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दुष्टों का भावी दण्ड दुष्टों का भावी दण्ड — अनिवार्य और असहनीय यहेजकेल 22:14 -- क्या जिन दिनों मैं तुझ से बर्ताव करूं, उनमें तेरा मन स्थिर रह सकेगा, या तेरे हाथ बलवन्त रह सकेंगे? मुझ यहोवा ने यह कहा है, और मैं इसे पूरा करूंगा।
इस अध्याय के पूर्वार्ध में हमें यरूशलेम के पापों की एक भयानक सूची मिलती है, जैसा कि आप पहली से तेरहवीं आयत तक देख सकते हैं। तेरहवीं आयत में, जो कि इस मूल-वाक्य से ठीक पहले की आयत है, परमेश्वर उनके अधर्मों के कारण उन पर अपनी बड़ी अप्रसन्नता और भयानक क्रोध प्रगट करता है: “देख, मैंने तेरे उस बेईमानी के लाभ के कारण, जो तूने कमाया है, और उस लहू के कारण, जो तेरे बीच में बहाया गया है, अपना हाथ पीटा है।” परमेश्वर के हाथ पीटने की यह अभिव्यक्ति उसके क्रोध की उग्रता को, और उनके जघन्य अपराधों के अनुसार दण्ड देने के लिये अपने आप को तैयार करने को दर्शाती है। यह उस बात की ओर संकेत है, जो हम कभी-कभी मनुष्यों में देखते हैं, जब वे किसी भयानक अपराध या असहनीय अन्याय को देखकर या सुनकर चकित हो जाते हैं, जो उनकी आत्मा को बहुत उभाड़ता है, और उन्हें उग्र क्षोभ से भर देता है; ऐसे अवसर पर वे क्रोध में उठ खड़े होते हैं और अपने हाथ आपस में पीटते हैं, जो उनके क्षोभ की गर्मी और उस अन्याय करनेवाले से बदला लेने के दृढ़ संकल्प को प्रगट करता है; जैसे अध्याय 21:7 में है: “मैं भी अपने हाथ आपस में पीटूंगा, और अपने क्रोध को शान्त करूंगा: मुझ यहोवा ने यह कहा है।”
फिर इस मूल-वाक्य में उस प्रजा के दण्ड को दर्शाया गया है।
1. उनके दण्ड की प्रकृति को साधारण रूप से इस बात में दर्शाया गया है कि परमेश्वर स्वयं उनसे बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लेता है: यहाँ परमेश्वर यरूशलेम के पापियों से बर्ताव करने की धमकी देता है।
भविष्यद्वक्ता उनका कुछ भी नहीं कर सके। परमेश्वर ने एक के बाद एक करके उन्हें भेजा था; परन्तु वे पापी उनके लिये बहुत बलवन्त निकले, और उन्होंने एक को पीटा और दूसरे को मार डाला। इसलिये अब परमेश्वर स्वयं उनसे बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लेता है।
2. उनके दण्ड को विशेष रूप से तीन बातों में दर्शाया गया है, अर्थात् उसकी असहनीयता, उसकी निरुपायता, और उसकी अनिवार्यता में।
(1.) उसकी असहनीयता: क्या तेरा मन स्थिर रह सकेगा?
(2.) उसकी निरुपायता, अर्थात् अपने बचाव के लिये कुछ भी कर सकने की असम्भवता:
क्या तेरे हाथ बलवन्त रह सकेंगे?
(3.) उसकी अनिवार्यता: मुझ यहोवा ने यह कहा है, और मैं इसे पूरा करूंगा।
सिद्धान्त चूंकि परमेश्वर ने पश्चाताप न करनेवाले पापियों से बर्ताव करने का भार अपने ऊपर ले लिया है, इसलिये वे न तो उस धमकाए गए दुःख से बच सकेंगे, न स्वयं को उससे छुड़ा सकेंगे, और न उसे सह सकेंगे।
इस सिद्धान्त पर विचार करते हुए, मैं, 1. यह दिखाऊंगा कि परमेश्वर के पश्चाताप न करनेवाले पापियों से बर्ताव करने के भार में क्या निहित है।
2. कि इसलिये वे दण्ड से बच नहीं सकते।
दुष्टों का भावी दण्ड 3. कि वे किसी भी रीति से स्वयं को उससे छुड़ा नहीं सकते, और न उसके अन्तर्गत अपने बचाव के लिये कुछ भी कर सकते हैं।
4. कि वे उसे सह नहीं सकते।
5. मैं एक जिज्ञासा का उत्तर दूंगा; और फिर उपयोग की ओर बढ़ूंगा।
I. मैं यह दिखाऊंगा कि परमेश्वर के पश्चाताप न करनेवाले पापियों से बर्ताव करने के भार में क्या निहित है... दूसरे लोग उनसे बर्ताव करने में समर्थ नहीं हैं। जो उन्हें सिखाने और उन पर शासन करने के लिये नियुक्त किए गए हैं, उनके द्वारा प्रयोग किए गए सब उपायों को वे विफल कर देते हैं। वे न तो माता-पिता के आगे झुकते हैं, न सेवकों की सम्मति, चितावनी, या डांट के आगे। वे हठी और कठोर-हृदय सिद्ध होते हैं। इसलिये
परमेश्वर स्वयं उनसे बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लेता है। इसमें निम्नलिखित बातें निहित हैं:
1. कि परमेश्वर उनसे हिसाब लेगा, और उनसे अपने न्याय की सन्तुष्टि प्राप्त करेगा। इस संसार में परमेश्वर अपने अधिकार का प्रयोग करके उन्हें आज्ञा देता है, और अपने अधीन होने की मांग करता है। अपनी आज्ञाओं में वह बहुत स्पष्ट है, कड़ाई से उनसे ऐसे-ऐसे कर्तव्यों को पूरा करने की मांग करता है, और उतनी ही दृढ़ता से ऐसी-ऐसी बातों को करने से मना करता है जो उनके कर्तव्य के विरुद्ध हैं। परन्तु वे इन आज्ञाओं की कुछ भी परवाह नहीं करते। परमेश्वर आज्ञा देता रहता है, और वे बलवा करते रहते हैं। वे परमेश्वर के अधिकार को कुछ भी नहीं समझते। परमेश्वर धमकाता है, परन्तु वे उसकी धमकी को तुच्छ जानते हैं। वे परमेश्वर का अनादर करने को कुछ भी नहीं समझते; उन्हें इसकी कुछ चिन्ता नहीं कि उनका चाल-चलन परमेश्वर के अनादर का कहां तक कारण बनता है। वह उन्हें दया प्रदान करता है, यदि वे पश्चाताप करके लौट आएं; परन्तु वे उसकी दया को उसके क्रोध के समान ही तुच्छ जानते हैं। परमेश्वर बुलाता है, परन्तु वे इनकार करते हैं। इस प्रकार वे निरन्तर अपने आप को अधिकाधिक ऋण में डुबोते जाते हैं, और साथ ही यह कल्पना करते हैं कि वे उस ऋण के भुगतान से बच जाएंगे, और परमेश्वर को उसका हक़ पूरी तरह लूट लेने का इरादा रखते हैं।
परन्तु परमेश्वर ने अपने आप को न्यायसंगत ठहराने का भार अपने ऊपर ले लिया है। वह उनसे हिसाब लेगा; उसने यह देखने का भार अपने ऊपर लिया है कि उसके प्रति सब ऋण चुकाए जाएं। उनके सब पाप उसकी पुस्तक में लिखे हैं; उनमें से एक भी नहीं भुलाया गया, और हर एक का भुगतान होना ही है। यदि परमेश्वर पर्याप्त बुद्धिमान और पर्याप्त बलवन्त है, तो वह पूरी सन्तुष्टि प्राप्त करेगा: वह अन्तिम पाई तक वसूल करेगा। वह इसे अपना भाग मानकर, अपना अधिकार समझकर, अपने ऊपर लेता है कि जहां उसके साथ अन्याय हुआ है, वहां वह अपने आप को न्यायसंगत ठहराए — व्यवस्थाविवरण 22:35 “पलटा लेना मेरा काम है।” वहीं 7:10 “वह अपने बैरी को टालमटोल न करेगा; वह उसे मुंह पर ही बदला देगा।”
2. उसने अपनी महिमा के सम्मान की रक्षा करने का भार अपने ऊपर लिया है। वे उसकी महिमा को तुच्छ जानते हैं।
