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पहली आज्ञा
मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है। तू मेरे सामने दूसरों को ईश्वर करके न मानना।
13. आप पहले वाक्य को आज्ञा का एक भाग मानें या उसे अलग पढ़ें, मेरे लिए यह कोई महत्त्व की बात नहीं, बशर्ते आप यह स्वीकार करें कि वह सम्पूर्ण व्यवस्था की एक प्रकार की प्रस्तावना है। व्यवस्थाएँ बनाते समय सबसे पहले इस बात से सावधान रहना चाहिए कि कहीं वे तिरस्कार के कारण तुरन्त रद्द न हो जाएँ। इसलिए प्रभु सबसे पहले यह ध्यान रखता है कि जो व्यवस्था दी जानेवाली है उसके साथ ऐसा न हो; वह उसे तिहरी पुष्टि के साथ आरम्भ करता है। वह अपने लिए आज्ञा देने की शक्ति और अधिकार का दावा करता है, ताकि चुनी हुई प्रजा के मन में आज्ञाकारिता की अनिवार्यता बैठा दे; वह अनुग्रह की प्रतिज्ञा सामने रखता है, ताकि उन्हें पवित्रता के अभ्यास की ओर आकर्षित करे; और वह अपने उपकार का स्मरण कराता है, ताकि यदि वे उचित प्रतिफल न दें तो उन्हें कृतघ्न ठहराए। “प्रभु” नाम से सामर्थ्य और वैध प्रभुत्व का बोध होता है। यदि सब कुछ उसी की ओर से है और उसी में स्थिर है, तो न्याय यही है कि सब कुछ उसी की ओर लौटे, जैसा पौलुस कहता है (रोमियों 11:36)। इसलिए यह नाम अपने आप में हमें दिव्य महिमा के अधिकार के अधीन करने के लिए पर्याप्त है; क्योंकि जिसके बिना हम अस्तित्व में भी नहीं रह सकते, उसके प्रभुत्व से निकल जाने की इच्छा करना अत्यन्त अस्वाभाविक होगा।
14. यह दिखा देने के बाद कि उसे आज्ञा देने और अपनी आज्ञा मनवाने का अधिकार है, वह आगे, इसलिए कि मनुष्यों को केवल बाध्यता से घसीटता हुआ न लगे बल्कि उन्हें आकर्षित करे, कृपापूर्वक घोषणा करता है कि वह कलीसिया का परमेश्वर है। क्योंकि इस कथन-शैली का आशय यह है कि प्रतिज्ञा में पारस्परिक सम्बन्ध सम्मिलित है: “मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे” (यिर्मयाह 31:33)। इसी कारण मसीह अब्राहम, इसहाक और याकूब की अमरता का निष्कर्ष इस बात से निकालता है कि परमेश्वर ने अपने आपको उनका परमेश्वर कहा था (मत्ती 22:32)। इसलिए यह वैसा ही है मानो उसने कहा हो: मैंने तुम्हें अपने लिए ऐसी प्रजा करके चुना है जिसकी भलाई मैं केवल इस जीवन में ही नहीं करूँगा, परन्तु आनेवाले जीवन में भी उन्हें परमानन्द दूँगा। इसका जो उद्देश्य है, उसकी ओर व्यवस्था में अनेक स्थानों पर संकेत किया गया है। क्योंकि जब प्रभु दया करके हमें इतना सम्मान देने को झुकता है कि हमें अपनी चुनी हुई प्रजा की सहभागिता में ले लेता है, तब, जैसा मूसा कहता है, वह हमें “पवित्र प्रजा”, “अपनी निज प्रजा” होने के लिए चुनता है, कि हम “उसकी सब आज्ञाओं को मानें” (व्यवस्थाविवरण 7:6; 14:2; 26:18)। इसी से यह उपदेश निकलता है: “तुम पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं, तुम्हारा परमेश्वर यहोवा, पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 19:2)। इन्हीं दो विचारों पर वह उलाहना आधारित है: “पुत्र पिता का, और दास स्वामी का आदर करता है; यदि मैं पिता हूँ, तो मेरा आदर मानना कहाँ है? और यदि मैं स्वामी हूँ, तो मेरा भय मानना कहाँ है? सेनाओं का यहोवा यह कहता है” (मलाकी 1:6)।
