इस पुस्तक में खोजें
यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
1834 में विलियम केरी की मृत्यु पर डॉ. जोशुआ मार्शमैन ने अपने उस महान सहकर्मी का जीवन-चरित लिखने का वचन दिया, जिसके साथ सदी के आरम्भ से ही उनकी लगभग प्रतिदिन बातचीत होती रही थी; परन्तु वे इतने थोड़े समय तक जीवित रहे कि इस कार्य को आरम्भ भी न कर सके। 1836 में रेवरेंड यूस्टस केरी ने उनसे पहले ही एक पुस्तक निकाल दी, जो बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी की समिति के अनुरोध पर तैयार किए गए काट-छाँटकर बिगाड़े हुए पत्रों और दैनन्दिनियों के एक संकलन से कुछ अधिक नहीं है। फिर भी उसमें एक अनुच्छेद मूल्यवान है। डॉ. केरी ने एक बार अपने भतीजे से, जिसके इरादे पर उन्हें सम्भवतः सन्देह हो गया था, कहा था, “यूस्टस, यदि मेरे चले जाने के बाद कोई मेरा जीवन-चरित लिखना सार्थक समझे, तो मैं तुम्हें एक कसौटी देता हूँ जिससे तुम उसकी सच्चाई को परख सकोगे। यदि वह मुझे एक धुन का पक्का, धीरे-धीरे परिश्रम करते रहनेवाला व्यक्ति माने, तो वह मेरा ठीक वर्णन करेगा। इससे बढ़कर कुछ भी कहना बहुत अधिक होगा। मैं लगातार परिश्रम कर सकता हूँ। मैं किसी भी निश्चित कार्य में स्थिर बना रह सकता हूँ। इसी के लिए मैं हर बात का ऋणी हूँ।”
1859 में श्री जॉन मार्शमैन ने इंग्लैंड अन्तिम बार लौट आने के बाद “केरी, मार्शमैन और वार्ड का जीवन और समय” (The Life and Times of Carey, Marshman, and Ward) प्रकाशित की, जो श्रीरामपुर मिशन का एक मूल्यवान इतिहास और उसका पक्ष-समर्थन है, परन्तु वह केरी की अपेक्षा उनके अपने पिता की जीवनी अधिक है।
जब मैं पहली बार श्रीरामपुर गया, तब उस महान मिशनरी की मृत्यु को बीस वर्ष भी नहीं हुए थे। “फ़्रेंड ऑफ़ इंडिया” के सम्पादक के रूप में वहाँ अपने लम्बे निवास के दौरान, मैं उस कार्य के स्वरूप को उसके अधिकांश विवरणों सहित जान गया जो केरी ने सदी के पहले तिहाई भाग में भारत के लिए और मसीही जगत के लिए किया था। मैंने उनकी जीवनी के लिए ऐसी सामग्री इकट्ठी करनी आरम्भ की जो कार्यालय में, छापाखाने में और कॉलेज में, तथा उन देशी मसीहियों और ब्राह्मण पण्डितों के बीच मिल सकती थी जिन पर उनका प्रभाव पड़ा था। ऐसी सामग्री और अनुभव के अतिरिक्त, मुझे केरी द्वारा लिखे गए या उनसे सम्बन्धित बहुत-से अप्रकाशित पत्रों का उपयोग करने का सौभाग्य भी मिला है; इस सौजन्य के लिए मैं यहाँ श्रीमती एस. केरी, साउथ बैंक, रेड हिल; फ़्रेडरिक जॉर्ज केरी, एस्क्वायर, एलएल.बी., लिंकन्स इन; और टिवर्टन के रेवरेंड जोनाथन पी. केरी को धन्यवाद देना चाहता हूँ।
श्रीरामपुर के केरी, हेनरी मार्टिन, कलकत्ता के डफ़, और बम्बई के विल्सन की मेरी जीवनियाँ लगभग सवा सौ वर्षों की अवधि को, अर्थात 1761 से 1878 तक के समय को, समेटती हैं। वे भारत की मसीही कलीसिया के उस इतिहास में योगदान के रूप में लिखी गई हैं जिसे किसी दिन उसके अपने ही किसी देशी पुत्र को लिखने का प्रयत्न करना होगा; और अंग्रेज़ी-भाषी जातियों के इतिहास में योगदान के रूप में भी, जिन्हें केरी द्वारा आरम्भ किए गए विदेशी मिशनों ने गैर-मसीही संसार का शासक और उसे सभ्य बनानेवाला बना दिया है।
