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क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी जोनाथन एडवर्ड्स (1703-1758) एनफील्ड, कनेक्टिकट 8 जुलाई, 1741 समय आने पर उनके पांव फिसल जाएंगे। व्यवस्थाविवरण 32:35
इस वचन में परमेश्वर के उन दुष्ट, अविश्वासी इस्राएलियों पर उसके प्रतिशोध की चेतावनी दी गई है, जो परमेश्वर की दृश्य प्रजा थे और अनुग्रह के साधनों के अधीन रहते थे; परन्तु जो, अपने ऊपर परमेश्वर के सारे अद्भुत कामों के बावजूद, (जैसा 28वें पद में है) युक्ति-हीन बने रहे और उनमें कुछ भी समझ न थी। स्वर्ग की समस्त सेवा-सुश्रुषा के अधीन रहकर भी उन्होंने कड़वा और विषैला फल उत्पन्न किया, जैसा इस वचन से ठीक पहले के दो पदों में कहा गया है। -- जिस वाक्यांश को मैं ने अपने पाठ के रूप में चुना है, अर्थात समय आने पर उनके पांव फिसल जाएंगे, वह इन बातों की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जो उस दण्ड और विनाश से सम्बन्धित हैं जिसके अधीन ये दुष्ट इस्राएली थे।
1 यह कि वे सदैव विनाश के लिये खुले हुए थे; जैसे कोई जो फिसलनेवाले स्थानों में खड़ा है या चलता है, वह सदैव गिरने के लिये खुला रहता है। यह उनके विनाश आने की रीति में निहित है, जिसे उनके पांव के फिसलने द्वारा दर्शाया गया है। यही बात भजन संहिता 73:18 में भी कही गई है।
निश्चय तू ने उन्हें फिसलनेवाले स्थानों में रखा; तू ने उन्हें गिराकर सत्यानाश कर डाला।
2 इसका यह भी अर्थ है कि वे सदैव अचानक, अप्रत्याशित विनाश के लिये खुले हुए थे। जैसे जो फिसलनेवाले स्थानों में चलता है, वह हर पल गिरने के योग्य रहता है, वह एक क्षण पहले भी यह नहीं जान सकता कि अगले ही क्षण वह खड़ा रहेगा या गिर जाएगा; और जब वह गिरता है, तो बिना किसी चेतावनी के तुरन्त गिर जाता है। यही बात भजन संहिता 73:18,19 में भी कही गई है: "निश्चय तू ने उन्हें फिसलनेवाले स्थानों में रखा; तू ने उन्हें गिराकर सत्यानाश कर डाला: वे पल भर में कैसे उजड़ गए!"
3 एक और बात जो इसमें निहित है, वह यह कि वे स्वयं ही गिर पड़ने योग्य हैं, बिना इसके कि किसी और का हाथ उन्हें गिराए; जैसे जो फिसलनेवाली भूमि पर खड़ा है या चलता है, उसे गिराने के लिये उसके अपने ही भार के अतिरिक्त और कुछ आवश्यक नहीं।
4 यह कि वे अब तक क्यों नहीं गिरे और अभी क्यों नहीं गिरते, इसका कारण केवल यही है कि परमेश्वर का ठहराया हुआ समय अभी नहीं आया। क्योंकि यह कहा गया है कि जब वह समय, अर्थात ठहराया हुआ समय आ जाएगा, तब उनके पांव फिसल जाएंगे। तब वे अपने ही भार की ओर झुके हुए, गिरने के लिये छोड़ दिए जाएंगे। परमेश्वर उन्हें इन फिसलनेवाले स्थानों में अब और अधिक थामे न रखेगा, वरन उन्हें छोड़ देगा; और तब, उसी क्षण, वे विनाश में जा गिरेंगे; जैसे जो ऐसी फिसलनेवाली, ढालू भूमि पर, गड़हे के किनारे खड़ा है, वह अकेला खड़ा नहीं रह सकता, और जब उसे छोड़ दिया जाता है तो वह तुरन्त गिरकर नष्ट हो जाता है।
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी अब मैं इन शब्दों से जो बात कहना चाहता हूं, वह यह है -- "ऐसा कुछ भी नहीं जो दुष्ट मनुष्यों को किसी भी एक क्षण नरक में जाने से रोके रखता है, केवल परमेश्वर की निरी प्रसन्नता को छोड़कर।" -- परमेश्वर की निरी प्रसन्नता से मेरा अभिप्राय उसकी सर्वसत्तात्मक प्रसन्नता, उसकी स्वेच्छ इच्छा से है, जो किसी बाध्यता से रोकी नहीं जाती, किसी प्रकार की कठिनाई से बाधित नहीं होती, मानो दुष्ट मनुष्यों के एक क्षण के बचाव में परमेश्वर की निरी इच्छा के अतिरिक्त और कुछ भी, किसी भी माप में, किसी भी दृष्टि से, हाथ न रखता हो। -- इस कथन की सत्यता निम्नलिखित विचार से प्रकट हो सकती है।
1 परमेश्वर में दुष्ट मनुष्यों को किसी भी क्षण नरक में डाल देने की सामर्थ्य की कोई कमी नहीं।
जब परमेश्वर उठ खड़ा होता है, तब मनुष्यों के हाथ बलवन्त नहीं रह सकते। सबसे बलवन्त पुरुषों में भी उसका सामना करने की सामर्थ्य नहीं, और न कोई उसके हाथों से छुड़ा सकता है। -- वह न केवल दुष्ट मनुष्यों को नरक में डालने में समर्थ है, वरन वह इसे अत्यन्त सहजता से कर सकता है। कभी-कभी किसी पार्थिव राजा को किसी बलवाई को दबाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जिसने अपने को सुदृढ़ करने के साधन ढूंढ लिए हों और अपने अनुयायियों की संख्या से अपने को बलवन्त बना लिया हो। परन्तु परमेश्वर के साथ ऐसा नहीं।
ऐसा कोई गढ़ नहीं जो परमेश्वर की सामर्थ्य से किसी की रक्षा कर सके। चाहे हाथ से हाथ मिलाकर परमेश्वर के शत्रुओं की बड़ी भीड़ आपस में मिल जाए और एक हो जाए, तौभी वे सहज ही टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं। वे बवण्डर के आगे हलकी भूसी के बड़े ढेरों के समान हैं; या भस्म कर देनेवाली लपटों के आगे सूखे भूसे की बड़ी राशियों के समान। हम भूमि पर रेंगते हुए किसी कीड़े को पांव तले रौंदकर कुचल देना सहज पाते हैं; इसी प्रकार जिस पतले धागे से कोई वस्तु लटकी हो उसे काट देना या झुलसा देना हमारे लिये सहज है: ठीक इसी प्रकार परमेश्वर के लिये, जब वह चाहे, अपने शत्रुओं को नरक में गिरा देना सहज है। हम क्या हैं, कि उसके सामने खड़े रहने की सोचें, जिसकी घुड़की से पृथ्वी कांप उठती है और जिसके सामने चट्टानें गिर पड़ती हैं?
