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दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी यहेजकेल 15:2-4 -- हे मनुष्य की सन्तान, दाखलता का वृक्ष अन्य वृक्षों से किस बात में बढ़कर है? या उस डाली से जो वन के वृक्षों में है? क्या उस में से लकड़ी लेकर किसी काम में लाई जाती है? या क्या मनुष्य उस में से खूंटी बनाकर उस पर कोई बर्तन टांगते हैं? देख, वह ईंधन के लिये आग में झोंकी जाती है; आग उसके दोनों सिरों को खा जाती है, और बीच का भाग भी जल जाता है: क्या वह किसी काम के योग्य है?
परमेश्वर की दृश्य कलीसिया की तुलना यहां दाखलता के वृक्ष से की गई है, जैसा कि इस दृष्टान्त की परमेश्वर की अपनी व्याख्या से पद 6, 7, और 8 में स्पष्ट है, "इसलिये प्रभु यहोवा यों कहता है, जैसा मैं ने वन के वृक्षों में की दाखलता की लकड़ी को ईंधन के लिये आग में दे दिया है, वैसा ही मैं यरूशलेम के निवासियों को भी दे दूंगा," इत्यादि। और इसे मनुष्यजाति पर साधारणतः भी लागू किया जा सकता है। हमें पवित्रशास्त्र में प्रायः मनुष्य की तुलना दाखलता से की गई मिलती है। इसी प्रकार व्यवस्थाविवरण के अध्याय 32 में, "उनकी दाखलता सदोम की दाखलता, और अमोरा के खेतों में की है; उनके अंगूर विष के अंगूर हैं।"
और भजन संहिता 80:8, "तू मिस्र में से एक दाखलता खोदकर निकाल लाया;" पद 14, "हे परमेश्वर, फिर आ, स्वर्ग में से देख, और इस दाखलता की सुधि ले।" और श्रेष्ठगीत 2:15, "हमारे लिये लोमड़ियों को, उन छोटी लोमड़ियों को जो दाख की बारियों को बिगाड़ती हैं, पकड़ लो; क्योंकि हमारी दाखलताओं में फूल लगे हैं।" यशायाह अध्याय 5 के आरम्भ में, "मेरे प्रीतम की एक दाख की बारी थी, और उस ने उस में उत्तम जाति की दाखलता लगाई।" यिर्मयाह 2:21, "मैं ने तो तुझे उत्तम जाति की दाखलता लगाया था।" होशे 10:1, "इस्राएल एक हरी-भरी दाखलता है।" इसी प्रकार यूहन्ना के अध्याय 15 में दृश्य मसीहियों की तुलना दाखलता की डालियों से की गई है।
मनुष्य को दाखलता के द्वारा बहुत ही उपयुक्त रीति से प्रदर्शित किया गया है। दाखलता की निर्बलता और उन वस्तुओं पर उसकी निर्भरता जो उसे सम्भाले रहती हैं, हमें भली भांति यह दिखाती है कि मनुष्य कैसा दीन, दुर्बल, परावलम्बी प्राणी है, और यदि वह अपने ऊपर ही छोड़ दिया जाए तो वह अवश्य विपत्ति में पड़ जाएगा और अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता। परमेश्वर के दृश्य लोगों की तुलना दाखलता से इसलिये उपयुक्त रीति से की गई है क्योंकि माली उनकी देखभाल और खेती करता है। इस्राएल देश में किसानों का अधिकांश काम अपनी दाख की बारियों में, दाखलताओं के विषय में होता था; और जो सावधानी वे उनकी बाड़ लगाने, उनकी रक्षा करने, उन्हें छांटने, उन्हें सहारा देने, और उनकी खेती करने में बरतते थे, वह उस दयालु देखभाल को भली भांति दर्शाती थी जो परमेश्वर अपने दृश्य लोगों के प्रति करता है; और पवित्रशास्त्र में यह उत्तरार्ध प्रायः स्पष्ट रीति से पूर्वार्ध से तुलना किया गया है।
अभी पढ़े गए वचनों में यह दिखाया गया है, 1. कि यदि दाखलता निष्फल हो जाए तो वह अन्य वृक्षों से भी बढ़कर कितनी पूर्णतः निकम्मी और निरुपयोगी है: "दाखलता का वृक्ष अन्य वृक्षों से, या वन के वृक्षों में की उस डाली से किस बात में बढ़कर है?" अर्थात यदि वह फल न लाए। मनुष्य दाखलता का मूल्य अन्य वृक्षों से कहीं अधिक आंकते हैं; वे उसकी बड़ी देखभाल करते हैं, उसकी बाड़ लगाते हैं, उसके चारों ओर खोदते हैं, उसे छांटते हैं, और इसी प्रकार के अन्य काम करते हैं। वह वन के किसी भी वृक्ष से कहीं अधिक आदर पाती है; उन वृक्षों को इसकी तुलना में तुच्छ समझा जाता है। और यदि वह फल लाए, तो वह वास्तव में अन्य वृक्षों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है; क्योंकि उसका फल एक उत्तम रस देता है; जैसा योताम के दृष्टान्त में कहा गया है, न्यायियों 9:13, "परन्तु दाखलता ने उन से कहा, क्या मैं अपने उस नए दाखमधु को छोड़ूं जो परमेश्वर और मनुष्य दोनों को आनन्दित करता है?"
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी परन्तु यदि वह फल न लाए, तो वह वन के वृक्षों से भी अधिक निरुपयोगी है; क्योंकि उनकी लकड़ी इमारती लकड़ी के काम आती है; परन्तु दाखलता की लकड़ी किसी काम के योग्य नहीं है; जैसा पाठ में कहा गया है, "क्या उस में से लकड़ी लेकर किसी काम में लाई जाती है? या क्या मनुष्य उस में से खूंटी बनाकर उस पर कोई बर्तन टांगते हैं?"
2. निष्फलता की दशा में दाखलता जिस एकमात्र काम की योग्य है, वह है ईंधन: "देख, वह ईंधन के लिये आग में झोंकी जाती है।" वह पूरी तरह भस्म हो जाती है; उसका कोई भी भाग बचाकर रखने योग्य नहीं, कि उससे किसी काम के लिये कोई साधन बनाया जाए।
सिद्धांत यदि मनुष्य परमेश्वर के लिये फल नहीं लाते, तो वे पूर्णतः निकम्मे हैं, सिवाय इसके कि वे अपने विनाश में ही उपयोगी हों।
इस सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिये मैं दिखाऊंगा, 1. कि यह अति स्पष्ट है, कि मनुष्य केवल दो ही रीति से उपयोगी हो सकता है, अर्थात या तो कार्य करने में, या फिर उस पर कार्य किए जाने और उसके प्रति व्यवहार किए जाने में।
2. कि मनुष्य सक्रिय रूप से परमेश्वर के लिये फल लाने के अतिरिक्त और किसी रीति से उपयोगी नहीं हो सकता।
3. कि यदि वह परमेश्वर के लिये फल नहीं लाता, तो निष्क्रिय रीति से उपयोगी होने का और कोई मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि वह नष्ट किया जाए।
4. कि इस रीति से वह बिना फल लाए भी उपयोगी हो सकता है।
I. मनुष्य केवल दो ही रीति से उपयोगी हो सकता है, अर्थात या तो कार्य करने में, या उस पर कार्य किए जाने में। यदि मनुष्य किसी उपयोगी प्रकार का प्राणी है, तो वह या तो सक्रिय रूप से या फिर निष्क्रिय रूप से ऐसा होगा: इसका कोई मध्य मार्ग नहीं। यदि वह किसी उद्देश्य के लिये उपयोगी है, तो वह या तो स्वयं कार्य करने में, या फिर किसी दूसरे के द्वारा उसके साथ व्यवहार किए जाने में उपयोगी होगा; या तो स्वयं उस उद्देश्य के लिये कुछ करने में, या फिर उस उद्देश्य के लिये किसी अन्य के द्वारा उस पर कुछ किए जाने में। इससे अधिक स्पष्ट और क्या हो सकता है, कि यदि मनुष्य स्वयं कुछ न करे, और न ही कोई अन्य उसके साथ या उस पर कुछ करे, तो वह किसी भी रीति से उपयोगी नहीं हो सकता? यदि मनुष्य अपने अस्तित्व के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये स्वयं कुछ न करे, और न ही कोई अन्य प्राणी इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये उसके साथ कुछ करे, तो इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिये कुछ भी नहीं किया जाएगा; और इस प्रकार मनुष्य पूर्णतः निकम्मा हो जाएगा। इसलिये मनुष्य किसी भी उद्देश्य के लिये केवल दो ही रीति से उपयोगी हो सकता है, अर्थात या तो सक्रिय रूप से या निष्क्रिय रूप से, या तो स्वयं कुछ करने में, या फिर उस पर किए गए किसी कार्य का विषय बनने में।
II. मनुष्य सक्रिय रूप से परमेश्वर के लिये फल लाने के अतिरिक्त, अर्थात परमेश्वर की सेवा करने और उसकी महिमा के लिये जीने के अतिरिक्त, और किसी रीति से उपयोगी नहीं हो सकता। यही एकमात्र मार्ग है जिसमें वह कार्य करने में उपयोगी हो सकता है; और इसका कारण यह है कि परमेश्वर की महिमा ही वह वस्तु है जिसके लिये मनुष्य को बनाया गया, और जिसके अधीन अन्य सब उद्देश्य हैं। मनुष्य कोई स्वतंत्र प्राणी नहीं, वरन वह अपना अस्तित्व किसी अन्य से प्राप्त करता है; और इसलिये उसका उद्देश्य उसी अन्य के द्वारा उसे सौंपा गया है:
और जिस ने उसे अस्तित्व दिया, उस ने उसे अभी बताए गए उद्देश्य के लिये ही बनाया। यही मनुष्य के रचयिता की वास्तविक योजना और लक्ष्य था, यही वह काम था जिसके लिये उस ने उसे बनाया, अर्थात अपने रचनेवाले की सेवा और महिमा करना।
अन्य प्राणी निम्न उद्देश्यों के लिये बनाए गए हैं। निम्न प्राणी निम्न उद्देश्यों के लिये बनाए गए थे। परन्तु यह ध्यान देने योग्य है, कि मनुष्य इस निचले संसार के सब प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ, और परमेश्वर के सबसे निकट है; और इसलिये उसका सरोकार परमेश्वर से है, यद्यपि अन्य
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी प्राणी निम्न उद्देश्यों के लिये बनाए गए हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणियों के क्रम में, पृथ्वी के तुच्छतम ढेले से लेकर मनुष्य तक, जिसके पास बुद्धिसंगत और अमर आत्मा है, एक प्रकार की क्रमिक उन्नति देखी जा सकती है। पौधा, घास, या वृक्ष, स्वभाव में पत्थर या ढेले से श्रेष्ठ है, क्योंकि उस में वानस्पतिक जीवन है। पशु प्राणी इससे भी एक दर्जा ऊंचे हैं; क्योंकि उनमें संवेदी जीवन है। परन्तु मनुष्य, जिसके पास बुद्धिसंगत आत्मा है, इस निचली सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ है, और परमेश्वर के सबसे निकट है; इसलिये उसका सरोकार परमेश्वर से है।
जड़ वस्तुएं, जैसे पृथ्वी, जल, इत्यादि, अपने से ऊपर की वस्तुओं के अधीन हैं, जैसे घास, पौधे और वृक्ष। ये वनस्पतियां उस श्रेणी के प्राणियों के अधीन हैं जो उनसे ठीक ऊपर है, अर्थात पशु सृष्टि; वे उनके भोजन के लिये हैं। पशु प्राणी, फिर, अपने से ऊपर की श्रेणी के उपयोग और सेवा के लिये बनाए गए हैं; वे मनुष्यजाति की सेवा के लिये बनाए गए हैं। परन्तु मनुष्य इस निचली सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ होने के कारण, उससे अगला पग परमेश्वर की ओर है। इसलिये वह परमेश्वर की सेवा और महिमा के लिये बनाया गया है। यही मनुष्य का सम्पूर्ण काम और सरोकार है; यही उसका सर्वोच्च उद्देश्य है, जिसके अधीन अन्य सब उद्देश्य हैं।
यदि यह उद्देश्य न होता, तो मनुष्य जैसा कोई प्राणी कभी न होता; इसके लिये कोई अवसर ही न होता। अन्य निम्न उद्देश्य मनुष्य जैसे किसी प्राणी के बिना भी उतनी ही भली भांति पूरे हो सकते थे। इतने उत्कृष्ट प्राणी को बनाने का, और उसे ऐसी सामर्थ्यों से सम्पन्न करने का कोई अवसर न होता, केवल इसलिये कि वह सांसारिक भलाई का आनन्द ले, खाए, पीए, और भोगविलास की वस्तुओं का आनन्द ले। बुद्धिहीन पशु प्राणी भी, मनुष्य के समान, इन वस्तुओं के योग्य हैं; वरन यदि इन्द्रिय-सुख के भोग से बढ़कर कोई उच्चतर उद्देश्य लक्षित न हो, तो बुद्धि सहायता के बदले बाधा ही है। यह मनुष्य को केवल इस बात के अधिक योग्य बनाती है कि वह अपने आप को चिन्ता से, मृत्यु के भय से, और अन्य भावी विपत्तियों के भय से पीड़ित करे, और अनेक चिन्ताओं से अपने आप को व्याकुल करे, जिनसे पशु प्राणी पूर्णतः स्वतंत्र हैं, और इसलिये कम बाधा के साथ अपनी इन्द्रियों को तृप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, बुद्धि मनुष्यों को केवल इस बात के अधिक योग्य बनाती है कि वे इन्द्रिय-सुख के भोग में एक दूसरे को अधिक बाधा और कष्ट दें। यदि मनुष्य को अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने के अतिरिक्त और कोई उद्देश्य खोजना न हो, तो बुद्धि केवल एक बाधा के सिवा कुछ नहीं।
इसलिये यदि मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता की सेवा और महिमा करने के लिये नहीं बनाया गया, तो ऐसे प्राणी का बनाया जाना पूर्णतः व्यर्थ है। निःसन्देह तब उस सर्वज्ञानी परमेश्वर ने, जो सब कुछ अनन्त बुद्धि से करता है, मनुष्य को इसी उद्देश्य के लिये बनाया है। और यह उस बात के अनुकूल है जो उस ने पवित्रशास्त्र के अनेक स्थानों में हमें सिखाई है। यही वह महान उद्देश्य है जिसके लिये मनुष्य को बनाया गया, और जिसके लिये उसे ऐसा प्राणी बनाया गया जैसा वह है, देह और आत्मा, शारीरिक इन्द्रियों, और बुद्धिसंगत सामर्थ्यों से सम्पन्न। इसी उद्देश्य के लिये वह ऐसी परिस्थितियों में रखा गया है जैसा वह है, और पृथ्वी उसे अधिकार के लिये दी गई है। इसी उद्देश्य के लिये उसे इस संसार के शेष प्राणियों पर प्रभुत्व दिया गया है। इसी उद्देश्य के लिये सूर्य उस पर चमकता है, और चांद तथा तारे उसके लिये चिन्ह और ऋतुओं के लिये हैं, और वर्षा उस पर बरसती है, और पृथ्वी उसे अपनी उपज देती है।
मनुष्य के अन्य सब उद्देश्य इसी के अधीन हैं। ऐसे निम्न उद्देश्य भी हैं जिनके लिये मनुष्य को बनाया गया। मनुष्य एक दूसरे के लिये बनाए गए; अपने मित्रों और पड़ोसियों के लिये, और जनसाधारण की भलाई के लिये बनाए गए। परन्तु ये सब निम्न उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करने के उच्चतर उद्देश्य के अधीन बनाए गए हैं; और इसलिये मनुष्य सक्रिय रूप से उपयोगी नहीं हो सकता, या सक्रिय रूप से पूरा नहीं कर सकता
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी किसी भी उद्देश्य को, सिवाय इसके कि वह सक्रिय रूप से परमेश्वर की महिमा करे, या परमेश्वर के लिये फल लाए। क्योंकि,
1. जो अपने उद्देश्य को सक्रिय रीति से पूरा नहीं करता, वह सक्रिय रूप से उपयोगी नहीं है। जो अपने उद्देश्य को पूरा नहीं करता, वह व्यर्थ है; क्योंकि इसी का अर्थ है जब कहा जाता है कि कोई वस्तु व्यर्थ है। इसलिये जो अपने उद्देश्य को सक्रिय रीति से पूरा नहीं करता, वह अपनी सक्रियता के सम्बन्ध में व्यर्थ है।
2. जो केवल अधीन उद्देश्यों को ही सक्रिय रूप से पूरा करता है, बिना अन्तिम उद्देश्य को पूरा किए, वह अपनी सक्रियता के सम्बन्ध में पूर्णतः निकम्मा है; और इसका कारण यह है कि अन्तिम उद्देश्य ही अधीन उद्देश्यों का उद्देश्य है। सर्वोच्च उद्देश्य की धारणा यही है, कि वह सब निम्न उद्देश्यों का उद्देश्य है।
अधीन उद्देश्य किसी काम के नहीं, केवल इस बात में कि वे सर्वोच्च उद्देश्य से सम्बद्ध हों। अधीन उद्देश्य की मूल धारणा ही यह है, कि वह किसी आगे के उद्देश्य के लिये है। इसलिये ये निम्न उद्देश्य, यद्यपि प्राप्त हो जाएं, तब भी किसी काम के नहीं जब तक कि वे अपने उद्देश्य को भी प्राप्त न कर लें। निम्न उद्देश्यों का लक्ष्य उनके अपने लिये नहीं, वरन केवल अन्तिम उद्देश्य के लिये होता है। इसलिये जो अपने उस महान सर्वोच्च उद्देश्य में असफल होता है, वह उतना ही पूर्णतः अपने उद्देश्य में असफल होता है, और उतना ही व्यर्थ है, जितना कि यदि वह अपने अधीन उद्देश्य को भी प्राप्त न करता।
मैं इसे दो-तीन उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा। घर की नींव का अधीन उद्देश्य घर को सहारा देना है; और खिड़कियों का अधीन उद्देश्य प्रकाश को भीतर आने देना है। परन्तु सम्पूर्ण का अन्तिम उद्देश्य निवासियों का हित है। इसलिये यदि घर में कभी कोई न रहे, तो सब कुछ व्यर्थ है। नींव व्यर्थ है, चाहे वह कितनी ही मजबूत हो और भवन को कितनी ही भली भांति सहारा दे। खिड़कियां भी पूर्णतः व्यर्थ हैं, चाहे वे कितनी ही बड़ी और साफ हों, और चाहे वे प्रकाश भीतर आने देने के अपने अधीन उद्देश्य को प्राप्त कर लें: वे उतनी ही व्यर्थ हैं, जितना कि यदि वे कोई प्रकाश भीतर न आने देतीं।
