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मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता जोनाथन एडवर्ड्स का एक उपदेश खण्ड दो, द बैनर ऑफ ट्रुथ ट्रस्ट, 1995 में पुनर्मुद्रित, पृष्ठ 849-854।
[उपदेश की एक रूपरेखा योगदानकर्ता द्वारा तैयार की गई है।] रोमियों 9:18 - इसलिये वह जिस पर चाहता है दया करता है, और जिसे चाहता है कठोर कर देता है।
प्रेरित इस अध्याय के आरम्भ में यहूदी जाति के लिये, जो परमेश्वर द्वारा अस्वीकार की गई थी, अपनी बड़ी चिन्ता और मन की उदासी को प्रगट करता है। इससे वह इस भेद पर ध्यान देने के लिये अग्रसर होता है, जो परमेश्वर ने चुनाव द्वारा कुछ यहूदियों और अन्यों के बीच, और उस जाति के अधिकांश भाग और मसीही अन्यजातियों के बीच किया। इस विषय में बोलते हुए वह परमेश्वर की सर्वसत्ता के इस विषय में—अर्थात कुछ को अनन्त जीवन के लिये चुनने और अन्यों को अस्वीकार करने में—इससे अधिक विस्तृत विवेचन में प्रवेश करता है, जितना बाइबल के किसी और भाग में नहीं पाया जाता; इसी क्रम में वह पुराने नियम के कई वचनों को उद्धृत करता है, जो इस सिद्धान्त की पुष्टि और स्पष्टीकरण करते हैं। नौवें पद में वह हमें उस बात की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर ने अब्राहम से कही थी, यह दिखाते हुए कि उसने इश्माएल से पहले इसहाक को चुन लिया
—“क्योंकि यह प्रतिज्ञा का वचन है, कि इस नियत समय मैं आऊँगा, और सारा के एक पुत्र होगा।” फिर उस बात की ओर, जो परमेश्वर ने रिबका से कही थी, यह दिखाते हुए कि उसने एसाव से पहले याकूब को चुन लिया; “बड़ा छोटे की सेवा करेगा।” तेरहवें पद में, मलाकी की एक वाणी की ओर, “मैं ने याकूब से प्रेम रखा, परन्तु एसाव से बैर रखा।” पन्द्रहवें पद में, उस बात की ओर जो परमेश्वर ने मूसा से कही थी, “मैं जिस पर चाहूँ दया करूँगा, और जिस पर चाहूँ करुणा करूँगा।” और वचन के ठीक पहले के पद में, उस बात की ओर जो परमेश्वर फिरौन से कहता है, “क्योंकि पवित्रशास्त्र फिरौन से कहता है
फिरौन से, कि मैं ने तुझे इसी काम के लिये खड़ा किया है, कि तुझ में अपनी शक्ति दिखाऊँ, और मेरा नाम सारी पृथ्वी पर प्रगट किया जाए।” जो कुछ प्रेरित इस वचन में कहता है, उसमें ऐसा जान पड़ता है कि उसका विशेष सम्बन्ध इन अन्तिम दो उद्धृत वचनों से है: उस बात से जो
परमेश्वर ने पन्द्रहवें पद में मूसा से कही, और उस बात से जो उसने ठीक पहले के पद में फिरौन से कही। परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं जिस पर चाहूँ दया करूँगा।” वचन के पहले भाग में प्रेरित इसी की ओर संकेत करता है। और हम जानते हैं कि फिरौन के विषय में कितनी बार कहा गया है कि परमेश्वर ने उसका हृदय कठोर कर दिया। और वचन के पिछले भाग में—“और जिसे चाहता है कठोर कर देता है”—प्रेरित का सम्बन्ध इसी से जान पड़ता है। हम इस वचन में देख सकते हैं,
1. मनुष्यों के साथ परमेश्वर का भिन्न-भिन्न व्यवहार। वह कुछ पर दया करता है, और अन्यों को कठोर करता है।
जब यहाँ परमेश्वर के विषय में यह कहा जाता है कि वह मनुष्यों की सन्तानों में से कुछ को कठोर करता है, तो इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिये कि परमेश्वर किसी सकारात्मक सामर्थ्य द्वारा किसी मनुष्य के हृदय को कठोर करता है। ऐसा कोई सकारात्मक कार्य नहीं है
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता परमेश्वर में, मानो वह हृदय को कठोर करने के लिये कोई सामर्थ्य लगाता हो। ऐसा मान लेना परमेश्वर को पाप का प्रत्यक्ष कर्ता बना देना होगा। परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह मनुष्यों को दो रीति से कठोर करता है: अपने आत्मा के सामर्थी प्रभावों को रोक कर, जिनके बिना उनके हृदय कठोर बने रहेंगे, और और भी अधिक कठोर होते जाएँगे; इस अर्थ में वह उन्हें कठोर करता है, कि वह उन्हें कठोरता में छोड़ देता है। और फिर, अपनी परमेश्वरीय व्यवस्था में उन बातों को इस प्रकार ठहराकर, जो उनकी भ्रष्टता के दुरुपयोग द्वारा उनके कठोर होने का अवसर बन जाती हैं। इस प्रकार परमेश्वर मनुष्यों के पास अपना वचन और अपनी विधियाँ भेजता है, जो उनके दुरुपयोग द्वारा उनके कठोर होने का अवसर सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार प्रेरित ने कहा, कि वह कुछ लोगों के लिये “मृत्यु का ऐसा गन्ध था जो मृत्यु ही लाए।” इसी प्रकार परमेश्वर के विषय में कहा गया है कि उसने भेजा
यशायाह को इसी काम के लिये, कि वह लोगों के मन को मोटा कर दे, और उनके कानों को भारी कर दे, और उनकी आँखों को बन्द कर दे; कहीं ऐसा न हो कि वे अपनी आँखों से देखें, और अपने कानों से सुनें, और अपने मन से समझें, और फिरें, और चंगे हो जाएँ। यशायाह 6:10। यशायाह का प्रचार अपने आप में, इसके विपरीत प्रवृत्ति का था, कि वह उन्हें भला बनाए। परन्तु उनके दुरुपयोग ने इसे उनके कठोर होने का अवसर बना दिया। जैसे यहाँ परमेश्वर के विषय में कहा जाता है कि वह मनुष्यों को कठोर करता है, वैसे ही उसके विषय में यह भी कहा जाता है कि उसने झूठे नबियों के मुँह में एक झूठी आत्मा डाल दी। 2 इतिहास 18:22। अर्थात उसने एक झूठी आत्मा को उनमें प्रवेश करने दिया।
और इसी प्रकार उसके विषय में यह भी कहा जाता है कि उसने शिमी को दाऊद को कोसने की आज्ञा दी। 2 शमूएल 16:10। यह नहीं कि उसने ठीक-ठीक उसे आज्ञा दी हो; क्योंकि यह परमेश्वर की आज्ञाओं के विरुद्ध है। परमेश्वर स्पष्ट रूप से लोगों के अधिकारी को कोसने से मना करता है। निर्गमन 22:28। परन्तु उसने उस समय भ्रष्टता को शिमी में इस प्रकार कार्य करने दिया, और उस अवसर को इस प्रकार ठहराया कि वह उभर आए, ताकि दाऊद के प्रति अपनी अप्रसन्नता प्रगट करे।
2. मनुष्यजाति के साथ उसके भिन्न-भिन्न व्यवहार का आधार; अर्थात उसकी सर्वसत्तापूर्ण इच्छा और प्रसन्नता। “वह जिस पर चाहता है दया करता है, और जिसे चाहता है कठोर कर देता है।”
इसका केवल यही अर्थ नहीं है कि परमेश्वर अपनी इच्छा के विरुद्ध कभी दया नहीं दिखाता, या उसे रोकता नहीं है, अथवा वह जब भी ऐसा करता है तो सदा उसे करने के लिये तैयार रहता है। एक इच्छुक प्रजाजन या सेवक, जब वह अपने स्वामी की आज्ञाओं का पालन करता है, तो सम्भव है कि वह कभी अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ न करे, बल्कि जो कुछ वह करे वह प्रसन्नता और आनन्द से करे; फिर भी उसके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वह वचन के अर्थ में अपनी ही इच्छा से कार्य करता है। परन्तु यह वाक्यांश यह दर्शाता है कि यह परमेश्वर की निज इच्छा और सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता ही है, जो इस विषय को सर्वोच्च रीति से ठहराती है। यह बिना किसी रोक, बिना किसी विवशता, और बिना किसी बाध्यता के ईश्वरीय इच्छा है।
सिद्धान्त। परमेश्वर मनुष्यों के अनन्त उद्धार में अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है।
वह न केवल सर्वसत्तासम्पन्न है, और उस विषय में ठहराने और व्यवस्था करने का सर्वसत्तापूर्ण अधिकार रखता है; और न केवल यह कि यदि वह चाहे तो सर्वसत्तापूर्ण रीति से आगे बढ़ सकता है, और कोई भी उस पर यह दोष नहीं लगा सकता कि उसने अपने अधिकार से बढ़कर कुछ किया; बल्कि वह वास्तव में ऐसा ही करता है; वह उस अधिकार का प्रयोग करता है जो उसके पास है।
इस उपदेश में मैं यह दिखाने का प्रस्ताव रखता हूँ, 1. परमेश्वर की सर्वसत्ता क्या है।
2. मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता का क्या अभिप्राय है।
3. कि परमेश्वर वास्तव में इस विषय में अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है।
4. इस प्रयोग के कारण।
(किसी अंक पर क्लिक करने से उस अंश पर पहुँचा जा सकता है) मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता 1. मैं यह दिखाना चाहूँगा कि परमेश्वर की सर्वसत्ता क्या है।
परमेश्वर की सर्वसत्ता उसका वह पूर्ण, स्वतन्त्र अधिकार है, जिसके द्वारा वह अपनी ही प्रसन्नता के अनुसार सब सृजी हुई वस्तुओं की व्यवस्था करता है। मैं इस परिभाषा पर इसके भागों के अनुसार विचार करूँगा।
