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यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
I.—श्रीरामपुर कॉलेज का निगमन-अधिकारपत्र (चार्टर ऑफ़ इनकॉर्पोरेशन)
हम, फ़्रेडरिक षष्ठ, परमेश्वर के अनुग्रह से डेनमार्क, वेंडों और गॉथों के राजा, श्लेसविग होल्स्टीन, स्टोर्मार्न, डिटमार्शन, लिमेसबोर्ग और ओल्डेनबोर्ग के ड्यूक, इन लेखों के द्वारा यह प्रकट करते और सार्वजनिक रूप से घोषित करते हैं कि, चूँकि बंगाल में स्थित हमारे नगर फ़्रेडरिक्सनगर (अथवा श्रीरामपुर) के निवासी, डॉक्टर ऑफ़ डिविनिटी विलियम केरी और जोशुआ मार्शमैन, तथा जॉन क्लार्क मार्शमैन, एस्क्वायर, भारत में, विशेषकर देशी मसीही जनसंख्या के बीच, भक्ति और विद्या को बढ़ावा देने के लिए एक कॉलेज स्थापित करने की इच्छा रखते हुए, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त भवन खड़े कर चुके हैं और उपयुक्त पुस्तकें, मानचित्र आदि ख़रीद और एकत्र कर चुके हैं, और उन्होंने नम्रतापूर्वक हमसे विनती की है कि हम उन्हें, तथा ऐसे व्यक्तियों को जो उनके और उनके उत्तराधिकारियों के द्वारा आगे बताई जानेवाली रीति से कॉलेज की परिषद् (काउंसिल) बनाने के लिए चुने जाएँ, अपना राजकीय निगमन-अधिकारपत्र (रॉयल चार्टर) प्रदान करें, ताकि वे ऊपर कहे गए प्रयोजनों को और भी प्रभावी रूप से कार्यान्वित कर सकें:—अतः हम, ऐसे प्रशंसनीय उपक्रम को प्रोत्साहित करने की इच्छा से, अपने विशेष अनुग्रह और स्वेच्छा से यह ठहराया, स्थापित किया, प्रदान किया और घोषित किया है, और इन लेखों के द्वारा हम अपनी, अपने वारिसों और उत्तराधिकारियों की ओर से यह ठहराते, स्थापित करते, प्रदान करते और घोषित करते हैं:
1. कि उक्त विलियम केरी, जोशुआ मार्शमैन और जॉन क्लार्क मार्शमैन, तथा ऐसा अन्य व्यक्ति या ऐसे अन्य व्यक्ति जो आगे बताई गई रीति से क्रमशः उक्त कॉलेज की परिषद् के रूप में चुने और नियुक्त किए जाएँ, इन लेखों के बल से अब से सदा के लिए उपर्युक्त प्रयोजनों के निमित्त “श्रीरामपुर कॉलेज” के नाम से एक राजनीतिक एवं निगमित निकाय होंगे, जिसका उत्तराधिकार निरन्तर बना रहेगा और जिसकी एक सामान्य मुहर होगी, और उक्त नाम से वे हमारी, हमारे वारिसों और उत्तराधिकारियों की प्रत्येक अदालत और स्थान में मुकद्दमा दायर कर सकेंगे और उन पर मुकद्दमा दायर किया जा सकेगा, वे अभियोग चला सकेंगे और उन पर अभियोग चलाया जा सकेगा, तथा वे उत्तर दे सकेंगे और उन्हें उत्तर दिया जा सकेगा।
2. और हम इसके द्वारा ठहराते, स्थापित करते और घोषित करते हैं कि इसके द्वारा निगमित किए गए व्यक्ति और उनके उत्तराधिकारी सदा के लिए विधि की दृष्टि से इस बात के लिए सक्षम होंगे कि वे अपने और अपने उत्तराधिकारियों के लिए किसी भी प्रकार का माल और चल सम्पत्ति ख़रीदें, रखें और उसका उपभोग करें, और वे तथा उनके उत्तराधिकारी किसी भी प्रकार की भूमि, भवन या पैतृक सम्पत्ति प्राप्त करें, ख़रीदें, रखें और उसका उपभोग करें; और कि उन्हें पूर्वोक्त रीति से अपने द्वारा अर्जित किसी भी अचल या चल सम्पत्ति को बेचने, बदलने या अन्य प्रकार से उसका निपटारा करने का पूरा अधिकार और सामर्थ्य होगा, जब तक कि ऐसी सम्पत्ति का विक्रय या हस्तान्तरण उसके दाता या दाताओं के द्वारा विशेष रूप से निषिद्ध न किया गया हो; और वे उक्त कॉलेज या निगम से सम्बन्धित सब कार्य उतनी ही व्यापक रीति या रूप में कर सकेंगे जितनी व्यापक रीति से हमारी कोई भी स्वामिभक्त प्रजा, या हमारे उक्त राज्य अथवा उसके अधीन क्षेत्रों में कोई भी अन्य राजनीतिक या निगमित निकाय कर सकता है या करने में समर्थ है।