इसी प्रकार किसान का हल जोतने, बीज बोने, और अपने खेत में भली भांति खाद डालने का अधीन उद्देश्य यह है कि वह उपज दे। परन्तु उसका अधिक अन्तिम उद्देश्य यह है कि उसके और उसके परिवार के लिये भोजन उपलब्ध हो। इसलिये यद्यपि उसका निम्न उद्देश्य प्राप्त हो जाए, और उसका खेत कितनी ही अच्छी उपज दे, तथापि यदि अन्त में वह आग से भस्म हो जाए, या किसी और रीति से नष्ट हो जाए, तो उस ने अपना खेत जोता और बोया उतना ही व्यर्थ, जितना कि यदि बीज कभी उगता ही नहीं।
इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने अधीन उद्देश्यों को कितनी ही पूर्णतः प्राप्त कर ले; तथापि यदि वह अपने अन्तिम उद्देश्य में पूर्णतः असफल रहे, तो वह पूर्णतः निकम्मा प्राणी है। इस प्रकार यदि मनुष्य लौकिक बातों में अपने परिवारों के लिये बहुत उपयोगी हों, या पड़ोस या जनसाधारण के लौकिक हित को बहुत बढ़ाएं; तथापि यदि उसके द्वारा परमेश्वर को कोई महिमा न मिले, तो वे पूर्णतः निकम्मे हैं। यदि मनुष्य सक्रिय रूप से परमेश्वर को कोई महिमा नहीं देते, तो वे, अपनी सक्रियता के सम्बन्ध में, पूर्णतः निकम्मे हैं, चाहे वे एक दूसरे के हित को कितना ही बढ़ाएं। मनुष्यजाति का एक भाग दूसरे भाग की चाहे कितनी ही सेवा करे; तथापि यदि सम्पूर्ण का उद्देश्य पूरा न हो, तो हर भाग निकम्मा है।
इस प्रकार यदि घड़ी के पुर्जे एक दूसरे की कितनी ही भली भांति सहायता करें, अपनी गतियों में परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए; एक पहिया कितनी ही नियमितता से दूसरे को घुमाए; तथापि यदि वह गति कभी सूई या हथौड़े तक न पहुंचे, तो वह उतनी ही पूर्णतः व्यर्थ है, जितनी कि यदि वह घड़ी रुकी ही रहती। जैसे घड़ी में एक पहिया दूसरे को घुमाता है, और वह फिर दूसरे को, यहां तक कि अन्त में वह गति सूई
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी और हथौड़े तक पहुंचती है, जो सीधे आंख और कान से सम्बन्धित हैं, अन्यथा सब गतियां व्यर्थ हैं; इसी प्रकार संसार में भी है, एक मनुष्य को दूसरे के लिये उपयोगी बनाया गया, और मनुष्यजाति का एक भाग दूसरे के लिये; परन्तु सम्पूर्ण का उपयोग रचयिता परमेश्वर को महिमा देना है, अन्यथा सब कुछ व्यर्थ है; और चाहे मनुष्य अपने साथी प्राणियों के मध्य निजी या सार्वजनिक रूप में कैसी ही सेवा करे, कुल मिलाकर वह व्यर्थ ही है।
सम्भव है यह आपत्ति उठाई जाए, कि एक दुष्ट मनुष्य, जनसाधारण के लिये सहायक होकर, उन बहुतों के लिये उपयोगी हो सकता है जो परमेश्वर के लिये फल लाते हैं, और इस प्रकार उसकी महिमा करते हैं।
उत्तर 1. यदि वह ऐसा है, तो वह उससे अधिक उपयोगी नहीं जितनी वह परमेश्वर को महिमा पहुंचाता है। यह सब अन्ततः उसी महिमा से सम्बद्ध है जो परमेश्वर को पहुंचाई जाती है, और इससे अधिक उपयोगी नहीं है; जैसे घड़ी के किसी एक पहिये की गति उससे अधिक उपयोगी नहीं जितनी वह अन्ततः सूई के सही संकेत और हथौड़े के प्रहार से सम्बद्ध है।
उत्तर 2. जब ऐसा होता है, तो दुष्ट मनुष्य केवल संयोगवश उपयोगी होते हैं, न कि उद्देश्यपूर्वक।
यद्यपि एक दुष्ट मनुष्य, भले मनुष्यों के लिये सहायक होकर, वह कर सकता है जो उनके परमेश्वर के लिये फल लाने में उनके लाभ का हो; तथापि यह सहायकता वह नहीं है जिसका वह लक्ष्य रखता है; यह उसका उद्देश्य नहीं है; वह अपने अन्तिम उद्देश्य के लिये इतनी दूर तक नहीं देखता। और यह उद्देश्य चाहे किसी भी रीति से प्राप्त हो, उसका कोई श्रेय उसे नहीं दिया जाना चाहिए; यह उसके लिये केवल संयोग है। वह केवल उसका अवसर है, न कि उसका उद्देश्यपूर्ण कारण। जो फल परमेश्वर की महिमा के लिये लाया जाता है, वह उसके द्वारा नहीं, वरन औरों के द्वारा लाया जाता है।
ऐसे मनुष्य की उपयोगिता, जो उद्देश्यपूर्ण नहीं है, उसे इस प्रकार नहीं माना जाना चाहिए जैसे वह उसका फल हो। वह एक मनुष्य के रूप में, या एक बुद्धिसंगत प्राणी के रूप में उपयोगी नहीं है, क्योंकि वह उद्देश्यपूर्वक ऐसा नहीं है। वह उतना ही उपयोगी है जितनी निर्जीव वस्तुएं हो सकती हैं। निर्जीव वस्तुएं भक्तों को फल लाने के लिये सुविधाजनक स्थिति में रखने के लिये उपयोगी हो सकती हैं, जैसे वह लकड़ी और पत्थर जिनसे उसका घर बना है, वह ऊन और सन जिनसे वह वस्त्र पहनता है; परन्तु जो फल परमेश्वर की महिमा के लिये लाया जाता है, उसे इसके बावजूद इन निर्जीव वस्तुओं का फल नहीं कहा जा सकता, वरन उस भक्त मनुष्य का जो उनका उपयोग करता है। ऐसा ही तब होता है जब दुष्ट मनुष्य भक्तों को परमेश्वर की महिमा करने के लिये सुविधाजनक स्थिति में रखते हैं, जैसा कोरेश, और अर्तक्षत्र, और अन्यों ने किया है।
III. यदि मनुष्य परमेश्वर के लिये फल नहीं लाते, तो निष्क्रिय रीति से उपयोगी होने का उनके पास और कोई मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि वे नष्ट किए जाएं। वे और किसी काम के योग्य नहीं हैं।
1. वे इस योग्य नहीं कि उन्हें इस संसार में सदा बने रहने दिया जाए। परमेश्वर उन्हें अभी के लिये जीवित रहने देता है, परन्तु यह केवल एक नियत काल के लिये है। वे यहां क्षणिक अवस्था में हैं। यह उचित नहीं कि यह संसार उनका स्थायी निवास स्थान बने जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते। यह उचित नहीं कि निष्फल वृक्ष को सदा दाख की बारी में खड़ा रहने दिया जाए। माली उसे कुछ समय के लिये खड़ा रहने देता है, जब तक वह उसके चारों ओर खोदकर, उसमें खाद डालकर, उसे असाध्य सिद्ध नहीं कर लेता, या जब तक उसे काट डालने का उचित समय नहीं आ जाता; परन्तु यह उचित नहीं कि ऐसा वृक्ष सदा यहां खड़ा रहे। यह उचित नहीं कि जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, उन्हें ऐसे संसार में सदा जीवित रहने दिया जाए जो परमेश्वर की भलाई से इतना भरपूर है, या कि उसकी भलाई सदा उन पर व्यय होती रहे।
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी यह संसार, यद्यपि यह पतित है, और शाप के अधीन है, और जो कभी था उससे कहीं अधिक दुखदायी स्थान है, तो भी ईश्वरीय भलाई की धाराओं से भरपूर है। परन्तु यह उचित नहीं कि जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, उन्हें सदा इन धाराओं में भागी बने रहने दिया जाए। तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएं हैं; एक अवस्था जिसमें केवल भलाई ही भलाई है, जो स्वर्ग में धन्य लोगों की अवस्था है; एक अवस्था जिसमें भलाई और बुराई का मिश्रण है, जो पार्थिव अवस्था है; और एक अवस्था जिसमें केवल बुराई ही बुराई है, जो अनन्त विनाश और दण्ड की अवस्था है। अब जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, वे इन दोनों में से किसी के भी योग्य नहीं हैं; यह उचित नहीं कि उन्हें परमेश्वर की किसी भी भलाई के भोग में सदा बने रहने दिया जाए।