परमेश्वर की इच्छा को उसकी निज प्रसन्नता इसलिये कहा जाता है, 1. किसी भी प्रकार की विवशता के विरुद्ध। मनुष्य स्वेच्छा से कार्य कर सकते हैं, फिर भी उसमें कुछ मात्रा में विवशता हो सकती है। किसी मनुष्य के विषय में यह कहा जा सकता है कि उसने कोई कार्य स्वेच्छा से किया, अर्थात उसने स्वयं उसे किया; और सब बातों पर विचार करते हुए, वह उसे करना चुन सकता है; फिर भी वह उसे भय के कारण कर सकता है, और वह कार्य अपने आप में उसके लिये अरुचिकर हो सकता है, और उसकी इच्छा के सर्वथा विरुद्ध हो सकता है। जब मनुष्य इस प्रकार कार्य करते हैं, तो उनके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने अपनी निज प्रसन्नता के अनुसार किया।
2. उसके किसी और की इच्छा के अधीन होने के विरुद्ध। एक सेवक अपने स्वामी की आज्ञाओं को पूरा कर सकता है, और उसे इच्छापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक कर सकता है, और अपने स्वामी की इच्छा को पूरा करने में आनन्द ले सकता है; फिर भी जब वह ऐसा करता है, तो वह उसे अपनी निज प्रसन्नता से नहीं करता। पवित्र लोग परमेश्वर की इच्छा को स्वतन्त्रतापूर्वक पूरा करते हैं। वे उसे करना चुनते हैं; वह उनका भोजन और जल है। फिर भी वे उसे अपनी निज प्रसन्नता और स्वेच्छाचारी इच्छा से नहीं करते; क्योंकि उनकी इच्छा एक उच्चतर इच्छा के निर्देशन के अधीन है।
3. किसी उचित बाध्यता के विरुद्ध। एक मनुष्य किसी ऐसे कार्य को, जिसे करने के लिये वह बाध्य है, बड़ी स्वतन्त्रता से कर सकता है; परन्तु उसके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपनी निज इच्छा और प्रसन्नता से कार्य करता है। जो अपनी निज प्रसन्नता से कार्य करता है, वह पूर्ण स्वतन्त्रता में है; परन्तु जो किसी उचित बाध्यता के अधीन है, वह स्वतन्त्र नहीं, बल्कि बन्धा हुआ है। अब परमेश्वर की सर्वसत्ता यह मानती है, कि उसे अपनी सब सृजी हुई वस्तुओं की व्यवस्था अपनी निज प्रसन्नता के अनुसार, उपर्युक्त अर्थ में, करने का अधिकार है। और उसका अधिकार पूर्ण और स्वतन्त्र है। मनुष्यों को कुछ वस्तुओं की व्यवस्था अपनी प्रसन्नता के अनुसार करने का अधिकार हो सकता है। परन्तु उनका अधिकार पूर्ण और असीमित नहीं है। मनुष्यों के विषय में यह कहा जा सकता है कि उन्हें अपनी वस्तुओं की व्यवस्था अपनी इच्छानुसार करने का अधिकार है। परन्तु उनका अधिकार पूर्ण नहीं है; उसकी सीमाएँ और मर्यादाएँ हैं। उन्हें अपनी वस्तुओं की व्यवस्था अपनी इच्छानुसार करने का अधिकार है, बशर्ते कि वे उस राज्य की व्यवस्था के विरुद्ध, जिसके वे अधीन हैं, अथवा परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध ऐसा न करें। मनुष्यों का अपनी वस्तुओं की व्यवस्था अपनी इच्छानुसार करने का अधिकार पूर्ण नहीं है, क्योंकि वह स्वतन्त्र नहीं है। उनके पास जो कुछ है उस पर उनका स्वतन्त्र अधिकार नहीं है, बल्कि कुछ बातों में वे उस समुदाय पर निर्भर हैं जिससे वे सम्बन्धित हैं, अपने अधिकार के लिये; और हर बात में वे परमेश्वर पर निर्भर हैं। उन्हें जो भी अधिकार किसी वस्तु पर प्राप्त है, वह उन्हें परमेश्वर से ही मिला है। परन्तु परमेश्वर की सर्वसत्ता का अभिप्राय यह है कि उसे अपनी सृजी हुई वस्तुओं की व्यवस्था अपनी इच्छानुसार करने का पूर्ण, असीमित, और स्वतन्त्र अधिकार है। मैंने यह जाँचने का प्रस्ताव रखा था,
2. मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता का क्या अभिप्राय है। इस प्रश्न के उत्तर में मैं यह देखता हूँ, कि इसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर मनुष्यों की सन्तानों में से किसी को भी उद्धार दे सकता है, या उससे इन्कार कर सकता है, बिना अपने किसी भी गुण की महिमा को कुछ भी हानि पहुँचाए, सिवाय वहाँ जहाँ उसने यह घोषित करना उचित समझा है कि वह उसे देगा या नहीं देगा। जैसा कि अब स्थिति है, यह पूर्ण रूप से नहीं कहा जा सकता कि परमेश्वर अपने किसी भी गुण के आदर को हानि पहुँचाए बिना मनुष्यों की सन्तानों में से किसी को भी उद्धार दे सकता है, या उससे इन्कार कर सकता है; क्योंकि कुछ के विषय में परमेश्वर ने यह घोषित करना उचित समझा है कि वह उन्हें उद्धार देगा या नहीं देगा; और इस प्रकार अपने ही वचन से स्वयं को बाँध लिया है। और कुछ के विषय में उसने मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता यह घोषित करना उचित समझा है, कि वह उन्हें कभी उद्धार नहीं देगा; अर्थात वे जिन्होंने पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप किया है। इसलिये, जैसा अब स्थिति है, वह बाध्य है; वह न तो एक दशा में उद्धार दे सकता है, और न दूसरी दशा में उससे इन्कार कर सकता है, बिना अपने सत्य के आदर को हानि पहुँचाए।
परन्तु परमेश्वर ने इन घोषणाओं को करने में अपनी सर्वसत्ता का ही प्रयोग किया। परमेश्वर यह प्रतिज्ञा करने के लिये बाध्य नहीं था कि वह मसीह पर विश्वास करनेवाले सभी को उद्धार देगा; और न ही वह यह घोषित करने के लिये बाध्य था, कि जिसने पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप किया है उसे कभी क्षमा नहीं मिलेगी। परन्तु उसे ऐसा घोषित करना अच्छा लगा। और यदि परमेश्वर को इन बातों में स्वयं को बाध्य करना अच्छा न लगा होता, तो वह फिर भी बिना अपने किसी भी गुण को हानि पहुँचाए, उद्धार दे सकता था, या उससे इन्कार कर सकता था। यदि उद्धार देना या उससे इन्कार करना अपने आप में उसके किसी गुण के लिये हानिकारक होता, तो परमेश्वर उस विषय में पूर्ण सर्वसत्तासम्पन्न होकर कार्य नहीं करता। क्योंकि तब वह केवल स्वेच्छाचारी बात नहीं रह जाती। वह पूर्ण स्वतन्त्रता का विषय नहीं रह जाती, और आवश्यकता या बाध्यता का विषय बन जाती है। क्योंकि परमेश्वर अपने किसी भी गुण की हानि के लिये, या जो अपने आप में उत्कृष्ट और महिमामय है उसके विरुद्ध, कुछ भी नहीं कर सकता। इसलिये,
1. परमेश्वर अपने किसी भी गुण की महिमा को हानि पहुँचाए बिना, मनुष्यों की सन्तानों में से किसी को भी उद्धार दे सकता है, सिवाय उनके जिन्होंने पवित्र
आत्मा के विरुद्ध पाप किया है। जब मनुष्य गिरा, और इससे पहले कि परमेश्वर ने यीशु मसीह द्वारा मनुष्यों को छुड़ाने के अपने अनन्त उद्देश्य और योजना को प्रगट किया, स्थिति ऐसी ही थी। सम्भवतः स्वर्गदूतों की दृष्टि में यह बात परमेश्वर के गुणों से सर्वथा असंगत जान पड़ती होगी कि वह मनुष्यों की सन्तानों में से किसी को भी बचाए। गिरे हुए मनुष्यों की सन्तानों में से किसी एक को भी, जैसे वे अपने आप में थे, बचाना ईश्वरीय गुणों के आदर से सर्वथा असंगत था। यह तब तक सम्भव नहीं हो सकता था जब तक परमेश्वर ने अपनी पवित्रता, महिमा, न्याय, और सत्य के आदर के अनुरूप कोई मार्ग न निकाला होता। परन्तु चूँकि परमेश्वर ने सुसमाचार में यह प्रगट किया है कि उसके लिये कुछ भी करना कठिन नहीं है, कुछ भी उसकी सामर्थ्य, बुद्धि, और पर्याप्तता की पहुँच से बाहर नहीं है; और चूँकि मसीह ने छुटकारे का कार्य पूरा किया है, और आज्ञा मानकर व्यवस्था को पूर्ण किया है, इसलिये मनुष्यजाति में कोई भी ऐसा नहीं जिसे वह अपने किसी भी गुण की हानि के बिना न बचा सके, सिवाय उनके जिन्होंने पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप किया है। और उन्हें भी वह अपने किसी भी गुण के विरुद्ध गए बिना बचा सकता था, यदि उसने यह घोषित करना उचित न समझा होता कि वह उन्हें नहीं बचाएगा। यह इसलिये नहीं था कि वह उन्हें अपने न्याय और अपनी व्यवस्था के अनुरूप नहीं बचा सकता था, या इसलिये कि उसका दया का गुण पर्याप्त बड़ा नहीं था, या मसीह का लहू उस पाप को धोने के लिये पर्याप्त नहीं था। परन्तु उसे बुद्धिमानी के कारणों से यह घोषित करना अच्छा लगा कि वह पाप इस संसार में, या आनेवाले संसार में, कभी क्षमा नहीं किया जाएगा। और इसलिये अब ऐसों को बचाना परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध है। परन्तु अन्यथा ऐसा कोई पापी नहीं, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, जिसे परमेश्वर बिना किसी गुण को हानि पहुँचाए न बचा सके; यदि वह हत्यारा, व्यभिचारी, झूठी गवाही देनेवाला, मूर्तिपूजक, अथवा निन्दा करनेवाला रहा हो, तो भी परमेश्वर चाहे तो उसे बचा सकता है, और इससे उसकी महिमा को किसी भी प्रकार हानि नहीं पहुँचेगी। यद्यपि लोग बहुत काल तक पाप करते रहे हों, हठी रहे हों, हज़ार बार जघन्य पाप किए हों, यहाँ तक कि पाप में बूढ़े हो गए हों, और बड़ी गम्भीरता से पाप किया हो: चाहे उन बातों की गम्भीरता जो भी हो; चाहे उन्होंने कितने ही बड़े प्रकाश में पाप किया हो; चाहे वे भटके हुए हों, और मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता कितनी ही अनेक और गम्भीर चेतावनियों तथा आत्मा के आग्रहों के, और उसकी साधारण परमेश्वरीय व्यवस्था की दयाओं के विरुद्ध पाप किया हो: यद्यपि ऐसों का खतरा अन्य पापियों से कहीं अधिक है, तो भी परमेश्वर चाहे तो उन्हें मसीह के निमित्त, बिना अपने किसी भी गुण को हानि पहुँचाए, बचा सकता है।