वे सुनते हैं कि वह महान परमेश्वर है; परन्तु वे उसकी महानता को तुच्छ जानते हैं; वे उसे तिरस्कार के योग्य समझते हैं, और उसी के अनुसार उसके साथ बर्ताव करते हैं। वे सुनते हैं कि वह महान राजा कहलाता है; परन्तु उसके अधिकार की वे परवाह नहीं करते, और कभी-कभी वर्षों तक उसे पांवों तले रौंदते रहते हैं। परन्तु परमेश्वर ने अपनी महिमा के सम्मान की रक्षा पूरी तरह उन्हीं पर नहीं छोड़ी। यद्यपि वे अभी उसे धूल में रौंदते हैं, तौभी यह इस बात का कोई चिन्ह नहीं कि वह अन्ततः नष्ट हो जाएगी। यदि परमेश्वर उसे पूरी तरह उन्हीं के हाथों में छोड़ देता, तो निश्चय ही वह नष्ट हो जाती। परन्तु परमेश्वर अपने सम्मान और अपनी महिमा को अपने शत्रुओं के पास नहीं छोड़ता; वह उसकी दृष्टि में इतना अनमोल है कि इस प्रकार उपेक्षित न हो। उसने उसकी रक्षा का भार अपने ही ऊपर रखा है:
वह देखेगा कि उसकी अपनी अपमानित महिमा का प्रतिशोध लिया जाए। यदि परमेश्वर का वह सम्मान, जिसे पापी रौंदते हैं, अन्ततः धूल में ही पड़ा रह जाए, तो इसका कारण यही होगा कि वह अपने आप को न्यायसंगत ठहराने के लिये पर्याप्त बलवन्त नहीं है। दुष्टों का भावी दण्ड उसने गिनती 14:21 में वह बड़ी शपथ खाई है: “जैसा मैं जीवित हूं, वैसा ही सारी पृथ्वी यहोवा की महिमा से भर जाएगी।”
पापी उसके पुत्र को तुच्छ जानते हैं, और उसे अपने पांवों तले रौंदते हैं। परन्तु वह देखेगा कि क्या वह उनके सम्बन्ध में अपने पुत्र की महिमा को प्रगट नहीं कर सकता; ताकि सारी पृथ्वी जान ले कि परमेश्वर के पुत्र को तुच्छ जानना कितनी बुरी बात है। परमेश्वर की मंशा है कि सब मनुष्य और स्वर्गदूत, सारा स्वर्ग और सारी पृथ्वी, यह देखें कि क्या वह उन पापियों पर, जो अभी उसे तुच्छ जानते हैं, अपने आप को महिमान्वित करने के लिये पर्याप्त है। उसकी मंशा है कि उनके सम्बन्ध में बातों का परिणाम खुला रहे, ताकि सब मनुष्य उसे देख सकें।
3. उसने पश्चाताप न करनेवाले पापियों को वश में करने का भार अपने ऊपर लिया है। इस संसार में रहते हुए उनके हृदय बहुत ही अवश हैं। वे अपना सिर ऊंचा उठाते हैं और बड़े घमण्ड और तिरस्कार से आचरण करते हैं, और प्रायः खुले हाथ से पाप करते हैं। वे अपना मुंह स्वर्ग के विरुद्ध लगाते हैं, और उनकी जीभ पृथ्वी में डोलती फिरती है। वे व्यवहार में वैसा ही कहते हैं जैसा फिरौन ने कहा था, “यहोवा कौन है? मैं यहोवा को नहीं जानता, और न उसकी बात मानूंगा।” अय्यूब 21:41 “वे परमेश्वर से कहते हैं,
‘हम से दूर हो, क्योंकि हम तेरे मार्गों के ज्ञान की इच्छा नहीं रखते।’”
कई लोग, जो अपने पाप को दिखावटी आडम्बर से ढांप लेते हैं, जो धर्म का मुखौटा और शान्त वेश-भूषा और आचरण धारण करते हैं, तौभी उनके हृदयों में यही आत्मा गुप्त रूप से राज्य करती है। अपने सारे सुन्दर दिखावे और भले बाहरी आचरण के होते हुए भी, वे अपने हृदयों में परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, और युद्ध के हथियार अपने पास रखते हैं, यद्यपि वे छिपे हुए शत्रु हैं, और अपनी तलवारें अपने वस्त्रों के नीचे छिपाए रहते हैं। उनके हृदय अत्यन्त घमण्डी, हठी, और बलवाई हैं, जो विरोध में उठने, उससे झगड़ने, और उसकी व्यवस्थाओं में दोष निकालने के लिये सदैव तैयार रहते हैं।
उनके हृदय घमण्ड, बैर, हठ, और निन्दा से भरे हैं, जो वचन के प्रचार को सुनते समय, और परमेश्वर के आत्मा के उनसे विनती करते समय, उनमें अनेक रीति से कार्य करते हैं; और जब तक वे संसार में जीवित रहते हैं, वे सदैव परमेश्वर का विरोध और प्रतिरोध करते रहते हैं; वे कभी अपने बलवे के हथियार नहीं डालते।”
परन्तु परमेश्वर ने उनसे बर्ताव करने और उन्हें वश में करने का भार अपने ऊपर लिया है; और वे घमण्डी और हठी हृदय, जो परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य के आगे नहीं झुकेंगे, उसके हाथ की सामर्थ्य से तोड़े जाएंगे। यदि वे उसके सुनहले राजदण्ड के इच्छुक प्रजा न बनेंगे, और उसके प्रेम के आकर्षण के आगे न झुकेंगे, तो वे चाहें या न चाहें, उसके लोहे के दण्ड के बल के अधीन किए जाएंगे।
जो लोग घमण्ड से अपनी ही धार्मिकता, और अपनी ही इच्छा को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा करते हैं, उन्हें नीचा दिखाने का भार परमेश्वर ने अपने ऊपर लिया है; और निःसन्देह यह किया जाएगा। उसने यह भार अपने ऊपर लिया है कि जो अभी परमेश्वर की परवाह नहीं करते, वे उसकी परवाह करने लगें। वे जान लेंगे कि वह यहोवा है।
अभी वे यह नहीं मानते कि वह प्रभु है; परन्तु वे इसे जान लेंगे, यशायाह 26:11 “हे यहोवा, जब तेरा हाथ ऊंचा किया गया, तब उन्होंने न देखा: परन्तु वे देखेंगे।”
अभी दुष्ट मनुष्य न केवल परमेश्वर से बैर रखते हैं, वरन् उसे तुच्छ भी जानते हैं; वे उससे नहीं डरते।
परन्तु वह उनके तिरस्कार को वश में कर लेगा। जब वह उन्हें हाथ में लेने आएगा, तब भी वे उससे बैर रखेंगे; परन्तु वे उसे तुच्छ न जानेंगे; वे उसकी सामर्थ्य को वैसा हलका न समझेंगे जैसा वे अभी समझते हैं; वे उसकी सामर्थ्य की अनन्तता को इतना अधिक देखेंगे और अनुभव करेंगे कि उसे तुच्छ नहीं जान सकेंगे। अभी वे अभ्यस्त हैं
दुष्टों का भावी दण्ड उसके क्रोध को तुच्छ जानने के; परन्तु तब वे उसे फिर कभी तुच्छ न जानेंगे, वे उससे अनन्त रूप से दूर होंगे, वे पर्याप्त अनुभव से जान लेंगे कि उसका क्रोध तुच्छ जानने योग्य नहीं है: वे इसे अपनी हानि से सीखेंगे, और इसे कभी न भूलेंगे।
4. परमेश्वर ने उनकी समझ को ठीक करने का भार अपने ऊपर लिया है। अभी वे उन बातों के विषय में निश्चय नहीं करते, जो परमेश्वर उन्हें अपने वचन में बताता है। सेवक उन्हें निश्चय दिलाने के लिये बहुत परिश्रम करते हैं, परन्तु सब व्यर्थ जाता है। इसलिये परमेश्वर स्वयं उन्हें निश्चय दिलाने का भार अपने ऊपर लेगा, और वह इसे प्रभावशाली रीति से करेगा।
अभी वे ईश्वरीय बातों की सच्चाई का निश्चय नहीं करते। उनके आगे वास्तव में निश्चय दिलानेवाले तर्क रखे जाते हैं; उन्हें निश्चय दिलाने के लिये पर्याप्त सुनने और देखने को मिलता है; तौभी वे अविश्वास और नास्तिकता की ओर इतने झुके हुए हैं, कि ईश्वरीय बातें उन्हें कभी वास्तविक प्रतीत नहीं होतीं। परन्तु परमेश्वर आगे चलकर उन्हें वास्तविक बना कर दिखाएगा।
