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व्यवस्था की आत्मिकता
जॉन कैल्विन
शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात् व्यभिचार, कामुकता, अशुद्धता, लुचपन, मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म, डाह, हत्या, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इन के समान और भी काम हैं; इन के विषय में मैं तुम को पहले से कहे देता हूँ, जैसा पहले कह भी चुका हूँ, कि ऐसे-ऐसे काम करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे। पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता और संयम हैं; ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं। - गलातियों 5:19-23
आज सवेरे हमने देखा कि मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में दोषी ठहरे हुए हैं, क्योंकि जो कुछ मनुष्य से निकलता है वह दूषित और घिनौना है। अब यदि परमेश्वर सब सिद्धता का कर्ता है, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि जो कुछ उसके स्वभाव या उसके वचन के विपरीत है वह पूरी तरह भ्रष्ट है। इसी कारण शरीर और आत्मा के बीच निरन्तर संघर्ष चलता रहता है; क्योंकि यदि मनुष्यों को अपने ही मार्गों पर चलने के लिए छोड़ दिया जाए, तो वे अपने सारे जीवन भर परमेश्वर के प्राणघातक शत्रु बने रहेंगे। इसलिए हम इसके सिवा और कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि मनुष्य बुराई और अधर्म से भरे हुए हैं। जब हम यह दण्डाज्ञा सुनते हैं, तो हमें पूरी तरह लज्जित होना चाहिए; क्योंकि यह हमारे स्वर्गीय न्यायी की आज्ञा है, और इसका विरोध करना उचित नहीं, क्योंकि परमेश्वर अधिकार के साथ बोलता है। जब वह घोषणा करता है कि हम स्वभाव से बुरे और भ्रष्ट हैं, तो वह अपना कर्तव्य निभाता है; क्योंकि हमें उसे लेखा देना है। फिर भी मनुष्य अपने कपट या अभिमान में ऐसे अन्धे हो गए हैं कि उन्हें इसकी चिन्ता नहीं कि उन्होंने अपने ऊपर परमेश्वर का क्रोध भड़का लिया है। इसका कारण यह है कि हम सब अपनी चापलूसी करते हैं और अपने पापों को पालते-पोसते हैं। इसलिए हमें अपने पापों को सचमुच मानने पर विवश करने का एकमात्र उपाय बल ही है। तब भी हम बचने के उपायों और छल-छद्म का सहारा लेते हैं। इतना ही नहीं, हम ढिठाई से तुच्छ बहाने ढूँढ़ते हैं, मानो वे परमेश्वर को भाएँगे! इसलिए हमारे लिए यह पर्याप्त नहीं कि हम हमारे विरुद्ध सुनाई गई परमेश्वर की दण्ड की सामान्य आज्ञा को सुन लें; हमें आवश्यकता है कि परमेश्वर हमारी अपनी नीचता को प्रकट करे, कि हम अपने आप से लज्जित हों। हमें आवश्यकता है कि वह विशिष्ट रूप से बताए और उन पापों की ओर उँगली उठाए जो हमारे आस-पास के लोगों को स्पष्ट और प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं।
इसीलिए पौलुस ने आज सवेरे यह कहने के बाद कि मनुष्यों के सब विचार और भावनाएँ परमेश्वर के विरुद्ध लड़ती हैं, अब वह घोषणा जोड़ दी जो हमने अभी सुनी। वह हमें बताता है कि फल के दिखाई देने से हम वृक्ष की दशा को परख सकते हैं, यद्यपि सबसे महत्त्वपूर्ण भाग, अर्थात् जड़, छिपी रहती है। जैसे वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है, वैसे ही जो पाप हममें और हमारे स्वभाव में राज्य करता है, वह हमारे किए हुए कामों से दिखाई देता है। इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि पौलुस यहाँ क्यों कहता है कि ‘शरीर के काम तो प्रगट हैं’। मानो वह यह कह रहा है कि लोग जानबूझकर अपनी आँखें मूँद लेते हैं कि अपनी बुराई को ढाँप दें, और अपने आपको धोखा देते हैं कि वे सद्गुण के सिवा और किसी बात से भरे नहीं हैं, यद्यपि वे अनगिनत भयानक दुर्गुणों से फटे पड़ रहे हैं। हम चाहे कितना ही विरोध करें, भिन्न-भिन्न बहाने ढूँढ़ें, अपना मुँह पोंछ लें और वस्तुस्थिति पर परदा डालें, तौभी हमें इस सच्चाई पर लौटना ही पड़ता है कि हमारा जीवन ऊँची और साफ आवाज़ से घोषित करता है कि हम किस प्रकार के लोग हैं। अतः शरीर के काम सचमुच प्रगट हैं। अब यह उन लोगों को डाँटने के लिए पर्याप्त है जो मानो सिंगार की एक परत के पीछे छिपना चाहते हैं, जैसे कि वे परमेश्वर की दृष्टि में निर्दोष हों। यह सच है कि पौलुस यहाँ उन पापों की पूरी सूची नहीं देता जिन्हें परमेश्वर ने व्यवस्था में दोषी ठहराया है, परन्तु वह ऐसे उदाहरण गिनाता है जिनसे हम शेष का सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि पौलुस उन्हें इस रीति से गिनाना चाहता तो यह एक लम्बी प्रक्रिया होती। परन्तु जैसा हम देखेंगे, यह सूची उन सब को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है जो समझते हैं कि उन्हें अपने कपट से लाभ होगा।
