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दसवीं आज्ञा
तू अपने पड़ोसी के घर का लालच न करना, तू अपने पड़ोसी की स्त्री का, न उसके दास का, न उसकी दासी का, न उसके बैल का, न उसके गधे का, न उसकी किसी भी वस्तु का लालच करना।
49. इसका आशय यह है: चूँकि प्रभु चाहता है कि सारी आत्मा प्रेम से परिपूर्ण हो, इसलिए हमारे मनों से प्रेम के विरुद्ध हर भावना निकाल दी जानी चाहिए। अतः सार यह होगा कि कोई ऐसा विचार हमारे मनों में घुसने न पाए, और उन्हें ऐसी हानिकारक लालसा से भर न दे जो हमारे पड़ोसी की हानि की ओर ले जाती हो। इसके अनुरूप विपरीत आज्ञा यह है कि जो कुछ हम सोचें, विचारें, चाहें या ठानें, वह सब हमारे पड़ोसी की भलाई और लाभ के साथ जुड़ा हो। परन्तु यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सामने एक बड़ी और उलझन-भरी कठिनाई खड़ी हो जाती है। क्योंकि यदि ऊपर यह ठीक ही कहा गया था कि व्यभिचार और चोरी के शब्दों के अन्तर्गत वासना तथा हानि पहुँचाने और छल करने के अभिप्राय को भी वर्जित किया गया है, तो फिर पड़ोसी की सम्पत्ति के लोभी अभिलाषा को रोकने के लिए एक अलग आज्ञा का प्रयोग करना व्यर्थ प्रतीत हो सकता है। यह कठिनाई सरलता से दूर हो जाएगी, यदि हम अभिप्राय और लोभ के बीच भेद करें। [218] अभिप्राय, जैसा हम पिछली आज्ञाओं में कह चुके हैं, वह इच्छा की सोची-समझी सहमति है जो तब होती है जब मन पर आवेग अधिकार कर चुका हो। लोभ ऐसे विचार-विमर्श और सहमति के बिना भी हो सकता है, जब मन केवल व्यर्थ और बिगड़ी हुई वस्तुओं से उत्तेजित और गुदगुदाया जाता है। इसलिए जैसे प्रभु ने पहले आज्ञा दी थी कि हमारी कामनाओं, प्रयत्नों और कार्यों को प्रेम नियन्त्रित करे, वैसे ही अब वह हमें आज्ञा देता है कि मन के विचारों को भी उसी रीति से नियन्त्रित करें, ताकि उनमें से कोई भी भ्रष्ट और टेढ़ा न हो जाए, कि मन को विपरीत झुकाव दे। क्रोध, घृणा, व्यभिचार, चोरी और झूठ की ओर अपने मन को मोड़ने और झुकाने से रोक देने के बाद, अब वह हमें अपने विचारों को वही दिशा देने से रोकता है।
50. और ऐसी सीधाई की माँग निराधार नहीं है। क्योंकि मन की सारी शक्तियों को प्रेम से भर देने की उपयुक्तता को कौन नकार सकता है? यदि वह प्रेम को अपना लक्ष्य बनाना छोड़ दे, तो कौन सन्देह कर सकता है कि वह रोगी है? तेरे मन में अपने भाई को हानि पहुँचानेवाली इतनी कामनाएँ क्यों प्रवेश करती हैं, सिवाय इसके कि तू उसकी उपेक्षा करके केवल अपने ही विषय में सोचता है? यदि तेरा मन पूर्णतः प्रेम से रंगा होता, तो ऐसे विचारों के प्रवेश के लिए उसमें कोई भाग शेष न रहता। इसलिए जिस मात्रा में मन प्रेम से रहित है, उसी मात्रा में वह लालसा के प्रभाव में होगा। कोई यह आपत्ति करेगा कि जो कल्पनाएँ संयोग से मन में उठती हैं और तुरन्त मिट जाती हैं, उन्हें उचित रीति से लालसा नहीं ठहराया जा सकता, जिनका निवास हृदय में होता है। मैं उत्तर देता हूँ कि यहाँ प्रश्न ऐसी कल्पनाओं का है, जो हमारे विचारों में उपस्थित होते हुए ही साथ-साथ मन पर लालच की छाप डालती और उसे उकसाती हैं, क्योंकि मन किसी वस्तु को चुनने की बात कभी सोचता ही नहीं, जब तक हृदय उत्तेजित होकर उसकी ओर न झुके। अतः परमेश्वर एक प्रबल और उत्कट भाव की आज्ञा देता है, ऐसा भाव जिसमें लालसा का छोटे-से-छोटा अंश भी बाधा न डाले। वह ऐसे उत्तम रीति से व्यवस्थित मन की माँग करता है जो प्रेम की व्यवस्था के विरुद्ध थोड़ा-सा भी न उकसाया जाए। ऐसा न हो कि तू सोचे कि इस मत को किसी गम्भीर अधिकारी का समर्थन नहीं मिला, मैं बता दूँ कि यह विचार सबसे पहले मुझे अगस्तीन से मिला। [219] परन्तु यद्यपि परमेश्वर का अभिप्राय हर प्रकार की बिगड़ी हुई अभिलाषा को वर्जित करना था, तथापि उसने उदाहरण के रूप में हमारे सामने वे वस्तुएँ रखीं जो सामान्यतः सबसे अधिक आकर्षक मानी जाती हैं; इस प्रकार जिन वस्तुओं में लालच विशेष रूप से आनन्दित होता और मनमानी करना चाहता है, उन्हें वर्जित करके उसने किसी भी प्रकार के लालच के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा।
