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इंग्लैंड आकर जागृतियों को बढ़ावा देने के लिए परिश्रम करने के बार-बार और आग्रहपूर्ण निमन्त्रण मिलने पर, वे 1849 की शरद ऋतु में अपनी दूसरी पत्नी (जो पहले रॉचेस्टर की श्रीमती एलिज़ाबेथ एफ़. एटकिन्सन थीं) के साथ जहाज़ पर रवाना हुए।
उन्होंने पहले हॉटन नामक गाँव में परिश्रम किया। श्री ब्राउन नाम के एक धनी और परोपकारी व्यापारी उस समाज की आत्मिक दरिद्रता से, और जनसाधारण का उद्धार करने में चर्च ऑफ़ इंग्लैंड की असमर्थता से, बहुत व्याकुल थे। उन्होंने आराधना का एक भवन बनवाया, और एक कैल्विनवादी प्रचारक को नियुक्त किया, परन्तु किसी का भी मन-परिवर्तन नहीं हुआ। उन्होंने बार-बार अपने प्रचारक से इसकी शिकायत की, जिसने अन्त में उत्तर दिया: “श्री ब्राउन, क्या मैं परमेश्वर हूँ कि प्राणों का मन-परिवर्तन कर सकूँ? मैं उन्हें सुसमाचार सुनाता हूँ, और परमेश्वर उनका मन-परिवर्तन नहीं करता; क्या इसमें मेरा दोष है?” श्री ब्राउन ने उत्तर दिया: “आप परमेश्वर हों या न हों, हमें मन-परिवर्तन चाहिए। लोगों का मन-परिवर्तन होना ही चाहिए।” इसलिए इस पादरी को विदा कर दिया गया। दूसरा पादरी लाया गया, और फ़िन्नी को बुलवाया गया। उन्होंने काम आरम्भ किया। श्री ब्राउन ने अपने घर के द्वार सबके लिए खुले रखे, और उन लोगों को भीतर बुलाते थे जो मीलों दूर-दूर से आते थे; वे उनकी मेज़ पर बैठते, बातचीत सुनते, फ़िन्नी का प्रचार सुनते, उनका मन-परिवर्तन हो जाता या वे जोश से भर उठते, और फिर जाकर आस-पास के गाँवों में जागृति की आग फैला देते थे। हर वह व्यक्ति, जिसके मन-परिवर्तन के लिए श्री ब्राउन पर विशेष बोझ था, भीतर लाया गया, और जनसाधारण तक पहुँचा गया और वे परमेश्वर की ओर फिराए गए।
बर्मिंघम
फ़िन्नी वहाँ से बर्मिंघम गए, जहाँ धन्य स्मृतिवाले रेवरेंड जॉन एंजेल जेम्स पास्टर थे। यद्यपि वे स्वयं उत्साही और सुसमाचारवादी थे, फिर भी उनकी अपनी ही मंडली में पन्द्रह सौ अपश्चातापी पापी थे। एक बैपटिस्ट पादरी, श्री रो, ने सबसे पहले श्री फ़िन्नी को अपनी कलीसिया में बुलाया। शीघ्र ही बहुत बड़ी संख्या में लोगों का मन-परिवर्तन हुआ, और जब वे कलीसिया में ग्रहण किए गए और प्रभुभोज हुआ, तो कलीसिया ने मत देकर अपने बंद प्रभुभोज (केवल अपने सदस्यों को प्रभुभोज देने) की रीति को एक ओर रख दिया, और श्री तथा श्रीमती फ़िन्नी को प्रभु की मेज़ पर अपने साथ बैठने का निमन्त्रण दिया।
“उस नगर में बहुत बड़ी संख्या में मन-परिवर्तन हुए; फिर भी पादरी उस समय इस बात के लिए तैयार न थे कि वे जागृति को पूरे नगर में सर्वत्र फैलाने के लिए आवश्यक साधनों के उपयोग में पूरे मन से अपने आप को लगा दें। एक यूनिटेरियन पादरी का मन-परिवर्तन हुआ और वह फिर से सही (रूढ़िवादी) विश्वास में लौट आया। उसने फ़िन्नी को ‘पवित्र आत्मा का विरोध करना’ विषय पर प्रचार करते सुना, और उन्हें लिखा: ‘मैंने आपके तर्कों की सच्चाई को अनुभव किया। आपकी अपीलें अनिवार्य रूप से मेरे हृदय तक पहुँचीं, और उस रात घर लौटते हुए मैंने परमेश्वर के सामने प्रण किया कि चाहे कुछ भी हो, मैं तुरन्त अपने आप को नये सिरे से उस उद्धारकर्ता को समर्पित करूँगा जिसके लहू का मूल्य मैंने अभी हाल ही में समझना सीखा था, और जिसके मूल्य का अनादर करने के लिए मैंने इतना कुछ किया था। जो मन की शान्ति मुझे अब प्राप्त है, वह सचमुच सारी समझ से परे है। परमेश्वर के अनुग्रह से, परमेश्वर मेरे परिश्रम को जिस किसी उपयोगिता का मुकुट पहनाए, उसका स्रोत मैं आप ही को मानूँगा।’”