इस सब को भली-भाँति समझने के लिए हमें यह जानना आवश्यक है कि परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलना क्या है। तीतुस के दूसरे अध्याय की ग्यारहवीं आयत में कहा गया है कि परमेश्वर का अनुग्रह प्रगट हुआ है, कि हम इस नीचे के संसार में पवित्रता, संयम और धार्मिकता से चलें, और उस जीवन की आशा रखें जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने हमसे की है, और अपने महान उद्धारकर्ता के आने की बाट जोहें, जो हमें अपने स्वर्गीय राज्य में अपने पास इकट्ठा करेगा। मसीहियों को सबसे बढ़कर इसी में लगे रहना चाहिए। उन्हें इन बातों का अभ्यास करना चाहिए; अर्थात् इस ज्ञान का कि यह हमारे अनन्त विश्राम का स्थान नहीं, और न हमारा निज भाग है। यह संसार एक परदेश के समान है जिसमें से होकर हमें यात्रा करनी है, जबकि हमारी आँखें स्वर्ग की ओर लगी हैं। यही सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। परन्तु यह तब तक सिद्ध नहीं हो सकती जब तक विश्वासी परमेश्वर को न पुकारें और केवल उसी की शरण न लें। हमारे जीवन के विषय में पौलुस तीन विशेष बातें कहता है: पहली पवित्रता है, जिसका अर्थ है कि हम शुद्ध मन से, खराई और सच्चाई के साथ परमेश्वर की सेवा करें और इस संसार की सब अशुद्धता का त्याग करें। यह पहली बात है। दूसरी यह कि हम सांसारिक या अपवित्र न बनें, वरन् सम्मानयोग्य जीवन बिताएँ। तीसरी यह कि हम किसी की हानि न करें, कभी छल या निर्दयता न करें, वरन् अपने पड़ोसियों की सेवा करने का प्रयास करें। एक मसीही का जीवन ऐसा ही होना चाहिए।
अब पौलुस यहाँ कहता है कि जो लोग यह नहीं मानते कि वे पूरी तरह परमेश्वर के शत्रु हैं और बैर और विद्रोह से भरे हैं, उनके लिए एक सरल परीक्षण आवश्यक है। यदि हम उनके जीवन की जाँच करें, तो हम पाएँगे कि कुछ व्यभिचार में पड़े हैं, कुछ पियक्कड़ हैं, दूसरे हर प्रकार की दुष्टता में लिप्त हैं, कुछ हत्यारे हैं, दूसरे टोन्हे हैं, कुछ विद्रोह भड़काते हैं, दूसरे महत्त्वाकांक्षा से भरे हैं, कुछ केवल फूट और उपद्रव के बीज बोने और ऐसे मत खड़े करने में लगे हैं जो अपनी बिगाड़ से परमेश्वर की सच्चाई को विकृत करते हैं। यदि हम मनुष्यों के जीवन में झाँकें तो हमें यही मिलेगा। तो फिर वे परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत करके और कुतर्कों से अपनी नीचता को छिपाने का प्रयत्न करके क्या पाएँगे? यदि वे अपने मुँह से इसे स्वीकार नहीं करते, तो उनका जीवन बोलेगा। उनका जीवन, उन सब कामों समेत जो हम उन्हें करते देखते हैं, हमारी कही हुई बात की गवाही देगा; इसलिए आगे और वाद-विवाद की कोई गुंजाइश नहीं।
फिर, जब पौलुस कहता है कि शरीर के काम प्रगट हैं, तो उसका यह अर्थ नहीं कि वे सब जिन्हें परमेश्वर उनके स्वाभाविक मार्ग पर चलने को छोड़ देता है, और जिनकी अगुआई पवित्र आत्मा नहीं करता, यहाँ गिनाए गए हर पाप के दोषी हैं। अधिक सम्भावना यह है कि कोई व्यक्ति इस हद तक भ्रष्ट होगा कि अवसर के अनुसार पहले एक पाप में, फिर दो-तीन में पड़ जाएगा। इसीलिए बहुत से अन्यजाति और अविश्वासी हैं जिनमें परमेश्वर का कोई भय नहीं, और जिन्हें उसका वचन कभी सिखाया नहीं गया, फिर भी जिनमें सद्गुण और सीधाई का कुछ दिखावा है। तथापि इसका अर्थ यह नहीं कि वे इसलिए भ्रष्टता से मुक्त हैं, क्योंकि यदि संक्रमण उनके भीतर छिपा और दबा बैठा है, तो उनमें एक गाँठ है जो अन्त में उनके हर अंग को सड़ा देगी। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव कोई सीमा या मर्यादा नहीं जानता; सब कुछ असीम गड़बड़ी है। इस अंश से हमें यही स्मरण रखना है; और इसलिए कि हममें से कोई कपट से धोखा न खाए, हमें अपने आप को भली-भाँति देखना और अपने जीवन को परिश्रम से जाँचना चाहिए। तब हमें अपनी आँखें नीचे झुकाने और अपना मुँह बन्द करने का अवसर मिलेगा, यह जानकर कि हम पूरी तरह अभागे और दण्ड के योग्य हैं। यह सच है कि पौलुस जो कुछ यहाँ गिनाता है उसमें से कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं, और सम्भव है मनुष्यों के सामने हम पर दोष न लगाया जा सके; परन्तु चाहे हम बाहर से छोटे स्वर्गदूतों के समान दिखाई दें, तब भी जब तक परमेश्वर हमें बदल न दे हम बुरे और भ्रष्ट ही हैं। बात केवल यह है कि परमेश्वर नहीं चाहता कि हमारे जीवन में हमें गिराने और हमें स्वेच्छा से अपने आप को दोषी ठहराने के लिए कोई गवाही न रहे।
अब हम देखेंगे कि इस शिक्षा को कैसे लागू किया जाए। यदि हम समझते हैं कि हम किसी रीति से योग्य हैं, और अपनी दीनता को नहीं देखते, तो आओ हम अपने जीवन को जाँचें, और अपने कामों की तुलना उस सब से करें जिसे परमेश्वर ने वर्जित और निषिद्ध ठहराया है। तब हमें अपनी दुष्टता और मलिनता का अच्छा चित्र मिलेगा; जैसा हम पहले सोचते थे कि हम पवित्रता और सिद्धता से भरे हैं, उसके बदले परमेश्वर हमारी आँखों के सामने प्रकट कर देगा कि हम अधर्म से भरे हैं। फिर भी, जब हम एक पाप को पहचान लें, फिर दो को, फिर तीन को, तब हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि यह तो उसका सौवाँ भाग भी नहीं। क्योंकि अपनी दीनता को जानने के विषय में हम सदा चौंधियाए रहते हैं। जब हम अपने कामों को साफ देख भी लें, तब भी हमें उनके स्रोत तक पहुँचने में समर्थ होना चाहिए। कुछ लोग इतने मन्दबुद्धि हैं कि वे सोचते हैं कि जब तक वे व्यभिचार के दोषी नहीं हुए, या जब तक उनकी पियक्कड़ी छिपी रहती है, या जब तक उनका छल इतने गुप्त और सावधानी से किया गया है कि किसी ने नहीं देखा, तब तक वे ग्रहणयोग्य होंगे। परन्तु पौलुस का यह कहने में कि शरीर के काम प्रगट हैं, यह अभिप्राय नहीं कि वह मनुष्यों की चापलूसी करके उन्हें बताए कि जब तक पाप पकड़ा न जाए तब