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पाँचवीं आज्ञा
अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: जिससे जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहे।
35. इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि चूँकि प्रभु अपने ही विधान की रक्षा से प्रसन्न होता है, इसलिए उसके ठहराए हुए पद-क्रम की गरिमा अलंघनीय मानी जानी चाहिए। इसलिए आज्ञा का सार यह होगा कि हम उनकी ओर आदर से देखें जिन्हें प्रभु ने हमारे ऊपर ठहराया है, और उन्हें सम्मान, कृतज्ञता और आज्ञाकारिता दें। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि तिरस्कार, कृतघ्नता या अवज्ञा के रूप में जो कुछ भी है, वह वर्जित है। क्योंकि पवित्रशास्त्र में "आदर" शब्द का अर्थ इतना व्यापक है। इस प्रकार जब प्रेरित कहता है, "जो प्राचीन अच्छी तरह अगुआई करते हैं, वे दुगुने आदर के योग्य समझे जाएँ" (1 तीमुथियुस 5:17), तब वह केवल उस श्रद्धा की ओर संकेत नहीं करता जो उनके प्रति देय है, वरन् उस प्रतिफल की ओर भी जिसके उनकी सेवा अधिकारी है। परन्तु चूँकि अधीन होने की यह आज्ञा मानव मन की हठीली प्रवृत्ति के बहुत प्रतिकूल है (जो महत्त्वाकांक्षी लालसाओं से फूलकर अधीन होना मुश्किल से स्वीकार करता है), इसलिए वह श्रेष्ठता जो सबसे आकर्षक और सबसे कम ईर्ष्या जगानेवाली है, एक उदाहरण के रूप में रखी गई है, जो हमारे मनों को कोमल करने और अधीनता की आदतों की ओर झुकाने के लिये उपयुक्त है। उस अधीनता से, जिसे सहना सबसे सरल है, प्रभु धीरे-धीरे हमें हर प्रकार की वैध अधीनता का अभ्यस्त बनाता है, क्योंकि सब में वही सिद्धान्त काम करता है। क्योंकि जिन्हें वह ऊँचे पदों पर बिठाता है, उन्हें अपना अधिकार उतने अंश तक सौंपता है जितना उनके पद को बनाए रखने के लिये आवश्यक है। पिता, परमेश्वर और प्रभु की उपाधियाँ अकेले उसी में मिलती हैं, और इसलिए जब कभी उनमें से कोई एक कही जाए, तब हमारा मन श्रद्धा के उसी भाव से भर जाना चाहिए। इसलिए जिन्हें वह ऐसी उपाधियाँ देता है, उन्हें वह अपने तेज की किसी छोटी-सी चिंगारी से विशिष्ट करता है, ताकि वे अपने-अपने स्थान में आदर के अधिकारी हों। इस प्रकार हमें यह मानना चाहिए कि हमारे सांसारिक पिता में कुछ ईश्वरीय स्वभाव है, क्योंकि उसके ईश्वरीय उपाधि धारण करने का कोई कारण है, और जो हमारा शासक और अधिपति है उसे परमेश्वर के सम्मान में कुछ सहभागिता प्राप्त है।
36. इसलिए हमें इसमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि प्रभु यहाँ यह सार्वभौमिक नियम बताता है—अर्थात् यह जानकर कि हर व्यक्ति उसकी नियुक्ति से हमारे ऊपर ठहराया गया है, हमें उसके प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, आज्ञाकारिता और अपनी सामर्थ्य में हर कर्तव्य निभाना चाहिए। और इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि जिन्हें यह आदर दिया गया है वे योग्य हैं या नहीं। वे जैसे भी हों, सर्वशक्तिमान उन्हें उनका पद देकर दिखाता है कि वह चाहता है कि उनका आदर हो। आज्ञा उस श्रद्धा का उल्लेख करती है जो उनके प्रति देय है जिनके हम अपने अस्तित्व के ऋणी हैं। इसे प्रकृति स्वयं कुछ अंश तक हमें सिखानी चाहिए। क्योंकि वे मनुष्य नहीं, राक्षस हैं जो अहंकार और अपमान के साथ पितृ-अधिकार का उल्लंघन करते हैं। इसीलिए प्रभु आज्ञा देता है कि जो अपने माता-पिता के विरुद्ध विद्रोह करते हैं, वे मार डाले जाएँ, क्योंकि वे मानो उस प्रकाश के योग्य नहीं जिसे देखने के लिये वे जिनके ऋणी हैं उनका कोई लिहाज नहीं करते। और व्यवस्था के विविध परिशिष्टों से यह स्पष्ट है कि हमने जो कहा वह सही था, कि यहाँ जिस आदर का उल्लेख है वह तीन भागों का है—श्रद्धा, आज्ञाकारिता और कृतज्ञता। इनमें पहली को प्रभु तब लागू करता है जब वह आज्ञा देता है कि जो अपने पिता या माता को कोसे वह मार डाला जाए। इस प्रकार वह अपमान और तिरस्कार का बदला लेता है। दूसरी को वह तब लागू करता है जब वह अवज्ञाकारी और विद्रोही सन्तान के लिये मृत्युदण्ड की घोषणा करता है। तीसरी से हमारे उद्धारकर्ता का यह कथन सम्बन्ध रखता है कि परमेश्वर हमसे अपने माता-पिता का भला करने की अपेक्षा करता है (मत्ती 15)। और जब कभी पौलुस इस आज्ञा का उल्लेख करता है, तब वह इसकी व्याख्या आज्ञाकारिता की आज्ञा के रूप में करता है। [213]