वह जिस पर चाहे दया कर सकता है। वह चाहे तो सबसे बड़े पापियों पर भी दया कर सकता है, और उसके किसी भी गुण की महिमा को तनिक भी धब्बा नहीं लगेगा। मसीह के प्रायश्चित और धार्मिकता की पर्याप्तता ऐसी है, कि ईश्वरीय गुणों में से कोई भी उनमें से किसी के उद्धार के मार्ग में बाधा नहीं बनता। इस प्रकार मसीह द्वारा अपने कुछ क्रूस पर चढ़ानेवालों को बचाने से किसी भी गुण की महिमा को तनिक भी हानि नहीं पहुँची।
1. परमेश्वर उनमें से किसी को भी अपनी पवित्रता के आदर को हानि पहुँचाए बिना बचा सकता है। परमेश्वर एक अनन्त पवित्र सत्ता है। उसकी दृष्टि में आकाश भी शुद्ध नहीं हैं। उसकी आँखें इतनी शुद्ध हैं कि वह बुराई को देख नहीं सकता, और अधर्म पर दृष्टि नहीं डाल सकता। और यदि परमेश्वर किसी भी रीति से पाप का समर्थन करे, और उसके प्रति अपने बैर और अप्रसन्नता की उचित साक्षी न दे, तो यह उसकी पवित्रता के आदर के लिये हानिकारक होगा। परन्तु परमेश्वर सबसे बड़े पापी को भी पाप का तनिक भी समर्थन किए बिना बचा सकता है। यदि वह किसी ऐसे व्यक्ति को बचाता है, जो लम्बे समय तक सुसमाचार के बुलावे के विरुद्ध खड़ा रहा हो, और भयानक गम्भीरता से पाप करता रहा हो; यदि वह किसी ऐसे को बचाता है, जो प्रकाश के विरुद्ध डाकू या निन्दक रहा हो, तो वह उनकी दुष्टता का तनिक भी समर्थन किए बिना ऐसा कर सकता है; क्योंकि उसका उससे घृणा और उसके प्रति उसकी अप्रसन्नता मसीह के दुःखों में पहले ही पर्याप्त रूप से प्रगट हो चुकी है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी दुष्टता के प्रति भी घृणा की पर्याप्त साक्षी थी, कि मसीह, परमेश्वर का अनन्त पुत्र, उसके लिये मरा। इससे बढ़कर और कुछ भी परमेश्वर की किसी दुष्टता के प्रति अनन्त घृणा को नहीं दिखा सकता। यदि दुष्ट मनुष्य को स्वयं नरक में डाल दिया जाए, और वह वहाँ भोगी जानेवाली सबसे भीषण यातनाएँ सहे, तो भी यह परमेश्वर की उस दुष्टता के प्रति घृणा का उससे बड़ा प्रकटीकरण नहीं होगा, जितना परमेश्वर के पुत्र के उसके लिये सहे गए दुःख थे।
2. परमेश्वर मनुष्यों की सन्तानों में से किसी को भी अपनी महिमा के आदर को हानि पहुँचाए बिना बचा सकता है। यदि मनुष्यों ने परमेश्वर का अपमान किया हो, चाहे कितना ही अधिक, यदि उन्होंने उसके अधिकार पर चाहे कितना ही तिरस्कार डाला हो; तो भी परमेश्वर चाहे तो उन्हें बचा सकता है, और उसकी महिमा के आदर को तनिक भी हानि नहीं पहुँचेगी। यदि परमेश्वर उन्हें, जिन्होंने उसका अपमान किया है, बिना किसी प्रतिपूर्ति के बचाए, तो उसकी महिमा के आदर को हानि पहुँचेगी। क्योंकि जब अनन्त महिमा पर तिरस्कार डाला जाता है, तो उसके आदर को हानि पहुँचती है, और यदि क्षति की पूर्ति न की जाए, तो वह तिरस्कार ईश्वरीय महिमा के आदर पर धुंधलापन छोड़ जाता है। परन्तु मसीह के दुःख उस क्षति की पूर्ण रीति से पूर्ति करते हैं। तिरस्कार चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, तो भी यदि मसीह जैसा आदरणीय व्यक्ति अपराधी के लिये मध्यस्थ बनना स्वीकार करे, और उस मध्यस्थता में उसके स्थान पर दुःख उठाए, तो वह सबसे बड़े पापी द्वारा स्वर्ग की महिमा को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ण रीति से पूर्ति कर देता है।
3. परमेश्वर किसी भी पापी को अपने न्याय के अनुरूप बचा सकता है। परमेश्वर का न्याय पाप के दण्ड की माँग करता है। परमेश्वर संसार का सर्वोच्च न्यायी है, और उसे न्याय के नियमों के अनुसार संसार का न्याय करना है। न्यायी का काम यह नहीं कि वह न्याय किए जानेवाले व्यक्ति के प्रति पक्षपात दिखाए; बल्कि उसे न्याय के नियम के अनुसार, दाहिनी या बाईं ओर बिना मुड़े, निर्णय करना है। परमेश्वर न्यायी के रूप में दया नहीं दिखाता, बल्कि सर्वसत्तासम्पन्न के रूप में दिखाता है। और इसलिये
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता जब दया ने पापियों के उद्धार की खोज की, तो प्रश्न यह था कि सर्वसत्तासम्पन्न के रूप में परमेश्वर की दया के प्रयोग को, और न्यायी के रूप में उसके कठोर न्याय को, कैसे एक साथ मिलाया जाए। और यह मसीह के दुःखों द्वारा किया जाता है, जिनमें पाप का पूर्ण रीति से दण्ड दिया जाता है, और न्याय की माँग पूरी की जाती है।
मसीह ने अब तक जीवित रहे सबसे बड़े पापी के पापों के दण्ड के लिये पर्याप्त दुःख उठाया।
इसलिये परमेश्वर जब न्याय करता है, तो वह कठोर न्याय के नियम के अनुसार कार्य करते हुए भी, यदि पापी मसीह में हो, तो उसे निर्दोष ठहरा सकता है। न्याय किसी भी मनुष्य के पापों के लिये उससे अधिक की माँग नहीं कर सकता, जितना त्रिएकत्व के एक व्यक्ति ने, अर्थात मसीह ने, दुःख उठाया। रोमियों 3:25,26। “जिसे
परमेश्वर ने उसके लहू पर विश्वास करने के द्वारा प्रायश्चित होने के लिये ठहराया है; कि वह अपनी धार्मिकता को प्रगट करे, ताकि वह आप ही धर्मी ठहरे, और उसको भी धर्मी ठहरानेवाला हो, जो यीशु में विश्वास करता है।”
4. परमेश्वर किसी भी पापी को बिना अपने सत्य के आदर को कुछ भी हानि पहुँचाए बचा सकता है।
परमेश्वर ने अपना वचन दिया था, कि पाप का दण्ड मृत्यु से दिया जाएगा, जिसे केवल पहली मृत्यु का ही नहीं, बल्कि दूसरी मृत्यु का भी अर्थ समझना चाहिये। परमेश्वर इस चेतावनी में अपने सत्य के अनुरूप ही सबसे बड़े पापी को बचा सकता है। क्योंकि पाप का दण्ड मसीह के दुःखों में दिया जाता है, इस अर्थ में कि वह हमारा जामिन है, और इस प्रकार व्यवस्था की दृष्टि में वही व्यक्ति है, और उसने हमारे दोष को अपने ऊपर लिया, और अपने दुःखों में हमारा दण्ड सहा। यह आपत्ति की जा सकती है, कि परमेश्वर ने कहा था, यदि तू खाएगा, तो तू मर जाएगा; मानो जिस व्यक्ति ने पाप किया वही दुःख उठाए; तो फिर परमेश्वर का सत्य उसे इसके लिये बाध्य क्यों नहीं करता? मैं उत्तर देता हूँ, कि वह वचन उस समय केवल उसी व्यक्ति तक सीमित रखने के अभिप्राय से नहीं कहा गया था, जिसने अपने ही व्यक्तित्व में पाप किया। आदम सम्भवतः समझता था कि उसकी सन्तान भी इसमें सम्मिलित है, चाहे वे अपने ही व्यक्तित्व में पाप करें या न करें। यदि उन्होंने आदम में, अपने जामिन में, पाप किया, तो उन शब्दों का, “यदि तू खाएगा,” यह अर्थ था, कि यदि तू अपने आप में, या अपने जामिन में खाएगा। और इसलिये पिछले शब्द, “तू मर जाएगा,” भी उचित रीति से इसी अर्थ को स्वीकार करते हैं, कि तू अपने आप में, या अपने जामिन में मरेगा। यशायाह 42:21। “यहोवा अपनी धार्मिकता के निमित्त प्रसन्न हुआ, कि वह व्यवस्था को महान और आदरणीय बनाए।” परन्तु,
2. परमेश्वर किसी भी पापी को उद्धार देने से इन्कार कर सकता है, बिना अपने किसी भी गुण के आदर को हानि पहुँचाए।
स्वाभाविक दशा में ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं, जिसे उद्धार देने से परमेश्वर बिना अपनी महिमा के किसी भाग को हानि पहुँचाए इन्कार न कर सके। चाहे स्वाभाविक मनुष्य बुद्धिमान हो या मूर्ख, अच्छे या बुरे स्वभाव का हो, नीच या आदरणीय कुल का हो, चाहे वह दुष्ट या भक्त माता-पिता से जन्मा हो; चाहे वह नैतिक हो या अनैतिक व्यक्ति हो, उसने चाहे जो भी भलाई की हो, चाहे वह कितना ही धार्मिक रहा हो, उसने चाहे जितनी भी प्रार्थनाएँ की हों, और उद्धार पाने के लिये चाहे जो भी परिश्रम उठाया हो; उसे दण्ड के भय से चाहे जितनी भी चिन्ता और व्याकुलता हो; अथवा वह चाहे किन्हीं भी परिस्थितियों में हो; परमेश्वर बिना अपने किसी भी सद्गुण को तनिक भी अपमानित किए उसे उद्धार से इन्कार कर सकता है। उसकी महिमा किसी भी दशा में इससे तनिक भी धुंधली नहीं होगी।
1. परमेश्वर किसी भी स्वाभाविक मनुष्य को अपनी धार्मिकता के आदर को हानि पहुँचाए बिना उद्धार से इन्कार कर सकता है। यदि वह ऐसा करता है, तो इसमें कोई अन्याय या अनुचितता नहीं है। जीवित रहनेवाला ऐसा कोई भी स्वाभाविक मनुष्य नहीं, चाहे उसकी दशा जो भी हो, जिसे परमेश्वर उद्धार से इन्कार न कर सके, और उसे नरक में न डाल सके, और फिर भी किसी भी दृष्टि से तनिक भी अधर्मी या अनुचित व्यवहार का दोषी
