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आत्मा के उद्धार को खोजने की रीति

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आत्मा के उद्धार को खोजने की रीति

उत्पत्ति 6:22 -- नूह ने ऐसा ही किया; जो कुछ परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, उसने ठीक वैसा ही किया।

इन वचनों के विषय में मैं तीन बातें दिखाना चाहता हूँ:

1. परमेश्वर ने नूह को क्या आज्ञा दी थी, जिसकी ओर ये वचन संकेत करते हैं। वह था जल-प्रलय के आने के समय के लिये परमेश्वर के विशेष निर्देश के अनुसार एक जहाज़ बनाना; और अपने लिये, अपने परिवार के लिये, तथा जहाज़ में सुरक्षित रखे जानेवाले अन्य प्राणियों के लिये भोजन इकट्ठा करना। इस विषय में परमेश्वर ने उसे जो विशेष आज्ञाएं दी थीं, वे हमें 14वें पद से मिलती हैं, "अपने लिये गोफेर की लकड़ी का एक जहाज़ बना,"

इत्यादि। 2. हम उस काम के विशेष उद्देश्य को भी देख सकते हैं जो परमेश्वर ने नूह को सौंपा था: वह यह था कि जब शेष संसार डूब जाए, तब वह स्वयं को और अपने परिवार को बचाए। देखिये पद

17, 18। हम नूह की आज्ञाकारिता को भी देख सकते हैं। उसने परमेश्वर की आज्ञा मानी: नूह ने ऐसा ही किया। और उसकी आज्ञाकारिता पूर्ण और सर्वांगीण थी: जो कुछ परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, उसने ठीक वैसा ही किया। उसने न केवल आरम्भ किया, वरन उस काम को पूरा भी किया, जिसे करने की आज्ञा परमेश्वर ने उसे प्रलय से उसके उद्धार के लिये दी थी। इसी आज्ञाकारिता की ओर प्रेरित इब्रानियों 11:7 में संकेत करता है, "विश्वास ही से

नूह ने उन बातों के विषय में जो अब तक देखी नहीं गई थीं, परमेश्वर से चेतावनी पाकर, भक्ति के भय से एक जहाज़ बनाया, जिससे उसके घराने का उद्धार हुआ।

हमें अपने उद्धार के लिये बड़े से बड़े कामों में लगने और उन्हें पूरा करने के लिये तैयार रहना चाहिये।

जो जहाज़ बनाने की आज्ञा नूह को दी गई थी, ताकि वह और उसका परिवार बच जाएं, वह एक बड़ा काम था: वह जहाज़ अत्यन्त विशाल आकार की एक इमारत थी; उसकी लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊँचाई तीस हाथ थी। हाल ही तक विद्वानों ने एक हाथ को हमारी नाप के डेढ़ फुट के बराबर माना था। परन्तु हाल ही में हमारे देश के कुछ विद्वान मिस्र और अन्य प्राचीन देशों में गए हैं, और वहाँ की कुछ प्राचीन इमारतों को, जो कई हजार वर्ष पुरानी हैं और जिनका नाप प्राचीन इतिहास हाथों में बताता है — विशेष रूप से मिस्र के पिरामिडों को, जो आज तक ज्यों के त्यों खड़े हैं — नापा है। इनको नापकर, और फुट में नाप की तुलना हाथों में दिए गए प्राचीन विवरणों से करके, यह पाया गया है कि एक हाथ लगभग बाईस इंच के बराबर होता है। इसलिये अब हाल के विद्वान एक हाथ को पहले की अपेक्षा कहीं बड़ा मानते हैं। इस प्रकार वह जहाज़, जो हर दृष्टि से इतना बड़ा माना जाएगा, पहले माने गए आकार से लगभग दुगुने आकार का प्रतीत होगा। हाथ की इस नई गणना के अनुसार, वह पाँच सौ पचास फुट से अधिक लम्बा, लगभग नब्बे फुट चौड़ा, और लगभग पचास फुट ऊँचा था।

ऐसी इमारत बनाना, जिसमें आवश्यक सभी कमरे और विभाजन हों, और जो इतने लम्बे समय तक जल पर तैरने के योग्य हो, उस समय

एक बड़ा काम था। नूह को, अपने सब कारीगरों के साथ, इसे बनाने में एक सौ बीस वर्ष, या लगभग उतना ही समय लगा। इतने ही समय तक परमेश्वर का आत्मा उस पुरानी दुनिया के साथ विवाद करता रहा, और परमेश्वर धीरज धरे हुए उसकी बाट जोहता रहा, जैसा उत्पत्ति 4:3 में देखा जा सकता है: "मेरा आत्मा सदा तक मनुष्य से विवाद करता न रहेगा, तौभी उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।" इतने समय तक जहाज़ बनता रहा, जैसा 1 पतरस 3:20 से प्रकट होता है: "जब कि नूह के दिनों में जहाज़ के बनते समय परमेश्वर का धीरज ठहरा रहा।" यह एक लम्बा समय था जिसमें नूह निरन्तर इस काम में लगा रहा। मनुष्य उस काम को भी बहुत बड़ा समझेंगे जो उन्हें उस समय के आधे भाग तक भी लगातार व्यस्त रखे। नूह को इन एक सौ बीस वर्षों तक इस काम की देखरेख करने में, और यह देखने में कि सब कुछ ठीक उन्हीं निर्देशों के अनुसार किया जाए जो परमेश्वर ने उसे दिए थे, मन में बड़ी और निरन्तर चिन्ता रही होगी।

न केवल नूह स्वयं निरन्तर इस काम में लगा रहा, वरन इसके लिये बड़ी संख्या में कारीगरों का भी उतने ही समय तक निरन्तर सामग्री जुटाने, इकट्ठा करने, तैयार करने, और उन्हें उचित रूप में जोड़ने में लगे रहना आवश्यक था। नूह के लिये ऐसा काम हाथ में लेना कितना बड़ा काम था! क्योंकि निरन्तर चिन्ता और परिश्रम के अतिरिक्त, यह अत्यधिक व्यय का काम भी था। यह सम्भव नहीं कि उस दुष्ट पीढ़ी में से किसी ने बिना पूरी मजदूरी लिए इस काम को आगे बढ़ाने में उंगली भी उठाई हो, जिसे वे निःसन्देह नूह की मूर्खता का ही परिणाम समझते थे। नूह अवश्य ही बहुत धनी रहा होगा, कि वह इतने काम का व्यय उठा सके, और इतने लम्बे समय तक इतने कारीगरों को मजदूरी दे सके। यह किसी राजकुमार के लिये भी बहुत बड़ा व्यय होता; और निःसन्देह नूह बहुत धनी था, जैसे बाद में अब्राहम और अय्यूब धनी थे। परन्तु सम्भवतः नूह ने इस काम में अपनी सारी सांसारिक सम्पत्ति लगा दी, और इस प्रकार सब कुछ बेचकर परमेश्वर के वचन में अपने विश्वास को प्रकट किया, यह विश्वास करते हुए कि निश्चय ही एक जल-प्रलय आएगा, जो सब कुछ नष्ट कर देगा; इसलिये यदि वह अपनी सम्पत्ति रख भी लेता, तो उसके किसी काम की न होती। इसमें उसने हमारे लिये एक उदाहरण छोड़ा है, यह दिखाते हुए कि हमें अपने उद्धार के लिये सब कुछ कैसे बेच देना चाहिये।

नूह का यह काम बड़ी कठिनाई का भी था, क्योंकि इससे वह उन पूरे एक सौ बीस वर्षों तक अपने सब पड़ोसियों की निरन्तर निन्दा का पात्र बना रहा। उनमें से किसी ने भी यह विश्वास नहीं किया कि जो जल-प्रलय आनेवाला है, वह संसार को डुबा देगा। किसी मनुष्य का इस धारणा के अधीन कि यह काम संसार के नष्ट होने पर उसके बचाव का साधन होगा, इतना विशाल काम हाथ में लेना, उसे सारे संसार की निरन्तर हंसी का पात्र बना देता था। जब वह कारीगरों को काम पर रखने जाता होगा, तो निःसन्देह सब उस पर हंसते होंगे, और हम यह मान सकते हैं कि यद्यपि कारीगर मजदूरी के लिये काम करने को राजी हो जाते थे, तौभी वे अपने नियोक्ता की मूर्खता पर हंसते थे। जब जहाज़ बनना आरम्भ हुआ, तो हम यह मान सकते हैं कि जो भी वहाँ से गुजरता और वह विशाल ढांचा खड़ा देखता, वह उस पर हंसता और उसे नूह की मूर्खता कहता।

आजकल मनुष्यों को कठिनाई से ही ऐसा कुछ करने या सहने के लिये राजी किया जा सकता है, जिससे वे अपने सब पड़ोसियों की निन्दा का पात्र बन जाएं। सच तो यह है कि यदि कुछ लोग उनकी निन्दा करें, परन्तु अन्य लोग उनके साथ खड़े होकर उनका आदर करें, तो इससे उन्हें सहारा मिलता है। परन्तु किसी मनुष्य के लिये उस मार्ग पर चलते रहना बहुत कठिन है, जिसमें वह सारे संसार की हंसी का पात्र बन जाता है, और जिसमें

उसे कोई भी ऐसा नहीं मिलता जो उसे तुच्छ न जाने। ऐसा कौन मनुष्य है जो बीस वर्ष तक ऐसी परीक्षा के आघात को सह सके?