तो यह है व्यवस्था की दूसरी पटिया, जिसमें हमें उन कर्तव्यों की पर्याप्त शिक्षा मिलती है जो हम परमेश्वर के निमित्त मनुष्य के प्रति रखते हैं; इसके स्वरूप पर विचार करने ही से प्रेम की सारी व्यवस्था टिकी है। इसलिए इस पटिया में सिखाए गए अनेक कर्तव्यों का उपदेश देना व्यर्थ होगा, यदि तू अपनी शिक्षा की नींव परमेश्वर के भय और श्रद्धा पर न रखे। विचारशील पाठक को मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग लोभ की मनाही की दो आज्ञाएँ बनाते हैं, वे एक ही वस्तु को उलटी रीति से दो भागों में चीर देते हैं। “तू लालच न करना” शब्दों की पुनरावृत्ति में कोई विशेष बात नहीं है। पहले “घर” का उल्लेख किया गया है, फिर उसके भिन्न-भिन्न अंग गिनाए गए हैं, जिनका आरम्भ “स्त्री” से होता है; अतः स्पष्ट है कि सारे को लगातार एक साथ पढ़ा जाना चाहिए, जैसा यहूदी ठीक ही करते हैं। इसलिए सारी आज्ञा का सार यह है कि हर एक व्यक्ति के पास जो कुछ है वह पूर्ण और सुरक्षित रहे, केवल हानि से या हानि की इच्छा से ही नहीं, वरन् लोभ की उस अत्यन्त हल्की भावना से भी जो मन में उठ सकती है।
51. अब सारी व्यवस्था के सामने रखे हुए सामान्य उद्देश्य का पता लगाना कठिन नहीं होगा, अर्थात् धार्मिकता की पूर्ति, कि मनुष्य अपना जीवन ईश्वरीय पवित्रता के नमूने पर ढाले। क्योंकि उसमें परमेश्वर ने अपना स्वभाव ऐसा चित्रित किया है कि जो कोई आज्ञा की हुई बात को कर्म में दिखाए, वह किसी हद तक परमेश्वर का जीवित स्वरूप प्रकट करेगा। इसीलिए मूसा ने जब सारे का सार इस्राएलियों की स्मृति में बैठाना चाहा, तब उनसे यों कहा, “और अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा का भय माने, और उसके सब मार्गों पर चले, और उससे प्रेम रखे, और अपने पूर्ण मन और सारे प्राण से अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा करे, और यहोवा की जो जो आज्ञा और विधि मैं आज तुझे तेरे भले के लिए सुनाता हूँ उनको माने?” (व्यवस्थाविवरण 10:12, 13)। और जब-जब व्यवस्था के उद्देश्य का उल्लेख करने का अवसर आया, तब-तब वह इसी बात को दोहराने से न थमा। व्यवस्था की शिक्षा इसी पर इतना ध्यान देती है कि वह मनुष्य को जीवन की पवित्रता के द्वारा उसके परमेश्वर से जोड़ती है, और, जैसा मूसा ने अन्यत्र कहा है (व्यवस्थाविवरण 6:5; 11:13), उसे उसी से लिपटाए रखती है। फिर जीवन की यह पवित्रता ऊपर बताए गए दो शीर्षकों के अन्तर्गत समाई हुई है। “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे हृदय, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी बुद्धि, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।” पहले हमारा मन परमेश्वर के प्रेम से पूरी तरह भर जाना चाहिए, और फिर यह प्रेम तुरन्त हमारे पड़ोसी की ओर बह निकले। यह बात प्रेरित इन शब्दों में दिखाता है, “आज्ञा का सारांश यह है कि शुद्ध मन और अच्छे विवेक और निष्कपट विश्वास से प्रेम उत्पन्न हो” (1 तीमुथियुस 1:5)। तू देखता है कि विवेक और निष्कपट विश्वास, अर्थात् सच्ची भक्ति, सबसे ऊपर रखे गए हैं, और उसी से प्रेम निकलता है। इसलिए यह समझना भूल है कि व्यवस्था में केवल धार्मिकता की आरम्भिक बातें और पहले सिद्धान्त दिए गए हैं, मानो वे भले कर्मों की किसी प्रकार की भूमिका बनाने के लिए हैं, उनके सिद्ध पालन की ओर मार्ग दिखाने के लिए नहीं। सम्पूर्ण सिद्धता के लिए मूसा और पौलुस के इन वचनों में कही गई बातों से अधिक कुछ नहीं माँगा जा सकता। वह भला कहाँ तक जाना चाहेगा, जो उस शिक्षा से सन्तुष्ट नहीं जो मनुष्य को परमेश्वर के भय, आत्मिक आराधना, व्यावहारिक आज्ञाकारिता की ओर, और अन्ततः विवेक की शुद्धता, निष्कपट विश्वास और प्रेम की ओर ले जाती है? इससे व्यवस्था की उस व्याख्या की पुष्टि होती है जो उसकी आज्ञाओं में भक्ति और प्रेम के सब कर्तव्यों को खोजती और पाती है। जो लोग केवल सूखी और दुबली-पतली आरम्भिक बातें ढूँढ़ते हैं, मानो वह परमेश्वर की इच्छा को केवल आधा सिखाती है, वे उसके उद्देश्य को कदापि नहीं समझते, जैसा प्रेरित साक्षी है।
