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उपदेश और संबोधन जे. सी. राइल (जारी)
लिवरपूल धर्मप्रान्त को दिया गया दूसरा त्रैवार्षिक उपदेश, अक्टूबर
21, 1884।
मेरे आदरणीय भाइयो, परमेश्वर की दया से हमें लिवरपूल के नए धर्मप्रान्त के दूसरे निरीक्षण-सम्मेलन में फिर एक साथ मिलने का अवसर दिया गया है। इस बार मैंने यही उचित समझा कि धर्मप्रान्त के सब पादरियों को एक ही स्थान पर इकट्ठा करूँ, पूरे समूह को एक ही समय में संबोधित करूँ, और विगन में निरीक्षण के दूसरे दिन को छोड़ दूँ। इस व्यवस्था को अपनाने में मेरा मुख्य उद्देश्य आपकी सुविधा का ध्यान रखना रहा है। हमारे धर्मप्रान्त का क्षेत्र बहुत छोटा है, और उसमें रेलमार्गों का जाल बिछा हुआ है। हमारे पादरियों की कुल संख्या अधिक नहीं है, और मेरा विश्वास है कि आप में से अधिकांश के लिए लिवरपूल से अधिक सुगम कोई सभा-स्थल नहीं है। इसमें यह भी जोड़ दूँ कि यह व्यवस्था लंदन धर्मप्रान्त की परिपाटी के अनुरूप है। उस विशाल धर्मपीठ के निरीक्षण-सम्मेलन में सब पादरी एक ही दिन सेंट पॉल के महागिरजाघर में अध्यक्ष से मिलते हैं।
निरीक्षण-सम्मेलन जैसी त्रैवार्षिक सभा सदा एक गम्भीर अवसर होती है, और नामों का पुकारा जाना हमारे मन में गम्भीर विचार उत्पन्न करे। हमारी आँखें अपनी पंक्तियों में रिक्त स्थानों को देखे बिना नहीं रह सकतीं, और हम में से कुछ को शायद क्रीमिया के युद्ध के बाद की सुबह के उस प्रसिद्ध चित्र ‘उपस्थिति-पत्र’ की स्मृति हो आती है। वाल्टन, ओर्म्सकर्क, ग्रासेनडेल, गार्स्टन, प्रेस्कॉट, स्केल्मर्सडेल, सेफ्टन, रेवनहेड, सेंट लूका, सेंट जेम्स द लेस, और क्राइस्ट चर्च, हंटर स्ट्रीट के पादरी अब हमारे साथ नहीं हैं। कौन कह सकता है कि तीन वर्ष और बीतने से पहले कितने रिक्त स्थान हो जाएँगे? परमेश्वर करे कि जब हमारी बारी आए तब हम सब तैयार पाए जाएँ! यह एक सांत्वनादायक विचार है कि कलीसिया का महान शिरोमणि ‘फिर कभी नहीं मरता,’ ‘मृत्यु का उस पर फिर कोई प्रभुत्व नहीं।’ वेस्टमिन्स्टर एबी में जॉन वेस्ली की स्मारक-पट्टिका पर एक मार्मिक वचन खुदा है, ‘परमेश्वर अपने कार्यकर्ताओं को दफनाता है, पर अपना कार्य आगे बढ़ाता रहता है।’
ऐसे अवसर पर यह उचित ही अपेक्षा की जाती है कि अध्यक्ष अपने एकत्रित पादरियों से दो महान विषयों के बारे में कुछ कहे। उन विषयों में से एक वह विशेष दशा है जो उस धर्मप्रान्त की है जिसकी अध्यक्षता के लिए वह नियुक्त किया गया है; दूसरा उस सम्पूर्ण कलीसिया की सामान्य दशा है जिसका उसका धर्मप्रान्त एक अंग है। इन दोनों विषयों में से प्रत्येक पर मैं आज कुछ कहना चाहता हूँ।
1. हमारे अपने धर्मप्रान्त के विषय में, मुझे कुछ तथ्यों और आँकड़ों से आरम्भ करना होगा, जिन्हें मैं आशा करता हूँ कि आप धीरज से सुनेंगे। परन्तु जिस क्षेत्र में हम रहते हैं उसकी आत्मिक दशा का सही अनुमान लगाना तब तक असम्भव है जब तक हम उस अत्यन्त विशिष्ट स्थिति को न समझें जो अनेक बातों में देश के अन्य धर्मप्रान्तों की तुलना में उसकी है। मैं इस विषय में अत्यन्त स्पष्टता से बोलना चाहता हूँ, क्योंकि इस नए धर्मपीठ के कलीसिया-जनों की प्रायः अनेक प्रतिकूल और अन्यायपूर्ण आलोचनाएँ की जाती हैं। मैं बिना किसी हिचकिचाहट के कहता हूँ कि इंग्लैंड या वेल्स में कोई ऐसा धर्मप्रान्त नहीं है जिसमें राजकीय कलीसिया को लिवरपूल के नए धर्मप्रान्त जैसी असुविधाओं और कठिनाइयों में कार्य करना पड़ता हो।
(1) हमारी पहली कठिनाई हमारे पादरियों की संख्या और धर्मप्रान्त में रहनेवाले प्राणियों की संख्या के बीच के दुःखद असन्तुलन में है। लंकाशायर का वेस्ट डर्बी हंड्रेड, जो लिवरपूल का नया धर्मपीठ बनाता है, उसकी जनसंख्या लगभग 12,00,000 है। इस विशाल जनसमूह के लिए हमारे पास पल्ली-क्षेत्रों वाले केवल 187 पादरी हैं। इस अनुपात की तुलना उन छः धर्मप्रान्तों से कीजिए जो जनसंख्या में लिवरपूल से बड़े हैं। यॉर्क में 13,00,000 लोगों के लिए 630 पादरी हैं; मैनचेस्टर में 23,00,000 के लिए 490; रिपन में 16,00,000 के लिए 490; वॉर्सेस्टर में 12,00,000 के लिए 480; लंदन में 30,00,000 के लिए 500; और रोचेस्टर में 16,00,000 के लिए 300 से अधिक। निस्सन्देह, मैंने गोल संख्याएँ ली हैं। बात यहीं समाप्त नहीं होती। हमारे नए धर्मप्रान्त के 187 प्रतिष्ठित गिरजाघरों में से 137 सन् 1800 के बाद बने हैं, और वे व्यावहारिक रूप से बिना किसी निधि-अनुदान के गिरजाघर हैं, जो आसन-किराये और स्वेच्छा से दिए गए दान पर निर्भर हैं। जहाँ तक उन पदों का प्रश्न है जिन्हें अधिष्ठाता-दशमांश या भूमि से भली-भाँति सम्पन्न किया गया हो, जैसे इंग्लैंड के कुछ प्रदेशों में सैकड़ों मिलते हैं, मुझे पूरे वेस्ट डर्बी हंड्रेड में बीस भी नहीं मिलते। और सबसे बढ़कर, 187 पादरी-पदों में से कम से कम 100 की आय 300 पाउंड वार्षिक से अधिक नहीं है; और अनेक मामलों में 300 पाउंड वार्षिक पानेवाले पादरी के अधीन 8,000 या 10,000, या उससे भी अधिक लोग होते हैं! मुझे सन्देह है कि आइल ऑफ़ वाइट से लेकर बरविक-ऑन-ट्वीड तक इंग्लैंड की कलीसिया में कहीं भी ऐसी स्थिति है।
(2) हमारी अगली कठिनाई हमारी जनसंख्या के अत्यन्त विचित्र और अपवादात्मक स्वरूप में निहित है। हमारे महान नगर लिवरपूल के बाहर निवासी कुलीन वर्ग और बड़े भूस्वामियों की एक अत्यन्त अनोखी और उल्लेखनीय कमी है, जो सामान्यतः राजकीय कलीसिया के मुख्य सहायक होते हैं। वेस्ट डर्बी हन्ड्रेड के किसी भी काउंटी-मानचित्र पर एक दृष्टि डालने से हरे धब्बे बहुत कम दिखाई देंगे, जो सामान्यतः किसी भूस्वामी की उपस्थिति के सूचक होते हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस क्षेत्र की सबसे बड़ी जागीरों में से कम से कम तीन पुराने रोमन कैथोलिक घरानों के हाथ में हैं। लिवरपूल में, जहाँ धर्मप्रान्त की आधी जनसंख्या बसती है, लगभग आधे लोग या तो रोमन कैथोलिक हैं, या स्कॉटलैण्ड के प्रेस्बिटेरियन, या वेल्श अथवा अंग्रेज़ नॉनकनफ़ॉर्मिस्ट हैं। इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि हमारे महान नगर के धनी और सफल व्यापारियों में से बहुत कम लोग लंकाशायर में जड़ जमाए और बँधे हुए जान पड़ते हैं, और कई प्रमुख घराने पिछले पचास वर्षों में व्यापार में सम्मानजनक सफलता पाने के बाद लिवरपूल छोड़कर इंग्लैण्ड के अन्य भागों में चले गए हैं। उनके नाम हमारे एक्सचेंज से लुप्त हो गए हैं और अब वे हमारे साथ जुड़े नहीं रहे।
