अध्याय 7

पादरियों का विरोध और न्यू लेबनान सम्मेलन

ए. एम. हिल्स

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    शैतान सच्चे धर्म से और पवित्रशास्त्र के अनुसार होनेवाली सब जागृतियों से पूरी घृणा के साथ घृणा करता है। उनका विरोध करने के लिए उसे साधनों और माध्यमों की कभी कमी नहीं होती। उसकी सबसे सूक्ष्म और शैतानी चालों में से एक यह है कि वह कलीसिया के प्रमुख और प्रतिष्ठित अगुवों को उकसाकर उन्हीं भाइयों के विरोध में खड़ा कर देता है जो आत्माओं को जीतने में सफल होते हैं। पौलुस के सबसे बड़े शत्रु उसके अपने ही भाई, यहूदी, और महासभा के सदस्य थे। रोमन कैथोलिक कलीसिया के बड़े-बड़े पदाधिकारी लूथर के लहू के प्यासे थे। कलीसिया के प्रमुख लोगों ने, अपने स्थायी कलंक के लिए, जॉन वेस्ली के विरुद्ध भारी विरोध खड़ा कर दिया। आज भी पवित्रता के प्रचारकों का इसी प्रकार मृत कलीसियाओं और निष्फल प्रचारकों द्वारा विरोध किया जाता है। फ़िन्नी भी इससे बच न सके।

    बड़े दुःख के साथ हमें ऐसी बातें लिखनी पड़ रही हैं जो अमेरिकी कलीसियाओं के इतिहास के दो या उससे अधिक सम्मानित नामों की कीर्ति को धूमिल करती हैं। जब फ़िन्नी ऑबर्न गए, तब उन्हें पूरी तरह पता न था कि पादरियों की ओर से उन्हें कितने विरोध का सामना करना पड़ेगा; उस क्षेत्र के पादरियों की ओर से नहीं जहाँ वे परिश्रम कर चुके थे, बल्कि उन पादरियों की ओर से जहाँ उन्होंने परिश्रम नहीं किया था, और जो व्यक्तिगत रूप से उनके विषय में कुछ नहीं जानते थे, पर उन झूठी ख़बरों से प्रभावित थे जो उन्होंने सुनी थीं। परन्तु विद्या के उस केन्द्र में उन्हें अनेक स्रोतों से पता चला कि एक प्रकार की जासूसी चलाई जा रही है, जिसका परिणाम होना निश्चित था, और जिसका उद्देश्य भी यही था, कि पादरियों और कलीसियाओं का एक व्यापक गठबन्धन बने जो उनके परिश्रम से जुड़ी जागृतियों को घेरकर रोक दे और उन्हें फैलने न दे।

    सुसमाचार-प्रचारक असाहेल नेटलटन और बोस्टन के डॉ. लाइमन बीचर इस अशोभनीय विरोध के अगुवे थे। नेटलटन ने डींग मारी कि फ़िन्नी मध्य न्यूयॉर्क से आगे पूर्व की ओर नहीं जाने पाएँगे। फ़िन्नी ने न तो सार्वजनिक रूप से और न निजी रूप से किसी से कुछ कहा, बल्कि निरन्तर प्रार्थना में लगे रहे।

    “मैं दिन-प्रतिदिन बड़ी लगन से परमेश्वर की ओर ताकता रहा कि वह मेरा मार्गदर्शन करे; मैं उससे माँगता रहा कि वह मुझे कर्तव्य का मार्ग दिखाए और इस आँधी को झेल जाने के लिए मुझे अनुग्रह दे। ऑबर्न में डॉ. लैंसिंग के घर अपने कमरे में एक दिन मुझ पर जो बीता, उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा। प्रभु ने, मानो दर्शन में, मुझे दिखाया कि मेरे सामने क्या है। जब मैं प्रार्थना में लगा था, तब वह मेरे इतने निकट आ गया कि मेरा शरीर सचमुच मेरी हड्डियों पर काँपने लगा। परमेश्वर की उपस्थिति के पूरे बोध के कारण मैं सिर से पाँव तक काँप उठा। पहले, और कुछ समय तक, ऐसा लगा मानो मैं मसीह के क्रूस की उपस्थिति में नहीं, बल्कि सीनै पर्वत की चोटी पर उसके पूरे गर्जनों के बीच खड़ा हूँ। अपने जीवन में मैं परमेश्वर के सामने कभी इतना भयभीत और दीन नहीं हुआ जितना उस समय। फिर भी, भाग जाने की इच्छा होने के बजाय, मैं परमेश्वर की ओर, उस उपस्थिति की ओर जिसने मुझे ऐसे अवर्णनीय भय और कंपकंपी से भर दिया था, और भी निकट, और भी निकट खिंचता चला गया। उसके सामने बड़ी दीनता के एक समय के बाद, मुझे बड़ा उत्थान मिला।