52. चूँकि व्यवस्था का सारांश देते समय मसीह और प्रेरित कभी-कभी पहली पटिया को छोड़ देते हैं, इसलिए बहुत से लोग यह समझने की भूल में पड़ जाते हैं कि उनके शब्द दोनों पटियाओं पर लागू होते हैं। मत्ती में मसीह “न्याय, दया और विश्वास” को “व्यवस्था की गम्भीर बातें” कहता है। मैं समझता हूँ कि यह स्पष्ट है कि यहाँ विश्वास का अर्थ मनुष्यों के प्रति सच्चाई है। परन्तु इन शब्दों को सारी व्यवस्था पर लागू करने के लिए कुछ लोग इसे परमेश्वर के प्रति भक्ति मान लेते हैं। यह निश्चय ही व्यर्थ है। क्योंकि मसीह उन कर्मों की बात कर रहा है जिनके द्वारा मनुष्य को अपने आपको धर्मी प्रमाणित करना चाहिए। यदि हम इस पर ध्यान दें, तो हमें इस पर आश्चर्य करना छोड़ देना चाहिए कि अन्यत्र जब उस जवान ने उससे पूछा, “मैं कौन सा भला काम करूँ कि अनन्त जीवन पाऊँ?” तब वह केवल यह उत्तर देता है कि उसे आज्ञाएँ माननी चाहिए, “हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: और, अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना” (मत्ती 19:16, 18)। क्योंकि पहली पटिया की आज्ञाकारिता लगभग पूरी तरह या तो हृदय की भीतरी भावना में थी, या रीति-रिवाजों में। हृदय की भावना दिखाई नहीं देती थी, और कपटी लोग रीति-रिवाजों के पालन में परिश्रमी थे; परन्तु प्रेम के कर्म ऐसे थे कि वे धार्मिकता की ठोस गवाही बन जाते थे। यही बात भविष्यद्वक्ताओं में इतनी बार आती है कि जिसे उनकी थोड़ी भी जान-पहचान है, उसे यह परिचित होनी चाहिए। [220] क्योंकि वे लगभग हर अवसर पर, जब लोगों को पश्चाताप के लिए उभारते हैं, तब पहली पटिया को छोड़कर विश्वास, न्याय, दया और खरेपन पर बल देते हैं। इस प्रकार वे परमेश्वर का भय नहीं छोड़ देते। वे तो केवल उसके चिह्नों से उसका गम्भीर प्रमाण माँगते हैं। यह सर्वविदित है कि जब वे व्यवस्था की चर्चा करते हैं, तब सामान्यतः दूसरी पटिया पर बल देते हैं, क्योंकि उसमें धार्मिकता और खरेपन का अभ्यास सबसे भली भाँति प्रकट होता है। वचन उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं। हर कोई स्वयं सरलता से मेरे कथन की सच्चाई देख सकता है।
53. तो क्या यह सच है, तू पूछेगा, कि मनुष्यों के साथ निर्दोष रीति से जीना परमेश्वर के प्रति भक्तिपूर्वक जीने से धार्मिकता का अधिक पूर्ण सारांश है? कदापि नहीं; परन्तु चूँकि कोई मनुष्य परमेश्वर का सच्चा भय माने बिना स्वाभाविक रूप से सब बातों में प्रेम का निर्वाह नहीं करता, इसलिए ऐसा निर्वाह भक्ति का भी प्रमाण है। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि प्रभु भली भाँति जानता है कि हमारा कोई भी भला काम उस तक नहीं पहुँच सकता (जैसा भजनकार घोषणा करता है, भजन संहिता 16:2), इसलिए वह हमसे अपने प्रति कर्तव्य नहीं माँगता, वरन् हमें अपने पड़ोसी के प्रति भले कामों में लगाता है। इसी कारण प्रेरित बिना कारण नहीं, सन्तों की सारी सिद्धता प्रेम में बताता है (इफिसियों 3:19; कुलुस्सियों 3:14)। और अन्य स्थान में वह उसे उचित ही “व्यवस्था की पूर्ति” कहता है, और जोड़ता है कि “जो दूसरे से प्रेम रखता है उसने व्यवस्था पूरी की है” (रोमियों 13:8)। और फिर, “सारी व्यवस्था इस एक बात में पूरी हो जाती है: तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना” (गलातियों 5:14)। क्योंकि यही बात मसीह स्वयं सिखाता है जब वह कहता है, “इसलिए जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है” (मत्ती 7:12)। निश्चित है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में विश्वास, और जो कुछ परमेश्वर की उचित आराधना से सम्बन्ध रखता है, वह पहला स्थान रखता है, और प्रेम उसके अधीन किया गया है; परन्तु हमारे प्रभु का अर्थ यह है कि व्यवस्था में मनुष्यों के प्रति न्याय और खरेपन का पालन उस साधन के रूप में निर्धारित किया गया है जिसके द्वारा हम परमेश्वर के प्रति भक्तिपूर्ण भय की साक्षी दें, यदि वह हम में सचमुच हो।
