अध्याय 15

प्रचारकों और प्रचार पर फ़िन्नी के विचार

ए. एम. हिल्स

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    यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

    “मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ, और मेरे विचारों और तरीकों के बहुत-से परिणाम लोगों के सामने प्रकट हैं। तो क्या प्रचार के विषय पर मेरा पादरियों से खुलकर बात करना अनुचित होगा? सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने एक बार मुझसे कहा था: ‘पादरी लोग जनता को सम्बोधित करने में समझदारी से काम नहीं लेते। वे बात को दोहराने से डरते हैं। वे ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिसे साधारण लोग ठीक से नहीं समझते। उनके उदाहरण जीवन के साधारण कामकाज से नहीं लिए जाते। वे बहुत ऊँची शैली में लिखते हैं, और बिना दोहराए पढ़ डालते हैं, और लोग उन्हें समझ नहीं पाते। अब यदि वकील ऐसा तरीका अपनाएँ, तो वे स्वयं को और अपने मुकदमे को भी बर्बाद कर डालेंगे। हमारा उद्देश्य अपनी वाक्पटुता का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि जूरी को कायल करना और वहीं के वहीं फ़ैसला प्राप्त करना होता है। अब यदि पादरी ऐसा करें, तो उनके प्रचार का प्रभाव आज की तुलना में अकथनीय रूप से भिन्न होगा। वे अपने अध्ययन-कक्ष में जाकर एक उपदेश लिखते हैं; फिर मंच पर जाकर उसे पढ़ देते हैं, और जो उसे सुनते हैं वे उसे बहुत कम समझ पाते हैं। वे लोगों को इस आशा से सम्बोधित नहीं करते कि वे उन्हें कायल करेंगे और वहीं के वहीं मसीह के पक्ष में उनका फ़ैसला प्राप्त करेंगे। वे ऐसा कोई उद्देश्य रखते ही नहीं। बल्कि ऐसा लगता है कि उनका लक्ष्य सुन्दर साहित्यिक रचनाएँ तैयार करना, और बड़ी वाक्पटुता तथा अलंकृत भाषा का प्रदर्शन करना होता है।’

    “मेरे भाइयों ने अक्सर मेरे साथ जो रूखा व्यवहार किया, उसके कारण मैंने उनके प्रति कभी ज़रा भी कटुता नहीं रखी। वे सचमुच यह समझते थे कि यदि मैं उनके विचार अपना लूँ तो मैं कहीं अधिक भलाई और कहीं कम बुराई करूँगा। परन्तु मेरी राय कुछ और थी।

    “जब मैं फ़िलाडेल्फ़िया में प्रचार कर रहा था, तो कनेक्टिकट से एक डॉक्टर वहाँ आए और उन्होंने मेरा प्रचार सुना। जिस ढंग से मैं मंच की गरिमा को नीचे गिरा रहा था, उस पर वे क्रोधित हुए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब तक मैं पादरी की शिक्षा प्राप्त न कर लूँ, तब तक मुझे प्रचार करने न दिया जाए; कि मुझे प्रचार करना बन्द करके प्रिंसटन जाना चाहिए और धर्मविज्ञान सीखना चाहिए, और इस विषय में बेहतर समझ प्राप्त करनी चाहिए कि सुसमाचार का प्रचार किस प्रकार किया जाना चाहिए।