अभी वे सदैव पवित्रशास्त्र की सच्चाई पर सन्देह करते रहते हैं, यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या वह परमेश्वर का वचन है, और क्या पवित्रशास्त्र की धमकियां सच हैं। परन्तु परमेश्वर ने उन्हें यह निश्चय दिलाने का भार अपने ऊपर लिया है कि वे धमकियां सच हैं, और वह उन्हें यह जना देगा कि वे सच हैं, यहां तक कि वे फिर कभी अनन्तकाल तक सन्देह न करेंगे। वे महंगे अनुभव से निश्चय पाएंगे... अभी वे सदैव यह प्रश्न उठाते रहते हैं कि क्या नरक जैसा कोई स्थान वास्तव में है। वे इसके विषय में बहुत सुनते हैं, परन्तु यह उन्हें सदैव स्वप्न-सा प्रतीत होता है। परन्तु परमेश्वर इसे स्वप्न से भिन्न कुछ प्रतीत कराएगा... अभी उन्हें प्रायः संसार की व्यर्थता के विषय में बताया जाता है; परन्तु पशुओं को उपदेश देना भी उतना ही उचित होगा जितना उन्हें पार्थिव वस्तुओं की व्यर्थता का विश्वास दिलाना। परन्तु परमेश्वर इसका निश्चय दिलाने का भार अपने ऊपर लेगा; वह आगे चलकर उन्हें इसका ऐसा पूरा बोध कराएगा, कि उन्हें इन सब वस्तुओं की व्यर्थता का गहरा बोध हो जाएगा।
अभी सेवक प्रायः पापियों को मसीह में हिस्सा पाने के बड़े महत्व के विषय में बताते हैं, और यह कि वही एक आवश्यक वस्तु है। उन्हें यह भी बताया जाता है कि अपने प्राणों की चिन्ता को टालते रहना कैसी मूर्खता है, और उनके लिये अपने अवसर का लाभ उठाना कितना आवश्यक है। परन्तु सेवकों के उपदेश उन्हें निश्चय नहीं दिलाते, इसलिये परमेश्वर स्वयं उन्हें निश्चय दिलाने का भार अपने ऊपर लेगा।
पश्चाताप न करनेवाले पापी, इस संसार में रहते हुए, यह सुनते हैं कि नरक कितना भयानक है। परन्तु वे इस पर विश्वास नहीं करते कि वह उतना ही भयानक है जितना सेवक उसे दर्शाते हैं। वे यह नहीं सोच सकते कि वे अनन्तकाल तक ऐसी तीव्र और भयावह यातनाएं सहेंगे। परन्तु उन्हें ऐसी रीति से सिखाया और निश्चय दिलाया जाएगा, कि सेवक उन यातनाओं के जो चित्रण परमेश्वर के वचन के अनुसार देते हैं, वे कोरी डरावनी बातें नहीं हैं; और परमेश्वर का क्रोध वास्तव में उतना ही भयानक है जितना वे घोषित करते हैं। चूंकि
परमेश्वर ने पापियों से बर्ताव करने, और इन बातों में उनकी समझ को ठीक करने का भार अपने ऊपर लिया है, और वह इसे पूरी रीति से करेगा; क्योंकि उसका कार्य सिद्ध है; जब वह कोई कार्य करने का भार अपने ऊपर लेता है, तब वह उसे अधूरा नहीं छोड़ता; इसलिये पापियों से अपना काम पूरा करने से पहले, वह उन्हें प्रभावशाली रीति से निश्चय दिलाएगा, यहां तक कि उन्हें फिर कभी अपनी पूर्व भ्रान्तियों में लौट पड़ने का खतरा न रहेगा। वह उन्हें उनकी उस मूर्खता और मूढ़ता का बोध कराएगा, जो वे अभी ऐसी धारणाएं रखने में दिखाते हैं।
इस प्रकार परमेश्वर ने हठी अविश्वासियों से बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लिया है। वे बातों को बड़ी उलझन में चलाते हैं; परन्तु हमें इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं: आइए हम प्रतीक्षा करें, और हम देखेंगे कि परमेश्वर बातों को ठीक कर देगा। पापी सदैव दण्डरहित होकर बलवा और तिरस्कार करते नहीं रहेंगे। दुष्टों का भावी दण्ड — परमेश्वर के सम्मान का प्रतिशोध उचित समय पर लिया जाएगा; और वे वश में किए जाएंगे और दोषी ठहराए जाएंगे, और उन्हें लेखा देना होगा। ऐसा कोई पाप नहीं, यहां तक कि व्यर्थ शब्द भी नहीं, जो वे बोलेंगे, जिसका उन्हें लेखा न देना पड़े; मत्ती 12:36। और उनके पापों का पूरा हिसाब चुकता किया जाना और बदला लिया जाना, और सन्तुष्टि प्राप्त की जानी है। क्योंकि उनके बुरे कामों के विरुद्ध न्याय शीघ्र नहीं किया जाता, इसलिये उनका मन उनमें बुराई करने के लिये पूरी तरह दृढ़ हो गया है। तौभी परमेश्वर एक धर्मी न्यायी है; वह देखेगा कि न्याय उचित समय पर किया जाए।
अब मैं आता हूं, II. यह दिखाने के लिये, कि इसलिये पश्चाताप न करनेवाले पापी अपने उचित दण्ड से नहीं बच सकते... परमेश्वर ने इसे लागू करने का भार अपने ऊपर लिया है; उसने इसे करने की प्रतिज्ञा की है; वह इसे अपना कार्य मानता है, अपना ही उचित भाग समझता है, और हम उससे इसकी आशा रख सकते हैं। यदि उसने अपने जीवन की शपथ खाई है कि वह इसे करेगा; और यदि उसमें पर्याप्त सामर्थ्य है; यदि वह जीवित परमेश्वर है, तो निःसन्देह हम इसे पूरा होते देखेंगे। और यह कि परमेश्वर ने घोषित किया है कि वह पश्चाताप न करनेवाले पापियों को दण्ड देगा, यह अनेक पवित्रशास्त्रों से स्पष्ट है; जैसे व्यवस्थाविवरण 32:41 “मैं अपने बैरियों से पलटा लूंगा, और अपने बैर रखनेवालों को बदला दूंगा।” व्यवस्थाविवरण 7:10 “वह अपने बैरी को टालमटोल न करेगा: वह उसे मुंह पर ही बदला देगा।” निर्गमन 34:7 “वह दोषी को कदापि निर्दोष न ठहराएगा।” नहूम 1:3 “यहोवा विलम्ब से क्रोधित होनेवाला और शक्ति में महान है, और दुष्ट को किसी रीति से निर्दोष न ठहराएगा।”
परमेश्वर मूल-वाक्य में कहता है, “मुझ यहोवा ने यह कहा है, और मैं इसे पूरा करूंगा;” जो इस धमकी की उसकी पूरी सीमा तक वास्तविक पूर्ति पर सन्देह करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता... कुछ दुष्ट मनुष्यों ने अपने आप को इस भ्रम में डाला है, कि यद्यपि परमेश्वर ने दुष्ट मनुष्यों को उनके पापों के लिये बहुत भयानक बातों की धमकी दी है, तौभी अपने हृदय में वह अपनी धमकियों को कभी पूरा करने का इरादा नहीं रखता, परन्तु केवल उन्हें डराने और भयभीत करने के लिये, जब तक वे जीवित रहें। परन्तु क्या वह अनन्त पवित्र परमेश्वर, जो ऐसा मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और जो व्यर्थ बातें नहीं कहता, इस रीति से बोल सकता है:
‘मुझ यहोवा ने यह कहा है, और मैं इसे पूरा करूंगा; मैंने न केवल धमकी दी है, वरन् मैं अपनी धमकियों को पूरा भी करूंगा’; जबकि साथ ही ये वचन उसके हृदय से मेल न खाते हों, वरन् वह गुप्त रीति से जानता हो कि यद्यपि उसने कहा है, तौभी वह इसे करने का इरादा नहीं रखता? कौन ऐसा है, जो अपने हृदय में ऐसी भयंकर निन्दा को स्थान देने का साहस करे?