54. इसलिए हम यह मानें कि हमारा जीवन परमेश्वर की इच्छा और उसकी व्यवस्था की माँगों के सर्वोत्तम अनुरूप तब ढलेगा, जब वह सब बातों में हमारे भाइयों के लिए अधिकतम लाभदायक हो। परन्तु सारी व्यवस्था में एक भी अक्षर ऐसा नहीं जो इस विषय में नियम बाँधे कि मनुष्य अपनी शारीरिक प्रकृति के लाभ के लिए क्या करे या किससे बचे। और वास्तव में, चूँकि मनुष्य स्वभाव से अत्यधिक आत्म-प्रेम की ओर झुके हुए हैं, जिसे वे सदा बनाए रखते हैं, चाहे वे सत्य से कितनी ही दूर क्यों न भटक गए हों, इसलिए पहले से ही अति मात्रा में विद्यमान प्रेम को भड़काने के लिए व्यवस्था की कोई आवश्यकता नहीं थी। अतः यह पूर्णतः स्पष्ट है, [221] कि आज्ञाओं का पालन अपने आपसे प्रेम रखने में नहीं, वरन् परमेश्वर और पड़ोसी से प्रेम रखने में है; और जो जितना कम हो सके अपने लिए सोचता और जीता है, वही सबसे उत्तम और पवित्र जीवन बिताता है; और उससे बुरा और अधिक अधर्मी जीवन कोई नहीं बिताता जो केवल अपने लिए सोचता और जीता है, और केवल अपनी ही वस्तुओं को खोजता और उन्हीं की चिन्ता करता है। वरन् यह दिखाने के लिए कि हमें अपने पड़ोसी से प्रेम करने की ओर कितना झुका होना चाहिए, प्रभु ने आत्म-प्रेम को मानो मापदण्ड बना दिया है, क्योंकि हमारे स्वभाव में उससे अधिक बलवान और तीव्र कोई भावना नहीं। इस कथन के बल को ध्यान से तौलना चाहिए। क्योंकि वह (जैसा कुछ तर्कशास्त्रियों ने मूर्खता से सोच लिया है) पहला स्थान आत्म-प्रेम को और दूसरा प्रेम को नहीं देता। वह तो उस प्रेम को, जो हम स्वभाव से अपने लिए रखते हैं, दूसरों की ओर मोड़ देता है। इसी कारण प्रेरित घोषणा करता है कि प्रेम “अपनी भलाई नहीं चाहता” (1 कुरिन्थियों 13:5)। न उस तर्क का एक तिनके जितना मूल्य है कि जिस वस्तु को नियन्त्रित किया जाता है वह सदा नियन्त्रक से निम्न होनी चाहिए। प्रभु ने आत्म-प्रेम को इस प्रकार नियम नहीं बनाया कि दूसरों के प्रति प्रेम उसके अधीन हो; परन्तु चूँकि स्वाभाविक भ्रष्टता के कारण प्रेम की भावना सामान्यतः हमारे ही ऊपर टिकी रहती है, इसलिए वह दिखाता है कि उसे दूसरी दिशा में फैलना चाहिए, कि हम अपने पड़ोसी का भला करने के लिए उतने ही उत्साह, उतनी ही उमंग और उतनी ही चिन्ता के साथ तत्पर हों जितनी अपने लिए।
55. हमारे उद्धारकर्ता ने सामरी के दृष्टान्त में (लूका 10:36) दिखा दिया है कि पड़ोसी शब्द में सबसे दूर का परदेशी भी आ जाता है, इसलिए प्रेम की आज्ञा को अपने ही सम्बन्धियों तक सीमित करने का कोई कारण नहीं। मैं इनकार नहीं करता कि जितना निकट का सम्बन्ध हो, उतनी ही बार हमारे दया के कार्य होने चाहिए। क्योंकि मानवीय स्थिति माँग करती है कि जो लोग रिश्ते, मित्रता या पड़ोस के बन्धनों से अधिक निकट जुड़े हैं, उनके बीच अधिक साझे कर्तव्य हों। और यह परमेश्वर को बिना ठेस पहुँचाए किया जाता है, जिसके विधान से हम एक प्रकार से ऐसा करने के लिए प्रेरित होते हैं। परन्तु मैं कहता हूँ कि सारी मानव जाति को बिना किसी अपवाद के प्रेम की एक ही भावना में समेटना चाहिए: कि यहाँ यूनानी या असभ्य, योग्य या अयोग्य, मित्र या शत्रु का कोई भेद नहीं, क्योंकि सबको उनके अपने आप में नहीं, वरन् परमेश्वर में देखना चाहिए। यदि हम इस दृष्टि से मुड़ जाएँ, तो कोई आश्चर्य नहीं कि हम भ्रम में उलझ जाते हैं। इसलिए यदि हम प्रेम में सच्चे मार्ग पर बने रहना चाहें, तो हमारा पहला कदम यह होना चाहिए कि हम अपनी आँखें मनुष्य की ओर न लगाएँ, जिसे देखकर प्रेम की अपेक्षा घृणा ही अधिक बार उत्पन्न हो, वरन् परमेश्वर की ओर लगाएँ, जो माँग करता है कि जो प्रेम हम उससे रखते हैं वह सारी मानव जाति में फैले, ताकि हमारा मूल सिद्धान्त सदा यही रहे: मनुष्य कैसा भी हो, वह तब भी प्रेम के योग्य है, क्योंकि परमेश्वर से प्रेम किया जाता है।
56. इसलिए विद्वत्तावादियों की अज्ञानता या दुष्टता से अधिक घातक कुछ नहीं हो सकता था, जिन्होंने बदला लेने और शत्रुओं से प्रेम रखने की आज्ञाओं को (जो आज्ञाएँ पहले सब यहूदियों को दी गई थीं, और फिर सब मसीहियों को सार्वभौमिक रूप से दी गईं) ऐसी सलाहों में बदल दिया, जिन्हें मानना या न मानना स्वतन्त्र था, और उनके अनिवार्य पालन को केवल भिक्षुओं तक सीमित कर दिया, जो केवल इस बात से साधारण मसीहियों की अपेक्षा अधिक धर्मी ठहरा दिए गए कि उन्होंने स्वेच्छा से सलाहों का पालन करने का बन्धन अपने ऊपर ले लिया। उन्हें व्यवस्था के रूप में न मानने का जो कारण वे देते हैं, वह यह है कि वे बहुत भारी और बोझिल प्रतीत होती हैं, विशेषकर मसीहियों के लिए, जो अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन हैं। क्या सचमुच उनमें इतना दुस्साहस है कि वे अपने पड़ोसी से प्रेम के विषय में परमेश्वर की सनातन व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ें? क्या व्यवस्था का कोई पृष्ठ है जिसमें ऐसा कोई भेद पाया जाता