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता न ठहराया जा सके। यह इसलिये स्पष्ट है, क्योंकि वे सब नरक के योग्य हैं: और किसी उचित न्यायी के लिये किसी मनुष्य पर उसके योग्य दण्ड लगाना कोई अन्याय नहीं है। और जैसे उसने दण्ड के योग्य होना अर्जित किया है, वैसे ही उसने उस दायित्व को दूर करने, या पाप का प्रायश्चित करने के लिये कभी कुछ नहीं किया। उसने ऐसा कुछ भी कभी नहीं किया, जिससे उसने परमेश्वर पर यह बाध्यता डाली हो कि वह उसे उसके योग्य दण्ड न दे।
2. परमेश्वर किसी भी अपरिवर्तित व्यक्ति को उद्धार से इन्कार कर सकता है, बिना अपनी भलाई के आदर को कुछ भी हानि पहुँचाए। पापी कभी-कभी अपने आप को यह समझाने के लिये तैयार रहते हैं, कि यद्यपि उन्हें दण्ड देना परमेश्वर के न्याय के विरुद्ध न हो, तो भी यह उसकी दया की महिमा के अनुरूप नहीं होगा। वे सोचते हैं कि उन्हें नरक में डालना, और उन पर तनिक भी दया या करुणा न करना, परमेश्वर की दया के लिये अनादरजनक होगा। वे सोचते हैं कि यह बहुत कठोर और निर्दय होगा, और अनन्त अनुग्रह और कोमल करुणा के परमेश्वर के योग्य नहीं होगा। परन्तु परमेश्वर किसी भी स्वाभाविक व्यक्ति को उद्धार से इन्कार कर सकता है, बिना अपनी दया और भलाई को कुछ भी अपमानित किए। जो बात परमेश्वर के न्याय के विरुद्ध नहीं है, वह उसकी दया के भी विरुद्ध नहीं है। यदि दण्ड न्याय हो, तो दया अपनी ही पात्र चुन सकती है। वे परमेश्वर की दया के स्वभाव को गलत समझते हैं, जो यह सोचते हैं कि यह एक ऐसा गुण है, जो कुछ दशाओं में न्याय के विरुद्ध होता है। नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया इसी के द्वारा और भी उजागर होती है, जैसा प्रसंग के तेईसवें पद में है। “कि वह अपनी महिमा का धन दया के उन पात्रों पर प्रगट करे, जिन्हें उसने पहले से महिमा के लिये तैयार किया था।”
3. यह परमेश्वर की सच्चाई के आदर के लिये किसी भी रीति से हानिकारक नहीं है। क्योंकि परमेश्वर ने अपने वचन द्वारा किसी भी स्वाभाविक मनुष्य को उद्धार देने के लिये स्वयं को किसी भी रीति से बाध्य नहीं किया है। स्वाभाविक दशा में मनुष्य प्रतिज्ञा की सन्तान नहीं हैं; बल्कि व्यवस्था के श्राप के लिये खुले हुए हैं, जो कि ऐसा न होता यदि उनके पास पकड़ने के लिये कोई प्रतिज्ञा होती।
3. परमेश्वर वास्तव में मनुष्यों के उद्धार में अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है।
हम यह दिखाएँगे कि वह इस अधिकार का प्रयोग कई विशेष बातों में किस प्रकार करता है।
1. एक जाति या राष्ट्र को बुलाने में, और उन्हें अनुग्रह के साधन देने में, और अन्यों को उनके बिना छोड़ देने में। ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार, उद्धार अनुग्रह के साधनों से जुड़ा हुआ दिया जाता है। परमेश्वर कभी-कभी बहुत असम्भाव्य साधनों का उपयोग कर सकता है, और बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों में पड़े मनुष्यों को उद्धार दे सकता है; परन्तु वह अनुग्रह पूर्णतः बिना किसी साधन के नहीं देता। परन्तु परमेश्वर उन साधनों को देने में अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है। सारी मनुष्यजाति स्वभाव से परमेश्वर के प्रति एक ही जैसी परिस्थिति में है। फिर भी परमेश्वर उन साधनों और सुविधाओं के द्वारा, जो वह कुछ को देता है, उन्हें अन्यों से बहुत भिन्न करता है।
जो वनवासी इस महाद्वीप के दूरस्थ भागों में रहते हैं, और घोर मूर्तिपूजक अन्धकार में हैं, और वैसे ही अफ्रीका के निवासी भी, वे स्वभाव से परमेश्वर के प्रति ठीक उसी परिस्थिति में हैं जिसमें हम इस देश में हैं। वे अपने स्वभाव में परमेश्वर से हमसे अधिक अलग या पराए नहीं हैं; और परमेश्वर के पास उन पर हमसे अधिक कोई दोष लगाने को नहीं है। और फिर भी परमेश्वर ने हमारे और उनके बीच कैसा विशाल भेद कर दिया है! इसमें उसने अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग किया है।
उसने प्राचीन काल में ऐसा ही किया, जब उसने केवल एक ही जाति को चुना, कि उसे अपनी वाचा की प्रजा बनाए, और उसे अनुग्रह के साधन दे, और अन्य सबको छोड़ दिया, और उन्हें मूर्तिपूजक अन्धकार और शैतान के अत्याचार के हाथों सौंप दिया, कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी सैकड़ों वर्षों तक नष्ट होते रहें। उस समय पृथ्वी अनेक बड़ी और शक्तिशाली जातियों से भरी हुई थी।
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता मिस्री लोग थे, जो अपनी बुद्धि के लिये प्रसिद्ध थे। अश्शूरी और कसदी भी थे, जो बड़ी, बुद्धिमान, और शक्तिशाली जातियाँ थीं। फारसी लोग थे, जिन्होंने अपनी शक्ति और नीति से संसार के एक बड़े भाग को अपने अधीन कर लिया। यूनानी और रोमी जैसी विख्यात जातियाँ थीं, जो अपनी उत्कृष्ट नागरिक शासन-व्यवस्था के लिये, शान्ति और युद्ध की कलाओं में अपनी बुद्धि और कुशलता के लिये सारे संसार में प्रसिद्ध थीं, और जिन्होंने अपनी सैन्य वीरता से बारी-बारी से संसार को अपने अधीन कर उस पर राज्य किया। वे अस्वीकार कर दी गईं।
परमेश्वर ने उन्हें अपनी प्रजा होने के लिये नहीं चुना, बल्कि उन्हें अनेक युगों तक घोर मूर्तिपूजक अन्धकार में छोड़ दिया, कि वे दर्शन की कमी से नष्ट हो जाएँ; और उसने केवल एक ही जाति को, अर्थात याकूब की सन्तान को, अपनी निज प्रजा होने के लिये चुना, और उन्हें अनुग्रह के साधन दिए। भजन संहिता 147:19,20। “वह याकूब को अपना वचन, और इस्राएल को अपनी विधियाँ और नियम बताता है। उसने किसी और जाति के साथ ऐसा नहीं किया; और अपने नियमों को उन्होंने नहीं जाना।” यह जाति अन्य अनेक जातियों की तुलना में एक छोटी, तुच्छ प्रजा थी। व्यवस्थाविवरण 7:7। “यहोवा ने तुम पर अपना प्रेम इसलिये नहीं लगाया, और न तुम्हें इसलिये चुना, कि तुम किसी और जाति से गिनती में अधिक थे; क्योंकि तुम तो सब जातियों में सबसे कम थे।” और न ही यह उनकी धार्मिकता के कारण था; क्योंकि उनके पास इसका भी अन्य जातियों से अधिक कुछ न था। व्यवस्थाविवरण 9:6। “इसलिये यह समझ ले, कि यहोवा तेरा परमेश्वर तुझे यह अच्छा देश तेरी धार्मिकता के कारण अधिकार करने को नहीं देता; क्योंकि तू हठीली प्रजा है।” परमेश्वर उन्हें यह समझाता है, कि उसने उन्हें अपनी प्रजा होने के लिये और किसी कारण से नहीं, बल्कि केवल अपने स्वतन्त्र चुनावी प्रेम के कारण चुना। जो कारण परमेश्वर के उनसे प्रेम करने का दिया गया है, वह यह था कि उसने उनसे प्रेम किया। व्यवस्थाविवरण 7:8। जिसका अर्थ यही है, कि तुम पर अपना प्रेम लगाना उसकी सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता के अनुरूप था।
परमेश्वर ने उस जाति को चुनने में भी अपनी सर्वसत्ता दिखाई, जब उन्हीं पूर्वजों से आई हुई अन्य जातियों को अस्वीकार कर दिया गया। इस प्रकार इसहाक की सन्तान चुनी गई, जब इश्माएल और अब्राहम के अन्य पुत्रों की सन्तान अस्वीकार कर दी गई। इसी प्रकार याकूब की सन्तान चुनी गई, जब एसाव की सन्तान अस्वीकार कर दी गई: जैसा प्रेरित सातवें पद में देखता है, “और न यह, कि अब्राहम के वंश होने के कारण सब सन्तान ठहरे; परन्तु इसहाक ही से तेरा वंश कहलाएगा।” और फिर दसवें, ग्यारहवें, बारहवें, तेरहवें पदों में। “और केवल यही नहीं; परन्तु जब रिबका ने भी एक ही से, अर्थात हमारे पिता इसहाक से, गर्भ धारण किया; और सन्तान अब तक जन्मी भी न थी, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था, कि परमेश्वर की चुनाव के अनुसार प्रतिज्ञा स्थिर बनी रहे, कर्मों से नहीं, परन्तु बुलानेवाले की ओर से; तो उससे कहा गया, बड़ा छोटे की सेवा करेगा। जैसा लिखा है, मैं ने याकूब से प्रेम रखा, परन्तु एसाव से बैर रखा।” प्रेरित का सम्बन्ध केवल इसहाक और याकूब के व्यक्तियों के, इश्माएल और एसाव से पहले, चुनाव से नहीं है; बल्कि उनकी सन्तान से है। मलाकी से पहले उद्धृत वचन में, परमेश्वर का सम्बन्ध उन जातियों से है, जो एसाव और याकूब की सन्तान थीं; मलाकी 1:2,3। “मैं ने तुम से प्रेम रखा है, यहोवा कहता है। तौभी तुम कहते हो, तू ने हम से किस बात में प्रेम रखा? क्या एसाव याकूब का भाई नहीं था? यहोवा की यही वाणी है: तौभी मैं ने याकूब से प्रेम रखा; और एसाव से बैर रखा, और उसके पहाड़ों और उसकी सम्पत्ति को जंगल के गीदड़ों के लिये उजाड़ डाला।” जब मसीह आया, तब परमेश्वर ने यहूदियों को अस्वीकार करने, और अन्यजातियों को बुलाने में अपनी सर्वसत्ता दिखाई। परमेश्वर ने उस जाति को अस्वीकार किया, जो शरीर के अनुसार अब्राहम की सन्तान थी, और जो इतने युगों तक उसकी निज प्रजा रही थी, और जो अकेली