वूस्टर
इसके बाद वे वूस्टर गए, और डॉ. रेडफ़र्ड के साथ परिश्रम किया, जिन्हें कुछ लोगों ने यूरोप का सबसे महान धर्मविज्ञानी घोषित किया था। उन्होंने फ़िन्नी की “धर्मविज्ञान” की समीक्षा की, और उसके अंग्रेज़ी संस्करण की प्रस्तावना लिखी। वूस्टर में काम इतना सफल हुआ कि कुछ धनी सज्जनों ने प्रस्ताव रखा कि आराधना का एक ऐसा चलायमान भवन खड़ा किया जाए जिसमें पाँच हज़ार लोग समा सकें, और उसे नगर-नगर ले जाया जाए ताकि फ़िन्नी उसमें सब सम्प्रदायों से स्वतंत्र रहकर, एक-एक नगर में कुछ-कुछ महीने सभाएँ करें। डरपोक पादरियों ने इसे बहुत ही नई बात बताकर इसके विरुद्ध सलाह दी। उन्होंने फ़िन्नी को यह प्रस्ताव अस्वीकार करने के लिए राज़ी कर लिया। निस्सन्देह यह उनके जीवन की भूल थी, और बाद में उन्हें इसका गहरा पछतावा हुआ।
लंदन
वहाँ से वे लंदन गए, और व्हाइटफ़ील्ड के टैबरनेकल में परिश्रम किया, जिसमें तीन हज़ार लोग समाते थे। लंदन में धर्म इतना गिर गया था कि सप्ताह के दिनों की सभाओं में बहुत ही कम लोग आते थे। वहाँ के पास्टर, डॉ. कैम्पबेल ने कहा कि फ़िन्नी ने सप्ताह के दिनों की संध्याओं में इतने लोगों को प्रचार किया, जितने लोगों को लंदन के बाकी सब पादरियों ने मिलकर भी नहीं किया।
फ़िन्नी ने कुछ समय तक प्रचार किया, और फिर पूछताछ-सभा के लिए एक कमरा माँगा। डॉ. कैम्पबेल का विचार था कि लोगों में इतनी रुचि नहीं है कि ऐसा कदम उठाना उचित हो; परन्तु फ़िन्नी अड़े रहे। अन्त में उन्होंने गिरजाघर में एक कमरे का नाम लिया जिसमें चालीस लोग समा सकते थे। फ़िन्नी ने कहा, “ओह, वह तो आधा भी बड़ा नहीं है!” पास्टर ने आश्चर्य और सन्देह प्रकट किया; परन्तु फ़िन्नी प्रभु के भेदों को भली-भाँति जानते थे, और उन्होंने कहा कि निस्सन्देह ऐसे लोग सैकड़ों हैं। अन्त में आस-पास के एक कमरे का नाम लिया गया जिसमें सोलह सौ लोग बैठ सकते थे। फ़िन्नी ने कहा, “ठीक ऐसा ही कमरा मुझे चाहिए।” डॉ. कैम्पबेल ने आपत्ति की कि ऐसी बात अमेरिका में सम्भव हो सकती है, परन्तु लंदन में नहीं। फ़िन्नी ने उत्तर दिया: “सुसमाचार अंग्रेज़ लोगों के लिए भी उतना ही उपयुक्त है जितना अमेरिकी लोगों के लिए। लोगों की दशा क्या है, यह मैं आपसे अधिक अच्छी तरह जानता हूँ; और मुझे इसका बिलकुल भी भय नहीं कि घमण्ड उन्हें ऐसे बुलावे का उत्तर देने से रोकेगा।” उन्होंने बुलावा दिया, और मसीहियों से कहा कि उस सभा में उनकी आवश्यकता नहीं है; और यह भी कि लापरवाह पापियों की आवश्यकता नहीं है; केवल वे ही चाहिए जो अपने प्राणों के विषय में चिन्तित हों, और जो तुरन्त परमेश्वर से मेल करने को तैयार हों, और अपने वर्तमान कर्तव्य के विषय में शिक्षा चाहते हों।