    “मुझे उच्च शिक्षा-संस्थानों का लाभ नहीं मिला था; और मुझे इस बात का इतना गहरा एहसास था कि मुझमें वे योग्यताएँ नहीं हैं जो मुझे स्वीकार्य बनातीं, विशेषकर पादरियों को, और मुझे डर था कि बड़े स्थानों के लोगों को भी, कि मेरी कभी इससे ऊँची कोई महत्वाकांक्षा या योजना नहीं रही कि मैं नई बस्तियों में और ऐसे स्थानों में जाऊँ जहाँ लोगों को सुसमाचार उपलब्ध नहीं था। सच तो यह है कि अपने प्रचार के आरम्भिक वर्षों में मैं स्वयं अक्सर यह देखकर चकित होता था कि मेरा प्रचार सबसे अधिक शिक्षित वर्गों के लिए भी इतना उन्नतिकारी और स्वीकार्य है। यह मेरी अपेक्षा से अधिक था, और जितनी आशा करने का मैंने साहस किया था उससे कहीं अधिक था। परन्तु मैं जितना अधिक प्रचार करता गया, उतना ही कम मुझे यह सोचने का कारण मिला कि मेरी भूल उस दिशा में है जिस दिशा में मेरे पादरी भाई उसे समझते थे। जितना अधिक मेरा अनुभव बढ़ा, जितना अधिक मैंने अपनी प्रचार-पद्धति के परिणाम देखे, जितना अधिक मैंने ऊँचे और नीचे, शिक्षित और अशिक्षित, सब वर्गों के लोगों से बातचीत की, उतना ही अधिक इस तथ्य में मेरा विश्वास दृढ़ हुआ कि परमेश्वर ने मेरी अगुवाई की थी, और प्राणों को जीतने की सर्वोत्तम रीति के विषय में मुझे सही समझ दी थी। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर ने मुझे सिखाया; और मैं जानता हूँ कि ऐसा ही हुआ होगा; क्योंकि निश्चय ही ये विचार मैंने किसी मनुष्य से प्राप्त नहीं किए थे। और मैंने अक्सर सोचा है कि मैं पूरी सच्चाई के साथ वैसा ही कह सकता हूँ जैसा पौलुस ने कहा, कि सुसमाचार मुझे मनुष्य ने नहीं, बल्कि स्वयं मसीह के आत्मा ने सिखाया। और आत्मा ने मुझे इतनी स्पष्ट और प्रबल रीति से सिखाया कि मेरे पादरी भाइयों का कोई भी तर्क, जिनसे वे मुझ पर इतनी बार और इतने लम्बे समय तक दबाव डालते रहे, मुझ पर ज़रा भी असर न डाल सका।

    “यह बात मैं कर्तव्य समझकर कह रहा हूँ; क्योंकि मैं अब भी गम्भीरता से इस दृढ़ धारणा से प्रभावित हूँ कि शिक्षा-संस्थान बहुत हद तक पादरियों को बिगाड़ रहे हैं। आजकल पादरियों के पास सब धर्मवैज्ञानिक प्रश्नों पर जानकारी प्राप्त करने की बड़ी सुविधाएँ हैं, और जहाँ तक धर्मविज्ञान, इतिहास और बाइबल के ज्ञान का सम्बन्ध है, वे संसार के शायद किसी भी युग की तुलना में कहीं अधिक विद्वान हैं। फिर भी, अपनी सारी विद्या के बावजूद, वे नहीं जानते कि उसका उपयोग कैसे करें। आख़िरकार, वे बहुत हद तक शाऊल का कवच पहने हुए दाऊद के समान हैं। कोई मनुष्य प्रचार करने के सिवाय और किसी तरह प्रचार करना कभी नहीं सीख सकता।

    “परन्तु पादरियों को एक बड़ी चीज़ की आवश्यकता है, और वह है निर्मल एकाग्र दृष्टि। यदि उन्हें अपनी प्रतिष्ठा बनानी और सँभालनी है, तो वे बहुत कम भलाई करेंगे। बहुत वर्ष पहले मेरे परिचय के एक प्रिय पास्टर अपने स्वास्थ्य के लिए घर से बाहर गए, और अपनी अनुपस्थिति में अपना मंच सँभालने के लिए उन्होंने सेमिनरी से अभी-अभी निकले एक युवक को रख लिया। इस युवक ने जितने शानदार उपदेश वह लिख सकता था, लिखे और प्रचार किए। अन्त में पास्टर की पत्नी ने साहस करके उससे कहा: ‘आप लोगों के सिर के ऊपर से प्रचार कर रहे हैं। वे न आपकी भाषा समझते हैं, न आपके उदाहरण। आप अपनी विद्या का बहुत अधिक भाग मंच पर ले आते हैं।’ उसने उत्तर दिया: ‘मैं एक युवक हूँ। मैं एक शैली विकसित कर रहा हूँ। मेरा लक्ष्य स्वयं को इस योग्य बनाना है कि मैं कोई मंच सँभालूँ और अपने चारों ओर एक सुसंस्कृत मंडली इकट्ठी करूँ। मैं आपके लोगों के स्तर तक नीचे नहीं उतर सकता। मुझे एक ऊँची शैली विकसित करनी ही है।’ तब से मैं उस व्यक्ति पर नज़र रखे हुए हूँ, और मैंने कभी उसका नाम किसी जागृति से जुड़ा हुआ नहीं देखा, और जब तक उसके विचार जड़ से न बदल जाएँ, तब तक मुझे ऐसा देखने की कोई आशा भी नहीं है।