तक वह दोषी नहीं ठहरता। क्योंकि जैसा मैंने कहा है, एक पाप दूसरे पाप की ओर ले जाता है। इसलिए यदि व्यभिचार, पियक्कड़ी, चोरी, हत्याएँ, विश्वासघात, परमेश्वर की निन्दा, झगड़ा और विद्रोह अपने आप में घृणित बातें हैं, तो हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अभक्ति, महत्त्वाकांक्षा, घमण्ड, या अपने मान और मूल्य की अत्यधिक भावना, जो हृदय में छिपी रहती है, उसके विषय में भी यही सच है। लोभ, जिसमें हम दूसरों की वस्तुओं की लालसा करते हैं, और ऐसी ही बातें, एक और पाप है जिसे हमें दोषी ठहराना चाहिए। संक्षेप में, बाहरी कार्य इस बात की गवाही देते हैं कि हम परमेश्वर की दृष्टि में संक्रमण से भरे हैं। यह कहाँ दिखाई देता है? हमारी इच्छाओं में, हमारी सम्मतियों में, हमारे विचारों में, और हमारे सब उपक्रमों में; हम देख सकते हैं कि ये सब बातें एक बुरे स्रोत से निकलती हैं।
इस प्रकार हम अपने पापों के ऐसे ज्ञान की ओर खिंचते हैं जो हमें परमेश्वर के सामने पूरी तरह लज्जित कर देता है। परमेश्वर व्यवस्था में शिक्षा की यही पद्धति अपनाता है। वहाँ परमेश्वर केवल व्यभिचार को ही वर्जित नहीं करता, वरन् परस्त्रीगमन को निषिद्ध ठहराता है। पहली दृष्टि में ऐसा लगता है कि परमेश्वर ठगने या लूटने को वर्जित नहीं करता। तो वह किस बात को दोषी ठहराता है? चोरी को। वह झूठ बोलने को नहीं, केवल झूठी गवाही देने को वर्जित करता है। इसलिए जो व्यवस्था के सामर्थ्य के विषय में कुछ नहीं जानते, उन्हें ऐसा लगता है कि यदि वे इन विशेष अपराधों से दूर रहे तो उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया। इसी कारण पौलुस कहता है कि कुछ समय तक वह अपने आप को अत्यन्त धर्मी समझता था, मानो परमेश्वर को उसमें ऐसा कुछ न मिल सकता था जिसके लिए वह उसे दोष दे (रोमियों 7:7)। इस प्रकार कपटी लोग घमण्ड से मतवाले हो जाते हैं और यदि परमेश्वर उन्हें डाँटे तो बिलकुल उग्र हो उठते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि वह उनके साथ बड़ा अन्याय करता है। क्यों? क्योंकि वे व्यवस्था के स्वरूप को नहीं समझते। पौलुस कहता है कि वह आत्मिक है, जिसका अर्थ है कि उसके अधीन होने से पहले हमारा पूरी तरह बदल जाना आवश्यक है (रोमियों 7:14)। जब तक हम अपने शारीरिक स्वभाव के पीछे चलते हैं, तब तक जो कुछ हम सोचते, करते और कहते हैं, वह परमेश्वर की दृष्टि में पाप ही हो सकता है।
इसलिए हमें व्यवस्था में प्रयुक्त शब्द को ही केवल नहीं देखना चाहिए। क्योंकि जब परमेश्वर परस्त्रीगमन का उदाहरण देता है, तो वह यह भी चाहता था कि हर प्रकार का व्यभिचार हमें घृणित लगे, क्योंकि यदि विवाह की प्रतिज्ञाएँ तोड़ी और भंग की जाएँ, तो यह मनुष्यों के बीच सारी व्यवस्था और नियम का बिगाड़ है। इसलिए ‘परस्त्रीगमन’ शब्द से परमेश्वर दिखाता है कि वह सब यौन अशुद्धता और अशोभनता से घृणा करता है। हमें यह भी कहा गया है, ‘तू हत्या न करना’। तो क्या लड़ना उचित नहीं? बिलकुल नहीं; घृणा करना भी नहीं, यूहन्ना के अनुसार, जो हमें बताता है कि यदि कोई गुप्त रूप से अपने पड़ोसी से बैर रखता है, चाहे वह उसे कभी न सताए, न उस पर उँगली उठाए, तो भी वह परमेश्वर की दृष्टि में हत्यारा है (1 यूहन्ना 3:15)। इसलिए ‘हत्या’ शब्द से परमेश्वर उस हर हानि को दोषी ठहरा रहा है जो हम अपने पड़ोसियों की कर सकते हैं। अतः यद्यपि हम उन्हें चोट पहुँचाने के लिए उँगली न उठाएँ, फिर भी यदि हम उनसे घृणा करते या उनके प्रति बुरा भाव रखते हैं, तो परमेश्वर की दृष्टि में हम हत्या के दोषी हैं। चोरी के विषय में भी यही बात है; चोर केवल वे ही नहीं जिन्हें हम कोड़े मारते और फाँसी देते हैं और जिनके कान काटते हैं। मैं तुमसे कहता हूँ, परमेश्वर की दृष्टि में केवल यही चोर नहीं हैं। वे भी जो भले मनुष्य कहलाने की प्रतिष्ठा चाहते हैं और जिनका बहुत आदर किया जाता है — यदि वे अपने पड़ोसियों को धोखा देते और ठगते हैं, तो यद्यपि मनुष्यों की दृष्टि में अपने ऊँचे पद के कारण उन पर चोरी का आरोप नहीं लगाया जा सकता, तथापि वे परमेश्वर के सामने चोर हैं। अन्य सब पापों पर भी यही बात लागू होती है।
इस अंश में, जहाँ पौलुस कहता है कि शरीर के काम प्रगट हैं, उसकी शिक्षा की धारा स्थूल पापों से सूक्ष्म पापों की ओर बढ़ती है। जब हमें अपनी दीनता और पाप का कायल कर दिया जाए, और हमें अपनी लज्जाजनक दशा का पता चल जाए, यहाँ तक कि हम निरुत्तर रह जाएँ, तब हमें एक और बात का कायल होना चाहिए: हमें यह समझना है कि वे सब लालसाएँ जो हमें बुराई करने की ओर ले जाती हैं, चाहे वे चोरी और निर्दयता हों, छल और झूठी शपथ हों, या घृणा और बैर हों — ये सब समान रूप से दोषी ठहराई जाने योग्य हैं। क्योंकि वृक्ष तब भी बुरा ही है, चाहे हम उसका फल पहली दृष्टि में न देखें; वृक्ष का अपना स्वभाव होता है, परन्तु उसके स्वभाव को परखने का हमारे पास एकमात्र उपाय उसका फल ही है। अब यह ध्यान देने योग्य है क्योंकि, जैसा मैंने कहा, यद्यपि परमेश्वर मनुष्यों को अपने आप को दोषी ठहराने पर विवश करता है, वे केवल आधे मन से ऐसा करेंगे। वे चाहते हैं कि जो दूसरों को दिखाई नहीं देता वह सब भुला दिया जाए, ताकि उसका कभी उल्लेख न हो। जो व्यक्ति बुराई करने के कारण दोषी ठहराया जाता है, यदि उसे उसे स्वीकार करने पर विवश किया जाए, तो वह निःसन्देह कभी अपने पाप का बहाना न बनाएगा। फिर भी, यह कोई प्रश्न ही नहीं कि वह स्वेच्छा से अपने आप को जाँचे कि अपने विरुद्ध परमेश्वर के न्याय को अनुभव करे। वह यह नहीं सोचता कि वह किस योग्य है, न यह विचार करता है कि इस कार्य को करने से पहले उसने कितनी परीक्षाओं का सामना किया, और उसके पाप के सब पर प्रकट होने से पहले उसने कोई सौ बार परमेश्वर को अप्रसन्न किया।