परन्तु ऐसे ही एक काम में नूह ने, परमेश्वर के निर्देश पर, हाथ डाला और उसे पूरा किया, ताकि वह स्वयं और उसका परिवार उस सर्वसाधारण विनाश से बच जाएं जो शीघ्र ही संसार पर आनेवाला था। उसने आरम्भ भी किया और अन्त भी किया: "जो कुछ परमेश्वर ने उसे आज्ञा दी थी, उसने ठीक वैसा ही किया।" समय की लम्बाई उसे थकाती न थी: वह अपने भारी व्यय से नहीं थका। उसने वर्ष दर वर्ष अपने सब पड़ोसियों और सारे संसार के उपहास के आघात को सहा: वह उनकी हंसी का पात्र बनते-बनते इतना न थका कि अपना काम छोड़ दे; वरन जब तक जहाज़ पूरा नहीं हुआ, तब तक वह उसमें स्थिर लगा रहा। इसके बाद उसे अपने परिवार के, और उन सब प्रकार के प्राणियों के, इतने लम्बे समय के लिये भरण-पोषण की सामग्री जुटाने का परिश्रम और व्यय भी उठाना पड़ा। ऐसा काम उसने एक सांसारिक उद्धार के लिये हाथ में लिया और पूरा किया। तो फिर मनुष्यों को अपने अनन्त उद्धार के लिये कैसे बड़े काम में हाथ डालने और उसे पूरा करने के लिये तैयार होना चाहिये! यह उस अनन्त जल-प्रलय से उद्धार है, परमेश्वर के कोप की उन लहरों से बचाव है, जिनकी छाया मात्र नूह का जल-प्रलय था।

मैं इस सिद्धान्त को विशेष रूप से निम्नलिखित तीन प्रस्तावों के अन्तर्गत स्पष्ट करूँगा।

I. एक काम या कार्य है जिसे मनुष्यों को हाथ में लेना और पूरा करना अवश्य है, यदि वे उद्धार पाना चाहते हैं।

II. यह कार्य एक बड़ा काम है।

III. मनुष्यों को इस काम में, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, प्रवेश करने और उसे पूरा करने के लिये तैयार रहना चाहिये, क्योंकि यह उनके अपने ही उद्धार के लिये है।

प्रस्ताव। एक काम या कार्य है जिसे मनुष्यों को अपने उद्धार के लिये हाथ में लेना और पूरा करना अवश्य है। — मनुष्यों को यह आशा रखने का कोई कारण नहीं कि वे आलस्य में बैठे-बैठे उद्धार पा जाएंगे, या बिना कुछ किए स्वर्ग पहुंच जाएंगे। नहीं; इसके लिये एक बड़ा काम है, जिसे न केवल आरम्भ करना, वरन पूरा भी करना अवश्य है। — मैं इस प्रस्ताव पर दो प्रश्नों के उत्तर में बोलूँगा।

1. वह कौन सा काम या कार्य है, जिसे मनुष्यों के उद्धार के लिये हाथ में लेना और पूरा करना अवश्य है?

उत्तर। यह उन सब कर्तव्यों के निरन्तर पालन की रीति से उद्धार खोजने का काम है, जिनकी ओर परमेश्वर अपने वचन में मनुष्यों को निर्देश देता है। यदि हम उद्धार पाना चाहते हैं, तो हमें उद्धार को खोजना ही होगा। क्योंकि यद्यपि मनुष्य स्वयं स्वर्ग को प्राप्त नहीं करते, तौभी वे वहाँ न तो संयोगवश पहुंचते हैं, और न ही अपने किसी संकल्प या प्रयत्न के बिना। परमेश्वर ने अपने वचन में मनुष्यों को निर्देश दिया है कि यदि वे उद्धार पाने की आशा रखते हैं, तो उसे खोजें। उनके सामने एक दौड़ रखी गई है, जिसे उन्हें दौड़ना है, और उस दौड़ में विजयी होकर ही वे पुरस्कार पा सकते हैं।

पवित्रशास्त्र ने हमें बताया है कि हमारे उद्धार के लिये हमें कौन-कौन से विशेष कर्तव्य पूरे करने हैं। यह पर्याप्त नहीं कि मनुष्य उनमें से केवल कुछ कर्तव्यों के पालन में अपना उद्धार खोजें; वरन उन सबका पालन सार्वभौमिक रूप से होना चाहिये। जो काम हमें करना है वह परमेश्वर की केवल कुछ आज्ञाओं का नहीं, वरन सब आज्ञाओं का पालन है; आराधना की हर विधि का पालन है; अनुग्रह के सब नियुक्त साधनों का तत्परता से प्रयोग है; और

परमेश्वर और मनुष्य दोनों के प्रति सब कर्तव्यों को पूरा करना है। — यह पर्याप्त नहीं कि मनुष्य परमेश्वर की सब आज्ञाओं का कुछ आदर करें, और यह कहा जा सके कि वे किसी प्रकार से सब आज्ञाओं के पालन में अपना उद्धार खोज रहे हैं; वरन उन्हें इसके लिये समर्पित होना अवश्य है।

उन्हें इसे कोई गौण काम नहीं बनाना चाहिये, न ही ऐसी बात जिसमें वे लापरवाह और असावधान रहें, या जिसे वे शिथिल हाथों से करें; वरन यह उनका सबसे बड़ा काम होना चाहिये, जिस पर वे अपनी सबसे बड़ी चिन्ता के रूप में ध्यान दें। उन्हें केवल खोजना ही नहीं, वरन प्रयत्न भी करना है; उन्हें जो कुछ उनका हाथ करने को पाए, उसे अपनी पूरी शक्ति से करना है, ऐसे मनुष्यों की भांति जो मन से पूरी तरह लगे हों, और जो बड़ी अभिलाषा तथा दृढ़ संकल्प से प्रेरित और आगे बढ़ाए जाते हों। उन्हें ऐसा व्यवहार करना है जैसे वे धर्म के महत्व को अन्य सब बातों से इतना बढ़कर देखते हों कि बाकी सब कुछ केवल आकस्मिक विषय बनकर रह जाए, और कोई भी वस्तु उसके कर्तव्यों की प्रतिस्पर्धा में खड़ी न हो सके। यही उनका एकमात्र काम होना चाहिये; फिलिप्पियों 3:13, "मैं एक ही काम करता हूं।" — यह वह काम होना चाहिये जिसके लिये वे अन्य सब मामलों को स्थान दें, और जिसके लिये वे अन्य वस्तुओं को बलिदान करने को तैयार रहें। उन्हें सुखों और सम्मान, सम्पत्ति और जीवन को त्यागने, और इस काम को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिये सब कुछ बेच देने को तैयार रहना है।

प्रत्येक मनुष्य से यह अपेक्षित है कि वह इस काम में केवल कुछ न कुछ करे ही नहीं, वरन स्वयं को इसके लिये समर्पित करे; जिसका अर्थ है कि वह स्वयं को, अपने सब मामलों को, और अपने सब सांसारिक सुखों को इसके लिये त्याग दे। यही क्रूस उठाने, मसीह का जूआ अपने ऊपर लेने, और अपने आप का इन्कार करके मसीह के पीछे चलने का अभिप्राय है। वह धनी जवान, जो घुटने टेककर मसीह के पास यह जानने आया था कि उद्धार पाने के लिये उसे क्या करना चाहिये (मरकुस 10:17), उसने किसी अर्थ में उद्धार को खोजा, परन्तु उसे प्राप्त नहीं किया। किसी अर्थ में उसने बचपन से ही सब आज्ञाओं का पालन किया था; परन्तु वह इस काम के लिये हृदय से समर्पित नहीं था। उसने अपने सब सुखों का इसके लिये बलिदान नहीं किया था, जैसा तब प्रकट हुआ जब मसीह ने उसे परखा; वह उसके लिये अपनी सम्पत्ति को त्यागने को तैयार न हुआ।

यह पर्याप्त नहीं कि मनुष्य कुछ समय के लिये बहुत लगे हुए दिखाई दें, और मानो अपने कर्तव्य के लिये समर्पित प्रतीत हों; वरन एक स्थिर बने रहनेवाली रीति से निरन्तर समर्पण होना चाहिये, जैसा नूह जहाज़ बनाने के काम के प्रति था, जो उस बड़े, कठिन, और खर्चीले काम में तब तक लगा रहा जब तक वह पूरा नहीं हो गया, और जब तक जल-प्रलय नहीं आ गया। मनुष्यों को न केवल अनुग्रह के साधनों के प्रयोग में तत्पर रहना है, और आशा और शान्ति प्राप्त होने तक अनन्त विनाश से बचने के लिये व्याकुलता से लगे रहना है; वरन इसके बाद भी उन्हें धर्म के कर्तव्यों में तब तक स्थिर बने रहना है, जब तक जल-प्रलय अर्थात मृत्यु की बाढ़ न आ जाए। मनुष्यों की केवल क्षमताएं, शक्ति, और सम्पत्ति ही इस काम के लिये समर्पित नहीं होनी चाहिये, वरन उनका समय और उनका जीवन भी; उन्हें अपना सम्पूर्ण जीवन इसके लिये दे देना है, यहां तक कि उस दिन तक भी जब परमेश्वर आंधी और जल-प्रलय ला दे। यही वह काम या कार्य है जो मनुष्यों को अपने उद्धार के लिये करना है।

प्रश्न 2। ऐसा क्यों आवश्यक है कि मनुष्य अपने उद्धार के लिये ऐसे काम को हाथ में लेकर पूरा करें?