    “मेरे प्रचार के आरम्भिक वर्षों में पादरियों के बीच यह बात आपस में तय कर लेना बहुत आम था कि यदि मैं सेवकाई में सफल हो गया, तो इससे शिक्षा-संस्थानों की बदनामी होगी। अब, मैंने कॉलेजों या धर्मवैज्ञानिक सेमिनरियों द्वारा दी जानेवाली शिक्षा को तुच्छ समझने का कभी विचार भी नहीं किया; यद्यपि मैं यह अवश्य सोचता था, और अब भी सोचता हूँ, कि कुछ बातों में वे अपने विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने के तरीकों में बड़ी भूल करते हैं। वे उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित नहीं करते कि अपनी पढ़ाई के दौरान ही वे लोगों से बात करें, और आसपास के क्षेत्र में लोगों के सामने बिना तैयारी के भाषण देने के अभ्यस्त हो जाएँ। मनुष्य बिना अभ्यास के केवल अध्ययन से प्रचार करना नहीं सीख सकते। विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे अपने लिए खुले हुए किसी भी स्थान में जाकर, और गम्भीर वार्ताओं में लोगों के सामने मसीह को ऊँचा उठाकर, परमेश्वर द्वारा दिए गए अपने वरदानों और बुलाहट का प्रयोग करें, उन्हें परखें और उन्हें उन्नत करें। इसी प्रकार उन्हें प्रचार करना सीखना होगा।

    “इसके बजाय, विद्यार्थियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे वह लिखें जिसे वे उपदेश कहते हैं, और उन्हें आलोचना के लिए प्रस्तुत करें; कि वे उनका प्रचार करें, अर्थात् उन्हें कक्षा और प्रोफ़ेसर के सामने पढ़कर सुना दें। इस प्रकार वे प्रचार का खेल खेलते हैं। इस रीति से कोई मनुष्य प्रचार नहीं कर सकता। ये तथाकथित उपदेश, उन्हें मिलनेवाली आलोचना के कारण, स्वाभाविक रूप से गिरकर साहित्यिक निबन्ध बन जाएँगे। लोगों के मन में ऐसे उपदेशों के लिए, उपदेशों के रूप में, कोई आदर नहीं होता। सुरुचिपूर्ण साहित्यिक निबन्धों का यह पाठ उनके लिए प्रचार नहीं है। यह साहित्यिक रुचि को तो तृप्त करता है, परन्तु आत्मिक उन्नति नहीं करता। यह प्राण की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता, और न ही यह प्राणों को मसीह के लिए जीतने के योग्य होता है। विद्यार्थियों को लेखन की एक सुन्दर, ऊँची शैली विकसित करना सिखाया जाता है। जहाँ तक सच्ची वाक्पटुता का प्रश्न है—वह उमड़ती हुई, प्रभावशाली, मन को मना लेनेवाली वक्तृता जो किसी ऐसे शिक्षित व्यक्ति से स्वाभाविक रूप से बह निकलती है जिसका प्राण अपने विषय से धधक रहा हो, और जो प्रतीक्षा करते हुए, उत्सुक लोगों के सामने अपना हृदय उँडेलने के लिए स्वतंत्र हो—वह उनमें ज़रा भी नहीं होती।

