अध्याय 17

दूसरों द्वारा फ़िन्नी का मूल्यांकन — धर्मविज्ञानी के रूप में फ़िन्नी

ए. एम. हिल्स

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    मैं एंडोवर के डॉ. एडवर्ड बीचर और डॉ. पार्क की वह सम्मति पहले ही दे चुका हूँ जो उन्होंने एक प्रचारक के रूप में फ़िन्नी की महानता के विषय में दी थी। न्यूयॉर्क सिटी के रेवरेंड चार्ल्स पी. बुश, डी. डी., ने उनके प्रचार में व्यवस्था और सुसमाचार के उपयोग का वर्णन करते हुए कहा: “इस प्रकार जब कलीसिया मानो भूकम्प से हिला दी गई, और मसीही लोग परमेश्वर की आशीष के लिए उत्कट प्रार्थना करने को जाग उठे, तब मिस्टर फ़िन्नी पापियों को प्रचार करने के लिए तैयार थे। उन्होंने व्यवस्था से आरम्भ किया, और दिखाया कि उसकी माँगें क्या हैं; उसका दण्ड क्या है, और वह कितनी न्यायसंगत है; विश्व की व्यवस्था और स्थिरता के लिए वह कितनी नितान्त आवश्यक है; किस प्रकार स्वयं व्यवस्था भी, सचमुच सुसमाचार के समान ही, ईश्वरीय सत्ता की भलाई को प्रमाणित करती है; और इसलिए ऐसे व्यवस्था देनेवाले के विरुद्ध और विश्व के सब हितों के विरुद्ध पाप करना कितनी भयानक बात होगी।

    “उन उपदेशों में कुछ भयावह बात भी थी। वास्तव में, इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी उनमें से कुछ को, विशेषकर उस उपदेश को जो इस पद पर था, ‘पाप की मजदूरी तो मृत्यु है,’ स्मरण करके मनुष्य लगभग काँप उठता है। प्रचारक की कल्पना उतनी ही सजीव थी जितना उनका तर्क अटल था। मानव स्वभाव और ईश्वरीय शासन के स्वयंसिद्ध सिद्धान्तों को स्थापित करने के बाद, फिर उसी विषय से सम्बन्धित पवित्रशास्त्र के सत्य को निकालकर, और तर्क और दृष्टान्त के द्वारा सब कुछ स्पष्ट और अकाट्य बनाकर, जब उन्होंने खोए हुए प्राण की दशा का वर्णन किया, तब उन्होंने ‘मजदूरी’ शब्द को कैसी-कैसी रीतियों से बार-बार दोहराया! ‘तुम्हें तुम्हारी मजदूरी मिलेगी; ठीक वही जो तुमने कमाया है, जो तुम्हारा हक़ है; न कुछ अधिक, न कुछ कम; और जब तुम्हारी पीड़ा का धुआँ घने बादल के समान युगानुयुग ऊपर उठता रहेगा, तब तुम उसकी बल खाती परतों पर प्रकाश के बड़े-बड़े चमकते अक्षरों में लिखा हुआ यह भयानक शब्द देखोगे, “मजदूरी, मजदूरी, मजदूरी!”’

    “जब प्रचारक ने यह वाक्य कहा, तो वे अपनी पूरी ऊँचाई तक तनकर खड़े हो गए, लम्बे और प्रतापी—मानो जड़वत् खड़े रह गए, उस जगमगाते अक्षरों से अंकित बादल की ओर टकटकी लगाए और उँगली से संकेत करते हुए, मानो वह उनके सामने लुढ़कता हुआ ऊपर उठ रहा हो; उनकी स्पष्ट, तीखी आवाज़ अपने ऊँचे से ऊँचे स्वर तक उठी, और उस विशाल सभा के कोने-कोने में पैठ गई। लोगों ने अपनी साँस रोक ली। हर हृदय मानो थम गया। यह लगभग मुर्दों को भी जिला उठाने के लिए पर्याप्त था।

    “और फिर भी वही सामर्थी पुरुष, जब मसीह के प्रेम या अपने पापों में पड़े प्राण के संकट के विषय में बोलते थे, तो कोमलता और करुणा में उतने ही महान होते थे जितने पहले प्रताप और सत्य में—स्वयं आँसुओं तक द्रवित होकर ऐसी विनतियाँ करते थे जो पत्थर के हृदय को भी तोड़ दें। बहुत-से लोग उन्हें केवल धार्मिकता के एक कठोर, कोई समझौता न करनेवाले प्रचारक के रूप में ही सोचते प्रतीत होते हैं। वे यह थे, और इससे बढ़कर भी—सिद्धान्त में एक पौलुस, परन्तु ईश्वरीय प्रेम के अपने चित्रणों में स्वयं यूहन्ना के समान मर्मस्पर्शी और कोमल। परन्तु उन्होंने प्रेम का प्रचार किसी मात्र सहज वृत्ति के रूप में, या किसी दुर्बल, भावुकता से भरी और विवेकहीन भावना के रूप में नहीं किया। उनका परमेश्वर केवल करुणा ही नहीं था, वरन् प्रताप का, व्यवस्था का और न्याय का परमेश्वर भी था। उसका प्रेम इस कारण और भी अधिक महिमामय है कि वह विवेकपूर्ण है, और इस कारण कि वह उस कोप से बचाता है जिसके मनुष्य योग्य हैं।” (संस्मरण, पृ. 12, 13।)