यह उचित नहीं कि एक निरुपयोगी, निष्फल प्राणी, जो अपने सृष्टिकर्ता की महिमा नहीं करेगा, सदा यहां जीवित रहकर पृथ्वी के फलों को खाता रहे, और ईश्वरीय उदारता के फलों को खाता रहे; और इस जीवन की अच्छी वस्तुएं, जैसे परमेश्वर का ऊन और उसका सन, उसका अनाज, और दाखमधु, और तेल, उस पर व्यर्थ ही व्यय होती रहें। जब तक मनुष्य इस संसार में जीवित है, संसार के अन्य प्राणी उसके अधीन कर दिए गए हैं। पशु प्राणी अपने परिश्रम और अपने प्राणों से उसकी सेवा करते हैं। सूर्य, चांद, और तारे, बादल, खेत और वृक्ष, सब उसकी सेवा करते हैं। परन्तु यह उचित नहीं कि ये प्राणी सदा उसकी सेवा करते रहें, जो सृष्टिकर्ता के लिये कोई फल नहीं लाता। परमेश्वर अपने प्राणियों को उस मनुष्य के अधीन सदा क्यों रखे, जो उसके अधीन नहीं होगा? सृष्टि को सदा ऐसे बन्धन में क्यों रखा जाए, कि वह दुष्ट मनुष्यों के अधीन रहे? प्राणी थोड़े समय के लिये व्यर्थता के अधीन किए गए हैं; परमेश्वर ने उन्हें दुष्ट मनुष्यों के अधीन किया है, और उनके उपयोग के लिये दिया है। तथापि उस ने ऐसा नहीं किया होता, यदि यह केवल थोड़े ही समय के लिये न होता; और प्राणी आते हुए छुटकारे की आशा के द्वारा इसे सहन कर सकते हैं; अन्यथा यह असह्य होता। रोमियों 8:20, "क्योंकि सृष्टि व्यर्थता के अधीन कर दी गई, अपनी इच्छा से नहीं, वरन उसके कारण जिस ने उसे इस आशा से अधीन किया।"
प्राणी, मानो, दुष्ट मनुष्यों के इस अधीनता के कारण कराहता है, यद्यपि यह केवल थोड़े समय के लिये है। रोमियों 8:22, "क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी छटपटाती है।" इसलिये निश्चय ही यह किसी भी रीति से उचित न होगा कि दुष्ट मनुष्य, जो कोई भलाई नहीं करते, और परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, यहां सदा जीवित रहें, कि विविध प्राणी उनके अधीन बने रहें, जैसे अब हैं। पृथ्वी दुष्ट मनुष्यों को उस थोड़े से समय में भी, जिसके लिये वे यहां रहते हैं, मुश्किल से सहन कर पाती है, वरन उन्हें उगल देने को तैयार रहती है। इसलिये यह किसी भी रीति से उचित नहीं कि उसे सदा उन्हें सहन करने के लिये विवश किया जाए।
जो मनुष्य परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, वे भूमि को व्यर्थ रोके रखनेवाले हैं। लूका 13:7, "और यह उचित नहीं कि उन्हें सदा भूमि को रोके रखने दिया जाए।" निष्फल जनों के प्रति व्यवहार करने की इस रीति में परमेश्वर की महिमा नहीं हो सकती। यदि ऐसे मनुष्यों को सदा ऐसी ही अवस्था में जीवित रहने दिया जाए, तो यह परमेश्वर की महिमा से इतना दूर होगा कि यह परमेश्वर के ज्ञान के लिये अपमानजनक होगा, कि उन्हें ऐसी अवस्था में सदा बनाए रखा जाए जो उनके लिये अनुपयुक्त है, और उन पर उसकी उदारता के फल सदा व्यर्थ ही व्यय किए जाते रहें। यह उसके न्याय के लिये भी अपमानजनक होगा; क्योंकि यह ऐसा संसार है जहां "सब के साथ सब कुछ एक-सा होता है, धर्मी और दुष्ट दोनों के लिये एक ही घटना होती है।" यदि दुष्ट मनुष्यों के रहने के लिये इसके अतिरिक्त और कोई अवस्था न होती, दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी तो न्याय होना सम्भव ही न होता। यह परमेश्वर की पवित्रता पर भी लांछन लगाता।
इस संसार को ऐसे लोगों के निवास के लिये सदा बनाए रखना, और उन्हें अपनी उदारता और भलाई का संचार सदा देते रहना, ऐसा प्रतीत होगा मानो वह पाप और दुष्टता का समर्थन और प्रोत्साहन करने पर उतारू हो।
2. यदि मनुष्य परमेश्वर के लिये फल नहीं लाते, तो वे स्वर्ग में रखे जाने के योग्य नहीं हैं।
स्वर्ग, अन्य सब स्थानों से बढ़कर, उनके लिये सबसे अनुपयुक्त स्थान है। उस अवस्था से सम्बन्धित हर बात उनके लिये अनुपयुक्त है। संगति सबसे अनुपयुक्त है। उस लोक के मूल निवासी स्वर्गदूत हैं। परन्तु दुष्ट मनुष्यों और स्वर्गदूतों को एक ही समाज में मिलाना कैसा अरुचिकर मेल होगा? उस लोक के कार्य भी अनुपयुक्त हैं। वे कार्य परमेश्वर की सेवा और महिमा करना हैं। तब उस स्वर्गीय पारादीस में निष्फल वृक्ष रोपना कितना अनुपयुक्त होगा, ऐसे वृक्ष जो ईश्वरीय महिमा के लिये कोई फल न लाएं? स्वर्ग के आनन्द भी अनुपयुक्त हैं। वे आनन्द पवित्र और आत्मिक आनन्द हैं, परमेश्वर की महिमा देखने का सुख, और उसके नाम की स्तुति करने का सुख, और इसी प्रकार के अन्य सुख।
परन्तु ये आनन्द दुष्ट मनुष्यों के शारीरिक, पार्थिव मनों के लिये जितने अनुपयुक्त हो सकते हैं उतने ही अनुपयुक्त हैं।
वे उनके लिये कोई आनन्द न होंगे; वरन इसके विपरीत सबसे अरुचिकर होंगे, और ऐसी वस्तुएं जिनका वे कोई स्वाद नहीं ले सकते, वरन जिनसे उन्हें पूर्णतः घृणा हो।
स्वर्ग का उद्देश्य उनके लिये अनुपयुक्त है। स्वर्ग बनाने में परमेश्वर का उद्देश्य यह था, कि वह धर्मियों के प्रतिफल के लिये एक पवित्र निवास स्थान हो, न कि दुष्ट मनुष्यों का निवास स्थान। दुष्ट मनुष्यों को वहां रखना परमेश्वर के ज्ञान पर बहुत बड़ा लांछन होगा; क्योंकि यह सबसे बड़ी गड़बड़ी होगी। परन्तु परमेश्वर गड़बड़ी का रचयिता नहीं,
1 कुरिन्थियों 14:33। यह परमेश्वर की पवित्रता के विरुद्ध होगा, कि दुष्ट मनुष्यों को अपनी महिमामय उपस्थिति में इतना निकट ले आए, कि वे सृष्टि के उस भाग में जो मानो उसका अपना भवन है सदा वास करें, और उसकी मेज पर बैठें। हम भजन संहिता 5:4 में पढ़ते हैं, "क्योंकि तू ऐसा ईश्वर नहीं जो दुष्टता से प्रसन्न रहे, बुराई तेरे संग नहीं रह सकती।" इसलिये निःसन्देह यह असम्भव होगा कि दुष्ट मनुष्यों के अस्तित्व का उद्देश्य उन्हें स्वर्ग में रखने से किसी भी रीति से पूरा हो सके।
IV. जो मनुष्य परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, वे तो भी विनाश सहने में उपयोगी हो सकते हैं।
यद्यपि वे सक्रिय रूप से, अर्थात अपने किसी काम से उपयोगी नहीं हैं; तथापि वे उसमें उपयोगी हो सकते हैं जो वे सहते हैं; ठीक जैसे एक निष्फल वृक्ष, जो दाख की बारी में खड़ा रहकर किसी काम का नहीं, तो भी अच्छा ईंधन हो सकता है, और आग में बहुत उपयोगी हो सकता है। परमेश्वर सबसे दुष्ट मनुष्यों के लिये भी उपयोग पा सकता है; उसे क्रोध के पात्रों की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी दया के पात्रों की; जैसे किसी घर में अनादर के पात्रों का भी उतना ही उपयोग है जितना आदर के पात्रों का। 2 तीमुथियुस 2:20, "बड़े घर में न केवल सोने-चान्दी के, वरन काठ और मिट्टी के भी पात्र होते हैं; और कितने आदर के लिये, और कितने अनादर के लिये होते हैं।" नीतिवचन 16:4, "यहोवा ने सारी वस्तुओं को अपने ही लिये बनाया है, वरन दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिये बनाया है।" मैं संक्षेप में उन उद्देश्यों की चर्चा करूंगा
जिन्हें परमेश्वर इसके द्वारा पूरा करता है।
1. निष्फल जन अपने विनाश में परमेश्वर के न्याय की महिमा के लिये उपयोगी हैं। यह परमेश्वर की इच्छा थी कि वह अपने प्राणियों पर अपनी दया के साथ-साथ अपने न्याय की भी महिमा करे। वह प्रतिशोधी
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी परमेश्वर का न्याय, उसकी दया के समान ही, एक महिमामय गुण है; और इस गुण की महिमा निष्फल और अनुपजाऊ जनों के अनन्त विनाश और सर्वनाश में प्रगट होती है।
भक्तिहीन मनुष्यों के विनाश में ईश्वरीय न्याय की महिमा स्वर्ग में संतों और स्वर्गदूतों की दृष्टि में अद्भुत और महिमामय प्रतीत होती है। इसलिये हमें यह वृत्तान्त मिलता है, कि वे परमेश्वर की स्तुति गाते हैं, और उन भयानक दण्डों को देखकर जो वह दुष्ट मनुष्यों पर लाता है, उसके न्याय की बड़ाई करते हैं। प्रकाशितवाक्य 16:5, "हे विद्यमान और भूतकालीन पवित्र, तू धर्मी है, कि तू ने ये दण्ड की आज्ञा दी है; क्योंकि उन्होंने पवित्र लोगों और भविष्यद्वक्ताओं का लोहू बहाया है, और तू ने उन्हें भी लोहू पिलाया है; वे इसी के योग्य हैं।" और प्रकाशितवाक्य 19:1-2:
"इन बातों के बाद मैं ने स्वर्ग में मानो बड़ी भीड़ का बड़ा शब्द यह कहते सुना, हल्लिलूय्याह: उद्धार, और महिमा, और आदर, और सामर्थ हमारे परमेश्वर की है; क्योंकि उसके निर्णय सच्चे और ठीक हैं; इसलिये कि उस ने उस बड़ी वेश्या का, जिस ने पृथ्वी को अपने व्यभिचार से बिगाड़ा था, न्याय चुकाकर उससे अपने दासों के लोहू का पलटा लिया है।"
2. निष्फल जन अपने विनाश में परमेश्वर के इस काम आते हैं कि वह उन पर अपने ऐश्वर्य की महिमा करे। परमेश्वर का भयानक ऐश्वर्य उन भयंकर और अद्भुत दण्डों में विशेष रूप से प्रगट होता है जो वह उन पर लाता है जो उसके विरुद्ध उठ खड़े होते हैं, और उसका तिरस्कार करते हैं। किसी सांसारिक राजा के ऐश्वर्य का बोध बहुत कुछ इस बोध से बना रहता है कि उसका अपमान करना कैसी भयानक बात है। परमेश्वर दुष्ट मनुष्यों के विनाश में अपने ऐश्वर्य की महिमा करता है; और इसमें वह अनन्त रूप से महान प्रगट होता है, कि उसे अप्रसन्न करना अनन्त रूप से भयानक बात प्रतीत होती है।
परमेश्वर का ऐश्वर्य उसके क्रोध की भयानकता में कैसा भयानक प्रतीत होता है! हम रोमियों 9:22 से सीख सकते हैं कि यह दुष्टों के दण्ड के उद्देश्यों में से एक है, "फिर यदि परमेश्वर ने अपना प्रकोप दिखाने और अपनी सामर्थ्य जताने की इच्छा से, विनाश के लिये तैयार किए हुए क्रोध के पात्रों को बड़े धीरज से सहा,"
परमेश्वर के विषय में प्रायः यह कहा गया है, कि वह भयानक परमेश्वर है। परमेश्वर के ऐश्वर्य और महिमा का यह भी एक भाग है, कि वह भयानक परमेश्वर है। परमेश्वर फिरौन से कहता है, कि उस ने इसी कारण उसे खड़ा किया, कि वह उस में अपनी सामर्थ्य दिखाए, और उसके विनाश में उसका नाम सारी पृथ्वी पर प्रचारित हो। निर्गमन 9:15-16; और फिर, अध्याय 14:17, "मैं फिरौन के द्वारा, और उसकी सारी सेना के द्वारा, उसके रथों और उसके सवारों के द्वारा अपनी बड़ाई प्रगट करूंगा।"
3. निष्फल जनों का विनाश इसलिये भी उपयोगी है, कि यह संतों को उनके अपने सुख का, और उन पर परमेश्वर के अनुग्रह का बड़ा बोध कराए। दुष्ट संतों की, और स्वर्ग के अन्य निवासियों की दृष्टि में नष्ट किए जाएंगे और तड़पाए जाएंगे। यह हमें प्रकाशितवाक्य 14:10 में सिखाया गया है।
"वह भी परमेश्वर के प्रकोप की दाखमधु पिएगा, जो उसके क्रोध के कटोरे में बिना मिलावट भरी है; और वह पवित्र स्वर्गदूतों के सामने, और मेम्ने के सामने आग और गन्धक से तड़पाया जाएगा।" और यशायाह 66:24 में, "और वे निकलकर उन मनुष्यों की लोथों को देखेंगे जिन्होंने मुझ से बलवा किया है; क्योंकि न तो उनका कीड़ा मरेगा, और न उनकी आग बुझेगी, और वे सब प्राणियों को घिनौने लगेंगे।"
जब स्वर्ग में संत नरक में दण्डित जनों को देखेंगे, तो इससे उन्हें अपने ही सुख का बड़ा बोध होगा, यह देखकर कि उनकी अपनी दशा उनसे कितनी भिन्न है
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी दण्डित जनों की। दण्डित जनों की शोकपूर्ण दशा को देखना उन्हें अपने धन्य होने को और भी बढ़कर महत्व देने को प्रेरित करेगा। जब वे देखेंगे कि परमेश्वर का क्रोध कितना भयानक है, तो इससे वे उसके प्रेम को और भी बढ़कर महत्व देंगे। वे इतना और अधिक आनन्दित होंगे कि वे परमेश्वर के क्रोध की नहीं, वरन उसके अनुग्रह की वस्तु हैं; कि वे उसके भयानक क्रोध के अधीन नहीं, वरन उसकी सन्तान के समान उनसे व्यवहार किया जाता है, वे उसके निकट ले लिए गए हैं, कि उसके प्रेम की अनन्त गोद में वास करें।
जब वे दण्डित जनों के दुख को देखेंगे, तो इससे उन्हें परमेश्वर के उस भेदकारी अनुग्रह और प्रेम का बड़ा बोध होगा जो उन पर है, कि परमेश्वर ने अनादिकाल से अपना प्रेम उन पर लगाया, और उनके तथा उन औरों के बीच, जो उन्हीं की जाति के हैं, स्वभाव से उनसे बुरे नहीं हैं, और परमेश्वर से उनसे बुरे के योग्य नहीं थे, इतना बड़ा अन्तर किया। जब वे दण्डित जनों के दुख को देखेंगे, और विचार करेंगे कि उनकी अपनी दशा उनसे कितनी भिन्न है, और यह केवल मुफ्त और प्रभुतासम्पन्न अनुग्रह ही है जो यह अन्तर बनाता है, तो इससे उन्हें उन पर परमेश्वर के अद्भुत अनुग्रह का कैसा बड़ा बोध होगा!
और यह उनकी स्तुति को कैसे और भी ऊंचा उठाएगा! वे कितनी बढ़कर अचम्भे और आत्मा के हर्षोल्लास के साथ परमेश्वर के उस मुफ्त और प्रभुतासम्पन्न अनुग्रह का गीत गाएंगे जो उन पर है!
जब वे दण्डित जनों को देखेंगे, और उनका दुख देखेंगे, तो स्वर्ग दुष्टों के प्रति परमेश्वर के न्याय की, और संतों के प्रति उसके अनुग्रह की स्तुतियों से कैसा गूंज उठेगा! और वे कितने बढ़कर विशाल हृदय के साथ अपने छुड़ानेवाले यीशु मसीह की स्तुति करेंगे, कि उसे कभी उन पर अपना प्रेम, अपना मरणपर्यन्त प्रेम रखना अच्छा लगा! और कि उस ने उन्हें ऐसा विशिष्ट बनाया कि अपना लहू बहाया, और अपने प्राण को बलिदान बनाया, कि उन्हें उस इतने बड़े दुख से छुड़ाए, और उन्हें ऐसे असीम सुख में लाए!
वे कैसे प्रेम और आनन्दातिरेक के साथ प्रकाशितवाक्य 5:9-10 का वह गीत गाएंगे, "तू योग्य है; क्योंकि तू घात हुआ, और तू ने अपने लोहू से हर एक कुल, और भाषा, और लोग, और जाति में से हमें परमेश्वर के लिये मोल लिया है; और हमें हमारे परमेश्वर के लिये राजा और याजक बनाया है।"
एक उद्देश्य जिसका उल्लेख प्रेरित यह बताने में करता है कि परमेश्वर ने क्रोध के पात्र क्यों नियुक्त किए, यह है कि वह संतों के प्रति अपनी दया की अद्भुतता को और अधिक प्रगट करे। रोमियों 9:22-23 में दो उद्देश्यों का उल्लेख है: "फिर यदि परमेश्वर ने अपना प्रकोप दिखाने और अपनी सामर्थ्य जताने की इच्छा से, विनाश के लिये तैयार किए हुए क्रोध के पात्रों को बड़े धीरज से सहा?" यह एक उद्देश्य है, फिर तुरन्त बाद दूसरे का उल्लेख किया गया है, "और यह इसलिये किया, कि दया के पात्रों पर, जिन्हें उस ने पहिले से महिमा के लिये तैयार किया था, अपनी महिमा का धन प्रगट करे?"
प्रयोग I. इससे हम सीख सकते हैं, कि जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते उनके विनाश में परमेश्वर कितना न्यायी और धर्मी है। चूंकि उनके उपयोगी होने का, या उनके अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त करने का और कोई मार्ग नहीं है, निश्चय ही यह अत्यन्त न्यायसंगत है कि परमेश्वर उनके साथ इस प्रकार व्यवहार करे। परमेश्वर उनकी हठधर्मिता के कारण अपने उद्देश्य से क्यों वंचित रहे? यदि मनुष्य वह काम नहीं करेंगे जिसके लिये उस ने उन्हें बनाया और योग्य किया; यदि वे, परमेश्वर के विरुद्ध विरोध और विद्रोह की आत्मा के कारण, इन्कार करते हैं; तो भी परमेश्वर अपने आप को उन्हें बनाने के अपने उद्देश्य में क्यों निराश होने दे? यह परमेश्वर की अनन्त महानता और दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी ऐश्वर्य के योग्य नहीं, कि वह अपने आप को धूल के पापी कीड़ों की दुष्टता और हठधर्मिता से निराश और वंचित होने दे। यदि परमेश्वर यह सहन करे, तो ऐसा प्रतीत होगा मानो या तो परमेश्वर में एक अच्छे उद्देश्य को निश्चित करने की बुद्धि की कमी है, या उसे पूरा करने की सामर्थ्य की कमी है।
परमेश्वर ने सब मनुष्यों को इसलिये बनाया कि वे उपयोगी हों; और यदि वे अपने आचरण और कार्यों में उपयोगी नहीं होंगे, तो यह कितना न्यायसंगत है कि परमेश्वर उन्हें उनके दुखभोग में उपयोगी बनाए! परमेश्वर ने सब मनुष्यों को अपनी ही महिमा के लिये बनाया; और यदि वे, परमेश्वर की प्रगट की गई इच्छा के विपरीत, सक्रिय रूप से और स्वेच्छा से उसकी महिमा करने से इन्कार करते हैं, तो यह कितना न्यायसंगत है कि परमेश्वर उनके साथ जो कुछ करता है उसमें अपनी ही महिमा करे!