    “एक विचारशील मन को ऐसा लगेगा कि अनन्त मृत्यु की कगार पर लटके हुए अमर प्राणों के सामने मंच से विद्या और अलंकार-शास्त्र के ऐसे नमूने प्रस्तुत करना असीम रूप से अनुचित है। . . . जब मनुष्य पूरी तरह गम्भीर होते हैं, तो उनकी भाषा सीधी और सरल होती है। उनके वाक्य छोटे, तर्कपूर्ण और शक्तिशाली होते हैं। सीधे कार्य करने की अपील की जाती है; और इसी कारण ऐसे सब प्रवचन असर करते हैं। . . . एक साधारण उपदेशक का भावावेशपूर्ण कथन अक्सर किसी मंडली को उस हद से कहीं आगे तक हिला देता है जहाँ तक अलंकार-शास्त्र के ये शानदार प्रदर्शन कभी पहुँचा सकते हैं। महान उपदेश लोगों को प्रचारक की प्रशंसा करने की ओर ले जाते हैं। अच्छा प्रचार लोगों को उद्धारकर्ता की स्तुति करने की ओर ले जाता है।

    “मेरा अनुभव यह रहा है कि एक पादरी के लिए ‘ईमानदारी ही सबसे अच्छी नीति है।’ . . . मनुष्य मूर्ख नहीं हैं। जो मनुष्य मंच पर जाकर चिकनी-चुपड़ी बातों का प्रचार करता है, उसके लिए उनके मन में कोई ठोस आदर नहीं होता। वे अपने अन्तरतम प्राण में ऐसी बात से हृदय से घृणा करते हैं। और कोई भी मनुष्य यह न सोचे कि वह स्थायी आदर प्राप्त करेगा, या उसके लोग स्थायी रूप से उसका सम्मान करेंगे, जब तक कि वह मसीह के राजदूत के रूप में उनके प्राणों के साथ विश्वासयोग्यता से व्यवहार न करे।

    “मेरी आदत सदा यह रही है कि मैं हर समय सुसमाचार का, और उसे सबसे अच्छी तरह लागू करने का, अध्ययन करता रहूँ। मैं अपने उपदेश लिखने के लिए स्वयं को कुछ घंटों और दिनों तक सीमित नहीं रखता; बल्कि मेरा मन सदा सुसमाचार की सच्चाइयों पर और उनका उपयोग करने की सर्वोत्तम रीति पर मनन करता रहता है। मैं लोगों के बीच जाता हूँ, और उनकी आवश्यकताओं को जानता हूँ। फिर, पवित्र आत्मा के प्रकाश में, मैं कोई ऐसा विषय चुनता हूँ जो मेरे विचार में उनकी वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करेगा। मैं उस पर गहराई से सोचता हूँ, उस पर बहुत प्रार्थना करता हूँ, और अपने मन को उससे भर लेता हूँ, और फिर जाकर उसे लोगों के सामने उँडेल देता हूँ। लिखे हुए उपदेश की एक कठिनाई यह है कि मनुष्य उसे लिख लेने के बाद विषय पर बहुत कम सोचने की आवश्यकता समझता है। जब तक मनुष्य आरम्भ करके, जैसे भी हो सके, लोगों से बात न करें, और अपने हृदयों को सत्य से और पवित्र आत्मा से भरपूर न रखें, तब तक वे कभी बिना तैयारी के बोलनेवाले प्रचारक नहीं बनेंगे।