नहीं; कोई भी पश्चाताप न करनेवाला पापी अपने आप को इतने व्यर्थ और मूर्खतापूर्ण ढंग से भ्रम में न डाले। यदि सचमुच केवल एक मनुष्य, अपने ही समान अशक्त और परिवर्तनशील प्राणी, उनसे बर्ताव करने का भार लेता, तो शायद वे कुछ कारण से अपने आप को यह भ्रम दे सकते थे, कि वे धमकाए गए दण्ड से बचने का कोई उपाय पा लेंगे। परन्तु चूंकि एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अपरिवर्तनशील परमेश्वर ने यह भार अपने ऊपर लिया है, इसलिये ऐसी सब आशाएं व्यर्थ हैं।
इसकी कोई आशा नहीं कि वे चाहे अनुद्धारित मरकर भी, किसी रीति से चोरी-छिपे स्वर्ग में जा घुसें। इसकी कोई आशा नहीं कि वे पश्चाताप और विश्वास के किसी झूठे दिखावे से परमेश्वर को धोखा दे सकें, और इस प्रकार भूल से स्वर्ग में ले लिए जाएं; क्योंकि परमेश्वर की आंखें आग की ज्वाला के समान हैं; वे हर मनुष्य को पूरी तरह से आर-पार देखती हैं; हृदय की भीतरी कोठरी उसके सामने पूरी तरह खुली है।
मृत्यु के समय पशुओं के समान शून्य में विलीन हो जाने से धमकाए गए दण्ड से बच निकलने की भी कोई आशा नहीं है। सचमुच, अनेक दुष्ट मनुष्य अपनी मृत्यु-शय्या पर इसी की कामना करते हैं। दुष्टों का भावी दण्ड यदि ऐसा होता, तो मृत्यु उनके लिये उस स्थिति की तुलना में जो अभी है, कुछ भी न होती। परन्तु ऐसी सब कामनाएं व्यर्थ हैं।
जब वे देह त्यागें, तब बिना ध्यान में आए बच निकलने की भी कोई आशा नहीं है। इसकी कोई आशा नहीं कि परमेश्वर, अपने ध्यान देने योग्य कार्यों की अधिकता के कारण, संयोगवश उन्हें अनदेखा कर दे, और जब वे मरने लगें तब उन पर ध्यान न दे; और इस प्रकार उनके प्राण गुप्त रीति से खिसक जाएं, और किसी छिपे हुए कोने में अपने आप को छिपा लें, और इस प्रकार ईश्वरीय प्रतिशोध से बच निकलें।
इसकी भी कोई आशा नहीं कि न्याय के दिन भीड़ में उन्हें अनदेखा कर दिया जाएगा, और उन्हें किसी पहाड़ की गुफा या मान्द में, या पृथ्वी के किसी छिपे हुए बिल में छिप जाने का अवसर मिलेगा; और ऐसा करते हुए भी, उस दिन ध्यान देने योग्य अनेक वस्तुओं के कारण उन पर ध्यान न दिया जाएगा... न ही इसकी कोई आशा है कि वे न्यायी के दाहिने हाथ पर पवित्र लोगों की भीड़ के बीच अपने आप को घुसा लेंगे, और इस प्रकार बिना पहचाने स्वर्ग चले जाएंगे... न ही इसकी कोई आशा है कि परमेश्वर अपना मन बदल देगा, या जो उसने कहा है उससे पछताएगा; क्योंकि वह मनुष्य का पुत्र नहीं कि पछताए। क्या उसने कहा है, और क्या वह उसे पूरा न करेगा? क्या उसने बोला है, और क्या वह उसे सच न कर दिखाएगा? परमेश्वर ने कब कोई कार्य करने का भार अपने ऊपर लेकर उसमें असफलता पाई है?
अब मैं आता हूं, III. यह दिखाने के लिये, कि जैसे पश्चाताप न करनेवाले पापी धमकाए गए दण्ड से नहीं बच सकते; वैसे ही वे उससे अपने आप को छुड़ाने, या उसके अन्तर्गत अपने आप को राहत देने के लिये भी कुछ नहीं कर सकते। यह मूल-वाक्य के इन शब्दों में निहित है, ‘क्या तेरे हाथ बलवन्त रह सकेंगे?’ हम अपने ही हाथों से अपने लिये वस्तुएं बनाते और पूरी करते हैं। परन्तु नरक में दुष्टों के हाथों में इतनी भी सामर्थ्य न होगी कि वे अपने लिये कुछ भी पूरा कर सकें, या किसी प्रकार का छुटकारा, या किसी मात्रा की राहत ला सकें।
1. वे उस संघर्ष में अपने शत्रु पर विजय पाने में, और इस प्रकार अपने आप को छुड़ाने में समर्थ न होंगे। परमेश्वर, जो तब उनसे बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लेगा, और क्रोध को क्रियान्वित करने के लिये अपने आप को सामर्थ्य से कमर बान्धेगा, उनका शत्रु होगा, और सचमुच शत्रु की भूमिका निभाएगा; और उसका विरोध करने के लिये उनमें कोई सामर्थ्य न होगी। जो लोग सुसमाचार के प्रकाश में रहते हुए अपने प्राणों की उपेक्षा करते हैं, वे ऐसे आचरण करते हैं मानो उन्हें विश्वास हो कि वे बाद में परमेश्वर के साथ अपना पक्ष सम्भाल लेंगे। 1 कुरिन्थियों 10:22 “क्या हम प्रभु को डाह दिलाते हैं? क्या हम उससे शक्तिमान हैं?”... परन्तु उनमें उस सर्वशक्तिमानता का सामना करने की कोई सामर्थ्य, कोई शक्ति न होगी, जो उनके विरुद्ध लगाई जाएगी।
2. उनके हाथों में परमेश्वर को शान्त करने, या उसके क्रोध की उग्रता को थोड़ा भी कम करने के लिये कुछ भी करने की सामर्थ्य न होगी। वे कोई सन्तुष्टि देने में समर्थ न होंगे: वे परमेश्वर की दया प्राप्त करने में समर्थ न होंगे। यद्यपि वे चिल्लाएं, परमेश्वर उनकी न सुनेगा। उन्हें परमेश्वर को देने के लिये कोई मूल्य न मिलेगा, जिससे वे कोई अनुग्रह मोल ले सकें, या अपने ऋण का कोई भाग चुका सकें।
3. वे किसी को भी अपना मित्र बनाने, और अपने लिये परमेश्वर से बिनती करनेवाला पाने में समर्थ न होंगे।
उन्हें इस संसार में एक मध्यस्थ का प्रस्ताव बार-बार दिया गया था; परन्तु नरक में उन्हें ऐसा कोई प्रस्ताव न मिलेगा। कोई भी उनका मित्र न बनेगा। नरक में उनका कोई मित्र न होगा; वहां सब
दुष्टों का भावी दण्ड उनके शत्रु होंगे। स्वर्ग में भी उनका कोई मित्र न होगा: पवित्र लोगों या स्वर्गदूतों में से कोई भी उनका मित्र न बनेगा; और यदि बनें भी, तो इसका कोई प्रयोजन न होगा। कोई भी प्राणी उन्हें छुड़ाने की सामर्थ्य न रखेगा, और न ही कोई उन पर कभी दया करेगा।
4. न ही वे कभी बच निकलने में समर्थ होंगे। उन्हें बन्दीगृह तोड़कर भाग निकलने का कोई उपाय न मिलेगा। नरक में वे सदा-सर्वदा के लिये अन्धकार की जंजीरों में बान्धे रखे जाएंगे। अपराधियों ने प्रायः बन्दीगृह तोड़ने और मानवीय न्याय के हाथ से बच निकलने के उपाय पा लिए हैं। परन्तु नरक के बन्दीगृह से, जो परमेश्वर का बन्दीगृह है, कोई कभी नहीं भाग सका। यह एक दृढ़ बन्दीगृह है: उस बन्दीगृह के द्वार को खोलना या तोड़ना किसी भी सीमित सामर्थ्य, या सब दुष्ट मनुष्यों और शैतानों की सम्मिलित शक्ति की भी पहुंच से परे है। मसीह के पास नरक की कुंजी है; “वह बन्द करता है, और कोई नहीं खोल सकता।”
5. न ही वे नरक में उन्हें राहत देने के लिये कुछ भी पाने में समर्थ होंगे। उन्हें वहां कभी कोई विश्राम-स्थान न मिलेगा; कोई अवकाश का स्थान; कोई छिपा हुआ कोना, जो शेष से अधिक ठण्डा हो, जहां उन्हें थोड़ा-सा अवकाश, उनकी यातना की चरम सीमा में थोड़ी-सी कमी मिल सके। उस यातना के लोक के किसी भाग में उन्हें कभी कोई ठण्डी धारा या सोता न मिलेगा; नहीं, अपनी जीभें ठण्डी करने के लिये पानी की एक बूंद भी न मिलेगी। उन्हें कोई ऐसा साथी न मिलेगा जो उन्हें कोई सुख दे, या उनका थोड़ा भी भला करे। उन्हें कोई ऐसा स्थान न मिलेगा, जहां वे एक मिनट के लिये भी ठहर सकें, विश्राम कर सकें, और सांस ले सकें: क्योंकि वे आग और गन्धक से यातना पाएंगे; और उन्हें सदा-सर्वदा के लिये न दिन में विश्राम मिलेगा, न रात में।
इस प्रकार पश्चाताप न करनेवाले पापी न तो धमकाए गए दण्ड से बच सकेंगे, न स्वयं को उससे छुड़ा सकेंगे, और न उसके अन्तर्गत कोई राहत पा सकेंगे।
