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विद्यार्थी सिनसिनाटी की लेन सेमिनरी में अपने आरामदायक आवास छोड़कर ओबर्लिन गए, जहाँ उन्हें आरे से चीरे गए लट्ठों के बाहरी तख़्तों से बनी “बैरकों” में ठहराया गया। उसे “स्लैब हॉल” (तख़्ता भवन) कहा जाता था। जब अन्य विद्यार्थियों ने सुना कि फ़िन्नी आ रहे हैं, तो वे हर दिशा से उमड़ पड़े। ओबर्लिन में कोई भी कमरा इतना बड़ा नहीं था कि उसमें वे मण्डलियाँ समा सकें जो जंगल में भी फ़िन्नी का प्रचार सुनने के लिए इकट्ठी हो जाती थीं। उन्हें इस बात की सूचना दी गई, और वे अपने साथ सौ फुट व्यास का एक गोल तम्बू ले आए, जिसके साथ उसे खड़ा करने का सारा साज़-सामान था। तम्बू को सम्भालनेवाले बीच के खम्भे के शिखर पर एक पताका थी, जिस पर बहुत बड़े अक्षरों में लिखा था, “यहोवा के लिए पवित्र।” वह तम्बू बड़े काम का सिद्ध हुआ। जब मौसम अनुमति देता, तो हर विश्रामदिन के लिए उसे खड़ा किया जाता था। आरम्भिक दीक्षान्त समारोहों में से कई उसी में आयोजित हुए, और आसपास के क्षेत्रों में लगातार चलनेवाली सभाएँ करने के लिए भी उसका उपयोग किया गया।
फ़िन्नी और श्री टैपन के बीच यह समझ थी कि ओबर्लिन की सहायता करने के उनके प्रस्ताव के विषय में ट्रस्टियों को पता न चले, कहीं ऐसा न हो कि वे धन इकट्ठा करने के लिए उचित प्रयत्न करने में ढिलाई करें। भवनों के मामले में काम तेज़ी से आगे बढ़ाया जा रहा था, कि तभी 1837 का बड़ा व्यापारिक संकट पूरे देश पर छा गया, और उसने अधिकतर धनी व्यापारियों को बर्बाद कर दिया। आर्थर टैपन, और लगभग वे सब जिन्होंने संकाय के भरण-पोषण के लिए चन्दा लिखवाया था, दिवालिया हो गए। इससे संकाय अपने भरण-पोषण के लिए बिना धन के रह गया, और कॉलेज पर तीस हज़ार डॉलर का कर्ज़ चढ़ गया। मानवीय दृष्टि से कॉलेज का उपक्रम नष्ट हो चुका था।
लोगों का बहुत बड़ा समूह इस उपक्रम के दासता-उन्मूलनवादी स्वरूप के कारण उसका पूरी तरह विरोधी था। आसपास के नगर इस आन्दोलन के प्रति शत्रुभाव रखते थे, और कुछ स्थानों में आकर भवनों को गिरा देने की धमकियाँ दी गईं। प्रचारक धर्मविज्ञान-सम्बन्धी पूर्वाग्रहों के कारण विरोध में थे। एक डेमोक्रेटिक विधान-मण्डल ने उनका अधिकार-पत्र रद्द करने का प्रयत्न किया।
उस समय विद्यालय की आवश्यकताएँ बहुत बड़ी थीं, और परमेश्वर से बड़ी पुकार की गई। फ़िन्नी अपनी जागृतियों और जागृति-व्याख्यानों के कारण इंग्लैंड में इतने सम्मान के साथ जाने जाते थे कि कॉलेज का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक समिति इंग्लैंड भेजी गई। उन्होंने लगभग छह हज़ार पाउंड स्टर्लिंग, अर्थात् $30,000, इकट्ठे किए, और इस प्रकार कर्ज़ चुका दिया। इस प्रकार परमेश्वर के अधीन फ़िन्नी के नाम और ख्याति ने ही ओबर्लिन को बचाया। पूरे उत्तर में हर जगह उनके मित्रों ने जो कुछ वे कर सकते थे किया; परन्तु इस सबके बावजूद, उन्हें वर्षों तक दरिद्रता और बहुत सी परीक्षाओं से संघर्ष करना पड़ा, कभी-कभी दिन-प्रतिदिन यह न जानते हुए कि उनकी आवश्यकताएँ कैसे पूरी होंगी। तब फ़िन्नी यह मार्मिक वृत्तान्त सुनाते हैं:
“एक समय मुझे सर्दी भर अपने परिवार का भरण-पोषण करने का कोई साधन दिखाई नहीं देता था। धन्यवाद-दिवस (थैंक्सगिविंग-डे) आया, और उसने हमें इतना दरिद्र पाया कि मुझे अपना यात्रा का सन्दूक, जिसका उपयोग मैंने अपने सुसमाचार-प्रचार के परिश्रम में किया था, बेचना पड़ा था, ताकि उस गाय की कमी पूरी करूँ जो मैंने खो दी थी। धन्यवाद-दिवस की सुबह मैं उठा और अपनी आवश्यकताओं को प्रभु के सामने फैला दिया। अन्त में मैंने यह कहकर समाप्त किया कि यदि सहायता न आए, तो मैं यह मान लूँगा कि यही सबसे अच्छा था कि वह न आए, और प्रभु जो भी मार्ग अपनाना बुद्धिमानी समझे, उससे मैं पूरी तरह सन्तुष्ट रहूँगा। मैं गया और प्रचार किया, और मेरे विचार में मैंने अपने प्रचार का उतना ही आनन्द लिया जितना कभी लिया था। मेरे अपने प्राण के लिए वह एक धन्य दिन था; मैं देख सकता था कि लोगों ने भी उसका अत्यधिक आनन्द लिया।
“सभा के बाद मैं कुछ भाइयों के साथ बातचीत में थोड़ी देर रुका रहा, और मेरी पत्नी घर लौट गई। जब मैं फाटक पर पहुँचा तो वह हाथ में एक पत्र लिए खुले द्वार में खड़ी थी। जब मैं निकट आया तो उसने मुस्कराते हुए कहा, ‘उत्तर आ गया है, प्रिय;’ और मुझे वह पत्र थमा दिया जिसमें प्रॉविडेंस के श्री जोसाया चेपिन की ओर से दो सौ डॉलर का चेक था। वे पिछली गर्मियों में अपनी पत्नी के साथ यहाँ आए थे। मैंने अपनी आवश्यकताओं के विषय में कुछ भी नहीं कहा था, क्योंकि उन्हें किसी से बताने की मेरी कभी आदत नहीं थी। परन्तु चेक वाले पत्र में उन्होंने कहा कि उन्हें पता चला है कि स्थायी निधि विफल हो गई है, और मुझे सहायता की आवश्यकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मैं समय-समय पर और भी सहायता की आशा रख सकता हूँ। वे कई वर्षों तक मुझे प्रति वर्ष छह सौ डॉलर भेजते रहे, और इसी पर मैं अपना जीवन-निर्वाह करता रहा।” (पृष्ठ 338.)
इस्राएल के इस प्रधान के विषय में सोचिए, जिसने किसी भी जीवित मनुष्य से कई गुना अधिक लोगों को परमेश्वर की ओर फेरा था, और जो ऐसे असाधारण परिश्रम के पन्द्रह वर्षों के बाद इतना दरिद्र था कि अपना सन्दूक बेचे बिना एक गाय नहीं खरीद सकता था! वे एक सावधान, सटीक और बुद्धिमान व्यवसायी व्यक्ति थे। यदि वे वकालत में या व्यापार-जगत में उतने ही अग्रणी होते जितने सेवकाई में थे, तो बात कितनी भिन्न होती! उनके हाथ उस धन-लोलुपता से कितने मुक्त रहे होंगे जो बहुत से सुसमाचार-प्रचारकों को गिरा देती है!