उत्तर 1। इसलिये नहीं कि वे उद्धार के योग्य बनें, या परमेश्वर की उद्धारकारी दया के लिये स्वयं को सिफारिश करें।

मनुष्य अपने किसी काम के कारण उद्धार नहीं पाते, फिर भी वे बिना कामों के भी उद्धार नहीं पाते। यदि हम केवल यह विचार करें कि किस बात के लिये, या किस बात के कारण, मनुष्य उद्धार पाते हैं, तो

मनुष्यों का कोई भी काम उनके उद्धार के लिये आवश्यक नहीं है। इस दृष्टि से वे पूर्णतः अपने किसी काम के बिना ही उद्धार पाते हैं: तीतुस 3:5, "धार्मिकता के कामों के कारण नहीं, जो हमने आप किए, वरन अपनी दया के अनुसार, उसने नये जन्म के स्नान, और पवित्र आत्मा के नवीनीकरण के द्वारा हमारा उद्धार किया।" हमें सचमुच कामों के कारण ही उद्धार मिलता है; परन्तु अपने कामों के कारण नहीं। यह उन कामों के कारण है जो मसीह ने हमारे लिये किए हैं। काम अनन्त जीवन का निश्चित मूल्य हैं; और यह मूल्य धार्मिकता के एक अनन्त, अपरिवर्तनीय नियम के द्वारा निश्चित किया गया है। परन्तु पतन के बाद इन कामों को करने की हमारे लिये कोई आशा नहीं रही, जब तक कि उद्धार बिना दाम और बिना मूल्य के सेंत-मेंत न दिया जाए। परन्तु, 2. यद्यपि हमें उद्धार के योग्य बनने के लिये कुछ करना आवश्यक नहीं, जिसे मसीह ने अपने में विश्वास करनेवाले सबके लिये पूर्णतः अर्जित कर लिया है; तौभी परमेश्वर ने अपने बुद्धिमान और पवित्र उद्देश्यों के लिये यह ठहराया है कि हम अन्तिम उद्धार तक और किसी रीति से नहीं, वरन हमारे द्वारा किए गए भले कामों की रीति से ही पहुंचें।

परमेश्वर ने नूह को जहाज़ बनाने में उसके परिश्रम और व्यय के कारण नहीं बचाया।

जल-प्रलय से नूह का उद्धार परमेश्वर की सेंत-मेंत और विशेष दया का एक उदाहरण था। और न ही परमेश्वर को जहाज़ बनाने के लिये नूह की चिन्ता, व्यय, या परिश्रम की कोई आवश्यकता थी। जिस शक्ति ने संसार को रचा, और जो जल-प्रलय पृथ्वी पर लाई, वह एक क्षण में ही बिना नूह की किसी चिन्ता या व्यय के, और बिना उन कारीगरों के किसी परिश्रम के जो इतने लम्बे समय तक काम में लगे रहे, जहाज़ बना सकती थी। तौभी परमेश्वर को यह भाया कि नूह इसी रीति से बचाया जाए। इसी प्रकार परमेश्वर ने यह ठहराया है कि मनुष्य बिना उस काम को हाथ में लिए और किए, जिसकी मैं बात कर रहा हूँ, उद्धार न पाए; और इसीलिये हमें आज्ञा दी गई है कि "भय और कंपकंपी के साथ अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ" (फिलिप्पियों 2:12)।

ऐसे काम को उद्धार की एक अनिवार्य शर्त के रूप में ठहराने के अनेक बुद्धिमानीपूर्ण उद्देश्य हैं। परमेश्वर की महिमा इसकी अपेक्षा करती है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर को मनुष्यों के किसी भी काम की आवश्यकता नहीं कि वे उसकी उद्धारकारी दया के लिये स्वयं को सिफारिश करें, तौभी मनुष्यों को उद्धार ऐसी रीति से देना, जो उन्हें आलस्य और दुष्टता में प्रोत्साहित करे, या तत्परता और पवित्रता को बढ़ावा देनेवाली रीति के अतिरिक्त किसी और रीति से देना, परमेश्वर की बुद्धि और पवित्रता की महिमा पर बहुत आंच लाता। मनुष्य को कार्य करने योग्य बनाया गया, और उसे देह और मन दोनों की अनेक शक्तियां इसके लिये उपयुक्त बनाकर दी गई थीं। वह काम के लिये बनाया गया था, आलस्य के लिये नहीं, और जिस मुख्य काम के लिये वह बनाया गया था, वह धर्म का ही काम था। इसलिये यह परमेश्वर की बुद्धि के अनुकूल है कि वह मनुष्य को उद्धार और सुख ऐसी रीति से दे, जो इस दृष्टि से उसके उद्देश्य को सबसे अधिक बढ़ावा दे, और उसे अपनी क्षमताओं और प्रतिभाओं के तत्पर प्रयोग के लिये उभारे।

यह परमेश्वर की बुद्धि के अनुकूल है कि उसने ऐसा प्रबन्ध किया है कि बड़े मूल्य और महत्व की वस्तुएं बिना बड़े परिश्रम और तत्परता के प्राप्त न हों। बड़ा मानवीय ज्ञान और उत्तम नैतिक गुण बिना चिन्ता और परिश्रम के प्राप्त नहीं होते। यह इसलिये बुद्धिमानी से ऐसा ठहराया गया है, कि मनुष्य में उन उत्तम वस्तुओं के मूल्य की उचित समझ बनी रहे। यदि बड़ी वस्तुएं सामान्यतः सहज ही प्राप्त हो जातीं, तो इससे मनुष्यों में उन्हें तुच्छ और हल्का समझने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती। मनुष्य सामान्यतः उन वस्तुओं को तुच्छ समझते हैं, जो सस्ती हैं, और जो बिना कठिनाई के प्राप्त हो जाती हैं।

यद्यपि मनुष्यों द्वारा किया गया आज्ञाकारिता का काम उद्धार के योग्य बनने के लिये आवश्यक नहीं है; तौभी उद्धार के लिये तैयार होने के लिये यह आवश्यक है। जिस रीति का वर्णन किया गया है, उसके बिना मनुष्य उद्धार के लिये तैयार नहीं हो सकते। यह इसलिये आवश्यक है कि उन्हें अपनी आवश्यकताओं और अयोग्यता की उचित समझ हो; और इसलिये भी कि जब उद्धार दिया जाए, तब वे उसका मूल्य समझने और उसके लिये उचित रूप से परमेश्वर के आभारी होने के लिये तैयार और इच्छुक हों। हमारे उद्धार के लिये इतने बड़े काम की अपेक्षा किसी भी रीति से उद्धार के प्रस्ताव की सेंत-मेंतता के विरुद्ध नहीं है; क्योंकि अन्ततः यह हमारे काम के प्रति बिना किसी सम्बन्ध के ही, हमारे उद्धार के मूल्य या योग्यता के कारण के रूप में नहीं, वरन जैसा मैं पहले ही बता चुका हूं, दिया और प्रस्तावित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इस रीति से दिया गया उद्धार हमारे लिये अधिक उत्तम है, और इस लोक तथा आनेवाले लोक दोनों में हमारे लाभ और सुख के लिये अधिक अच्छा है, बजाय इसके कि यह बिना इस अपेक्षा के दिया जाता।

II. प्रस्ताव। यह काम या कार्य, जो मनुष्यों के उद्धार के लिये किया जाना अवश्य है, एक बड़ा काम है। जिन मनुष्यों पर इसे बल देकर कहा जाता है, उन्हें प्रायः यह ऐसा ही प्रतीत होता है। अपने सब पापों से पूर्णतः अलग हो जाना, और बिना किसी एक भी वासना को बचाए रखे, हर परिस्थिति में परमेश्वर की हर आज्ञा के आगे झुककर उसका पालन करते हुए, धर्म के काम के लिये स्वयं को सदा के लिये सौंप देना, और उसमें स्थिर बने रहना, अनेकों को इतनी बड़ी बात लगती है कि उन्हें इसे हाथ में लेने के लिये व्यर्थ ही बल दिया जाता है। ऐसा करने में उन्हें ऐसा लगता है, मानो वे स्वयं को एक स्थायी बन्धन में सौंप रहे हों। इसलिये अधिकांश मनुष्य इसे टाल देना और यथासम्भव इससे दूर रहना ही चुनते हैं। वे ऐसी कठोर सेवा में तुरन्त प्रवेश करने के विचार को सह नहीं सकते, और इसे करने के बजाय, वे इसे किसी अनिश्चित भावी अवसर पर टालकर अनन्त दण्ड का जोखिम उठाना अधिक पसन्द करते हैं।

यद्यपि धर्म का काम वास्तव में ऐसा नहीं है जैसा वह ऐसे मनुष्यों को दिखाई देता है — और शैतान अवश्य ही, यदि वह कर सके, तो पापियों के सामने इसे झूठे रंगों में प्रस्तुत करेगा, और इसे यथासम्भव काला और भयानक दिखाएगा — तौभी यह वास्तव में एक बड़ा काम है, एक बड़ा उद्यम है, और यह उचित है कि जिस किसी को इसके लिये प्रेरित किया जाए, वह पहले ही इसका मूल्य आंक ले, और उससे जुड़ी कठिनाई को समझ ले। क्योंकि यद्यपि शैतान अनेकों को इस काम को वास्तविकता से अधिक कठिन बताकर हतोत्साहित करता है, तौभी दूसरों के साथ वह विपरीत मार्ग अपनाता है, और उन्हें चापलूसी से यह विश्वास दिलाता है कि यह तो बहुत सहज बात है, एक साधारण सा काम है, जिसे वे जब चाहें तब कर सकते हैं, और इस प्रकार वह उन्हें इसी विचार से इसे टालने का साहस देता है। परन्तु कोई भी धर्म के उस काम के विषय में, जो उनके उद्धार के लिये सर्वथा आवश्यक है, इसके अतिरिक्त और कोई धारणा न बनाए कि यह एक बड़ा काम है। यह निम्नलिखित बातों के कारण ऐसा है।