    “परमेश्वर ने मुझे निश्चय दिलाया कि वह मेरे साथ रहेगा और मुझे सम्भाले रहेगा; कि कोई विरोध मुझ पर प्रबल न होगा; कि इस सारे मामले में मुझे और कुछ नहीं करना है, केवल अपने काम में लगे रहना है और परमेश्वर के उद्धार की बाट जोहना है। उस समय परमेश्वर की उपस्थिति का जो बोध हुआ, और मेरे प्राण और परमेश्वर के बीच जो कुछ हुआ, उसका वर्णन मैं कभी नहीं कर सकता। उसके कारण मैं पूर्ण रूप से भरोसा रखनेवाला और पूर्ण रूप से शान्त हो गया, और उन सब भाइयों के प्रति, जो बहकाए गए थे और मेरे विरुद्ध मोर्चा बाँध रहे थे, मेरे मन में सबसे अधिक स्नेह की भावनाओं के सिवा और कुछ न रहा। मुझे निश्चय था कि सब कुछ ठीक ही निकलेगा; कि मेरा सच्चा मार्ग यही है कि सब कुछ परमेश्वर पर छोड़ दूँ और अपने काम में लगा रहूँ; और जैसे-जैसे आँधी घिरती गई और विरोध बढ़ता गया, मैंने एक क्षण के लिए भी सन्देह नहीं किया कि इसका परिणाम क्या होगा। मैं इससे कभी व्याकुल नहीं हुआ; जागते हुए मैंने एक घण्टा भी इसके विषय में सोचने में नहीं बिताया, जबकि बाहर से देखने पर ऐसा लगता था मानो देश की सारी कलीसियाएँ, उन स्थानों को छोड़कर जहाँ मैंने परिश्रम किया था, एक होकर मेरे लिए अपने मंच बन्द कर देंगी। जहाँ तक मैं समझता था, विरोध का नेतृत्व करनेवाले लोगों का यही घोषित संकल्प था। वे इतने धोखे में थे कि वे सोचते थे कि एक हो जाने के सिवा और कोई कारगर उपाय नहीं है, और, जैसा वे कहते थे, ‘उसे दबा देना है।’ परन्तु परमेश्वर ने मुझे निश्चय दिलाया कि वे मुझे दबा नहीं सकेंगे।”

    “प्रभु ने मुझे उस विरोध को मन पर लेने नहीं दिया, और मैं सच्चाई से कह सकता हूँ कि जहाँ तक मुझे याद है, उनके पूरे विरोध के समय में मिस्टर नेटलटन या डॉ. बीचर या इस काम के किसी भी प्रमुख विरोधी के प्रति मेरे मन में कभी कोई कटु भावना नहीं आई।”

    ऐसा प्रतीत होता है कि रेवरेंड विलियम आर. वीक्स ने, जो उस बस्ती के एक कट्टर कैल्विनवादी थे जहाँ फ़िन्नी ने परिश्रम किया था, धर्मसैद्धान्तिक आधार पर उनका विरोध किया। वे “यह मानते थे कि पाप और पवित्रता दोनों ही सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के एक प्रत्यक्ष कार्य द्वारा मन में उत्पन्न किए जाते हैं; कि परमेश्वर अपनी सर्वोच्च इच्छा से मनुष्यों को पापी या पवित्र बनाता है, पर दोनों ही दशाओं में सर्वशक्तिमान सामर्थ्य के एक प्रत्यक्ष कार्य द्वारा, ऐसे कार्य द्वारा जो स्वयं सृष्टि के कार्य के समान अप्रतिरोध्य है; कि वास्तव में सारे विश्व में केवल परमेश्वर ही एकमात्र सच्चा कर्ता है, और सब प्राणी केवल उतना ही कार्य करते हैं जितना उसकी अप्रतिरोध्य सामर्थ्य उन्हें चलाती और विवश करती है; कि विश्व का हर पाप, चाहे मनुष्यों का हो चाहे दुष्टात्माओं का, परमेश्वर की ओर से किए गए एक प्रत्यक्ष, अप्रतिरोध्य कार्य का परिणाम है।”