बहुत से लोग, और पादरियों की भी एक बड़ी भीड़, यीशु मसीह के राज्य और सेवा में बड़ी उपयोगिता की लालसा रखते हैं। कम से कम वे ऐसा सोचते हैं। परन्तु सावधान पर्यवेक्षक यह जान लेगा कि जो भी असाधारण रूप से उपयोगी होते हैं, वे उसका मूल्य आत्म-त्याग, और दुःख, और अभाव, और वेदना, और आँसुओं में चुकाते हैं। परमेश्वर के राज्य के सबसे प्रभावशाली परिश्रमी अपनी मज़दूरी का अधिकांश भाग इस संसार में नहीं पाते। अद्वितीय उपयोगिता का मूल्य चुकाना पड़ता है; और अधिकतर लोग वह मूल्य चुकाने को तैयार नहीं होते।
तीन वर्ष तक फ़िन्नी ने अपनी गर्मियाँ ओबर्लिन में, और अपनी सर्दियाँ न्यूयॉर्क सिटी में अपनी कलीसिया के साथ बिताईं। हर सर्दी में न्यूयॉर्क में एक धन्य जागृति होती थी; और ओबर्लिन में उनके रहने के दौरान भी निरन्तर जागृति बनी रहती थी। परन्तु शीघ्र ही उनका स्वास्थ्य ऐसा हो गया कि उन्होंने अनुभव किया कि अपना बोझ हल्का करने के लिए उन्हें एक या दूसरा क्षेत्र छोड़ना ही होगा। आश्चर्य की बात है कि उनके मन में जंगल की उस नई संस्था के हित महानगर की कलीसिया से अधिक भारी पड़े! स्पष्ट है कि उन उत्साही विद्यार्थियों में से महान प्रचारक और शिक्षक तैयार करने की उनमें बड़ी लालसा थी, और स्पष्ट है कि वे विश्वास करते थे कि वहाँ वे मसीह के राज्य के लिए सबसे अधिक कर सकते हैं।
ब्रॉडवे टैबरनेकल में अपनी पास्टरी की अन्तिम दो सर्दियों के दौरान उन्होंने मसीहियों के लिए व्याख्यानों की एक शृंखला दी, जिनकी रिपोर्ट भी श्री लेविट ने लिखी, और वे इवैंजलिस्ट में प्रकाशित हुए। ये भी इस देश में और यूरोप में एक खण्ड के रूप में प्रकाशित हुए। ये व्याख्यान उस खोज का परिणाम थे जो उनके अपने मन में चल रही थी। परमेश्वर का आत्मा पवित्रीकरण के विषय में उनसे व्यवहार कर रहा था।
“बहुत से मसीहियों ने उन व्याख्यानों को सुसमाचार की अपेक्षा व्यवस्था का प्रदर्शन अधिक समझा। परन्तु मैं ऐसा नहीं समझता। मेरे लिए व्यवस्था और सुसमाचार का जीवन का एक ही नियम है; और व्यवस्था की आत्मा का हर उल्लंघन सुसमाचार की आत्मा का भी उल्लंघन है। परन्तु मुझे बहुत समय से यह निश्चय रहा है कि मसीही अनुभव के ऊँचे रूप केवल मनुष्य के विवेक और हृदय पर परमेश्वर की व्यवस्था के भयंकर रूप से खोजनेवाले प्रयोग के परिणामस्वरूप ही प्राप्त होते हैं। मेरे परिश्रम के परिणामों ने मुझे मसीहियों की बड़ी दुर्बलता दिखा दी थी, और यह भी कि कलीसियाओं के पुराने सदस्य, सामान्य रूप से, अनुग्रह में बहुत कम उन्नति कर रहे थे। मैंने पाया कि वे जागृति की अवस्था से नए विश्वासियों से भी पहले पीछे हट जाते थे। जिस जागृति में मेरा स्वयं का मन-परिवर्तन हुआ था, उसमें भी ऐसा ही हुआ था। मैंने अनुभव किया कि इसका कारण वे विचार थे जिन्हें अपनाने के लिए उन्हें तब प्रेरित किया गया था जब वे नए विश्वासी थे।”