15. इसके बाद उसके उपकार का स्मरण आता है, जिसे हम पर उतना ही गहरा प्रभाव डालना चाहिए जितनी घृणा से कृतघ्नता को मनुष्यों में भी देखा जाता है। यह सच है कि वह इस्राएल को एक ऐसे छुटकारे की याद दिला रहा था जो तब हाल का ही था; परन्तु अपनी अद्भुत महानता के कारण वह दूर-से-दूर की पीढ़ियों तक सदा स्मरणीय बना रहनेवाला था। इसके अतिरिक्त, यह प्रस्तुत विषय के लिए अत्यन्त उपयुक्त है। [197] क्योंकि प्रभु यह जताता है कि वे दुःखदायी दासत्व से इसलिए छुड़ाए गए कि वे अपनी स्वतंत्रता के कर्ता के रूप में उसके प्रति तत्परता से अधीनता और आज्ञाकारिता सीखें। इसी प्रकार, हमें अपनी सच्ची आराधना में बनाए रखने के लिए वह प्रायः अपने आपको कुछ ऐसी उपाधियों से बताता है जो उसके पवित्र ईश्वरत्व को सब मूर्तियों और कल्पित देवताओं से अलग करती हैं। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा, हम व्यर्थता और अहंकार की ओर ऐसे झुके हुए हैं कि ज्यों ही परमेश्वर का नाम लिया जाता है, हमारे मन, भ्रम से अपने को बचा न पाने के कारण, तुरन्त किसी खोखली भ्रान्ति की ओर उड़ जाते हैं। इस रोग का उपचार करते हुए परमेश्वर अपने ईश्वरत्व को कुछ विशेष नामों से पहचान कराता है, और इस प्रकार मानो हमें निश्चित सीमाओं के भीतर रोक लेता है, ताकि हम इधर-उधर भटककर, जीवित परमेश्वर को छोड़कर और मूर्ति खड़ी करके, अपने लिए कोई नया देवता न गढ़ लें। इसी कारण, जब कभी भविष्यद्वक्ता उसे हमारे सामने ठीक रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, तब वे उसे उन्हीं लक्षणों से सजाते और मानो घेर देते हैं जिनके अधीन उसने अपने आपको इस्राएल की प्रजा पर प्रकट किया था। जब वह अब्राहम का परमेश्वर या इस्राएल का परमेश्वर कहलाता है, जब उसे यरूशलेम के मन्दिर में करूबों के बीच स्थापित बताया जाता है, तो ये और इसी प्रकार की अन्य कथन-शैलियाँ [198] उसे किसी एक स्थान या किसी एक जाति में सीमित नहीं करतीं, परन्तु केवल इसलिए प्रयोग की गई हैं कि हमारे विचार उस परमेश्वर पर टिकें जिसने इस्राएल के साथ बाँधी हुई वाचा में अपने आपको इस प्रकार प्रकट किया कि वहाँ दिए गए उसके स्वरूप के कठोर चित्रण से किसी भी कारण हटना अनुचित ठहरता है। इसलिए यह समझ लिया जाए कि छुटकारे का उल्लेख इसीलिए हुआ है कि यहूदी उस परमेश्वर के अधीन अधिक तत्परता से हों जो उन पर न्यायसंगत रूप से अपना अधिकार जताता है। हम भी, यह मान बैठने के बदले कि यह बात हमसे सम्बन्ध नहीं रखती, यह विचार करें कि मिस्र में इस्राएल की दासता उस आत्मिक दासता का प्रतीक थी जिसकी बेड़ियों में हम सब तब तक जकड़े रहते