    ऐसा पागलपन भरा धर्मविज्ञान निश्चय ही परमेश्वर पर एक निन्दापूर्ण लांछन है। स्वाभाविक है कि ऐसे सिद्धान्त रखनेवाला मनुष्य, और उनसे स्वाभाविक रूप से निकलनेवाले दर्शन और तरीकों को माननेवाला, फ़िन्नी का विरोध करने की ओर ले जाया जाएगा। उसने, और उसके जैसे दूसरों ने, दूर-दूर तक पत्र लिखे, जिनमें इस काम को ग़लत ढंग से प्रस्तुत किया गया और मैसाचुसेट्स और कनेक्टिकट के प्रमुख अगुवों के मनों में विष घोला गया। “नए तरीकों” के विरुद्ध बड़ा शोर और उत्तेजना खड़ी की गई। उसने एक पुस्तिका लिखी, और एक यूनिटेरियन ने भी ऐसा ही किया। बुरी ख़बरें दूर-दूर और आस-पास फैलती गईं, यहाँ तक कि अन्त में 1827 की गर्मियों में न्यू लेबनान में एक सम्मेलन बुलाया गया, ताकि मध्य न्यूयॉर्क में हाल में हुई जागृतियों के स्वरूप और उनकी बुराइयों की जाँच की जाए। फ़िन्नी वहाँ उपस्थित थे, और वे पास्टर भी जिनके साथ उन्होंने परिश्रम किया था।

    पूर्व से आए हुए उपस्थित पादरी ये थे: डॉ. लाइमन बीचर, जो उस समय बोस्टन और मैसाचुसेट्स के प्रमुख जागृति-पास्टर थे; एमहर्स्ट कॉलेज के अध्यक्ष डॉ. हर्मन हम्फ्री; एंडोवर, मैसाचुसेट्स के डॉ. जस्टिन एडवर्ड्स; वेदर्सफ़ील्ड के कालेब जे. टेनी; और हार्टफ़ोर्ड, कनेक्टिकट के डॉ. जोएल हॉज़। उन बुराइयों को रोकने का प्रयत्न करने का उत्तरदायित्व, जिनके विषय में माना जाता था कि वे फ़िन्नी के काम से पनप रही हैं, डॉ. बीचर और असाहेल नेटलटन पर डाला गया।

    फ़िन्नी की दो जीवनियाँ और “नेटलटन का संस्मरण” मेरे सामने हैं। हो सकता है मैं ग़लत होऊँ, पर मैं यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकता कि नेटलटन, जितना वे स्वयं समझते थे उससे कहीं अधिक, फ़िन्नी की बढ़ती हुई कीर्ति और अद्वितीय सफलता के प्रति ईर्ष्या से प्रेरित थे। वे फ़िन्नी से नौ वर्ष बड़े थे, और इस समय चौवालीस वर्ष के थे। फ़िन्नी के आगमन तक वे सबसे सफल सुसमाचार-प्रचारक थे जिसे पूर्व ने, या कहें तो सारे देश ने, उत्पन्न किया था। डॉ. बीचर ने 1827 में उनके विषय में लिखा: “मिस्टर नेटलटन ने किसी भी जीवित मनुष्य से अधिक आत्म-त्याग, स्थिरता, बुद्धि और सफलता के साथ परमेश्वर की और अपनी पीढ़ी की सेवा की है। … उनके प्रभाव के विस्तार को देखते हुए, मैं उन्हें बिना किसी तुलना के सबसे बड़ा उपकारक मानता हूँ जिसे परमेश्वर ने इस राष्ट्र को दिया है, और धर्म की शुद्ध और सामर्थी जागृतियों को बढ़ाने में उनके प्रभाव के कारण, उन्हें संसार के सबसे बड़े उपकारकों में से एक होने के लिए ठहराया हुआ मानता हूँ।”