अब मैं आता हूं, IV. यह दिखाने के लिये, कि वे उसे सहने में भी समर्थ न होंगे। न तो उनके हाथ इतने बलवन्त होंगे कि वे उससे अपने आप को छुड़ा सकें, और न उनके हृदय उसे सहने में समर्थ होंगे। मनुष्यों में यह सामान्य बात है कि जब उन्हें इस संसार में विपत्तियां आ पड़ती हैं, तो सबसे पहले वे उनसे बचने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु यदि वे पाएं कि वे उनसे बच नहीं सकते, तो उनके आ जाने के बाद, वे यथाशीघ्र अपने आप को उनसे छुड़ाने का प्रयत्न करते हैं; या कम से कम, बातों को इस प्रकार व्यवस्थित करने का, कि किसी मात्रा में अपने आप को छुड़ा सकें। परन्तु यदि वे पाएं कि वे किसी भी रीति से अपने आप को नहीं छुड़ा सकते, और देखें कि स्थिति ऐसी है कि उन्हें उन्हें सहना ही होगा; तो वे उन्हें सहने के लिये अपने आप को तैयार करते हैं: वे अपनी आत्मा को दृढ़ करते हैं, और यह संकल्प लेते हैं कि वे अपने आप को यथासम्भव सम्भाले रखेंगे।
परन्तु पश्चाताप न करनेवाले पापियों के लिये नरक की यातनाओं के सम्बन्ध में ऐसा सोचना पूरी तरह व्यर्थ होगा। वे उन्हें सहने, या उनके अन्तर्गत अपने आप को किसी भी रीति से सम्भाले रखने में समर्थ न होंगे: वह यातना उनकी सामर्थ्य से असीम रूप से परे होगी। किसी कीड़े के लिये, जो किसी बड़ी चट्टान के भार के नीचे दबने ही वाला है, जिस पर वह चट्टान अपने पूरे भार के साथ गिरने ही वाली है, इसका क्या अर्थ होगा कि वह अपनी शक्ति बटोरे, अपने आप को उस चट्टान के भार को सम्भालने के लिये तैयार करे, और अपने आप को उससे कुचले जाने से बचाए? इससे कहीं अधिक व्यर्थ यह होगा कि एक बेचारा शापित प्राण, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के क्रोध के भार के नीचे अपने आप को सम्भाले रखने का प्रयत्न करे।
मनुष्य की सामर्थ्य ही क्या है, जो एक कीड़े मात्र है, कि वह यहोवा की सामर्थ्य के, और उसके क्रोध की उग्रता के विरुद्ध अपने आप को सम्भाले रख सके? मनुष्य की सामर्थ्य ही क्या है, जब उसे सहने के लिये लगाया जाए
दुष्टों का भावी दण्ड अनन्त सामर्थ्य के प्रयोग के विरुद्ध? मत्ती 21:44 “जो कोई इस पत्थर पर गिरेगा, वह चकनाचूर हो जाएगा; परन्तु जिस किसी पर वह गिरेगा, वह उसे पीस डालेगा।”
जब पापी नरक की यातनाओं के विषय में सुनते हैं, तब वे कभी-कभी अपने मन में सोचते हैं: अच्छा, यदि ऐसा ही होना है कि मुझे नरक जाना ही पड़े, तो मैं इसे यथासम्भव सह लूंगा: मानो संकल्प और मन की दृढ़ता धारण करके वे किसी मात्रा में अपने आप को सम्भाले रख सकेंगे; जबकि, हाय! उनमें कोई संकल्प, कोई साहस बिलकुल न होगा। यद्यपि उन्होंने अपने आप को तैयार कर लिया हो, और अपनी शक्ति बटोर ली हो; तौभी जैसे ही वे उस क्रोध को अनुभव करना आरम्भ करेंगे, उनके हृदय पिघलकर जल के समान हो जाएंगे। यद्यपि इससे पहले वे सहने के लिये अपने आप को तैयार करने हेतु अपने हृदय कठोर करते दिखें, तौभी जिस क्षण वे उसे अनुभव करेंगे, उनके हृदय भट्टी के आगे मोम के समान हो जाएंगे। उनका साहस और संकल्प एक क्षण में सब जाता रहेगा; वह पलक झपकते ही छाया के समान लुप्त हो जाएगा। सबसे दृढ़ और सबसे बलवन्त को भी उतना ही साहस मिलेगा जितना सबसे दुर्बल शिशु को: चाहे कोई मनुष्य शिशु हो या दानव, दोनों एक समान होंगे। वे किसी भी साहस, किसी भी शक्ति, किसी भी सुख, या किसी भी आशा को जीवित नहीं रख सकेंगे।
अब मैं, जैसा प्रस्तावित किया गया था, V. इन बातों के सम्बन्ध में स्वाभाविक रूप से उठने वाली एक जिज्ञासा का उत्तर देने आता हूं।
जिज्ञासा। कुछ लोग यह कहने को तैयार हो सकते हैं, यदि यह बात सच है, यदि पश्चाताप न करनेवाले पापी न तो भावी दण्ड से बच सकते हैं, न स्वयं को उससे छुड़ा सकते हैं, और न उसे सह सकते हैं; तो फिर उनका क्या होगा?
उत्तर। वे पूरी तरह अनन्त मृत्यु में डूब जाएंगे। हृदय का वह डूबना होगा, जिसकी हम अभी कल्पना नहीं कर सकते। हम देखते हैं कि जब देह अत्यन्त पीड़ा में होती है, तब उसकी क्या दशा होती है। देह की प्रकृति बड़ी पीड़ा के अन्तर्गत भी काफी देर तक अपने आप को सम्भाले रखती है, ताकि पूरी तरह डूब न जाए। बड़ा संघर्ष, दयनीय कराहना और हांफना, और सम्भवतः ऐंठन होगी। ये पीड़ा की चरम सीमा के अन्तर्गत अपने आप को सम्भाले रखने के लिये प्रकृति के संघर्ष हैं। मानो प्रकृति में उसके आगे झुकने के प्रति एक बड़ी अनिच्छा है; वह पूरी तरह डूब जाने को सह नहीं सकती।
परन्तु कभी-कभी देह की पीड़ा इतनी अत्यन्त और तीव्र होती है, कि देह की प्रकृति उसके अन्तर्गत अपने आप को सम्भाल नहीं सकती; चाहे वह डूबने के प्रति कितनी ही अनिच्छुक हो, तौभी वह उस पीड़ा को सह नहीं सकती; कुछ संघर्ष, वेदनाएं, और हांफना होता है, और शायद एक-दो चीत्कार, और फिर प्रकृति उन यातनाओं के प्रचण्ड वेग के आगे झुक जाती है, डूब जाती है, और देह मर जाती है। यह देह की मृत्यु है। ऐसा ही नरक में प्राण के साथ होगा; उसमें अपने आप को छुड़ाने की कोई शक्ति या सामर्थ्य न होगी, और उसकी यातना और भय इतना बड़ा, इतना प्रचण्ड, उसकी सामर्थ्य से इतना असंगत होगा, कि अपने आप को सम्भालने की तनिक भी शक्ति न रखते हुए, यद्यपि प्राण की प्रकृति और प्रवृत्ति के सर्वथा विरुद्ध होगा कि वह पूरी तरह डूब जाए; तौभी वह डूब जाएगा, वह पूरी तरह और सम्पूर्ण रूप से डूब जाएगा, बिना किसी शेष सुख, शक्ति, साहस, या आशा के तनिक भी अंश के। और यद्यपि वह कभी नष्ट नहीं किया जाएगा, उसका अस्तित्व और उसकी चेतना कभी लुप्त नहीं होगी, तौभी उस अन्धकार की गहराई इतनी अनन्त होगी जिसमें वह डूब जाएगा, कि वह मृत्यु की, अनन्त मृत्यु की, दशा में होगा।
दुष्टों का भावी दण्ड मनुष्य की प्रकृति सुख की कामना करती है; प्राण की प्रकृति ही है कि वह कल्याण की लालसा और प्यास रखे; और यदि वह दुःख के अधीन हो, तो वह उत्सुकता से राहत के लिये हांफता है; और दुःख जितना बड़ा होता है, वह सहायता के लिये उतनी ही उत्सुकता से संघर्ष करता है। परन्तु यदि सारी राहत रोक ली जाए, सारी शक्ति दबा दी जाए, सारा सहारा पूरी तरह जाता रहे; तो वह मृत्यु के अन्धकार में डूब जाता है।
हम इस विषय की बहुत कम कल्पना कर सकते हैं; हम कल्पना नहीं कर सकते कि ऐसी दशा में प्राण का वह डूबना क्या है। परन्तु आपकी कल्पना में सहायता के लिये, कल्पना कीजिए कि आपको किसी अग्निमय भट्टे में, या किसी बड़ी भट्टी में डाल दिया गया है, जहां आपकी पीड़ा उतनी ही अधिक होगी जितनी उस पीड़ा से, जो अचानक आग के अंगारे को छू लेने से होती है, वह ताप अधिक है। यह भी कल्पना कीजिए कि आपकी देह वहां एक चौथाई घण्टे तक पड़ी रहे, पूरे समय पूर्ण चेतना से युक्त; ऐसी भट्टी में प्रवेश करते ही आपको कैसा भय अनुभव होगा! और वह चौथाई घण्टा आपको कितना लम्बा प्रतीत होगा! और एक मिनट तक उसे सहने के बाद, यह विचार कि आपको शेष चौदह मिनट सहने ही होंगे, आपके लिये कितना असह्य होगा!