डॉ. कैम्पबेल ने घबराहट और चिन्ता के साथ खिड़की से बाहर झाँककर देखा कि मंडली किस ओर जाती है। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि काउपर स्ट्रीट पूरी तरह लोगों से भरी हुई है, जो उस कमरे में घुसने के लिए धक्का-मुक्की करते हुए आगे बढ़ रहे थे, और कमरा ठसाठस भर गया था। वे भीड़ को, और विशेष करके उसमें प्रकट होनेवाली भावना की गहराई को, देखकर चकित रह गए। फ़िन्नी ने उन्हें यह समझा दिया कि परमेश्वर उनसे यह चाहता है कि वे अपने आप को पूरी तरह उसकी इच्छा के अधीन कर दें, विद्रोह के अपने हथियार डाल दें, उसे अपना उचित प्रभुसत्ताधारी मानकर उसके अधीन हो जाएँ, और यीशु को अपना एकमात्र छुड़ानेवाला करके ग्रहण करें — उसी समय और उसी स्थान पर।
“मैं इंग्लैंड में इतने समय तक रह चुका था कि मुझे यह आवश्यकता अनुभव हो गई थी कि परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करने के उनके विचार को दूर किया जाए। लंदन अति-कैल्विनवादी प्रचार के शाप से ग्रस्त है, और लम्बे समय से रहा है। सुसमाचार के जाल को उनके चारों ओर भली-भाँति फैला देने के बाद, मैं उसे किनारे पर खींचने की तैयारी करने लगा।” जब वे उनसे यह कहने ही वाले थे कि वे घुटने टेकें और अपने आप को पूरी तरह और सदा के लिए मसीह को सौंप दें, तभी मंडली के बीच में से एक मनुष्य मन की अत्यन्त व्यथा में चिल्ला उठा कि उसने पाप करते-करते अपने अनुग्रह के दिन को गँवा दिया है। फ़िन्नी ने देखा कि कोलाहल मच जाने का खतरा है, और उन्होंने जैसे-तैसे उसे शान्त किया, और लोगों से घुटने टेकने को कहा, परन्तु इतना शान्त रहने को कहा कि जो प्रार्थना वे करने जा रहे थे उसका एक-एक शब्द वे सुन सकें। उन्होंने स्पष्ट प्रयत्न करके अपने आप को इतना शान्त रखा कि वे सुन सकें, यद्यपि भवन के हर भाग में बड़ी सिसकियाँ और रोना हो रहा था।
एक ही समय में पन्द्रह सौ लोग घुटनों पर परमेश्वर को खोज रहे थे! उसके बाद बहुत बार ऐसे बुलावों के उत्तर में कई सैकड़ों लोग परमेश्वर को खोजते, और कुछ अवसरों पर तो दो हज़ार तक। और यह सप्ताह-पर-सप्ताह नौ महीने तक चलता रहा। लोग लंदन के हर भाग से आते थे, सभा तक पहुँचने के लिए कई मील पैदल चलकर आते थे, जो पास्टर के लिए बिलकुल अजनबी थे, और मन-परिवर्तन इतने बढ़ते गए कि निस्सन्देह उनकी संख्या हज़ारों तक पहुँच गई।
डॉ. कैम्पबेल श्री फ़िन्नी को विद्यार्थियों को सम्बोधित करने के लिए एक विद्यालय में ले गए, और उनमें से बहुत-से बाद में उनकी कलीसिया में सम्मिलित हो गए, जो उसी सभा का परिणाम था, और जिसकी पास्टर को बिलकुल भी आशा न थी। फ़िन्नी कहते हैं, “सच्चाई यह है कि इंग्लैंड के पादरी, और इस देश के भी, बहुत हद तक इस आवश्यकता को भूल गए थे कि लोगों के विवेक पर उनके वर्तमान दायित्व को दृढ़ता से बैठाया जाए। पादरी पापियों के विषय में बातें करते हैं, और यह प्रभाव नहीं डालते कि परमेश्वर उन्हें अभी पश्चाताप करने की आज्ञा देता है; और इस प्रकार वे अपनी सेवकाई को निष्फल कर देते हैं।”