    “मैंने हाल के वर्षों में मंच के लिए तैयारी करने की अपनी रीति के विषय में बताया है। जब मैंने पहले-पहल प्रचार करना आरम्भ किया, और अपनी आरम्भिक सेवकाई के लगभग बारह वर्षों तक, मैंने एक शब्द भी नहीं लिखा, और अधिकतर मुझे बिना किसी भी तैयारी के प्रचार करना पड़ता था, सिवाय उसके जो मुझे प्रार्थना में मिलती थी। अक्सर मैं यह जाने बिना मंच पर चला जाता था कि मैं किस पाठ पर बोलूँगा या कौन-सा एक भी शब्द कहूँगा। मैं इस बात पर निर्भर रहता था कि अवसर और पवित्र आत्मा ही पाठ सुझाएँगे, और सारे विषय को मेरे मन के सामने खोल देंगे; और निश्चय ही अपनी सेवकाई के किसी भी भाग में मैंने इससे अधिक सफलता और सामर्थ के साथ प्रचार नहीं किया। यदि मैं प्रेरणा से प्रचार नहीं करता था, तो मैं नहीं जानता कि फिर मैं किस प्रकार प्रचार करता था। मेरा यह आम अनुभव था, और मेरी पूरी पादरी-सेवा के जीवन में रहा है, कि विषय मेरे मन के सामने ऐसी रीति से खुल जाता था जिस पर मैं स्वयं चकित होता था। ऐसा प्रतीत होता था कि मुझे मानो अन्तर्बोध की स्पष्टता से ठीक-ठीक दिखाई देता था कि मुझे क्या कहना चाहिए; और विचारों, शब्दों और उदाहरणों की पूरी की पूरी टुकड़ियाँ उतनी तेज़ी से मेरे पास आती थीं जितनी तेज़ी से मैं उन्हें बोल सकता था। . . . मैं विश्वास करता हूँ कि सुसमाचार का प्रचार करने के लिए मसीह द्वारा बुलाए गए सब पादरियों को इस अर्थ में ऐसा प्रेरित होना चाहिए, और वे हो भी सकते हैं, कि वे ‘स्वर्ग से भेजे गए पवित्र आत्मा के द्वारा सुसमाचार सुनाएँ।’ सब पादरी पवित्र आत्मा से ऐसे भरपूर हो सकते हैं, और होने भी चाहिए, कि जितने उन्हें सुनें, वे सब इस दृढ़ धारणा से प्रभावित हों कि परमेश्वर सचमुच उनके साथ है।” (संस्मरण, पृ. 85-97।)

    “मनुष्यों में, स्त्रियों और पुरुषों दोनों में, समझाने-मनाने की स्वाभाविक शक्ति में असीम अन्तर होता है; परन्तु मनुष्य की कोई भी वाक्पटुता कभी किसी प्राण का मन-परिवर्तन नहीं कर सकती। जब तक परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर के सत्य को हृदय तक पहुँचाकर उसे प्रभावशाली न बना दे, तब तक मनुष्य की सारी वाक्पटुता और विद्या व्यर्थ रहेगी। और यह एक ऐसा तथ्य है जो पूरे ध्यान और विचार के योग्य है कि बहुत थोड़ी मानवीय शिक्षा के होते हुए भी, सामर्थ का यह वरदान एक मसीही को प्राणों को मसीह के पास लाने में बुद्धिमान और प्रभावशाली बना देगा। . . . यह मानवीय विद्या और घमण्ड के लिए बहुत अपमानजनक है, और सदा से रहा है; फिर भी आरम्भ से ही मसीह की यह रीति रही है कि वह ज्ञानवानों को लज्जित करने के लिए संसार की निर्बल वस्तुओं को चुनता है। . . . सामर्थ का यह वरदान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें लोग समझाने-मनाने और बातचीत करने की आदतें डालकर बढ़ते-बढ़ते पहुँच जाएँ। यह एक दान है, एक अभिषेक है, जो क्षण भर में प्राप्त होता है, और जो इस बात के अनुसार बढ़ या घट सकता है कि उसका धारक उसे, जिन उद्देश्यों के लिए वह दिया गया था उनके लिए, कम या अधिक विश्वासयोग्यता और लगन से उपयोग करता है। अक्सर वह प्राप्त होकर फिर खो जाता है, या किसी ऐसी बात के कारण उसका प्रकट होना रुक जाता है जो प्राण में आत्मा के प्रकाश को बुझा देती है।

    “जहाँ यह सामर्थ विद्यमान हो, वहाँ विद्या और वाक्पटुता जितनी अधिक हो उतना ही अच्छा। परन्तु यह देखना दुःखदायी है कि इस सामर्थ के स्थान पर संस्कृति को, या इस ईश्वरीय वरदान के स्थान पर मानवीय विद्या और वाक्पटुता को रखने की प्रवृत्ति निरन्तर बनी रहती है। मुझे डर है कि कलीसिया में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कलीसियाएँ पवित्र आत्मा से गहराई से बपतिस्मा पाए हुए मनुष्यों के बजाय, इस ईश्वरीय वरदान के स्थान पर, बड़ी विद्या और वाक्पटुता वाले मनुष्यों को बुला रही हैं।