परन्तु आपके प्राण पर क्या प्रभाव पड़ता, यदि आप जानते कि आपको वहां पड़े रहकर उस यातना को पूरे चौबीस घण्टे तक सहना होगा! और यह प्रभाव कितना अधिक होता, यदि आप जानते कि आपको इसे पूरे एक वर्ष तक सहना होगा; और यह और भी कितना असीम अधिक होता, यदि आप जानते कि आपको इसे एक हज़ार वर्ष तक सहना होगा! हाय, तब आपका हृदय कैसे डूब जाता, यदि आप सोचते, यदि आप जानते, कि आपको इसे सदा-सर्वदा सहना ही होगा! कि इसका कोई अन्त न होगा! कि करोड़ों-करोड़ों युगों के बाद भी, आपकी यातना अन्त के उतनी ही निकट होगी, जितनी वह कभी थी; और यह कि आप कभी, कभी भी न छुड़ाए जाएंगे!
परन्तु नरक में आपकी यातना इस दृष्टान्त द्वारा दर्शाई गई यातना से असीम रूप से अधिक होगी।
तो फिर एक बेचारे प्राणी का हृदय उसके अधीन कैसे डूब जाएगा! ऐसी दशा में प्राण का डूबना कितना पूर्णतः अवर्णनीय और अकल्पनीय होगा!
यही वह मृत्यु है जिसकी धमकी व्यवस्था में दी गई है। यही शब्द के उच्चतम अर्थ में मरना है। यह सचेत होकर मरना है; मरना और उसे जानना है; मृत्यु के अन्धकार को अनुभव करना है। यही सर्वनाश होना है; यही विनाश नाम के योग्य है। प्राण का इस असीम भार के नीचे डूबना, जिसे वह सह नहीं सकता, यही नरक का अन्धकार है। हम पवित्रशास्त्र में घोर अन्धकार के विषय में पढ़ते हैं; यही वह है, यही वही वस्तु है। हम पवित्रशास्त्र में पापियों के खो जाने, और उनके अपने प्राणों को खो देने के विषय में पढ़ते हैं: यही वह वस्तु है जो अभिप्रेत है; यही प्राण को खोना है: जो इसके अधीन होते हैं, वे पूर्णतः खो जाते हैं।
उपयोग इस विषय को पश्चाताप न करनेवाले पापियों के लिये जागृति के उपयोग में लगाया जा सकता है। इस सिद्धान्त के अन्तर्गत जो कुछ कहा गया है, वह तेरे लिये है, हे पश्चाताप न करनेवाले पापी, हे दीन अभागे, जो उसी दुःखी दशा में है जिसमें तू संसार में आया था, केवल इतना अन्तर है कि तू अपने वास्तविक पापों के कारण कहीं अधिक बड़े दोष से लदा हुआ है। ये भयानक बातें, जो तूने सुनी हैं, तेरे ही लिये हैं, जो अब तक अनुद्धारित है, और अब भी बिना मसीह और बिना परमेश्वर के इस संसार में परदेशी और अजनबी बना हुआ है। ये उस तेरे लिये हैं, जो आज तक परमेश्वर का शत्रु और शैतान की सन्तान बना हुआ है, यहां तक कि इस उल्लेखनीय समय में भी, जब यहां और दुष्टों का भावी दण्ड — दूर-दूर तक अन्यत्र भी दूसरे लोग मसीह की ओर उमड़ रहे हैं; तेरे लिये, जो इन बातों की आवाज़, इनकी चर्चा तो सुनता है, परन्तु अपने ही हृदय में भक्ति की सामर्थ्य के विषय में कुछ नहीं जानता।
तू चाहे जो भी हो, चाहे जवान हो या बूढ़ा, छोटा हो या बड़ा, यदि तू मसीह-रहित, अनुद्धारित दशा में है, तो यही वह क्रोध है, यही वह मृत्यु है जिसके लिये तू दण्डित है। यही वह क्रोध है जो तुझ पर बना रहता है; यही वह नरक है जिस पर तू लटका हुआ है, और जिसमें तू प्रतिदिन और प्रतिरात गिरने ही वाला है।
यदि तू थोड़ी देर और अन्धा, और कठोर, और पाप में मरा हुआ बना रहेगा, तो यह विनाश तुझ पर आ पड़ेगा: परमेश्वर ने कहा है और वह इसे पूरा करेगा। तेरे लिये यह व्यर्थ है कि तू अपने आप को इस आशा से भ्रम दे कि तू इससे बच जाएगा, या अपने हृदय में कहे, ‘शायद ऐसा न होगा; शायद ऐसा ठीक वैसा न होगा; शायद बातों को उनसे अधिक बुरा दिखाया गया है जितनी वे हैं।’ यदि तू परमेश्वर के नाम में मनुष्यों द्वारा तुझे सुनाए गए वचन से निश्चय नहीं पाएगा, तो परमेश्वर स्वयं तुझे निश्चय दिलाने का भार अपने ऊपर लेगा, यहेजकेल 14:4, 7, 8।
क्या तुझे यह असत्य-सा प्रतीत होता है कि तू ऐसा भयानक विनाश सहेगा, क्योंकि तुझे लगता है कि तू इसके योग्य नहीं है? और क्योंकि तुझे अपने आप में ऐसा कुछ भी भयानक नहीं दिखाई देता, जो ऐसे भयानक दण्ड के योग्य हो? ऐसा क्यों है कि तेरी दुष्टता तुझे इस दण्ड के योग्य होने के लिये पर्याप्त बुरी नहीं लगती? इसका कारण यह है कि तू अपनी दुष्टता से प्रेम करता है; तेरी दुष्टता तुझे भली लगती है; वह तुझे मनोहर प्रतीत होती है; तुझे उसमें कोई घिनौनापन दिखाई नहीं देता, या निश्चय ही, ऐसा कोई घिनौनापन नहीं जो ऐसे दुःख के योग्य हो।
परन्तु जान ले, हे मूढ़, अन्धे, कठोर अभागे, कि परमेश्वर वैसे नहीं देखता जैसे तू अपनी मलिन आंखों से देखता है: तेरे पाप उसकी दृष्टि में अनन्त रूप से घृणित हैं। तू जानता है कि तूने हज़ारों-हज़ार बार परमेश्वर की महिमा को हलका समझा है। और वह महिमा, जिसे तूने इस प्रकार तुच्छ जाना है, तेरे दण्ड की महानता में क्यों प्रगट न की जाए? तूने बार-बार सुना है कि यहोवा कैसा महान और भयानक परमेश्वर है; परन्तु तूने उसे इतना हलका समझा है, कि तू उससे नहीं डरा, तू उसके विरुद्ध पाप करने से नहीं डरा, न ही दिन-प्रतिदिन अपने पापों से उसे क्रोध दिलाने से, न उसकी आज्ञाओं को पांवों तले फेंककर उन्हें रौंदने से। अब क्यों न परमेश्वर, तेरे विनाश की महानता में, उस महिमा को, जिसे तूने तुच्छ जाना है, न्यायसंगत रीति से प्रगट और सिद्ध करे?
तूने परमेश्वर की महाशक्ति को तुच्छ जाना है; तू उससे नहीं डरा। अब यह क्यों उचित नहीं कि परमेश्वर तेरे विनाश में अपनी सामर्थ्य की महानता दिखाए? ऐसा कौन-सा राजा है, जो अपने अधिकार को तुच्छ जाननेवाली प्रजा को दण्ड देने में अपने अधिकार को न दिखाए! और कौन बलवा करनेवालों पर प्रतिशोध लेने में अपनी राजसी महिमा का प्रतिशोध न लेगा?