2 वे नरक में डाले जाने के योग्य हैं; इसलिये ईश्वरीय न्याय कभी बाधा नहीं बनता, वह इस बात पर कोई आपत्ति नहीं करता कि परमेश्वर किसी भी क्षण अपनी सामर्थ्य का प्रयोग करके उन्हें नष्ट कर दे।
वरन इसके विपरीत, न्याय ऊंचे शब्द से उनके पापों के अनन्त दण्ड की मांग करता है। ईश्वरीय न्याय उस वृक्ष के विषय में, जो सदोम की ऐसी दाख उत्पन्न करता है, यह कहता है: "इसे काट डाल; यह भूमि को क्यों रोके है?" लूका 13:7। ईश्वरीय न्याय की तलवार हर क्षण उनके सिरों के ऊपर हिलाई जा रही है, और उसे रोकनेवाला और कुछ नहीं, केवल स्वेच्छ दया का हाथ और परमेश्वर की निरी इच्छा है।
3 वे पहले ही से नरक के दण्ड की आज्ञा के अधीन हैं। वे न केवल न्यायपूर्वक वहां डाले जाने के योग्य हैं, वरन परमेश्वर की व्यवस्था की आज्ञा, अर्थात वह अनन्त और अपरिवर्तनीय धार्मिकता की विधि जो परमेश्वर ने अपने और मनुष्यजाति के बीच नियुक्त की है, उनके विरुद्ध निकल चुकी है और उनके विरुद्ध बनी हुई है; इसलिये वे पहले ही नरक के लिये बन्धे हुए हैं। यूहन्ना 3:18 - "जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका है।" इसलिये हर एक अनपरिवर्तित मनुष्य ठीक ही नरक का है; वही उसका स्थान है; क्योंकि वह वहीं से है, यूहन्ना 8:23 - "तुम नीचे के हो।" और वहीं वह बंधा हुआ है; यही वह स्थान है जो न्याय, परमेश्वर का वचन, और उसकी अपरिवर्तनीय व्यवस्था की आज्ञा उसे सौंपती है।
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी 4 वे अभी उसी क्रोध और परमेश्वर के प्रकोप के लक्ष्य हैं, जो नरक की यातनाओं में प्रकट होता है। और वे हर क्षण नरक में नहीं जा गिरते, इसका कारण यह नहीं कि परमेश्वर, जिसकी सामर्थ्य के अधीन वे हैं, उस समय उन पर बहुत क्रोधित नहीं है; जैसा वह उन बहुत से अभागे प्राणियों पर है जो अभी नरक में यातना भोग रहे हैं और वहां उसके प्रकोप की भयंकरता को अनुभव कर रहे हैं और सह रहे हैं। वरन परमेश्वर अभी पृथ्वी पर के बहुत से लोगों पर कहीं अधिक क्रोधित है: हां, निःसन्देह, इस सभा में अभी बैठे बहुतों पर, जो शायद निश्चिन्त हैं, वह उन बहुतों से कहीं अधिक क्रोधित है जो अभी नरक की लपटों में हैं।
इसलिये यह नहीं कि परमेश्वर उनकी दुष्टता से बेखबर है, और उससे नाराज़ नहीं, कि वह अपना हाथ ढीला नहीं छोड़ता और उन्हें काट नहीं डालता। परमेश्वर वैसा नहीं जैसा वे स्वयं हैं, यद्यपि वे उसे वैसा ही समझ सकते हैं। परमेश्वर का क्रोध उनके विरुद्ध भड़क रहा है, उनका दण्ड ऊंघता नहीं; गड़हा तैयार है, आग तैयार की जा चुकी है, भट्ठी अभी गरम है, उन्हें ग्रहण करने के लिये तैयार; लपटें अभी धधक रही हैं और दहक रही हैं।
चमकती हुई तलवार पैनी की गई है, और उनके ऊपर ताने हुए है, और गड़हे ने उनके नीचे अपना मुंह खोल दिया है।
5 शैतान इस बात के लिये तैयार खड़ा है कि जिस क्षण परमेश्वर उसे अनुमति दे, वह उन पर टूट पड़े और उन्हें अपनी वस्तु समझकर पकड़ ले। वे उसी के हैं; उनके प्राण उसके अधिकार में और उसके शासन के अधीन हैं। पवित्रशास्त्र उन्हें उसकी सम्पत्ति के रूप में दर्शाता है, लूका 11:21। दुष्टात्माएं उन पर दृष्टि रखती हैं; वे सदैव उनके पास, उनके दाहिने हाथ पर रहती हैं; वे उनकी बाट जोहती खड़ी रहती हैं, जैसे लालची, भूखे सिंह जो अपने शिकार को देखते हैं और उसे पाने की आशा रखते हैं, परन्तु फिलहाल रोक दिए गए हैं। यदि परमेश्वर अपना वह हाथ हटा ले, जिससे वे रोके गए हैं, तो वे एक ही क्षण में उनके बेचारे प्राणों पर झपट पड़ें। वह पुराना सर्प उनके लिये मुंह फैलाए हुए है; नरक उन्हें ग्रहण करने के लिये अपना मुंह चौड़ा खोले हुए है; और यदि परमेश्वर इसकी अनुमति दे दे, तो वे शीघ्र निगल लिए जाएं और नष्ट हो जाएं।
6 दुष्ट मनुष्यों के प्राणों में वे नरकीय सिद्धान्त राज्य कर रहे हैं, जो परमेश्वर की रोक न होने पर अभी ही सुलगकर नरक की आग में भड़क उठें। शारीरिक मनुष्यों के स्वभाव में ही नरक की यातनाओं की नींव रखी हुई है। उनमें वे भ्रष्ट सिद्धान्त राज्य करते हुए और उन पर पूर्ण अधिकार जमाए हुए हैं, जो नरक की आग के बीज हैं। ये सिद्धान्त सक्रिय और सामर्थी हैं, अपने स्वभाव में अत्यन्त उग्र हैं, और यदि परमेश्वर का रोकनेवाला हाथ उन पर न होता तो वे शीघ्र ही फूट पड़ते, वे उसी रीति से भड़क उठते जैसे वही भ्रष्टता, वही शत्रुता शापित प्राणों के हृदयों में भड़कती है, और उनमें वैसी ही यातनाएं उत्पन्न करती जैसी उनमें करती है। पवित्रशास्त्र में दुष्टों के प्राणों की तुलना अशान्त समुद्र से की गई है, यशायाह 57:20। अभी के लिये, परमेश्वर अपनी सामर्थी शक्ति से उनकी दुष्टता को वैसे ही रोके हुए है जैसे वह अशान्त समुद्र की उमड़ती लहरों को रोकता है, यह कहते हुए, "यहां तक तू आ सकता है, इससे आगे नहीं;" परन्तु यदि परमेश्वर उस रोकनेवाली सामर्थ्य को हटा ले, तो वह शीघ्र ही सब कुछ अपने साथ बहा ले जाएगी। पाप प्राण का सत्यानाश और दुःख है; वह अपने स्वभाव में विनाशकारी है; और यदि परमेश्वर उसे बिना रोक-टोक छोड़ दे, तो क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी प्राण को पूर्णतः दुःखी बनाने के लिये और कुछ आवश्यक न होगा। मनुष्य के हृदय की भ्रष्टता अपने प्रकोप में असीम और सीमाहीन है; और जब तक दुष्ट मनुष्य यहां जीवित रहते हैं, वह परमेश्वर की रोक से बन्द की गई आग के समान है, जबकि यदि उसे छोड़ दिया जाए, तो वह सृष्टि के क्रम को ही जला डाले; और जैसे हृदय अभी पाप का सोता है, वैसे ही यदि पाप को न रोका जाए, तो वह प्राण को तुरन्त एक धधकती भट्ठी, या आग और गन्धक की भट्ठी में बदल डाले।
7 दुष्ट मनुष्यों के लिये यह एक क्षण की भी सुरक्षा नहीं कि मृत्यु का कोई दृश्य साधन उनके निकट नहीं। स्वाभाविक मनुष्य के लिये यह कोई सुरक्षा नहीं कि वह अभी स्वस्थ है, और यह कि वह नहीं देखता कि वह किसी दुर्घटना से अभी तुरन्त किस रीति से संसार से बाहर चला जाएगा, और यह कि उसकी परिस्थितियों में किसी भी दृष्टि से कोई दृश्य संकट नहीं। संसार का बहुविध और निरन्तर अनुभव, सब युगों में, यह दिखाता है कि यह इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि कोई मनुष्य अनन्तता की कगार पर नहीं खड़ा, और यह कि अगला कदम किसी दूसरे लोक में नहीं होगा।
मनुष्यों के अचानक संसार से चले जाने के अनदेखे, अनसोचे मार्ग और साधन असंख्य और अकल्पनीय हैं। अनपरिवर्तित मनुष्य नरक के गड़हे के ऊपर एक सड़े हुए आवरण पर चलते हैं, और इस आवरण में असंख्य ऐसे स्थान हैं जो इतने कमज़ोर हैं कि उनका भार सहन नहीं करेंगे, और ये स्थान दिखाई नहीं देते। मृत्यु के तीर दोपहर के समय भी अनदेखे उड़ते हैं; तीक्ष्णतम दृष्टि भी उन्हें पहचान नहीं सकती। परमेश्वर के पास दुष्ट मनुष्यों को संसार से निकालकर नरक भेजने के इतने भिन्न-भिन्न अगम्य मार्ग हैं, कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि परमेश्वर को किसी दुष्ट मनुष्य को किसी भी क्षण नष्ट करने के लिये किसी चमत्कार का व्यय उठाना पड़े, या अपनी सामान्य विधान-व्यवस्था से बाहर जाना पड़े। पापियों के संसार से बाहर जाने के जितने भी साधन हैं, वे सब परमेश्वर के हाथों में इतने और इतने सर्वथा और पूर्णतः उसकी सामर्थ्य और ठहराव के अधीन हैं, कि पापी किसी भी क्षण नरक जाएंगे या नहीं, यह उतना ही परमेश्वर की निरी इच्छा पर निर्भर है, जितना कि यदि इन साधनों का कभी उपयोग ही न किया गया होता, या वे इस मामले में कुछ भी सम्बद्ध न होते।
8 स्वाभाविक मनुष्यों की अपने प्राण बचाने की चतुराई और सावधानी, या उन्हें बचाने के लिये औरों की सावधानी, उन्हें एक क्षण के लिये भी सुरक्षित नहीं करती। इस बात की गवाही ईश्वरीय विधान और सार्वभौमिक अनुभव भी देते हैं। यह स्पष्ट प्रमाण है कि मनुष्यों की अपनी बुद्धि उन्हें मृत्यु से कोई सुरक्षा नहीं देती; क्योंकि यदि ऐसा न होता तो हमें संसार के बुद्धिमान और चतुर मनुष्यों तथा औरों के बीच, अकाल और अप्रत्याशित मृत्यु की सम्भावना के विषय में, कुछ अन्तर दिखाई देता: परन्तु वास्तव में यह कैसा है? सभोपदेशक 2:16 - "बुद्धिमान मूर्ख ही की नाईं कैसे मरता है?"