    निश्चय ही उन्होंने सिय्योन में अपना अच्छा नाम कमाया था। परन्तु बयालीस से चौवालीस वर्ष की आयु में वे फ़िन्नी के द्वारा हुई जागृतियों के विषय में बढ़ा-चढ़ाकर कही गई, शत्रुतापूर्ण और झूठी ख़बरों को लेकर व्याकुल और उत्तेजित होने लगे। वे पूरी तरह शैतान के जाल में फँस गए, और फ़िन्नी के कटु विरोध में इतने आगे बढ़ गए कि ऐसा लगा मानो परमेश्वर ने उन्हें अलग कर दिया। उनकी जीवनी अगले दस वर्षों में केवल चार सौ मन-परिवर्तन दिखाती है। वे फिर कभी सम्भल न सके।

    डॉ. बीचर ने 1826 की शरद ऋतु में नेटलटन को अल्बानी भेजा, ताकि वे वहाँ सभा करें और फ़िन्नी के द्वारा हुई जागृतियों के विरुद्ध मोर्चा लें और उन्हें फैलने से रोकें। वे झाड़ू से समुद्र के ज्वार को पीछे धकेलने का प्रयत्न भी कर सकते थे; क्योंकि परमेश्वर फ़िन्नी के साथ था। फ़िन्नी के मन में नेटलटन के लिए गहरा सम्मान और भरोसा था, परमेश्वर के एक आदरणीय सेवक के रूप में उनके प्रति सच्ची श्रद्धा थी। उन्हें देखने और उनके चरणों में बैठकर सीखने की उनकी ऐसी लालसा थी कि वे प्रायः उनसे मिलने जाने के स्वप्न देखा करते थे।

    फ़िन्नी अल्बानी गए और उनसे भेंट की, और धर्मविज्ञान पर संक्षेप में बातचीत की। जब फ़िन्नी ने उनसे कहा कि उनका विचार अल्बानी में रुककर शाम को उनका प्रचार सुनने का है, तो उन्होंने बड़ी बेचैनी प्रकट की, और कहा कि उन्हें “उनके साथ दिखाई नहीं देना चाहिए।” इसलिए फ़िन्नी जाकर एक न्यायाधीश के साथ गैलरी में बैठे, और उन्होंने इतना देख लिया कि उन्हें सन्तोष हो गया कि वे नेटलटन से किसी सलाह या शिक्षा की आशा नहीं रख सकते। “यह स्पष्ट था कि नेटलटन उनकी संगति में रहना नहीं चाहते थे, और उन्हें हाथ भर की दूरी पर रखे हुए थे, और जागृतियों के विषय में उनसे कुछ भी कहना नहीं चाहते थे।”

    “नेटलटन का संस्मरण” के लेखक ने पृष्ठ 238 पर उन्हें ऐसा दिखाया है कि उन्होंने फ़िन्नी से दो बार भेंट की, और उनके “विनाशकारी तरीकों” के विषय में उन्हें समझाया-बुझाया, और उन्हें सुधारने का प्रयत्न किया, ताकि वे दोनों मिलकर काम कर सकें। यह हर एक बात में स्पष्ट रूप से ग़लत है। नेटलटन ने फ़िन्नी को केवल एक बार देखा, जागृति के काम का उल्लेख तक नहीं किया, और उनके साथ मिलकर काम करने की इच्छा रखना तो दूर, वे उनकी संगति में दिखाई देना भी नहीं चाहते थे। यह एक भले मनुष्य के जीवन पर एक दुःखद टिप्पणी है, और दिखाती है कि इस्राएल के अगुवों को भी कितना सावधान और चौकस रहने की आवश्यकता है।