हो; या क्या हमें हर पृष्ठ पर ऐसी आज्ञाएँ नहीं मिलतीं जो कठोरतम शब्दों में हमसे शत्रुओं से प्रेम करने की माँग करती हैं? इस आज्ञा का क्या अर्थ है कि यदि हमारा शत्रु भूखा हो तो उसे खिलाएँ, यदि उसका बैल या गधा भटकता हुआ मिले तो उसे लौटा लाएँ, या यदि उसे बोझ के नीचे पड़ा देखें तो उसे उठाने में सहायता करें? (नीतिवचन 25:21; निर्गमन 23:4)। क्या हम मनुष्य के निमित्त पशुओं पर तो दया दिखाएँ, और स्वयं उसके प्रति कोई सद्भावना न रखें? क्या? क्या प्रभु का यह वचन सनातन सत्य नहीं: “पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा?” (व्यवस्थाविवरण 32:35)। यह अन्यत्र और अधिक स्पष्टता से कहा गया है: “तू बदला न लेना, और न अपने जाति भाइयों से बैर रखना” (लैव्यव्यवस्था 19:18)। वे या तो इन वचनों को व्यवस्था में से मिटा दें, या प्रभु को व्यवस्था देनेवाला स्वीकार करें, और उसे झूठमूठ केवल सलाहकार न बनाएँ।
57. और भला, इस वचन का क्या अर्थ है जिसका उन्होंने इस बेतुकी टीका के द्वारा अपमान करने का साहस किया है? “अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप दें उन्हें आशीष दो, जो तुम से बैर रखें उनका भला करो, और जो तुम्हारा अपमान करें और तुम्हें सताएँ उनके लिए प्रार्थना करो; जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरो” (मत्ती 5:44, 45)। यहाँ कौन क्राइसोस्टम के उस तर्क से सहमत नहीं होगा (lib. de Compunctione Cordis, और रोमियों 7 पर), कि प्रेरणा का स्वरूप ही स्पष्ट कर देता है कि ये उपदेश नहीं, वरन् आज्ञाएँ हैं? क्योंकि यदि हम परमेश्वर की सन्तान की गिनती से निकाल दिए जाएँ तो हमारे पास क्या रह जाता है? विद्वत्तावादियों के अनुसार केवल भिक्षु ही स्वर्ग में हमारे पिता की सन्तान होंगे, केवल भिक्षु ही परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकारने का साहस करेंगे। और इस बीच कलीसिया का क्या होगा? उसी नियम से वह अन्यजातियों और चुंगी लेनेवालों तक सीमित रह जाएगी। क्योंकि हमारा उद्धारकर्ता कहता है, “यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिए क्या प्रतिफल है? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते?” यदि हमारे पास केवल मसीही नाम बचे, और हम स्वर्ग के राज्य के उत्तराधिकार से वंचित कर दिए जाएँ, तो सचमुच हमारी बड़ी भलाई होगी! अगस्तीन का तर्क भी कम सशक्त नहीं: “जब प्रभु व्यभिचार को वर्जित करता है, तब वह शत्रु की स्त्री के विषय में भी उसे उतना ही वर्जित करता है जितना मित्र की स्त्री के विषय में; जब वह चोरी को वर्जित करता है, तब वह किसी भी प्रकार की चोरी की अनुमति नहीं देता, चाहे मित्र से हो या शत्रु से” (अगस्तीन, Lib. de Doctr. Christ)। अब इन दो आज्ञाओं को, “तू चोरी न करना, तू व्यभिचार न करना,” पौलुस प्रेम के नियम के अधीन ले आता है; वरन् वह कहता है कि वे संक्षेप में इस वचन में समाई हैं, “तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना” (रोमियों 13:9)। इसलिए, या तो पौलुस व्यवस्था का झूठा व्याख्याकार ठहरे, या हमें अनिवार्य रूप से यह निष्कर्ष निकालना होगा कि इस आज्ञा के अधीन हम अपने शत्रुओं से वैसे ही प्रेम रखने के लिए बँधे हैं जैसे अपने मित्रों से। अतः जो इस प्रकार स्वच्छन्दता से उस जुए को उतार फेंकते हैं जो परमेश्वर की सन्तान के लिए साझा है, वे सचमुच अपने आपको शैतान की सन्तान प्रमाणित करते हैं। यह सन्देह किया जा सकता है कि इस सिद्धान्त का प्रचार करने में उन्होंने अधिक मूर्खता दिखाई या अधिक ढिठाई। कोई प्राचीन लेखक ऐसा नहीं जो इसे निश्चित न माने कि ये शुद्ध आज्ञाएँ हैं। ग्रेगोरी के युग में भी इस पर सन्देह नहीं किया गया था, जैसा उसके दृढ़ कथन से स्पष्ट है; क्योंकि वह इसे निर्विवाद मानता है कि वे आज्ञाएँ हैं। और वे कितनी मूर्खता से तर्क करते हैं! वे कहते हैं कि यह बोझ मसीहियों के सहने के लिए बहुत कठिन होता! मानो इससे अधिक कठिन किसी बात की कल्पना की जा सकती हो कि प्रभु से अपने सारे हृदय, प्राण और शक्ति से प्रेम किया जाए। इस व्यवस्था की तुलना में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं जो सरल न लगे, चाहे वह अपने शत्रु से प्रेम करने की हो, या अपने मन से बदले की