इसके अतिरिक्त यह भी कभी नहीं भूलना चाहिए कि लिवरपूल संसार का सबसे बड़ा बन्दरगाह है, और हमारे बहुत से लोग सब जातियों के नाविक हैं, जो निरन्तर आते-जाते और बदलते रहते हैं, आज यहाँ और कल वहाँ। फिर, हमारे महान नगर के उत्तरी और दक्षिणी छोर पर घाटों से जुड़े असंख्य लोग रहते हैं, जो प्रायः अत्यन्त दरिद्र दशा में, बहुत दीन-हीन घरों में रोज़ कमाने-रोज़ खाने की स्थिति में जीते हैं, और जिनमें मद्यपान, अपव्यय और अनुग्रह के साधनों की निरन्तर उपेक्षा की भयंकर प्रवृत्ति है। यदि समय होता तो मैं विगन के आसपास की घनी कोयला-खदान जनसंख्या, और सेंट हेलेन्स तथा विडनेस के रासायनिक कारखानों में लगे हज़ारों लोगों के विषय में भी कुछ कहता। परन्तु मैं समझता हूँ कि यह कहना उचित है कि हमारे कुल 12,00,000 प्राणियों में हमारे नए धर्मप्रान्त के अध्यक्ष और पादरी-वर्ग के सामने अत्यन्त विचित्र कठिनाइयाँ प्रस्तुत करनेवाला एक जनसमूह है। और मैं फिर कहता हूँ कि मुझे सन्देह है कि इंग्लैण्ड की कलीसिया में इसके जैसा कुछ और भी है।
(3) हमारी तीसरी, परन्तु कम नहीं, कठिनाई यह है कि राजकीय कलीसिया का कार्य चलाने के लिए जो तन्त्र अन्य धर्मप्रान्तों को उपलब्ध है, उसका बहुत बड़ा भाग यहाँ स्पष्टतः अनुपस्थित है। आर्चडीकनों के बाद अध्यक्ष के लिए ग्रामीण डीनों से अधिक उपयोगी कोई धर्मप्रान्तीय अधिकारी नहीं होते। परन्तु लिवरपूल धर्मप्रान्त में ऐसे सहायक केवल 9 हैं। यॉर्क में 31 हैं, लन्दन में 25, रोचेस्टर में 19, वॉर्सेस्टर में 31, मैनचेस्टर में 21, रिपन में 24। हमारे यहाँ कोई वेतनभोगी डीन और कैनन नहीं हैं, और ग्रेट ब्रिटेन के दूसरे सबसे बड़े नगर के गिरजाघर की आराधना बिना वेतन के स्वैच्छिक सहायता देनेवाले मानद कैननों द्वारा चलाई जाती है, और बहुधा उन्हें स्वयं बड़ी असुविधा उठानी पड़ती है। आज तक हमारे पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे धर्मप्रान्त के योग्य कैथेड्रल कहा जा सके। जब मैनचेस्टर और रिपन के धर्मप्रान्त बने थे, तब दोनों में एक-एक कैथेड्रल पहले से बना-बनाया हाथ में था। न्यूकैसल में एक ऐसा पल्ली-गिरजाघर है जिसका आकार और विस्तार उसे कैथेड्रल बनाने के योग्य है। वेकफ़ील्ड में, जब वहाँ धर्मपीठ स्थापित होगा, एक और पल्ली-गिरजाघर है जो लिवरपूल के हमारे किसी भी गिरजाघर से कहीं बढ़कर है। साउथवेल में पहले से एक सुन्दर मिन्स्टर है। सारे लिवरपूल नगर में एक भी ऐसा गिरजाघर नहीं है जिसे उचित अंग्रेज़ी कैथेड्रल बनाया जा सके। हमारे सामने एक विशाल, घनी बसी नगरी के बीच कैथेड्रल बनाने और उसके लिए निधि जुटाने का विराट कार्य है। मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह कार्य अन्ततः पूरा होगा; परन्तु यह नकारा नहीं जा सकता कि यह अत्यन्त भयानक उपक्रम है, जो लिवरपूल की भी ऊर्जा और उदारता पर भारी बोझ डालता है, और नए धर्मपीठ के सामने एक बहुत गम्भीर कठिनाई है। संक्षेप में, हमारे धर्मप्रान्त में कार्यकर्ताओं की पूरी कमी है और साधन अधूरे हैं, और इसका पहला प्रोटेस्टेंट अध्यक्ष उस विशाल जहाज़ के कप्तान की स्थिति में है जिसे अचानक आधे नाविकों, आधे इंजीनियरों और आधे कोयले के साथ, जो जहाज़ को चाहिए, अटलांटिक पार यात्रा आरम्भ करने को कहा जाए। कोई मुझे गलत न समझे। मैंने जो कहा है, वह शिकायत की भावना से नहीं कहा। मैं किसी में दोष नहीं निकालता। जिस स्थिति पर मैं शोक करता हूँ, वह मुख्यतः लंकाशायर के इस भाग की व्यापारिक कुशलता और समृद्धि से उत्पन्न हुई है, और पिछले चालीस वर्षों में जनसंख्या की जो अद्भुत वृद्धि हुई है, उससे। मैं उन सुविख्यात पुरुषों के उत्साह, साहस और उदारता की सराहना करता हूँ जिन्होंने इस नए धर्मपीठ की नींव डाली। मुझे सन्देह है कि यदि लंकाशायर में अगुआई करनेवालों ने वह उदार उदाहरण न रखा होता, तो न्यूकैसल और साउथवेल कभी स्थापित होते। परन्तु मैंने कुछ तथ्यों का उल्लेख इसलिए किया है कि इंग्लैण्ड के बहुत से लोग उनसे पूर्णतः अनजान हैं, और अपनी अनभिज्ञता में उन्होंने लिवरपूल धर्मपीठ की स्थापना से तुरन्त उससे कहीं अधिक परिणामों की आशा की है जितनी करने का उन्हें अधिकार था। बहुतों ने ऐसा सोचा है जैसे उस रोमी सेनापति ने डींग मारकर कहा था कि उसे केवल भूमि पर पैर पटकना है और एक सेना खड़ी हो जाएगी, वैसे ही अध्यक्ष को केवल लिवरपूल भेजना है और दो-तीन वर्ष में धर्मप्रान्त में कुछ भी कमी न रहेगी। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैंने ऐसी कोई आशा नहीं की थी। मैंने अपने सामने की कठिनाइयाँ देखीं, और उनका सामना करने तथा जो अनुचित बातें कही जाएँगी उन्हें धीरज से सहने के लिए तैयार होकर अपने पद पर आया। और इस क्षण भी मेरे मन में निराशा की तनिक भी भावना नहीं है। इंग्लैण्ड की कलीसिया को समय दीजिए, और मेरा विश्वास है कि परमेश्वर की आशीष से वह वेस्ट डर्बी हन्ड्रेड में उतने ही बड़े कार्य करेगी जितने देश का कोई भी धर्मप्रान्त करता है।
हमारे नए धर्म-प्रदेश के गठन के विषय में एक ही बात है जिस पर मुझे सार्वजनिक रूप से खेद प्रकट करना है, और वह यह है कि संसद के जिस अधिनियम से इस अध्यक्ष-पद की स्थापना हुई, उसमें अध्यक्ष के लिए पदों के नियुक्ति-अधिकार की कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई। यहाँ फिर मुझे नम्रतापूर्वक शिकायत करनी पड़ती है कि लिवरपूल के अध्यक्ष की स्थिति अत्यन्त असाधारण है। वृद्ध और अशक्त पदधारियों को राहत देने के लिए, और 'प्रकाश तथा नेतृत्व' से सम्पन्न युवा पादरियों को पुरस्कृत करने के लिए, उसके पास देने को केवल चार जीविकाएँ हैं, और चार अन्य ऐसी हैं जिनमें वह राजमुकुट के साथ बारी-बारी से नियुक्ति करता है। बेंच पर और कोई अध्यक्ष इस स्थिति में नहीं है। नवगठित न्यूकैसल धर्म-प्रदेश में भी अध्यक्ष के पास देने को उन्नीस जीविकाएँ हैं, और ग्यारह अन्य राजमुकुट के साथ बारी-बारी से। इनमें से कुछ जीविकाएँ लिवरपूल के अध्यक्ष के अधिकार में आने वाली चारों जीविकाओं में से किसी की भी तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान हैं। चेस्टर का अध्यक्ष-पद, जो लिवरपूल के अध्यक्ष-पद के गठन से अपनी दो-तिहाई जनसंख्या और बहुत बड़े उत्तरदायित्व से मुक्त हो गया, साझेदारी के विघटन के समय हमारे अध्यक्ष-पद को केवल चार जीविकाएँ सौंप गया, और स्वयं पचास का नियुक्ति-अधिकार अपने पास रख लिया! मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करता। नियुक्ति-अधिकार तो अधिक से अधिक एक विवादास्पद सम्पत्ति है। भूल हो चुकी है, और उसे संसद के किसी सामान्य अधिनियम के बिना सुधारा नहीं जा सकता, जो सम्भवतः कभी प्राप्त नहीं होगा। फिर भी मैं उचित समझता हूँ कि इस विषय का उल्लेख इस प्रकार सार्वजनिक रूप से करूँ, क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे पादरी-वर्ग को यह समझ में आए कि मैं उनके लिए कितना कम कर पाता हूँ।
अब मैं प्रसन्नता से अपने धर्म-प्रदेश के क्षितिज की कठिनाइयों और काले बादलों से हटकर अपनी स्थिति के नीले आकाश की ओर मुड़ता हूँ। हमारे पास देखने को कुछ नीला आकाश है। पिछले चार वर्षों पर दृष्टि डालते हुए, और वेस्ट डर्बी हण्ड्रेड की कलीसियाई स्थिति के विषय में यहाँ आते समय की अपेक्षा कहीं अधिक जानते हुए, मैं ऐसी अनेक बातें देखता हूँ जिनके लिए मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ और साहस पाता हूँ।