इसलिए हमें इस चेतावनी पर, जिस पर मैंने टीका की है, और भी अधिक ध्यान देना चाहिए; विशेषकर इसलिए कि पोपवादी शिक्षक यह कहकर अपनी अत्यधिक मूर्खता प्रकट करते हैं कि बुरा सोचना, या परीक्षा में पड़ना, पाप नहीं है, जब तक कि कोई उसे करने के लिए सहमत न हो। कोई मनुष्य अपने पड़ोसी का किसी प्रकार अनिष्ट करने की परीक्षा में पड़ सकता है; उसके मन में कोई शिकायत या झुँझलाहट हो सकती है जिससे वह उस व्यक्ति से जिसने उसे ठेस पहुँचाई है बदला लेना चाहे। यदि अवसर आ जाए, तो वह प्रसन्न होगा। वे हमसे कहते हैं कि यह पाप नहीं है, जब तक कि उसने दृढ़ निश्चय के साथ परीक्षा से सहमति न दी हो। वे तो वेश्याओं के समान केवल अपना मुँह पोंछते हैं, या सूअरनियों के समान अपनी थूथन दिखाते हैं, जब वे कीचड़ और मैल में लोट चुकी होती हैं। कोई मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध बुड़बुड़ा सकता है और उस पर क्रोध कर सकता है, और सन्देह कर सकता है कि परमेश्वर उसकी देखभाल करेगा या नहीं; वह अनेक अविश्वासपूर्ण विचारों से व्याकुल हो सकता है, यहाँ तक कि उसे परमेश्वर में शरण न मिले; परन्तु पोपवादियों के अनुसार इनमें से कोई भी बात पाप नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा कि इन बातों में केवल साधारण जन ही धोखा खाते हैं, क्योंकि उनके सब विद्यालय इसी सिद्धान्त और मान्यता पर टिके हैं कि यह पाप नहीं है। वे यह तो कहते हैं कि बपतिस्मा से पहले सब कुछ पाप है; परन्तु बपतिस्मा के बाद सब कुछ पुण्य बन जाता है, चाहे हम परमेश्वर पर कितना ही सन्देह करें, या उसके विरुद्ध हमारी कितनी ही शिकायतें हों। हम उसके प्रति बहुत अधीर हो सकते हैं, या इस या उस बात के विषय में उत्तेजित हो सकते हैं — परन्तु यदि हम बाहरी रूप से बुराई करने के लिए प्रेरित नहीं हुए, तो हम पर दोष नहीं लगाया जा सकता! संक्षेप में, यदि हम उस सब की ओर झुकते हैं जिसे परमेश्वर अपनी व्यवस्था में दोषी ठहराता और डाँटता है — वह सब जो अनुचित है — तो वह कुछ नहीं है। ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों पर विश्वास करना उन्हें ही शोभा देता है! आखिर उन्होंने आराधना के लिए मूरतें और विकृत प्रतिमाएँ बना ली हैं, और अब उनके मन अन्धकारमय हो गए हैं जब वे अपने देवताओं के चारों ओर रंगरलियाँ मनाते हैं और हमारी हँसी उड़ाते हैं, मानो हम धार्मिकता और खराई पर भाषण देनेवाले किसी नन्हे बालक हों। इसलिए यदि ऐसे लोग इस प्रकार का व्यवहार करें तो हमें आश्चर्य न करना चाहिए। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की महिमा को बिगाड़ा और नष्ट कर दिया है, इसलिए वे पूरी तरह पशु-समान ही होंगे।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, आओ हम प्रेरित पौलुस के उन शब्दों पर ध्यान दें जिन्हें मैं पहले उद्धृत कर चुका हूँ, अर्थात् यह कि व्यवस्था आत्मिक है। यदि बाहरी, दिखाई देनेवाले कामों के कारण हम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही ठहराए जाते हैं, तो आओ स्मरण रखें कि परमेश्वर हमारे भीतर बुरी अभिलाषाओं की असंख्य, वरन् एक अथाह खाई को कुलबुलाते हुए पाएगा, यद्यपि मनुष्य उन्हें हमें दोषी ठहरानेवाली नहीं मानते। इसलिए हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि हम हर बात में और हर प्रकार से विनाश में डूबे हुए हैं, जब तक परमेश्वर हम पर दया की दृष्टि न करे और हमें बाहर न खींच ले। पौलुस के इस पाठ को हमारी शिक्षा के लिए लागू करने की रीति यह है: चूँकि हम उन पापों से अनजान हैं जो हमारे भीतर छिपे हैं, इसलिए आवश्यक है कि परमेश्वर आकर हमारे जीवन की जाँच करे। इसके बाद हम अपने आप को दीन करना सीखेंगे। इसलिए जब हम उन पापों को देख लें जो सब को ज्ञात और प्रत्यक्ष हैं, और जिनका बहाना नन्हे बच्चों की दृष्टि में भी नहीं बनाया जा सकता, तो हम और आगे बढ़कर गहराइयों को नापने और यह मानने के लिए प्रेरित हों कि हमारी सब अभिलाषाएँ और विचार परमेश्वर के विरुद्ध अनेक विद्रोहों के समान हैं। फिर भी यदि हममें से हर एक इस प्रकार अपने आप को जाँचने में अधिक सावधान होता, तो निश्चय ही हम सब को काँपने और आहें भरने का अवसर मिलता; सारा अहंकार और घमण्ड गिरा दिया जाता और हम अपने जीवन के हर पहलू से लज्जित होते। परन्तु हम जानते हैं कि हममें से हर एक अपने पापों के किसी भी ज्ञान से जितना हो सके उतना मुँह मोड़ता है; हम उन सब को अपनी पीठ के पीछे फेंक देते हैं। परमेश्वर उन्हें नहीं भूलता; यद्यपि हम चाहते हैं कि वे भुला दिए जाएँ, फिर भी उसे उन्हें स्मरण में रखना ही पड़ता है। पौलुस इस अंश में हमारा ध्यान इसी ओर खींचता है।