37. सिफ़ारिश के रूप में एक प्रतिज्ञा जोड़ी गई है, कि हमें और अच्छी तरह स्मरण रहे कि यहाँ माँगी गई अधीनता परमेश्वर को कितनी प्रिय है। पौलुस हमें हमारी सुस्ती से जगाने के लिये यह प्रेरणा लागू करता है, जब वह इसे प्रतिज्ञा सहित पहली आज्ञा कहता है; क्योंकि पहली पटिया में जो प्रतिज्ञा है वह किसी एक आज्ञा के लिये विशेष रूप से नहीं, वरन् सारी व्यवस्था के लिये है। इसके अतिरिक्त, प्रतिज्ञा को जिस अर्थ में लेना चाहिए वह यह है:—प्रभु ने इस्राएलियों से विशेष रूप से उस देश की बात की जिसे उसने उन्हें मीरास के रूप में देने की प्रतिज्ञा की थी। यदि इस देश का अधिकार ईश्वरीय अनुग्रह का बयाना था, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि प्रभु ने दीर्घायु देकर अपना अनुग्रह प्रकट करना चाहा, क्योंकि इस प्रकार वे उसकी कृपा का देर तक आनन्द ले सकते थे। इसलिए अर्थ यह है: अपने पिता और अपनी माता का आदर कर, कि तू दीर्घ जीवन के दौरान उस देश के अधिकार का आनन्द ले सके जो मेरे अनुग्रह की साक्षी में तुझे दिया जाएगा। परन्तु चूँकि विश्वासियों के लिये सारी पृथ्वी आशीषित है, इसलिए हम उचित ही वर्तमान जीवन को ईश्वरीय आशीषों में गिनते हैं। इसलिए यह प्रतिज्ञा उसी प्रकार हम पर भी लागू होती है, क्योंकि वर्तमान जीवन की अवधि हमारे प्रति ईश्वरीय कृपा का प्रमाण है। यह हमसे नहीं की गई, और न यहूदियों से की गई थी, मानो वह अपने आप में सुख हो, वरन् इसलिए कि वह भक्तों के प्रति ईश्वरीय अनुग्रह का एक साधारण चिह्न है। इसलिए यदि माता-पिता का आज्ञाकारी कोई व्यक्ति परिपक्व आयु से पहले ही उठा लिया जाए (जो बात प्रायः होती रहती है), तो भी प्रभु अपनी प्रतिज्ञा पर उतनी ही दृढ़ता से स्थिर रहता है जितनी तब जब वह एक एकड़ की प्रतिज्ञा करके सौ एकड़ भूमि देता है। सब कुछ इसी में है: हमें यह मानना चाहिए कि दीर्घायु की प्रतिज्ञा केवल उतने अंश में है जितने अंश में वह परमेश्वर की ओर से आशीष है, और वह आशीष केवल उतने अंश में है जितने अंश में वह ईश्वरीय अनुग्रह का प्रकटीकरण है। तो भी वह अपने सेवकों के लिये इसे मृत्यु के द्वारा अधिक प्रचुरता और ठोस रूप से साक्षी देता और सचमुच प्रकट करता है।
38. इसके अतिरिक्त, जब प्रभु उन सन्तानों को वर्तमान जीवन की आशीष की प्रतिज्ञा देता है जो अपने माता-पिता का उचित आदर करती हैं, तब वह साथ ही यह भी जताता है कि विद्रोही और अवज्ञाकारी लोगों पर एक अटल शाप मँडरा रहा है; और ताकि वह पूरा होने से न चूके, वह अपनी व्यवस्था में उन पर मृत्युदण्ड की आज्ञा सुनाता और उसे दिए जाने का आदेश देता है। यदि वे उस न्याय से बच निकलें, तो वह किसी न किसी रीति से बदला लेगा। क्योंकि हम देखते हैं कि इस प्रकार के लोगों की कितनी बड़ी संख्या या तो युद्ध में या झगड़ों में गिर जाती है; दूसरे अनोखी विपत्तियों से घिर जाते हैं, और लगभग सब इस बात का प्रमाण हैं कि यह चेतावनी व्यर्थ नहीं दी गई। परन्तु यदि कोई अत्यन्त वृद्धावस्था तक बच भी जाए, तो भी, चूँकि वह इस जीवन में परमेश्वर की आशीष से वंचित है, वह केवल दुष्टता में घुलता रहता है, और आनेवाले संसार में और भी कठोर दण्ड के लिये रखा जाता है; वह आज्ञाकारी सन्तानों से की गई प्रतिज्ञा की आशीष में भागी होने से बहुत दूर है। प्रसंगवश यह ध्यान देना चाहिए कि हमें माता-पिता की आज्ञा केवल प्रभु में माननी है। यह पहले बताए गए सिद्धान्त से स्पष्ट है: क्योंकि जिस स्थान पर वे हैं वह ऐसा है जिस तक प्रभु ने उन्हें अपने सम्मान का एक अंश देकर ऊँचा उठाया है। इसलिए उन्हें दी जानेवाली अधीनता परम पिता तक पहुँचने की हमारी चढ़ाई में एक सीढ़ी होनी चाहिए, और इसीलिए यदि वे हमें व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिये उकसाएँ, तो वे माता-पिता नहीं, वरन् ऐसे परायों के समान गिने जाने के योग्य हैं जो हमें हमारे सच्चे पिता की आज्ञाकारिता से बहकाने का प्रयत्न करते हैं। यही बात शासकों, स्वामियों और हर प्रकार के अधिकारियों के विषय में है। क्योंकि यह अनुचित और बेतुका होगा कि उनकी उन्नति से परमेश्वर का सम्मान घटे—ऐसी उन्नति जो उसी से प्राप्त होने के कारण हमें उसी तक ले जानी चाहिए। [214]