1. यह बहुत परिश्रम और चिन्ता का काम है। अनेक आज्ञाएं हैं जिनका पालन करना है, अनेक कर्तव्य हैं जिन्हें पूरा करना है — परमेश्वर के प्रति कर्तव्य, अपने पड़ोसी के प्रति कर्तव्य, और अपने प्रति कर्तव्य। इन कर्तव्यों के मार्ग में बाहर से बहुत विरोध है। एक चतुर और शक्तिशाली शत्रु मार्ग में हर प्रकार की बाधाएं डाल रहा है। शैतान की अनगिनत परीक्षाएं हैं जिनका विरोध करना और जिन्हें दूर हटाना है। संसार की ओर से बड़ा विरोध है, हर ओर अनगिनत फंदे बिछे हुए हैं, अनेक चट्टानें और पहाड़ हैं जिन्हें पार करना है, अनेक धाराएं हैं जिनसे होकर गुजरना है, और व्यर्थ संसार की अनेक चापलूसियां और प्रलोभन हैं जिनका विरोध करना है।

भीतर से भी बड़ा विरोध है; एक मन्द और आलसी हृदय, जो धर्म में आवश्यक उस तत्परता से अत्यधिक अरुचि रखता है; एक शारीरिक हृदय, जो धर्म और आत्मिक अभ्यासों से अरुचि रखता है, और निरन्तर विपरीत दिशा में खींचता है; और एक अभिमानी तथा छलपूर्ण हृदय, जिसमें भ्रष्टता हर प्रकार से अपने आप को प्रकट करती रहती है। इसलिये बिना अत्यन्त कड़ी और सावधान चौकसी, बड़े परिश्रम और संघर्ष के, कुछ भी प्रभावी रूप से नहीं किया जा सकता।

2. यह एक निरन्तर चलनेवाला काम है। — जिस काम में बड़ा परिश्रम अपेक्षित होता है, उसमें मनुष्य कभी-कभी विश्राम का कुछ समय चाहते हैं, ताकि वे अपने असाधारण परिश्रम से आराम पा सकें।

परन्तु यह ऐसा काम है जिसका पालन प्रतिदिन करना अवश्य है। लूका 9:23, "यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इनकार करे, और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले।" हमें इस काम से कभी भी अपने आपको विश्राम नहीं देना चाहिये; इसे दिन प्रतिदिन निरन्तर आगे बढ़ाना है। यदि हम कभी-कभी धर्म के विषय में बड़ी हलचल और सरगर्मी दिखाएं, परन्तु फिर सब कुछ छोड़कर आराम करने लगें, और समय-समय पर ऐसा ही करते रहें, तो इसका कोई अच्छा परिणाम नहीं होगा; इससे तो अच्छा यही होता कि हम कुछ भी न करते। इस प्रकार पालन किया गया धर्म का काम कभी किसी अच्छे परिणाम तक नहीं पहुंच सकता, और न ही वह कार्य कभी किसी अच्छे उद्देश्य के लिये पूरा हो सकता है।

3. यह इसलिये भी एक बड़ा काम है, क्योंकि यह बड़े व्यय का काम है। — इसमें हमें सब कुछ बेच देना है: हमें इस काम को अपने सब अवैध सुखों और आनन्दों के मूल्य पर, अपने शारीरिक आराम के मूल्य पर, प्रायः अपनी सम्पत्ति, मनुष्यों के बीच अपनी प्रतिष्ठा, अपने पड़ोसियों की सद्भावना के मूल्य पर, अपने सब सांसारिक मित्रों के मूल्य पर, और यहां तक कि अपने जीवन के ही मूल्य पर आगे बढ़ाना है। इसमें यह नूह के जहाज़ बनाने के काम के समान है, जो, जैसा दिखाया जा चुका है, एक महंगा काम था: यह मनुष्यों के बीच उसकी प्रतिष्ठा की कीमत पर था, जिसने उसे अपने सब पड़ोसियों और सारे संसार की निरन्तर हंसी का पात्र बनाया; और यह उसकी सम्पत्ति की भी कीमत पर था, और सम्भवतः इसमें उसका सब कुछ लग गया जो उसके पास था।

4. कभी-कभी इस काम और आत्मा के उद्धार के विषय में जो भय, कष्ट, और मन की उलझन सही जाती है, वह किसी शान्ति के मिलने से पहले बड़ी और लम्बे समय तक बनी रहती है। कभी-कभी इस दशा में मनुष्य लम्बे समय तक अन्धकार में परिश्रम करते हैं, और कभी-कभी मानो आग ही में होकर, उन्हें विवेक की बड़ी पीड़ा, बड़े भय, और अनेक उलझानेवाली परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है, इससे पहले कि उन्हें ज्योति और शान्ति मिले जो उनकी चिन्ता और परिश्रम को उनके लिये सहज बना दे। वे कभी-कभी बड़ी लगन से, और लम्बे समय तक, शान्ति खोजते हैं, परन्तु उसे नहीं पाते, क्योंकि वे उसे न तो सही रीति से, और न ही सही वस्तुओं में खोजते हैं। इसलिये परमेश्वर अपना मुख छिपा लेता है। वे पुकारते हैं, परन्तु परमेश्वर उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं देता। वे प्रयत्न करते हैं, परन्तु सब कुछ व्यर्थ ही प्रतीत होता है।

उन्हें ऐसा लगता है कि वे बिलकुल भी आगे नहीं बढ़ रहे, न ही पाप से छुटकारे के निकट आ रहे हैं; वरन आगे के बजाय पीछे जा रहे हैं। उन्हें ज्योति की कोई हल्की सी झलक भी नहीं दिखाई देती: सब कुछ उलटा और अधिक अन्धकारमय दिखाई देता है। यहां तक कि वे प्रायः निराश होने, और अपने वर्तमान कष्ट के बोझ के नीचे, तथा भावी दुःख की सम्भावना के नीचे दब जाने के निकट पहुंच जाते हैं। इस दशा में, और इन विचारों के अधीन, कुछ लोग निराशा की कगार तक पहुंच जाते हैं। बहुत से लोग, कुछ उद्धारकारी शान्ति पा लेने के बाद भी, फिर से अन्धकार और संकट में पड़ जाते हैं। उनकी दशा उन मसीही इब्रानियों की सी होती है, इब्रानियों 10:32, "जब तुम ज्योति पा चुके थे, तब तुमने दुखों का बड़ा संघर्ष

सह लिया।" कुछ लोग, स्वभाव की उदासी और देह की अस्वस्थता के कारण, शैतान की परीक्षाओं के साथ मिलकर, अपने जीवन का एक बड़ा भाग कष्ट और अन्धकार में बिताते हैं, चाहे उन्हें कुछ उद्धारकारी शान्ति मिल भी चुकी हो।

5. यह ऐसा काम है, जिसमें अनेक कठिनाइयों, फंदों, और खतरों के कारण, बहुत शिक्षा, विचार, और सम्मति की आवश्यकता होती है। ऐसा कोई काम नहीं जिसमें मनुष्यों को इससे अधिक सम्मति की आवश्यकता हो। यह एक कठिन काम है, जिसमें सही ढंग से आगे बढ़ना कठिन है। इसमें दस हजार गलत मार्ग हैं, जिन पर मनुष्य चल सकते हैं; अनेक भूल-भुलैयां हैं जिनमें अनेक बेचारी आत्माएं उलझ जाती हैं और मार्ग कभी नहीं पातीं; अनेक चट्टानें हैं, जिन पर हजारों आत्माओं ने सही दिशा में न चलने के कारण जहाज़ी दुर्घटना का सामना किया है।

मनुष्य स्वयं से यह नहीं जानते कि इस काम में कैसे आगे बढ़ें, ठीक वैसे ही जैसे इस्राएल की सन्तान बादल और आग के खम्भे के मार्गदर्शन के बिना जंगल में यह नहीं जानती थी कि कहां जाना है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि वे पवित्रशास्त्र को खोजें, और उसमें दिए गए उपदेशों और निर्देशों पर, जो अन्धियारे स्थान में चमकनेवाली ज्योति के समान हैं, तत्परता से ध्यान दें, और इन बातों में निपुण लोगों से सम्मति मांगें। और ऐसा कोई काम नहीं जिसमें मनुष्यों को प्रार्थना द्वारा परमेश्वर से इतनी अधिक सम्मति खोजने, और यह चाहने की आवश्यकता हो कि वह उन्हें सही मार्ग पर ले चले, और उन्हें सांकरा फाटक दिखाए। "क्योंकि सांकरा है वह फाटक और सकेत है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है, और थोड़े ही हैं जो उसे पाते हैं"; हां, स्वर्ग से मार्गदर्शन के बिना कोई भी उसे नहीं पाता। जहाज़ बनाना इस कारण भी बड़ी कठिनाई का काम था, कि नूह की बुद्धि पर्याप्त नहीं थी कि वह जान सके कि ऐसी इमारत कैसे बनाई जाए जो ऐसे जल-प्रलय के विरुद्ध पर्याप्त सुरक्षा दे, और जो स्वयं उसके, उसके परिवार के, और सब प्रकार के पशुओं, पक्षियों, और रेंगनेवाले जीवों के लिये एक उपयुक्त निवास-स्थान हो। और यदि परमेश्वर उसे निर्देश न देता, तो वह कभी भी यह न जान पाता कि यह इमारत कैसे बनाई जाए।