(1) सबसे पहले और सबसे बढ़कर, मैं उस सामान्य शिष्टता और दयालुता के लिए अत्यन्त कृतज्ञ हूँ जिसके साथ इस धर्म-प्रदेश के कलीसिया के सदस्यों, पादरियों और सामान्य जनों दोनों, ने मेरा स्वागत किया है। उत्तर, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम, जहाँ कहीं मैं गया, मुझे दयालुता, सहानुभूति, और मेरी सहायता करने तथा मेरी इच्छाओं का आदर करने की तत्परता मिली। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक अंग्रेज़ अध्यक्ष के अपने विचार और मत तो होते ही हैं। कोई समझदार मनुष्य यह नहीं चाहेगा कि वह केवल दिखावे का प्रधान हो, जिसका अपना कोई स्वतन्त्र मन न हो और जो सभी विचार-धाराओं का मानद सदस्य मात्र हो। उसका ऐसा होना वांछनीय भी नहीं है। इसलिए यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसके पादरियों में से प्रत्येक जो कुछ कहता या करता है उस सब का वह पूर्ण अनुमोदन करेगा, या उसके पादरियों में से प्रत्येक उससे पूर्णतः सहमत होगा। स्थापित कलीसिया अत्यन्त व्यापक है, और जब तक उसके सदस्य उसके अनुच्छेदों और प्रार्थना-पुस्तक के प्रति निष्ठावान हैं, वह उन सब को विचार की बहुत बड़ी स्वतन्त्रता देती है। उसके पादरियों में कुछ सीमाओं के भीतर मत और आचरण की पर्याप्त विविधता सदा बनी रहेगी। इस विविधता से लिवरपूल का धर्म-प्रदेश देश के अन्य धर्म-प्रदेशों से किसी भी तरह मुक्त नहीं है। वास्तव में मेरा विचार है कि लंकास्टर परगने में, जैसा कि हर अन्य विषय पर, वैसा ही धर्मशास्त्रीय विषयों पर भी स्वतन्त्र चिन्तन का बहुत बड़ा भाग है, और मुझे इसका खेद नहीं है। परन्तु जब स्थिति ऐसी है, तो मुझे ईमानदारी से कहना चाहिए कि हमारे कार्य में जो थोड़ा-सा घर्षण और टकराव मैंने देखा है, उसके लिए मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। हम मेरी आशा से कहीं अच्छी तरह आगे बढ़े हैं, और मुझे विश्वास है कि हमारा यह सामंजस्यपूर्ण कार्य जारी रहेगा और बढ़ेगा। अपनी सारी विविधताओं के बावजूद मैं मानता हूँ कि हम इंग्लैंड की कलीसिया के हितों को आगे बढ़ाने की एक समान इच्छा से परस्पर जुड़े हुए हैं, और मैं आशा करता हूँ कि समय बीतने के साथ हम और भी अधिक एक-दूसरे से जुड़ेंगे और एक होंगे। एकता में बल है, और फूट किसी कलीसिया की दुर्बलता का प्रमुख कारण है। मैं अपनी भूल-चूक की प्रवृत्ति से भली-भाँति अवगत हूँ, और मुझे सदा लगता है कि मैं जो कुछ करता हूँ वह कहीं अधिक अच्छी तरह किया जा सकता था। परन्तु मैं आशा करता हूँ कि मेरे पादरी मेरी इस बात पर विश्वास करेंगे कि मैं अपना कर्तव्य निभाने का प्रयत्न करता हूँ।
(2) अगली बात यह कि मैं उस बड़े परिमाण के ठोस और भले कार्य के लिए कृतज्ञ हूँ जो हमारे धर्म-प्रदेश के अधिकांश पल्लियों में चल रहा है। निस्सन्देह पल्ली-पल्ली में अन्तर होता है, और कुछ में दूसरों की अपेक्षा बहुत अधिक कार्य होता है। परन्तु जब मैं मसीही कार्य-तन्त्र की उस मात्रा को देखता हूँ जिसे इस धर्म-प्रदेश के अनेक भागों में बेढंगे और अत्यधिक फैले हुए क्षेत्रों के अनेक कम वेतन पाने वाले पदधारी धैर्य, दृढ़ता और नियमितता के साथ चलाते रहते हैं, तब मैं यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकता कि परमेश्वर की स्तुति करने के लिए हमारे पास बड़ा कारण है, और यदि मैं सार्वजनिक रूप से ऐसा न कहूँ तो मैं कृतघ्न ठहरूँगा।
(3) अगली बात यह कि मैं हमारे अधिकांश आराधनालयों की दशा और साज-सज्जा तथा उनमें सम्पन्न होनेवाली सेवाओं की रीति के लिए धन्यवादी हूँ। इस विषय में अपना मत प्रकट करने का मुझे अधिकार है। पिछले चार वर्षों में मुझे हमारे धर्मप्रान्त की 187 कलीसियाओं में से कम से कम 150 की वेदियों पर खड़े होने का अवसर मिला है, या तो प्रचार करने के लिए या दृढ़ीकरण-संस्कार के सम्बोधन देने के लिए। इसलिए मैं वही कहता हूँ जो मैंने अपनी आँखों से देखा और स्वयं परखा है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि यद्यपि वास्तुकला की दृष्टि से हमारे यहाँ भव्य कलीसिया-भवन थोड़े ही हैं, फिर भी पादरी-वर्ग और कलीसिया के संरक्षकों के सराहनीय परिश्रम के कारण बहुत कम ऐसे हैं जिनमें हमारे लिए लज्जित होने की कोई बात हो। (4) अगली बात यह कि मुझे यह कहते हुए आनन्द है कि हमारे विशाल और अत्यधिक फैले हुए पल्लियों की पुकारती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कलीसिया-भवनों का निर्माण-कार्य उससे कहीं अधिक गति से चल रहा है जितना अधिकतर लोग समझते हैं। जब से यह धर्मप्रान्त स्थापित हुआ है, उन चार वर्षों में मैंने नौ बिलकुल नए कलीसिया-भवनों का समर्पण किया है, अर्थात् : सन्त यूहन्ना सुसमाचार-लेखक, वाल्टन; सर्वसन्त, साउथपोर्ट; सन्त लूका, साउथपोर्ट; सन्त अथानासियुस, किर्कडेल; सन्त सिप्रियन, एज हिल; सन्त अन्द्रियास, विगन; सन्त एलिज़ाबेथ, आस्पल; सन्त अम्ब्रोस, विडनेस; और सन्त गेब्रियल, टॉक्सटेथ पार्क; तथा दो अन्य जो फिर से बनाए गए, अर्थात् सन्त अन्द्रियास, मैगल, और सन्त स्तिफनुस, एज हिल; और वर्तमान कलीसिया-भवनों में तीन वेदी-कक्ष जोड़े गए, अर्थात् पैडगेट, ग्रेट सैंकी और अपहॉलैण्ड। मैंने अनुज्ञापत्र द्वारा तीन अन्य बड़े कलीसिया-भवन भी खोले हैं, अर्थात् : सर्वसन्त, प्रिन्सेस पार्क; सन्त मरियम, वाटरलू; और सन्त लॉरेन्स, किर्कडेल; जिनका समर्पण तब होगा जब मरम्मत और निधि के लिए धन जुट जाएगा। इसके अतिरिक्त चार और कलीसिया-भवन, अर्थात् लिवरपूल में सन्त एग्नेस; सन्त हेलेन्स में काउली हिल; विडनेस में सन्त पौलुस; और साउथपोर्ट में सन्त फिलिप्पुस, शीघ्र ही पूरे होने की सम्भावना है। सन्त बीड, सन्त पोलिकार्प और सन्त फिलिप्पुस, लिवरपूल; सन्त बेनेडिक्ट, एवर्टन; सन्त डन्स्टन, अर्ल्स रोड; और इन्स में एक नया कलीसिया-भवन, शीघ्र ही आरम्भ होने की सम्भावना है। कुल मिलाकर मुझे दृढ़ आशा है कि सन् 1885 के अन्त तक, जब से हमारा धर्मप्रान्त स्थापित हुआ है, तेईस बिलकुल नए कलीसिया-भवन समर्पित हो चुके होंगे। अन्त में, परन्तु कम महत्त्व की बात नहीं, मैं यह भी जोड़ दूँ कि जब से मैं लिवरपूल आया हूँ, तब से धर्मप्रान्त के विभिन्न भागों में अठारह या बीस लोहे के कक्ष, पाठशाला-कक्ष या मिशन-कक्ष अनुज्ञापत्र द्वारा परमेश्वर की आराधना और प्रभु-भोज के संस्कार के लिए खोले गए हैं, और कुछ बिना अनुज्ञापत्र के कक्ष भी हैं, जिनके विषय में मैं विशेष रूप से कुछ नहीं कह सकता। मुझे विश्वास है कि ऐसे कक्षों का महत्त्व असीम है। वे उन सैकड़ों लोगों को एकत्र करने का अवसर देते हैं जो बड़े पल्ली-कलीसिया-भवन से झिझकते हैं, परन्तु किसी कक्ष में सरल और प्रारम्भिक सेवा में आने को भली-भाँति तैयार हैं। मैं अवसर पाकर बड़े पल्ली के प्रत्येक पादरी को अत्यन्त दृढ़ता से सलाह देता हूँ कि वह ऐसा एक कक्ष बनवाए, ताकि उन लोगों को आकर्षित किया जा सके और उन तक पहुँचा जा सके जो इस समय किसी भी आराधनालय में नहीं जाते। मुझे निश्चय है कि वह इसे एक अमूल्य सहायक पाएगा, और इसलिए भी कि इससे उसे रविवार को योग्य साधारण विश्वासियों की सहायता प्राप्त हो सकेगी।