बहुत-से पादरी फ़िन्नी की सभाओं में आए, और उत्साह से भर उठे, और उनसे सीखा कि प्राणों को कैसे जीता जाता है। उनके नगर छोड़ने से पहले, एक एपिस्कोपल पादरी के पल्ली में पन्द्रह सौ आशाजनक मन-परिवर्तन हो चुके थे। जब वे लंदन से गए तब चार या पाँच एपिस्कोपल कलीसियाएँ मन-परिवर्तन के लिए प्रतिदिन सभाएँ कर रही थीं, और जब वे दस वर्ष बाद उस नगर में पहुँचे तब तक भी वे प्रयत्न कभी बन्द नहीं हुए थे।
श्रीमती फ़िन्नी को एक सभा को सम्बोधित करने का निमन्त्रण मिला, जहाँ उन्हें केवल महिलाओं के उपस्थित होने की आशा थी; परन्तु वहाँ कई सज्जन भी उपस्थित थे, और उस प्रयत्न के परिणाम इतने अच्छे निकले कि उनके लिए और भी सभाएँ ठहराई गईं; और इस प्रकार, बिना ऐसी किसी बात की आशा किए, वे इस काम में खिंच आईं।
फ़िन्नी ने पाप-स्वीकार और क्षतिपूर्ति पर बहुत प्रचार किया, और भीड़-की-भीड़ के विवेक इतने छिद गए कि हर प्रकार के अपराध स्वीकार किए गए और क्षतिपूर्ति करने के लिए हज़ारों पाउंड स्टर्लिंग चुकाए गए।
अप्रैल 1851 में ओबर्लिन कॉलेज की आवश्यकताओं ने फ़िन्नी को घर वापस बुला लिया, और वे बड़ी अनिच्छा के साथ इंग्लैंड से विदा हुए; नये विश्वासियों और मित्रों की एक बड़ी भीड़ उनके पीछे-पीछे जहाज़ तक आई, और जब वे रवाना हुए तो हाथ हिलाकर उन्हें विदाई दी।
हार्टफ़र्ड, कनेक्टिकट
1851-2 की आरम्भिक सर्दियों में श्री फ़िन्नी को हार्टफ़र्ड, कनेक्टिकट में आमन्त्रित किया गया। उस समय दो प्रमुख कॉन्ग्रिगेशनल पास्टरों, डॉ. हॉज़ और डॉ. बुशनेल, के बीच धर्मविज्ञान के प्रश्नों पर एकता का अभाव था। डॉ. हॉज़ का विचार था कि डॉ. बुशनेल प्रायश्चित के सिद्धान्त पर सही नहीं हैं। फ़िन्नी एक तीसरी कॉन्ग्रिगेशनल कलीसिया में परिश्रम कर रहे थे। ये दोनों भाई फ़िन्नी की सभाओं में आए, और उन्होंने देखा कि परमेश्वर प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है, और वे इस बात पर सहमत हुए कि अपने मतभेदों को एक ओर रख दें ताकि वे मनुष्यों के उद्धार के मार्ग में ठोकर का कारण न बनें। उस समय से उनमें अच्छी मात्रा में आत्मीयता रही, और काम पूरे नगर में फैल गया।
फ़िन्नी ने पाया कि उस नगर के लोग बहुत नखरेबाज़ (अति-नाज़ुक रुचिवाले) हैं, और पादरी, विशेष करके डॉ. हॉज़, पापियों से यह कहने से डरते थे कि वे आगे आएँ, और मनुष्य के भय से छूटकर, सबके सामने अपने आप को परमेश्वर को सौंप दें। परन्तु फ़िन्नी ने इन बन्धनों को तोड़ दिया, और लोगों को घुटने टेककर अपने आप को परमेश्वर को सौंपने का निमन्त्रण दिया। डॉ. हॉज़ काँप उठे, परन्तु बाद में उन्होंने फ़िन्नी के सामने यह स्वीकार किया: “मैंने सदा यह देखा है कि लोगों को निर्णय के बिन्दु पर लाने के लिए, और उन्हें अपने वर्तमान पाप-बोध के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करने के लिए, किसी बात की आवश्यकता है; परन्तु मुझमें ऐसा कुछ प्रस्तावित करने का साहस नहीं हुआ।”