6. यह काम जीवन के समाप्त होने तक कभी समाप्त नहीं होता। जो लोग इस परिश्रमी, चिन्तापूर्ण, खर्चीले, आत्म-त्यागी काम को हाथ में लेते हैं, उन्हें यह आशा नहीं रखनी चाहिये कि मृत्यु के उनका अन्त करने तक वे अपने परिश्रम से विश्राम पाएंगे। जिस काम को नूह ने हाथ में लिया था, उसका लम्बे समय तक चलते रहना ही विशेष रूप से उसे एक बड़ा काम बनाता था। यही बात इस्राएल की सन्तान के जंगल में यात्रा को भी उनके लिये इतना बड़ा बना देती थी, कि वह इतने लम्बे समय तक चलती रही। उनका साहस टूट गया, वे निराश हो गए, और उनमें इतने बड़े काम को पूरा करने का साहस न रहा। परन्तु यह काम ऐसा है कि यह जीवन के साथ-साथ चलता है, चाहे वह लम्बा हो या छोटा। चाहे हम बड़ी आयु तक जीवित रहें, हमारी दौड़ और युद्ध मृत्यु के आने तक समाप्त नहीं होंगे। हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिये कि हम जो कोई अच्छी दशा प्राप्त कर लें, उसकी आशा से हमारे परिश्रम, चिन्ता, और संघर्ष का अन्त हो जाएगा। भूतकाल की उपलब्धियां और भूतकाल की सफलता हमें भविष्य के लिये शेष बचे काम से मुक्त नहीं करेंगी, और न ही वे भविष्य के निरन्तर परिश्रम और चिन्ता को हमारे उद्धार के लिये अनावश्यक बनाएंगी।

III. मनुष्यों को इस काम में लगने और उसे पूरा करने के लिये तैयार रहना चाहिये, चाहे यह उन्हें कितना भी बड़ा और कठिन क्यों न लगे, क्योंकि यह उनके अपने ही उद्धार के लिये है। क्योंकि,

1. कोप का जल-प्रलय अवश्य आएगा। पुरानी दुनिया के निवासियों ने यह विश्वास नहीं किया कि पृथ्वी पर वैसा जल-प्रलय आएगा जिसकी बात नूह ने उनसे की थी, यद्यपि उसने उन्हें बार-बार बताया; और न ही उन्होंने विनाश से बचने के लिये कोई सावधानी बरती।

तौभी वैसा ही जल-प्रलय आया; जिन-जिन बातों की चेतावनी नूह ने उन्हें पहले दी थी, उनमें से कोई भी असफल नहीं हुई।

इसी प्रकार इस दुष्ट संसार पर परमेश्वर के कोप का एक और भी भयानक जल-प्रलय अवश्य आएगा। हमें पवित्रशास्त्र में इसकी बार-बार चेतावनी दी जाती है, और यह संसार, उस समय की भांति, ऐसी किसी बात पर विश्वास नहीं करता। तौभी यह चेतावनी उतनी ही निश्चितता से पूरी होगी, जितनी निश्चितता से पुरानी दुनिया के विरुद्ध सुनाई गई चेतावनी पूरी हुई थी। कोप का दिन आ रहा है; यह अपने नियुक्त समय पर आएगा; यह विलम्ब नहीं करेगा, यह अपने नियुक्त समय से एक क्षण भी आगे नहीं टाला जाएगा।

2. जो कोई इस उल्लिखित बड़े काम को समय रहते हाथ में नहीं लेता और पूरा नहीं करता, वह अवश्य ही इस जल-प्रलय में डूब जाएगा। जब कोप की बाढ़ आएगी, तो वह इस दुष्ट संसार को सर्वत्र डुबा देगी: जिसने भी जहाज़ तैयार करने की सावधानी नहीं बरती, वह अवश्य ही इसमें डूब जाएगा; उसे बचने का कोई और मार्ग नहीं मिलेगा। पहाड़ियों से, और अनेक पर्वतों से व्यर्थ ही उद्धार की आशा की जाएगी; क्योंकि जल-प्रलय सब पर्वतों की चोटियों से ऊपर उठ जाएगा। या यदि वे पर्वतों की गुफाओं और खोहों में छिप जाएं, तो भी जल-प्रलय का जल उन्हें वहां भी ढूंढ लेगा, और वे वहीं दुःखपूर्वक नष्ट हो जाएंगे। जैसे पुरानी दुनिया के वे लोग नष्ट हो गए जो जहाज़ में नहीं थे (उत्पत्ति

7:21, 23), वैसे ही जिन सबने सुसमाचार के आत्मिक जहाज़ में अपने लिये स्थान सुरक्षित नहीं किया होगा, वे पुरानी दुनिया से भी कहीं अधिक दुःखपूर्वक नष्ट होंगे। निःसन्देह पुरानी दुनिया के निवासियों ने स्वयं को बचाने के लिये अनेक उपाय किए होंगे। कुछ, ऐसा हम मान सकते हैं, अपने घरों की छतों पर चढ़ गए होंगे, और एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तक धकेले जाते हुए, अन्ततः नष्ट हो गए होंगे।

अन्य ऊंचे गुम्मटों की चोटियों पर चढ़ गए होंगे; परन्तु वे भी उठती हुई बाढ़ की प्रचण्ड लहरों से वहां से बहा दिए गए होंगे। कुछ वृक्षों की चोटियों पर चढ़ गए होंगे; अन्य पर्वतों की, और विशेषकर सबसे ऊंचे पर्वतों की चोटियों पर। परन्तु सब कुछ व्यर्थ हुआ; जल-प्रलय ने देर-सबेर सबको निगल लिया; केवल नूह और उसका परिवार, जिन्होंने जहाज़ तैयार करने की सावधानी बरती थी, जीवित बचे रहे। निःसन्देह संसार के अन्त में भी ऐसा ही होगा, जब मसीह धार्मिकता से संसार का न्याय करने आएगा। कुछ लोग, जब वे ऊपर देखेंगे और उसे आकाश के बादलों में आते देखेंगे, तो अपने घरों की कोठरियों और गुप्त स्थानों में छिप जाएंगे। अन्य पृथ्वी की गुफाओं और खोहों में भागकर वहां छिपने का प्रयत्न करेंगे। अन्य चट्टानों और पर्वतों को पुकारेंगे कि वे उन पर गिर पड़ें, और उन्हें सिंहासन पर बैठनेवाले के मुख से, और मेम्ने के कोप से छिपा लें। — ऐसा ही तब होगा जब दण्ड की आज्ञा सुना दी जाएगी, और दुष्ट मनुष्य उस भयानक आग को आते देखेंगे, जो इस संसार को सदा के लिये भस्म करनेवाली है, और जो आग का ऐसा जल-प्रलय होगी कि वह पृथ्वी को पर्वतों की तलहटी तक, और उसके केन्द्र तक भी जला डालेगी। व्यवस्थाविवरण 32:22, "क्योंकि मेरे कोप की आग भड़क उठी है, और वह अधोलोक की तह तक भस्म करेगी, और पृथ्वी को उसकी उपज समेत खा डालेगी, और पहाड़ों की नींवों को भी जला देगी।" मैं कहता हूं, जब दुष्ट लोग, दण्ड की आज्ञा सुनाए जाने के बाद, इस

बड़ी आग को इस पृथ्वी पर सुलगते और फैलते देखेंगे, तो वे बचने के लिये अनेक उपाय सोचेंगे — कुछ पृथ्वी की गुफाओं और बिलों में भागेंगे, कुछ एक स्थान में, और कुछ दूसरे स्थान में छिपेंगे। परन्तु वे चाहे जहां भी छिपें, या चाहे जो भी करें, सब सर्वथा व्यर्थ होगा। हर गुफा भट्ठी की भांति जलेगी, चट्टानें और पर्वत प्रचण्ड ताप से पिघल जाएंगे, और यदि वे पृथ्वी के केन्द्र तक भी रेंगकर उतर जाएं, तो भी वह ताप उनका पीछा करेगा, और वहां भी उतनी ही प्रचण्डता से भड़केगा, जितनी सतह पर।