    थॉमस डब्ल्यू. सीवर्ड ने यूटिका नगर के इतिहास पर दिए एक भाषण में फ़िन्नी के द्वारा हुई जागृति के विषय में कहा: “गिरजाघर का दृश्य वर्णन से परे गम्भीर था। रुचि को बढ़ाने या प्रभाव को गहरा करने के लिए कभी कोई बाहरी साधन काम में नहीं लाया गया। वक्ता की आवाज़ और ढंग की कुछ सहज, फिर भी ध्यान खींचनेवाली विशेषताओं के सिवा, ऐसा कुछ न था जो कौतूहल को आकर्षित करे या औचित्य की सबसे नुक्ताचीन या छिद्रान्वेषी भावना को भी ठेस पहुँचाए। उनके प्रचार के विषय में यह कहना प्रशंसा की अपर्याप्त भेंट है कि चाहे वह सबसे अधिक बौद्धिक सूक्ष्मता के लिए, चाहे पाप की कठोर भर्त्सना के लिए, चाहे आनेवाले क्रोध के भयानक चित्रण के लिए विख्यात रहा हो, उसका प्रतिफल मसीही पंक्तियों में अनगिनत लोगों के जुड़ने और धार्मिक जीवन की नई शक्ति के रूप में मिला। एक मंच-वक्ता के रूप में उनके समय के सबसे अग्रणी लोगों में उनका स्थान बहुत पहले ही सुनिश्चित हो चुका था।” (सी. जी. फ़िन्नी, राइट द्वारा, पृष्ठ 60।)

    रेवरेंड मिस्टर क्रॉस अपनी बस्ती में फ़िन्नी के प्रचार के विषय में कहते हैं: “उनकी शैली गरिमापूर्ण थी, उनका व्यवहार शिष्ट था, उनकी आत्मा बालक के समान थी; जागृति का परिवर्तनकारी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था, और वह स्थान धार्मिक भावना से इतनी गहराई तक भर गया था कि छः वर्ष तक वहाँ कोई नाच-पार्टी आयोजित करना असम्भव रहा, और सर्कस लगाना घाटे का सौदा था।” (सी. जी. फ़िन्नी, राइट द्वारा, पृष्ठ 61।)

    डॉ. चार्ल्स पी. बुश अपने “फ़िन्नी के संस्मरण” में कहते हैं कि फ़िन्नी के प्रचार से रॉचेस्टर नगर का पूरा चरित्र बदल गया, और वह ऊँचा नैतिक स्तर चालीस वर्ष तक अनुभव किया जाता रहा। फिर भी परमेश्वर के ऐसे प्रिय और प्रभावशाली सेवक पर उनके भाइयों द्वारा “विनाशकारी तरीकों” के लिए व्यावहारिक रूप से मुकद्दमा चलाया जाना था। इसी प्रकार उनके स्वामी पर भी उनसे पहले मुकद्दमा चलाया गया था।

    इस सम्मेलन के जो विभिन्न विवरण मेरे सामने हैं, उनसे स्पष्ट है कि बीचर और नेटलटन जागृतियों के विरुद्ध पहले से बँधे हुए सम्मेलन में आए थे, और अनुभव करते थे कि उनकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है, और फ़िन्नी के प्रति उनके विरोध को सम्मेलन द्वारा उचित ठहराया ही जाना चाहिए। जब उनकी जानकारी के स्रोतों के विषय में प्रश्न उठाया गया, तो डॉ. बीचर ने उत्तर दिया: “हम यहाँ जिरह कराने नहीं आए हैं, और हमारी आत्मिक मर्यादा हमें ऐसे किसी भी प्रश्न का उत्तर देने से रोकती है।” जब जागृतियों के विषय में फैली बेतुकी ख़बरों की सच्चाई का प्रश्न आया, तो डॉ. बीचर और मिस्टर नेटलटन ने यह रुख़ अपनाया कि “फ़िन्नी की और उन सब पादरियों की गवाही, जिन्होंने उनके साथ परिश्रम किया था, स्वीकार नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि निन्दा उन्हीं की हो रही थी, और यह अपने ही मामले में गवाही देना होगा; वे गवाह के रूप में मान्य नहीं थे, और तथ्य उनसे स्वीकार नहीं किए जाने चाहिए।” डॉ. हम्फ्री ने बड़ी दृढ़ता से कहा कि इस मामले में काम करनेवाले तो वे ही लोग हैं, और वे जानते हैं कि उन्होंने क्या किया है, और सम्मेलन को उनके कथन बिना हिचकिचाहट के स्वीकार करने चाहिए। बीचर और नेटलटन को छोड़ सब इस बात पर सहमत हुए।