और क्या तू ऐसा मूर्ख है, जो यह सोचता है कि स्वर्ग और पृथ्वी का वह महान राजा, जिसके आगे सब अन्य राजा टिड्डियों के समान हैं, तुझ जैसे तिरस्कारी बलवाइयों पर अपनी राजसी महिमा का प्रतिशोध न लेगा? यदि तू ऐसा सोचता है, तो तू बहुत बड़ी भूल में है। यदि तू परमेश्वर की महिमा की परवाह नहीं करता, तो तुझे यह जान लेना चाहिए कि परमेश्वर अपनी ही महिमा की परवाह करना नहीं छोड़ता; वह उसके सम्मान की चिन्ता रखता है, और वह उसका प्रतिशोध लेगा।
दुष्टों का भावी दण्ड यह अजीब न समझ कि परमेश्वर तेरे साथ इतनी कठोरता से बर्ताव करे, या कि जो क्रोध तू सहेगा, वह इतना बड़ा हो। क्योंकि वह जितना बड़ा है, वह परमेश्वर के उस प्रेम से बड़ा नहीं, जिसे तूने तुच्छ जाना है। परमेश्वर का प्रेम, और उसका अनुग्रह, उसकी दीनता, और पापियों पर उसकी दया, जिसमें उसने अपने पुत्र को उनके लिये मरने को संसार में भेजा, इस अवर्णनीय क्रोध के समान ही महान और अद्भुत है। यह दया तेरे सामने रखी गई है, और सैकड़ों बार अपनी अद्भुत महानता में वर्णित की गई है, और उतनी ही बार तुझे प्रस्तुत की गई है; परन्तु तूने मसीह को ग्रहण नहीं किया; तूने परमेश्वर का यह महान प्रेम नहीं चाहा; तूने परमेश्वर के मरणकारी प्रेम को तुच्छ जाना; तूने उसके लाभों को पांवों तले रौंदा। अब तुझे उस प्रेम और दया के समान बड़ा क्रोध क्यों न मिले, जिसे तू तुच्छ जानता और अस्वीकार करता है? क्या तुझे यह अविश्वसनीय-सा लगता है कि परमेश्वर एक बेचारे पापी के विरुद्ध अपना हृदय इतना कठोर कर ले, कि उसे इस प्रकार नष्ट कर दे, और अनन्त सामर्थ्य और निर्दय क्रोध से उसे कुचल डाले? और क्या यह उससे बड़ी बात है, जो तूने अनन्त दया के विरुद्ध, और परमेश्वर के मरणकारी प्रेम के विरुद्ध, अपना हृदय कठोर करके किया है?
क्या तुझे यह अविश्वसनीय-सा लगता है कि परमेश्वर पापी के कल्याण की इतनी पूर्ण अवहेलना करे, कि उसे दुःख की एक अनन्त गहराई में डुबो दे? क्या यह तुझे चौंका देनेवाली बात है? और क्या यह तुझे तनिक भी चौंकानेवाली बात नहीं, कि तू अनन्त परमेश्वर के सम्मान और महिमा की इतनी पूर्ण अवहेलना करता रहा है?
यह तेरी मूर्खतापूर्ण मूढ़ता और असंवेदनशीलता से उत्पन्न होता है, और इसलिये है कि तेरा हृदय पत्थर का है, कि तू अपनी ही दुष्टता के प्रति इतना असंवेदनशील है कि तू यह सोचता है कि तूने ऐसा दण्ड नहीं पाया है, और तुझे यह अविश्वसनीय लगता है कि यह तुझ पर डाला जाएगा। परन्तु यदि, सब कुछ कहने और करने के बाद भी, तू निश्चय न पाए, तो थोड़ी देर प्रतीक्षा कर, और तू निश्चय पा लेगा: परमेश्वर वह कार्य करने का भार अपने ऊपर लेगा जो सेवक नहीं कर सकते। यद्यपि तेरे बुरे कामों के विरुद्ध न्याय अभी तक नहीं किया गया, और परमेश्वर अभी तुझे छोड़े हुए है, तौभी वह शीघ्र ही अपनी बड़ी सामर्थ्य के साथ तुझ पर आ पड़ेगा, और तब तू जान लेगा कि परमेश्वर क्या है, और तू क्या है।
अपने आप को इस भ्रम में न डाल, कि यदि ये बातें सच सिद्ध हों, और बुरे से बुरा हो जाए, तो तू अपने आप को यथासम्भव सहने के लिये तैयार कर लेगा। जब तू उस सर्वशक्तिमान राजा, यहोवा के हाथों में पड़ेगा, तब अपने आप को सहने के लिये तैयार करने, और अपने आप को सम्भालने के लिये अपनी शक्ति बटोरने का क्या अर्थ रह जाएगा? जिसने तुझे बनाया, वह अपनी तलवार तुझ तक पहुंचा सकता है। उसकी तलवार मनुष्य की तलवार नहीं, और न उसका क्रोध मनुष्य का क्रोध है। यदि ऐसा होता, तो सम्भवतः उसके अन्तर्गत दृढ़ता बनाए रखी जा सकती थी। परन्तु यह उस महान परमेश्वर के क्रोध की उग्रता है, जो तेरी सारी शक्ति को एक क्षण में विफल और छिन्न-भिन्न कर सकता है। वह तेरे बेचारे प्राण को क्रोध के महासागर से, आग और गन्धक की बाढ़ से भर सकता है; या वह उसे इससे दस हज़ार गुना अधिक यातना से भर सकता है, जितनी कभी किसी भट्टे में आग से भरी गई हो; और साथ ही, वह उसे इस निराशा से भर सकता है कि उसकी यातना का अन्त, या उसके दुःख से कोई विश्राम कभी न देखा जाएगा: तब तेरी शक्ति कहां रहेगी? तब तेरे साहस का क्या होगा? तेरे सहने के प्रयत्नों का क्या अर्थ रहेगा?
तू उस महान परमेश्वर के हाथों में क्या है, जिसने एक वचन बोलकर स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया? तू क्या है, जब तुझसे उस सामर्थ्य द्वारा बर्ताव किया जाए, जो इस विशाल विश्व का सञ्चालन करती है,
दुष्टों का भावी दण्ड जो पृथ्वी के गोले को थामे रखती है, युग-युग तक आकाशीय पिण्डों की सब गतियों को निर्देशित करती है, और जब निश्चित समय आएगा, तब सब कुछ को चूर-चूर कर देगी? ऐसे अन्य दुष्ट प्राणी हैं जो तुझसे हज़ार गुना अधिक बलवन्त हैं: वे महान लिव्यातान हैं, बलवन्त और घमण्डी आत्माएं, विशालकाय दृढ़ता और कठोरता के। परन्तु महान परमेश्वर के हाथों में वे कितने तुच्छ हैं!
वे दुर्बल शिशुओं से भी तुच्छ हैं; वे क्रोधित परमेश्वर के हाथों में कुछ भी नहीं, और कुछ से भी कम हैं, जैसा न्याय के दिन प्रगट होगा। उनके हृदय तोड़े जाएंगे; वे डूब जाएंगे; उनमें कोई शक्ति या साहस शेष न रहेगा; वे जल के समान दुर्बल होंगे; उनके प्राण अनन्त अन्धकार की, मृत्यु और निराशा की एक गहराई में डूब जाएंगे। तब तेरा क्या होगा, हे बेचारे कीड़े, जब तू उस परमेश्वर के हाथों में पड़ेगा, जब वह अपना क्रोध दिखाने, और तुझ पर अपनी सामर्थ्य प्रगट करने आएगा?
यदि पृथ्वी के सब दुष्ट मनुष्यों की, और नरक के सब शैतानों की शक्ति एक में मिला दी जाए, और वह सब तेरे ही अधिकार में हो; और यदि उन सबके हृदयों का साहस, महानता, और दृढ़ता तेरे अकेले हृदय में मिला दिया जाए, तौभी तू यहोवा के हाथों में कुछ भी न होगा।
यदि यह सब इकट्ठा भी कर लिया जाए, और तू अपने आप को यथासम्भव सहने के लिये तैयार कर ले, तौभी वह सब उसके बड़े क्रोध के नीचे एक क्षण में डूब जाएगा, और पूरी तरह मिटा दिया जाएगा: तेरे हाथ तुरन्त गिर पड़ेंगे और तेरा हृदय मोम के समान पिघल जाएगा। बड़े-बड़े पर्वत, दृढ़ चट्टानें, परमेश्वर की सामर्थ्य के आगे टिक नहीं सकतीं; जैसे ही वे खड़ी होती हैं, जब परमेश्वर अपने क्रोध में प्रगट होता है, तो वे इधर-उधर उछाली जाती हैं, और मेमनों के समान कूदती हैं। वह एक क्षण में पृथ्वी को चूर-चूर कर सकता है; हां, वह सारे विश्व को छिन्न-भिन्न करके एक ही प्रहार में चूर-चूर कर सकता है। तो फिर तेरे हाथ कैसे बलवन्त रहेंगे, या तेरा हृदय कैसे स्थिर रहेगा?