इसलिये जब दुष्ट मनुष्य, जिन्होंने अपने जीवनकाल में अपने बड़े काम की उपेक्षा की, और जो इस काम की कठिनाई और परिश्रम से गुजरने को तैयार नहीं थे, मृत्यु के निकट आते हैं, तो वे कभी-कभी मृत्यु से बचने के लिये बहुत कुछ करते हैं, और अपने जीवन को कम से कम थोड़ा और लम्बा करने के लिये अनेक प्रयत्न करते हैं। इस उद्देश्य से वे वैद्यों को बुलाते हैं, और सम्भवतः अनेक से सलाह ली जाती है, और उनके नुस्खों का ठीक-ठीक पालन किया जाता है। वे अपने प्राणों को नरक से बचाने के लिये भी अनेक प्रयत्न करते हैं। वे परमेश्वर की दुहाई देते हैं; अपने बीते हुए पापों को मान लेते हैं; भविष्य में सुधरने की प्रतिज्ञा करते हैं; और, आह, अपने जीवन में थोड़ी सी वृद्धि के लिये, या भविष्य के सुख की कुछ आशा के लिये, वे क्या न दे देते! परन्तु सब कुछ व्यर्थ सिद्ध होता है: परमेश्वर ने उनके दिन गिन लिए हैं और उन्हें पूरा कर दिया है; और चूंकि उन्होंने अनुग्रह के दिन को पाप में गंवा दिया, इसलिये उन्हें इसका परिणाम सहना ही होगा, और सदा के लिये शोक में पड़े रहना होगा।

3. जब विनाश आएगा, तो वह अनन्त रूप से भयानक होगा। जल-प्रलय के द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश भयानक था; परन्तु दुष्टों पर आनेवाला वह अनन्त विनाश उससे कहीं अधिक भयानक है। वह जल का प्रलय तो परमेश्वर के प्रतिशोध की इस भयानक बाढ़ की केवल एक छाया मात्र था। जब जल फुहारों या झरनों की भांति, या किसी बड़ी नदी के गिरने की भांति, वर्षा से कहीं अधिक वेग से बरसा; तो वहां परमेश्वर के कोप का कैसा भयानक दृश्य रहा होगा! तौभी यह तो केवल परमेश्वर के उस भयानक प्रकोप की एक छाया मात्र है, जो दुष्ट मनुष्यों पर सदा, हां सदा-सर्वदा के लिये होगा। और जब गहरे सागर के सोते फूट पड़े, और जल भूमि से इस प्रकार फूट निकला मानो वे गर्भ से निकल रहे हों

(अय्यूब 38:8), यह परमेश्वर के कोप के उन शक्तिशाली प्रकोपों की एक छाया थी, जो तब होंगे जब कोप के जलद्वार खोल दिए जाएंगे। हम कितना अनुमान लगा सकते हैं कि पुरानी दुनिया के दुष्ट लोगों ने कितना पछताया होगा कि उन्होंने नूह की दी हुई चेतावनियों पर कान नहीं धरा, जब उन्होंने ये भयानक बातें देखीं, और देखा कि उन्हें नष्ट होना ही है! आप कितना अधिक पछताएंगे कि आपने सुसमाचार की अनुग्रहकारी चेतावनियों पर कान न धरा, जब आप स्वर्ग से बरसती हुई, और पृथ्वी की गहराइयों से हर ओर फूट निकलती हुई परमेश्वर के कोप की आग को अपने विरुद्ध देखेंगे!

4. यद्यपि मनुष्य के उद्धार के लिये आवश्यक काम एक बड़ा काम है, तौभी यह असम्भव नहीं है। नूह से जो अपेक्षित था, वह निःसन्देह एक बहुत बड़ा और कठिन काम प्रतीत हुआ होगा। तौभी उसने इसे दृढ़ संकल्प के साथ हाथ में लिया, और वह इसमें अन्त तक स्थिर रहा। इसी प्रकार यदि हम भी इसी सद्भावना और संकल्प के साथ इस काम को हाथ में लें, तो हम निश्चय ही सफल होंगे। चाहे यह कितना ही कठिन क्यों न हो, तौभी अनगिनत लोग इससे गुजर चुके हैं, और इसी साधन से उद्धार पा चुके हैं। यह हमारे स्वभाव की क्षमताओं से परे कोई काम नहीं है, और न ही उन अवसरों से परे है जो परमेश्वर हमें देता है। यदि मनुष्य केवल चेतावनी माने, और सम्मति पर कान धरें, यदि वे केवल सच्चे और पूरी लगन से हों, अपने काम में समयानुकूल हों, अपने अवसरों का लाभ उठाएं, अपने साधनों का उपयोग करें, स्थिर रहें, और डांवाडोल न हों; तो वे असफल नहीं होंगे।

इस सिद्धान्त से मैं जो उपयोग करना चाहता हूं, वह यह है कि सभी को उस बड़े काम को हाथ में लेने और पूरा करने के लिये उत्साहित करूं, जो उन्हें अपने उद्धार के लिये करना है, चाहे यह काम कितना ही बड़ा और कठिन क्यों न प्रतीत हो। यदि आपका स्वभाव इससे विमुख हो, और मार्ग में बहुत भयानक बातें प्रतीत हों, यहां तक कि उनकी सम्भावना से आपका मन टूटने लगे; तौभी जो कुछ कहा गया है, उस पर गम्भीरता से विचार कीजिये, और बुद्धिमानी का व्यवहार कीजिये। क्योंकि यह आपके ही लिये, आपके अपने ही उद्धार के लिये है; क्योंकि यह इतने बड़े उद्धार के लिये है, आपके अनन्त विनाश से बचाव के लिये है; और क्योंकि आपके उद्धार के लिये यह इतनी अनिवार्य आवश्यकता है, कि परमेश्वर के कोप का जल-प्रलय अवश्य आएगा, और बिना जहाज़ तैयार किए उससे बचना सम्भव नहीं होगा; तो क्या आपके लिये यही सबसे अच्छा नहीं कि आप इस काम को हाथ में लें, अपनी पूरी शक्ति से इसमें लगें, और इसे पूरा करें, चाहे यह बिना बड़े परिश्रम, चिन्ता, कठिनाई, और व्यय के सम्भव न हो?

मैं इस काम के विषय में आपको किसी भी रीति से चापलूसी नहीं करना चाहता, न ही आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आपको यह एक सहज और हल्का काम लगेगा: नहीं, मैं नहीं चाहता कि आप ऐसी किसी बात की आशा रखें।

मैं चाहता हूं कि आप बैठकर इसका मूल्य आंक लें; और यदि आपका मन एक बड़े, कठिन, परिश्रमी, और खर्चीले काम में लगने, और जीवन के अन्त तक उसमें स्थिर बने रहने के लिये तैयार नहीं होता, तो धार्मिक होने का दिखावा मत कीजिये। अपने आराम में डूब जाइये; अपने सुखों के पीछे चलिये; खाइये, पीजिये, और आनन्द मनाइये; यहां तक कि उसी रीति से नरक जाना निश्चित कर लीजिये, और फिर कभी अपने उद्धार को खोजने का दिखावा मत कीजिये। यहां कुछ विशेष बातों पर विचार कीजिये।

1. आपको परमेश्वर के आते हुए कोप के जल-प्रलय की कितनी बार चेतावनी दी गई है। आपको नरक के विषय में कितनी बार बताया गया है, आपके सामने परमेश्वर के वचन की धमकियां कितनी बार सुनाई गई हैं, और आपको आनेवाले कोप से भागने की चेतावनी कितनी बार दी गई है। आपकी दशा वैसी ही है जैसी पुरानी दुनिया के निवासियों की थी। नूह ने उन्हें आते हुए जल-प्रलय की भरपूर चेतावनी दी, और उन्हें अपनी सुरक्षा के लिये सावधान रहने की सलाह दी (1 पतरस 3:19, 20)। नूह ने उन्हें वचनों में चेतावनी दी; और उसने उन्हें प्रचार किया। उसने उन्हें अपने कामों के द्वारा भी चेतावनी दी। उसका जहाज़ बनाना, जिसमें उसे इतना लम्बा समय लगा, और जिसमें उसने इतने हाथ लगाए, उनके लिये एक स्थायी चेतावनी था। उस निर्माण के दौरान हथौड़े और कुल्हाड़ी की हर चोट, पुरानी दुनिया के लिये आते हुए विनाश से बचाव हेतु सावधान रहने के लिये उतने ही पुकार और चेतावनियां थीं। कारीगरों की हर खटखट यीशु मसीह की उनके हृदय के द्वार पर दस्तक थी: परन्तु उन्होंने कान न धरा। ये सब चेतावनियां, यद्यपि प्रतिदिन दोहराई गईं, और इतने लम्बे समय तक जारी रहीं, तौभी कुछ काम न आईं।

अब, क्या आपकी दशा भी बहुत कुछ वैसी ही नहीं है, जैसी उनकी थी? आपको कितनी बार चेतावनी दी गई है!

आपने इतने वर्षों से, सप्ताह दर सप्ताह, सुसमाचार की चेतावनी भरी दस्तकें कैसी सुनी हैं! तौभी आप में से कुछ ने उन पर उतना ही ध्यान दिया है जितना पुरानी दुनिया के निवासियों ने नूह के जहाज़ में कारीगरों के औज़ारों की आवाज़ पर ध्यान दिया था!

आपत्ति। परन्तु यहां सम्भवतः कोई यह आपत्ति उठा सकता है, कि यद्यपि यह सत्य है कि उन्हें बार-बार नरक के विषय में बताया गया है, तौभी उन्होंने उसे कभी देखा नहीं, और इसलिये वे यह नहीं समझ सकते कि ऐसा कोई स्थान सचमुच है। उन्होंने बार-बार नरक के विषय में सुना है, और उन्हें बताया गया है कि दुष्ट मनुष्य, मरने पर, एक अत्यन्त भयानक पीड़ा के स्थान में जाते हैं; कि इसके बाद न्याय का एक दिन होगा, और यह संसार आग से भस्म हो जाएगा। परन्तु उन्हें कैसे पता चले कि यह सचमुच ऐसा ही है? उन्हें कैसे पता चले कि मरनेवाले उन दुष्ट मनुष्यों का क्या होता है? उनमें से कोई भी वापस आकर उन्हें नहीं बताता। उनके पास केवल उस वचन के अतिरिक्त, जो वे सुनते हैं, और कुछ नहीं जिस पर निर्भर रहें। और उन्हें कैसे पता चले कि यह सब चतुराई से गढ़ी गई कोई कहानी नहीं है?