इसके अतिरिक्त, हम पोपतन्त्र के शिक्षकों की मूर्खता और अज्ञानता (या कहें, जड़ता) को इसमें देख सकते हैं कि वे मानते हैं कि ‘शरीर’ शब्द केवल मनुष्य के इन्द्रियग्राही स्वभाव (जैसा वे उसे कहते हैं) की ओर संकेत करता है; क्योंकि वे उसे इसी प्रकार बाँटते हैं। वे मानते हैं कि जिन अभिलाषाओं को वे ‘निम्न’ कहते हैं वे बहुत भ्रष्ट हैं, परन्तु समझते हैं कि जब तक हमारे पास स्वतन्त्र इच्छा है, तब तक हमारे भीतर बुद्धि और समझ का कुछ अंश बचा रहता है। पोपवादियों के अनुसार मनुष्य की इन्द्रियपरायणता तब प्रकट होती है जब वह अपनी ही बुद्धि के मार्गदर्शन में नहीं चलता, वरन् यौन अशुद्धता, या पियक्कड़ी, या पेटूपन, या ऐसी ही किसी बात में अत्यधिक लगा रहता है। फिर भी यहाँ पौलुस महत्त्वाकांक्षा को उसी स्तर पर रखता है। और क्यों मनुष्य एक-दूसरे से डाह करते हैं, और एक-दूसरे से श्रेष्ठता पाने की होड़ करते हैं, सबसे बुद्धिमान या सबसे समझदार होना चाहते हैं? क्या इसलिए नहीं कि हर एक संसार की दृष्टि में आदर पाने की लालसा रखता है? क्या यह व्यभिचार या पियक्कड़ी से कम दोषी ठहराए जाने योग्य है? यदि कोई खाने-पीने का प्रेमी बेचारा गँवार बहुत पी लेता है, तो वह अपनी मस्ती में आगे बढ़ता जाएगा; वह राजा या बड़ा स्वामी बनने की माँग नहीं करता — वह केवल अपना समय बिताता है। दूसरा जो जुए का लती है, अपने जैसे बदमाशों के साथ जाकर खेलेगा, और उसे महत्त्वाकांक्षा और बड़े सम्मान की लालसा की परीक्षा नहीं होती। इसलिए पौलुस कहता है कि जो सबसे अधिक सम्माननीय समझे जाते हैं और अपने आपको ऊँचा मानते हैं, वे ही सबसे अधिक शारीरिक हैं। हमने 1 कुरिन्थियों की पत्री में देखा कि उसने उन पर शारीरिक होने का दोष लगाया, क्योंकि वे मत-सम्बन्धी बातों पर आपस में विवाद करते थे, और मनुष्यों से आदर पाने और ध्यान खींचने की मूर्खतापूर्ण लालसा रखते थे (1 कुरिन्थियों 3:3)। वहाँ भी उसने वास्तव में ‘झगड़े और विभाजन’ का उल्लेख किया है। यदि कोई मनुष्य दूसरों के प्रति तिरस्कार के कारण, या प्रशंसा और प्रतिष्ठा की इच्छा के कारण झूठे सिद्धान्तों से परमेश्वर की कलीसिया को व्याकुल करता है, तो पोपवादी उसे शारीरिक नहीं कहेंगे। वे कहेंगे कि वह बहुत चतुर था; परन्तु पौलुस कहता है कि विधर्म, महत्त्वाकांक्षा और डाह शरीर के काम हैं। इससे वही सिद्ध होता है जो हमने आज सवेरे कहा, कि ‘शरीर’ शब्द में वह सब सम्मिलित है जो मनुष्य से सम्बन्ध रखता है। जब तक हम बदले और रूपान्तरित न किए जाएँ, तब तक हम पूरी तरह बुराई के वश में रहेंगे।
जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, यह सच है कि अन्यजाति और अविश्वासी सदा सद्गुणी समझे जाएँगे, यद्यपि परमेश्वर ने उनकी लगाम छोड़ दी है और उन्हें अपने पवित्र आत्मा से नया जन्म नहीं दिया। वास्तव में हमें उनके जीवन में शिष्टता की कुछ मात्रा मिलेगी; कम से कम वे सब के सब व्यभिचारी, या पियक्कड़ या चोर नहीं होंगे। तो पौलुस कैसे कह सकता है कि वे शारीरिक हैं? इसलिए कि मनुष्य का हृदय अधर्म का एक गहरा गड्ढा है, जैसा यिर्मयाह कहता है, जिसकी न कोई तलहटी है न किनारा; भविष्यद्वक्ता पुकार उठता है, ‘हृदय कैसी अथाह खाई है! उसकी गहराइयों को कौन नाप सकता है? केवल परमेश्वर’ (यिर्मयाह 17:9)।
क्योंकि जैसा हम जानते हैं, मनुष्य अपनी चापलूसी करते हैं और बिना दण्ड के दुष्ट कर्म करते हैं; वे पाप में ऐसे कठोर हो गए हैं कि बुराई पर बुराई और पाप पर पाप का ढेर लगाते जाते हैं, और अपने दुर्गुणों को सद्गुण समझते हैं। तथापि उनके जीवन का रूप चमकदार और आकर्षक हो सकता है। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि जिन्हें सत्य सिखाया नहीं गया वे धर्मी ठहरेंगे। पौलुस ने रोमियों के पहले अध्याय में कहा कि सारा संसार अभक्ति और कृतघ्नता का दोषी है, क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को बिना किसी अपवाद के सब पर इतना प्रकट किया है कि उनके लिए कोई बहाना न रहे (रोमियों 1:20)। वह आगे कहता है, ‘परमेश्वर को जानकर उन्होंने उसे परमेश्वर के योग्य महिमा नहीं दी’; इसलिए उसने उन्हें निकम्मे मन के वश में छोड़ दिया, और उन्हें उनकी अपनी घोर, दुष्ट अभिलाषाओं के हाथ सौंप दिया। पौलुस आगे उन सब घृणित बातों का वर्णन करता है जो वे करते हैं। अन्य बातों के साथ वह हत्या, व्यभिचार, और अन्य बुरी और भ्रष्ट बातों की चर्चा करता है जिनका हमें नाम तक न लेना चाहिए। उसके बाद वह डाह की, जैसा इस अंश में है, और बुरी बातों के गढ़नेवालों की, छल, चुगली, द्वेष, झगड़ों और विवादों की चर्चा करता है। निश्चय ही ये सब हर अविश्वासी में दिखाई नहीं देते! तथापि पौलुस हमें बताता है कि सब अविश्वासी, बड़े से लेकर छोटे तक, परमेश्वर के प्रति कृतघ्न हैं, और उन्होंने उसका योग्य आदर उससे छीन लिया है। इसलिए वे पवित्र वस्तु की चोरी के दोषी हैं, क्योंकि उन्होंने वह सब हटा दिया जो उसका है। इस प्रकार वह उन्हें वह मजदूरी देता है जिसके वे योग्य हुए हैं, इस कारण कि सब पाप के बीज मनुष्य के स्वभाव में पड़े हैं।
