के बाद, श्रीरामपुर पहुँच सके, तो उन्होंने वार्ड को आनन्द मनाते पाया। वे दिन भर मलबा हटाते रहे थे, और उन्होंने अभी-अभी पंच और मैट्रिक्स (साँचे) सुरक्षित पाए थे। पाँचों छापे की मशीनें भी अछूती थीं। उन्होंने नदी-तट के अधिक निकट एक लम्बा गोदाम पहले ही खुलवा लिया था, जिसका पट्टा उनके हाथ आ गया था, और उस अनाकर्षक स्थान के उपयोग की योजना भी बना ली थी, जिसमें श्रीरामपुर के प्रसिद्ध छापेखाने को और, अन्त में, ‘फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया’ साप्ताहिक समाचार-पत्र को 1875 तक ठिकाना मिला। टॉमसन जैसे प्रत्यक्षदर्शी द्वारा उस दृश्य का और केरी पर उसके प्रभाव का वर्णन अपना ही मूल्य रखता है:—“वर्ष 1812 का आरम्भ एक भूकम्प से हुआ, जिससे पहले एक ज़ोर का शब्द हुआ; घर हिल गया; दीवारों पर लगे दीयों का तेल छलककर बाहर गिर पड़ा; पक्षियों ने भयानक शोर मचाया; देशी लोग अपने देवताओं के नाम पुकारते हुए अपने घरों से भागे; वह अनुभूति अत्यन्त भयावह होती है; हमने छियालीसवाँ भजन पढ़ा। इस भयानक अद्भुत घटना के बाद वह विनाशकारी विपत्ति आई, श्रीरामपुर की आग। मुझे उस समाचार पर विश्वास ही नहीं हो रहा था; वह सिर पर लगी ऐसी चोट के समान था जो सुन्न कर देती है। मैं उजाड़ देखने के लिए मानो उड़कर श्रीरामपुर पहुँचा। दृश्य सचमुच हृदयविदारक था। दो सौ फ़ुट लम्बा और पचास फ़ुट चौड़ा वह विशाल छापाखाना केवल एक खोखला ढाँचा रह गया था। आँगन काग़ज़ के जले हुए दस्तों से ढका था; इस वस्तु में हुई हानि बहुत बड़ी थी। केरी मेरे साथ धुआँ उगलते खण्डहरों पर चले। उनकी आँखों में आँसू भरे थे। उन्होंने कहा, ‘एक छोटी-सी सन्ध्या में वर्षों का परिश्रम भस्म हो गया। परमेश्वर के मार्ग कैसे अगम हैं! मैंने हाल ही में कुछ बातों को उस चरम पूर्णता तक पहुँचाया था जिसके वे योग्य प्रतीत होती थीं, और मिशन की व्यवस्था को शायद बहुत अधिक आत्म-प्रशंसा के साथ निहारता था। प्रभु ने मुझे नीचा किया है, ताकि मैं अधिक सरलता से उसी की ओर देखूँ।’ ऐसे स्थान पर, ऐसे समय, ऐसे व्यक्ति के साथ, कौन खड़ा हो सकता था जिसके मन में तीखा खेद और गम्भीर आत्म-मंथन न उठे? मैंने भूमि पर अधजले काग़ज़ बिखरे देखे, जिन पर कुछ ही महीनों में जीवन के वचन छप जाते। खण्डहरों के बीच हमारे पैरों के नीचे की धातु पिघलकर बेडौल ढेलों में बदल गई थी— पवित्रस्थान की सेवा के लिए समर्पित सुन्दर टाइपों के दुःखद अवशेष। कुछ घण्टे पहले सब कुछ मुस्कुरा रहा था और आशा दे रहा था—अब सब धुएँ में उड़ गया है या मलबे में बदल गया है! अब अपनी पुस्तकों की ओर लौट जा, अपने हर काम में परमेश्वर को ध्यान में रख। नम्रता के साथ अरबी सीख। अपनी सब योजनाओं, उद्देश्यों और परिश्रम में परमेश्वर को ऊँचा कर; वह तेरे बिना भी काम चला सकता है।”