उत्तर। पुरानी दुनिया के पापियों को भी वही आपत्ति थी, जो नूह ने उन्हें संसार को डुबा देनेवाले जल-प्रलय के विषय में बताया था। तौभी परमेश्वर का केवल वचन ही यह प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त सिद्ध हुआ कि ऐसी बात आनेवाली है। उस समय पृथ्वी पर के अनगिनत लोगों में से किसी ने भी नूह की बात पर विश्वास क्यों नहीं किया, इसका और क्या कारण था, सिवाय इसके कि यह एक अनोखी बात थी, कि ऐसी बात पहले कभी सुनी नहीं गई थी? और नूह की वह कहानी उन्हें कैसी अनोखी लगी होगी, जिसमें उसने उन्हें पर्वतों की चोटियों से ऊपर उठनेवाले जल-प्रलय की बात बताई! इसीलिये इब्रानियों 11:7 में कहा गया है कि "नूह ने उन बातों के विषय में जो अब तक देखी नहीं गई थीं, परमेश्वर से चेतावनी पाई।" सम्भव है कि कोई भी यह कल्पना नहीं कर सका होगा कि सारा संसार जल-प्रलय में कैसे डूब सकता है; और सब यह पूछने को तैयार रहे होंगे, कि इसके लिये इतना जल कहां से आएगा; और यह किस साधन से पृथ्वी पर लाया जाएगा। नूह ने उन्हें यह नहीं बताया कि यह कैसे पूरा होगा; उसने केवल उन्हें यह बताया कि परमेश्वर ने कहा है कि यह होगा: और यही पर्याप्त सिद्ध हुआ। इस घटना ने उनकी उस मूर्खता को प्रकट किया कि उन्होंने परमेश्वर के केवल वचन पर निर्भर न रहकर मूर्खता की, जो समर्थ था, जो यह जानता था कि इसे कैसे पूरा करना है, और जो झूठ नहीं बोल सकता था।

उसी प्रकार परमेश्वर का वचन सत्य सिद्ध होगा, जब वह सब दुष्टों को डुबा देनेवाले अनन्त कोप के जल-प्रलय की धमकी देता है। आप इसे तब विश्वास करेंगे जब घटना इसे प्रमाणित कर देगी, जब इस विश्वास से लाभ उठाने में बहुत देर हो चुकी होगी। परमेश्वर का वचन कभी असफल नहीं होगा; इससे अधिक निश्चित और कुछ नहीं: आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु परमेश्वर का वचन कभी नहीं टलेगा। यह पीतल के पहाड़ों से भी अधिक दृढ़ है। अन्त में, दर्शन बोलेगा और झूठ नहीं बोलेगा। यह वचन पूरा होकर रहेगा, और सब दुष्ट मनुष्य जान लेंगे कि परमेश्वर ही प्रभु है, कि वह सत्य का परमेश्वर है, और जो उसके वचन पर निर्भर नहीं रहते, वे मूर्ख हैं। पुरानी दुनिया के दुष्ट लोग

नूह को इसलिये मूर्ख समझते थे कि उसने परमेश्वर के वचन पर इतना निर्भर होकर स्वयं को जहाज़ बनाने के सारे परिश्रम और व्यय में डाल दिया; परन्तु घटना ने दिखा दिया कि वे स्वयं ही मूर्ख थे, और वह बुद्धिमान था।

2. विचार कीजिये कि परमेश्वर का आत्मा सदा आपसे विवाद करता नहीं रहेगा; और न ही उसका धीरज सदा आपकी बाट जोहता रहेगा। परमेश्वर ने पुरानी दुनिया के निवासियों के विषय में ऐसा ही कहा था (उत्पत्ति

4:3), "मेरा आत्मा सदा तक मनुष्य से विवाद करता न रहेगा, क्योंकि वह भी शरीर ही है; तौभी उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी।" इतने समय तक परमेश्वर उनके साथ विवाद करता रहा। यह उनके लिये अनुग्रह का दिन था, और इतने समय तक परमेश्वर का धीरज उनकी बाट जोहता रहा: 1 पतरस 3:20, "जो कभी आज्ञा न माननेवाले थे, जब कि नूह के दिनों में जहाज़ के बनते समय परमेश्वर का धीरज ठहरा रहा।" इतने समय तक उनके पास बचने का अवसर था, यदि वे केवल कान धरें और परमेश्वर पर विश्वास करें। जहाज़ पूरा हो जाने के बाद भी, जो जल-प्रलय के आने से कुछ ही पहले हुआ प्रतीत होता है, फिर भी एक अवसर था; जहाज़ का द्वार कुछ समय तक खुला रहा। कुछ समय ऐसा था जिसमें नूह जहाज़ में सामग्री जमा करने में लगा रहा। तब भी बहुत देर नहीं हुई थी; जहाज़ का द्वार तब भी खुला रहा। — जल-प्रलय आने से लगभग एक सप्ताह पहले, नूह को पशुओं और पक्षियों को इकट्ठा करना आरम्भ करने की आज्ञा दी गई। इस अन्तिम सप्ताह के दौरान भी जहाज़ का द्वार खुला रहा। परन्तु जिस दिन जल-प्रलय आना आरम्भ हुआ, जब वर्षा अभी रुकी हुई थी, नूह और उसकी पत्नी, उसके तीन पुत्र, और उनकी पत्नियां जहाज़ में चली गईं; और हमें बताया गया है (उत्पत्ति 7:16) कि "परमेश्वर ने उसे भीतर बन्द कर दिया।" तब परमेश्वर के धीरज का दिन बीत गया; जहाज़ का द्वार बन्द कर दिया गया; परमेश्वर ने स्वयं, जो बन्द करता है और कोई नहीं खोलता, द्वार बन्द कर दिया। तब उनके जल-प्रलय से बचने की सब आशा जाती रही; अब पछताने में बहुत देर हो चुकी थी कि उन्होंने नूह की चेतावनियों पर कान क्यों नहीं धरा, और द्वार खुला रहते हुए जहाज़ में प्रवेश क्यों नहीं किया।

नूह और उसके परिवार के जहाज़ में प्रवेश कर जाने और परमेश्वर द्वारा उन्हें भीतर बन्द कर दिए जाने के बाद, आकाश की खिड़कियां खुल जाने पर, और उन्होंने देखा कि जल आकाश से किस प्रकार उंडेला जा रहा है, तो हम मान सकते हैं कि आस-पास रहनेवाले अनेक लोग दौड़कर जहाज़ के द्वार पर आए, खटखटाते हुए, और प्रवेश के लिये अत्यन्त दयनीय रीति से पुकारते हुए। परन्तु बहुत देर हो चुकी थी; परमेश्वर ने स्वयं द्वार बन्द कर दिया था, और नूह के पास इसे खोलने की न तो अनुमति थी, और सम्भवतः न ही शक्ति। हम मान सकते हैं कि वे खटखटाते और पुकारते हुए खड़े रहे: हमारे लिये खोल दो, हमारे लिये खोल दो; हे, हमें भीतर आने दो; हम विनती करते हैं कि हमें भीतर आने दिया जाए। और सम्भवतः उनमें से कुछ ने नूह के साथ पुरानी जान-पहचान की दुहाई दी हो; कि वे सदा उसके पड़ोसी रहे थे, और उन्होंने तो जहाज़ बनाने में उसकी सहायता भी की थी। परन्तु सब कुछ व्यर्थ हुआ। वे वहीं खड़े रहे जब तक जल-प्रलय का जल आ न गया, और उसने बिना दया दिखाए उन्हें जहाज़ के द्वार से बहा ले गया।

यही आपके साथ भी होगा, यदि आप उन चेतावनियों पर कान धरने से इन्कार करते रहें जो आपको दी जा रही हैं। अभी परमेश्वर आपके साथ विवाद कर रहा है; अभी वह आपको आते हुए जल-प्रलय की चेतावनी दे रहा है, और सप्ताह दर सप्ताह आपको बुला रहा है। अभी जहाज़ का द्वार खुला है। परन्तु परमेश्वर का

आत्मा सदा आपसे विवाद करता नहीं रहेगा; उसका धीरज सदा आपकी बाट जोहता नहीं रहेगा। परमेश्वर के धीरज का एक नियुक्त दिन है, जो उतना ही निश्चित रूप से सीमित है जितना वह पुरानी दुनिया के लिये था।

परमेश्वर ने आपकी सीमाएं ठहरा दी हैं, जिन्हें आप पार नहीं कर सकते। यद्यपि अभी चेतावनियां भरपूर मात्रा में जारी हैं, तौभी अन्तिम दस्तकें और अन्तिम पुकारें भी आएंगी, जो आप कभी सुन सकेंगे उनमें से अन्तिम। जब नियुक्त समय बीत जाएगा, तो परमेश्वर द्वार बन्द कर देगा, और आप उसे फिर कभी खुला हुआ न देखेंगे; क्योंकि परमेश्वर बन्द करता है, और कोई नहीं खोलता। — यदि आप उस समय से पहले अपने अवसर का लाभ नहीं उठाते, तो आप व्यर्थ ही पुकारेंगे, "हे प्रभु, हे प्रभु, हमारे लिये खोल दे" (मत्ती 25:11, और लूका 23:25, इत्यादि)।