    विलक्षणताएँ

    “जो लोग इस भले पुरुष से सबसे अधिक प्रेम करते और उनकी सबसे अधिक सराहना करते थे, उनसे बढ़कर कोई नहीं जानता कि उनमें अपनी विलक्षणताएँ थीं। किस महान पुरुष में नहीं होतीं? परन्तु उन पर कभी ओछेपन या कपट का दोष नहीं लगाया गया। वे एक सीधे-सादे, स्पष्टवादी पुरुष थे, जो बिना लाग-लपेट के सीधी बात कहते थे, और सदा ठीक वही अभिप्राय रखते थे जो कहते थे। उनका प्राण छल और कपट से घृणा करता था। कदाचित् यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि उन्होंने सत्य को अधिकांश लोगों से कहीं अधिक स्पष्टता से देखा, और उसके मूल्य और महत्व को उनसे कहीं अधिक पूर्णता से समझा। वे वास्तव में बुद्धि में, अपने विचारों और उद्देश्यों की भव्यता में, और अपने चरित्र की उदात्त शक्ति में एक दिग्गज थे, और यह उनकी कुछ विलक्षणताओं को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त था। कहा जाता है कि अपने मन-परिवर्तन से पहले उन्होंने एडम्स की कलीसिया के एक प्राचीन से कहा था कि मसीही लोग सामान्यतः जिस बात का अंगीकार करते हैं उस पर आधा भी विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा, ‘यदि मैं कभी मसीही बना, तो अपनी पूरी शक्ति से उसमें लगूँगा।’ और उन्होंने ऐसा ही किया।” (पृष्ठ 19।)

    सिनसिनाटी के रेवरेंड आर. एल. स्टैंटन, डी. डी.: “उस जाड़े में जब मैंने फ़िन्नी का प्रचार सुना, तो मैं उनसे भय खाता था। मैंने उस समय के बहुत-से महान प्रचारकों को सुना है, और मैं उन्हें अपने सुने हुए सबसे महान प्रचारक मानता हूँ। मैं कहूँगा कि मिस्टर फ़िन्नी एक कठोर प्रचारक थे। उन्होंने व्यवस्था को ऐसा ऊँचा उठाकर प्रस्तुत किया जैसा मैंने न उससे पहले कभी सुना था न उसके बाद। वे पाप का ऐसा चित्रण करते थे कि लोग सचमुच अपने आसनों पर काँपने लगते थे। दूसरी ओर, मसीह के प्रेम का ऐसा प्रदर्शन भी मैंने कभी नहीं सुना। मुझे स्मरण है कि मैंने उन्हें ‘पाप की मजदूरी तो मृत्यु है’ पर प्रचार करते सुना। मैंने घड़ी देखी, और उन्होंने दो घंटे प्रचार किया। परमेश्वर के भयानक कोप का ऐसा चित्रण मैंने कभी नहीं सुना। मेरे विचार में मिस्टर फ़िन्नी ने प्रचार की एक नई शैली आरम्भ की। उनके उपदेश का पहला तीन-चौथाई भाग बातचीत की शैली में होता था; और अन्तिम भाग में वे ऐसी अपीलें करते थे जैसी मैंने कहीं और कभी नहीं सुनीं।” (संस्मरण, पृ. 26-27।)

    न्यूयॉर्क सिटी के माननीय विलियम ई. डॉज: “वे सबसे असाधारण प्रचारक थे जिन्हें मैंने कभी सुना। वे अपने श्रोताओं को डेढ़ या दो घंटे तक बाँधे रखते थे, और किसी को भी ऐसा नहीं लगता था कि समय बोझिल होकर कट रहा है।”

    प्रोफ़ेसर जॉन मॉर्गन, डी. डी.: “मैं समझता हूँ कि जो लोग मिस्टर फ़िन्नी से सबसे घनिष्ठ रूप से परिचित थे, वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि वे ऐसे मनुष्य थे जिनमें अन्तर्ज्ञान और तर्क की शक्तियाँ असाधारण मात्रा में एक साथ मिली हुई थीं। उनमें अद्भुत अन्तर्ज्ञान-शक्ति थी, और जब वे अन्तर्ज्ञान के द्वारा अपनी साहसी आधार-मान्यताओं तक पहुँच जाते थे, चाहे वे तर्कबुद्धि और परमेश्वर के कार्यों से ली गई हों, या परमेश्वर के वचन से, तो वे उनसे अद्भुत सामर्थ्य के साथ तर्क करते थे। इसलिए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यद्यपि मिस्टर फ़िन्नी विद्वान पुरुष नहीं थे, तौभी वे ऐसे अध्येता, ऐसे विचारक रहे थे, और उन्होंने इतना गहन मनन किया था कि वे सचमुच उन सबसे गहरे धर्मविज्ञानियों में से एक थे जिनके विषय में मुझे कुछ भी जानकारी थी; और मुझे विवश होकर उनकी तुलना अध्यक्ष एडवर्ड्स से करनी पड़ी है, और उन्हें कम से कम उनके बराबर मानना पड़ा है; और अध्यक्ष एडवर्ड्स सर्वमान्य रूप से उन सर्वश्रेष्ठ धर्मविज्ञानियों में से एक हैं जिन्हें हमारे देश ने कभी उत्पन्न किया है। मेरे विचार में पचास वर्षों में, यदि अभी नहीं, तो मिस्टर फ़िन्नी का उनके बराबर होना स्वीकार कर लिया जाएगा।