हैं जब तक स्वर्गीय छुड़ानेवाला अपनी भुजा के बल से हमें छुड़ाकर अपने स्वतंत्र राज्य में नहीं पहुँचा देता। इसलिए जैसे प्राचीन काल में, जब वह बिखरे हुए इस्राएलियों को अपने नाम की आराधना के लिए इकट्ठा करना चाहता था, उसने उन्हें फिरौन के असह्य अत्याचार से छुड़ाया, वैसे ही अब जो उसे मानते हैं वे सब शैतान के घातक अत्याचार से छुड़ाए गए हैं, जिसका मिस्र का अत्याचार केवल एक प्रतीक था। इसलिए ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसके मन को व्यवस्था पर ध्यान देने के लिए जागृत न होना चाहिए, जिसके विषय में उसे बताया जाता है कि वह परम राजा की ओर से आई है, उसकी ओर से जिसने सबको अस्तित्व दिया और जो न्यायसंगत रूप से सबको अपनी ओर, उनके सच्चे अन्त के रूप में, ठहराता और चलाता है। मैं कहता हूँ, ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसे उस व्यवस्था-दाता को ग्रहण करने के लिए शीघ्रता न करनी चाहिए जिसकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए वह जानता है कि वह विशेष रूप से ठहराया गया है, जिसकी कृपा से वह सब भलाइयों की बहुतायत और धन्य अमरता तक की आशा रखता है, और जिसकी अद्भुत सामर्थ्य और दया के कारण वह मृत्यु के जबड़ों से छुटकारे का ऋणी है। [199]
16. व्यवस्था का अधिकार स्थापित और दृढ़ हो जाने पर परमेश्वर अपनी पहली आज्ञा देता है—
तू मेरे सामने दूसरों को ईश्वर करके न मानना।
इस आज्ञा का आशय यह है कि प्रभु चाहता है कि उसकी प्रजा में केवल वही ऊँचा किया जाए, और वह उन पर पूर्ण स्वामित्व का दावा अपने लिए करता है। ऐसा हो सके, इसलिए वह हमें आज्ञा देता है कि हम हर प्रकार की अभक्ति और अन्धविश्वास से दूर रहें, जिनसे उसके ईश्वरत्व की महिमा घटती या धुंधली होती है; और उसी कारण वह माँग करता है कि हम सच्चे भक्तिमय उत्साह से उसकी उपासना और आराधना करें। प्रयुक्त सीधे शब्दों का अर्थ स्पष्टतः यही है। क्योंकि जब हम परमेश्वर को उसकी सब वस्तुओं को अपनाए बिना ग्रहण नहीं कर सकते, तब पराए देवता रखने के निषेध का अर्थ यह है कि जो कुछ उसका है उसमें से कुछ भी किसी और को न दिया जाए। परमेश्वर के प्रति हमारे कर्तव्य असंख्य हैं, परन्तु उन्हें उचित रूप से चार शीर्षकों में बाँटा जा सकता है: आराधना (जिसके साथ विवेक की आत्मिक अधीनता भी जुड़ी है), भरोसा, प्रार्थना और धन्यवाद। [200] आराधना से मेरा अभिप्राय उस श्रद्धा और उपासना से है जो हम तब उसे अर्पित करते हैं जब उसकी महिमा के सामने दण्डवत् करते हैं; और इसी कारण मैं अपने विवेकों को उसकी व्यवस्था के अधीन करने को भी उसका एक भाग मानता हूँ। [201] भरोसा उसके गुणों को पहचानकर उसमें निश्चिन्त विश्राम करना है, जब हम सब सामर्थ्य, बुद्धि, न्याय, भलाई और सत्य उसी को मानकर अपने आपको इस बात में धन्य समझते हैं कि हम उसकी संगति में लाए गए हैं। प्रार्थना की परिभाषा यह हो सकती है कि हर आवश्यकता में उसकी प्रतिज्ञा