जब आप द्वार पर खड़े होकर दयनीय रीति से पुकार रहे होंगे, तब परमेश्वर के कोप का जल-प्रलय आप पर आ पड़ेगा, आपको डुबा देगा, और आप बच नहीं सकेंगे। आंधी आपको बिना दया दिखाए बहा ले जाएगी, और आप सदा के लिये निगल लिए जाएंगे और नष्ट हो जाएंगे।

3. विचार कीजिये कि जब परमेश्वर के कोप की लहरें आएंगी, तो वे कितनी शक्तिशाली होंगी। नूह के जल-प्रलय का जल अत्यन्त विशाल था। वह प्रलय विशाल था; वह बहुत गहरा था; लहरें सबसे ऊंचे पर्वतों से पन्द्रह हाथ ऊपर तक पहुंच गई थीं; और वह एक ऐसा सागर था जिसका कोई किनारा नहीं था;

यह उस कोप की महानता को दर्शाता है जो दूसरे लोक में दुष्ट मनुष्यों पर आनेवाला है, जो उन्हें डुबा देनेवाले जल के एक शक्तिशाली प्रलय के समान होगा, और उनके सिरों से बहुत ऊपर उठेगा, और जिसकी लहरें स्वर्ग तक पहुंचेंगी। वे लहरें उनकी बेचारी आत्माओं पर पर्वतों से भी ऊंची और भारी होंगी। परमेश्वर का कोप एक ऐसा सागर होगा जिसका कोई किनारा नहीं, जैसा नूह का जल-प्रलय था: यह ऐसा दुःख होगा जिसका कोई अन्त नहीं होगा। नरक में दण्ड पाए हुओं के दुःख को इससे बेहतर और किसी रूप में प्रकट नहीं किया जा सकता, सिवाय दुःख के एक प्रलय के, कोप के एक शक्तिशाली प्रलय के, जो जल के प्रलय से दस हजार गुना अधिक भयानक होगा; क्योंकि यह पिघली हुई आग का प्रलय होगा, जिसे पवित्रशास्त्र में आग और गन्धक की झील कहा गया है। — संसार के अन्त में सब दुष्ट लोग आग के एक विशाल प्रलय में निगल लिए जाएंगे, जो नूह के जल-प्रलय के समान ही विशाल और शक्तिशाली होगा। देखिये 2 पतरस 3:5, 6, 7। इसके बाद दुष्टों की बेचारी आत्माओं और उनकी दुःखी, यातनाग्रस्त देहों पर आग और गन्धक की शक्तिशाली लहरें अनन्त काल तक लुढ़कती रहेंगी। उन लहरों को आग और गन्धक के विशाल पिघले हुए पर्वत कहा जा सकता है। और जब एक लहर उनके सिरों के ऊपर से गुजर जाएगी, तो बिना रुके दूसरी लहर आ जाएगी, जो उन्हें दिन-रात सदा-सर्वदा कोई विश्राम नहीं देगी।

4. कोप का यह जल-प्रलय सम्भवतः आप पर अचानक आ पड़ेगा, जब आप सब इसके विषय में बहुत कम सोच रहे होंगे, और यह आपसे दूर प्रतीत हो रहा होगा। पुरानी दुनिया पर भी जल-प्रलय इसी प्रकार आया था। देखिये मत्ती 24:36,

इत्यादि। सम्भवतः उनमें से अनेक रात में उस समय चकित रह गए होंगे जब जल अचानक उनके द्वारों में, या उनके घरों की नींवों के नीचे से फूट पड़ा, और उनकी शय्याओं पर ही उन पर आ पड़ा।

क्योंकि जब गहरे सागर के सोते फूट पड़े, तो जल, जैसा पहले कहा जा चुका है, प्रचण्ड धाराओं में फूट निकला। पुरानी दुनिया के दुष्टों के रात में इसी प्रकार अचानक चकित हो जाने की ओर सम्भवतः अय्यूब 27:20 संकेत करता है, "भय की धाराएं उसे बहा ले जाती हैं, आंधी उसे रात ही में उड़ा ले जाती है।" इसी प्रकार विनाश उन दुष्ट मनुष्यों पर आया करता है, जो आते हुए विनाश की अनेक चेतावनियां सुनते हैं, तौभी उनसे प्रभावित नहीं होते। क्योंकि "जो मनुष्य बार-बार डांटे जाने पर भी हठ करता है, वह अचानक नाश हो जाएगा, और उसका उपाय न रहेगा" (नीतिवचन 29:1)। और "जब वे कहते होंगे, कुशल और निडरता है; उस समय जच्चा को पीड़ा की भांति उन पर अचानक विनाश आ पड़ेगा, और वे किसी रीति से न बचेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों)।

5. यदि आप आते हुए विनाश की उन अनेक चेतावनियों पर कान नहीं धरेंगे जो आपको दी जा रही हैं, तो आप पशुओं की सी मूर्खता से भी बढ़कर दोषी ठहरेंगे। "बैल अपने मालिक को पहचानता है, और गदहा अपने स्वामी की चरनी को।" वे यह जानते हैं कि वे किस पर निर्भर हैं, और किसकी आज्ञा माननी है, और उसी के अनुसार व्यवहार करते हैं। परन्तु आप, जब तक अपने ही उद्धार की उपेक्षा करते हैं, ऐसा व्यवहार करते हैं मानो आप न तो अपने सृष्टिकर्ता और स्वामी परमेश्वर को जानते हों, और न ही उस पर अपनी निर्भरता को। पशु भी, जब वे आते हुए तूफान के चिह्न देखते हैं, तो शरण के लिये अपनी माँदों में चले जाते हैं। तौभी आप, परमेश्वर के प्रतिशोध के आते हुए तूफान की भरपूर चेतावनी पाकर भी, तूफान से बचने के लिये शरण-स्थान की ओर, और आंधी से आड़ की ओर नहीं भागेंगे।

गौरैया, अबाबील, और अन्य पक्षी, जब उन्हें आते हुए जाड़े की पूर्व-चेतावनी मिलती है, तो वे अपने आपको एक अधिक अनुकूल जलवायु में ले जाते हैं। तौभी आप, जिन्हें परमेश्वर के कोप के छेदनेवाले झोंकों की बार-बार पूर्व-चेतावनी दी गई है, उनसे बचने के लिये उस नये यरूशलेम में, जिसकी वायु अत्यन्त मृदु और स्वास्थ्यकर है, प्रवेश नहीं करेंगे, यद्यपि द्वार आपको ग्रहण करने के लिये चौड़ा खुला है। चींटियां भी ग्रीष्मकाल में जाड़े के लिये संचय करने में तत्पर रहती हैं: तौभी आप आनेवाले समय के लिये एक अच्छी नींव जमा करने के लिये कुछ भी नहीं करेंगे। बिलाम की गदही खिंची हुई तलवार पर दौड़ने को तैयार न हुई, यद्यपि उसका स्वामी, लाभ के लिये, परमेश्वर के कोप की तलवार के सामने स्वयं को उजागर करने को तैयार था; और इस प्रकार परमेश्वर ने उस गूंगी गदही से, शब्दों और कामों दोनों में, उस भविष्यद्वक्ता की मूर्खता को डांटा (1 पतरस 2:16)। इसी प्रकार आप, यद्यपि आपको बार-बार यह चेतावनी दी गई है कि परमेश्वर के कोप की तलवार आपके विरुद्ध खिंची हुई है, और यदि आप अपनी वर्तमान चाल पर चलते रहे, तो निश्चय ही आपके आर-पार निकाल दी जाएगी, तौभी आप परिणाम की चिन्ता किए बिना उसी पर चलते रहते हैं।

इसी प्रकार परमेश्वर ने पुरानी दुनिया के पशुओं और पक्षियों से भी उस समय के मनुष्यों की मूर्खता को डांटा: क्योंकि वे, यहां तक कि उनकी हर जाति के प्राणी, द्वार खुला रहते हुए ही जहाज़ में भाग गए; जो उस समय के मनुष्यों ने करने से इन्कार कर दिया; परमेश्वर इस प्रकार यह दिखाता है कि उनकी मूर्खता निरे पशु प्राणियों की मूर्खता से भी बढ़कर थी। — ऐसी ही मूर्खता और पागलपन के आप भी दोषी हैं, जो परमेश्वर के कोप के आते हुए जल-प्रलय के विषय में दी गई चेतावनियों पर कान धरने से इन्कार करते हैं।

आपको आज एक बार फिर चेतावनी दी गई है, जबकि जहाज़ का द्वार अभी भी खुला है।

आपने मानो एक बार फिर जहाज़ के निर्माण में हथौड़े और कुल्हाड़ी की दस्तकें सुनी हैं, जो आपको यह स्मरण दिलाने के लिये हैं कि एक जल-प्रलय निकट आ रहा है। इसलिये सावधान रहिये कि आप अपने कान बन्द न करें, इन चेतावनियों को उपेक्षा के हृदय से न लें, और उस बड़े काम की उपेक्षा न करते रहें जो आपको करना है, कहीं ऐसा न हो कि कोप का जल-प्रलय अचानक आप पर आ पड़े, आपको बहा ले जाए, और फिर कोई उपाय न रहे।

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