सरकारी विद्यालय में एक बड़ी जागृति फूट पड़ी। एक सुबह लड़के इतने गहरे पाप-बोध में एकत्र हुए कि वे पढ़ न सके, और उन्होंने अपने शिक्षक से अपने लिए प्रार्थना करने को कहा, परन्तु वह मसीही नहीं था। इससे उसे पाप का बोध हुआ और उसका मन-परिवर्तन हो गया; और फिर वह अपने विद्यालय को मसीह के पास ले आया। नये विश्वासियों में से छः सौ तो केवल कॉन्ग्रिगेशनल कलीसियाओं में ही सम्मिलित हुए।
सिराक्यूज़, 1852-53
अगली सर्दियाँ सिराक्यूज़, न्यूयॉर्क में बीतीं। फ़िन्नी को प्रचार करते बहुत दिन न हुए थे कि “सूखी हड्डियों में बड़ी हलचल होने लगी।” कॉन्ग्रिगेशनल कलीसिया के प्रमुख सदस्य एक-दूसरे के सामने, और सार्वजनिक रूप से भी, परमेश्वर से अपने भटकने का, और उन दूसरी बातों का अंगीकार करने लगे जिनके कारण नगर में उनके विरुद्ध पूर्वाग्रह उत्पन्न हो गया था। शीघ्र ही वे लोगों को आकर्षित करने लगे, और उनके लिए जगह कम पड़ गई; प्रेस्बिटेरियन कलीसियाएँ खोल दी गईं, और “हर ओर मन-परिवर्तन बढ़ते गए।”
श्रीमती फ़िन्नी को महिलाओं की अलग सभाओं में उनके बीच परिश्रम करने में बड़ी सफलता मिली। कॉन्ग्रिगेशनल, प्रेस्बिटेरियन और बैपटिस्ट कलीसियाएँ सब आत्मिकता में और संख्या में बहुत दृढ़ हुईं। एक महिला गहरे मसीही अनुभव की आवश्यकता के गहरे बोध के साथ श्री फ़िन्नी के पास आई। उसने पवित्रीकरण के सिद्धान्त का प्रचार सुना था, और उसका प्रश्न यह था कि वह उसे कैसे प्राप्त कर सकती है। वे कहते हैं: “मैंने उससे कुछ क्षण बातचीत की, और उसका ध्यान विशेष रूप से इस आवश्यकता की ओर दिलाया कि वह अपने आप को और अपना सब कुछ पूरी तरह और सम्पूर्ण रूप से मसीह को समर्पित कर दे। मैंने उससे कहा कि जब वह ऐसा कर चुके, तब उसे पवित्र आत्मा की छाप के लिए विश्वास करना होगा।” “दोपहर के बाद वह लौटी, और पवित्र आत्मा से उतनी भरी हुई थी जितनी कोई हो सकती है।” वह महिला जल्दी से अपने कमरे में गई थी, उसने अपने आप को और अपना सब कुछ पूरी और सम्पूर्ण रीति से मसीह के हाथों में सौंप दिया था, और शीघ्र ही उसे आत्मा की परिपूर्णता प्राप्त हुई।
उनके जीवन के “संस्मरण” में इस स्थान तक, पवित्रीकृत होने के लिए यह पहला स्पष्ट, सरल और सहज ही समझ में आनेवाला निर्देश है जो हमें मिला है। यह तो ठीक मेथोडिस्ट शिक्षा थी, जैसी जॉन वेस्ली, या जॉन फ़्लेचर, या एडम क्लार्क, या पवित्रीकरण के अनुभव का कोई भी आधुनिक मेथोडिस्ट शिक्षक दे सकता था। और इसका परिणाम ठीक वही था जो आज पूरे अमेरिका में सैकड़ों पवित्रता-शिविर-सभाओं में देखा जा रहा है, जहाँ हज़ारों की संख्या में लोग पवित्रीकृत हो रहे हैं। यह अत्यन्त विचित्र बात है कि फ़िन्नी ने इस घटना से यह नहीं सीखा कि अनगिनत हज़ारों लोगों को पवित्रीकरण के अनुभव में कैसे सिखाया और ले जाया जाए। परन्तु उन्होंने नहीं सीखा; उन्होंने मेथोडिस्ट सिद्धान्त को अस्वीकार कर दिया, और इसलिए लोगों को पवित्रीकृत कराने में उन्हें वह सफलता नहीं मिली जो मेथोडिज़्म के आत्मा से परिपूर्ण महान अगुवों को मिली।
वेस्टर्न की जागृति, 1854-5