9 दुष्ट मनुष्यों का समस्त परिश्रम और योजना, जो वे नरक से बचने के लिये करते हैं, जब तक वे मसीह को अस्वीकार करते रहते हैं और इस प्रकार दुष्ट ही बने रहते हैं, उन्हें एक क्षण के लिये भी नरक से सुरक्षित नहीं करती। लगभग हर स्वाभाविक मनुष्य, जो नरक के विषय में सुनता है, अपने आप को यह भरोसा दिलाता है कि वह उससे बच जाएगा; वह अपनी सुरक्षा के लिये अपने ऊपर ही भरोसा रखता है; वह अपने किए हुए, अपने अभी कर रहे, या करने के इरादे रखे हुए कामों में अपने आप को भरमाता है। हर एक अपने ही मन में यह योजना बनाता है कि वह दण्ड से कैसे बचेगा, और अपने आप को यह भरोसा दिलाता है कि वह अच्छी युक्ति निकाल रहा है
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी अपने लिये अच्छी युक्ति निकाल रहा है, और यह कि उसकी योजनाएं विफल नहीं होंगी। वे यह सुनते तो हैं कि उद्धार पानेवाले थोड़े ही हैं, और यह कि अब तक मर चुके अधिकांश मनुष्य नरक में जा चुके हैं; परन्तु हर एक यह कल्पना करता है कि वह अपने बचाव के लिये औरों से बेहतर युक्ति निकाल रहा है। वह उस यातना के स्थान में जाने का इरादा नहीं रखता; वह अपने मन में कहता है कि वह प्रभावी सावधानी बरतेगा, और अपने लिये मामलों को ऐसे ठीक करेगा कि वह विफल न हो।
परन्तु मनुष्यों की मूर्ख सन्तानें अपनी ही योजनाओं में, और अपनी शक्ति और बुद्धि के भरोसे में, अपने आप को दयनीय रीति से धोखा देती हैं; वे किसी छाया के अतिरिक्त और किसी पर भरोसा नहीं रखतीं। जो लोग अब तक इन्हीं अनुग्रह के साधनों के अधीन रह चुके हैं और अब मर चुके हैं, उनमें से अधिकांश निःसन्देह नरक में जा चुके हैं; और यह इसलिये नहीं कि वे उतने बुद्धिमान न थे जितने अभी जीवित हैं: यह इसलिये नहीं कि उन्होंने अपने बचाव को सुनिश्चित करने के लिये उतनी अच्छी युक्ति नहीं निकाली थी। यदि हम उनसे बात कर सकते, और एक-एक करके उनसे पूछ सकते कि जब वे जीवित थे और नरक के विषय में सुना करते थे, तब क्या उन्हें कभी यह आशा थी कि वे इस दुःख के भागी होंगे: तो निःसन्देह हम एक-एक से यह उत्तर सुनते, "नहीं, मेरा कभी यहां आने का इरादा नहीं था: मैं ने अपने मन में और ही योजना बना रखी थी; मुझे लगता था कि मैं अपने लिये अच्छी युक्ति निकालूंगा -- मुझे लगता था कि मेरी योजना अच्छी है। मेरा इरादा प्रभावी सावधानी बरतने का था; परन्तु यह मुझ पर अप्रत्याशित रूप से आ पड़ा; मैं ने उस समय और उस रीति से इसकी आशा नहीं की थी; यह चोर के समान आया -- मृत्यु ने मुझे मात दे दी: परमेश्वर का क्रोध मेरे लिये बहुत शीघ्र था। हाय, मेरी शापित मूर्खता! मैं अपने आप को यह भरोसा दिला रहा था, और आगे जो करूंगा उसके व्यर्थ स्वप्नों में अपने आप को प्रसन्न कर रहा था; और जब मैं कह रहा था,
'शान्ति और सुरक्षा है,' तभी अचानक विनाश मुझ पर आ पड़ा।"
10 परमेश्वर ने अपने आप को किसी प्रतिज्ञा से यह बाध्यता नहीं दी कि वह किसी स्वाभाविक मनुष्य को एक क्षण के लिये भी नरक से बाहर रखे। परमेश्वर ने निश्चय ही अनन्त जीवन की, या अनन्त मृत्यु से किसी छुटकारे या सुरक्षा की, कोई प्रतिज्ञा नहीं की, सिवाय उनके जो अनुग्रह की वाचा में निहित हैं, अर्थात वे प्रतिज्ञाएं जो मसीह में दी गई हैं, जिसमें सारी प्रतिज्ञाएं 'हां' और 'आमीन' हैं। परन्तु निश्चय ही अनुग्रह की वाचा की प्रतिज्ञाओं में उनका कोई भाग नहीं जो वाचा की सन्तान नहीं, जो इन प्रतिज्ञाओं में से किसी पर भी विश्वास नहीं करते, और वाचा के मध्यस्थ में जिनका कोई भाग नहीं।
इसलिये, कुछ लोगों ने स्वाभाविक मनुष्यों के सच्चे ढूंढ़ने और खटखटाने के प्रति की गई प्रतिज्ञाओं के विषय में जो कुछ कल्पना और दावा किया हो, यह स्पष्ट और प्रकट है कि जब तक कोई स्वाभाविक मनुष्य मसीह पर विश्वास नहीं करता, तब तक चाहे वह धर्म में कितना ही परिश्रम करे, चाहे वह कैसी भी प्रार्थनाएं करे, परमेश्वर किसी भी रीति से यह बाध्य नहीं कि वह उसे एक क्षण के लिये भी अनन्त विनाश से बचाए।
इस प्रकार, स्वाभाविक मनुष्य परमेश्वर के हाथ में, नरक के गड़हे के ऊपर, थामे हुए हैं; वे उस अग्निमय गड़हे के योग्य ठहर चुके हैं, और उसके लिये पहले ही दण्डाज्ञा पा चुके हैं; और परमेश्वर भयानक रीति से क्रुद्ध है, उनके प्रति उसका क्रोध उतना ही बड़ा है जितना उनके प्रति जो नरक में उसके प्रकोप की भयंकरता को वास्तव में सह रहे हैं, और उन्होंने उस क्रोध को शान्त या कम करने के लिये लेशमात्र भी कुछ नहीं किया है, और न परमेश्वर किसी प्रतिज्ञा से लेशमात्र भी बाध्य है कि वह उन्हें एक क्षण के लिये भी थामे रखे; शैतान उनकी बाट जोह रहा है, नरक उनके लिये मुंह फैलाए हुए है, लपटें इकट्ठी होकर चमक रही हैं
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी उनके चारों ओर, और उन्हें पकड़कर निगल जाना चाहती हैं; वह आग जो उन्हीं के हृदयों में बन्द है, बाहर फूट पड़ने के लिये संघर्ष कर रही है: और मध्यस्थ में उनका कोई भाग नहीं, ऐसा कोई साधन उनकी पहुंच में नहीं जो उनके लिये कोई सुरक्षा हो सके। संक्षेप में, उनके लिये कोई शरणस्थान नहीं, पकड़ने के लिये कुछ नहीं; हर क्षण उन्हें बचाए रखनेवाली केवल एक क्रुद्ध परमेश्वर की निरी स्वेच्छ इच्छा, और वाचा-रहित, अबाध्य सहनशीलता है।
प्रयोग इस भयानक विषय का प्रयोग इस सभा में अनपरिवर्तित लोगों को जगाने के लिये हो सकता है। जो तुम ने सुना है, वह उस हर एक की दशा है जो तुम में से मसीह से बाहर है। -- वह दुःख का लोक, वह जलते हुए गन्धक की झील, तुम्हारे नीचे दूर तक फैली हुई है। वहां परमेश्वर के प्रकोप की दहकती लपटों का भयानक गड़हा है; वहां नरक का चौड़ा खुला मुंह है; और तुम्हारे पास खड़े होने के लिये कुछ नहीं, न पकड़ने के लिये कुछ; तुम्हारे और नरक के बीच वायु के अतिरिक्त और कुछ नहीं है; केवल परमेश्वर की सामर्थ्य और निरी प्रसन्नता ही है जो तुम्हें थामे हुए है।