यह दिखाया जा चुका है, कि इसे पूरा करने का और कोई मार्ग नहीं, सिवाय उनके विनाश के। इसलिये निश्चय ही यह न्यायसंगत और धर्मसंगत होना चाहिए कि परमेश्वर उन्हें नष्ट करे।
मनुष्य अपने दुखभोग में परमेश्वर की महिमा करने के इस उपयोग में डाले जाने की किसी स्वाभाविक अनिवार्यता के अधीन नहीं हैं। परमेश्वर उन्हें कार्य में, फल लाने में, उसकी महिमा करने का अवसर देता है, उन्हें इसके लिये सुविधाजनक स्थिति में रखता है, और उन्हें इस ओर लाने के लिये अनेक साधनों का उपयोग करता है। परन्तु यदि वे इस रीति से उपयोगी नहीं होंगे, तो यह अत्यन्त न्यायसंगत है कि परमेश्वर उन्हें उस एकमात्र शेष रीति से उपयोगी बनाए जिसमें वे उपयोगी हो सकते हैं, अर्थात उनके विनाश में। परमेश्वर उन्हें इस उपयोग में डालने के लिये उत्सुक नहीं है। वह हमें बताता है, कि उसे "दुष्ट के मरने से कुछ प्रसन्नता नहीं, परन्तु इस में कि दुष्ट अपनी चाल से फिरकर जीवित रहे," यहेजकेल 33:11। परमेश्वर पापियों के विनाश को ऐसा काम बताता है जिसकी ओर वह अनिच्छुक है; तो भी यह उचित है कि वे नष्ट किए जाएं, बजाय इसके कि उन्हें परमेश्वर को उनके अस्तित्व के उद्देश्य से वंचित करने दिया जाए। माली को कौन दोष दे सकता है यदि वह एक निष्फल वृक्ष के चारों ओर खोदकर, उसमें खाद डालकर, और उसे फलवन्त बनाने के सब उचित साधनों का उपयोग करने के बाद, उसे काट डाले और जला डाले?
हम में से जिन्होंने अब तक अपना सारा जीवन निरुपयोगी रूप से जिया है, और उन सब साधनों के बावजूद जो उनके साथ प्रयोग किए गए हैं, परमेश्वर की महिमा के लिये कभी कोई फल नहीं लाया, वे इस पर विचार करें। विचार करें कि यह कितना न्यायसंगत होगा यदि परमेश्वर आपको पूरी तरह नष्ट कर दे, और इस रीति से आप पर अपनी महिमा करे; और यह परमेश्वर के धीरज का कैसा आश्चर्य है, कि उस ने अब तक ऐसा नहीं किया।
II. इस विषय को आपको अपने आप की जांच करने के लिये प्रेरित करना चाहिए, कि कहीं आप पूर्णतः निकम्मे प्राणी तो नहीं हैं। आपने अब सुना है, कि जो परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाते, वे, जहां तक उनके किसी भी भलाई के काम का सम्बन्ध है, पूर्णतः निकम्मे हैं। इसलिये जांच करें, कि क्या आपने कभी अपने जीवन में परमेश्वर के लिये कोई फल लाया है। क्या आपने कभी परमेश्वर के प्रति अनुग्रहमय आदर से, या परमेश्वर के प्रति प्रेम के कारण कुछ किया है? केवल अपने सांसारिक हित को खोजने से आप परमेश्वर के लिये फल नहीं लाते। सब्त के दिन सार्वजनिक आराधना में आना, अपने परिवारों में प्रार्थना करना, और इसी प्रकार की अन्य बातें, यदि केवल सामान्य प्रथा के अनुरूप की जाएं, तो यह परमेश्वर के लिये फल लाना नहीं है। संयमी, नैतिक, और धार्मिक होना, केवल मनुष्यों को दिखाने के लिये, या अपने ही सम्मान और आदर के प्रति आदर के कारण, परमेश्वर के लिये फल लाना नहीं है। जो केवल प्रथा के लिये, या मनुष्यों के आदर के लिये किया जाता है, वह परमेश्वर के लिये कैसे हो सकता है?
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी मनुष्यों का प्रार्थना करना, पढ़ना, सुनना, और धार्मिक और नैतिक कर्तव्यों में कठोर और तत्पर होना, केवल नरक के भय से, परमेश्वर के लिये फल लाना नहीं है। अपने ही दुख से प्रेम न करने के लिये, और अनन्तकाल तक नरक में जलने से बचने के लिये कुछ परिश्रम करने की इच्छा रखने के लिये, आपको कौन-सा धन्यवाद दिया जाना चाहिए? नरक में ऐसा कोई शैतान नहीं जो यही खुशी से न करे।
होशे 10:1, "इस्राएल एक हरी-भरी दाखलता है; वह अपने ही लिये फल लाता है।"
जहां परमेश्वर के प्रति प्रेम से, या उसके प्रति किसी सच्चे आदर से किसी भी रीति से कुछ नहीं किया जाता, वहां परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाया जाता। परमेश्वर हृदय को देखता है। उसे हमारी सेवाओं की आवश्यकता नहीं, और न ही हम जो कुछ कर सकते हैं उससे उसे कोई लाभ होता है। वह हमसे कुछ इसलिये ग्रहण नहीं करता कि उससे उसे लाभ हो, वरन केवल इसलिये कि वह उसके प्रति हमारे प्रेम और आदर का उपयुक्त प्रमाण है। यही वह फल है जिसे वह खोजता है। मनुष्य स्वयं ही मित्रता के उन दिखावों को स्वीकार नहीं करते, जिन्हें वे कपटपूर्ण और हृदय से न निकले हुए समझते हैं। तो परमेश्वर, जो मनुष्यों की सन्तान के हृदयों को खोजता और उनके गुर्दों को परखता है, ऐसे दिखावों को कितना कम स्वीकार करेगा! यूहन्ना 4:23, "परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजनहारी आत्मा और सच्चाई से भजन करें।"
इसलिये जांच करें, कि क्या आपने कभी अपने जीवन में परमेश्वर के प्रति प्रेम के कारण छोटी से छोटी बात भी की है।
क्या आपने यह सब अपने ही लिये नहीं किया है? जकर्याह 7:5-6, "जब तुम ने इन सत्तर वर्षों में पांचवें और सातवें महीने में उपवास और विलाप किया, तो क्या तुम ने सचमुच मेरे ही लिये, हां, मेरे ही लिये उपवास किया? और जब तुम खाते और पीते थे, तब क्या तुम अपने ही लिये नहीं खाते-पीते थे?"
III. इस विषय का एक और उपयोग उनके लिये कायल करने और दीन बनाने का हो सकता है जिन्होंने कभी परमेश्वर के लिये कोई फल नहीं लाया। यदि जांच करने पर आप पाते हैं कि आपने अपने सारे जीवन में परमेश्वर के प्रति सच्चे आदर से कभी कुछ नहीं किया, तो यह प्रमाणित हो चुका है, कि आप जो कुछ भी करते हैं उसके सम्बन्ध में आप पूर्णतः निकम्मे प्राणी हैं। और विचार करें, कि आप जैसे बुद्धिसंगत प्राणियों के लिये, और उपयोगी होने के लिये ऐसी सुविधाओं में रखे गए होने के बावजूद, फिर भी पूर्णतः निकम्मे रहना, और संसार में व्यर्थ जीना, कैसी लज्जा की बात है!
हम किसी भी व्यक्ति के लिये यह एक बहुत ही तुच्छ चरित्र समझते हैं, कि वह एक निकम्मा, तुच्छ व्यक्ति है; और ऐसा कहलाना एक बड़ी लज्जा की बात समझी जाती है। परन्तु गम्भीरता से विचार करें, कि क्या आप अपने आप को इस चरित्र से मुक्त सिद्ध कर सकते हैं। बुद्धि को काम में लगाएं; क्या आप बुद्धिसंगत रूप से यह मान सकते हैं, कि आप किसी भी मात्रा में उस उद्देश्य को पूरा करते हैं जिसके लिये परमेश्वर ने आपको अस्तित्व दिया, और आपको पशुओं से श्रेष्ठ स्वभाव का बनाया? परन्तु इसलिये कि आप यह अनुभव कर सकें कि आपको अपनी निरुपयोगिता पर लज्जित होने का क्या कारण है, निम्नलिखित बातों पर विचार करें।
1. परमेश्वर ने आपके स्वभाव की सम्पन्नताओं में आप पर कितना कुछ प्रदान किया है। परमेश्वर ने आपको बुद्धिसंगत, समझदार प्राणी बनाया है, आपको उत्तम सामर्थ्यों से सम्पन्न किया है, वे सम्पन्नताएं जिनमें परमेश्वर की स्वाभाविक प्रतिमा सन्निहित है। आप अपने स्वभाव में इस निचले संसार के अन्य प्रकार के प्राणियों से अत्यन्त ऊंचे उठाए गए हैं। आप किसी भी पशु प्राणी की तुलना में हजार गुना अधिक की क्षमता रखते हैं। उस ने आपको समझ की एक ऐसी सामर्थ्य दी है, जो अपने आप को अत्यन्त विस्तृत कर सकती है, समय के आरम्भ की ओर पीछे देख सकती है, और यह विचार कर सकती है कि संसार के अस्तित्व में आने से पहले क्या था, और समय के अन्त से भी आगे देख सकती है। यह इस योग्य है
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी कि विश्वब्रह्माण्ड की अन्तिम सीमाओं से भी आगे बढ़ सके; और यह वह सामर्थ्य है जिससे आप स्वर्गदूतों के समान हैं, और परमेश्वर को जानने में, ईश्वरीय सत्ता का, और उसके कार्यों और उसके वचन में प्रगट उसके महिमामय सद्गुणों का मनन करने में भी समर्थ हैं। आपके पास ऐसे प्राण हैं जो परमेश्वर के पवित्र आत्मा, और उसके ईश्वरीय अनुग्रह के निवासस्थान बनने के योग्य हैं। आप स्वर्गदूतों के उत्तम कार्यों के योग्य हैं।
यह कितना शोचनीय और लज्जाजनक है, कि ऐसा प्राणी पूर्णतः निकम्मा हो, और व्यर्थ जिए! यह कितना शोचनीय है कि ईश्वरीय शिल्पकारी की ऐसी उत्तम और श्रेष्ठ रचना अपने उद्देश्य में असफल हो, और व्यर्थ हो जाए! क्या यह परमेश्वर के लिये कभी उचित था कि वह आपको ऐसा प्राणी बनाए, ऐसे उत्तम स्वभाव के साथ, और अन्य प्रकार के प्राणियों से इतना ऊंचा, केवल इसलिये कि आप खाएं, पीएं, और अपनी शारीरिक भूखों को तृप्त करें? आपके लिये यह कितना शोचनीय और लज्जाजनक है, कि ऐसा उत्तम वृक्ष वन के किसी भी वृक्ष से अधिक निकम्मा हो; कि मनुष्य, जिसे
परमेश्वर ने इस प्रकार आदर में रखा है, अपने आप को नष्ट होनेवाले पशुओं से भी अधिक निकम्मा बना ले!