हर भावना को निकाल देने की। वास्तव में हमारी दुर्बलता के लिए तो व्यवस्था की हर बात, उसकी छोटी-से-छोटी मात्रा तक, कठिन और दुष्कर है। प्रभु में हमारे पास बल है। जो वह आज्ञा देता है उसे देना, और जो वह चाहता है उसकी आज्ञा देना, उसी का काम है। मसीहियों का अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन होने का अर्थ यह नहीं कि वे बिना व्यवस्था के निरंकुश भटकते फिरें, वरन् यह कि वे मसीह में कलम लगाए गए हैं, जिसके अनुग्रह से वे व्यवस्था के श्राप से स्वतन्त्र हैं, और जिसके आत्मा के द्वारा व्यवस्था उनके हृदयों पर लिखी है। इस अनुग्रह को पौलुस ने, यद्यपि शब्द के उचित अर्थ में नहीं, व्यवस्था कहा है, परमेश्वर की उस व्यवस्था की ओर संकेत करते हुए जिससे वह उसकी तुलना कर रहा था। विद्वत्तावादी “व्यवस्था” शब्द को पकड़कर उसे अपनी व्यर्थ कल्पनाओं की नींव बना लेते हैं। [222]
58. यही बात उनके “क्षम्य पाप” शब्द के प्रयोग के विषय में कहनी चाहिए, जिसे वे पहली पटिया को तोड़नेवाली छिपी हुई अभक्ति और दूसरी पटिया की अन्तिम आज्ञा के सीधे उल्लंघन, दोनों पर लागू करते हैं। [223] वे क्षम्य पाप की परिभाषा यह करते हैं: ऐसी अभिलाषा जिसके साथ सोची-समझी सहमति न हो, और जो हृदय में देर तक न टिके। परन्तु मैं कहता हूँ कि वह तब तक हृदय में प्रवेश भी नहीं कर सकती जब तक व्यवस्था में माँगी गई बातों की कमी न हो। हमें पराए देवता रखने से मना किया गया है। जब मन अविश्वास के प्रभाव में कहीं और देखता है, या अचानक किसी इच्छा से पकड़ा जाता है कि अपना आनन्द किसी और ओर ले जाए, तो ये हलचलें, चाहे कितनी ही क्षणिक हों, कहाँ से आती हैं, सिवाय इसके कि आत्मा में कोई खाली कोना है जो ऐसी परीक्षाओं को ग्रहण करता है? और विषय को लम्बा न खींचते हुए, परमेश्वर से पूरे हृदय, मन और प्राण से प्रेम रखने की आज्ञा है; इसलिए यदि आत्मा की सब शक्तियाँ परमेश्वर के प्रेम की ओर न लगी हों, तो व्यवस्था की आज्ञाकारिता से विचलन है; क्योंकि वे भीतरी शत्रु जो परमेश्वर के प्रभुत्व के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं और उसके आदेशों को रद्द करते हैं, यह प्रमाणित करते हैं कि उसका सिंहासन हमारे विवेकों में भली भाँति स्थापित नहीं है। यह दिखाया जा चुका है कि अन्तिम आज्ञा इतनी दूर तक जाती है। क्या हमारे मन में कोई अनुचित लालसा उत्पन्न हुई है? तो हम लोभ के दोषी हैं, और व्यवस्था के उल्लंघनकर्ता ठहरते हैं। क्योंकि व्यवस्था हमें केवल अपने पड़ोसी की हानि के विषय में सोचने और योजना बनाने से ही नहीं रोकती, वरन् लोभ से उत्तेजित और प्रज्वलित होने से भी रोकती है। परन्तु व्यवस्था का हर उल्लंघन हमें श्राप के अधीन करता है, और इसलिए छोटी-से-छोटी अभिलाषाएँ भी उस घातक दण्ड से मुक्त नहीं की जा सकतीं। अगस्तीन कहता है, “अपने पापों को तौलते समय हम छल-भरे तराजू का प्रयोग न करें, जिसमें अपनी इच्छा से जो चाहें और जैसे चाहें तौलें, इसे भारी और उसे हल्का कहें; परन्तु हम पवित्रशास्त्र के ईश्वरीय तराजू का प्रयोग करें, जो प्रभु के भण्डार से लिया गया है, और उसी से हर अपराध को तौलें, वरन् तौलें नहीं, बल्कि प्रभु के द्वारा पहले से तौले हुए को पहचानें” (अगस्तीन, De Bapt. cont. Donatist. Lib.2 chap.6)। और पवित्रशास्त्र क्या कहता है? निश्चय ही जब पौलुस कहता है कि “पाप की मजदूरी मृत्यु है” (रोमियों 6:23), तब वह दिखाता है कि वह इस नीच भेद से अनजान था। चूँकि हम कपट की ओर बहुत ही झुके हुए हैं, इसलिए हमारे सुस्त विवेकों को सहलाने के लिए इस टुकड़े की बहुत ही कम आवश्यकता थी।
59. मैं चाहता हूँ कि वे विचार करें कि हमारे उद्धारकर्ता का क्या अर्थ था जब उसने कहा, “इसलिए जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा” (मत्ती 5:19)। क्या वे इसी गिनती में नहीं आते जब वे व्यवस्था के उल्लंघन को हल्का बताने का साहस करते हैं, मानो वह मृत्यु के योग्य ही न हो? उचित मार्ग यह था कि केवल यह नहीं देखा जाता कि क्या आज्ञा दी गई है, वरन् यह कि आज्ञा देनेवाला कौन है, क्योंकि उसकी व्यवस्था का छोटे-से-छोटा उल्लंघन भी उसके अधिकार को घटाता है। क्या वे परमेश्वर की महिमा का किसी भी एक बात में अपमान करना छोटी बात मानते हैं?