“मैं विश्वास और प्रेम में अपनी स्वयं की स्थिरता की कमी से भी बड़े असन्तोष की अवस्था में पहुँच गया। स्पष्ट कहूँ और सच बताऊँ, तो परमेश्वर के अनुग्रह की स्तुति के लिए मुझे कहना पड़ेगा कि उसने मुझे उस सीमा तक पीछे हटने नहीं दिया जिस सीमा तक स्पष्ट रूप से बहुत से मसीही पीछे हट गए थे। परन्तु मैं प्रायः परीक्षा के सामने अपने आप को दुर्बल पाता था, और मुझे बार-बार उपवास और प्रार्थना के दिन रखने पड़ते थे, और अपने धार्मिक जीवन की जाँच-पड़ताल करने में बहुत समय लगाना पड़ता था, ताकि परमेश्वर के साथ वह संगति, और ईश्वरीय सत्य पर वह पकड़ बनाए रख सकूँ, जो मुझे धर्म की जागृतियों को बढ़ाने के लिए प्रभावशाली रूप से परिश्रम करने के योग्य बनाए।”
“अपने परिश्रम में मसीही कलीसिया की जो दशा मुझ पर प्रकट हुई थी, उसे देखकर मैं गम्भीरता से यह खोजने लगा कि क्या मसीही कलीसिया जितना जानती थी, उससे कहीं ऊँची और अधिक स्थायी कोई बात नहीं है; क्या सुसमाचार में मसीहियों को पूरी तरह एक ऊँचे प्रकार के मसीही जीवन में स्थिर करने के साधन उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। . . . हमारे मेथोडिस्ट भाइयों द्वारा माने जानेवाले पवित्रीकरण के दृष्टिकोण के विषय में मैं कुछ-कुछ जानता था। परन्तु क्योंकि पवित्रीकरण के विषय में उनका विचार मुझे लगभग पूरी तरह संवेदना की अवस्था से सम्बन्धित लगता था, इसलिए मैं उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सका।* फिर भी, मैंने गम्भीरता से पवित्रशास्त्र में, और इस विषय पर जो कुछ भी हाथ लगा उसमें, खोज करने में अपने आप को लगा दिया, यहाँ तक कि मेरे मन को सन्तोष हो गया कि मसीही जीवन का एक पूरी तरह ऊँचा और अधिक स्थिर रूप प्राप्त किया जा सकता है, और वह सब मसीहियों का विशेषाधिकार है। इसी कारण मैंने मसीही सिद्धता पर दो उपदेश दिए, जो मसीहियों के लिए व्याख्यानों के खण्ड में सम्मिलित हैं।”
*यहीं उनकी भूल थी, जैसा कि हम आगे उनके धर्मविज्ञान पर एक अध्याय में दिखाएँगे।
“न्यूयॉर्क में उस अन्तिम सर्दी में, परमेश्वर को यह भाया कि मेरे प्राण को बड़ी ताज़गी दे। हृदय की गहरी जाँच के एक समय के बाद, उसने मुझे, जैसा वह प्रायः करता रहा है, एक चौड़े स्थान में पहुँचाया, और मेरे प्राण में उस ईश्वरीय मिठास का बहुत कुछ दिया, जिसके विषय में प्रेसिडेंट एडवर्ड्स अपने स्वयं के अनुभव में प्राप्त हुई बताते हुए बात करते हैं। उस सर्दी में मेरा पूरी तरह से टूटना हुआ; यहाँ तक कि कभी-कभी काफ़ी समय तक, अपने पापों को और मसीह में परमेश्वर के प्रेम को देखकर, मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने से अपने आप को रोक नहीं पाता था। उस सर्दी में ऐसे समय बार-बार आते थे, और उनके फलस्वरूप मेरी आत्मिक शक्ति का बड़ा नवीनीकरण हुआ, और मसीहियों के विशेषाधिकारों और परमेश्वर के अनुग्रह की बहुतायत के विषय में मेरे विचारों का विस्तार हुआ।” (पृष्ठ 340-341)