तीस वर्ष बाद फ़िन्नी फिर वहीं लौट आए, और उसी स्थान पर एक और जागृति-सभा कर रहे थे जहाँ से उन्होंने एक सुसमाचार-प्रचारक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन आरम्भ किया था — न्यूयॉर्क के ओनाइडा काउंटी का वेस्टर्न नगर। पिछली जागृति के बाद एक पूरी पीढ़ी जन्म लेकर युवावस्था तक पहुँच चुकी थी। जो बहुत-सी उल्लेखनीय घटनाएँ हुईं, उनमें से एक निश्चय ही उन अनेक शिक्षाओं के कारण वर्णन करने योग्य है जो उससे मिलती हैं।
एक युवक ने, जो भक्त माता-पिता का पुत्र था और जिसके लिए वे लम्बे समय से प्रार्थना करते आ रहे थे, वर्षों पहले “द पाइरेट्स ओन बुक” (समुद्री डाकुओं की अपनी पुस्तक) पढ़ी थी। उसका उसके मन पर अत्यन्त असाधारण प्रभाव पड़ा। उसने उसके भीतर एक प्रकार की भयानक और नारकीय महत्त्वाकांक्षा जगा दी कि वह अब तक के सबसे बड़े समुद्री डाकू बने। उसने ठान लिया कि जितने भी राजमार्ग के लुटेरों, डकैतों और समुद्री डाकुओं का इतिहास कभी लिखा गया है, वह उन सबका सरदार बनेगा। परन्तु उसकी धार्मिक शिक्षा उसके मार्ग में आड़े आती थी। उसके माता-पिता की शिक्षाएँ और प्रार्थनाएँ मानो उसके सामने खड़ी हो जाती थीं, जिससे वह आगे न बढ़ पाता था। परन्तु उसने सुन रखा था कि परमेश्वर के आत्मा को शोकित करके दूर भगा देना, और उसके प्रभाव को ऐसा बुझा देना सम्भव है कि मनुष्य उसे फिर कभी अनुभव न करे। उसने ऐसा करने का निश्चय किया, और उसका पहला काम यह था कि अपने धार्मिक बोध से छुटकारा पाए, ताकि वह विवेक की किसी भी चुभन के बिना आगे बढ़कर हर प्रकार की डकैतियाँ और हत्याएँ कर सके। इसलिए उसने जान-बूझकर पवित्र आत्मा की निन्दा करने का काम ठान लिया। तब उसे लगा कि अब तो परमेश्वर का आत्मा अवश्य उसे छोड़ देगा, और उसका विवेक उसे फिर कभी परेशान न करेगा। थोड़े समय बाद उसने निश्चय किया कि कोई अपराध करके देखे कि उसका उस पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस उद्देश्य से उसने एक पाठशाला-भवन में आग लगा दी, और वह जलकर राख हो गया।
जब फ़िन्नी ने प्रचार आरम्भ किया, तो वह प्रचार और सभाओं के विरुद्ध अत्यन्त कटु था। उसने अपनी इच्छा-शक्ति के पूरे बल के साथ अपने आप को जागृति के विरुद्ध खड़ा कर दिया, और घोषणा की कि “न फ़िन्नी और न नरक उसका मन-परिवर्तन कर सकते हैं।”
यह बात बिलकुल सच थी; उन दोनों में से कोई भी नहीं कर सकता था। परन्तु उसने अपने हिसाब में परमेश्वर को छोड़ दिया था; और भक्त माता-पिता की प्रार्थनाओं के उत्तर में पवित्र आत्मा ने उस पर इतना दबाव डाला कि वह उसे और सह न सका। वह श्री फ़िन्नी से मिलने आया, और उसके चेहरे पर ऐसी क्लान्त और उजड़ी हुई दशा थी कि वह लगभग पागल-सा दिखाई देता था। उसके होंठ नीले और रक्तहीन थे, और उसका सारा रूप बड़ा ही भयावह था। उसका शरीर इतना काँप रहा था कि कमरे का फ़र्नीचर हिल उठता था। जब तक वह सह सका तब तक वह अपने पाप-बोध के विरुद्ध डटा रहा था; और अब उसने उद्धारकर्ता के आगे हार मान ली, और गिरजाघर गया, जबकि फ़िन्नी ने उसकी अनुमति से लोगों को उसके पाप और अपराध के विषय में बताया। परमेश्वर ने इसका उपयोग लोगों के हृदयों को पिघलाने में, और दूसरों को परमेश्वर के पास लाने में किया। (संस्मरण, पृ. 428-431।)
रॉचेस्टर, 1855 की शरद ऋतु