2. परमेश्वर ने संसार की सृष्टि में आपके लिये कितना कुछ किया है। उस ने पृथ्वी, और समुद्रों, और उनकी सारी भरपूरी को मनुष्य के उपयोग के लिये बनाया, और उसे दे दिया है। भजन संहिता 115:16, "पृथ्वी को उस ने मनुष्यों की सन्तान को दे दिया है।" उस ने मनुष्य के उपयोग और सेवा के लिये प्राणियों की विशाल विविधता बनाई। उत्पत्ति 1:28, "समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जीवजन्तुओं पर प्रभुता करो।" उसी उद्देश्य से उस ने मैदान के सब पौधे, घास, और वृक्ष बनाए। उत्पत्ति 1:29, "मैं ने तुम्हें सारी पृथ्वी के ऊपर का बीजवाला हर एक छोटा पेड़, और वृक्ष, जिसके फल में उसका बीज हो, दिया है; ये तुम्हारे भोजन के लिये होंगे।" उस ने आकाश में सूर्य बनाया, वह महिमामय ज्योतिर्मय, वह अद्भुत प्रकाश का गोला, मनुष्य को प्रकाश देने के लिये, और दिन और रात के बीच अन्तर करने के लिये। उस ने चांद भी बनाया, और तारों की विशाल भीड़ भी, मनुष्य के उपयोग के लिये, कि वे उसके लिये चिन्ह और ऋतुओं के लिये हों।
परमेश्वर ने मनुष्य के लिये कैसी महान व्यवस्था की है! उसकी सुविधा के लिये, उसे उपयोगी होने की सुविधाजनक स्थिति में रखने के लिये, भोजन और अन्य वस्तुओं की कैसी विशाल विविधता है!
यह कैसा शोचनीय है, कि इन सब बातों के बाद भी वह संसार में एक निकम्मा प्राणी बना रहे!
3. परमेश्वर की साधारण संचालना के क्रम में आपके लिये कितना कुछ किया जाता है! विचार करें कि प्रकृति निरन्तर आपके लिये किस प्रकार परिश्रम कर रही है। सूर्य, मानो, मनुष्यजाति के लिये उत्तेजित है, वर्ष दर वर्ष, और दिन दर दिन अथकता से अपनी यात्रा करता हुआ, और मनुष्य पर अपनी किरणें बिखेरता हुआ, कि उसे उपयोगी होने की सुविधाजनक स्थिति में रखे; प्रतिदिन उसे प्रकाश देते हुए कि उसे परमेश्वर के महिमामय ज्ञान को देखने का, और परमेश्वर को देखने और उसकी सेवा करने का अवसर मिले।
पवन और बादल निरन्तर आपके लिये परिश्रम कर रहे हैं, और जल एक निरन्तर परिक्रमा में चल रहे हैं, समुद्रों से वायु में ऊपर उठते हुए, वर्षा में नीचे गिरते हुए, नालों और नदियों में इकट्ठे होते हुए, समुद्र में लौटते हुए, और फिर आपके लिये ऊपर उठते और नीचे गिरते हुए। पृथ्वी आपके भरण-पोषण के लिये अपनी उपज लाने में निरन्तर परिश्रम कर रही है। मैदान के वृक्ष आपके लिये परिश्रम कर रहे हैं और अपनी शक्ति व्यय कर रहे हैं। और कितने ही दीन पशु प्राणी आपके लिये निरन्तर परिश्रम कर रहे हैं, और आपके लिये अपनी शक्ति व्यय कर रहे हैं! पृथ्वी का कितना भाग
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी आप पर व्यय होता है! परमेश्वर के कितने प्राणी आपके द्वारा खाए जाते हैं! परमेश्वर के कितने जीवधारियों के प्राण आपके लिये, आपके भरण-पोषण और सुख के लिये नष्ट किए जाते हैं!
अब, यह कितना शोचनीय होगा, यदि इन सब बातों के बाद भी आप पूर्णतः निकम्मे हों, और व्यर्थ जिएं! आप कैसे मात्र भूमि को रोकनेवाले होंगे! लूका 13:7 के अनुसार। प्रकृति, जो इस प्रकार आपके लिये निरन्तर परिश्रम करती है, आपके बोझ से दबेगी। यही वह प्रतीत होता है जो प्रेरित का अभिप्राय है, रोमियों 8:20-22, जहां वह हमें बताता है, कि सृष्टि को व्यर्थता के अधीन किया गया, और विनाश के दासत्व में लाया गया; और कि सारी सृष्टि इस दासत्व के अधीन कराहती और पीड़ाओं में पड़ी छटपटाती है।
4. अनुग्रह के साधनों के उपयोग में आपके लिये कितना कुछ किया गया है। परमेश्वर ने आपको उपयोगिता के लिये उपयुक्त साधन और सुविधाएं देने के लिये कितना कुछ किया है! परमेश्वर ने भिन्न-भिन्न युगों में संसार में कितने भविष्यद्वक्ता भेजे हैं, उन्हें अपने पवित्र
आत्मा से प्रेरित करके, और उन्हें अपने वचन की पुष्टि के लिये अनेक चमत्कार करने की सामर्थ्य देकर, जिनके द्वारा अब आपके पास आपको सिखाने के लिये परमेश्वर का लिखित वचन है!
परमेश्वर ने आपके लिये कैसी महान बात की है, कि आपको उपयोगी होने का अवसर और सुविधा देने के लिये उस ने अपने ही पुत्र को संसार में भेजा! वह जो वास्तव में और सच्चाई से परमेश्वर है, उस ने अपने आप को मानवीय स्वभाव से जोड़ लिया, और मनुष्य बन गया, कि आपके और अन्य पापियों के लिये एक भविष्यद्वक्ता और शिक्षक बने। वरन, उस ने पाप का प्रायश्चित करने के लिये अपना प्राण दे दिया, कि आपको ग्रहण किए जाने की आशा के साथ परमेश्वर की सेवा करने का प्रोत्साहन मिले।
आपके लिये कितने विधान स्थापित किए गए हैं! परमेश्वर के सेवकों के परिश्रम का कितना भाग आप पर व्यय किया गया है! क्या यशायाह अध्याय 5 के आरम्भ में लिखी हुई बात आपके विषय में सत्य नहीं, जो एक अत्यन्त उपजाऊ पहाड़ी पर रोपी गई, और विशेष सावधानी और परिश्रम से बाड़ लगाई और जोती गई दाख की बारी के विषय में है, जो तो भी निष्फल निकली? माली ने निष्फल वृक्ष के चारों ओर कितना खोदा, और उसमें खाद डाली, और फिर भी वह निष्फल बना रहा!