    सम्मेलन कई दिनों तक चला, और जैसे-जैसे जागृतियों के विषय में तथ्य सामने आते गए, मिस्टर नेटलटन इतने व्याकुल और घबराए हुए हो गए कि वे कई बैठकों में उपस्थित न हो सके। उन्होंने स्पष्ट देखा कि उनके पाँव तले की ज़मीन खिसक रही है, और ऐसी कोई बात सिद्ध नहीं की जा सकती जो उनके अपनाए हुए मार्ग को उचित ठहरा सके। डॉ. बीचर ने भी इसे गहराई से अनुभव किया। सब भाइयों ने घोषित किया कि जहाँ तक फ़िन्नी का सम्बन्ध है, जागृतियों के विषय में फैलाई गई बुरी ख़बरें झूठी थीं। परन्तु डॉ. बीचर ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया। न्यू हेवन के डॉ. टेलर को लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा कि उन जागृतियों में झूठ की आत्मा इतनी प्रबल थी कि उनमें लगे भाइयों पर तनिक भी विश्वास नहीं किया जा सकता। (फ़िन्नी के संस्मरण, पृष्ठ 191।)

    बीचर की जीवनी (खण्ड 2, पृष्ठ 101) में उन्हें सम्मेलन में फ़िन्नी से यह कहते हुए दिखाया गया है: “फ़िन्नी, मैं तुम्हारी योजना जानता हूँ, और तुम जानते हो कि मैं जानता हूँ; तुम कनेक्टिकट आना चाहते हो, और आग की एक लकीर बोस्टन तक ले जाना चाहते हो। परन्तु यदि तुमने ऐसा करने का प्रयत्न किया, तो जीवित प्रभु की शपथ, मैं राज्य की सीमा पर तुम्हारा सामना करूँगा और तोपचियों को बुला लूँगा, और बोस्टन तक एक-एक इंच के लिए लड़ूँगा, और फिर वहाँ भी तुमसे लड़ूँगा।” इस वीरतापूर्ण धमकी पर हम बस यह संक्षिप्त टिप्पणी करते हैं कि थोड़े ही समय में फ़िन्नी बोस्टन में बीचर की कलीसिया में प्रचार कर रहे थे।

    पाठक निःसन्देह अब तक यह जानने को उत्सुक होंगे कि ये “नए तरीके,” ये “विनाशकारी तरीके” क्या थे, जिनके कारण सिय्योन के कुछ अगुवे इतने गरम हो उठे थे। “नेटलटन का संस्मरण” से ज्यों के त्यों उद्धृत वे ये हैं: “इस उत्तेजना के साथ-साथ अनेक तरीके चलाए गए, जो उन तरीकों से मिलते-जुलते थे जो पुराने समय में जागृतियों की शुद्धता को बिगाड़ने और कट्टर उन्माद को बढ़ावा देने के बड़े साधन रहे थे; जैसे लोगों के लिए नाम ले-लेकर प्रार्थना करना; स्त्रियों को मिली-जुली सभाओं में प्रार्थना करने और उपदेश देने के लिए प्रोत्साहित करना; लोगों को चिन्तित खोजियों की बेंच पर आने के लिए, या सार्वजनिक सभा में खड़े होकर यह प्रकट करने के लिए बुलाना कि उन्होंने अपना हृदय परमेश्वर को दे दिया है, या धर्म की ओर ध्यान देने का निश्चय कर लिया है।” (पृष्ठ 237।)

    हम आज के लोगों को यह सब किसी कल्पित कथा की उपज, अतीत में क्या हुआ हो सकता था इसका एक व्यर्थ स्वप्न सा लगता है। इस गर्मी (1901) में अपने कॉलेज के अवकाश के दौरान मैंने पाँच राज्यों — टेक्सस, नेब्रास्का, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क और मैसाचुसेट्स — में जागृति का काम किया, और मैंने हर राज्य में ये सब बातें होती देखीं, और किसी ने विरोध नहीं किया, न आपत्ति करने की बात सोची। यहाँ टेक्सस होलीनेस यूनिवर्सिटी, ग्रीनविल, टेक्सस में, जिसके चैपल में मैं 20 दिसम्बर 1901 को ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, हम ये सब बातें निरन्तर देखते हैं। 24 सितम्बर से हमारी वेदियों पर सतहत्तर लोग उद्धार पा चुके हैं या पवित्र किए जा चुके हैं, और इस वर्ष 1 जनवरी से एक सौ तिहत्तर; और यदि कहीं भी सच्चे मसीही चरित्र बनाए जाते हैं, तो वे यहाँ बनाए जा रहे हैं।