    “विद्या की सेमिनरियाँ इस विषय में बहुत दोषी हैं। वे इस वरदान पर, संसार में उपयोगी होने की एक अनिवार्य योग्यता के रूप में, उतना आधा ज़ोर भी नहीं देतीं जितना देना चाहिए। किसी कॉलेज या धर्मवैज्ञानिक सेमिनरी के प्रोफ़ेसर के लिए सामर्थ के इस वरदान का प्रकट होना एक अनिवार्य योग्यता माना जाना चाहिए, और इसके अभाव को प्रोफ़ेसर-पद के लिए, विशेषकर किसी धर्मवैज्ञानिक सेमिनरी में, अयोग्यता माना जाना चाहिए। धर्मविज्ञान का कोई प्रोफ़ेसर जो सामर्थ के इस वरदान में विश्वास नहीं करता, और जिसमें यह प्रकट मात्रा में नहीं है, वह अपने विद्यार्थियों के लिए ठोकर का कारण बने बिना नहीं रह सकता। यदि वह इस पर, सेवकाई के लिए सब योग्यताओं में सबसे महत्वपूर्ण योग्यता के रूप में, उनसे आग्रह नहीं करता, यदि वह इसकी चर्चा नहीं करता और इसे सेवकाई में सफलता के लिए पूरी तरह अनिवार्य नहीं मानता, तो उसकी शिक्षा और उसका प्रभाव बुनियादी रूप से दोषपूर्ण होंगे; वे एक फन्दा और ठोकर का कारण बनेंगे। यह बात सच होनी ही चाहिए, नहीं तो ऊपर से सामर्थ पाने का यह सारा प्रश्न ही एक भ्रम होगा।” (पवित्र आत्मा का बपतिस्मा, पृ. 245-247।)

    मैंने प्रचारकों, प्रचार और पादरियों के प्रशिक्षण के विषय में फ़िन्नी की ये विस्तृत टिप्पणियाँ इसलिए उद्धृत की हैं, क्योंकि मेरा विश्वास है कि इनमें उतनी ही मात्रा के किसी भी अन्य प्रवचन-शास्त्रीय साहित्य की तुलना में कहीं अधिक ठोस विवेक और बुद्धिमानी भरी सलाह है। मैं भी आलोचना के लिए एक प्रोफ़ेसर और सहपाठियों के सामने दिखावटी उपदेश का प्रचार करने के उस घिनौने स्वांग से गुज़र चुका हूँ। मुझे भी कॉलेज और सेमिनरी में रहते हुए वर्षों तक प्रचार करने से रोका गया। मुझे भी प्रशिक्षित किया गया, उपाधि दी गई, और प्रचार करने के लिए भेज दिया गया, परन्तु किसी प्रोफ़ेसर ने कभी मुझे इस बात का संकेत तक नहीं दिया कि मुझे ईश्वरीय अभिषेक की, ऊपर से मिलनेवाली सामर्थ के वरदान की, आवश्यकता है।

    जब हम इस पर विचार करते हैं कि संसार के सबसे अधिक उच्च-शिक्षित पादरियों के होते हुए भी, लगभग तीन हज़ार कॉन्ग्रिगेशनल और प्रेस्बिटेरियन कलीसियाएँ प्रतिवर्ष एक भी मन-परिवर्तन की सूचना नहीं देतीं, और कि कई पूरे के पूरे सम्प्रदाय ऐसे हैं जिनकी दशा इससे भी बुरी है, तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि प्रचारक तैयार करने के लिए शिक्षा-संस्थानों की शिक्षा से कुछ अधिक की आवश्यकता है। फ़िन्नी की सफलता इतनी असाधारण थी कि धर्मविज्ञान के प्रोफ़ेसर, विद्यार्थी और प्रचारक भली-भाँति उसके चरणों में बैठकर प्रवचन-कला के पाठ सीख सकते हैं।

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