सब का सार यह कि पिछले चार वर्षों में जो भौतिक (अर्थात् ईंट-गारे का) कार्य हुआ है और हो रहा है, उसमें मुझे धन्यवाद देने के बड़े कारण दिखाई देते हैं। निःसन्देह बहुत कुछ अभी करना शेष है। विशेष रूप से लिवरपूल के उत्तरी छोर की दशा पीड़ादायक रूप से असन्तोषजनक है, और सन्त पौलुस, नॉर्थ शोर, बूटल और सीफोर्थ के क्षेत्र के भीतर अलेक्ज़ैण्ड्रा गोदियों के आसपास कम से कम तीन नए कलीसिया-भवनों और पल्ली-क्षेत्रों की तुरन्त और प्रबल आवश्यकता है। पिछले चार वर्षों में मैंने अपनी आँखों से देखा है कि इस क्षेत्र में कई एकड़ भूमि नए घरों से भर गई है, जबकि हमारी कलीसिया ने अब तक वहाँ के निवासियों के लिए आराधनालय जुटाने को कुछ नहीं किया। मैं हार्दिक आशा करता हूँ कि पादरी-वर्ग, भूमि-स्वामी और उत्तरी छोर के जहाज़रानी-हित से जुड़े सब लोग इस आवश्यकता पर गम्भीरता से विचार करेंगे। उस क्षेत्र में कलीसिया द्वारा बड़े प्रयास की सचमुच आवश्यकता है, और अगला त्रैवार्षिक निरीक्षण होने से पहले मुझे आशा है कि कुछ किया जाएगा। यदि कोई सक्रिय कदम नहीं उठाए गए, तो हज़ारों परिवार शीघ्र ही इंग्लैण्ड की कलीसिया के हाथ से निकल जाएँगे, या अन्य सम्प्रदायों में मिल जाएँगे, या आराधना न करनेवालों की सूची में जुड़ जाएँगे।
(5) जो पदस्थापनाएँ मैंने लिवरपूल का अध्यक्ष बनने के बाद से की हैं, वे मुझे बहुत धन्यवाद का कारण देती हैं। यह एक उल्लेखनीय बात है कि 1880 के त्रित्व-रविवार (Trinity Sunday) को समाप्त हुए चार वर्षों में वेस्ट डर्बी हण्ड्रेड के पल्लियों के लिए, जो हमारा वर्तमान धर्मप्रान्त है, केवल छिहत्तर डीकनों को अभिषिक्त किया गया था। आज तक के चार वर्षों की दूसरी अवधि में, जितने डीकनों को मैंने अभिषिक्त किया है, उनकी संख्या एक सौ तेरह है; अर्थात् इस धर्मप्रान्त में कलीसिया की सेवा में लाए गए पादरियों की संख्या में 37 की बड़ी और विलक्षण वृद्धि हुई है। इसमें मैं यह भी जोड़ दूँ कि जब मैं 1880 में यहाँ आया था तब धर्मप्रान्त में केवल 131 सहायक पादरी थे, और अब 1884 में 170 हैं। यह भी 39 की वृद्धि है। ये तथ्य और भी अधिक ध्यान देने योग्य तब हो जाते हैं जब यह याद रखा जाए कि हमारे यहाँ केवल 187 पल्ली-पुरोहित हैं, और उनमें से बहुतों को इतना कम वेतन मिलता है कि उन्हें एक भी सहायक पादरी रखने में बड़ी कठिनाई होती है। मैंने बार-बार कहा है, और आज फिर कहता हूँ, कि हमारे जैसे विशाल और कम कर्मचारियोंवाले धर्मप्रान्त की पहली आवश्यकता जीवित कार्यकर्ताओं की संख्या में भारी वृद्धि है। यदि कोई धनी कलीसिया-सदस्य लिवरपूल में हमारी कलीसिया की उत्तम सेवा करना चाहे, तो मेरा विश्वास है कि इससे बढ़कर वह और कुछ नहीं कर सकता कि किसी बड़े और निर्धन पल्ली के पल्ली-पुरोहित से कहे, 'यदि आप एक नया क्षेत्र स्थापित करें, या एक सहायक पादरी रखें, तो मैं पाँच वर्ष तक प्रति वर्ष £150 दूँगा।' इस विशाल नगर में और भी बहुत से पादरियों के लिए स्थान है, और बहुत काम किया जाना शेष है।
फिर भी पदस्थापना के विषय को छोड़ने से पहले मैं दो बातें कहना चाहता हूँ, जिन पर मैं अपने पादरियों का विशेष ध्यान चाहता हूँ। पहली बात यह कि डीकन के पद के लिए अपेक्षित स्तर को घटाने की मेरी ज़रा भी इच्छा नहीं है, और मैं उन लोगों से सहमत नहीं हो सकता जो अध्यक्षों पर दबाव डालते हैं कि वे ऐसे लोगों को सेवकाई में लाएँ जिन्हें लैटिन, यूनानी, कलीसिया के इतिहास, अंग्रेज़ी धर्म-सुधार की कथा, प्रार्थना-पुस्तक, कलीसिया की प्रश्नोत्तरी या मसीही धर्म के प्रमाणों का बहुत कम या कुछ भी ज्ञान नहीं है, और जो संक्षेप में केवल भक्त लोग हैं जो बाइबल जानते हैं और सुसमाचार की बातें कर सकते हैं। मैं समझता हूँ कि यदि सेवकाई के पद को सामान्य जनों का आदर पाना है, तो उसके लिए इससे ऊँचे स्तर के लोग चाहिए, और मुझे उस बात में कोई बुद्धिमानी नहीं दिखती जिसे विस्तारित डीकन-पद कहा जाता है। यद्यपि पदस्थापना कोई संस्कार नहीं है, फिर भी वह बहुत गम्भीर बात है; और कलीसिया की आवश्यकताएँ चाहे जो हों, पद हल्के ढंग से नहीं दिए जाने चाहिए। मेरी अपनी राय में मैं पूरी तरह इस पक्ष में हूँ कि मान्यता-प्राप्त पाठकों, अर्थात् साधारण जन कार्यकर्ताओं की एक श्रेणी को पहचाना और आगे बढ़ाया जाए। मैं समझता हूँ कि वे लोगों का अत्यन्त उपयोगी वर्ग हो सकते हैं, और मैं हृदय से चाहता हूँ कि उनकी संख्या और अधिक हो। वास्तव में, यदि यह स्पष्ट रूप से वैध होता, तो मैं ऐसे पाठकों को खुशी से यह अनुमति देता कि जब पल्ली-पुरोहित गिरजाघर का उपयोग न कर रहा हो, तब वे उसमें किसी भी समय संक्षिप्त धार्मिक सभाएँ चलाएँ; बशर्ते, निस्सन्देह, कि वे संस्कारों का संचालन न करें, और ऐसा कुछ न करें जो पल्ली-पुरोहित को पूरी तरह स्वीकार्य और अध्यक्ष द्वारा अनुमोदित न हो। मैं बहुत समय से यह मानता आया हूँ कि हम अपने गिरजाघरों का पर्याप्त उपयोग नहीं करते। £7,000 या £8,000 की लागत से एक विशाल गिरजाघर बनाना, और फिर रविवार को केवल चार-पाँच घण्टे और सप्ताह में शायद चार-पाँच घण्टे और उसका उपयोग करना, मुझे न बुद्धिमानी लगती है न समझदारी। मैं चाहता हूँ कि हमारे गिरजाघर मान्यता-प्राप्त साधारण पाठकों की एक श्रेणी द्वारा काम में लाए जाएँ। परन्तु मैं इस धर्मप्रान्त में भली-भाँति प्रशिक्षित और योग्य अभिषिक्त डीकनों की एक श्रेणी बनाए रखना अवश्य चाहता हूँ, और मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता है कि ऐसे लोगों की पूर्ति इस समय माँग से कहीं अधिक है। मेरी दूसरी बात यह है कि मैं विशेष रूप से उन पल्ली-पुरोहितों से, जो सहायक पादरियों को पद-अधिकार देते हैं, निवेदन करता हूँ कि वे स्मरण रखें कि डीकन को आगे चलकर याजक के रूप में अभिषिक्त होना है, और डीकन-पद के उसके वर्ष में उससे इतना काम न लें कि उसे पढ़ने या तैयारी करने का समय ही न मिले। यह एक दुःखद तथ्य है, जिसे मैंने और मेरे सहायक पादरियों ने चार वर्षों के अनुभव के बाद जाना है, कि जब कोई डीकन याजक-पद के लिए आता है तो वह प्रायः उतना अच्छा नहीं करता और उसकी परीक्षा उतनी अच्छी नहीं होती जितनी डीकन के रूप में अभिषिक्त होने के समय थी, और स्पष्ट है कि उसे अपना अध्ययन बनाए रखने का समय नहीं मिला।