फ़िन्नी ओबर्लिन में अपने आरम्भिक अनुभवों के इसी अध्याय में यह तथ्य प्रकट करते हैं कि जब हडसन कॉलेज के ट्रस्टियों को पता चला कि उन्हें ओबर्लिन बुलाया गया है, तो उन्होंने भी उन्हें क्लीवलैंड से सत्ताईस मील दक्षिण में स्थित हडसन कॉलेज से जुड़ने के लिए बुलाया। उस संस्था की एक समिति क्लीवलैंड आई और कई दिनों तक प्रतीक्षा करती रही, ताकि जब वे नाव से उतरें तो उनसे मिलकर उन्हें हडसन कॉलेज आने का निमन्त्रण दे, जिसके पास पहले से ही अच्छे भवन थे और जिसकी अच्छी शुरुआत हो चुकी थी। फिर भी उन्होंने ओबर्लिन के पक्ष में निर्णय किया, और उसके बाद वर्षों तक वह संस्था ओबर्लिन की निरन्तर और कटु विरोधी बनी रही।
इसके अतिरिक्त, पश्चिमी शिक्षा और पश्चिमी कॉलेजों के भरण-पोषण के विषय पर विचार करने के लिए क्लीवलैंड में एक सम्मेलन बुलाया गया। डॉ. लाइमन बीचर उसकी प्रेरक शक्ति थे, और उन्होंने ओबर्लिन के प्रतिनिधियों और ओबर्लिन के समर्थकों को सम्मेलन से बाहर रखने की भावना भड़काई। सम्मेलन का उद्देश्य यह प्रतीत होता था कि ओबर्लिन को हर ओर से घेर लिया जाए, और ऐसे जनमत के द्वारा उसे कुचल दिया जाए जो उसे हर प्रकार का समर्थन देने से इनकार कर दे।
मानव-स्वभाव कैसी विचित्र वस्तु है, उस समय भी जब वह साधारण से अधिक मात्रा में बुद्धि और अनुग्रह से सम्पन्न हो, यदि वह पवित्र न किया गया हो! डॉ. बीचर को न्यू लेबनान में फ़िन्नी के विरुद्ध तलवार उठाने के लिए उकसाया गया था, और प्रभु ने उन्हें पराजित किया था। तब उन्होंने बॉस्टन छोड़ा, और महान नए पश्चिम तक पहुँचने और उसे बचाने में सहायता करने के लिए सिनसिनाटी चले गए। परन्तु परमेश्वर ने फ़िन्नी को उससे कहीं अधिक प्रभावशाली काम करने के लिए भेजा, जितना वे—चाहे वे कितने ही महान थे—कभी कर पाए या कर सकते थे। प्रत्यक्ष रूप से एक अयोग्य उद्देश्य से प्रेरित होकर, उन्होंने फिर से फ़िन्नी के काम को कुचलने का प्रयत्न किया। फिर से उन्हें पूरी असफलता मिली।
फ़िन्नी ने हडसन के विरोध के विषय में लिखा: “हम अपने काम में लगे रहे, और हमने अनुभव किया कि चुपचाप बैठे रहने में ही हमारा बल है; और हम ग़लत नहीं थे। हमें पूरा भरोसा था कि ऐसे विरोध को प्रबल होने देना परमेश्वर की योजना नहीं थी।” और सम्मेलन के विरोध के विषय में उन्होंने लिखा: “हम अपने काम में लगे रहे, और हमारे पास सदा उतने विद्यार्थी रहे जितनों को हम सम्भाल सकते थे। हमारे हाथ सदा परिश्रम से भरे रहे, और अपने प्रयत्नों में हमें सदा बड़ा प्रोत्साहन मिलता रहा। हमारी नीति यह थी कि विरोध को उसके हाल पर छोड़ दें।”
इस सम्मेलन की बैठक के कुछ वर्ष बाद, वहाँ उपस्थित रहे प्रमुख पादरियों में से एक आए और फ़िन्नी के घर पर एक-दो दिन बिताए। अन्य बातों के साथ उन्होंने कहा: “भाई फ़िन्नी, ओबर्लिन हमारे लिए एक बड़ा आश्चर्य है। मैं बहुत वर्षों से एक कॉलेज से उसके प्राध्यापकों में से एक के रूप में जुड़ा रहा हूँ। कॉलेज का जीवन और सिद्धान्त, और वे परिस्थितियाँ जिन पर कॉलेज खड़े किए जाते हैं, मुझे भली-भाँति परिचित हैं। हम सदा यह सोचते आए हैं कि कॉलेज तब तक टिक नहीं सकते जब तक पादरी-वर्ग उन्हें संरक्षण न दे। हम जानते थे कि जो युवक कॉलेज जाने वाले होते हैं, वे सामान्यतः इस विषय में कि उन्हें कौन-सा कॉलेज चुनना चाहिए, अपने पास्टरों से परामर्श करते हैं, और उनके निर्णय के अनुसार चलते हैं।”