सम्भवतः तुम इसे अनुभव नहीं करते; तुम पाते हो कि तुम नरक से बाहर रखे गए हो, परन्तु उसमें परमेश्वर के हाथ को नहीं देखते; वरन तुम अन्य बातों को देखते हो, जैसे तुम्हारे शरीर की अच्छी दशा, तुम्हारा अपने प्राण की सावधानी, और तुम्हारे अपने बचाव के लिये तुम्हारे उपाय। परन्तु सचमुच ये बातें कुछ भी नहीं; यदि परमेश्वर अपना हाथ हटा ले, तो ये तुम्हें गिरने से बचाने में उतना ही असमर्थ होंगी, जितनी पतली वायु किसी उसमें लटके हुए व्यक्ति को थामने में असमर्थ होती है।
तुम्हारी दुष्टता तुम्हें मानो सीसे के समान भारी बना देती है, और बड़े भार और दबाव के साथ नरक की ओर नीचे को झुकाती है; और यदि परमेश्वर तुम्हें छोड़ दे, तो तुम तुरन्त डूब जाओगे और वेग से नीचे उतरकर उस अथाह गड़हे में जा गिरोगे, और तुम्हारा स्वस्थ शरीर, तुम्हारी अपनी सावधानी और बुद्धिमानी, तुम्हारी सबसे अच्छी युक्ति, और तुम्हारी सारी धार्मिकता, तुम्हें थामने और नरक से बाहर रखने में उससे अधिक प्रभावी न होंगी, जितना कोई मकड़ी का जाला किसी गिरती हुई चट्टान को रोकने में होता है। यदि परमेश्वर की सर्वसत्तात्मक प्रसन्नता न होती, तो पृथ्वी तुम्हें एक क्षण के लिये भी न सहती; क्योंकि तुम उस पर एक बोझ हो; सृष्टि तुम्हारे कारण कराह रही है; सृजी हुई वस्तुएं तुम्हारी भ्रष्टता की दासता के अधीन बनाई गई हैं, अपनी इच्छा से नहीं; सूर्य अपनी इच्छा से तुम पर नहीं चमकता कि तुम्हें पाप और शैतान की सेवा करने के लिये उजाला दे; पृथ्वी अपनी इच्छा से अपनी उपज तुम्हारी वासनाओं को तृप्त करने के लिये नहीं देती; न ही वह अपनी इच्छा से तुम्हारी दुष्टता के प्रदर्शन का रंगमंच है; वायु अपनी इच्छा से तुम्हें सांस लेने के लिये नहीं देती कि वह तुम्हारे भीतर जीवन की ज्योति बनाए रखे, जब तुम अपना जीवन परमेश्वर के शत्रुओं की सेवा में व्यतीत करते हो। परमेश्वर की सृजी हुई वस्तुएं भली हैं, और मनुष्यों के लिये इसलिये बनाई गईं कि वे उनसे परमेश्वर की सेवा करें, और वे अपनी इच्छा से किसी और उद्देश्य की सेवा नहीं करतीं, और जब उनका दुरुपयोग उनके स्वभाव और उद्देश्य के सर्वथा विपरीत कामों के लिये किया जाता है, तो वे कराहती हैं। और यदि उसका सर्वसत्तात्मक हाथ न होता, जिसने आशा में सृष्टि को अधीन कर रखा है, तो संसार तुम्हें उगल देता। अभी तुम्हारे सिरों के ठीक ऊपर परमेश्वर के प्रकोप के काले बादल छाए हुए हैं, जो भयानक आंधी से भरे और गर्जन से गर्भित हैं; और यदि परमेश्वर का रोकनेवाला हाथ न होता, तो वह तुरन्त तुम पर फूट पड़ता। परमेश्वर की सर्वसत्तात्मक प्रसन्नता अभी के लिये उसकी प्रचण्ड आंधी को रोके हुए है; अन्यथा वह प्रकोप के साथ आ पड़ती, और तुम्हारा
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी विनाश बवण्डर के समान आ पड़ता, और तुम धूप के खलिहान की भूसी के समान हो जाते।
परमेश्वर का प्रकोप उन बड़े जलों के समान है जो अभी के लिये बान्ध दिए गए हैं; वे और अधिक बढ़ते जाते हैं, और अधिकाधिक ऊंचे उठते जाते हैं, जब तक कि उन्हें निकास न दिया जाए; और धारा जितनी देर रोकी जाती है, एक बार छूट जाने पर उसका बहाव उतना ही अधिक वेगवान और प्रचण्ड होता है। यह सच है कि तुम्हारे बुरे कामों के विरुद्ध दण्डाज्ञा अब तक चलाई नहीं गई; परमेश्वर के प्रतिशोध की बाढ़ रोकी गई है; परन्तु इस बीच तुम्हारा दोष निरन्तर बढ़ता जा रहा है, और तुम प्रतिदिन और अधिक क्रोध बटोरते जा रहे हो; जल निरन्तर ऊंचे उठते और अधिकाधिक प्रचण्ड होते जा रहे हैं; और परमेश्वर की निरी प्रसन्नता के अतिरिक्त और कुछ भी उन जलों को रोके हुए नहीं जो रुकना नहीं चाहते और आगे बढ़ने के लिये बलपूर्वक दबाव डाल रहे हैं। यदि परमेश्वर केवल अपना हाथ बाढ़-द्वार से हटा ले, तो वह तुरन्त खुल पड़े, और परमेश्वर के प्रकोप और क्रोध की अग्निमय बाढ़ अकल्पनीय प्रचण्डता के साथ फूट निकले, और सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के साथ तुम पर आ पड़े; और यदि तुम्हारा बल इससे दस हजार गुणा अधिक होता, हां, नरक के सबसे हष्ट-पुष्ट, सबसे बलवन्त शैतान के बल से भी दस हजार गुणा अधिक होता, तो भी उसका सामना करना या उसे सहना कुछ भी न होता।
परमेश्वर के प्रकोप का धनुष खींचा हुआ है, और तीर डोरी पर तैयार रखा हुआ है, और न्याय उस तीर को तुम्हारे हृदय की ओर तानता है, और धनुष को खींचता है, और परमेश्वर की निरी प्रसन्नता के अतिरिक्त, अर्थात एक क्रुद्ध परमेश्वर की प्रसन्नता के अतिरिक्त, बिना किसी प्रतिज्ञा या बाध्यता के, और कुछ भी उस तीर को एक क्षण के लिये भी तुम्हारे लहू से मतवाला होने से रोके हुए नहीं है। इस प्रकार तुम सब, जो कभी परमेश्वर के आत्मा की सामर्थी शक्ति के द्वारा अपने प्राणों में हृदय के बड़े परिवर्तन से नहीं गुज़रे; तुम सब, जो कभी नये सिरे से नहीं जन्मे, और नई सृष्टि नहीं बने, और पाप में मरे होने की दशा से उठाकर एक नई, और पहले सर्वथा अननुभवी ज्योति और जीवन की दशा में नहीं लाए गए, एक क्रुद्ध परमेश्वर के हाथों में हो। चाहे तुमने अपने जीवन को अनेक बातों में सुधार लिया हो, और चाहे तुम्हारे मनोभाव धार्मिक रहे हों, और चाहे तुम अपने परिवारों और एकान्त कक्षों में, और परमेश्वर के भवन में, धर्म का रूप बनाए रखते हो, तौभी उसकी निरी प्रसन्नता के अतिरिक्त और कुछ भी तुम्हें इस क्षण अनन्त विनाश में निगल लिए जाने से नहीं रोकता। चाहे तुम अभी जो सुनते हो उसकी सच्चाई से कितने ही अविश्वस्त क्यों न हो, शीघ्र ही तुम इसके पूर्णतः कायल हो जाओगे। जो तुम्हारी सी ही दशा में थे और अब जा चुके हैं, वे देखते हैं कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था; क्योंकि उनमें से अधिकांश पर विनाश अचानक आ पड़ा; जब उन्हें उसकी कुछ भी आशा न थी, और जब वे यह कह रहे थे, 'शान्ति और सुरक्षा है': अब वे देखते हैं कि जिन बातों पर वे शान्ति और सुरक्षा के लिये भरोसा रखते थे, वे केवल पतली वायु और खाली छायाएं ही थीं।