3. और हम इसके द्वारा ठहराते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि प्रोफ़ेसरों, फ़ेलो अथवा छात्र-शिक्षकों (स्टूडेंट ट्यूटर) और विद्यार्थियों की संख्या अनिश्चित रहेगी, और कि उक्त विलियम केरी, जोशुआ मार्शमैन और जॉन क्लार्क मार्शमैन उक्त कॉलेज की पहली परिषद् होंगे; और कि यदि उनके जीवन-काल में उन्हें आवश्यक प्रतीत हो, अथवा उक्त पहली परिषद् के तीन सदस्यों में से किसी एक की मृत्यु हो जाए, तो जीवित बचे सदस्य या सदस्य अपने-अपने हस्ताक्षर और मुहर के अधीन ऐसे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को कॉलेज की परिषद् के सदस्य होने के लिए नियुक्त करेंगे और कर सकेंगे, और वे एक-दूसरे के उत्तराधिकारी होकर उसी क्रम में उक्त परिषद् के सदस्य बनेंगे जिस क्रम में वे नियुक्त किए जाएँ, इस अभिप्राय से कि उक्त कॉलेज की परिषद् में सदा कम से कम तीन व्यक्ति रहें।
4. और हम इसके द्वारा आगे ठहराते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि उक्त कॉलेज के उत्तम शासन और उसके कार्यों के उत्तम प्रबन्ध के लिए, पहली परिषद् के सदस्य उक्त विलियम केरी, जोशुआ मार्शमैन और जॉन क्लार्क मार्शमैन को इन लेखों की तिथि से दस वर्ष की अवधि तक ऐसे विधान (स्टैच्यूट) बनाने और स्थापित करने का पूरा अधिकार और सामर्थ्य होगा जो उन्हें उक्त कॉलेज के शासन के लिए उपयोगी और आवश्यक प्रतीत हों; और उन विधानों में वे उन अधिकारों को परिभाषित करेंगे जो उनके उत्तराधिकारियों को, प्रोफ़ेसरों को, फ़ेलो अथवा छात्र-शिक्षकों को और उसके अन्य अधिकारियों को सौंपे जाएँगे, और उन कर्तव्यों को भी जिन्हें ये लोग क्रमशः सम्पदाओं, भूमियों, राजस्व और माल के प्रबन्ध के लिए—तथा उक्त कॉलेज के कामकाज के लिए—पूरा करेंगे, और परिषद्, प्रोफ़ेसरों, फ़ेलो अथवा शिक्षकों, अधिकारियों, विद्यार्थियों और सेवकों में से प्रत्येक और सबके प्रस्तावित किए जाने, चुने जाने, प्रवेश दिए जाने और हटाए जाने की रीति को भी; और वे सामान्यतः ऐसे सब अन्य विधान बनाएँगे और स्थापित करेंगे जो उन्हें उक्त कॉलेज के भावी उत्तम शासन और समृद्धि के लिए आवश्यक प्रतीत हों, बशर्ते कि ये विधान हमारे राज्य के क़ानूनों और विधानों के विरुद्ध न हों।
5. और हम इसके द्वारा आगे ठहराते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि पहली परिषद् के उक्त तीन सदस्यों के द्वारा इस प्रकार बनाए और स्थापित किए गए, और उनके अपने-अपने हस्ताक्षर के अधीन लिखित रूप में दिए या छोड़े गए विधान, इन लेखों की तिथि से दस वर्ष की समाप्ति पर मान्य और पूर्ण रूप से प्रभावी होंगे, इस प्रकार कि कॉलेज की किसी भी भावी परिषद् को उन्हें किसी भी रीति से बदलने, परिवर्तित करने या उनमें फेर-बदल करने का अधिकार न होगा, और वे विधान सदा के लिए