    ऐसी बातों पर, जिन्हें परमेश्वर ने इतना काम में लिया और इतनी आशीष दी, जान-बूझकर भड़काई गई ऐसी उत्तेजना मुझे “खोदा पहाड़, निकली चुहिया” वाली कहावत की याद दिलाती है। फिर भी यह कभी एक दुःखद तथ्य और जीवित इतिहास था। परन्तु इसने फ़िन्नी के काम को नहीं रोका, न एक घण्टे के लिए उसमें बाधा डाली। हम देखेंगे कि परमेश्वर ने उन्हें पहले से कहीं अधिक सामर्थ्य और प्रभाव का कहीं अधिक विस्तार दिया, जबकि मिस्टर नेटलटन अलग कर दिए गए, और डॉ. बीचर उस काम को हानि पहुँचाने में पूरी तरह असमर्थ रहे। बाद में वे बोस्टन से सिनसिनाटी, ओहायो में लेन थियोलॉजिकल सेमिनरी के अध्यक्ष होकर चले गए। मैं एक बार उस सेमिनरी में गया था, और वहाँ मुझे डॉ. बीचर का व्याख्यान-कक्ष और वही कुर्सी दिखाई गई जिस पर वे बैठा करते थे, और उसके पीछे दीवार पर उनका चित्र टँगा था। “परन्तु,” मुझे घुमानेवाले प्रोफ़ेसर ने कहा, “अब इन व्याख्यान-कक्षों में हम बीचर की अपेक्षा फ़िन्नी को अधिक बार उद्धृत करते हैं।”

    फ़िन्नी ने लिखा: “क्योंकि तब से मैंने इस देश में और ग्रेट ब्रिटेन में व्यापक रूप से परिश्रम किया है, और मेरे तरीकों पर कोई आपत्ति नहीं की गई, इसलिए यह मान लिया गया है और कहा गया है कि मिस्टर नेटलटन और डॉ. बीचर द्वारा किए गए विरोध के बाद से मैं सुधर गया हूँ, और मैंने वे तरीके छोड़ दिए हैं जिनकी उन्होंने शिकायत की थी। यह पूरी तरह भूल है। मैंने सदा और हर जगह वे सब तरीके काम में लिए हैं जो मैंने उन जागृतियों में लिए थे, और जब कभी मैंने उचित समझा, प्रायः दूसरे तरीके भी जोड़ दिए हैं। इस विषय में मैंने सुधार की कभी कोई आवश्यकता नहीं देखी। यदि मुझे अपना जीवन फिर से जीना हो, तो मैं सोचता हूँ कि जागृति के कामों में चालीस वर्ष से अधिक के अनुभव के साथ भी, उन्हीं परिस्थितियों में मैं मूल रूप से वही तरीके काम में लूँगा जो मैंने तब लिए थे।

    “और मेरी बात का यह अर्थ न समझा जाए कि मैं इसका श्रेय स्वयं लेता हूँ। नहीं, कदापि नहीं, जिसने मेरा मार्गदर्शन किया वह मेरी अपनी कोई बुद्धि न थी। मुझे अपनी अज्ञानता और पराधीनता का अनुभव कराया गया, और निरन्तर परमेश्वर की ओर उसके मार्गदर्शन के लिए ताकने की प्रेरणा दी गई। मुझे तब कोई सन्देह न था, और न कभी हुआ है, कि परमेश्वर ने अपने आत्मा के द्वारा मुझे वह मार्ग अपनाने के लिए चलाया जो मैंने अपनाया। उसने दिन-प्रतिदिन मुझे इतनी स्पष्टता से चलाया कि मैंने कभी सन्देह नहीं किया, न कर सकता था, कि मेरा मार्गदर्शन ईश्वरीय रूप से हो रहा था।