जो परमेश्वर तुम्हें नरक के गड़हे के ऊपर वैसे थामे हुए है जैसे कोई किसी मकड़ी को, या किसी घृणित कीड़े को, आग के ऊपर थामे रहता है, वह तुमसे घृणा करता है, और भयानक रीति से क्रुद्ध है: तुम्हारे प्रति उसका क्रोध आग के समान जलता है; वह तुम्हें इसके अतिरिक्त और किसी योग्य नहीं समझता, कि तुम्हें आग में डाल दिया जाए; वह इतनी शुद्ध आंखोंवाला है कि तुम्हें अपनी दृष्टि में सहन नहीं कर सकता; तुम उसकी दृष्टि में उससे दस हजार गुणा अधिक घृणित हो, जितना घृणित सबसे विषैला सर्प हमारी दृष्टि में है। तुमने उसे उससे अनन्त गुणा अधिक अपराधी बनाया है, जितना किसी हठी बलवाई ने कभी अपने राजा को किया। और तौभी उसका हाथ ही है जो तुम्हें हर क्षण आग में गिरने से रोके हुए है। इसका कारण और कुछ नहीं
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी दिया जा सकता है, कि तुम बीती रात नरक में नहीं गए; कि तुम्हें आंखें मूंदकर सो जाने के बाद, इस संसार में फिर जागने दिया गया। और इसका और कोई कारण नहीं दिया जा सकता कि सवेरे उठने के बाद से तुम नरक में क्यों नहीं गिर गए, सिवाय इसके कि परमेश्वर के हाथ ने तुम्हें थाम रखा है। इसका भी और कोई कारण नहीं दिया जा सकता कि तुम परमेश्वर के भवन में यहां बैठे रहते हुए भी नरक में क्यों नहीं गए हो, जबकि तुम उसकी गम्भीर आराधना में सम्मिलित होने की अपनी पापमय दुष्ट रीति से उसकी शुद्ध आंखों को उकसाते रहे हो। हां, इसका और कोई कारण नहीं दिया जा सकता कि तुम इसी क्षण नरक में क्यों नहीं गिर पड़ते।
हे पापी! उस भयानक संकट पर विचार करो जिसमें तुम हो: यह क्रोध की एक बड़ी भट्ठी है, एक चौड़ा और अथाह गड़हा है, क्रोध की आग से भरा हुआ, जिसके ऊपर तुम उस परमेश्वर के हाथ में थामे हुए हो, जिसका क्रोध तुम्हारे विरुद्ध उतना ही उकसाया और भड़काया गया है, जितना नरक के अनेक दण्डित प्राणियों के विरुद्ध है। तुम एक पतले धागे से लटके हो, जिसके चारों ओर ईश्वरीय प्रकोप की लपटें चमक रही हैं, और हर क्षण उसे झुलसाकर जला डालने को तैयार हैं; और मध्यस्थ में तुम्हारा कोई भाग नहीं, और अपने को बचाने के लिये पकड़ने को कुछ भी नहीं, प्रकोप की लपटों को रोकने के लिये कुछ भी नहीं, तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं, तुमने कभी जो किया हो उसमें से कुछ भी नहीं, तुम जो कर सको उसमें से कुछ भी नहीं, जिससे तुम प्रेरित कर सको
परमेश्वर को एक क्षण के लिये भी तुम पर तरस खाने को। -- और यहां विशेष रूप से इस पर विचार करो, 1. यह किसका क्रोध है: यह उस अनन्त परमेश्वर का क्रोध है। यदि यह केवल मनुष्य का क्रोध होता, चाहे वह सबसे शक्तिशाली राजा का ही क्यों न होता, तो इसे तुलनात्मक रूप से थोड़ा ही गिना जाता। राजाओं के क्रोध से बहुत डरा जाता है, विशेषकर उन निरंकुश राजाओं के जिनके पास अपनी प्रजा की सम्पत्ति और प्राण पूर्णतः अपने अधिकार में होते हैं, कि वे अपनी निरी इच्छा से उनका निपटारा करें। नीतिवचन 20:2 - "राजा का भय दिखाना जवान सिंह की गर्जन के समान है: जो कोई उसे क्रोध दिलाता है, वह अपने ही प्राण के विरुद्ध पाप करता है।" वह प्रजाजन, जो किसी निरंकुश राजा को अत्यधिक क्रोधित कर देता है, वह उन अत्यन्त भयंकर यातनाओं को सहने के योग्य ठहरता है जिन्हें मानवीय कौशल गढ़ सके, या मानवीय सामर्थ्य दे सके। परन्तु पृथ्वी के सबसे बड़े शासक भी, अपने सबसे बड़े वैभव और सामर्थ्य में, और जब वे अपने सबसे बड़े भय के वस्त्र पहने हों, स्वर्ग और पृथ्वी के महान और सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता और राजा की तुलना में केवल धूल के दुर्बल, तुच्छ कीड़े हैं। जब वे सबसे अधिक क्रोधित हों, और जब उन्होंने अपने प्रकोप की चरम सीमा तक बल लगाया हो, तब भी वे बहुत थोड़ा ही कर सकते हैं। पृथ्वी के सारे राजा, परमेश्वर के सामने, टिड्डियों के समान हैं; वे कुछ भी नहीं, और कुछ से भी कम हैं: उनका प्रेम और उनका द्वेष दोनों ही तुच्छ गिनने योग्य हैं।
उस राजाओं के महाराजा का क्रोध उनके क्रोध से उतना ही अधिक भयंकर है, जितनी उसकी महिमा उनकी महिमा से बड़ी है। लूका 12:4,5 - "मैं तुम से जो मेरे मित्र हो कहता हूं, कि जो शरीर को घात करते हैं, और उसके बाद और कुछ नहीं कर सकते, उन से मत डरो। मैं तुम्हें चिताता हूं कि तुम किस से डरो: उस से डरो, जिसे घात करने के बाद नरक में डालने का भी अधिकार है: हां, मैं तुम से कहता हूं, उसी से डरो।"
2 यह उसके क्रोध की भयंकरता है जिसके अधीन तुम हो। हम अक्सर परमेश्वर के प्रकोप के विषय में पढ़ते हैं; जैसा यशायाह 59:18 में है - "उनके कामों के अनुसार, वह अपने द्रोहियों को प्रकोप का बदला देगा।" इसी प्रकार यशायाह 66:15 - "क्योंकि देखो, यहोवा आग के साथ आएगा, और उसके रथ बवण्डर के समान होंगे, कि क्रोध के साथ अपना कोप और आग की लपटों के साथ अपनी घुड़की प्रगट करे।" और क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी और भी अनेक स्थानों में। इसी प्रकार, प्रकाशितवाक्य 19:15 में हम "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रचण्ड प्रकोप की मदिरा के कुण्ड" के विषय में पढ़ते हैं। ये शब्द अत्यन्त भयानक हैं। यदि केवल यह कहा गया होता, "परमेश्वर का क्रोध," तो इन शब्दों का अर्थ भी अनन्त रूप से भयानक होता: परन्तु यह "परमेश्वर का प्रकोप और क्रोध" है। परमेश्वर का प्रकोप! यहोवा की भयंकरता! हाय, यह कितना भयानक होगा! कौन यह कह सके या कल्पना कर सके कि ऐसे शब्दों में क्या निहित है!