उन्होंने कहा, “अब, पादरी लगभग सब के सब ओबर्लिन के विरुद्ध खड़े हो गए। वे व्यवस्था-विरोधी सिद्धतावाद (एन्टिनोमियन परफ़ेक्शनिज़्म) की पुकार से, और सुधार के विषय में आपके विचारों के सम्बन्ध में, धोखा खा गए; और दूर-दूर तक कलीसियाई संस्थाएँ—कॉन्ग्रिगेशनल, और प्रेस्बिटेरियन, और सब सम्प्रदायों की—एक हो गईं। उन्होंने अपनी कलीसियाओं को आपके विरुद्ध चेतावनी दी; उन्होंने सब जगह युवकों को आपके पास आने से हतोत्साहित किया, फिर भी प्रभु ने आपको बढ़ाया है। पश्चिम के लगभग किसी भी कॉलेज से अधिक अच्छी तरह धन से आपकी सहायता हुई है; आपके पास कहीं अधिक विद्यार्थी रहे हैं, और परमेश्वर की आशीष आप पर रही है, यहाँ तक कि आपकी सफलता अद्भुत रही है।” उन्होंने कहा, “अब, कॉलेजों के इतिहास में यह एक पूर्ण अपवाद है। ओबर्लिन के विरोधी लज्जित हुए हैं, और इस सारे विरोध के बीच परमेश्वर आपके साथ खड़ा रहा है, यहाँ तक कि आपने उसे मुश्किल से ही अनुभव किया है।”
यह कितना सच था, यह निम्नलिखित तथ्यों से देखा जा सकता है: “विद्यार्थियों की उपस्थिति 1835 में फ़िन्नी के परिश्रम के आरम्भ में दो सौ (जिनमें से बहुत से इसलिए वहाँ थे कि वे आ रहे थे) से बढ़कर 1840 में पाँच सौ, 1850 में एक हज़ार से अधिक, और कुछ समय बाद औसतन बारह से चौदह सौ तक पहुँच गई।”
यहाँ हम ठहरकर एक-दो बातों पर ध्यान दे सकते हैं: पहली, परमेश्वर के चुने हुओं में से किसी ऐसे व्यक्ति से लड़ना व्यर्थ काम है, जो अपने काम से काम रखता है और विश्वासयोग्यता से प्रभु का काम कर रहा है, जैसा फ़िन्नी कर रहे थे। यहाँ हम टेक्सस होलीनेस यूनिवर्सिटी वालों के लिए भी एक सबक है। हमने यह विद्यालय ठीक उसी प्रकार आरम्भ किया जैसे ओबर्लिन आरम्भ हुआ था, “परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता” के विस्तार के लिए। उनके तम्बू के ऊपर लहराती पताका पर “यहोवा के लिए पवित्र” लिखा था; हमारे यहाँ यह हमारे नाम में और हमारे अधिकार-पत्र में, और हमारे विद्यालय के हर लक्ष्य और उद्देश्य में है।
जब तक वे अपने आदर्श-वाक्य के प्रति उचित मात्रा में सच्चे रहे, तब तक कलीसियाई या पादरियों के या शैतानी विरोध के बावजूद उनकी अतुलनीय बढ़ोतरी हुई। यदि हम, अपनी अधिक ज्योति और पवित्रता को फैलाने के अपने अधिक घोषित उद्देश्य के साथ, केवल अपने ईश्वरीय मिशन के प्रति अडिग और निडर होकर सच्चे बने रहें, तो हमारी वर्तमान अभूतपूर्व बढ़ोतरी केवल इस बात की भविष्यवाणी है कि आगे क्या होगा।