    “परन्तु मैं समझता हूँ कि हम सबने अनुभव किया कि उनकी आत्मिक सामर्थ्य ही वह बात थी जिसमें वे सबसे बढ़कर थे। प्राणों पर उनका जो प्रभाव पड़ता था वह कभी-कभी बहुत प्रबल होता था। मुझे ऐसे अवसर याद हैं जब उन्हें लगता था कि ओबर्लिन में धर्म घट रहा है; क्योंकि उनका मानदंड इतना ऊँचा था कि उन्हें तनिक भी सन्तुष्ट करने के लिए वे चाहते थे कि बातें बहुत ऊँचे स्तर पर हों। मुझे याद है कि वे किस प्रकार आकर हमारे साथ इस विषय पर विचार-विमर्श किया करते थे, और जब उनकी प्रबल आँख मुझ पर टिक जाती थी तो मैं काँप उठता था। मेरा विश्वास है कि पूरी-पूरी मंडलियों पर भी उनका लगभग इसी प्रकार का प्रभाव पड़ता था; परन्तु मैंने इसे विशेष रूप से तब अनुभव किया जब उन्होंने मुझे व्यक्तिगत रूप से सम्बोधित किया। . . . प्रार्थना में उनमें ऐसी असाधारण सामर्थ्य थी जैसी मैंने किसी भी मनुष्य में कभी नहीं देखी।” (संस्मरण, पृ. 57, 58।)

    येल के प्रोफ़ेसर बारबर। मुझे स्मरण है कि मैंने रेवरेंड डॉ. बारबर को एक लम्बे, आलोचनात्मक व्याख्यान में यह घोषणा करते सुना कि अध्यक्ष फ़िन्नी पहले महान विचारक थे जिन्होंने इच्छा की स्वतन्त्रता के सिद्धान्त का उसके सब पहलुओं सहित पर्याप्त और पूर्ण रूप से समर्थन किया। उन्होंने उनका नाम संसार के तत्त्वमीमांसक विचारकों में सबसे अग्रणी लोगों के बीच लिया।

    प्रोफ़ेसर जॉर्ज एफ. राइट, धर्मविज्ञानी के रूप में फ़िन्नी की चर्चा करते हुए, उनके और ऑगस्टीन के बीच एक उल्लेखनीय तुलना करते हैं, और उनकी विचार-प्रणाली का वर्णन इस प्रकार करते हैं: “मुझसे यह अपेक्षा की जाती है कि मैं अध्यक्ष फ़िन्नी की चर्चा एक ऐसे ऑगस्टीन की भूमिका में करूँ जो एक धर्मवैज्ञानिक प्रणाली का विस्तार से निर्माण करता है, और उसके द्वारा आगे बढ़कर भविष्य की पीढ़ियों को सीधे अपनी पकड़ में ले लेता है। निस्सन्देह बहुत-से ऐसे गुणों के होते हुए भी जिनमें परस्पर विरोध है, इन दोनों व्यक्तित्वों [ऑगस्टीन और फ़िन्नी] में निश्चय ही समानता की अनेक उल्लेखनीय बातें हैं। धर्म के प्रति उनकी आरम्भिक उपेक्षा, उनके मन-परिवर्तन का स्पष्ट और प्रबल स्वरूप, और उसके साथ आई भावनाओं की उमड़ती बाढ़, उनके मनों का दार्शनिक झुकाव, और, जो इस प्रसंग में और भी अधिक उपयुक्त है, वह मानसिक पूँजी जिसके साथ उन्होंने मसीही विचार-प्रणाली की अपनी व्याख्याएँ आरम्भ कीं और आगे बढ़ाईं—ये सब इन असाधारण पुरुषों में एक उल्लेखनीय समानता उत्पन्न करते हैं। ऑगस्टीन इब्रानी बिलकुल नहीं जानते थे, और यूनानी बहुत थोड़ी। फिर भी, न्याय करने के लिए सबसे योग्य लोगों की सम्मति में, किसी भी अकेले अप्रेरित नाम ने मसीही कलीसिया पर कभी ऐसी सामर्थ्य का प्रयोग नहीं किया, और किसी भी एक मस्तिष्क ने मानव विचार पर कभी ऐसी छाप नहीं छोड़ी।”