उक्त कॉलेज का संविधान माने जाएँगे। और हम इसके द्वारा नियुक्त और घोषित करते हैं कि ये विधान केवल उक्त विलियम केरी, जोशुआ मार्शमैन और जॉन क्लार्क मार्शमैन के द्वारा ही बनाए और स्थापित किए जाएँगे, इस प्रकार कि यदि उनमें से कोई दस वर्ष की समाप्ति से पहले मर जाए, तो इन विधानों को पूरा करने या पूर्ण रूप देने का अधिकार पूरी तरह जीवित बचे सदस्यों या सदस्य पर आ जाएगा; और कि यदि वे तीनों ही दस वर्ष की समाप्ति से पहले मर जाएँ, तो वे विधान जिन्हें उन्होंने अपने हस्ताक्षर के अधीन, या उनमें से अन्तिम जीवित व्यक्ति के हस्ताक्षर के अधीन, लिखित रूप में छोड़ा हो, “श्रीरामपुर कॉलेज के मौलिक विधान और संविधान” माने जाएँगे, जिनमें न कुछ जोड़ा जा सकेगा और न कुछ बदला जा सकेगा, और उन्हें “श्रीरामपुर कॉलेज के विधान और संविधान” के रूप में हमारे राजकीय चांसरी-न्यायालय में पंजीकृत किया जाएगा और किया जा सकेगा।
6. और हम इसके द्वारा आगे नियुक्त करते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि पूर्वोक्त दस वर्ष के समय में उक्त कॉलेज के विधानों के पूरे हो जाने के पश्चात् से, कॉलेज की उक्त परिषद् में एक मास्टर अथवा अध्यक्ष (प्रेसिडेंट) और दो या चार सदस्य माने जाएँगे, जो विधानों के निर्देश के अनुसार प्रोफ़ेसर या अन्य हो सकते हैं, इस प्रकार कि उक्त परिषद् में, जैसा विधानों में निर्धारित किया जाए, तीन से कम और पाँच से अधिक व्यक्ति न हों। परिषद् का चुनाव सदा उसी प्रकार होगा जैसा कॉलेज के विधान निर्देश दें, तौभी उक्त मास्टर अथवा अध्यक्ष सदा पहले से उक्त कॉलेज का सदस्य रहा हो; और उक्त मास्टर अथवा अध्यक्ष की मृत्यु होने पर, उक्त कॉलेज की परिषद् किसी नए मास्टर अथवा अध्यक्ष की नियुक्ति तक, ऐसे मास्टर की नियुक्ति को छोड़कर, कोई भी कार्य या कृत्य करने में असमर्थ होगी।
7. और हम आगे नियुक्त करते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि पहली परिषद् के सदस्य उक्त विलियम केरी, जोशुआ मार्शमैन और जॉन क्लार्क मार्शमैन, और सदा के लिए उनके उत्तराधिकारी, उक्त कॉलेज के विद्यार्थियों को, देशी मसीहियों को और अन्य लोगों को भी, उनकी योग्यता के अनुसार पद और सम्मान की उपाधियाँ उतनी ही व्यापक रीति से प्रदान करने का अधिकार रखेंगे जितनी व्यापक रीति से कोई अन्य ऐसा कॉलेज रखता है, तौभी उक्त श्रीरामपुर कॉलेज को ऐसी उपाधियाँ केवल उन विद्यार्थियों को प्रदान करने का अधिकार होगा जो विज्ञान में अपनी योग्यता प्रमाणित करें, और हमारे राज्य-क्षेत्रों में उनके साथ कोई पद या अन्य विशेष अधिकार जुड़ा न होगा। और हम इसके द्वारा आगे नियुक्त करते, प्रदान करते और घोषित करते हैं कि उक्त दस वर्ष की समाप्ति के पश्चात्, कॉलेज की उक्त परिषद् और सदा के लिए उसके उत्तराधिकारी ऐसे आदेश और उपनियम बनाने और स्थापित करने का अधिकार रखेंगे जो उन्हें उक्त कॉलेज के शासन के लिए उपयोगी और आवश्यक प्रतीत हों, और पहले से बने हुए उपनियमों को बदलने, स्थगित करने या रद्द करने का, और समय-समय पर उनके स्थान पर ऐसे नए उपनियम बनाने का जो उन्हें सबसे उचित और हितकर प्रतीत हों, बशर्ते कि वे कॉलेज के विधानों या हमारे राज्य के क़ानूनों के