अनुग्रह के इस वर्ष 1901 में, परमेश्वर ने अपना आत्मा हम पर उतने ही स्पष्ट रूप से उण्डेला है जितना उसने कभी ओबर्लिन पर उण्डेला था, और हमारे कॉलेज की वेदी पर एक सौ तिहत्तर लोगों का उद्धार या पवित्रीकरण हुआ है, जिनमें से पचास दीक्षान्त समारोह के कार्यक्रमों के दौरान; और हमारी यात्रा अभी आरम्भ ही हुई है। पादरी हमारा विरोध कर रहे हैं; परन्तु परमेश्वर हमारी सहायता के लिए दूसरों को खड़ा कर रहा है। हम अपने प्रतिस्पर्धियों को सहज चाल से पीछे छोड़ते जा रहे हैं; आइए, हम परमेश्वर और पवित्रता के प्रति निष्ठा की नई प्रतिज्ञा करें, और साहस और आशा के साथ भविष्य का सामना करें; क्योंकि वह हमारा है।
फ़िन्नी कहते हैं: “देश के विभिन्न भागों में बहुत बड़ी संख्या में साधारण विश्वासी, और कुल मिलाकर पादरियों की भी कोई छोटी संख्या नहीं, ऐसे थे जिन्हें इस विरोध पर कोई भरोसा नहीं था, जो हमारे लक्ष्यों, हमारे विचारों और हमारे प्रयत्नों से सहानुभूति रखते थे, और जो हर अच्छी-बुरी परिस्थिति में दृढ़ता से हमारे साथ खड़े रहे; और यह जानते हुए कि इस विरोध के कारण उस समय हम कैसी तंगी में पहुँच गए थे, उन्होंने हमें आगे बढ़ाने में सहायता के लिए खुले हाथ से अपना धन और अपना प्रभाव दिया। मैं प्रॉविडेंस के श्री चेपिन के विषय में बता चुका हूँ कि वे कई वर्षों तक मुझे प्रति वर्ष छह सौ डॉलर भेजते रहे, जब तक कि आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनके लिए ऐसा करते रहना असुविधाजनक न हो गया। बॉस्टन के श्री विलार्ड सीयर्स ने उनका स्थान लिया, और कई वर्षों तक मुझे प्रति वर्ष उतनी ही राशि उनसे लेने दी जितनी श्री चेपिन देते थे। इस बीच, संकाय के अन्य सदस्यों के भरण-पोषण के लिए निरन्तर प्रयत्न किए जाते रहे; और परमेश्वर के अनुग्रह से हम उस आँधी से पार निकल आए।” उन लोगों को कैसी आशीषें मिली होंगी जिन्होंने फ़िन्नी का पेट भरा, जैसे उस विधवा ने एलिय्याह का पालन-पोषण किया था!
प्रेसिडेंट महान, बाइबल के टीकाकार प्रोफ़ेसर काउल्स, नए नियम की यूनानी और इब्रानी के शिक्षक प्रोफ़ेसर मॉर्गन, और फ़िन्नी—ये सब अपने-अपने ढंग से उल्लेखनीय व्यक्ति थे, विपुल लेखक और रचनाकार, और प्रबल विचारक। विरले ही कोई नया विद्यालय अपने आसपास और अपने संकाय में ऐसे व्यक्तियों को इकट्ठा कर पाता है। उन्होंने ओबर्लिन इवैंजलिस्ट, और बाद में ओबर्लिन क्वार्टरली की स्थापना की, जिनमें वे धर्मविज्ञान और नैतिकता में उस समय के बड़े प्रश्नों पर खुलकर चर्चा कर सकें। फ़िन्नी के धर्मविज्ञान के प्राध्यापक होने के कारण अधिकतर आक्रमण उन्हीं पर हुए। परन्तु वे लिखते हैं:
“धुएँ और धूल के, बाहर से ग़लतफ़हमी और विरोध के इन वर्षों के दौरान, प्रभु भीतर हमें भरपूर आशीष दे रहा था। एक कलीसिया के रूप में यहाँ न केवल हमारे प्राण उन्नति करते रहे, बल्कि हममें निरन्तर जागृति बनी रही, या हम ऐसी अवस्था में थे जिसे उचित रूप से जागृति की अवस्था माना जा सकता था। हमारे विद्यार्थियों का मन-परिवर्तन बीसियों की संख्या में हुआ, और प्रभु ने अपनी दया के बादल से हम पर निरन्तर छाया की। ईश्वरीय प्रभाव की लहरें साल-दर-साल हम पर से बहती रहीं, और आत्मा के फल बहुतायत से उत्पन्न करती रहीं।”