परन्तु यह "सर्वशक्तिमान परमेश्वर का प्रकोप और क्रोध" भी है। मानो उसके प्रकोप की भयंकरता जो कुछ दण्ड दे, उसमें उसकी सर्वशक्तिमत्ता का बहुत बड़ा प्रकटीकरण होगा, मानो सर्वशक्तिमत्ता स्वयं जैसे क्रुद्ध होकर बल लगाए, जैसे मनुष्य अपने क्रोध की भयंकरता में अपना बल लगाया करते हैं। हाय! तब इसका क्या परिणाम होगा! उन बेचारे कीड़ों का क्या होगा जो इसे सहेंगे! किसके हाथ बलवन्त रह सकते हैं? और किसका हृदय सह सकता है? उस बेचारे प्राणी को दुःख की कितनी भयानक, अवर्णनीय, अकल्पनीय गहराई में डूबना होगा जो इसका भागी होगा!
इस पर विचार करो, तुम जो यहां उपस्थित हो, जो अब तक नये जन्म से रहित दशा में हो।
यह कि परमेश्वर अपने क्रोध की भयंकरता को क्रियान्वित करेगा, इसका अर्थ है कि वह बिना किसी तरस के क्रोध देगा। जब परमेश्वर तुम्हारी दशा की अवर्णनीय पराकाष्ठा को देखेगा, और देखेगा कि तुम्हारी यातना तुम्हारे बल की तुलना में कितनी असीम रूप से अधिक है, और देखेगा कि तुम्हारा बेचारा प्राण कैसे कुचला जा रहा है, और मानो एक अनन्त अन्धकार में डूबता जा रहा है; तब उसे तुम पर कोई करुणा नहीं होगी, वह अपने क्रोध के क्रियान्वयन को रोकेगा नहीं, न अपना हाथ लेशमात्र भी हल्का करेगा; वहां न कोई नरमी होगी, न दया, न ही परमेश्वर तब अपनी प्रचण्ड आंधी को कुछ भी रोकेगा; उसे तुम्हारे कल्याण की कोई चिन्ता नहीं होगी, न ही वह इस बात की तनिक भी परवाह करेगा कि तुम किसी और अर्थ में अधिक न सहो, सिवाय इसके कि तुम कठोर न्याय की मांग से अधिक न सहो।
इसलिये कि तुम्हारे लिये सहना इतना कठिन है, इस कारण कुछ भी रोका न जाएगा। यहेजकेल 8:18 - "इसलिये मैं भी जलजलाहट के साथ काम करूंगा; मेरी आंख कोमलता नहीं करेगी, और न मैं तरस खाऊंगा; और चाहे वे ऊंचे शब्द से मेरे कान में पुकारें, तौभी मैं उनकी न सुनूंगा।" अभी परमेश्वर तुम पर तरस खाने को तैयार खड़ा है; यह दया का दिन है; तुम अभी दया पाने की कुछ आशा के साथ पुकार सकते हो। परन्तु एक बार दया का दिन बीत जाने पर, तुम्हारी सबसे शोकपूर्ण और दुःखमय पुकारें और चीत्कार व्यर्थ होंगी; तुम पूर्णतः खोए हुए और परमेश्वर द्वारा त्यागे हुए होगे, जहां तक तुम्हारे कल्याण की कोई परवाह का प्रश्न है। परमेश्वर तुम्हारा और कोई उपयोग नहीं करेगा, सिवाय इसके कि तुम दुःख सहो; तुम्हें और किसी उद्देश्य के लिये अस्तित्व में नहीं रखा जाएगा; क्योंकि तुम विनाश के लिये तैयार किया हुआ क्रोध का पात्र बनोगे; और इस पात्र का और कोई उपयोग नहीं होगा, सिवाय इसके कि यह क्रोध से भरपूर किया जाए।
परमेश्वर तुम्हारे पुकारने पर तुम पर तरस खाने से इतना दूर होगा, कि यह कहा गया है कि वह केवल "हंसेगा और ठट्ठा करेगा," नीतिवचन 1:25,26, इत्यादि।
कितने भयानक हैं वे शब्द, यशायाह 63:3, जो महान परमेश्वर के शब्द हैं। "मैं ने कोप करके उन्हें रौंदा, और जलजलाहट में उन्हें लताड़ा, और उनका लहू मेरे वस्त्रों पर छिड़क गया, और मैं ने अपना सारा वस्त्र सान डाला।" सम्भवतः ऐसे शब्दों की कल्पना करना असम्भव है जो इनसे अधिक इन तीन बातों के प्रकटीकरण को लिए हों, अर्थात तिरस्कार, और घृणा, और क्रोध की भयंकरता। यदि तुम परमेश्वर से यह पुकारो कि वह तुम पर तरस खाए, तो वह तुम्हारी दयनीय दशा में तुम पर तरस खाने से, या तुम्हें क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी लेशमात्र भी कृपादृष्टि या अनुग्रह दिखाने से, इतना दूर होगा, कि इसके बदले, वह केवल तुम्हें पांवों तले रौंदेगा। और यद्यपि वह जानेगा कि तुम सर्वशक्तिमत्ता के अपने ऊपर रौंदे जाने का भार सहन नहीं कर सकते, तौभी वह इसकी परवाह नहीं करेगा, वरन वह तुम्हें बिना दया के अपने पांवों तले कुचल डालेगा; वह तुम्हारा लहू कुचलकर निकाल देगा, और उसे उड़ा देगा, और वह उसके वस्त्रों पर छिड़क जाएगा, यहां तक कि उसका सारा वस्त्र सन जाएगा।
वह न केवल तुमसे घृणा करेगा, वरन वह तुम्हें अत्यन्त तिरस्कार की दृष्टि से देखेगा: तुम्हारे लिये और कोई स्थान उपयुक्त नहीं समझा जाएगा, सिवाय उसके पांवों तले, गलियों की कीच के समान रौंदे जाने के।
3 जिस दुःख के अधीन तुम हो, वह वही है जो परमेश्वर इसलिये देगा, कि वह दिखा सके कि यहोवा का वह क्रोध कैसा है। परमेश्वर के हृदय में यह रहा है कि वह स्वर्गदूतों और मनुष्यों को दिखाए कि उसका प्रेम कितना उत्तम है, और उसका क्रोध भी कितना भयानक है। कभी-कभी पार्थिव राजाओं की यह इच्छा होती है कि वे उन अत्यन्त दण्डों द्वारा, जो वे अपने को उकसानेवालों पर देंगे, यह दिखाएं कि उनका क्रोध कितना भयानक है। नबूकदनेस्सर, वह कसदी साम्राज्य का सामर्थी और घमण्डी राजा, शद्रक, मेशक, और अबेदनगो पर क्रुद्ध होने पर अपना क्रोध दिखाना चाहता था; और तदनुसार उसने आज्ञा दी कि जलती हुई भट्ठी पहले से सात गुणा अधिक गरम की जाए; निःसन्देह, वह उस भयंकरता की चरम सीमा तक बढ़ाई गई जितनी मानवीय कौशल बढ़ा सकता था। परन्तु महान परमेश्वर भी अपने शत्रुओं की चरम यातनाओं में अपना क्रोध दिखाना, और अपनी भयानक महिमा और सामर्थी शक्ति को महान बनाना चाहता है। रोमियों 9:22 - "फिर यदि परमेश्वर ने अपना क्रोध दिखाने, और अपनी सामर्थ्य जताने की इच्छा से, क्रोध के उन पात्रों को जो विनाश के लिये तैयार किए गए थे, बड़े धीरज से सहा?" और यह देखते हुए कि यही उसकी युक्ति है, और यही उसने ठाना है, अर्थात यह दिखाना कि यहोवा का अनियंत्रित क्रोध, प्रकोप और भयंकरता कैसी है, वह इसे पूरा करके रहेगा। वहां कुछ ऐसा सम्पन्न होकर घटित होगा जो गवाही सहित भयानक होगा। जब महान और क्रुद्ध परमेश्वर उठकर बेचारे पापी पर अपना भयानक प्रतिशोध क्रियान्वित करेगा, और वह अभागा प्राणी वास्तव में उसके क्रोध के अनन्त भार और सामर्थ्य को सह रहा होगा, तब परमेश्वर सारी सृष्टि को बुलाकर उस भयानक महिमा और सामर्थी शक्ति को देखने के लिये कहेगा जो उसमें देखी जा सके। यशायाह 33:12-14 - "और देश देश के लोग जलकर चूने के समान हो जाएंगे, वे कटे हुए कांटों के समान आग में जला दिए जाएंगे।