केरी ने स्वयं इस विपत्ति के विषय में डॉ. राइलैंड को यों लिखा:—“25 मार्च 1812।—हानि बहुत बड़ी है, और लम्बे समय तक गहराई से खलेगी; फिर भी मैं सैकड़ों ऐसी परिस्थितियों की कल्पना कर सकता हूँ जो इसे सहना और भी कठिन बना देतीं। प्रभु ने हमें मारा है, उसे ऐसा करने का अधिकार था, और हम उसकी ताड़नाओं के योग्य हैं। मैं उसकी सर्वोच्च इच्छा के अधीन होना चाहता हूँ, वरन् हृदय से उसे स्वीकार करना चाहता हूँ, और कठोरता से अपनी जाँच करना चाहता हूँ कि मुझमें ऐसा क्या है जिसने इस विपत्ति में योगदान दिया।
“परन्तु अब मैं उजले पक्ष की ओर मुड़ता हूँ; और यहाँ मैं यह बता सकता था कि हमारे पास अभी क्या बचा है, और परमेश्वर की छड़ी की इस मार के साथ भी कौन-सी दयापूर्ण परिस्थितियाँ जुड़ी हैं; परन्तु मैं मुख्य रूप से उन बातों का उल्लेख करूँगा जो हर उस व्यक्ति के हृदय को ढाढ़स देंगी जो परमेश्वर के काम के लिए चिन्ता रखता है। जहाँ तक मैं देख सकता हूँ, हमारी हानि की पूर्ति उससे कहीं कम समय में हो सकती है जितना मैंने पहले सोचा था। तमिल टाइप का फ़ॉन्ट पहला था जिसे हमने फिर से ढालना आरम्भ किया। मुझे आशा है कि वह इस सप्ताह के अन्त तक, आरम्भ होने के ठीक एक पखवाड़े बाद, पूरा हो जाएगा। अगला हिन्दुस्तानी पवित्रशास्त्र के लिए छोटा देवनागरी होगा, और उसके बाद संस्कृत के लिए बड़ा। मुझे आशा है कि यह एक महीने में और पूरा हो जाएगा। अन्य फ़ॉन्ट, अर्थात् बंगला, उड़िया, सिख, तेलिंगा, सिंहली, मराठा, बर्मी, कश्मीरी, अरबी, फ़ारसी और चीनी, क्रम से आएँगे, और सम्भवतः छः या सात महीनों में पूरे हो जाएँगे, सिवाय चीनी के, जिसकी पूर्ति में एक वर्ष से अधिक लगेगा। इसलिए मुझे भरोसा है कि हमें बहुत अधिक देर नहीं होगी। हमारी अंग्रेज़ी रचनाओं में सबसे अधिक देर होगी; परन्तु सामान्यतः वे सबसे कम महत्व की हैं। जली हुई पाण्डुलिपियों में सबसे अधिक हानि मेरी हुई है; अर्थात् जो कुछ मैंने स्वयं तैयार किया था, और जिसकी छपाई के लिए सारी दोहराई मुझ पर निर्भर थी, वही नष्ट हुई पाण्डुलिपियों का मुख्य भाग है। उसी भूमि पर फिर से चलना होगा, परन्तु इससे छपाई में कोई देरी होने की आवश्यकता नहीं। सब अनुवाद पहले विभिन्न भाषाओं में पण्डितों द्वारा लिखे जाते हैं, सिवाय संस्कृत के, जिसे मैं एक लिपिक को बोलकर लिखवाता हूँ। सिख, मराठा, हिन्दुस्तानी, उड़िया, तेलिंगा, असमिया और कर्नाटी का पण्डितों द्वारा मोटे तौर पर फिर से अनुवाद हो रहा है, जो लम्बे समय से अपने काम के अभ्यस्त हैं और पहले भी उस भूमि पर चल चुके हैं। मैं दोहराई में उनके पीछे चलता हूँ, जिसका मुख्य भाग तब होता है जब पन्ने छापेखाने से गुज़रते हैं, और यही काम का कहीं सबसे भारी भाग है। संस्कृत में से केवल शमूएल की दूसरी पुस्तक और राजाओं की पहली पुस्तक नष्ट हुई। उड़िया की लगभग कोई भी, और कश्मीरी या बर्मी की कोई भी पाण्डुलिपि नष्ट नहीं हुई—(नष्ट हुई वस्तुएँ ये हैं:) मेरे बंगला शब्दकोश के लगभग तीस पृष्ठों की सामग्री, एक तेलिंगा व्याकरण की पूरी प्रति, पंजाबी या सिख भाषा के व्याकरण की प्रति का एक भाग, और वह सारी सामग्री जो मैं संस्कृत से निकली सब भाषाओं के एक शब्दकोश के लिए लम्बे समय से इकट्ठा कर रहा था। फिर भी मुझे आशा है कि यदि मेरा जीवन बढ़ाया गया, तो मैं इस हानि की पूर्ति करने और अपनी प्रिय योजना को पूरा करने में समर्थ किया जाऊँगा।”