फिर, चूँकि परमेश्वर ने अपनी इच्छा व्यवस्था में समझाई है, इसलिए व्यवस्था के विपरीत हर बात उसे अप्रिय है। क्या वे यह कल्पना करेंगे कि परमेश्वर का क्रोध इस प्रकार निरस्त्र हो गया है कि उसके पीछे मृत्यु का दण्ड तुरन्त नहीं आएगा? उसने स्पष्ट घोषणा की है (यदि वे उसकी वाणी को सुनने के लिए तैयार किए जा सकें, और अपनी फीकी चतुराइयों से उसके स्पष्ट सत्य को धुँधला न करें), “जो प्राणी पाप करता है वही मरेगा” (यहेजकेल 18:20)। फिर, अभी उद्धृत किए गए वचन में, “पाप की मजदूरी मृत्यु है।” जिसे ये लोग पाप स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे उसका इनकार नहीं कर सकते, उसके विषय में वे तर्क करते हैं कि वह मृत्युकारी नहीं है। इस पागलपन में बहुत देर तक रमे रहने के बाद, वे पश्चाताप करना सीखें; या यदि वे अपनी इस मूर्खता पर अड़े रहें, तो उन पर और ध्यान न देते हुए, परमेश्वर की सन्तान यह स्मरण रखें कि सब पाप मृत्युकारी है, क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह है, और अनिवार्य रूप से उसके क्रोध को भड़काता है; और क्योंकि वह व्यवस्था का उल्लंघन है, जिसके हर उल्लंघन के विरुद्ध, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का न्याय सुनाया जा चुका है। सन्तों के दोष वास्तव में क्षम्य हैं, परन्तु अपने स्वभाव से नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर की दया से उन्हें क्षमा मिल जाती है।
टिप्पणियाँ:
[190] यह अध्याय पुस्तक 1 के अध्याय 1 और 2 से, तथा पुस्तक 2 के अध्याय 1--6 से सम्बन्धित है। पुस्तक 2, अध्याय 2, खण्ड 22 भी देखें।
[191] देखें कैल्विन, De Vera Ecclesiæ Reformandæ Ratione।
[192] देखें Augustin. De Civitate Dei, Lib. 4 c. 12, और Lib. 12 c. 20, और Lib. 14 c. 12। यह भी देखें Lib. De Bono Conjugali, और Lib. Contra Adversarios Legis et Prophetarum, Lib. 1 c. 14।
[193] “Ne sit nobis Lesbiæ regulæ,” फ्रांसीसी में छोड़ दिया गया है।
[194] फ्रांसीसी पाठ है “Tout ainsi comme si quelcun vouloit faire une belle monstre d'un corps sans teste;” मानो कोई बिना सिर के शरीर का सुन्दर प्रदर्शन करने का प्रयत्न करे।
[195] Origen in Exod. cap. 20 Homil. 8; Augustin. contra duas Epist. Pelagii, Lib. 3 cap. 4; Quæst. in Vet. Test. Lib. 2 cap. 74; Epist cxix ad Januarium, cap. 11। जोसेफस का मत, और अगस्तीन का अन्तिम-उल्लिखित मत, कैल्विन ने Exod. cap. 20 में पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या करते हुए संक्षेप में खण्डित किया है।
[196] फ्रांसीसी पाठ है, “Nous avous aussi un autre ancien Pere qui accorde a nostre opinion, celui que a ecrit les Commentaires imparfaits sur Sainct Matthiue।” हमारे पास एक और प्राचीन पिता भी है जो हमारे मत से सहमत है, वही जिसने सन्त मत्ती पर अधूरी टीकाएँ लिखीं।
[197] “Præsenti causæ।”--फ्रांसीसी पाठ है, “du temps que la loi devoit estre publiée;” उस समय तक जब व्यवस्था प्रकाशित की जानी थी।
[198] निर्गमन 3:6; आमोस 1:2; हबक्कूक 2:20; भजन संहिता 80:2; 99:1; यशायाह 37:16।
[199] “E faucibus mortis।”--फ्रांसीसी में, “du gouffre d'enfer;” नरक की खाई से।
[200] कैल्विन की प्रश्नोत्तरी (Catechismo) में; और कलीसिया-सुधार की आवश्यकता पर ग्रन्थ (De Necessitate Reformandæ Ecclesiæ Ratio) में।
[201] फ्रांसीसी में यह जोड़ा गया है, “Car c'est un hommage spirituel qui se rend a lui comme souverain Roy, et ayant toute superiorité sur nos ames।” क्योंकि यह एक आत्मिक श्रद्धांजलि है जो उसे सर्वोच्च राजा के रूप में दी जाती है, जिसका हमारी आत्माओं पर पूर्ण प्रभुत्व है।
[202] अथवा “सामर्थी,” यह नाम सामर्थ्य को सूचित करनेवाले एक शब्द से निकला है।