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता एकमात्र सच्चे परमेश्वर की स्वामिनी थी, और उनसे पहले मूर्तिपूजक अन्यजातियों को चुन लिया, और उन्हें अपनी प्रजा होने के लिये बुलाया। जब मसीहा आया, जो उनकी जाति में जन्मा था, और जिसकी वे इतनी बड़ी आशा रखते थे, तो उसने उन्हें अस्वीकार कर दिया। वह अपनों के पास आया, और उसके अपनों ने उसे ग्रहण न किया। यूहन्ना
1:11। जब सुसमाचार की महिमामय व्यवस्था आई, तो परमेश्वर ने यहूदियों को छोड़ दिया, और उन्हें, जो अन्यजातीय थे, बुलाया, कि वे उसकी सुविधाओं का आनन्द लें। वे तोड़ दिए गए, कि अन्यजातियाँ साटी जाएँ। रोमियों 11:17। अब वह प्रिय कहलाई, जो प्रिय न थी।
और उजाड़ स्त्री की सन्तान, ब्याही हुई स्त्री की सन्तान से अधिक हैं। यशायाह 54:1।
अब्राहम की स्वाभाविक सन्तान अस्वीकार कर दी गई है, और परमेश्वर पत्थरों से अब्राहम के लिये सन्तान उत्पन्न करता है। वह जाति, जो परमेश्वर द्वारा इतनी आदर पाई थी, अब अनेक युगों से अस्वीकृत है, और सारे संसार में तितर-बितर पड़ी हुई है, जो ईश्वरीय प्रतिशोध का एक उल्लेखनीय स्मारक है। और अब परमेश्वर कुछ अन्यजातीय राष्ट्रों को अन्यों से बहुत भिन्न करता है, और यह सब उसकी सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता के अनुसार है।
2. परमेश्वर उन सुविधाओं में भी अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है, जो वह विशेष व्यक्तियों को देता है।
सबको समान रूप से उद्धार की आवश्यकता है, और सब स्वभाव से समान रूप से उसके अयोग्य हैं; परन्तु वह कुछ को अन्यों से बहुत अधिक बड़ी सुविधाएँ उद्धार के लिये देता है। कुछ को वह भक्त और धार्मिक परिवारों में उनका स्थान देता है, जहाँ उन्हें अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण मिल सके, और जहाँ धार्मिक माता-पिता उन्हें परमेश्वर को समर्पित करें, और उनके लिये बहुत सी प्रार्थनाएँ करें। परमेश्वर कुछ को अन्यों से अधिक सामर्थी सेवकाई के अधीन रखता है, और ऐसे स्थानों में जहाँ परमेश्वर के आत्मा की अधिक बरसात होती है। कुछ को वह अन्यों से कहीं अधिक आत्मा के आग्रह और जगानेवाले प्रभाव देता है। यह सब उसकी निज सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता के अनुसार है।
3. परमेश्वर कभी-कभी नीचों और तुच्छों को उद्धार देने, और बुद्धिमानों तथा बड़ों को उससे इन्कार करने में, अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है। मसीह अपनी सर्वसत्ता में राजाओं और रईसों के फाटकों के पास से निकल जाता है, और किसी झोंपड़ी में प्रवेश करके वहाँ निवास करता है, और उसके तुच्छ निवासियों के साथ सहभागिता रखता है। परमेश्वर ने अपनी सर्वसत्ता में उस धनी मनुष्य से उद्धार रोक दिया, जो प्रतिदिन सुख-विलास में जीवन बिताता था, और उसे उस दरिद्र लाज़र को दे दिया, जो उसके फाटक पर बैठकर भीख माँगता था। परमेश्वर इस रीति से राजाओं पर, और उनकी सारी चमक-दमक पर, तिरस्कार उंडेलता है। इसी प्रकार परमेश्वर कभी-कभी बुद्धिमानों को, बड़ी समझवाले, विद्वान और महान विद्वानों को छोड़ देता है, और अन्यों को, जिनकी समझ दुर्बल है, और जो केवल पवित्रशास्त्र के सरल भागों को, और मसीही धर्म के मूल सिद्धान्तों को ही समझ पाते हैं, उद्धार देता है। हाँ, ऐसा जान पड़ता है कि बड़े लोग अन्यों से कम बुलाए जाते हैं। और परमेश्वर इस प्रकार व्यवस्था करके अपनी सर्वसत्ता प्रगट करता है। 1 कुरिन्थियों 1:26,27,28। “हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो देखो, कि शरीर के अनुसार अधिक बुद्धिमान, अधिक सामर्थी, अधिक कुलीन नहीं बुलाए गए। परन्तु परमेश्वर ने संसार की मूर्ख वस्तुओं को चुन लिया, कि बुद्धिमानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने संसार की निर्बल वस्तुओं को चुन लिया, कि बलवानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने संसार की नीच वस्तुओं को, और तुच्छ ठहराई हुई वस्तुओं को, वरन जो हैं ही नहीं, उन्हें भी चुन लिया, कि जो हैं उन्हें व्यर्थ ठहराए।”
4. कुछ ऐसों को उद्धार देने में, जिन्हें बहुत कम सुविधाएँ मिली थीं। परमेश्वर कभी-कभी दुर्बल साधनों को आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न करने के लिये आशीष देता है, जब अधिक उत्तम साधन मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता सफल नहीं हुए। परमेश्वर कभी-कभी बहुत भक्त माता-पिता की सन्तानों से उद्धार रोक देता है, और उसे उन अन्यों को देता है, जो दुष्ट परिवारों में पाले-पोसे गए। इस प्रकार हम यारोबाम के परिवार में एक भले अबिय्याह के विषय में पढ़ते हैं, और दुष्ट आहाज के पुत्र, भक्त हिजकिय्याह के विषय में, और दुष्ट आमोन के पुत्र, भक्त योशिय्याह के विषय में। परन्तु इसके विपरीत, पवित्र दाऊद के पुत्रों, दुष्ट अम्नोन और अबशालोम के विषय में, और भले हिजकिय्याह के पुत्र, उस नीच मनश्शे के विषय में भी। कभी-कभी कुछ, जिन्हें अनुग्रह के उत्कृष्ट साधन मिले थे, अस्वीकार कर दिए जाते हैं, और नष्ट होने के लिये छोड़ दिए जाते हैं, और अन्य, जिन्हें कहीं कम सुविधाएँ मिलीं, बचा लिए जाते हैं। इस प्रकार शास्त्री और फरीसी, जिन्हें पवित्रशास्त्र का इतना प्रकाश और ज्ञान था, अधिकांशतः अस्वीकार कर दिए गए, और दरिद्र, अज्ञानी चुंगी लेनेवाले बचा लिए गए। जिनके बीच मसीह अधिकतर रहा, और जिन्होंने उसका प्रचार सुना, और जिन्होंने उसे प्रतिदिन आश्चर्यकर्म करते देखा, उनका अधिकांश भाग छोड़ दिया गया; और सामरिया की स्त्री ग्रहण की गई, और उसी समय अनेक अन्य सामरी भी, जिन्होंने केवल मसीह को प्रचार करते सुना था, जब वह कभी-कभार उनके नगर से होकर निकलता था। इसी प्रकार कनान की स्त्री ग्रहण की गई, जो यहूदियों के देश की न थी, और जिसने यीशु मसीह को केवल एक ही बार देखा था। इसी प्रकार जिन यहूदियों ने मसीह को देखा और सुना था, और उसके आश्चर्यकर्मों को देखा था, और जिनके बीच प्रेरितों ने इतना परिश्रम किया, वे नहीं बचाए गए। परन्तु अन्यजातियों में से, अनेकों ने, जिन्होंने मानो केवल क्षणभर के लिये उद्धार के शुभ समाचार को सुना, उसे ग्रहण किया, और परिवर्तित हो गए।
5. परमेश्वर कुछ को, जो अत्यन्त जघन्य रीति से दुष्ट रहे हों, उद्धार के लिये बुलाने में, और अन्यों को, जो नैतिक और धार्मिक व्यक्ति रहे हों, छोड़ देने में, अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है। फरीसी यहूदियों के बीच एक बहुत कठोर सम्प्रदाय थे। उनका धर्म असाधारण था। लूका 18:11। वे अन्य मनुष्यों के समान अंधेर करनेवाले, अन्यायी, अथवा व्यभिचारी नहीं थे। यही उनकी नैतिकता थी। वे सप्ताह में दो बार उपवास रखते थे, और अपने सारे धन का दशमांश देते थे। यही उनका धर्म था। परन्तु फिर भी वे अधिकांशतः अस्वीकार कर दिए गए, और चुंगी लेनेवाले, और वेश्याएँ, और खुले तौर पर दुराचारी लोग, उनसे पहले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर गए। मत्ती 21:31। प्रेरित फरीसी रहते हुए अपनी धार्मिकता का वर्णन करता है। फिलिप्पियों 3:6। “व्यवस्था की उस धार्मिकता के विषय में जो निर्दोष है।” वह धनी युवक, जो मसीह के पास घुटने टेककर आया, और कहा, हे उत्तम गुरु, मैं क्या करूँ कि अनन्त जीवन पाऊँ, वह एक नैतिक व्यक्ति था। जब मसीह ने उसे आज्ञाओं को मानने की आज्ञा दी, तो उसने कहा, और अपनी ही दृष्टि में सच्चाई से, “इन सब को मैं ने बचपन से मान रखा है।” वह स्पष्टतः एक अच्छे परिवार में पाला-पोसा गया था, और ऐसे मनोहर स्वभाव और उचित आचरण का युवक था, कि यह कहा गया, “यीशु ने उस पर दृष्टि करके उससे प्रेम किया।”
फिर भी वह छोड़ दिया गया; जबकि वह डाकू, जिसे मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था, क्रूस पर ही चुना और बुलाया गया। परमेश्वर कभी-कभी सबसे बड़े पापियों पर, हत्यारों, अपवित्र करनेवालों, और निन्दकों पर दया दिखाकर, अपनी सर्वसत्ता प्रगट करता है। और जब वे बूढ़े भी हो चुके होते हैं, तो कुछ को ग्यारहवें घण्टे में बुलाया जाता है। परमेश्वर कभी-कभी उन पर दया दिखाकर अपने अनुग्रह की सर्वसत्ता प्रगट करता है, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग शैतान की सेवा में बिताया है, और जिनके पास परमेश्वर की सेवा में बिताने के लिये बहुत कम बचा है।
