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छठवीं आज्ञा
तू हत्या न करना।
39. इस आज्ञा का आशय यह है कि चूँकि प्रभु ने सारी मानव जाति को एक प्रकार की एकता के बन्धन में बाँध रखा है, इसलिए सब की सुरक्षा को हर एक के हाथ में सौंपी हुई समझना चाहिए। अतः सामान्य रूप से सब प्रकार की हिंसा और अन्याय, और हर वह हानि जिससे हमारे पड़ोसी का शरीर पीड़ित होता है, वर्जित है। इसलिए हमसे यह अपेक्षा है कि हमारे वश में जो कुछ है उसके अनुसार हम अपने पड़ोसी के प्राण की रक्षा विश्वासयोग्यता से करें; जो कुछ उसकी शान्ति के लिए हितकर है उसे बढ़ावा दें, हानि को दूर रखने में सजग रहें, और जब संकट आए तो उसे दूर करने में सहायता दें। यह स्मरण रखते हुए कि विधान-दाता परमेश्वर इस प्रकार कहता है, यह भी विचार कर कि वह तुझसे यही नियम अपने मन को ठीक रखने में भी लागू करने की माँग करता है। यह हास्यास्पद होता कि जो हृदय के विचारों को देखता है और उन पर विशेष ध्यान देता है, वह केवल शरीर को ही सीधाई की शिक्षा दे। इसलिए यह आज्ञा हृदय की हत्या को भी वर्जित करती है, और अपने भाई के प्राण को बचाए रखने की सच्ची इच्छा की माँग करती है। हत्या हाथ तो करता है, परन्तु उसकी कल्पना मन क्रोध और घृणा के वशीभूत होकर करता है। तू अपने भाई पर क्रोध कैसे कर सकता है और साथ ही उसकी हानि की उत्कट लालसा न रखे? यदि तुझे उस पर क्रोध नहीं करना है, तो उससे घृणा भी नहीं करनी है, क्योंकि घृणा पुराने पड़े हुए क्रोध के सिवा और कुछ नहीं। तू इस तथ्य को चाहे जैसे छिपाए, या व्यर्थ बहानों से इससे बचने का प्रयत्न करे; जहाँ क्रोध या घृणा है, वहाँ बुराई करने की प्रवृत्ति है। यदि तू फिर भी टालमटोल पर अड़ा रहे, तो पवित्र आत्मा के मुख ने घोषणा की है कि "जो कोई अपने भाई से घृणा करता है वह हत्यारा है" (1 यूहन्ना 3:15); और हमारे उद्धारकर्ता के मुख ने घोषणा की है कि "जो कोई अपने भाई पर बिना कारण क्रोध करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहरेगा; और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहरेगा; और जो कोई कहे 'अरे मूर्ख', वह नरक की आग के दण्ड के योग्य ठहरेगा" (मत्ती 5:22)।
40. पवित्रशास्त्र दोहरी न्यायसंगतता की ओर संकेत करता है जिस पर यह आज्ञा आधारित है। मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप भी है और हमारा अपना मांस भी। इसलिए यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को अपवित्र न करना चाहें, तो हमें मनुष्य के व्यक्तित्व को पवित्र मानना चाहिए; यदि हम अपनी मानवता से अपने आपको वंचित न करना चाहें, तो हमें अपने ही मांस का पालन-पोषण करना चाहिए। मसीह के छुटकारे और दान से जो व्यावहारिक निष्कर्ष निकलता है, उस पर अन्यत्र विचार किया जाएगा। [215] प्रभु ने यह उचित समझा कि हमारा ध्यान इन दो स्वाभाविक विचारों की ओर खींचे, ताकि वे हमें अपने पड़ोसी के जीवन की रक्षा के लिए प्रेरित करें, अर्थात् उसमें अंकित परमेश्वर के स्वरूप का आदर करना और अपने ही मांस को अपनाना। हत्या के अपराध से मुक्त होने के लिए मनुष्य का लहू बहाने से रुकना ही पर्याप्त नहीं है। यदि तू कर्म में वह करता है, प्रयत्न में उसकी योजना बनाता है, इच्छा और अभिप्राय में वह सोचता है जो दूसरे की सुरक्षा के विरुद्ध है, तो तू हत्या का दोषी है। दूसरी ओर, यदि तू अपने साधन और अवसर के अनुसार उसकी सुरक्षा की रक्षा करने का यत्न नहीं करता, तो उस निर्दयता के द्वारा तू व्यवस्था को तोड़ता है। परन्तु यदि शरीर की सुरक्षा के लिए इतनी सावधानी से प्रबन्ध किया गया है, तो इससे हम अनुमान कर सकते हैं कि आत्मा की सुरक्षा के लिए कितनी चिन्ता और परिश्रम अपेक्षित है, जिसका मूल्य परमेश्वर की दृष्टि में अपार रूप से कहीं अधिक है।