(6) जो दृढ़ीकरण-संस्कार मैं पिछले चार वर्षों में प्रति वर्ष करा पाया हूँ, वे कुल मिलाकर बहुत सन्तोषजनक रहे हैं। प्रस्तुत किए गए उम्मीदवारों की संख्या वर्ष-प्रति-वर्ष लगातार बढ़ती गई है। पहले वर्ष में मैंने 4719 का, दूसरे में 5744 का, तीसरे में 6310 का दृढ़ीकरण किया। इस वर्ष लगभग 5640 का दृढ़ीकरण हो चुका है, और मेरी सूची अभी पूरी नहीं हुई है। कुल परिणाम यह है कि जब से मैं केवल 187 पल्लियोंवाले धर्मप्रान्त का अध्यक्ष बना हूँ, तब से मैं 22,000 से अधिक युवाओं पर दृढ़ीकरण का विधान सम्पन्न कर चुका हूँ।
मुझे ऐसे शब्द नहीं मिलते जिनसे मैं पुष्टिकरण के मूल्य के विषय में अपनी गहरी अनुभूति व्यक्त कर सकूँ, जब उसके पहले उचित तैयारी हो और उसके बाद पुष्टि पाने वालों की आत्मिक दशा पर उचित ध्यान दिया जाए। यद्यपि पुष्टिकरण वह संस्कार नहीं है जिसे 'स्वयं मसीह ने ठहराया हो और जो उद्धार के लिये सामान्यतः आवश्यक हो', तथापि यह उन सबसे महत्त्वपूर्ण विधियों में से एक है जो इंग्लैंड की कलीसिया ने अपने सदस्यों के लिये ठहराई हैं। यह हर पादरी को अपने झुंड के युवा भाग से, उनके जीवन के सबसे नाज़ुक समय में, व्यक्तिगत परिचय करने का स्वर्णिम अवसर देता है। इससे वह उनके मन और विवेक में अपने लिये स्थान बना पाता है, और परमेश्वर की आशीष से उनके सारे भावी जीवन की दिशा को एक झुकाव दे सकता है। यह प्रायः उसके लिये प्रभु-भोज में सहभागी होने वालों, रविवारीय पाठशाला के शिक्षकों और अपने पल्ली के कार्यकर्ताओं की निरन्तर पंक्ति सुनिश्चित करता है, जो मृत्यु या निवास-परिवर्तन से हटे हुओं का स्थान लेते हैं। मेरे आदरणीय भाइयो, मैं आप सबसे स्नेहपूर्वक आग्रह करता हूँ कि इस महत्त्वपूर्ण विधि को प्रभावी बनाने के प्रयास में कभी ढील न दें, और इसे ग्रहण करने के लिये अधिक से अधिक उम्मीदवार जुटाएँ। मुझे पूरा निश्चय है कि इस धर्म-प्रदेश में प्रति वर्ष कहीं अधिक उम्मीदवार प्रस्तुत किए जा सकते हैं, यदि इस विधि का महत्त्व सब पल्लियों में उतना ही समझा जाए जितना कुछ में समझा जाता है। अब भी कुछ बड़े पल्ली-क्षेत्र हैं जिनमें उम्मीदवारों की संख्या अत्यन्त दुःखद रूप से कम है, और मुझे भय है कि एक से अधिक ऐसे हैं जहाँ से मुझे शायद ही कभी एक भी उम्मीदवार मिला हो। ऐसा नहीं होना चाहिए। जो पादरी सचमुच इंग्लैंड की कलीसिया को दृढ़ करना चाहता है, उसे स्मरण रखना चाहिए कि इसका सही मार्ग युवाओं से आरम्भ करना है, और युवाओं को जोड़ने के सर्वोत्तम उपायों में से एक है उन्हें पुष्टिकरण के लिये आगे आने को मनाना।
(7) मैं इस विषय को छोड़ने से पहले इसी से जुड़े रविवारीय पाठशालाओं के विषय में कुछ शब्द अवश्य कहना चाहता हूँ। सारे धर्म-प्रदेश में रविवारीय पाठशाला की शिक्षा के प्रति जो रुचि दिखाई गई है, उसके लिये मैं बहुत धन्यवादी हूँ। मैं हृदय से आशा करता हूँ कि यह रुचि कभी मंद न पड़े, वरन् प्रति वर्ष दृढ़ होती और बढ़ती जाए। मेरा विश्वास है कि इस समय हमारी कलीसिया की रविवारीय पाठशालाओं के नामांकन-पत्रों में, मोटे तौर पर, लगभग 40,000 विद्यार्थी और 4,000 शिक्षक हैं। मुझे सन्देह है कि थोड़े और परिश्रम से ये संख्याएँ सरलता से बढ़ाई जा सकती हैं। कलीसिया के बच्चों के लिये कम से कम सप्ताह के एक दिन निश्चित, गहन और सैद्धान्तिक धार्मिक शिक्षा देना कभी इतना आवश्यक नहीं रहा जितना आज है। राज्य ने अनुदान पाने वाले विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा को औपचारिक रूप से मान्यता देने या उसे पुरस्कृत करने से इनकार कर दिया है; इसलिये कलीसिया को यह देखना होगा कि दिन के विद्यालय में युवाओं की पवित्रशास्त्रीय शिक्षा की उपेक्षा कभी न हो, और रविवारीय पाठशाला में उस पर विशेष ध्यान दिया जाए। मैं अपने धर्म-प्रदेश के प्रत्येक अधिकारी-पादरी को गम्भीरता से आदेश देता हूँ कि वह अपनी रविवारीय पाठशाला पर यथासम्भव अधिक ध्यान दे, योग्य शिक्षक जुटाने का भरसक प्रयत्न करे, और यह देखे कि पाठशाला का समय भली-भाँति व्यतीत हो, और उन भले-मानुस लोगों के हाथों व्यर्थ न गँवाया जाए जो कमज़ोर छोटी कहानी की पुस्तकें पढ़कर और बच्चों को मुस्कुराता देखकर सन्तुष्ट हो जाते हैं। बाइबल और प्रार्थना-पुस्तक की शिक्षा सदा सबसे आगे रहनी चाहिए, और उद्धार के लिये आवश्यक सिद्धान्तों की स्पष्ट शिक्षा कभी दृष्टि से ओझल न हो।
(8) धर्म-प्रदेश में मद्यपान को रोकने, और स्त्री-पुरुष के सब सम्बन्धों में पवित्रता को बढ़ाने तथा युवतियों के कल्याण की चौकसी करने के लिये जो प्रयत्न किए गए हैं, उनके लिये मैं फिर से गहरा धन्यवादी हूँ। ये अत्यन्त मूल्यवान और हितकर आन्दोलन हैं, और इस क्षेत्र के प्रत्येक निवासी की ओर से हर प्रकार के प्रोत्साहन के योग्य हैं। स्थिरता, विश्वसनीयता, नैतिकता, जीवन की नियमित आदतें, दूरदर्शिता और सम्मान का ऊँचा स्तर किसी राष्ट्र की समृद्धि की रीढ़ हैं, और जिस राष्ट्र में इनकी उपेक्षा होती है, वह कभी फलता-फूलता नहीं। मुझे निश्चय है कि लिवरपूल के धनी नियोक्ता इससे अधिक बुद्धिमानी या दूरदर्शिता का कोई काम नहीं कर सकते कि जिन उद्देश्यों की चर्चा मैं कर रहा हूँ, उन्हें बढ़ावा देने वाले धर्म-प्रदेश के वर्तमान संगठनों को धन और प्रभाव से प्रोत्साहित करें।
हमारे धर्म-प्रदेश के विशेष विषयों को अब मैं तीन ऐसी बातों का उल्लेख किए बिना नहीं छोड़ सकता जो मुझे बहुत चिन्ता में डालती हैं, और जिनमें से कम से कम दो के विषय में मैं समझता हूँ कि सुधार की बड़ी गुंजाइश है।
(1) पहली और सबसे पीड़ादायक बात यह है कि हमारे धर्मप्रान्त के असंख्य लोग रविवार के दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सार्वजनिक आराधना में स्पष्ट रूप से अनुपस्थित रहते हैं। श्री ग्लैडस्टन ने अभी हाल ही में हाउस ऑफ कॉमन्स में सार्वजनिक रूप से कहा कि लिवरपूल में ऐसा ही है, और उन्होंने कहा, 'यहाँ की स्थिति अत्यन्त लज्जाजनक है।' मैं जानता हूँ कि उनके मन में विशेष रूप से लिवरपूल था, परन्तु मुझे भय है कि विगन, सेंट हेलेन्स और वारिंग्टन की दशा भी लगभग ऐसी ही है। अब मुझे शायद ही कहना पड़े कि संसार के सबसे प्रमुख देश के प्रधानमंत्री द्वारा, विद्यमान सबसे महान राष्ट्रीय सभा में, हमारी कमियों का सार्वजनिक रूप से उजागर किया जाना, और यह सोचना कि उनके शब्द पृथ्वी के हर कोने में छपते और पढ़े जाते हैं, कुछ अप्रिय अवश्य है। परन्तु मैं इसकी शिकायत नहीं करूँगा। जान-बूझकर हो या नहीं, मेरा विचार है कि श्री ग्लैडस्टन ने एक चौंकानेवाले तथ्य को व्यापक प्रचार देकर हमारी अच्छी सेवा की होगी। किसी भी दशा में, मुझे दृढ़ विश्वास है कि इससे लिवरपूल के लोग सोचने पर विवश होंगे। मैं यह नहीं मानता कि सार्वजनिक आराधना में उपस्थिति के विषय में लिवरपूल की दशा लन्दन, या उन अन्य बड़े नगरों की दशा से जरा भी बुरी है जिनके नाम मैं ले सकता हूँ। परन्तु मैं खुले मन से स्वीकार करता हूँ कि बातें बिलकुल वैसी नहीं हैं जैसी होनी चाहिए, और