तौभी, यद्यपि मनुष्य उतने दुर्गुणों से ठसाठस भरे हैं जितने हम सोच सकते हैं, परमेश्वर अब भी लगाम थामे रहता है और मनुष्यों को बुराई में पूरी तरह छूट नहीं देता। इसी कारण बहुत से अविश्वासी अपनी स्वाभाविक इन्द्रियों के वश में नहीं रहते, वरन् पवित्र और शालीन हैं; वे दूसरे का माल नहीं चुराते, वरन् संयमी और सीधे हैं। संक्षेप में, संसार की राय में उनमें अनेक सद्गुण हैं। तो फिर वे व्यभिचारियों, चोरों और पियक्कड़ों के साथ क्यों दोषी ठहराए जाते हैं? इसलिए कि उनके ये सद्गुण परमेश्वर की आज्ञा मानने की इच्छा से नहीं हैं, क्योंकि उनके हृदयों में खराई नहीं है। वे लज्जा के कारण, या किसी और ऐसे कारण से जो हमें ज्ञात नहीं, रुके रहते हैं। इस रीति से परमेश्वर मानव जाति को बचाए रखता है, कि बातें गड़बड़ी की दशा में न हों, और मनुष्य पूरी तरह पशु-समान न हो जाएँ। परमेश्वर इन अविश्वासियों को इस उद्देश्य से अपने वश में रखता है कि उनके सब सद्गुण, जो भी हों, दुर्गुण ही बने रहें। इसलिए पहला अवसर मिलते ही, जब परमेश्वर उनकी लगाम छोड़ देता है, वे हर प्रकार की बुराई में लग जाते हैं। हम कह सकते हैं कि विश्वासी भी उतनी ही आसानी से कुकर्मी बन सकते हैं। निश्चय, परन्तु परमेश्वर ने उन्हें अन्त तक स्थिर रहने के लिए बल देने की प्रतिज्ञा की है। साथ ही, परमेश्वर की सन्तानों में, जिन्हें उसका पवित्र आत्मा चलाता है, और उन अविश्वासियों में, जो अब भी शारीरिक हैं, बड़ा अन्तर है। परमेश्वर की सन्तान का लक्ष्य और अभिप्राय यह है कि वे अपने आप को उसे समर्पित करें और उसके अनुग्रह से सचमुच शुद्ध किए जाएँ। दूसरे लोग बिना लक्ष्य के भटकते हैं, और यदि वे भले हों, तो उन्हें शायद ही पता हो कि क्यों! वे उसे ‘सद्गुण’ कहेंगे, परन्तु उनके मन में परमेश्वर नहीं होता क्योंकि वे उससे दूर हैं। इस अंश से हमें यही स्मरण रखना चाहिए।
दूसरी ओर, पौलुस कहता है कि ‘आत्मा का फल आनन्द, शान्ति, नम्रता, कृपा, धीरज’ और ऐसी ही बातें हैं। मानो वह यह कह रहा है कि हमारी बड़ी विकृति और इस बात को देखते हुए कि हम बुराई और भ्रष्टता से भरे हैं, यहाँ हमें लगाए रखने के लिए इतना पर्याप्त है कि हम अपने शेष जीवन भर निठल्ले न रहें! अपने पाप के विरुद्ध संघर्ष हमें दिन-रात व्यस्त रखने के लिए पर्याप्त है। फिर भी हमें यह भी आज्ञा दी गई है कि हम दयालु और भले स्वभाव के बनें, संयमी और पवित्र जीवन बिताएँ, और अपने आप को अशुद्ध होने से बचाए रखें। हमें अपने आप को परमेश्वर के लिए बलिदान करके समर्पित करना है, और उस सब से दूर रहना है जिससे हानि हो। अपनी उन्नति खोजने के बदले हमें उन सब की जिन्हें हमारी आवश्यकता है, सहायता और शान्ति के लिए वह सब करना है जो हम कर सकते हैं। जब हम देखते हैं कि हमसे यह सब अपेक्षित है, तो हम पूछते हैं, क्या इसे प्राप्त करना सम्भव है? बिलकुल नहीं; वरन् परमेश्वर के निकट पहुँचने के लिए हमें स्वर्ग तक उठा लिए जाने की आवश्यकता है। जो पवित्रता परमेश्वर व्यवस्था में माँगता है, और जितने भले काम वह हमसे चाहता है, वे इसलिए हैं कि वह हमारे और अपने बीच मेल चाहता है। परन्तु इतनी ऊँची उड़ान भरने के लिए पंख कहाँ हैं? क्योंकि जब तक हम संसार का और अपना त्याग न करें, और जो कुछ हम स्वभाव से हैं उसे न छोड़ दें, तब तक हम न पवित्र हो सकते हैं, न भले, न कृपालु, न संयमी, न सचेत। परन्तु यह हमारी क्षमताओं से परे है। इसलिए यहाँ बहुत कुछ है जो हमें भयभीत करके दूर भगा सकता है।
इसलिए पौलुस यह कहकर समाप्त करता है कि ‘ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं’। दूसरे शब्दों में, यदि हम सचमुच परमेश्वर के आत्मा की अगुआई में चलते हैं, तो हम अब व्यवस्था के अधीन नहीं। यहाँ पौलुस सब विश्वासियों को प्रोत्साहित करता है, जो अपनी निर्बलता का तब तक अनुभव करेंगे जब तक वे अपनी नश्वर देह को पीछे न छोड़ दें। परमेश्वर फिर भी उन्हें थामे रहता है, और उनकी सेवा उसे ग्रहणयोग्य है, यद्यपि वे सिद्धता तक पूरी तरह नवीकृत नहीं हुए हैं। इसलिए उन्हें डटे रहना चाहिए; नहीं तो वे व्याकुल होंगे और निराशा में गिर पड़ेंगे। इसलिए पौलुस यहाँ हमें स्थिर रहने का उपदेश देता है, यह कहते हुए कि यदि हम परमेश्वर के आत्मा की अगुआई में चलते हैं, तो हम अब व्यवस्था के अधीन न रहेंगे।
परन्तु साथ ही वह उन लोगों का परोक्ष रूप से उपहास भी कर रहा है जिनसे उसका झगड़ा है, जैसा हमने आज सवेरे देखा, क्योंकि वे अपने सद्गुणों का बड़े ढोल-नगाड़ों से प्रचार करते थे! आज पोपतन्त्र में भी ऐसा ही है, जहाँ पवित्रता और परमेश्वर की सेवा की चर्चा करने का अर्थ अच्छे कामों और बहुत से रीति-रिवाजों के पालन के सिवा और कुछ नहीं। दूसरे शब्दों में, उन्हें तुच्छ बकवास की चिन्ता है। पोपवादी इसमें और उसमें हाथ डालेगा — वह एक मूरत के आगे झुकेगा, और फिर अगली के पास चला जाएगा। कट्टर लोग अपनी मोमबत्तियाँ जलाएँगे, कई बार पवित्र जल लगाएँगे, यहाँ, वहाँ और सर्वत्र बार-बार क्रूस का चिह्न बनाएँगे, और उपवास के दिनों का ध्यान रखेंगे। वे इन सब बातों का बोझ इसलिए अपने ऊपर लादते हैं कि मिस्सा, या अन्य घृणित कामों के द्वारा अपना छुटकारा कर लें। परमेश्वर की सेवा और आदर इसी प्रकार होता है! पोपवादियों के लिए सिद्धता उसी में है जो झूठ से कम नहीं; मोमबत्तियाँ सुन्दर होनी चाहिए, अंग-वाद्य अच्छा बजना चाहिए, बहुत सी शोभायात्राएँ होनी चाहिए, मूरतों पर अच्छी सोने की परत चढ़ी होनी चाहिए, उन्हें सुगन्धियाँ तैयार करनी चाहिए और सब प्रकार की अन्य मूर्खताओं से प्रसन्न होना चाहिए। यह ठट्ठा है, वरन् घृणित काम है, यद्यपि वे उसे अत्यन्त पुण्य का काम समझते हों।