विचार करें कि यह कैसी लज्जा की बात है कि आप व्यर्थ जिएं, जब कि अन्य सब प्राणी, जो आपसे निम्न हैं, अपने स्वभाव के अनुसार अपने सृष्टिकर्ता की महिमा करते हैं। आप, जो संसार में इतने ऊंचे उठाए गए हैं, पशु सृष्टि से भी अधिक निकम्मे हैं; वरन तुच्छतम कीड़ों से भी, या निर्जीव वस्तुओं से भी, जैसे मिट्टी और पत्थर: क्योंकि वे सब उस रीति में अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं जिसके लिये प्रकृति ने उन्हें योग्य बनाया है; उनमें से कोई भी इसमें असफल नहीं होता। वे सब अपने-अपने स्थान पर उपयोगी हैं, सब अपने सृष्टिकर्ता को स्तुति की उचित भेंट चढ़ाते हैं; जब कि आप सृष्टि में मात्र उपद्रव हैं, और पृथ्वी के लिये बोझ हैं; जैसे वन का कोई भी वृक्ष दाखलता से अधिक उपयोगी है, यदि वह फल न लाए।
IV. इस सिद्धांत के आगे के प्रयोग में, मुझे आपको हर रीति से परमेश्वर के लिये फल लाने का उत्साह देने दें। यही आपका निरन्तर प्रयत्न हो कि इस रीति से संसार में सक्रिय रूप से उपयोगी बनें। यहां तीन बातों पर विचार करें।
1. आप जैसे दीन प्राणियों के लिये ईश्वरीय महिमा के लिये फल लाना कैसा बड़ा आदर होगा। मनुष्य जैसा दीन कीड़ा क्या है, कि उसे परमेश्वर के लिये कोई फल लाने में समर्थ बनाया जाए! यह मनुष्य के स्वभाव का सबसे बड़ा आदर है, कि परमेश्वर ने उसे महान सृष्टिकर्ता की महिमा करने की क्षमता दी है। दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी यह वह बात है जिसे इस निचले संसार का कोई अन्य प्राणी मनुष्य के समान रीति से नहीं कर सकता। दृश्य संसार में मनुष्य के अतिरिक्त कोई प्राणी सक्रिय रूप से परमेश्वर की महिमा करने में समर्थ नहीं है।
2. परमेश्वर के लिये फल लाने में, आप औरों की तुलना में अपने ही लिये सबसे अधिक लाभदायक होंगे; आप इससे परमेश्वर को कोई लाभ नहीं पहुंचा सकते। अय्यूब 22:2, "क्या मनुष्य से ईश्वर को कुछ लाभ पहुंच सकता है?" आप इससे अपने साथी प्राणियों को लाभ पहुंचा सकते हैं; तो भी उतना नहीं जितना अपने ही आप को। जो फल आप परमेश्वर के लिये लाएंगे वह किसी भी जीवित प्राणी की तुलना में आपके लिये अधिक लाभदायक होगा।
आप अपने आप के लिये किसी और की तुलना में अधिक उपयोगी होंगे।
यद्यपि आप परमेश्वर के लिये फल लाने के स्वाभाविक कर्तव्य के अधीन हैं, तो भी परमेश्वर आपसे इसे बिना किसी प्रतिफल के नहीं मांगता। वह इसके लिये आपको भरपूर प्रतिफल देगा। आपसे उसके लिये फल लाने की मांग करने में, वह केवल आपसे अपने ही सुख के लिये फल लाने की मांग करता है। आप अपने ही फल की मिठास चखेंगे। परमेश्वर के लिये फल लाना इस संसार में आपके लिये सबसे लाभदायक होगा; यहां रहते हुए यह आपके अत्यधिक लाभ का होगा। फलवन्त और पवित्र जीवन जीना आपके लिये सुखद होगा; सुख परिश्रम से बढ़कर होगा। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने ऐसे जीवन के लिये अनन्त प्रतिफल, अवर्णनीय, असीम लाभों की प्रतिज्ञा की है। इसलिये इसके द्वारा आप अपने ही हित को अनन्त रूप से बढ़ाएंगे।
3. यदि आप इसी प्रकार निरुपयोगी बने रहें, और सक्रिय रूप से उपयोगी न हों, तो निश्चय ही परमेश्वर आपके विनाश में आपसे अपना उद्देश्य प्राप्त करेगा। वह निष्फल वृक्ष के विषय में कहेगा, "इसे काट डाल, यह भूमि को क्यों रोके है?" मसीह, यूहन्ना 15:6 में, हमें बताता है, "यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाईं फेंक दिया जाता और सूख जाता है, और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं।" यह दाखलता की निष्फल डालियों के विषय में कहा गया है। यदि किसी बगीचे में कोई निष्फल वृक्ष हो, या आपके खेतों में झाड़-झंखाड़ और जंगली बीज हों, तो आप स्वयं ऐसी दशा में क्या करेंगे? निःसन्देह, यदि यह आपके वश में होता, तो आप उन्हें पूर्णतः नष्ट कर देते।
परमेश्वर अपना उद्देश्य पाकर रहेगा; वह इसे पूरा करेगा। यद्यपि सब मनुष्य और शैतान अपने प्रयत्नों को मिला लें, वे किसी भी बात में परमेश्वर को विफल नहीं कर सकते; और "चाहे वे हाथ पर हाथ भी मारें, तौभी दुष्ट निर्दोष नहीं ठहरेगा;" नीतिवचन 11:1। परमेश्वर ने अपने महान नाम की शपथ खाई है, कि वह मनुष्यों से अपनी महिमा पाएगा, चाहे वे सक्रिय रूप से उसकी महिमा करें या न करें। गिनती 14:21-23।
"परन्तु मेरे जीवन की शपथ, सारी पृथ्वी यहोवा की महिमा से भर जाएगी। क्योंकि वे सब मनुष्य जिन्होंने मेरी महिमा को, और मेरे उन चमत्कारों को देखा जो मैं ने मिस्र में और जंगल में किए, और अब इन दस बार मुझे परखा है, और मेरी बात नहीं मानी है; निश्चय वे उस देश को न देखेंगे जिसकी मैं ने उनके बापदादों से शपथ खाई थी, और उन में से कोई भी जिसने मुझे रिस दिलाई है, उसे न देखेगा।"
"अब कुल्हाड़ा पेड़ों की जड़ पर धरा है; इसलिये जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है;" मत्ती 3:10। जो मनुष्य केवल झाड़-झंखाड़ और कांटे ही लाते हैं उनका अन्त जला दिया जाना है, जैसा इब्रानियों 6:7-8 में है, "क्योंकि जो भूमि उस पानी को जो उस पर बार-बार बरसता है सोख लेती है, और उन के लिये उत्तम अन्न उगाती है जिनके निमित्त वह जोती जाती है, वह परमेश्वर की ओर से आशीष पाती है: परन्तु यदि वह कांटे और भटकटैया उगाए, तो अयोग्य ठहरती है, और स्रापित होनेवाली है; और उसका अन्त जलाया जाना है।" इसी प्रकार हम जंगली बीज के विषय में पढ़ते हैं,
दुष्ट मनुष्य केवल अपने विनाश में ही उपयोगी मत्ती 13:30, "दोनों को कटनी तक इकट्ठे बढ़ने दो; और कटनी के समय मैं लवनेवालों से कहूंगा, कि पहिले जंगली बीज बटोरकर जलाने के लिये उसके पूले बान्ध लो;" और पद 40, 41, 42 में, "इसलिये जैसा जंगली बीज बटोरा और आग में जलाया जाता है, वैसा ही जगत के अन्त में होगा। मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सारी ठोकर की बातों और कुधर्म करनेवालों को बटोरकर आग के भट्ठे में झोंक देंगे: वहां रोना और दांत पीसना होगा।"
इसी प्रकार भूसी के विषय में कहा गया है, मत्ती 3:12, "उसका सूप उसके हाथ में है, और वह अपना खलिहान अच्छी तरह से साफ करेगा; और अपने गेहूं को खत्तों में बटोरेगा, परन्तु भूसी को उस आग में जलाएगा जो कभी नहीं बुझती।"
यदि आप ईश्वरीय महिमा के लिये कोई फल लाना जारी न रखें, जैसा आपने अब तक किया है, तो नरक ही आपके लिये एकमात्र उपयुक्त स्थान होगा। यह विशेष रूप से ऐसे जनों का ग्रहणस्थल बनने के लिये तैयार किया गया स्थान है। नरक में प्रकृति पापियों के लिये और अधिक परिश्रम करना बन्द कर देती है: सूर्य वहां उन पर चमकने के लिये अपनी यात्रा नहीं करता, पृथ्वी वहां उन पर व्यय होने के लिये अपनी उपज नहीं लाती। वहां उन्हें ईश्वरीय भलाई के फलों को अपनी वासनाओं पर खाने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। नरक में वे किसी भी ऐसी वस्तु को न तो हानि पहुंचा सकते हैं और न बाधित कर सकते हैं, जिस पर परमेश्वर कोई मूल्य रखता है। वहां परमेश्वर के विश्वासयोग्य सेवक और सेवकाई करनेवाले अब उन पर अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं व्यय करेंगे। जब निष्फल वृक्ष आग में होता है, तो माली के सेवक उसके चारों ओर और खोदने और उसमें खाद डालने के आगे के परिश्रम और श्रम से मुक्त हो जाते हैं।
नरक में उन्हें फिर धर्म की उन्नति को रोकने और हतोत्साहित करने का, और बहुत सी भलाई को नष्ट करने का, जैसा वे प्रायः इस संसार में करते हैं, कोई अवसर नहीं मिलेगा। नरक में उन्हें फिर अपने बुरे उदाहरण से औरों को बिगाड़ने का कोई अवसर नहीं मिलेगा। नरक में उनके पास भक्तों को ठेस पहुंचाने की सामर्थ्य फिर नहीं रहेगी; वे एक दूसरे को चोट पहुंचा सकते हैं और तड़पा सकते हैं; परन्तु भक्त उनकी पहुंच से बाहर होंगे। नरक में कोई विधान नहीं होंगे, कोई सब्त नहीं होंगे, कोई संस्कार नहीं होंगे, कोई पवित्र वस्तुएं नहीं होंगी, जिन्हें वे अपनी लापरवाह और कपटपूर्ण उपस्थिति से अपवित्र और भ्रष्ट करें।
इसलिये, यदि आप निष्फल और भूमि को रोकनेवाले बने रहें, तो नरक ही आपके लिये सबसे उपयुक्त स्थान होगा, और वहां निश्चय ही आपका भाग आपको सौंपा जाएगा। वहां परमेश्वर अपने लिये आप पर आदर प्राप्त करेगा; वहां वह पवित्र स्वर्गदूतों की उपस्थिति में, और मेम्ने की उपस्थिति में, आपके सर्वनाश में अपनी बड़ाई करेगा; और न्याय के दिन संतों के द्वारा, और अनन्त युगों तक स्वर्ग की सारी सेना के द्वारा इस कारण उसकी स्तुति की जाएगी।