प्रतिकूल न हों; और कि इन दस वर्षों की समाप्ति के पश्चात् परिषद् के किसी भी सदस्य को किसी नए उपनियम को लागू करने, या किसी विद्यमान उपनियम को बदलने, स्थगित करने या रद्द करने का प्रस्ताव रखने का अधिकार होगा, बशर्ते कि ऐसे प्रस्ताव की सूचना लिखित रूप में मास्टर को दी गई हो और उक्त कॉलेज की परिषद् की किसी पिछली बैठक में अध्यक्ष-आसन से पढ़कर सुनाई गई हो; परन्तु ऐसा कोई प्रस्ताव तब तक स्वीकृत नहीं माना जाएगा जब तक उस पर विशेष रूप से उसी प्रयोजन के लिए बुलाई गई किसी दूसरी बैठक में विचार न किया गया हो और गुप्त मतदान द्वारा निर्णय न हुआ हो, और तब उपस्थित सदस्यों के बहुमत ने उसके पक्ष में मत न दिया हो; और इसमें, जैसे अन्य सब मामलों में, यदि मत बराबर हों, तो मास्टर अथवा अध्यक्ष का निर्णायक मत होगा। हमारे प्रभु के वर्ष एक हज़ार आठ सौ सत्ताईस की फ़रवरी के तेईसवें दिन, हमारे राज्य के उन्नीसवें वर्ष में, कोपेनहेगन स्थित हमारे राजमहल में दिया गया। हमारे राजकीय हस्ताक्षर और मुहर के अधीन। फ़्रेडरिक आर.
II.—श्रीरामपुर कॉलेज के विधान और नियम
12 जून, 1833।
1. डेनमार्क के महामहिम के द्वारा प्रदान किए गए अधिकारपत्र (चार्टर) की तीसरी धारा ने श्रीरामपुर कॉलेज की पहली परिषद् को यह अधिकार दिया है कि वह अपने जीवन-काल में अपने हस्ताक्षर और मुहर के अधीन ऐसे अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को सहकर्मी या उत्तराधिकारी मनोनीत करे जो उसे सबसे उचित प्रतीत हों, ताकि परिषद् में सदा कम से कम तीन व्यक्ति रहें; अतः परिषद् में उनके उत्तराधिकारी भी इसी प्रकार अपने जीवन-काल में, अपने-अपने हस्ताक्षर और मुहर के अधीन, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को मनोनीत करने में सक्षम होंगे जिन्हें वे उस समय विद्यमान रिक्त स्थानों को, या उनकी मृत्यु पर होनेवाले रिक्त स्थानों को, भरने के लिए सबसे उचित समझें; इस प्रकार मनोनीत और चुने गए सदस्य अपने मनोनयन के क्रम में परिषद् में उत्तराधिकारी होंगे।
2. अधिकारपत्र में यह निश्चित किया गया है कि परिषद् में मास्टर अथवा अध्यक्ष और कम से कम दो, परन्तु चार से अधिक नहीं, सदस्य होने चाहिए, और कि मास्टर की मृत्यु पर जब तक दूसरा न चुना जाए तब तक कोई कार्य न किया जाए; अतः तत्कालीन मास्टर और परिषद् अपने-अपने हस्ताक्षर और मुहर के अधीन अगले मास्टर की नियुक्ति करेंगे। यदि किसी मास्टर की मृत्यु पर कोई ऐसा व्यक्ति न पाया जाए जो परिषद् के बहुमत के हस्ताक्षर और मुहर के अधीन इस प्रकार नियुक्त किया गया हो, तो परिषद् का वरिष्ठ सदस्य मास्टर के रूप में उत्तराधिकारी होगा।
3. अधिकारपत्र ने निर्णायक मत मास्टर को दिया है, अतः सब मामलों में, जब मत बराबर हों, निर्णायक मत मास्टर का होगा, और यदि कोई मास्टर न हो, तो वह परिषद् के वरिष्ठ सदस्य का होगा।
4. विद्या और भक्ति मसीहियों के किसी एक सम्प्रदाय की ही विशेषता नहीं हैं, इसलिए संस्था के मूल उद्देश्य को बनाए रखने के लिए परिषद् का एक सदस्य सदा बैपटिस्ट के अतिरिक्त किसी अन्य सम्प्रदाय का भी हो सकता है; परन्तु यदि किसी मास्टर के चुनाव के समय परिषद् के सदस्य बराबर-बराबर बँट जाएँ, तो वह पक्ष जो पूरी तरह बैपटिस्ट सम्प्रदाय का हो, निर्णायक मत रखेगा, चाहे उसमें मास्टर सम्मिलित हो या न हो।