की हुई सहायता की ओर, एकमात्र सहारे के रूप में, फिर लौट जाना। धन्यवाद वह कृतज्ञता है जो हमारी सब आशीषों की स्तुति उसी को देती है। जिस प्रकार प्रभु यह स्वीकार नहीं करता कि ये किसी और स्थान से प्राप्त हों, उसी प्रकार वह माँगता है कि ये पूर्णतया उसी की ओर लौटाई जाएँ। केवल अन्य देवताओं से बचे रहना पर्याप्त नहीं है। हमें उसी समय अपने आपको पूरी तरह उसी को समर्पित करना चाहिए, कुछ अधर्मी तुच्छ समझनेवालों की भाँति नहीं, जो सब धार्मिक आचरण का उपहास करने को सबसे छोटा मार्ग मानते हैं। परन्तु यहाँ सच्चे धर्म को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो हमारे मन को जीवित परमेश्वर की ओर निर्देशित करता है। जब उसके ज्ञान से भली-भाँति भर दिए जाएँगे, तब हमारे जीवन का सारा उद्देश्य यही होगा कि हम उसकी महिमा का आदर करें, उससे डरें और उसकी आराधना करें, उसकी आशीषों में भाग का आनन्द लें, हर कठिनाई में उसकी शरण लें, उसके कार्यों की भव्यता को स्वीकार करें, सराहें और उसका गुणगान करें, और उसे मानो अपने सब कार्यों का एकमात्र लक्ष्य बना लें। फिर, हमें अन्धविश्वास से सावधान रहना चाहिए, जिससे हमारे मन सच्चे परमेश्वर से हटकर अनेक देवताओं के पीछे इधर-उधर भटकाए जाते हैं। इसलिए यदि हम एक ही परमेश्वर से सन्तुष्ट हैं, तो उस बात को स्मरण करें जो पहले कही गई थी, कि सब कल्पित देवताओं को दूर भगा देना चाहिए, और जिस आराधना का दावा वह अपने लिए करता है उसे खण्डित नहीं करना चाहिए। उसकी महिमा का एक कण भी रोके न रखा जाए: जो कुछ उसका है वह सब का सब उसी के लिए सुरक्षित रखा जाए। “मेरे सामने” ये शब्द अपमान को और बढ़ा देते हैं, क्योंकि जब कभी हम उसके स्थान पर अपनी कल्पनाओं को बैठाते हैं, तब परमेश्वर जलन से भर उठता है; जैसे विश्वासघातिनी पत्नी अपने पति के हृदय को और गहरा आघात पहुँचाती है जब उसका व्यभिचार उसकी आँखों के सामने खुलेआम किया जाता है। इसलिए परमेश्वर ने अपनी वर्तमान सामर्थ्य और अनुग्रह से यह प्रकट करके कि उसने उस प्रजा का ध्यान रखा जिसे उसने चुना था, अब उन्हें विद्रोह की दुष्टता से रोकने के लिए चेतावनी देता है कि वे उसे साक्षी और दर्शक बनाए बिना पराए देवताओं को नहीं अपना सकते। ऐसा करने के दुस्साहस के साथ यह अत्यन्त बड़ी अभक्ति भी जुड़ जाती है कि वे समझें कि अपने बहानों से परमेश्वर की आँख को धोखा दे सकते हैं। इससे बहुत दूर, प्रभु घोषणा करता है कि जो कुछ हम सोचते, योजना बनाते या पूरा करते हैं, वह सब उसकी दृष्टि के सामने खुला है। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हमारी आराधना प्रभु को ग्रहणयोग्य हो, तो हमारा विवेक विद्रोह के दूर-से-दूर के विचार से भी अलग रहे। उसके ईश्वरत्व की महिमा को सम्पूर्ण और निष्कलंक रखना चाहिए, केवल बाहरी अंगीकार से ही नहीं, परन्तु ऐसे जैसे उसकी उस दृष्टि के नीचे जो हृदय के भीतरी-से-भीतरी स्थानों में भी भेद जाती है।