हे दूर के लोगो, जो मैं ने किया है उसे सुनो; और हे निकट के लोगो, मेरे पराक्रम को जान लो।
सिय्योन के पापी डर गए हैं; कपटियों को थरथराहट ने पकड़ लिया है," इत्यादि।
यदि तुम अनपरिवर्तित दशा में बने रहो, तो तुम्हारे साथ भी ऐसा ही होगा, जो इस दशा में हो; सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनन्त पराक्रम, महिमा, और भयंकरता तुम पर, तुम्हारी यातनाओं की अवर्णनीय शक्ति में, महान की जाएगी। तुम्हें पवित्र स्वर्गदूतों की उपस्थिति में, और मेम्ने की उपस्थिति में यातना दी जाएगी; और जब तुम इस दुःख की दशा में होगे, तब स्वर्ग के महिमामय निवासी बाहर निकलकर उस भयानक दृश्य को देखेंगे, कि वे यह देख सकें कि सर्वशक्तिमान का क्रोध और भयंकरता कैसी है; और जब वे इसे देख लेंगे, तो वे गिरकर उस महान सामर्थ्य और महिमा की आराधना करेंगे। यशायाह
66:23,24 - "और नये चांद से नये चांद तक, और विश्रामदिन से विश्रामदिन तक, ऐसा होगा कि सब प्राणी मेरे सम्मुख दण्डवत करने को आया करेंगे, यहोवा का यही वचन है। तब वे निकलकर उन मनुष्यों की लोथों को देखेंगे जिन्होंने मुझसे बलवा किया है;
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी क्योंकि न तो उनका कीड़ा मरेगा, और न उनकी आग बुझेगी, और वे सब प्राणियों को घृणित लगेंगे।"
4 यह अनन्त क्रोध है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इस प्रकोप और क्रोध को एक क्षण के लिये सहना भी भयानक होगा; परन्तु तुम्हें इसे अनन्तकाल तक सहना होगा। इस चरम भयानक दुःख का कोई अन्त न होगा। जब तुम आगे देखोगे, तो तुम्हारे सामने एक लम्बी सदा, एक असीम अवधि दिखाई देगी, जो तुम्हारे विचारों को निगल लेगी, और तुम्हारे प्राण को चकित कर देगी; और तुम पूर्णतः निराश हो जाओगे कि तुम्हें कभी कोई छुटकारा, कोई अन्त, कोई राहत, कोई विश्राम मिलेगा। तुम निश्चय जान लोगे कि तुम्हें इस सर्वशक्तिमान निर्दय प्रतिशोध के साथ मल्लयुद्ध और संघर्ष करते हुए लम्बे युग, करोड़ों-करोड़ों युग बिताने होंगे; और तब जब तुम ऐसा कर चुके होगे, जब तुम वास्तव में इतने युग इस रीति से बिता चुके होगे, तब तुम जान लोगे कि जो अब भी शेष है उसकी तुलना में यह सब केवल एक बिन्दु मात्र है। इसलिये तुम्हारा दण्ड सचमुच अनन्त होगा। हाय, कौन बता सके कि ऐसी परिस्थितियों में किसी प्राण की दशा क्या है! हम इसके विषय में जो कुछ भी कह सकते हैं, वह इसका केवल एक अत्यन्त क्षीण, धुंधला वर्णन ही देता है; यह अवर्णनीय और अकल्पनीय है: क्योंकि "परमेश्वर के क्रोध की सामर्थ्य को कौन जानता है?"
उनकी दशा कितनी भयानक है जो प्रतिदिन और हर घड़ी इस महान क्रोध और अनन्त दुःख के संकट में हैं! परन्तु यही इस सभा के हर उस प्राण की भयावह दशा है जो नये सिरे से नहीं जन्मा, चाहे वह अन्यथा कितना ही नैतिक और कठोर, संयमी और धार्मिक क्यों न हो। हाय, कि तुम इस पर विचार करो, चाहे तुम जवान हो या बूढ़े! यह सोचने का कारण है कि इस सभा में, जो अभी यह प्रवचन सुन रहे हैं, बहुत से ऐसे हैं जो सचमुच अनन्तकाल तक इसी दुःख के भागी होंगे। हम नहीं जानते कि वे कौन हैं, या किन आसनों पर बैठे हैं, या अभी उनके क्या विचार हैं। हो सकता है वे अभी निश्चिन्त हों, और ये सब बातें बिना अधिक विचलित हुए सुन रहे हों, और अभी अपने आप को यह भरोसा दिला रहे हों कि वे वे व्यक्ति नहीं, अपने आप से यह वचन दे रहे हों कि वे बच जाएंगे। यदि हम जानते कि इस सारी सभा में एक ही व्यक्ति है, केवल एक ही, जो इस दुःख का भागी होगा, तो इसके विषय में सोचना कितनी भयानक बात होती! यदि हम जानते कि वह कौन है, तो ऐसे व्यक्ति को देखना कितना भयानक दृश्य होता! शेष सारी सभा उसके ऊपर कैसी शोकपूर्ण और कड़वी पुकार उठा सकती थी! परन्तु, हाय! एक के बदले, कितने ऐसे हैं जो सम्भवतः नरक में इस प्रवचन को याद रखेंगे? और यह आश्चर्य की बात होगी, यदि अभी उपस्थित लोगों में से कोई बहुत शीघ्र, यहां तक कि यह वर्ष बीतने से पहले ही, नरक में न हो। और यह कोई आश्चर्य न होगा यदि इस सभा-भवन के किसी आसन पर अभी स्वस्थ, शान्त, और निश्चिन्त बैठे कुछ लोग कल सवेरे से पहले वहां हों। तुम में से जो अन्ततः स्वाभाविक दशा में बने रहोगे, जो सबसे अधिक देर तक नरक से बाहर रहोगे, वे भी शीघ्र वहां होंगे! तुम्हारा दण्ड ऊंघता नहीं; यह वेगपूर्वक आएगा, और, सम्भावना के अनुसार, तुम में से बहुतों पर अत्यन्त अचानक आ पड़ेगा। तुम्हारे पास इस पर आश्चर्य करने का कारण है कि तुम अभी तक नरक में नहीं हो। यह निःसन्देह उन कुछ लोगों की दशा है जिन्हें तुमने देखा और जाना है, जो तुमसे कभी अधिक नरक के योग्य न थे, और जो पहले तुम्हारे समान ही अभी जीवित रहने की सम्भावना रखते प्रतीत होते थे। उनकी दशा सर्वथा आशा से परे है; वे क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी की चरम पीड़ा और पूर्ण निराशा में पुकार रहे हैं; परन्तु तुम यहां जीवितों की भूमि में और परमेश्वर के भवन में हो, और तुम्हें उद्धार पाने का अवसर मिला हुआ है। वे बेचारे दण्डित, आशाहीन प्राण, तुम्हें अभी जो एक दिन का अवसर मिला हुआ है, उसके लिये क्या न देते!