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम कहते हैं कि परमेश्वर की सेवा आत्मिक है, और वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता जो मनुष्यों को दिखाई देता है (यूहन्ना 4:23-24)। परमेश्वर सीधी खराई और हृदय की सच्चाई चाहता है, जैसा यिर्मयाह के पाँचवें अध्याय (आयत तीन) में कहा गया है। परन्तु इसके विपरीत, मनुष्य अपने आप को समझा लेते हैं कि वे परमेश्वर को अपने ही ढंग से और जैसा उन्हें भाए वैसे सन्तुष्ट कर सकते हैं, और इस प्रकार वे उसका रूप बदल देते हैं और कल्पना करते हैं कि वह ठीक उन्हीं के समान है, और इसलिए उनके विचारों से सहमत होगा। इस पर हमें आश्चर्य न होना चाहिए, क्योंकि यद्यपि वे कहते हैं कि उन्हें व्यवस्था सिखाई गई है, वे उसका कभी अध्ययन नहीं करते और सचमुच नहीं जानते कि उसमें क्या है। इसलिए आओ हम सीखें कि यदि हम अपने आप को परमेश्वर की सेवा में लगाना चाहते हैं, तो हमें वह नहीं करना है जो हमें ठीक लगे, क्योंकि हमारे अपने विचार, जैसा हम उन्हें कहते हैं, शैतान के छल ही हैं। हमें उस पर ध्यान देना है जिसकी परमेश्वर ने आज्ञा दी है, और उन बातों में लगे रहना है जिन्हें उसने ठहराया है। आओ हम इन्हें अपना अध्ययन बनाएँ कि हम उसकी आज्ञाकारिता कर सकें।
हमें इस अंश पर जो यहाँ हमारे सामने रखा गया है भली-भाँति ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हम अपने गढ़े हुए विधानों का पालन करने का कितना ही कठिन प्रयत्न करें, इसका अर्थ यह नहीं कि परमेश्वर उनमें से किसी को ग्रहण करेगा। हम अपने स्वभाव के पीछे चल रहे हैं, जो भ्रष्ट है। तो फिर परमेश्वर हमसे क्या करवाना चाहता है? वह हमसे क्या माँगता है? सबसे पहले यह कि हम सब कुटिलता, घृणा और कड़वाहट को छोड़ें; सब फूट, छल, और हर वह बात जिससे हानि होती है, निन्दाएँ, मूर्तिपूजा, निर्दयता, हिंसा, विश्वासघात, डाह और बैर को छोड़ दें। इसलिए यदि हम परमेश्वर की सेवा में लगना चाहते हैं तो हमें अच्छे सैनिक होना चाहिए, और उन कामों के विरुद्ध नहीं जो दिखाई देते हैं और जिन्हें संसार या तो दोषी ठहराता है या सराहता है, वरन् शरीर के कामों के विरुद्ध लड़ना चाहिए। हमारी लड़ाई गुप्त अभिलाषाओं के विरुद्ध है। हम इस मैल से शुद्ध किए जाएँ जो हमारे हृदयों में सड़ रहा है। हम अपना सारा प्रयत्न इसी के लिए लगाएँ; इसलिए नहीं कि हम स्वयं इसे पा सकते हैं, परन्तु हमें परमेश्वर से प्रार्थना करने, और सवेरे-साँझ अपने आप को जाँचने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब हम अपने पापों को पहचान लें, तो हम काँपने और उचित स्रोत से सहायता माँगने के लिए प्रेरित हों। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर उस बुराई का उपचार करे जिससे हम पीड़ित हैं। इसलिए यदि हम अधिकाधिक प्रयत्न करें कि सुखी जीवन बिताएँ, भले स्वभाव के हों, विपत्ति में धीरजवन्त हों, बिना बदला लिए अपमान और हानि सह लें — यदि, मैं कहता हूँ, हम ऐसे हों, तो हमारे पास व्यस्त रहने को बहुत कुछ होगा, और हम कभी निठल्ले न हो सकेंगे।
आओ हम पोपवादियों को परमेश्वर के साथ अपना खिलवाड़ करने दें। वे अपने आप को इतना क्यों खपाते हैं? इसलिए कि वे कभी नहीं जान पाए कि परमेश्वर किस प्रकार सेवा और आदर पाना चाहता है। उनके अनुसार उसके विधान उनकी मूर्खतापूर्ण कल्पनाओं के सामने कुछ भी नहीं। मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ। कोई मनुष्य जीविका के लिए ईमानदारी से परिश्रम करता है; चाहे उसे मन भर केवल मोटी रोटी ही मिले, तौभी वह सवेरे परमेश्वर को पुकारता और साँझ को उसकी स्तुति करता है। यदि उसके बाल-बच्चे हैं, तो वह उन्हें खिलाने-पहनाने के लिए जितना हो सके अपने आप को वंचित रखता है। यदि परमेश्वर उसके घराने पर दुःख भेजता है, तो वह उन्हें धीरज से सहता है। यदि वह कोई हस्तकला या कोई और व्यापार करता है, तो अपने पड़ोसियों को ठगने से बचेगा। वह किसी के साथ अन्याय करने से मर जाना अच्छा समझेगा। यह मनुष्य, जो सबसे पहले एक ईमानदार जीवन बिताता है, इतना ढीठ न होगा कि बिना संकोच अपनी उन्नति चाहे। वह असंयमी आदतों में न पड़ेगा। वह खाने-पीने में संयमी, और सब विपत्तियों में धीरजवन्त होगा। पोपवादियों के अनुसार यह कैसा मनुष्य है? ‘अरे, वह सांसारिक मनुष्य है; अर्थात् वह दुनियादार आदमी है।’ वे परमेश्वर की शुद्ध सेवा को इतना ही मूल्य देते हैं। हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे जो मुख्य सेवा चाहता है वह यह है कि हम अपने आप को पूरी तरह उसे समर्पित करें; इसका अर्थ है कि हम विपत्ति में भी और समृद्धि में भी उसकी महिमा करेंगे, और जब हम बुलाए जाते हैं तब जो हमारा बुलावा है उसका पालन बिना घमण्ड, महत्त्वाकांक्षा या डाह के करेंगे। परमेश्वर इससे प्रसन्न होता है, परन्तु पोपवादियों की परिभाषा के अनुसार जो इस प्रकार जीवन बिताते हैं वे सांसारिक हैं!