इन सीधे-सादे विद्वानों ने, जो पूरी तरह अपने काम में डूबे थे, स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि यह आग उन्हें और उनके काम को भारत के साथ-साथ पूरे यूरोप और अमेरिका में प्रसिद्ध करने का साधन सिद्ध होगी। हर मसीही विचारधारा के लोगों की, और उन लोगों की भी जो केवल उनके उद्यम के साहित्यिक और लौकिक पक्ष में रुचि रखते थे, सक्रिय सहानुभूति जाग उठी। केवल धन की हानि, उस समय की विनिमय-दर पर, दस हज़ार पाउंड से कम नहीं थी। पचास दिनों में यह राशि अकेले इंग्लैंड और स्कॉटलैंड में इकट्ठी हो गई, यहाँ तक कि फ़ुलर ने अपने अन्तिम दौरे से लौटकर अपनी समिति के कमरे में प्रवेश करते हुए घोषणा की, “हमें चन्दा रोकना होगा।” उदाहरण के लिए, ग्रीनॉक में एक रविवार को हर आराधना-स्थल में धन इकट्ठा किया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका में फ़िलाडेल्फ़िया के एक प्रेस्बिटेरियन व्यापारी श्री रॉबर्ट राल्सटन ने, जो केरी के पत्र-मित्र के रूप में भारत के मिशनों की सहायता करनेवाले पहले अमेरिकी साधारण विश्वासी थे, और डॉ. स्टॉटन ने, जिन्होंने अमेरिका जा बसने से पहले 1792 में सोसाइटी के गठन में रुचि ली थी, लम्बे समय से अनुवाद-कार्य में सहायता की थी, और अब जबकि जडसन इधर आने के मार्ग में थे, उन्होंने अपने प्रयत्न दुगुने कर दिए। भारत में टॉमसन की अपनी मण्डली ने मिशनरियों को £800 भेजे, और ब्राउन ने अपनी मृत्यु-शय्या से प्रेमपूर्ण सहायता का सन्देश लिखा। कलकत्ता के समाचार-पत्रों में भी यह उत्साह फैल गया; एक प्रमुख सम्पादकीय लेख इस आश्वासन के साथ समाप्त हुआ कि श्रीरामपुर का छापाखाना “प्राचीन काल के फ़ीनिक्स पक्षी के समान अपनी राख से उठेगा, नई शक्ति के पंख लेकर, और एक ऊँची और दीर्घकालीन उड़ान में पूरे पूर्व में ज्ञान के लाभों को दूर-दूर तक फैलाने के लिए ठहराया हुआ।” आग का धुआँ थमने के अगले ही दिन मनोहर पिघली हुई धातु के ढेलों से टाइप ढालने के काम में लग गए।
पहला समाचार पहुँचने के दो महीने के भीतर फ़ुलर उन नगरों और कलीसियाओं को, जिन्होंने चन्दा दिया था, इन्हीं टाइपों से छपे तमिल नए नियम के पन्नों की कतरनें “फ़ीनिक्स के पंख” के रूप में भेजने में समर्थ हुए। हर पखवाड़े एक फ़ॉन्ट ढाला गया; एक महीने में सारा देशी कर्मचारी-वर्ग दिन-रात काम में लगा था। छः महीनों में पूर्वी टाइपों की सारी हानि की पूर्ति हो गई। रामायण का अनुवाद और संस्कृत बहुभाषी शब्दकोश फिर कभी आरम्भ नहीं किए गए। परन्तु बाइबल-अनुवादों और व्याकरणों के विषय में केरी और उनके दो वीर भाइयों ने लिखा:—“प्रयत्न करने पर हमने पाया कि उसी भूमि पर दूसरी बार चलने के लाभ इतने बड़े थे कि उन्होंने दूसरे अनुवाद में लगाए जानेवाले आवश्यक समय की पूरी भरपाई कर दी।” वास्तव में उस आग ने, जिसका कारण कभी पता नहीं चला, और जिसके विरुद्ध बीमा उस समय भारत में था ही नहीं, संशोधित संस्करणों को जन्म दिया था।