6. उद्धार खोजनेवालों में से कुछ को बचाने में, न कि अन्यों को। जैसा हम पवित्रशास्त्र और अनुभव दोनों से जानते हैं, उद्धार खोजनेवालों में से कुछ शीघ्र ही परिवर्तित हो जाते हैं; जबकि अन्य लम्बे समय तक खोजते हैं, और अन्त में भी नहीं पाते। परमेश्वर कुछ की उन पर्वतों और कठिनाइयों में सहायता करता है
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता जो मार्ग में हैं; वह शैतान को अधीन करता है, और उन्हें उसकी परीक्षाओं से छुड़ाता है: परन्तु अन्य उन परीक्षाओं से नष्ट हो जाते हैं जिनका उन्हें सामना होता है। कुछ कभी पूर्णरूप से नहीं जागते; जबकि अन्यों को परमेश्वर पूर्ण दोषभाव देना उचित समझता है। कुछ को भटकते हुए हृदयों में छोड़ दिया जाता है; अन्यों को परमेश्वर अन्त तक स्थिर बने रहने देता है। कुछ को अपनी ही धार्मिकता पर भरोसे से हटा दिया जाता है; अन्य अपने जीवनभर उस बाधा से कभी पार नहीं पाते जो उनके मार्ग में है। और कुछ परिवर्तित होकर बचाए जाते हैं, जिन्हें कभी उतने बड़े संघर्ष नहीं करने पड़े जितने कुछ अन्यों को, जो फिर भी नष्ट हो जाते हैं।
4. अब मैं वे कारण बताने आता हूँ, जिनके लिये परमेश्वर मनुष्यों की सन्तानों के अनन्त उद्धार में इस प्रकार अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करता है।
1. यह सृष्टि की रचना में परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप है, कि वह अपने हर एक गुण का प्रयोग करे, और इस प्रकार हर एक की महिमा को प्रगट करे। सृष्टि में परमेश्वर का उद्देश्य स्वयं को महिमा देना था, अथवा अपने स्वभाव की सारभूत महिमा को प्रगट करना था। यह उचित था कि अनन्त महिमा प्रकाशित हो; और यह परमेश्वर का मूल उद्देश्य था कि वह अपनी महिमा को, जैसी वह है, प्रगट करे। यह नहीं कि उसका उद्देश्य अपनी सारी महिमा को सृजी हुई वस्तुओं की समझ में प्रगट करना था; क्योंकि यह असम्भव है कि सृजी हुई वस्तुओं का मन उसे समझ सके। परन्तु उसका उद्देश्य अपनी महिमा का एक सच्चा प्रकटीकरण करना था, जो हर एक गुण को दर्शाए।
यदि परमेश्वर एक गुण की महिमा प्रगट करता, और दूसरे की नहीं, तो उसकी महिमा का ऐसा प्रकटीकरण अपूर्ण होता; और यह चित्रण पूर्ण न होता। यदि परमेश्वर के सारे गुण प्रगट नहीं किए जाते, तो उनमें से किसी की भी महिमा वैसी प्रगट नहीं होती जैसी वह है: क्योंकि ईश्वरीय गुण एक-दूसरे पर महिमा प्रतिबिम्बित करते हैं। इस प्रकार यदि परमेश्वर की बुद्धि प्रगट की जाती, और उसकी पवित्रता नहीं, तो उसकी बुद्धि की महिमा वैसी प्रगट न होती जैसी वह है; क्योंकि ईश्वरीय बुद्धि के गुण की महिमा का एक भाग यह है, कि यह एक पवित्र बुद्धि है। इसी प्रकार यदि उसकी पवित्रता प्रगट की जाती, और उसकी बुद्धि नहीं, तो उसकी पवित्रता की महिमा वैसी प्रगट न होती जैसी वह है; क्योंकि परमेश्वर की पवित्रता की महिमा से सम्बन्धित एक बात यह है, कि यह एक बुद्धिमान पवित्रता है। दया और न्याय के गुणों के विषय में भी ऐसा ही है। परमेश्वर की दया की महिमा वैसी प्रगट नहीं होती, जब तक वह एक न्यायपूर्ण दया के रूप में, या न्याय के अनुरूप दया के रूप में प्रगट न हो। और परमेश्वर की सर्वसत्ता के विषय में भी ऐसा ही है, यह उसके अन्य सब गुणों पर महिमा प्रतिबिम्बित करती है। यह परमेश्वर की दया की महिमा का एक भाग है, कि यह सर्वसत्तापूर्ण दया है। इस प्रकार परमेश्वर के सारे गुण एक-दूसरे पर महिमा प्रतिबिम्बित करते हैं। एक गुण की महिमा दूसरे के प्रकटीकरण के बिना, जैसी वह है, प्रगट नहीं हो सकती। एक गुण दूसरे के बिना अपूर्ण है, और इसलिये प्रकटीकरण अपूर्ण होगा। इसलिये परमेश्वर की इच्छा थी कि वह अपने सारे गुणों को प्रगट करे। पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की घोषणात्मक महिमा को प्रायः परमेश्वर का नाम कहा जाता है, क्योंकि यह उसके स्वभाव को घोषित करती है। परन्तु यदि उसका नाम उसके स्वभाव को वैसा नहीं दर्शाता जैसा वह है, या किसी गुण को घोषित नहीं करता, तो वह सच्चा नाम नहीं है। परमेश्वर की सर्वसत्ता उसके गुणों में से एक है, और उसकी महिमा का एक भाग है। परमेश्वर की महिमा विशेष रूप से उसकी सब सृजी हुई वस्तुओं, बड़ी और छोटी, पर उसकी पूर्ण सर्वसत्ता में प्रगट होती है। यदि किसी राजकुमार की महिमा उसकी शक्ति और शासन हो, तो परमेश्वर की महिमा उसकी पूर्ण सर्वसत्ता है। इसी में परमेश्वर की अनन्त महानता और सब सृजी हुई वस्तुओं से ऊपर उसकी उच्चता प्रगट होती है। इसलिये परमेश्वर की इच्छा है कि वह अपनी सर्वसत्ता प्रगट करे। और उसकी सर्वसत्ता, उसके अन्य गुणों की भाँति, उसके प्रयोगों में प्रगट होती है
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता इसकी। वह अपनी शक्ति के प्रयोग में अपनी शक्ति की महिमा करता है। वह अपनी दया के प्रयोग में अपनी दया की महिमा करता है। इसी प्रकार वह अपनी सर्वसत्ता के प्रयोग में अपनी सर्वसत्ता की महिमा करता है।
2. जिस सृजी हुई वस्तु पर परमेश्वर सर्वसत्तासम्पन्न है वह जितनी अधिक उत्कृष्ट है, और जितने बड़े विषय में वह इस प्रकार प्रगट होता है, उसकी सर्वसत्ता उतनी ही अधिक महिमामय है। मनुष्यों पर सर्वसत्तासम्पन्न होने में परमेश्वर की सर्वसत्ता, निम्न सृजी हुई वस्तुओं पर सर्वसत्तासम्पन्न होने से कहीं अधिक महिमामय है। और स्वर्गदूतों पर उसकी सर्वसत्ता मनुष्यों पर उसकी सर्वसत्ता से भी अधिक महिमामय है। क्योंकि सृजी हुई वस्तु जितनी अधिक उत्कृष्ट है, उतना ही अधिक बड़ा और ऊँचा परमेश्वर उस पर अपनी सर्वसत्ता में प्रगट होता है। मनुष्य के लिये पशुओं पर अधिकार रखने से अधिक बड़ा आदर मनुष्यों पर अधिकार रखने में है; और साधारण मनुष्यों पर अधिकार रखने से भी अधिक बड़ा आदर राजकुमारों, रईसों, और राजाओं पर अधिकार रखने में है। इसी प्रकार परमेश्वर की सर्वसत्ता की महिमा इसमें प्रगट होती है, कि वह मनुष्यों की आत्माओं पर सर्वसत्तासम्पन्न है, जो ऐसी उत्कृष्ट और श्रेष्ठ सृजी हुई वस्तुएँ हैं। इसलिये परमेश्वर उन पर अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करेगा। और जिस किसी का अधिकार दूसरे पर जितना अधिक विस्तृत होता है, उतना ही बड़ा आदर होगा। यदि किसी मनुष्य का अधिकार दूसरे पर केवल कुछ ही बातों में हो, तो उसमें वह उतना ऊँचा नहीं उठता, जितना उसके जीवन, धन-सम्पत्ति, और उसकी सारी वस्तुओं पर पूर्ण अधिकार रखने में उठता है।
इसी प्रकार मनुष्यों पर परमेश्वर की सर्वसत्ता इस बात में महिमामय प्रगट होती है, कि यह उनसे सम्बन्धित हर बात तक विस्तृत है। वह उनसे सम्बन्धित हर बात के विषय में, अपनी ही प्रसन्नता के अनुसार, उनकी व्यवस्था कर सकता है। उसकी सर्वसत्ता इस बात में महिमामय प्रगट होती है, कि यह उनके सबसे महत्वपूर्ण विषयों तक, यहाँ तक कि मनुष्यों की आत्माओं की अनन्त दशा और स्थिति तक भी पहुँचती है। इसी में प्रगट होता है कि परमेश्वर की सर्वसत्ता बिना किसी सीमा या मर्यादा के है, कि यह ऐसे अनन्त महत्व के विषय तक भी पहुँचती है।
इसलिये परमेश्वर, चूँकि उसका उद्देश्य अपनी ही महिमा प्रगट करना है, मनुष्यों के प्रति, उनकी आत्माओं और देहों पर, उनके अनन्त उद्धार के इस सबसे महत्वपूर्ण विषय में भी, अपनी सर्वसत्ता का प्रयोग करना चाहता है, और करता है। वह जिस पर चाहता है दया करता है, और जिसे चाहता है कठोर करता है।
1. इससे हम यह सीखते हैं कि हम अपनी आत्माओं के अनन्त उद्धार के इस महान विषय में परमेश्वर पर कितनी पूर्णता से निर्भर हैं। हम न केवल उसकी बुद्धि पर निर्भर हैं कि वह उसे पूरा करने का मार्ग निकाले, और उसकी सामर्थ्य पर कि वह उसे सम्पन्न करे, बल्कि हम इस विषय में उसकी निज इच्छा और प्रसन्नता पर भी निर्भर हैं। हम इससे सम्बन्धित हर बात के लिये, नींव से लेकर शिखर तक, परमेश्वर की सर्वसत्तापूर्ण इच्छा पर निर्भर हैं। यह परमेश्वर की सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता ही थी, कि उसने मनुष्यजाति में से किसी को बचाने का मार्ग निकाला, और हमें अपना एकलौता पुत्र यीशु मसीह हमारा छुड़ानेवाला होने के लिये दिया। उसने हम पर दृष्टि क्यों की, और हमारे पास एक उद्धारकर्ता क्यों भेजा, और गिरे हुए स्वर्गदूतों के पास नहीं?