    अध्यक्ष फ़िन्नी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि यद्यपि उन्होंने कुछ हद तक इब्रानी और यूनानी का अध्ययन किया था, तौभी वे अपने को पवित्रशास्त्र की मूल भाषाओं में उसकी कोई स्वतन्त्र समालोचना करने का साहस करने योग्य नहीं समझते थे। हमारा अंग्रेज़ी अनुवाद उनके लिए वही था जो ऑगस्टीन के लिए वल्गेट था।

    अध्यक्ष फ़िन्नी की धर्मविज्ञान-प्रणाली को एक रचना की अपेक्षा एक विकास कहा जा सकता है। उन्होंने आरम्भिक जीवन में ईश्वरविद्या का एक सुसंगत ग्रन्थ लिखने का काम अपने हाथ में नहीं लिया। उसमें ऐसी कृति की निरर्थक साधारणता नहीं है। परन्तु उनकी प्रणाली एक गहन धार्मिक और व्यापक व्यावहारिक अनुभव का फल है, जिसके साथ दार्शनिक चिन्तन और तार्किक विवेचन की असाधारण योग्यता जुड़ी हुई थी। उन्होंने पवित्रशास्त्र की व्याख्या उस मात्र भाषाविद् की भ्रामक और तुच्छ बना देनेवाली पद्धति के अनुसार नहीं की, जो व्याकरण और शब्दकोश की बारीकियों में ऐसा दबा रहता है कि वह सामान्य शिक्षा की उस व्यापक धारा को कभी नहीं देख पाता जो इन सबके नीचे बहती है और इन सबको अपने में समेटे हुए है।

    उनकी दृष्टि में बाइबल साधारण लोगों के लिए एक धार्मिक प्रकाशन है, जो अनुवाद में अपनी स्पष्टता किसी बड़ी मात्रा में नहीं खोता। उसका मुख्य प्रकाशन इतना स्पष्ट है कि उस मार्ग पर चलनेवाला, चाहे मूर्ख भी हो, तौभी उसमें न भटकेगा। वह पवित्रता के राजमार्ग का एक व्यावहारिक प्रकाशन है, जो सामान्य बुद्धि का विकल्प नहीं, वरन् उसका पूरक है।

    विवादित विषयों के सम्बन्ध में फ़िन्नी की प्रणाली की विशेषताएँ संक्षेप में ये हैं: 1. मनुष्य की इच्छा अपने कार्य में स्व-निर्धारक है। 2. दायित्व योग्यता से सीमित है। 3. सारा सद्गुणी चुनाव प्राणियों की भलाई पर, और अन्तिम विश्लेषण में, सामान्य रूप से समस्त अस्तित्व की भलाई पर जाकर समाप्त होता है। 4. इच्छा अपने कार्य में कभी विभाजित नहीं होती, वरन् प्रत्येक क्षण उसमें जो भी वेग होता है, उसके साथ वह या तो पूर्णतः सद्गुणी होती है या पूर्णतः पापमय। 5. सम्पूर्ण भ्रष्टता के विषय में, वे इसे बाइबल की एक शिक्षा के रूप में स्वीकार करते हैं कि पतन के बाद से और नये जन्म से पहले मनुष्यों के सब कार्य पापमय हैं। 6. नये जन्म और मन-परिवर्तन को पर्यायवाची शब्द माना गया है, जो पवित्र आत्मा और मनुष्य की इच्छा दोनों के एक समकालिक कार्य का वर्णन करते हैं। वे तथ्यों को स्वीकार करके रहस्य को वैसा ही छोड़ देने में सन्तुष्ट हैं; तौभी इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य की तर्कबुद्धि का सदा इतना आदर किया जाता है कि हर दशा में सत्य ही वह साधन है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा मन-परिवर्तन को सिद्ध करता है। 7. नये जन्म के द्वारा मनुष्य जिस दशा में लाए जाते हैं, वह या तो निरन्तर पवित्रता की दशा है, जो परिमाण में बढ़ती जाती है, या ऐसी अवस्थाओं की दशा जो सम्पूर्ण पवित्रता से सम्पूर्ण पापमयता तक बारी-बारी से बदलती रहती हैं; अन्त में पहली अवस्था प्रबल हो जाती है, और साधारण कैल्विनवादी स्थिर बने रहने की शिक्षा के अनुसार अनन्त उद्धार में समाप्त होती है। पवित्र लोगों के अन्त तक स्थिर बने रहने को एक प्रकट किए गए सत्य के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसका तर्कबुद्धि खण्डन नहीं कर सकती, और जिसके रहस्य प्रभु पर छोड़ दिए गए हैं। 8. इसी प्रकार चुनाव की शिक्षा को इस रूप में माना गया है कि परमेश्वर की बुद्धि में वही हमारा एकमात्र आश्वासन है कि किसी का भी उद्धार निश्चित रूप से होगा। उद्धार की एक योजना है जिसके साधन और लक्ष्य अनादि काल से चुने गए थे, और जो अब हमारे सामने प्रकट हो रही है। 9. उद्धार की इस योजना में मसीह केन्द्रीय व्यक्ति है; एक ऐसा अस्तित्व जो परमेश्वर और मनुष्य दोनों है, और जिसकी दीनता और दुःख उन लोगों के दण्ड के बदले एक शासकीय प्रतिस्थापन हैं जो उसके नाम पर विश्वास के द्वारा पवित्र किए जाते हैं। प्रायश्चित सामान्य न्याय की माँगों को पूरा करता है, और उसके द्वारा किए गए प्रबन्ध सब मनुष्यों के सामने सेंत-मेंत रखे जाते हैं। (संस्मरण, पृ. 68-71।)