    “जिन भाइयों ने उन जागृतियों का विरोध किया वे भले लोग थे, इसमें मुझे सन्देह नहीं; और वे बहकाए गए थे और उन्हें बहुत बुरी तरह और हानिकारक ढंग से धोखा दिया गया था, इसमें भी मुझे उतना ही कम सन्देह है। यदि वे इस विश्वास के साथ मरे कि जो कुछ उन्होंने किया, लिखा और कहा उसके लिए उनके पास उचित कारण थे, और कि उन्होंने उन बुराइयों को सुधारा जिनकी उन्होंने शिकायत की थी, तो वे इस विषय में बड़े धोखे में मरे। न तो कलीसिया की सुरक्षा के लिए, न जागृतियों के सम्मान के लिए, न मसीह की महिमा के लिए यह उचित है कि आनेवाली पीढ़ियाँ यह विश्वास करें कि वे बुराइयाँ विद्यमान थीं, और ऐसी आत्मा से और ऐसे ढंग से सुधारी गईं जैसा बताया गया है। यदि यह भ्रम स्थायी और पक्का करने का इतना स्पष्ट प्रयत्न न किया गया होता कि उन जागृतियों का विरोध उचित और सफल था, तो मैं चुप ही रहता।

    “मुझे कोई सन्देह नहीं कि डॉ. बीचर को किसी ने यह विश्वास दिला दिया था कि उनका विरोध आवश्यक है। यदि डॉ. बीचर की जीवनी ने इस विषय को फिर से न खोला होता, इस स्पष्ट उद्देश्य से कि उनके अपनाए हुए मार्ग को उचित ठहराए, और जनता के मन पर यह धारणा पक्की कर दे कि उन जागृतियों का वह विरोध करके उन्होंने एक महान और अच्छा काम किया, तो मैं वह कहने के लिए अपने को बाध्य न समझता जिसे अब रोक रखना मेरे लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनकी जीवनी पढ़ते हुए मैं उन सन्देहों और भ्रमों को देखकर चकित रह जाता हूँ जिनके बोझ तले उनका मन काम कर रहा था। जीवनी में प्रकट की गई इस सारी जोड़-तोड़ से मैं एक बालक के समान अनजान था। उन भयों और व्याकुलताओं में मेरा कोई भाग न था जिन्होंने, ऐसा लगता है, डॉ. बीचर और मिस्टर नेटलटन को इतना अधिक दुःखी कर रखा था।

    “सम्मेलन के समय तक और उस समय से आगे के मेरे परिश्रम का सच्चा विवरण यह दिखाएगा कि डॉ. बीचर और मिस्टर नेटलटन मेरे विषय में क्या कह रहे थे या क्या कर रहे थे, इसकी मुझे कितनी कम जानकारी या परवाह थी। मैं प्रभु को धन्य कहता हूँ कि उनके विरोध के कारण मैं अपने काम से भटकने से बचाया गया, और मैंने उसके विषय में अपने को कभी कोई बेचैनी नहीं होने दी। ऑबर्न में परमेश्वर ने मुझे निश्चय दिलाया था कि मेरे अपने विरोधियों को उत्तर देने के लिए मुड़े बिना ही वह सारे विरोध को निष्फल कर देगा। यह मैं कभी नहीं भूला। इस ईश्वरीय आश्वासन के अधीन मैं एक ही लक्ष्य पर दृष्टि और भरोसा रखनेवाली आत्मा के साथ आगे बढ़ता गया; और अब, जब मैं पढ़ता हूँ कि इन भाइयों के मनों पर कैसी व्याकुलताएँ, सन्देह और ग़लतफ़हमियाँ छाई हुई थीं, तो मैं अपने और अपने परिश्रम के विषय में उनके भ्रम और उसके परिणामस्वरूप उनकी चिन्ता को देखकर चकित रह जाता हूँ। ठीक उसी समय जब डॉ. बीचर फ़िलाडेल्फ़िया में थे (1828 में), और जनरल असेम्बली के सदस्यों के साथ जोड़-तोड़ कर रहे थे, जैसा उनकी जीवनी में बताया गया है, मैं उसी नगर में परिश्रम कर रहा था, और कई महीनों से विभिन्न कलीसियाओं में धर्म की एक सामर्थी जागृति के बीच परिश्रम करता आ रहा था, और डॉ. बीचर के वहाँ आने के उद्देश्य से बिलकुल अनजान था। मैं इस बात के लिए जितना धन्यवाद करूँ कम है कि उन दिनों के सारे विरोध के बीच परमेश्वर ने मुझे व्याकुल होने से, और अपनी आत्मा में या परिश्रम सम्बन्धी अपने विचारों में बदल जाने से बचाए रखा।” (फ़िन्नी के संस्मरण, अध्याय 16।)

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