“मैंने इस भले काम में अपनी सफलता का श्रेय सदा पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह को दिया है। यह सफलता हमारी अपनी किसी बुद्धि या भलाई से प्राप्त नहीं हुई। समाज में व्याप्त निरन्तर ईश्वरीय प्रभाव के अतिरिक्त और किसी वस्तु ने हमें हमारी परीक्षाओं में नहीं सम्भाला, और हमें ऐसी मनोदशा में नहीं रखा जिसमें हम उस काम में प्रभावशाली हो सकें जिसे हमने हाथ में लिया था। हमने सदा यह अनुभव किया है कि यदि प्रभु अपना आत्मा रोक ले, तो कोई भी बाहरी परिस्थिति हमें सचमुच समृद्ध नहीं बना सकती।”
“हमारे बीच आपस में भी परीक्षाएँ आई हैं। सार्वजनिक चर्चा के विषय बार-बार उठे हैं; और हमने कभी-कभी कर्तव्य और उपयुक्तता के ऐसे बड़े प्रश्नों पर चर्चा करने में दिन, और सप्ताह भी बिताए हैं, जिन पर हमारे विचार एक समान नहीं थे। परन्तु इन प्रश्नों में से किसी ने भी हमें स्थायी रूप से विभाजित नहीं किया। हमारा सिद्धान्त यह रहा है कि हम एक-दूसरे को निजी निर्णय का अधिकार दें। जिन विषयों पर हमारा मतभेद था, उन पर हम सामान्यतः सारभूत सहमति पर पहुँच गए हैं; और जब हमने पाया कि हम एक समान नहीं देख पा रहे हैं, तो अल्पसंख्यकों ने अपने आप को बहुमत के निर्णय के अधीन कर दिया है। . . हमने बहुत बड़ी सीमा तक ‘मेल के बन्धन में आत्मा की एकता’ को बनाए रखा है। शायद कोई भी समाज इतने लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रहा, और ऐसी परीक्षाओं और परिवर्तनों से होकर नहीं गुज़रा जैसे हम गुज़रे हैं, जिसने कुल मिलाकर मेल-मिलाप, मसीही सहनशीलता और भाईचारे के प्रेम की इससे बड़ी आत्मा बनाए रखी हो।”
“जब पवित्रीकरण का प्रश्न पहली बार उठा, तब हम एक सामर्थी जागृति के बीच में थे। यह 1836 की बात है। महान ने प्रचार किया था; श्री फ़िन्नी ने इस विषय पर कुछ अतिरिक्त बातें कहीं, तभी आत्मा श्रोताओं पर उतरा। बहुतों ने अपने सिर झुका लिए; कुछ ऊँचे स्वर से कराहने लगे। बहुतों को नई आशाएँ मिलीं। प्रेसिडेंट महान ने स्वयं पवित्र आत्मा का बपतिस्मा पाया। यह विद्यार्थियों के बीच और कलीसिया में एक बड़ा प्रश्न बन गया। इस विषय पर हमारे पास कोई सिद्धान्त नहीं थे, बचाव करने के लिए कोई दर्शन नहीं था, बल्कि हमने इसे सीधे-सीधे बाइबल के एक प्रश्न के रूप में लिया। इस रूप में यह हमारे बीच एक अनुभवजन्य सत्य के रूप में विद्यमान रहा, जिसे हमने किसी धर्मवैज्ञानिक सूत्र में बाँधने का प्रयत्न नहीं किया; और न ही हमने वर्षों बाद तक उसके दर्शन को समझाने का प्रयत्न किया। परन्तु इस प्रश्न की चर्चा हमारे लिए, और हमारे बहुत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों के लिए एक बड़ी आशीष सिद्ध हुई, जो अब देश के विभिन्न भागों में बिखरे हुए हैं, या संसार के विभिन्न भागों में मिशनरी होकर विदेश गए हैं।” (पृष्ठ 349-351.)