1855 के उत्तरार्ध में रॉचेस्टर के कुछ लोग जागृति के लिए परमेश्वर से प्रार्थना में तब तक मल्लयुद्ध करते रहे जब तक वे प्रबल न हुए। उन्होंने फ़िन्नी को उस नगर में परिश्रम करने के लिए अत्यन्त आग्रहपूर्ण निमन्त्रण भेजा। वे जाने में कुछ हिचकिचा रहे थे। जो भाई उन्हें लेने आया था उसने बड़े विश्वास से कहा, “प्रभु आपको रॉचेस्टर भेजने वाला है, और आप इन सर्दियों में रॉचेस्टर जाएँगे, और हमारे यहाँ एक बड़ी जागृति होगी।” फ़िन्नी हिचकिचाहट के साथ गए; परन्तु जब वे कार्यक्षेत्र में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि यह प्रभु की ओर से था। कॉन्ग्रिगेशनल, प्रेस्बिटेरियन, बैपटिस्ट और मेथोडिस्ट कलीसियाएँ इस काम में एक हो गईं।
शीघ्र ही सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों, अपील न्यायालय के दो न्यायाधीशों, और वकीलों के संघ के सदस्यों ने उन्हें एक और निवेदन-पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने परमेश्वर के नैतिक शासन पर वकीलों के लिए व्याख्यानों की एक शृंखला का अनुरोध किया। उन्होंने उनका अनुरोध स्वीकार किया, और इस पाठ से आरम्भ किया: “परमेश्वर के साम्हने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं।” उन्होंने यह दिखाया—1. हर मनुष्य का एक विवेक होता है; 2. हर मनुष्य जानता है कि वह परमेश्वर के विरुद्ध पापी है; 3. कि इसलिए परमेश्वर को उसे पापी ठहराकर दोषी ठहराना ही होगा; 4. कि हर मनुष्य जानता है कि उसका अपना विवेक उसे पापी ठहराकर दोषी ठहराता है। नगर में एक संशयवादी वकील आ बसा था, जिसने थोड़े ही समय पहले घोषणा की थी कि वह फिर कभी किसी मसीही सभा में नहीं जाएगा। उसने पहला व्याख्यान सुना, और घर लौटते हुए एक मित्र के सामने स्वीकार किया कि उसे निश्चय हो गया है कि मसीही धर्म में उससे कहीं अधिक है जितना उसने सोचा था; कि उसे फ़िन्नी के तर्क से बचने का कोई मार्ग नहीं दिखाई देता, और वह हर व्याख्यान में जाएगा, और तथ्यों को ध्यान में रखकर अपना निर्णय करेगा।
फ़िन्नी रात-प्रति-रात उन पर दबाव डालते हुए आगे बढ़ते गए; परन्तु उन्हें व्यवस्था के अधीन बन्द, अपने ही विवेक द्वारा दोषी ठहराए हुए, और अनन्त मृत्यु का दण्ड पाए हुए छोड़ देते थे। वे प्रभावशाली रूप से सुसमाचार के प्रकाशन और मसीह में, जो उनकी एकमात्र आशा था, बन्द कर दिए गए, और तब फ़िन्नी ने मसीह को उनके सामने प्रस्तुत किया। वकील टूट गए, और परमेश्वर के अधीन हो गए।
इस प्रकार, पिछली दो जागृतियों के समान इसमें भी, काम उच्च वर्गों में आरम्भ हुआ और पहले वहीं बढ़ा, और फिर लोगों के सब वर्गों में नीचे तक फैल गया। व्यापारियों ने ऐसा प्रबन्ध किया कि उनके क्लर्क सभाओं में जा सकें। काम इतना व्यापक हो गया कि सार्वजनिक आने-जाने के सब स्थानों में, दुकानों और सरायों में, बैंकों में, सड़कों पर, और सार्वजनिक सवारियों में, और हर जगह, उद्धार का जो काम चल रहा था वही सबको तल्लीन करनेवाला विषय बन गया। नगर की महिलाओं ने सब वर्गों के लोगों को सभाओं में और मसीह के पास लाने के लिए अपना भरसक प्रयत्न किया। रेलवे के बहुत-से कर्मचारियों का मन-परिवर्तन हुआ, और रेलवे के कर्मचारियों में इतनी बड़ी रुचि थी कि रविवार का बहुत-सा काम स्थगित कर दिया गया ताकि वे अपने प्राणों के उद्धार की ओर ध्यान दे सकें। पिछली जागृतियों के समान यह काम भी दूर और निकट के दूसरे गाँवों, कस्बों और नगरों में फैल गया।