5. कॉलेज का प्रबन्ध, जिसमें उसका राजस्व और सम्पत्ति, प्रोफ़ेसर और शिक्षकों का चुनाव, विद्यार्थियों का प्रवेश, सब पदाधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति, और कॉलेज की सामान्य व्यवस्था और शासन सम्मिलित हैं, सदा मास्टर और परिषद् के हाथ में रहेगा। मास्टर यह देखेगा कि परिषद् के विधान और नियम विधिवत् कार्यान्वित हों, और सब बातों में कॉलेज के उत्तम शासन का प्रबन्ध करेगा। सब विलेखों, लिखतों, दस्तावेज़ों और कार्यवाहियों की मान्यता के लिए उसके हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
6. “पहली परिषद् और सदा के लिए उसके उत्तराधिकारी” को अधिकारपत्र के द्वारा यह अधिकार दिया गया है कि वे अन्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के समान “पद और सम्मान की ऐसी उपाधियाँ प्रदान करें जो विद्या को प्रोत्साहन दें,” अतः वे समय-समय पर ज्ञान और विज्ञान की उन शाखाओं में, जिनका वहाँ अध्ययन किया जाए, उसी रीति से उपाधियाँ प्रदान करेंगे जिस रीति से डेनमार्क, जर्मनी और ग्रेट ब्रिटेन के विश्वविद्यालय करते हैं। ऐसा करने में मास्टर और परिषद् अपनी इच्छा से (ad libitum) श्रीरामपुर कॉलेज के किसी भी या सब प्रोफ़ेसरों की सहायता ले सकेंगे। ऐसी सब उपाधियाँ उस व्यक्ति के लिए, जिसे वे प्रदान की जाएँ, पूर्णतः निःशुल्क होंगी, चाहे वह भारत में हो, यूरोप में हो या अमेरिका में।
7. श्रीरामपुर कॉलेज में किसी को भी शपथ नहीं दिलाई जाएगी, न परिषद् के सदस्यों को, न प्रोफ़ेसरों और शिक्षकों को, और न विद्यार्थियों को। सब मामलों में शपथ के स्थान पर एक गम्भीर प्रतिज्ञा स्वीकार की जाएगी, जो विधिवत् अभिलिखित हो और सम्बन्धित व्यक्ति के द्वारा हस्ताक्षरित हो।
8. श्रीरामपुर कॉलेज में मास्टर के पद से लेकर सबसे निचले विद्यार्थी के स्थान तक, किसी भी पद या स्थान के लिए विवाह बाधा नहीं होगा।
9. श्रीरामपुर कॉलेज में प्रोफ़ेसरों और शिक्षकों के वेतन परिषद् के द्वारा निर्धारित किए जाएँगे, और सब पदाधिकारियों, विद्यार्थियों और सेवकों के भरण-पोषण के साधन परिषद् के द्वारा उस रीति से नियमित किए जाएँगे जो संस्था के उद्देश्यों को सबसे अच्छी तरह बढ़ाए।
10. यह अभिप्राय है कि सामान्यतः न मास्टर और न परिषद् का कोई सदस्य कोई वेतन पाए। परन्तु कोई भी मास्टर जो पहले से कॉलेज में न रहता हो, उसे अपने और अपने परिवार के लिए वहाँ बिना किराए का निवास-स्थान मिलेगा। और यदि परिषद् यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसे वह विद्या और भक्ति में प्रतिष्ठित समझती हो, इस दृष्टि से परिषद् का सदस्य चुने कि परखने पर यदि वह उसे योग्य समझे तो उसे मास्टर चुन ले, तो परिषद् उसके लिए ऐसा वेतन नियत करने में सक्षम होगी जिसे वह आवश्यक समझे, परन्तु वह किसी प्रोफ़ेसर को दिए जानेवाले सबसे ऊँचे वेतन से अधिक न होगा।