और अभी तुम्हें एक असाधारण अवसर मिला हुआ है, एक ऐसा दिन जिसमें मसीह ने दया का द्वार चौड़ा खोल दिया है, और खड़े होकर ऊंचे शब्द से बेचारे पापियों को बुला रहा है और पुकार रहा है; एक ऐसा दिन जिसमें बहुत से उसकी ओर उमड़ रहे हैं, और परमेश्वर के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश कर रहे हैं। बहुत से प्रतिदिन पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से आ रहे हैं; बहुत से जो अभी थोड़े ही समय पहले तुम्हारी सी ही दयनीय दशा में थे, अब एक सुखी दशा में हैं, जिनके हृदय उससे प्रेम से भरे हुए हैं जिसने उन्हें प्रेम किया, और अपने ही लहू से उनके पापों को धो डाला, और जो परमेश्वर की महिमा की आशा में आनन्दित हो रहे हैं। ऐसे दिन में पीछे छूट जाना कितना भयानक है! इतने औरों को भोज करते देखना, जब तुम क्षीण होते और नष्ट होते जा रहे हो! इतनों को हृदय के आनन्द से आनन्दित होते और गाते देखना, जब तुम्हारे पास हृदय के शोक से विलाप करने और आत्मा की व्याकुलता से चिल्लाने का कारण है! तुम ऐसी दशा में एक क्षण भी कैसे विश्राम कर सकते हो? क्या तुम्हारे प्राण उतने ही मूल्यवान नहीं जितने सफ़ील्ड के लोगों के प्राण हैं, जहां वे दिन-प्रतिदिन मसीह की ओर उमड़ रहे हैं?
क्या यहां बहुत से ऐसे नहीं हैं जो संसार में बहुत दिनों से जीवित रहे हैं, और आज तक नये सिरे से नहीं जन्मे? और इस प्रकार इस्राएल के राज्य से पराए हैं, और जब से वे जीवित हैं तब से क्रोध के दिन के लिये क्रोध बटोरने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं किया? हे सज्जनो, तुम्हारी दशा विशेष रूप से अत्यन्त संकटपूर्ण है। तुम्हारा दोष और हृदय की कठोरता अत्यन्त बड़ी है। क्या तुम नहीं देखते कि परमेश्वर की दया के इस अद्भुत और आश्चर्यजनक वितरण में तुम्हारी आयु के अधिकांश लोग किस प्रकार छोड़ दिए जा रहे हैं? तुम्हें अपने आप पर विचार करने और नींद से पूर्णतः जाग उठने की आवश्यकता है। तुम अनन्त परमेश्वर की भयंकरता और क्रोध को सह नहीं सकते। -- और तुम, हे जवान पुरुषो और जवान स्त्रियो, क्या तुम इस अनमोल अवसर की उपेक्षा करोगे जो तुम्हें अभी मिला हुआ है, जब तुम्हारी आयु के इतने और लोग सारी युवावस्था की व्यर्थताओं को त्यागकर मसीह की ओर उमड़ रहे हैं? तुम्हें अभी विशेष रूप से एक असाधारण अवसर मिला हुआ है; परन्तु यदि तुम इसकी उपेक्षा करोगे, तो शीघ्र ही तुम्हारी दशा उन लोगों की सी हो जाएगी जिन्होंने युवावस्था के सारे अनमोल दिन पाप में बिताए, और अब अन्धेपन और कठोरता की ऐसी भयानक स्थिति में आ पहुंचे हैं।
-- और तुम, हे बालको, जो अनपरिवर्तित हो, क्या तुम नहीं जानते कि तुम उस परमेश्वर का भयानक क्रोध सहने के लिये नरक में जा रहे हो, जो अभी प्रतिदिन और प्रति रात्रि तुम पर क्रुद्ध है? क्या तुम शैतान की सन्तान बने रहने से सन्तुष्ट रहोगे, जब देश के इतने और बालक परिवर्तित होकर राजाओं के महाराजा की पवित्र और सुखी सन्तान बन गए हैं?
और हर एक जो अभी मसीह से बाहर है, और नरक के गड़हे के ऊपर लटका हुआ है, चाहे वे बूढ़े पुरुष और स्त्रियां हों, या अधेड़ आयु के, या जवान लोग, या छोटे बालक, वे अभी परमेश्वर के वचन और विधान की ऊंची पुकारों पर कान लगाएं। प्रभु का यह ग्रहणयोग्य वर्ष, जो कुछ के लिये ऐसी बड़ी कृपा का दिन है, निःसन्देह औरों के लिये उतने ही उल्लेखनीय प्रतिशोध का दिन भी होगा।
यदि मनुष्य अपने प्राणों की उपेक्षा करें, तो इस दिन जैसे समय में उनके हृदय कठोर होते जाते हैं, और उनका दोष तेज़ी से बढ़ता जाता है; और ऐसे लोगों के हृदय की कठोरता और मन के अन्धेपन में सौंप दिए जाने का इतना बड़ा संकट पहले कभी नहीं रहा। परमेश्वर अभी सारे प्रान्तों में अपने चुने हुए लोगों को शीघ्रता से इकट्ठा करता प्रतीत होता है
क्रोधित परमेश्वर के हाथों में पापी देश के; और सम्भवतः जितने भी वयस्क लोग कभी उद्धार पाएंगे, उनमें से अधिकांश अभी थोड़े ही समय में लाए जाएंगे, और यह वैसा ही होगा जैसा प्रेरितों के दिनों में यहूदियों पर आत्मा के महान उंडेले जाने के समय हुआ था; चुने हुए लोग उद्धार पाएंगे, और शेष अन्धे कर दिए जाएंगे।
यदि तुम्हारी दशा ऐसी ही रही, तो तुम इस दिन को सदा के लिये कोसोगे, और उस दिन को कोसोगे जिस दिन तुम पैदा हुए थे, कि तुमने परमेश्वर के आत्मा के उंडेले जाने का ऐसा समय देखा, और चाहोगे कि इसे देखने से पहले ही तुम मर गए होते और नरक में चले गए होते। अभी निःसन्देह वैसा ही है जैसा यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के दिनों में था, कुल्हाड़ी असाधारण रीति से पेड़ों की जड़ पर रखी हुई है, ताकि हर वह पेड़ जो अच्छा फल नहीं लाता, काट डाला जाए और आग में झोंक दिया जाए।
इसलिये, हर एक जो मसीह से बाहर है, वह अभी जाग उठे और आनेवाले क्रोध से भाग निकले।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर का क्रोध अभी निःसन्देह इस सभा के बड़े भाग के ऊपर लटका हुआ है। हर एक सदोम से भाग निकले: "अपने प्राण के लिये भाग जा, अपने पीछे न देख, और पहाड़ पर भाग जा, ऐसा न हो कि तू नष्ट हो जाए।"