    प्रोफ़ेसर राइट ने फ़िन्नी के धर्मविज्ञान के इस सावधानीपूर्ण विवरण में पवित्रीकरण का उल्लेख मुश्किल से ही किया है। परन्तु फ़िन्नी ने अनुपात में किसी भी अन्य धर्मविज्ञानी की अपेक्षा पवित्रीकरण की चर्चा को अधिक स्थान दिया, अपने सम्पूर्ण धर्मविज्ञान के आठवें भाग से भी अधिक। उनका मत था कि पवित्र किया जाना परमेश्वर के लोगों का विशेषाधिकार है; कि वे पवित्र होने के लिए बाध्य हैं, और परमेश्वर इसी जीवन में उनसे इसकी अपेक्षा करता है। तौभी इसकी चर्चा, और यह कि फ़िन्नी किस बात में पवित्रीकरण की शिक्षा देने में चूक गए, हम अगले और अन्तिम अध्याय के लिए रख छोड़ेंगे।

    हम प्रोफ़ेसर राइट से एक और उद्धरण देंगे: “यह एक पुरानी कहावत है कि कैल्विनवादी आर्मीनियनवाद का प्रचार करते हैं, और आर्मीनियन लोग कैल्विनवाद की प्रार्थना करते हैं, और इस प्रकार, किसी न किसी रीति से, दोनों का सम्पूर्ण सत्य दोनों में से किसी भी प्रकार की मंडलियों द्वारा सुरक्षित रहता है। [यह सच नहीं है।]

    “हमारा विश्वास है कि अध्यक्ष फ़िन्नी, उन सब लेखकों में से जिनके लेखों से हम परिचित हैं, किसी भी अन्य लेखक की अपेक्षा धर्मविज्ञान की एक ऐसी प्रणाली विकसित करने में अधिक सफल हुए हैं जो इन प्रतिद्वन्द्वी दलों के सत्य को मिलाती और उनमें सामंजस्य स्थापित करती है। उन्होंने यह कुछ हद तक एक नकारात्मक रीति से किया है, अर्थात् आवश्यकता से अधिक दार्शनिक अटकलें न लगाकर। ऐसा करने का आरोप तो तथाकथित ओल्ड स्कूल धर्मविज्ञानियों पर लगता है, जो इस प्रणाली पर ‘एक आरोपित दोष जो दोष नहीं है’ के अपने अटल सिद्धान्तों का, और दायित्व की एक ऐसी धारणा का बोझ डालते हैं जो योग्यता से अलग कर दी गई है। वे ही हैं जो नये जन्म के दर्शनशास्त्र में उतरते हैं, और उसके विषय में एक सार्वभौमिक नकारात्मक बात सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, यह दावा करते हुए कि यह आत्मा का एक ऐसा कार्य है जो नैतिक और समझाने-बुझानेवाला नहीं है। वे यह सिद्ध करने का बीड़ा उठाते हैं कि नये जन्म में आत्मा ‘उन आन्तरिक प्रवृत्तियों, सिद्धान्तों, रुचियों या आदतों में, जो सब सचेत क्रियाओं के मूल में रहती हैं,’ परिवर्तन उत्पन्न करता है।

    “अध्यक्ष फ़िन्नी का उदाहरण इस बात में अमूल्य है कि वे पाप के लिए कोई बहाना नहीं छोड़ते; कि वे सब पर वर्तमान उत्तरदायित्व को दृढ़ता से लागू करते हैं; कि वे मसीह के प्रायश्चित को ऊँचा उठाते हैं, और पवित्र आत्मा की महिमा करते हैं।”

    मेरा विश्वास है कि अध्यक्ष फ़ेयरचाइल्ड ओबर्लिन की पहली स्नातक होनेवाली कक्षा के एक स्नातक थे। वे ओबर्लिन के सबसे आरम्भिक विद्यार्थियों में से एक थे, और उन्होंने अपना जीवन उस कॉलेज में विद्यार्थी, ट्यूटर, प्रोफ़ेसर, या कॉलेज के अध्यक्ष-पद पर फ़िन्नी के उत्तराधिकारी के रूप में बिताया। वे उस महान पुरुष को उतना ही जानते थे जितना एक प्राण दूसरे को जान सकता है जब दोनों एक दूसरे से बहुत भिन्न हों। वे धर्मविज्ञान में फ़िन्नी के स्वतन्त्र रुख़ को इस प्रकार समझाते हैं:

    “मिस्टर फ़िन्नी संसार में से लिए गए थे, कलीसिया में से नहीं। उनका पालन-पोषण धार्मिक संस्थाओं या कलीसियाई प्रभावों के साथ बहुत ही थोड़े सम्पर्क में हुआ था। यद्यपि उनका स्वभाव धार्मिक सत्य से गहराई से प्रभावित होनेवाला था, और वे मानो किसी सम्मोहन से उसके मनन की ओर खिंचते थे, तौभी वे कलीसिया से अलग रहकर उसके सिद्धान्तों और उसके जीवन के एक आलोचक की स्थिति में खड़े रहे थे। धार्मिक लोगों के साथ उनका ऐसा कोई सम्पर्क नहीं था जो उन्हें सलाह के लिए उनकी ओर देखने, या अपने काम को निर्धारित करने में उनका मार्गदर्शन खोजने को प्रेरित करता। उनके चरित्र की स्वाभाविक स्वतन्त्रता भी निस्सन्देह उसी दिशा में ले गई। क़ानून के अपने अध्ययन में उन्होंने जो प्रशिक्षण पाया था, उसने भी उसी परिणाम में सहयोग दिया। प्रश्नोत्तरी की शिक्षा से, या खरी बातों के उन आदर्शों से जिनके द्वारा कलीसिया अपनी सन्तानों को सिद्धान्तों की शिक्षा देती है, और जो सामान्यतः निस्सन्देह अपने प्रभाव में हितकर होते हैं, जुड़ा कोई भी संस्कार उन्हें बाँधे हुए नहीं था।

    “वे बाइबल और सुसमाचार के सिद्धान्तों के अध्ययन में निर्णय की उसी स्वतन्त्रता और तर्कसंगत सहज बोध के साथ आए जिसके साथ उन्होंने क़ानून के सिद्धान्तों को समझा और अपनाया था, और उनमें भी वैसी ही स्वयंसिद्ध सत्यता खोजी। इस प्रकार वे तुरन्त ओल्ड स्कूल के इन मतों से मुड़ गए: स्वभाव में पाप, योग्यता से बढ़कर दायित्व, पापी के दोष और दण्ड का मसीह पर शाब्दिक स्थानान्तरण, और स्वभाव के परिवर्तन द्वारा नया जन्म। जहाँ तक वे जानते थे, उस समय कलीसिया में यही सिद्धान्त प्रचलित थे। उनके विश्वास के अनुसार उन्होंने इन्हें वेस्टमिंस्टर विश्वास-अंगीकार में पाया; और इन्हें त्यागते हुए उन्होंने स्वाभाविक रूप से अनुभव किया कि वे कलीसिया की परम्पराओं से हट रहे हैं, और एक ऐसी स्थिति अपना रहे हैं जो कुछ हद तक सामान्यतः पादरियों द्वारा मानी गई स्थिति के विरोध में है। दूसरी ओर, इन दिशाओं में उनके प्रचार के खुले साहस के कारण बहुतों के मन में इस विषय में आशंकाएँ और सन्देह उत्पन्न हुए कि वे विश्वास में पक्के हैं या नहीं; और इस प्रकार सब प्रभावों ने मिलकर उन्हें परिश्रम की इस कुछ-कुछ स्वतन्त्र दिशा में दृढ़ किया।

    “यह दृढ़ निश्चय, जो उनके मन-परिवर्तन के साथ आरम्भ हुआ और अन्त तक उनके साथ बना रहा, कि उन्हें मानवीय नहीं वरन् ईश्वरीय मार्गदर्शन की ओर देखना चाहिए, स्वाभाविक रूप से उन्हें अपने लिए स्वयं एक मार्ग निकालने की ओर प्रवृत्त करता था; और इस प्रकार, सम्भवतः आरम्भ में अनजाने में ही, उन्होंने कलीसिया में एक सुधारक का जीवन-मार्ग अपनाया। जिस कार्य के लिए वे अपने को नियुक्त समझते थे, वह मनुष्यों का उद्धार करना था; और उन्होंने सिद्धान्त के पुराने रूपों को इसलिए अस्वीकार किया क्योंकि वे उनके काम में सहायक नहीं वरन् बाधक थे। उन्हें ऐसे सिद्धान्तों की आवश्यकता थी जिनका वे प्रचार कर सकें, और जो मनुष्यों के विवेक को झकझोर दें। परमेश्वर के अधीन होने में उन्होंने जान-बूझकर सत्य के आगे समर्पण किया था, और वे सत्य पर उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य के रूप में निर्भर रहने लगे। इस प्रकार वे उद्धार के प्रचारक के रूप में अपने उपयोग के लिए अनुग्रह के महान सिद्धान्तों को फिर से व्यवस्थित करने और नये शब्दों में व्यक्त करने की ओर अग्रसर हुए। दार्शनिक विचार के क्षेत्र में वे स्वभाव से ही एक पैने विश्लेषक थे, और कम ही लोगों में ऐसे अध्ययनों के प्रति, उनके अपने आन्तरिक गुणों के कारण, उनसे अधिक तीव्र रुचि रही है; परन्तु उन्होंने अपनी खोज एक दार्शनिक के रूप में नहीं, वरन् मसीह के एक सेवक के रूप में आगे बढ़ाई, जिसे सुसमाचार का भण्डारीपन सौंपा गया था। अपने घुटनों पर, अपनी खुली बाइबल के सामने, एक भले प्राचीन की प्रार्थनाओं और सहानुभूति से सम्भाले हुए, उन्होंने अपनी धर्मविज्ञान-प्रणाली का निर्माण किया—इसलिए नहीं कि वे धर्मविज्ञान में सुधारक बन जाएँ, वरन् इसलिए कि वे ‘ऐसा काम करनेवाला जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो’ बनने के योग्य हो जाएँ।