तू वन के सिंह के आगे खड़ा नहीं रह सकता; एक क्रोधित जंगली पशु, यदि उभाड़ा जाए, तो तुझ जैसे को सहज ही चीर-फाड़ देगा। हां, इतना ही नहीं, वरन् तू पतंगे के आगे भी कुचला जाता है। एक बहुत छोटी वस्तु, एक छोटा-सा कीड़ा या मकड़ी, या ऐसा ही कोई कीट, तुझे मार डालने में समर्थ है।
तो फिर तू परमेश्वर के हाथों में क्या कर सकता है? दहकती हुई लपटों के विरुद्ध कांटों और झाड़ियों को युद्ध की पंक्ति में खड़ा करना व्यर्थ है; कांटों की नोकें, चाहे कितनी भी तीक्ष्ण हों, आग का सामना करने में कुछ भी नहीं कर पातीं।
आप में से कुछ ने भवनों को आग में जलते देखा होगा; इसलिये अपने-आप कल्पना कीजिए कि यदि आप ऐसी बड़ी और प्रचण्ड आग के बीच होते, तो आप लपटों से लड़ने में कितने असमर्थ सिद्ध होते। आपने प्रायः किसी मकड़ी, या किसी और घिनौने कीट को, जब वह प्रचण्ड आग के बीच फेंका जाता है, देखा होगा, और देखा होगा कि वह किस प्रकार तुरन्त लपटों के वेग के आगे झुक जाता है। न कोई लम्बा संघर्ष होता है, न आग के विरुद्ध कोई लड़ाई, न ताप का सामना करने या उससे उड़ जाने के लिये कोई शक्ति लगाई जाती है; वरन् वह तुरन्त अपने आप को फैला देता है और झुक जाता है; और आग उस पर अधिकार कर लेती है, और वह तुरन्त आग से भर जाता है। यह उसका एक छोटा-सा चित्र है, जिसके अधीन आप नरक में होंगे, यदि आप पश्चाताप करके मसीह की शरण में न जाएं। यद्यपि आप सोचें कि आप अपने आप को दृढ़ करेंगे, और यथासम्भव सह लेंगे; परन्तु जिस पहले ही क्षण आप नरक में डाले जाएंगे, आपकी सारी शक्ति डूब जाएगी और पूरी तरह मिट जाएगी। अपने आप को यह प्रोत्साहन देना, कि आप नरक की यातनाओं को यथासम्भव सहने के लिये तैयार रहेंगे, ठीक वैसा ही है जैसे कोई कीड़ा, जो दुष्टों का भावी दण्ड — दहकती हुई भट्टी में फेंका जाने ही वाला है, फूलकर अपने आप को दृढ़ करे और लपटों से लड़ने की तैयारी करे।
आप बिजलियों के साथ क्या कर सकते हैं? उनसे लड़ने का क्या अर्थ रहेगा? एक बेचारा दुर्बल मनुष्य कैसी हास्यास्पद मूर्ति बनाएगा, जो किसी आंधी-तूफान में, अपने सिर या छाती पर बिजली की चमक की आशा रखते हुए, तलवार हाथ में लेकर उसका सामना करने निकल पड़े; जबकि गन्धक की एक धारा एक ही क्षण में उसके सारे प्राण और जीवन को पी जाएगी, और उसकी तलवार को पिघला देगी!
आप सब, जो परमेश्वर के शत्रु और मसीह को अस्वीकार करनेवाले हैं, चाहे आप वृद्ध पुरुष हों या स्त्रियां, मसीह-रहित घरों के मुखिया हों, या युवा लोग और दुष्ट सन्तान हों, इन बातों पर विचार कीजिए। निश्चय जानिए, कि यदि आप न सुनेंगे और न पश्चाताप करेंगे, तो परमेश्वर अपना क्रोध दिखाने, और आप पर अपनी सामर्थ्य प्रगट करने का इरादा रखता है। उसका इरादा है कि वह आप को नरक में डुबोकर अपने आप को अत्यधिक महिमान्वित करे।
उसका इरादा है कि वह न्याय के दिन, एक विशाल सभा के सामने, आपके दुःख में अपनी महान महिमा दिखाए; ऐसी सभा के सामने जो पृथ्वी पर अब तक प्रगट हुई किसी भी सभा से हज़ारों गुना बड़ी होगी; पवित्र लोगों की एक विशाल सभा के सामने, और दुष्ट मनुष्यों की एक विशाल सभा के सामने, पवित्र स्वर्गदूतों की एक विशाल सभा के सामने, और सब शैतानों के दल के सामने। परमेश्वर इन सब के सामने आपके विनाश में अपना सम्मान प्राप्त करेगा; आप उन सब की उपस्थिति में यातना पाएंगे। तब सब देखेंगे कि परमेश्वर एक महान
परमेश्वर है सचमुच; तब सब देखेंगे कि ऐसे परमेश्वर के विरुद्ध पाप करना, और ऐसे उद्धारकर्ता को, ऐसे प्रेम और अनुग्रह को अस्वीकार करना, जिसे आपने अस्वीकार और तुच्छ जाना है, कितनी भयानक बात है। सब उस महान दृश्य को देखकर श्रद्धा से भर जाएंगे, और सब पवित्र लोग और स्वर्गदूत आप की ओर देखेंगे, और उस महिमा, उस पराक्रमी सामर्थ्य, और परमेश्वर की उस पवित्रता और न्याय की आराधना करेंगे, जो आपके अवर्णनीय विनाश और दुःख में प्रगट होगी।
सम्भव है कि यहां कुछ लोग हों, जो आज मुझे सुन रहे हैं, जो इसी क्षण अजागृत हैं, और अपने प्राणों के विषय में बड़ी मात्रा में लापरवाह हैं। मुझे भय है कि हम में से कुछ ऐसे हैं जो अत्यन्त भयानक रीति से कठोर हो चुके हैं: उनके हृदय चट्टानों से भी अधिक कठोर हैं। हीरे पर भी प्रभाव डालना उनके हृदयों की तुलना में आसान है। मुझे लगता है कि आप में से कुछ ने मेरी सारी बातों को सहजता और शान्ति से सुना है: यह आपको बड़े-बड़े गूंजते शब्दों जैसा प्रतीत होता है, परन्तु आपके हृदयों तक नहीं पहुंचता। आपने ऐसी बातें अनेक बार सुनी हैं: आप पुराने योद्धा हैं, और स्वर्ग की तोप की गर्जना के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि उससे भयभीत नहीं होते। इसलिये सम्भवतः आपसे और कुछ कहना मेरे लिये व्यर्थ ही होगा; मैं केवल आपको यह स्मरण कराऊंगा कि परमेश्वर शीघ्र ही आपसे बर्ताव करेगा। मैं आपसे बर्ताव नहीं कर सकता, आप उसे तुच्छ जानते हैं जो
मैं कहता हूं; मुझमें आपको अपने संकट और दुःख का, और परमेश्वर के क्रोध की भयानकता का बोध कराने की कोई सामर्थ्य नहीं है। इस रीति में मनुष्यों के प्रयत्न प्रायः व्यर्थ सिद्ध हुए हैं।
तौभी, परमेश्वर ने आप जैसे मनुष्यों से बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लिया है। उसकी सामान्य रीति है कि पहले मनुष्यों को अपनी पूरी शक्ति आज़माने दे: विशेष रूप से सेवकों को आज़माने दे, ताकि इस प्रकार वह सेवकों को उनकी अपनी दुर्बलता और असमर्थता दिखा सके; और जब वे जो कर सकते हैं वह कर चुकें, और सब कुछ विफल हो जाए, तब परमेश्वर स्वयं इस मामले को अपने हाथों में ले लेता है। इसलिये आपकी हठधर्मिता को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो परमेश्वर का इरादा है कि वह स्वयं आपसे बर्ताव करने का भार अपने ऊपर ले। वह आपको वश में करने का भार अपने ऊपर लेगा; वह देखेगा कि क्या वह आपकी उस असंवेदनशीलता और उपेक्षा को ठीक नहीं कर सकता, जो आप उसकी
दुष्टों का भावी दण्ड धमकियों के प्रति रखते हैं। और आप निश्चय पा लेंगे; आप प्रभावशाली रीति से वश में किए जाएंगे: आपके हृदय पूरी रीति से तोड़े जाएंगे; आपकी शक्ति पूर्णतः टूट जाएगी, आपका साहस और आशा डूब जाएगी। परमेश्वर निश्चय ही उन्हें तोड़ देगा जो नहीं झुकेंगे। परमेश्वर ने, अपनी सामर्थ्य और क्रोध से कमर बान्धकर, इससे पहले भी अनेक कठोर, हठी, असंवेदनशील, दुराग्रही हृदयों से बर्ताव करने का भार अपने ऊपर लिया है; और वह कभी विफल नहीं हुआ, उसने सदैव अपना कार्य पूरी रीति से किया है।
बहुत दिन नहीं बीतेंगे कि आप अद्भुत रीति से बदल दिए जाएंगे। आप, जो अभी नरक और महान परमेश्वर के क्रोध के विषय में सुनते हैं, और यहां इन आसनों पर इतनी सहजता और शान्ति से बैठे रहते हैं, और इतनी लापरवाही से यहां से चले जाते हैं; शीघ्र ही कांपेंगे, थरथराएंगे, चिल्लाएंगे, चीत्कार करेंगे, और अपने दांत पीसेंगे, और इन महान बातों के विशाल भार और महत्व का पूरी तरह बोध पाएंगे, जिन्हें आप अभी तुच्छ जानते हैं।