यह परमेश्वर की सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता से हुआ। कौन से साधन ठहराए जाएँ, यह भी उसकी सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता से था। उसका हमें बाइबल, और धर्म की विधियाँ देना, उसके सर्वसत्तापूर्ण अनुग्रह से है।
उसका ये साधन हमें, न कि अन्यों को देना, उसका अपने आत्मा के जगानेवाले प्रभाव देना, और उद्धार का अनुग्रह देना, सब कुछ उसकी सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता से है। जब वह कहता है,
“ऐसे किसी की आत्मा में ज्योति हो,” तो यह अनन्त सामर्थ्य और सर्वसत्तापूर्ण अनुग्रह का वचन है।
2. आओ, हम सबसे बड़ी नम्रता के साथ परमेश्वर की उस भययोग्य और पूर्ण सर्वसत्ता की आराधना करें।
जैसा हमने अभी दिखाया है, यह ईश्वरीय सत्ता का एक प्रधान गुण है, कि वह मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता मनुष्यों की आत्माओं जैसी उत्कृष्ट सत्ताओं पर सर्वसत्तासम्पन्न है, और वह भी हर बात में, यहाँ तक कि उनके अनन्त उद्धार के विषय में भी। परमेश्वर की अनन्त महानता, और हमसे ऊपर उसकी उच्चता, किसी और बात में इतनी प्रगट नहीं होती, जितनी उसकी सर्वसत्ता में। पवित्रशास्त्र में इसे उसकी महिमा का एक बड़ा भाग कहा गया है।
व्यवस्थाविवरण 32:39। “अब देखो, कि मैं ही वह हूँ, और मेरे संग कोई और देवता नहीं। मैं मारता, और मैं जिलाता हूँ; मैं घायल करता, और मैं चंगा करता हूँ; और मेरे हाथ से कोई छुड़ा नहीं सकता।” भजन संहिता 115:3।
“हमारा परमेश्वर स्वर्ग में है; उसने जो कुछ चाहा वही किया है।” दानिय्येल 4:34,35। “जिसका प्रभुत्व एक अनन्त प्रभुत्व है, और जिसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तक है।
और पृथ्वी के सब निवासी कुछ नहीं गिने जाते; और वह स्वर्ग की सेना में, और पृथ्वी के निवासियों में, अपनी ही इच्छा के अनुसार कार्य करता है; और कोई उसके हाथ को रोक नहीं सकता, और न उससे कह सकता है, तू यह क्या करता है?” हमारे प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता के प्रयोग के लिये पिता की स्तुति और महिमा की। मत्ती 11:25,26। “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, कि तू ने इन बातों को बुद्धिमानों और समझदारों से छिपाकर बालकों पर प्रगट किया। हाँ, हे पिता, यह तुझे ऐसा ही अच्छा लगा।” इसलिये आओ, हम परमेश्वर को उसकी सर्वसत्ता की महिमा दें, उसकी आराधना करते हुए, जिसकी सर्वसत्तापूर्ण इच्छा सब कुछ ठहराती है, और अपने आप को उसकी तुलना में कुछ भी न समझते हुए।
प्रभुत्व और सर्वसत्ता प्रजाजन से नम्र भक्ति और आदर की माँग करती है। परमेश्वर की पूर्ण, सार्वभौमिक, और असीमित सर्वसत्ता की माँग है, कि हम उसकी आराधना सम्भव सबसे बड़ी नम्रता और भक्ति के साथ करें। यह असम्भव है कि हम उस सत्ता के प्रति दीनता और भक्ति में अति कर सकें, जो हमारी व्यवस्था अपनी इच्छा के अनुसार अनन्तकाल तक कर सकती है।
3. जो उद्धार की दशा में हैं, उन्हें इसका श्रेय केवल सर्वसत्तापूर्ण अनुग्रह को ही देना चाहिये, और उसी को सारी स्तुति देनी चाहिये, जो उन्हें अन्यों से भिन्न बनाता है। भक्ति परमेश्वर में छोड़कर घमण्ड करने का कोई कारण नहीं है। 1 कुरिन्थियों 1:29,30,31। “कि कोई प्राणी उसके सामने घमण्ड न करे।
परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये बुद्धि, और धार्मिकता, और पवित्रीकरण, और छुटकारा ठहरा। ताकि जैसा लिखा है, वैसा ही हो, कि जो घमण्ड करे, वह प्रभु में घमण्ड करे।” ऐसों को किसी भी रीति से, किसी भी मात्रा में, अपनी भक्ति, अपनी सुरक्षित और सुखी दशा और स्थिति का श्रेय, अपने और अन्य मनुष्यों के बीच किसी स्वाभाविक भेद को, या अपनी ही किसी शक्ति या धार्मिकता को नहीं देना चाहिये। उन्हें अपने आप को तनिक भी बड़ा करने का कोई कारण नहीं है; बल्कि परमेश्वर ही वह सत्ता है जिसे उन्हें बड़ा करना चाहिये। उन्हें बड़ा करना चाहिये
परमेश्वर पिता को, जिसने उन्हें मसीह में चुना, जिसने उन पर अपना प्रेम लगाया, और उन्हें उद्धार दिया, इससे पहले कि वे जन्मे, और यहाँ तक कि संसार की उत्पत्ति से भी पहले। यदि वे यह पूछें, कि परमेश्वर ने उन पर अपना प्रेम क्यों लगाया, और उन्हें अन्यों की अपेक्षा क्यों चुना, यदि वे यह सोचें कि वे परमेश्वर के बाहर कोई कारण देख सकते हैं, तो वे बड़ी भूल में हैं। उन्हें परमेश्वर पुत्र को बड़ा करना चाहिये, जिसने संसार में आते समय उनके नाम अपने हृदय पर धारण किए, और क्रूस पर लटका, और जिसमें अकेले उनके पास धार्मिकता और सामर्थ्य है। उन्हें परमेश्वर पवित्र आत्मा को बड़ा करना चाहिये, जिसने सर्वसत्तापूर्ण अनुग्रह से उन्हें अन्धकार से अद्भुत ज्योति में बुलाया है; जिसने अपने ही प्रत्यक्ष और स्वतन्त्र कार्य द्वारा, उन्हें पाप की बुराई और खतरे की समझ में पहुँचाया है, और उन्हें अपनी ही धार्मिकता से हटा दिया है, और उनकी आँखें खोली हैं कि वे परमेश्वर की महिमा को, और यीशु मसीह में परमेश्वर के अद्भुत धन को देख सकें, और उन्हें पवित्र किया है, और उन्हें बनाया है
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता नई सृष्टि। जब वे अन्यों की दुष्टता के विषय में सुनें, या दुराचारी व्यक्तियों को देखें, तो उन्हें यह सोचना चाहिये कि वे स्वयं कभी कैसे दुष्ट थे, और उन्होंने परमेश्वर को कितना क्रोधित किया, और वे कैसे इस योग्य थे कि वह उन्हें सदा के लिये पाप में नष्ट होने को छोड़ दे, और यह कि केवल सर्वसत्तापूर्ण अनुग्रह ही है जिसने यह भेद किया है। 1 कुरिन्थियों 6:10। वहाँ अनेक प्रकार के पापी गिनाए गए हैं; व्यभिचारी, मूर्तिपूजक, परस्त्रीगामी, स्वेच्छाचारी, पुरुषगामी। और फिर ग्यारहवें पद में, प्रेरित उनसे कहता है, “तुम में से कितने ऐसे ही थे; परन्तु तुम धोए गए, तुम पवित्र किए गए, तुम प्रभु यीशु के नाम से, और हमारे
परमेश्वर के आत्मा से धर्मी ठहराए गए।” परमेश्वर की प्रजा के पास धन्यवाद करने का अधिक कारण है, परमेश्वर से प्रेम करने का अधिक कारण है, जिसने केवल अपनी निज सर्वसत्तापूर्ण प्रसन्नता से उन पर ऐसी बड़ी और अवर्णनीय दया की है।
4. इससे हम सीखते हैं कि हमारे पास परमेश्वर के अनुग्रह की प्रशंसा करने का कैसा कारण है, कि उसने वाचा द्वारा हमसे बँध जाना स्वीकार किया; कि वह, जो स्वभाव से हम पर सर्वोच्च प्रभुत्व रखता है, जो हमारा पूर्ण स्वामी है, और हमारे साथ अपनी इच्छानुसार व्यवहार कर सकता है, और हमारे प्रति किसी बाध्यता के अधीन नहीं है; कि वह, मानो, अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता को त्याग दे, और विश्वासियों के प्रति अपनी व्यवस्था में, जब वे एक बार मसीह पर विश्वास कर लें, केवल सर्वसत्तासम्पन्न बना रहना छोड़ दे, और उनकी अधिक भरपूर शान्ति के लिये, बँध जाए।
इसलिये वे इस सर्वसत्तासम्पन्न से उद्धार की माँग कर सकते हैं; वे इसे मसीह के द्वारा, एक ऋण के समान, माँग सकते हैं। और उन्हें इससे इन्कार करना परमेश्वर के गुणों की महिमा के लिये हानिकारक होगा; यह उसके न्याय और उसकी सच्चाई के विरुद्ध होगा। ऐसी सत्ता में यह कैसी अद्भुत दीनता है, कि वह इस प्रकार हम धूल के कीड़ों के लिये, हमारी शान्ति के निमित्त, बँध जाए! उसने स्वयं को अपने वचन से, अपनी प्रतिज्ञा से, बाँधा। परन्तु वह इससे सन्तुष्ट नहीं हुआ; बल्कि इसलिये कि हमें और भी अधिक दृढ़ शान्ति मिले, उसने स्वयं को अपनी शपथ से बाँधा। इब्रानियों 6:13 आदि। “क्योंकि जब परमेश्वर ने अब्राहम से प्रतिज्ञा की, तो चूँकि वह किसी बड़े की शपथ नहीं खा सकता था, उसने अपनी ही शपथ खाई; और कहा, निश्चय मैं तुझे आशीष पर आशीष दूँगा, और बढ़ाकर तेरी सन्तान को बढ़ाऊँगा। और इस प्रकार धीरज धरने के बाद, उसे प्रतिज्ञा मिली। मनुष्य तो निश्चय अपने से बड़े की शपथ खाते हैं; और पुष्टि के लिये शपथ उनके लिये सब वाद-विवाद का अन्त होती है। इसमें परमेश्वर ने, प्रतिज्ञा के वारिसों को अपनी युक्ति की अपरिवर्तनीयता और भी भरपूर रीति से दिखाने की इच्छा से, उसे शपथ द्वारा दृढ़ किया; कि दो अपरिवर्तनीय बातों के द्वारा, जिनमें परमेश्वर का झूठ बोलना असम्भव था, हमें, जो शरण लेने के लिये अपने सामने रखी हुई आशा को पकड़ने भागे हैं, दृढ़ शान्ति मिले। यह आशा हमारे प्राण के लिये लंगर के समान है, स्थिर और दृढ़, और जो परदे के भीतर तक पहुँचती है; जहाँ हमारे लिये अग्रदूत, अर्थात यीशु, मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये महायाजक बनकर, प्रवेश कर चुका है।”