    “उसी समय कलीसियाओं में दूसरे लोग भी पुराने कैल्विनवाद में इसी प्रकार के संशोधनों के लिए काम कर रहे थे—न्यू इंग्लैंड में टेलर और बीचर जैसे लोग, और न्यूयॉर्क में बीमन और एकन तथा अन्य लोग। परन्तु इन लोगों के साथ फ़िन्नी का कोई सम्पर्क नहीं था। उन्हें ‘मांस और लहू’ से सलाह लेने का कोई अवसर नहीं मिला, वरन् उन्होंने अपना सुसमाचार परमेश्वर के वचन के रूप में पाया, जो आत्मा के प्रकाश के द्वारा उनके मन तक पहुँचाया गया था। इस प्रकार वे इस पूरे निश्चय के साथ एक प्रचारक के रूप में अपने काम के लिए निकले कि उनके पास परमेश्वर की ओर से मनुष्य के लिए एक सन्देश है; और यह निश्चय उनके सार्वजनिक जीवन और परिश्रम के पचास वर्षों तक उन पर प्रबल रहा।” (संस्मरण, पृ. 78-80।)

    इस अध्याय को समाप्त करते हुए, यह उचित है कि हम धर्मविज्ञानी के रूप में फ़िन्नी का स्थान निर्धारित करने का प्रयत्न करें। बहुत-से लोग उनके विषय में ऐसे बात करते हैं मानो वे कैल्विनवादी थे। वास्तव में, “न्यू स्कूल कैल्विनवादी” वाक्यांश एक अस्पष्ट, अनिश्चित शब्द है, जिसकी विस्तृत तहों के नीचे बहुत-से धर्मविज्ञानी, जो अपने कलीसियाई सम्बन्धों से पूरी तरह नाता तोड़ने को तैयार नहीं हैं, कैल्विनवाद की भयावहताओं से छिप रहे हैं। फ़िन्नी कैल्विनवादी नहीं थे। हम कई तर्कों से इस निर्णय पर पहुँच सकते हैं:

    1. उन्होंने वेस्टमिंस्टर विश्वास-अंगीकार को पूर्णतः अस्वीकार किया, और घोषणा की कि वे उससे, और उसके समर्थन में दिए गए पवित्रशास्त्र के तर्कों से, लज्जित हैं। जीवन भर उन्होंने अपने तीखे व्यंग्य से उसका उपहास किया, और अपने निर्मम तर्क से उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। परन्तु वेस्टमिंस्टर विश्वास-अंगीकार कैल्विनवाद का मूर्त रूप और सार-तत्त्व है; जो कोई पहले को अस्वीकार करता है वह दूसरे का शिष्य नहीं है।

    2. उनके मरने के दिन तक पक्के कैल्विनवादी फ़िन्नी से डरते रहे और उनसे लड़ते रहे। डॉ. चार्ल्स हॉज ने निर्ममता से अपनी सारी तोपें उनके विरुद्ध मोड़ दीं; और हॉज कैल्विनवाद की साक्षात् मूर्ति थे, और उसकी सारी भयावहताओं और ईशनिन्दाओं पर गर्व करते थे।

    3. कैल्विनवाद के पाँच सूत्र ये हैं: (1) बिना शर्त चुनाव; (2) केवल चुने हुओं के लिए पूर्ण छुटकारा, अर्थात् सीमित प्रायश्चित; (3) पतित मनुष्य विश्वास और पश्चाताप करने में असमर्थ है, अर्थात् सम्पूर्ण नैतिक असमर्थता; (4) परमेश्वर का अनुग्रह चुने हुओं के उद्धार के लिए अप्रतिरोध्य रूप से प्रभावी है, और कोई दूसरा उद्धार नहीं पा सकता; (5) जिस प्राण का एक बार मन-परिवर्तन या नया जन्म हो गया, वह कभी नाश नहीं होता, अर्थात् पवित्र लोगों का अन्त तक स्थिर बने रहना।

    अब, इनमें से पहले चार को, और उनसे निकाले गए सब भयानक उपसिद्धान्तों और निष्कर्षों को, फ़िन्नी ने हर प्रकार की अभिव्यक्ति और तर्क में हज़ार बार पूरी तरह ठुकराया। नैतिक असमर्थता के सिद्धान्त के विषय में उन्होंने एक बार एक उपदेश में कहा: “यह हर मसीही देश में बार-बार गूँजता है, और युग-युग से आगे सौंपा जाता है, कि कभी भुलाया न जाए। निर्लज्ज मुख से यह घोषणा की जाती है कि मनुष्य वह नहीं कर सकते जो परमेश्वर उनसे माँगता है। विश्वास-अंगीकार के इस कथन को झूठा कलंक कहना तो केवल संयत भाषा है। यदि नरक में या नरक के बाहर कोई झूठ है, तो यह झूठ है, नहीं तो परमेश्वर एक असीम अत्याचारी है। यदि तर्कबुद्धि को बोलने ही दिया जाए, तो उसके लिए इससे कम या इससे भिन्न कुछ कहना असम्भव है।”