तो फिर पोपवादियों के ‘स्वर्गदूत’ कहाँ हैं? मठों के भीतर! जब ये दुष्ट कपटी लोग ठूँस-ठूँसकर खा चुके और उत्तम भोजन से अघा चुके, तब उन्हें समझ नहीं आता कि अपने आप को क्या करें, सिवा जुआ खेलने या अन्य बुराइयाँ करने के। (क्योंकि हम जानते हैं कि पोपतन्त्र के सब मठ पूरे-पूरे वेश्यालय हैं, और परमेश्वर करे वे केवल वेश्यालय ही होते — क्योंकि वे वहाँ ऐसे घोर और भयावह काम करते हैं कि उनके विषय में सुनकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाएँ!) दूसरे शब्दों में, उनकी जीवन-शैली हमें दहला देगी, और फिर भी वे उन गरीब लोगों की तुलना में, जो वैसे जीवन बिताते हैं जैसा हमने पहले बताया, स्वर्गदूत हैं। ऐसा क्यों है? इसलिए कि वे भक्ति से प्रभात-प्रार्थना गाते हैं, मिस्सा गाते हैं और अपने आप को शेष संसार से अलग करते हैं। वे न मिट्टी खोदते हैं, न सिलाई या दर्जीगिरी, या किसी और काम में लगते हैं। उनका जीवन ध्यानमय है, और वे सिद्धता की दशा में हैं। क्या तुम नहीं देखते कि संसार कैसे धोखे में पड़ा है? ऐसे लोग, जो परमेश्वर को छोटी-छोटी मूरतें बना देते हैं, ऐसी बेतुकी भूलें गढ़ने के कारण गड्ढे के भली-भाँति योग्य हैं।
जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, आओ हम जान लें कि हमारा परमेश्वर आत्मा है, और वह चाहता है कि उसकी सेवा आत्मिक रीति से की जाए, जैसा वह अपने वचन में हमसे कहता है। साथ ही, हम उन मूर्खतापूर्ण धारणाओं के जाल में फँसने से सावधान रहें जो इन अभागों को मोहित कर देती हैं; वरन् हम समझें कि परमेश्वर हमसे इसलिए बात करता है कि हम सारी पवित्रता, धार्मिकता और सीधाई के साथ उसकी शरण लें। आओ हम अपने जीवन को व्यवस्था की कसौटी पर नापें, अपनी या संसार की राय पर नहीं। आओ हम उसकी चिन्ता करें जिसकी परमेश्वर आज्ञा देता है और जिसे वह वर्जित करता है, क्योंकि हमें उसे लेखा देना है, और यह जानते हुए कि परमेश्वर के सिवा हमारा कोई और न्यायी नहीं। हम इन सब बातों में अपना अभ्यास करें, यह विश्वास करते हुए कि यदि हम ऐसा करेंगे तो हमारा परिश्रम व्यर्थ न जाएगा। पोपवादियों को छोड़ दो कि वे अपनी टाँगें और गर्दनें तोड़ें, और इस बीच यह भी न जानें कि वे क्या कर रहे हैं, फिर भी परमेश्वर को खिझाते और उसे और अधिक भड़काते रहें। इसलिए कि हम व्यर्थ परिश्रम न करें, या बिना निश्चित लक्ष्य के इधर-उधर इस या उस राय के पीछे न भटकें, आओ हम उन बातों में अपना अभ्यास करें जो पौलुस हमें इस अंश में सिखाता है। तब हम निरर्थक बातों में लगे रहने के कारण दोषी न ठहरेंगे जिन्हें परमेश्वर अस्वीकार करता है, जिनसे घृणा करता है, और जिन्हें तुच्छ घोषित करता है।
अब आओ हम अपने महान परमेश्वर की महिमा के सामने गिर पड़ें, अपने पापों को मानते हुए, और प्रार्थना करते हुए कि वह हमें उनके विषय में अधिकाधिक सचेत करे, कि हम अपने आप को नीचा करें। अपने आप को दोषी ठहराकर आओ हम उसकी शरण लें, यह जानते हुए कि वह उनकी सहायता करने को सदा तैयार रहता है जो उसके अनुग्रह के भूखे हैं और सच्चाई से उसकी इच्छा रखते हैं। चूँकि उसने हमें प्रभु यीशु मसीह को दे दिया है, और उसके आचरण को ऐसे देखता है मानो वह हमारा हो, इसलिए वह अपने पवित्र आत्मा के भण्डार और दान उण्डेले कि हम उनके भागी हों। वह हम में अपना अनुग्रह बढ़ाए, और हम ऐसे सुसज्जित हों कि शैतान, संसार और अपने ही शरीर के साथ अपने सब युद्ध में विजय पाएँ। वह यह अनुग्रह केवल हमें ही नहीं, वरन् पृथ्वी के सब लोगों और जातियों को दिखाए, इत्यादि।