इसलिये आओ, हम परमेश्वर की सर्वसत्ता के अधीन होने का प्रयत्न करें। परमेश्वर आग्रह करता है, कि उसकी सर्वसत्ता हमारे द्वारा स्वीकार की जाए, और यह भी इस महान विषय में, एक ऐसे विषय में जो हमसे इतनी निकटता से और इतनी अनन्त रीति से सम्बन्धित है, अर्थात हमारा अपना अनन्त उद्धार। यही वह ठोकर है जिस पर हज़ारों गिरते और नष्ट होते हैं; और यदि हम परमेश्वर की सर्वसत्ता के विषय में उससे विवाद करते रहें, तो यह हमारा अनन्त विनाश होगा। यह सर्वथा आवश्यक है कि हम परमेश्वर के अधीन हों, अपने
मनुष्यों के उद्धार में परमेश्वर की सर्वसत्ता पूर्ण सर्वसत्तासम्पन्न के, और अपनी आत्माओं के सर्वसत्तासम्पन्न के, जो जिस पर चाहे दया कर सकता है, और जिसे चाहे कठोर कर सकता है।
5. और अन्त में। हम इस सिद्धान्त का उपयोग उद्धार खोजनेवालों को दो विपरीत छोरों से—अर्थात दुःसाहस और निराशा से—बचाने के लिये कर सकते हैं। परमेश्वर की दया पर दुःसाहस न करो, और इस प्रकार अपने आप को पाप में प्रोत्साहित न करो। बहुत लोग सुनते हैं कि परमेश्वर की दया अनन्त है, और इसलिये सोचते हैं, कि यदि वे अभी उद्धार खोजना विलम्बित करें, और उसे बाद में खोजें, तो परमेश्वर उन पर अपना अनुग्रह करेगा। परन्तु विचार करो, कि यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह पर्याप्त है, तो भी वह सर्वसत्तासम्पन्न है, और अपनी ही प्रसन्नता का उपयोग करेगा कि वह तुम्हें बचाए या न बचाए। यदि तुम उद्धार को बाद के लिये टाल दो, तो उद्धार तुम्हारे अधिकार में नहीं रहेगा। यह इस पर निर्भर होगा कि सर्वसत्तासम्पन्न परमेश्वर को क्या अच्छा लगे, कि तुम उसे पाओ या नहीं। इसलिये, चूँकि इस विषय में तुम परमेश्वर पर इतनी पूर्णता से निर्भर हो, यह सबसे अच्छा है कि तुम इसे खोजने में उसके निर्देश का पालन करो, जो यह है कि आज ही उसका शब्द सुनो: “आज यदि तुम उसका शब्द सुनो, तो अपना हृदय कठोर न करो।” निराशा से भी सावधान रहो। निराशाजनक विचारों से बचो, कि तुम एक बड़े पापी हो, कि तुम इतने लम्बे समय से पाप में बने रहे हो, भटक गए हो, और पवित्र आत्मा का विरोध किया है। स्मरण रखो, कि तुम्हारी दशा चाहे जो भी हो, और तुम चाहे कितने ही बड़े पापी क्यों न हो, यदि तुमने पवित्र आत्मा के विरुद्ध पाप नहीं किया है, तो परमेश्वर तुम पर अपनी पवित्रता के आदर को, जिसे तुमने ठेस पहुँचाई है, या अपनी महिमा के आदर को, जिसका तुमने अपमान किया है, या अपने न्याय के आदर को, जिसे तुमने अपना शत्रु बनाया है, या अपने सत्य के, या अपने किसी भी गुण के आदर को तनिक भी हानि पहुँचाए बिना, दया कर सकता है। तुम चाहे जैसे भी पापी क्यों न हो, परमेश्वर चाहे तो तुम्हारे उद्धार में अपने आप को बड़ी रीति से महिमामय कर सकता है।
मनुष्य की निर्भरता में परमेश्वर की महिमा मनुष्य की निर्भरता में परमेश्वर की महिमा पाठक के लिये सूचना उपदेश पाठक के लिये सूचना मनुष्य की निर्भरता में परमेश्वर की महिमा पहले उपदेश के सम्बन्ध में पाठक के लिये सूचना।
यह बड़ी ही कठिनाई से हुआ कि लेखक की युवावस्था और विनम्रता को इसके लिये मनाया जा सका कि वह हमारे सार्वजनिक व्याख्यान में एक प्रचारक के रूप में प्रगट हो, और बाद में, अनेक सेवकों और अन्य श्रोताओं के अनुरोध पर, जिन्होंने इसे सुना था, हमें अपने उपदेश की एक प्रति दे। परन्तु जैसे ही हमने पाया कि वह एक ऐसा कारीगर है, जिसे अपने भाइयों के सामने लज्जित होने की आवश्यकता नहीं, हमारा सन्तोष और भी बढ़ गया यह देखकर कि उसने ऐसे उत्तम विषय को चुना, और उसे इतनी सामर्थ्य और स्पष्टता से प्रस्तुत किया, जैसा विवेकी पाठक निम्नलिखित रचना में देखेगा: एक ऐसा विषय, जो गिरे हुए मनुष्य के छुटकारे के कार्य में प्रभु
यीशु मसीह द्वारा परमेश्वर के महान उद्देश्य को सुरक्षित रखता है, जो स्पष्टतः इस प्रकार रचा गया है, कि सम्पूर्ण महिमा उसी को, उस धन्य ठहरानेवाले, मोल लेनेवाले, और लागू करनेवाले को, वापस लौटे; एक ऐसा विषय जो व्यावहारिक धर्म में गहराई तक प्रवेश करता है; जिसके विश्वास के बिना, वह मनुष्यों के हृदयों और जीवन में शीघ्र ही मर जाएगा।
क्योंकि जिस अनुपात में हमें उस भाव का अनुभव होगा, कि हम अपनी सारी आवश्यक भलाई के लिये सर्वसत्तासम्पन्न परमेश्वर पर निर्भर हैं, उसी अनुपात में उसके लिये हमारा मूल्य, उस पर हमारा भरोसा, उसे ठेस पहुँचाने का हमारा भय, और उसे प्रसन्न करने की हमारी चिन्ता होगी; और वैसे ही उसके स्वतन्त्र उपकारों के अपने अनुभव पर, हमारा धन्यवाद और प्रेम, हमारा आनन्द और स्तुति भी होगी।
संक्षेप में, यह भक्ति की वास्तविक आत्मा है, कि हम यह समझें और स्वीकार करें कि हमारे सारे स्रोत उसी में हैं; हमारे वर्तमान अनुग्रह और शान्ति के, और हमारी भावी महिमा और धन्यता के स्रोत; और यह कि वे सब पूर्णतः मसीह के द्वारा, पवित्र आत्मा के प्रभावशाली कार्य से, बहते हैं।
इन्हीं बातों से पवित्र लोग जीवित रहते हैं, और इन सब बातों में ही हमारे प्राणों का जीवन है।
ऐसे सिद्धान्तों को, जो मनुष्यों के मन को दीन करके, उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिये तैयार करते हैं, उसने सुधारित संसार में, और विशेष रूप से हमारे देश में, हमारे पूर्वजों के दिनों में, विशेष रूप से स्वीकार किया और समृद्ध किया है; और हम आशा करते हैं कि वे हमारे बीच कभी अप्रचलित नहीं होंगे; क्योंकि हमें यह पूर्ण विश्वास है, कि यदि जिन्हें हम अनुग्रह के सिद्धान्त कहते हैं, वे कभी तुच्छ या अरुचिकर समझे जाने लगें, तो सच्ची भक्ति भी उसी अनुपात में क्षीण होकर मिट जाएगी; क्योंकि ये सिद्धान्त सदा गम्भीर धर्म के पतन के साथ मनुष्यों की दृष्टि में गिरते जाते हैं।
इसलिये हम अपनी प्रसन्नता और धन्यवाद को प्रगट किए बिना नहीं रह सकते, कि कलीसिया के महान मुखिया को अब भी यह अच्छा लगता है कि वह अपनी प्रजा की सन्तानों में से, अपनी कलीसियाओं की आवश्यकता की पूर्ति के लिये, ऐसों को खड़ा करे, जो इन सुसमाचारी सिद्धान्तों का दावा करें और उन्हें बनाए रखें; और यह कि हमारी कलीसियाएँ (अपने सारे पतन के होते हुए भी) अब भी ऐसे सिद्धान्तों का, और उन्हें सार्वजनिक रूप से मानने और सिखानेवालों का, बड़ा मूल्य रखती हैं।
और जैसे हम यह चाहे और प्रार्थना किए बिना नहीं रह सकते, कि पड़ोसी उपनिवेश का महाविद्यालय (हमारे अपने महाविद्यालय के समान) अपने वर्तमान योग्य कुलाधिपति की देखभाल पर स्वर्ग की आशीष से, लेखक जैसे अनेक ऐसे पुत्रों की फलदायी माता बने; वैसे ही हम परमेश्वर की उस विशेष कृपा में मन से आनन्दित होते हैं, जिसने नॉर्थैम्प्टन की सुखी कलीसिया को ऐसा बहुमूल्य वरदान दिया, जो इतने वर्षों तक ऐसे भक्तिपूर्ण सिद्धान्तों के प्रभाव में फलती-फूलती रही है,
पाठक के लिये सूचना जो उन्हें उनके दिवंगत आदरणीय पासबान की उत्तम सेवकाई में सिखाए गए थे, जिनका वरदान और आत्मा, हम आशा करते हैं, उनके इस पौत्र में दीर्घकाल तक जीवित और प्रकाशमान रहेगा, ताकि वे परमेश्वर की महिमा के लिये, सुसमाचारी नम्रता और धन्यवाद के सब मनोहर फलों में और भी भरपूर हो जाएँ।
उसकी आशीष के हाथों हम उन सबको, इस उपदेश सहित, और इसे पढ़नेवाले हर एक को सौंपते हैं; और हम हैं सुसमाचार में आपके सेवक, टी. प्रिंस।
बॉस्टन, 17 अगस्त, 1731।