    एक और स्थान पर वे कैल्विनवाद के एक सुप्रसिद्ध सिद्धान्त का नाम लेकर घोषणा करते हैं, “इससे अधिक निराधार या इससे अधिक घिनौनी कोई निन्दा नहीं हो सकती।” एक और समय उन्होंने उन लज्जाजनक कथनों में से एक के विरुद्ध, जो इस संसार की भयानक दुष्टता के लिए परमेश्वर को उत्तरदायी ठहराते हैं, पुकारकर कहा, “यह परमेश्वर के विरुद्ध उतनी ही घृणित निन्दा है जितनी कभी नरक से उगली गई हो!”

    एक और समय, एक मनुष्य ने, जिसे कैल्विनवाद ने अविश्वासी बना दिया था, फ़िन्नी के सामने यह उद्धृत किया, “क्या यह सच नहीं कि पतन के बाद से कोई भी मात्र मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं का पूर्ण रूप से पालन करने में समर्थ नहीं हुआ, वरन् विचार, वचन और कर्म में प्रतिदिन उन्हें तोड़ता है?” फ़िन्नी ने उत्तर दिया:

    “आह, मेरे मित्र, यह प्रश्नोत्तरी है, बाइबल नहीं। हमें सावधान रहना चाहिए कि जो कुछ मानवीय प्रश्नोत्तरियों ने कहा है, वह सब बाइबल के मत्थे न मढ़ दें। बाइबल आपसे केवल इतना माँगती है कि आपके पास जो बल और शक्तियाँ वास्तव में हैं, उन्हें आप परमेश्वर को समर्पित करें, और वह इस दावे के लिए किसी प्रकार उत्तरदायी नहीं कि परमेश्वर मनुष्य से उससे अधिक माँगता है जितना वह कर सकता है। नहीं, सचमुच, बाइबल कहीं भी परमेश्वर पर ऐसी अनुचित और क्रूर माँग का दोष नहीं लगाती। कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य का मन परमेश्वर की व्यवस्था के ऐसे दृष्टिकोण के विरुद्ध विद्रोह करे। यदि कोई मानवीय क़ानून असम्भव बातें माँगता, तो उस पर पड़नेवाली निन्दाओं का कोई अन्त न होता। कोई भी मानवीय मन ऐसे क़ानून का समर्थन कदापि नहीं कर सकता; और न यह माना जा सकता है कि परमेश्वर उचित रूप से ऐसे सिद्धान्तों पर कार्य कर सकता है जो किसी भी मानवीय शासन को कलंकित और नष्ट कर देंगे।”

    अब मैं यह निवेदन करता हूँ कि ऐसे मनुष्य को कैल्विनवादी कहना भाषा का दुरुपयोग है जिसने उन सब सिद्धान्तों को इतने रोष के साथ अस्वीकार किया जो कैल्विनवाद के हृदय, केन्द्र और मज्जा थे।

    4. मैं इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाता हूँ कि इंग्लैंड या अमेरिका में कहीं भी फ़िन्नी ने अपने भाइयों के ऐसे हार्दिक सहयोग के साथ, और उनके साथ ऐसे मेल में, प्रचार नहीं किया जैसा इंग्लैंड के बोल्टन में, जहाँ जॉन वेस्ली ने अपना सबसे सफल काम किया था, और जहाँ वेस्लीवाद का प्रभुत्व था।

    जोसेफ़ कुक ने एक बार बॉस्टन में कहा था कि मेथोडिस्टों के पास एक ऐसा धर्मविज्ञान है जिसका वे उसके लिए कोई सफ़ाई दिए बिना प्रचार कर सकते हैं। ठीक यही बात फ़िन्नी ने अपने घुटनों पर सीखी—एक ऐसा धर्मविज्ञान जो परमेश्वर का आदर करता था और मनुष्यों के सामने उसके मार्गों को न्यायसंगत ठहराता था। उन्होंने इसे पुस्तकों से नहीं, वरन् उस पुस्तक (बाइबल) से और पवित्र आत्मा के प्रकाश से सीखा। वे आर्मीनियस के समान ही मौलिक विचारक थे, और हम यह कहने में संकोच नहीं करते कि उनके धर्मविज्ञान में जो कुछ व्यावहारिक मूल्य का था, और आत्माओं को जीतने के उनके कार्य में सहायक था, वह मूलतः आर्मीनियन था। कैल्विनवादी होना तो दूर, वे ठीक ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्हें स्वयं जॉन कैल्विन खम्भे से बाँधकर जला देते, और वह भी सर्वेटस को जलाने से कहीं अधिक रुचि के साथ।

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