जब से मैं इस धर्मप्रान्त का अध्यक्ष बना हूँ, मैंने यह बात अनेक बार सार्वजनिक और निजी रूप से कही है। कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर लोगों को जगाना और उनकी आँखें खुलवाना बहुत कठिन है, और यदि हाउस ऑफ कॉमन्स में श्री ग्लैडस्टन के शब्द हमें लिवरपूल में जगाने में सहायक हों, तो मैं उनका बहुत आभारी रहूँगा। फिर भी, मुझे संक्षेप में यह बताने दीजिए कि जिसे प्रधानमंत्री 'हमारी अत्यन्त लज्जाजनक धार्मिक जनगणना' कहते हैं उसके वास्तविक कारण क्या हैं, और फिर यह कि मेरे विचार में सच्चे उपाय क्या हैं। जो कुछ मैं कहने जा रहा हूँ उसकी भूमिका में यह कह दूँ कि किसी नगर में किसी निश्चित दिन सार्वजनिक आराधना करनेवालों की गणना उस स्थान में धर्म की मात्रा की कोई उचित कसौटी नहीं है। मैं क्षण-भर के लिए भी यह नहीं मानूँगा कि वहाँ के निवासियों की मसीही दशा को कलीसियाओं और प्रार्थनालयों की दीवारों के भीतर के सिरों की संख्या से आँका और नापा जाए। मुझे विश्वास है कि इस समय लिवरपूल के श्रमिक वर्ग के हज़ारों स्त्री-पुरुष हैं जो किसी आराधना-स्थल की दीवारों के भीतर कभी नहीं पाए जाते और किसी मण्डली के सदस्य नहीं हैं, फिर भी वे सर्वथा धर्महीन नहीं हैं, और यदि आप उन्हें अन्यजाति कहें तो वे उचित ही बुरा मानेंगे। कुछ मामलों में, निर्धनता के कारण उनके पास अच्छे वस्त्र नहीं हैं, और उनके मन में सच्ची भावना है कि जब तक अच्छे दिन न आएँ, अच्छे वस्त्र पहने आराधकों के बीच जाना आदरपूर्ण नहीं है। अन्य मामलों में वे सचमुच नहीं जानते कि किस आराधना-स्थल में जाएँ, उनसे कभी कोई मिलने नहीं आता, उन्हें कभी कोई नहीं बुलाता, और वे लिवरपूल से अपरिचित बाहर से आए परदेशी हैं, जो यह भी नहीं बता सकते कि वे किस पल्ली-क्षेत्र में रहते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो बिना अनुमति-प्राप्त कमरों और एकान्त स्थानों में मिशनरी भावना वाले भले स्त्री-पुरुषों की स्वैच्छिक शिक्षा के अधीन इकट्ठे होते हैं; और कोई जनगणना ऐसी सभाओं की गिनती नहीं कर सकती। हमारे सामने के इस विषय पर विचार करते समय मेरी सम्मति में इन बातों को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
लिवरपूल की कलीसियाओं और प्रार्थनालयों में कम उपस्थिति का एक मुख्य कारण यह है कि नगर में सार्वजनिक आराधना के लिए किया गया प्रबन्ध बिलकुल अपर्याप्त है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि यदि लिवरपूल के कुछ निर्धन पल्ली-क्षेत्रों के सारे निवासी अगले रविवार को कलीसिया जाने की ठान लें, तो आराधकों के दसवें भाग के लिए भी स्थान न मिल सके। जब लिवरपूल के किसी पल्ली-क्षेत्र की स्थापित कलीसिया दस या बारह हज़ार लोगों के लिए केवल एक भवन उपलब्ध कराती है, और भले प्रोटेस्टेंट असहमतिवादी शायद केवल एक या दो भवन और उपलब्ध कराते हैं, तो परिणाम निश्चित है कि हज़ारों लोग रविवार को कहीं नहीं जाते और घर पर ही रहते हैं। इस प्रकार के पल्ली-क्षेत्रों में धार्मिक जनगणना का वही परिणाम होना स्वाभाविक है जिसे श्री ग्लैडस्टन 'अत्यन्त लज्जाजनक परिणाम' कहते हैं। सीधा सच यह है कि पिछली दो-तीन पीढ़ियों में स्थापित कलीसिया ने लिवरपूल के अनेक क्षेत्रों को पूरी तरह अपनी पकड़ से फिसल जाने दिया है, और ऐसे लोगों की एक आबादी उठ खड़ी हुई है जो व्यवहार में किसी के पल्ली-सदस्य नहीं हैं। मैं घोषणा करता हूँ कि हमारे नगर के उत्तरी या दक्षिणी छोर पर, लगभग £300 वार्षिक आय के साथ, आठ, दस या बारह हज़ार श्रमजीवी लोगों के दायित्व वाले लिवरपूल के किसी पादरी की दशा से अधिक दयनीय दशा मैं नहीं जानता। तर्क और सामान्य बुद्धि बताती है कि ऐसे व्यक्ति के लिए इस आबादी के बड़े भाग तक पहुँचना सर्वथा असम्भव है। उसके पास केवल एक सिर, एक जीभ, दो आँखें और दो पाँव हैं, और संसार-भर की लगन के बावजूद वह अपने पल्ली-सदस्यों की बहुत सीमित संख्या से अधिक तक न पहुँच सकता है, न उनसे मिलने जा सकता है। उनमें से अनेकों को वह कभी नहीं देखेगा, और वे उसके किसी दोष के बिना, अपेक्षाकृत 'अकेले छोड़े हुए' जीते और मरते हैं। ऐसे पल्ली-क्षेत्र में यदि सैकड़ों लोग किसी आराधना-स्थल की देहली पर कभी पाँव न रखें, और व्यवहार में संसार में परमेश्वर के बिना और रविवार की आराधना के बिना हों, तो कौन आश्चर्य करे? ठीक ऐसे ही पल्ली-क्षेत्र हैं जिनमें आराधना न करनेवाले भरे पड़े हैं, और जिनके विषय में श्री ग्लैडस्टन बहुत अधिक सच्चाई के साथ कहते हैं, 'धार्मिक जनगणना लज्जाजनक है।'
परन्तु यदि हरे पेड़ में यह दशा है, तो सूखे में क्या पाने की आशा की जाए? यदि आठ-दस हज़ार लोगों के किसी पल्ली का पादरी, जो शरीर से स्वस्थ, मन से सच्चा और परिश्रम करने को तत्पर है, सब कुछ करके भी दुःख के साथ यह मान लेने को विवश है कि उसके बहुत से पल्लीवासी किसी आराधना-स्थल में नहीं जाते, तो उस नगरीय पल्ली की क्या दशा होगी जहाँ परिस्थितियाँ बिलकुल भिन्न हैं? जब पादरी वृद्ध हो, या दुर्बल हो, या सदा का रोगी हो, या निर्धनता से दबा हुआ हो, और उसके पास न कोई सहायक पादरी हो और न किसी प्रकार के सहायकों की टोली, तब हम क्या आशा कर सकते हैं? जब यह पादरी, चाहे कितना ही भला या नेकनीयत क्यों न हो, नगरीय पल्ली के लिए स्वभाव से ही उपयुक्त न हो और उसमें लोगों को आकर्षित करनेवाले वरदान न हों, तब क्या आशा की जाए? हमारे धर्म-प्रदेश में इस प्रकार की पल्लियाँ हैं, इससे इनकार करना व्यर्थ है। मैं कहता हूँ कि इसके सिवा और क्या आशा की जा सकती है कि पल्ली का गिरजाघर खाली रहे, और पल्लीवासियों की एक विशाल संख्या रविवार को किसी आराधना-स्थल में न जाए? ऐसे अभागे पादरी को दोष देना अन्याय और निर्दयता है। लगभग तीन सौ पाउण्ड वार्षिक आय में आप उससे यह आशा नहीं कर सकते कि वह अधिनियम के अधीन त्यागपत्र दे और सौ पाउण्ड वार्षिक आय पर निवृत्त हो जाए। खेद है कि कलीसिया ने थके-हारे पादरियों के लिए कोई सेवानिवृत्ति-निधि नहीं बनाई। आप उससे यह भी आशा नहीं कर सकते कि वह अपनी सीमित आय में से दूसरों को वेतन देकर वह काम करवाए जो वह स्वयं नहीं कर सकता। संक्षेप में, ऐसे मामलों में स्थापित कलीसिया की व्यवस्था पूरी तरह विफल होती दिखाई देती है, और पल्लीवासी 'बिना चरवाहे की भेड़ों' के समान हैं। यदि ऐसी पल्ली की धार्मिक जनगणना अत्यन्त असन्तोषजनक और शोचनीय न होती, अथवा जिसे श्री ग्लैडस्टन 'लिवरपूल के लिए लज्जाजनक' कहते हैं वैसी न होती, तो यह सचमुच एक चमत्कार होता।