फ़िन्नी ने ये टिप्पणियाँ कीं, जो अर्थ से भरी हुई हैं: “मैंने कहीं भी रॉचेस्टर से अधिक आनन्द के साथ प्रचार नहीं किया। वे अत्यन्त बुद्धिमान लोग हैं, और उन्होंने सदा ऐसी लगन, ऐसी निष्कपटता, और सत्य के प्रति ऐसी सराहना प्रकट की है, जो इतने बड़े पैमाने पर किसी भी दूसरे स्थान में मेरे देखे हुए किसी भी अनुभव से बढ़कर है। मैंने दूसरे ऐसे नगरों में भी परिश्रम किया है जहाँ के लोग इनसे भी अधिक शिक्षित थे। परन्तु उन नगरों में लोगों की आदतें अधिक बँधी-बँधाई थीं; लोग अधिक नखरेबाज़ थे, और उपायों से अधिक डरते थे। न्यू इंग्लैंड में मैंने सामान्य शिक्षा का ऊँचा स्तर तो पाया है, परन्तु साथ ही ऐसा संकोच, ऐसी जड़ता, ऐसी औपचारिकता भी पाई है, जिसने पवित्र आत्मा के लिए स्वतंत्रता और सामर्थ्य के साथ काम करना असम्भव कर दिया है।
“जब मैं हार्टफ़र्ड में परिश्रम कर रहा था, तो एक पादरी ने, जिसने मध्य न्यूयॉर्क की बड़ी जागृतियों को देखा था, मुझसे कहा: ‘अरे, भाई फ़िन्नी, आपके हाथ बँधे हुए हैं; आप उनके भयों से और हर काम को करने के उनके बँधे-बँधाए ढंग से घेर दिए गए हैं। उन्होंने तो पवित्र आत्मा को भी जकड़नेवाला कुर्ता (स्ट्रेट-जैकेट) पहना दिया है।’ वह पादरी अश्रद्धालु नहीं था। उसने तो केवल वही देखा और अनुभव किया जो मैंने देखा और अनुभव किया, कि लोगों के भयों और उनकी अपनी बुद्धिमानी के कारण पवित्र आत्मा अपने काम में बहुत रोका जा रहा था। मैं नहीं सोचता कि न्यू इंग्लैंड के लोग उन रुकावटों को तनिक भी समझ सकते हैं जो वे प्राणों के उद्धार का कार्य पूरा करने में पवित्र आत्मा पर डालते हैं; और न वे उन स्थानों की जागृतियों की सामर्थ्य और शुद्धता को समझ सकते हैं जहाँ ये भय, पूर्वाग्रह, रुकावटें और अपनी बुद्धिमानी नहीं होतीं।”
एक बुद्धिमान, शिक्षित समाज में उपायों के उपयोग में अव्यवस्था के खतरे के बिना बड़ी स्वतंत्रता दी जा सकती है। वास्तव में, अव्यवस्था किसे कहते हैं, इस विषय में गलत धारणाएँ बहुत फैली हुई हैं। अधिकांश कलीसियाएँ हर उस बात को अव्यवस्था कहती हैं जिसकी वे अभ्यस्त नहीं हैं। उनकी दृष्टि में उनके बँधे-बँधाए ढंग ही परमेश्वर की व्यवस्था हैं, और जो कुछ इनसे भिन्न है वह अव्यवस्था है, और उनकी औचित्य की भावना को ठेस पहुँचाता है। परन्तु वास्तव में, जो बात केवल लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करती है वह अव्यवस्था नहीं है। धर्म में भी, और हर दूसरी बात के समान, अच्छी समझ और ठोस विवेक समय-समय पर साधनों को लक्ष्यों के अनुकूल बनाएँगे। जिन उपायों की आवश्यकता होगी, वे उन लोगों को स्वाभाविक रूप से सूझेंगे जो परिस्थिति को देखते हैं; और यदि प्रार्थनापूर्वक और सावधानी से उनका उपयोग किया जाए, तो सब हृदयों में पवित्र आत्मा के प्रभाव को बड़ी स्वतंत्रता दी जाए।