11. चूँकि कॉलेज के संस्थापक मसीह के ईश्वरत्व और प्रायश्चित पर विश्वास को जीवित मसीहियत के लिए अनिवार्य मानते हैं, जिसका प्रसार ही इस संस्था का महान उद्देश्य है, इसलिए कोई भी व्यक्ति जिसके विषय में यह ज्ञात हो कि वह इन सिद्धान्तों का विरोध करता है, कॉलेज-परिषद् या किसी प्रोफ़ेसर-पद के लिए योग्य नहीं होगा; और यदि प्रोफ़ेसरों में से कोई या परिषद् का कोई सदस्य अपने चुनाव के पश्चात् दुर्भाग्यवश अपने विचार ऐसे बदल ले कि मसीहियत के इन मौलिक सिद्धान्तों का विरोध करने लगे, तो उसकी शिक्षा या उसके लेखों से यह बात स्पष्ट और निर्णायक रूप से प्रमाणित हो जाने पर, वह उस पद को, जिस पर वह पहले था, रिक्त कर देगा। परन्तु कॉलेज-परिषद् की ओर से इस प्रकार की हर कार्यवाही, उन प्रमाणों के साथ जिन पर वह आधारित हो, अगली रिपोर्ट के परिशिष्ट के रूप में मसीही जगत के सामने प्रकाशित की जाएगी।
12. परिषद् के सदस्य कॉलेज के प्रोफ़ेसरों में से, या भारत, यूरोप या अमेरिका के किसी भी ऐसे व्यक्ति में से चुने जा सकते हैं जिसे कॉलेज-परिषद् विद्या, भक्ति और प्रतिभा की दृष्टि से उपयुक्त समझे।
13. परिषद् के विवेक पर विद्यार्थी मसीहियों के किसी भी समुदाय से प्रवेश पा सकते हैं, चाहे वे प्रोटेस्टेंट हों, रोमन कैथोलिक हों, यूनानी (ग्रीक) कलीसिया के हों या आर्मीनियाई कलीसिया के; और अध्ययन के प्रयोजन से मुसलमान और हिन्दू युवक भी, जिनकी रीतियाँ उन्हें कॉलेज में रहने से रोकती हैं। कोई भी जाति, रंग या देश किसी भी मनुष्य को श्रीरामपुर कॉलेज में प्रवेश से वंचित नहीं करेगा।
14. खुली अनैतिकता, सुधार न माननेवाले आलस्य, कॉलेज के विधानों और नियमों की उपेक्षा, या कॉलेज के अधिकारियों की बार-बार अवज्ञा के मामलों में निष्कासन का दण्ड दिया जाएगा।
15. भारत, यूरोप या अमेरिका का कोई भी व्यक्ति ग्रेट ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की ही रीति से, विद्या को प्रोत्साहन देने के लिए, कोई भी प्रोफ़ेसर-पद स्थापित करने, या श्रीरामपुर कॉलेज के साथ कोई वार्षिक छात्रवृत्ति या पुरस्कार जोड़ने के लिए स्वतन्त्र होगा, और वह ऐसे दान-निधि को अपनी इच्छा के अनुसार नियमित करेगा; और कॉलेज-परिषद् का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे दानों को, जहाँ तक वे कॉलेज के विधानों के अनुकूल हों, दाताओं की इच्छा के ठीक-ठीक अनुसार कार्यान्वित करे।
16. कॉलेज की पहली परिषद् या उसके उत्तराधिकारियों के लिए कोई भी उपनियम बनाना और रद्द करना वैध होगा, बशर्ते कि वे इन विधानों के विरुद्ध न हों।
17. अधिकारपत्र ने यह घोषित किया है कि श्रीरामपुर कॉलेज में प्रोफ़ेसरों और विद्यार्थियों की संख्या असीमित रहेगी, अतः उसे इसी प्रकार असीमित छोड़ा जाएगा, और वह संख्या केवल परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण व्यवस्था और भारत, यूरोप और अमेरिका की जनता की उदारता के द्वारा ही नियमित होगी।
III.—श्रीरामपुर को ब्रिटिश सरकार को हस्तान्तरित करनेवाली क्रय-सन्धि का अनुच्छेद VI, खण्ड 2
“श्रीरामपुर कॉलेज को 23 फ़रवरी, 1827 के राजकीय अधिकारपत्र के द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों और उन्मुक्तियों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, वरन् वे ब्रिटिश भारत के सामान्य क़ानून के अधीन उसी प्रकार प्रभावी बने रहेंगे मानो वे ब्रिटिश सरकार के अधिकारपत्र के द्वारा प्राप्त किए गए हों।”