फिर भी, हम चाहे जो भी स्पष्टीकरण दें, हमें इस तथ्य से आँखें नहीं मूँदनी चाहिए कि जिस नगरीय जनसंख्या का बहुमत कभी परमेश्वर की आराधना करता दिखाई नहीं देता, वह अत्यन्त संकटपूर्ण वर्ग है, और उस पर न केवल सब कलीसियावालों का, वरन् सब मसीहियों, सब परोपकारियों और सब देशभक्तों का सर्वोत्तम ध्यान अपेक्षित है। जो मनुष्य यह मानता है कि मानव स्वभाव को धार्मिक और नैतिक प्रभावों के अधीन लाए बिना सुरक्षित रूप से 'अकेला छोड़ा' जा सकता है, वह निश्चय ही बहुत अज्ञानी है। जो स्त्री-पुरुष रविवार को कभी आराधना-स्थल में नहीं जाते, और जिन्हें कभी परमेश्वर और आनेवाले जगत की याद नहीं दिलाई जाती, वे ठीक वही वर्ग हैं जिनके बिगड़ने की सबसे अधिक सम्भावना है; वे असंयमी, अदूरदर्शी, झगड़ालू और बेईमान हो जाते हैं, हर भीड़-वक्ता और विद्रोह भड़कानेवाले के शिकार बनते हैं, और दण्डाधिकारियों, नगरपालिकाओं और सरकारों के लिए कष्ट का कारण होते हैं। प्रायः यही वह वर्ग है जिसके विषय में न्यूकैसल के सांसद श्री काउन ने हाल में कहा: 'समाज लज्जित और निराश होकर उन्हें कूड़े की नाईं उदास आश्रय-स्थलों में बुहार देता है, जहाँ अपनी दुर्दशा में उबलते हुए वे एक साथ हमारी निर्बलता और हमारी निन्दा के कारण बनते हैं। इन आश्रय-स्थलों को कैसे सुखद बनाया जाए और इनके निराश्रित निवासियों को अपनी सहायता आप करने में कैसे सहायता दी जाए, यही इस घड़ी की समस्या है। यदि समाज इसे हल न करेगा, तो यह समय आने पर समाज को ही हल कर देगी।' सच्चाई यह है कि जो लोग परमेश्वर के प्रति अपने कर्तव्य से अनजान छोड़ दिए जाते हैं, उनसे यह आशा कम ही की जा सकती है कि वे अपने पड़ोसियों के प्रति अपना कर्तव्य निभाएँगे। बाइबल, चाहे कुछ लोग कुछ भी कहें, व्यवस्था, नैतिकता और शान्ति की सच्ची मित्र है, और जो लोग कलीसिया या उपासनालय में बाइबल को पढ़ते और सिखाते हुए कभी नहीं सुनते, जैसा कि मुझे भय है कि लिवरपूल में लाखों लोगों की दशा है, वे हर प्रकार की बुराई की उपजाऊ भूमि हैं, और समाज के उच्च वर्गों का अत्यन्त गम्भीर ध्यान चाहते हैं। यह कहना सस्ता और सरल काम है कि उन्हें सुरक्षित रूप से 'अकेला छोड़ा' जा सकता है, कि इंग्लैण्ड एक 'स्वतन्त्र देश' है, और यदि श्रमजीवी वर्ग गिरजाघर या उपासनालय जाना पसन्द नहीं करता तो हम कुछ नहीं कर सकते, और हाथ बाँधे खड़े रहकर उन्हें अपनी इच्छा से करने देना चाहिए! मैं इसके विपरीत कहता हूँ कि हमारे बड़े नगरों के आराधना न करनेवाले लाखों लोगों को सुरक्षित रूप से 'अकेला नहीं छोड़ा' जा सकता, और जिस स्थिति को श्री ग्लैडस्टन 'लज्जाजनक' कहते हैं उसके निवारण के लिए हर सम्भव उपाय करना न केवल उच्च वर्गों और मालिकों का कर्तव्य है, वरन् उन्हीं का हित भी है।
परन्तु जिन बुराइयों की चर्चा मैं अभी कर रहा था, उनका सामना करने के लिए क्या किया जा सकता है? आइए, हम ईमानदारी और नम्रता से इन तथ्यों को स्वीकार करें और इनका सामना करें। आराधना न करनेवालों की पंक्तियों को घटाने और इस बड़े नगर की धार्मिक जनगणना को अधिक सराहनीय बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?
यह सोचना व्यर्थ है कि एक बड़ा भवन-निधि आरम्भ करके हम अपने गिरजाघरों की संख्या तुरन्त दुगुनी कर सकते हैं, और ईंट-गारे से इस रोग को दूर कर सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए धन मिल जाने की ज़रा भी सम्भावना नहीं है। लिवरपूल में स्थान, मरम्मत-निधि और अत्यन्त सामान्य बन्दोबस्त के साथ एक गिरजाघर बनाने और सुसज्जित करने में दस हज़ार पाउण्ड से कम नहीं लगता। लिवरपूल में कुछ उदार-हृदय पुरुष हुए हैं जिन्होंने इसी स्थान में अपना धन कमाकर जनता से एक पैसा माँगे बिना उदारतापूर्वक गिरजाघर बनवाया। परन्तु ऐसे पुरुषों की संख्या सदा थोड़ी ही रहेगी। इसके अतिरिक्त यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोगों के उनका उपयोग करने को तैयार होने से पहले गिरजाघर बनाना आरम्भ करना कुछ सन्देहजनक नीति है। जिस श्रमजीवी ने सम्भवतः दस वर्ष से गिरजाघर के भीतर पैर नहीं रखा, उससे यह आशा करना कि गिरजाघर उसके निकट आते ही वह हमारी प्रार्थना-पुस्तक की उत्तम आराधना-विधि को महत्त्व देने लगेगा, न तो बुद्धि की बात है और न सामान्य ज्ञान की। यह वैसा ही है जैसे कोई यह आशा करे कि जिसे अ और ब का भेद नहीं मालूम, वह पुस्तक पढ़ने लगेगा।
जिस स्थिति पर हम शोक करते हैं, उसका सच्चा उपाय, जैसा कि मैं अध्यक्ष बनने से पहले और बाद में भी अनेक बार कह चुका हूँ, जीवित सेवकों की संख्या बढ़ाना और आक्रामक सुसमाचार-प्रचार की एक संगठित व्यवस्था है। यदि हम केवल अपने बड़े और अत्यधिक फैले हुए पल्लियों को भौगोलिक रूप से लगभग 3,500 लोगों वाले जिलों में बाँट सकें, हर जिले में एक सक्रिय और उत्साही पादरी को बसा सकें, और उसकी सहायता के लिए एक पवित्रशास्त्र-पाठक और एक बाइबल-स्त्री दे सकें, और उसे यह अधिकार दें कि वह अपने जिले में जिस ढंग से और जिस भी कमरे में चाहे कार्य करे, बशर्ते वह अनुग्रह के सबसे प्रारम्भिक साधनों का ही प्रयोग करे और किसी विस्तृत धार्मिक विधि-आराधना से आरम्भ न करे—यदि ऐसा कोई व्यक्ति प्रेरित पौलुस की रीति पर कार्य करने निकले, घर-घर और कमरे-कमरे जाकर सुसमाचार का सीधा-सादा सन्देश सुनाए, क्रूस की कथा बताए, और हर एक के पास प्रेम, सहानुभूति और पवित्र किए हुए व्यावहारिक विवेक के साथ पहुँचे—यदि यह किया जा सके, तो मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि पाँच वर्ष में लिवरपूल के हर भाग में भारी सुधार आ जाएगा, और हमारी धार्मिक जनगणना को फिर ‘लज्जाजनक’ नहीं कहा जाएगा। क्योंकि मैं एक क्षण के लिए भी यह स्वीकार नहीं करूँगा कि लंकाशायर के श्रमिक वर्ग मसीह के लिए जीते नहीं जा सकते, यदि उचित साधन काम में लाए जाएँ। यह कहना झूठ है कि वे स्वभाव से अन्य वर्गों की अपेक्षा अविश्वास या अनैतिकता की ओर अधिक झुके हुए हैं। वे सब एक ही माता-पिता, आदम और हव्वा, के वंशज हैं, और देश के सबसे ऊँचे और श्रेष्ठ लोगों के समान ही हृदय और विवेक लेकर जन्मे हैं। परन्तु वे जैसे हैं—देखने में परमेश्वर से रहित और आराधना न करनेवाले—उसका कारण केवल यह है कि उन्हें ‘अकेला छोड़ दिया गया’ है; न कोई उनके पास गया, न किसी ने उनसे बात की, न किसी ने उनके साथ वैसा प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जैसा मसीह ने सामरी स्त्री के साथ किया। वे ऐसा खेत हैं जो, यदि ठीक से जोता जाए, तो परमेश्वर की महिमा, जिस स्थान में वे रहते हैं उसके लाभ, और सारे राष्ट्र की भलाई के लिए भरपूर फसल दे सकता है।