[203] 2 कुरिन्थियों 11:2; इफिसियों 5:30; यिर्मयाह 62:5; होशे 2:9; यिर्मयाह 3:1, 2; होशे 2:2।
[204] 1 शमूएल 14:44; 2 राजाओं 5:31; 2 कुरिन्थियों 1:23।
[205] फ्रांसीसी में यह जोड़ा गया है, “jurans par S. Jaques ou S. Antoine;”--सन्त याकूब या सन्त अन्तोनी की शपथ खाते हुए।
[206] निर्गमन 23:13; व्यवस्थाविवरण 6:13; 10:20; इब्रानियों 6:13।
[207] उत्पत्ति 21:24; 26:31; 31:53; रूत 3:13; 1 राजाओं 18:10।
[208] गिनती 13:22; यहेजकेल 20:12; 22:8; 23:38; यिर्मयाह 27:21, 22, 27; यशायाह 55:2; नहेम्याह 9:14।
[209] “Finem istum politicum et ecclesiasticum ordinem।”--फ्रांसीसी में, “la police et ordre en l'Eglise;” कलीसिया में शासन-व्यवस्था और क्रम।
[210] इस स्वतन्त्रता के विषय में देखें Socrates, Hist. Trip. Lib. 9 c. 38।
[211] फ्रांसीसी में, “ne discernans entre le Dimanche et le Sabbath autrement, sinon que le septiéme jour estoit abrogé qu'on gardoit pour lors, mais qu'il on faloit, neantmoins garder un;”--रविवार और सब्त के बीच इसके सिवा कोई भेद न करते हुए कि सातवाँ दिन, जो तब तक माना जाता था, रद्द हो गया, परन्तु फिर भी कोई एक दिन मानना आवश्यक था।
[212] फ्रांसीसी में, “leur conviendroyent mieux;”--उन पर अधिक उपयुक्त बैठता।
[213] निर्गमन 21:17; लैव्यव्यवस्था 20:9; नीतिवचन 20:20; व्यवस्थाविवरण 21:18; मत्ती 25:4; इफिसियों 6:1; कुलुस्सियों 3:20।
[214] फ्रांसीसी में यह जोड़ा गया है, “et la doit plustost augmenter, qu'amoindrir confirmer que viloer;”--और उसे घटाने की अपेक्षा बढ़ाना चाहिए, उल्लंघन करने की अपेक्षा उसकी पुष्टि करनी चाहिए।
[215] पुस्तक 3, अध्याय 7 खण्ड 4--7; अध्याय 20 खण्ड 38, 45; पुस्तक 4 अध्याय 1 खण्ड 13--19; अध्याय 17 खण्ड 38, 40।
[216] देखें Ambros. Lib. de Philosoph., जिसे अगस्तीन ने अपनी पुस्तक Contra Julian, Lib. 2 में उद्धृत किया है।
[217] फ्रांसीसी पाठ है “D'avantage ce precepte s'estend jusques l?, que nous n'affections point une plaisanterie d'honnesteté et une grace de brocarder et mordre en riant les uns et les autres, comme sont aucuns, qui se bagnent quand ils peuvent faire vergogne? quelqu'un: car par telle intemperance souventes fois quelque marque demeure sur l'homme qu'on a ainsi noté।”--इसके अतिरिक्त, आज्ञा यहाँ तक फैली है: हमें उपनाम रखने में भले-हास्य की चतुराई और शिष्टता का ढोंग नहीं करना चाहिए, और मुस्कराते हुए दूसरों के विषय में चुभनेवाली बातें नहीं कहनी चाहिए, जैसा कुछ लोग करते हैं, जो जब किसी को लज्जित कर सकें तो प्रसन्न होते हैं: क्योंकि ऐसे असंयम से अकसर उस व्यक्ति पर, जिस पर इस प्रकार प्रहार किया गया, कलंक चिपक जाता है।
[218] देखें ऊपर, अध्याय 2, खण्ड 24 का अन्त; और पुस्तक 3 अध्याय 3 खण्ड 11, 12, 13; और पुस्तक 4 अध्याय 15 खण्ड 11, 12।
[219] देखें August. Ep. 200, ad Asellicum, et Quæstio, Lib. 88, sub fin. Quæst. 66; परन्तु विशेषकर Conscio. 8, in भजन संहिता 118। इस विषय का स्पर्श भजन संहिता 142 में भी हुआ है, और De Temp. Serm. 45, और Retract. Lib. 1 cap. 5, और De Continentia, cap. 8 में भी।
[220] यशायाह 1:17; 57:6; यिर्मयाह 7:5, 6; यहेजकेल 18:7, 8; होशे 6:6; जकर्याह 7:9, 10।
[221] देखें पुस्तक 3 अध्याय 7 खण्ड 4। यह भी देखें August. de Doctrina Christiana, Lib. 1 chap. 23 et seq.
[222] फ्रांसीसी पाठ है “Ces folastres sans propos prennent un grand mystére en ce mot de Loy;” ये मूर्ख लोग बेतुके ढंग से “व्यवस्था” शब्द में बड़ा रहस्य ढूँढ़ते हैं।
[223] देखें पुस्तक 3 अध्याय 4 खण्ड 28, जहाँ यह भी दिखाया गया है कि यह स्टोइकों का यह सिद्धान्त नहीं है कि सब पाप समान हैं।