जो उपचार-योजना मैंने अभी रेखांकित की है, उसमें मुझे कुछ भी अव्यावहारिक, काल्पनिक या असम्भव आदर्शवादी नहीं दिखता, और न ऐसा कुछ जो इंग्लैंड की कलीसिया के पल्ली-पुरोहितों के अधिकारों और विशेषाधिकारों में हस्तक्षेप करे। यह योजना लन्दन और रोचेस्टर के धर्मप्रान्तों में बड़ी सफलता के साथ आज़माई जा चुकी है, और मुझे समझ नहीं आता कि जो मिडलसेक्स और सरे में सफल है, वह लंकाशायर में सफल क्यों न हो। मैं निष्पक्ष और न्यायपूर्वक चुनी हुई परिषद की सहायता के बिना ऐसी योजना को चलाने का प्रयास कभी न करूँगा। किसी भी पल्ली-पुरोहित के अधिकारों में हस्तक्षेप करने, या योजना को उस पर थोपने का विचार तक मैं कभी न करूँगा। आपमें से बहुतों को स्मरण होगा कि यह विचार हमारे दूसरे धर्मप्रान्तीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था और उसे कोई समर्थन नहीं मिला। परन्तु उस सम्मेलन की तिथि से लेकर अब तक मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा जो मेरी राय बदले। जिन बुराइयों पर हम शोक करते हैं, उनसे निपटने का कोई बेहतर साधन किसी ने नहीं सुझाया; और मैं आज फिर कहता हूँ, चाहे इस विषय में मैं अकेला ही रह जाऊँ, कि इस महान नगर की धार्मिक जनगणना सुधारने का मुझे इससे अधिक निश्चित कोई मार्ग नहीं दिखता। एक बात तो निश्चित है। इस योजना का व्यय कलीसिया-भवन बनाने के प्रयास की अपेक्षा कहीं कम होगा। लिवरपूल में एक नया कलीसिया-भवन, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, £10,000 में बनता है। ऊपर वर्णित प्रकार के किसी भौगोलिक जिले में कार्य करने के लिए एक पवित्रशास्त्र-पाठक और एक बाइबल-स्त्री सहित एक मिशनरी सहायक पादरी £400 प्रतिवर्ष में मिल सकता है। और यदि हमें उचित प्रकार के मिशनरी सहायक पादरी मिल जाएँ, तो लगभग £2,000 के व्यय के बाद पाँच वर्ष के अन्त तक अनेक जिले आत्मनिर्भर हो जाएँगे। मैं अपने पादरी-वर्ग से गम्भीरता से आग्रह करता हूँ कि इस विषय को ईमानदारी से देखें। मैं अन्तिम बार केवल अपनी सोची-समझी प्रतीति घोषित कर सकता हूँ कि उचित प्रकार के जीवित सेवकों की संख्या बढ़ाए बिना और आक्रामक सुसमाचार-प्रचार की संगठित व्यवस्था के बिना, आप लिवरपूल की धार्मिक जनगणना को सुधरते हुए कभी न देखेंगे, और हमारे धर्मप्रान्त की बड़ी कमियाँ दूर न होंगी। और यदि विरोधी आलोचक यह स्मरण रखें कि पृथ्वी का कोई अध्यक्ष बूढ़े पल्ली-पुरोहितों को जवान, रोगी पल्ली-पुरोहितों को बलवान, या निर्धन पल्ली-पुरोहितों को धनी नहीं बना सकता, और न थके-हारे पल्ली-पुरोहितों के लिए पेंशन जुटा सकता है, तो शायद लिवरपूल में इंग्लैंड की कलीसिया की स्थिति के विषय में कम प्रतिकूल टिप्पणियाँ की जाएँगी।
(2) अब मुझे एक और बात का उल्लेख करना है जो मुझे काफी चिन्ता में डालती है। मेरा संकेत हमारी सुप्रसिद्ध धर्मप्रान्तीय संस्थाओं की आर्थिक दशा की ओर है। उन्हें इस समय वह सहायता नहीं मिल रही जिसकी वे अधिकारी हैं, और वे बहुत शिथिल दशा में हैं। निस्सन्देह, मुझे आपको यह स्मरण कराने की आवश्यकता नहीं कि इनमें से पाँच संस्थाएँ किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं। उनका उद्देश्य ऐसे केन्द्रीय स्रोत होना है जहाँ कलीसिया-भवन निर्माण, कलीसिया-सहायता या शिक्षा को बढ़ावा देने की इच्छा रखनेवाला कोई भी व्यक्ति आवेदन करके अनुदान पा सके। इन संस्थाओं का संविधान बड़ी सावधानी और अत्यन्त सराहनीय परिश्रम से बनाया गया था। जो समितियाँ इनका प्रबन्ध करती हैं, वे मेरे विश्वास के अनुसार निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और भली-भाँति चुनी हुई हैं। परन्तु धर्मप्रान्त के चन्दे और दान जितने होने चाहिए, उससे कहीं कम हैं, और वास्तव में उस क्षेत्र के अनुरूप नहीं हैं जिसमें हम रहते हैं। मैं यह विषय अपने सब पादरी-वर्ग के ध्यान में सौंपता हूँ। मुझे लगता है कि यदि हर पल्ली-पुरोहित प्रतिवर्ष अपने पल्लीवासियों के सामने इन संस्थाओं के दावों को अधिक गम्भीरता से रखे, तो और अधिक किया जा सकता है। परन्तु अनेक स्थानों में धर्मप्रान्तीय कामों के लिए धन पल्ली के बाहर भेजने के प्रति स्पष्ट अनिच्छा है, और यह साफ़ है कि हम अभी एक धर्मप्रान्त के रूप में नहीं, बल्कि स्वतन्त्र मण्डलियों के एक समूह के रूप में कार्य करते हैं। किसी भी दशा में सुधार की बहुत गुंजाइश है, और मुझे आशा है कि समय बीतने पर हमारी विभिन्न धर्मप्रान्तीय संस्थाओं के लेखा-विवरण बहुत भिन्न रूप धारण करेंगे।
फिर भी एक बात को सावधानी से स्मरण रखना चाहिए। हमारी धर्मप्रान्तीय संस्थाओं के चन्दों और अंशदानों को इस बात का पूरा लेखा नहीं समझना चाहिए कि लिवरपूल धर्मप्रान्त में कलीसिया के उद्देश्यों के लिए कलीसिया के सदस्यों ने कुल कितना धन दिया है। ऐसा सोचना हास्यास्पद होगा। लिवरपूल के धर्माध्यक्षीय पद की स्थापना के बाद के इन चार वर्षों में, हमारे धर्माधिकरण-न्यायालय में पुरानी या वर्तमान कलीसियाओं की मरम्मत, परिवर्तन, सुधार या विस्तार के लिए कम से कम 77 अनुमति-पत्र दिए गए हैं, जिन पर कुल मिलाकर कम से कम £38,137 का व्यय हुआ। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि मेरी पहली निरीक्षण-यात्रा के बाद के इन तीन वर्षों में इस धर्मप्रान्त में कलीसिया-भवनों के निर्माण, कलीसिया-भवनों के विस्तार, पाठशालाओं के कक्षों और मिशन-कक्षों पर खर्च की गई राशि £145,385 की बड़ी रकम है; और इन्हीं तीन वर्षों में स्थानीय कलीसियाओं की दान-संस्थाओं, धर्मप्रान्तीय संस्थाओं तथा देश और विदेश के मिशनों के लिए कम से कम £98,770 का दान दिया गया है। और यह सब केवल 187 कलीसिया-पदों वाले धर्मप्रान्त में तीन वर्ष के भीतर किया गया है! (देखिए परिशिष्ट, अध्याय 3।)
मेरे विचार से यह बात व्यापक रूप से ज्ञात होनी चाहिए, क्योंकि इस विषय में बहुत बड़ी मात्रा में गलत प्रचार हो रहा है, और अमित्र आलोचक यह कहना पसन्द करते हैं कि 1880 में धर्माध्यक्षीय पद की स्थापना के बाद से लिवरपूल धर्मप्रान्त ने कुछ नहीं किया । परन्तु तथ्य बहुत हठीली वस्तुएँ होते हैं, और जिस तथ्य का मैंने अभी उल्लेख किया है, वह ऐसा है जो सबको ज्ञात होना चाहिए। वह अपनी गवाही आप देता है। निस्सन्देह हम उससे कम करते हैं जितना कर सकते हैं, और उससे भी कम जितना हमें करना चाहिए। परन्तु जब सहायक पादरियों, पवित्रशास्त्र-पाठकों और बाइबल-स्त्रियों के लिए, संयम, पवित्रता और शिक्षा के उद्देश्य के लिए, कलीसिया-भवनों और पाठशाला-भवनों के निर्माण के लिए, दान और परोपकार के कार्यों के लिए, नाविकों के लिए, अनाथों के लिए और सुधार-गृहों के लिए जुटाई गई कुल राशि का हिसाब लगाया जाएगा—मैं कहता हूँ, जब कुल राशि जोड़ी जाएगी—तब यह कहना किसी भी प्रकार उचित न होगा कि लिवरपूल धर्मप्रान्त कुछ भी नहीं करता।
(3) धर्मप्रान्त की विशेष रुचि का अन्तिम विषय, जिसके बारे में आप स्वाभाविक रूप से मुझसे कुछ सुनने की आशा करेंगे, लिवरपूल के लिए प्रस्तावित नया प्रधान गिरजाघर है, और मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि यह एक कठिन और कष्टदायक विषय है। आपको स्मरण होगा कि यह विषय दो वर्ष से औपचारिक रूप से हाथ में लिया गया है। हमारे दूसरे धर्मप्रान्तीय सम्मेलन में लगभग सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ था कि ‘लिवरपूल में एक प्रधान गिरजाघर अवश्य होना चाहिए।’ उस प्रस्ताव के पारित होने को दो वर्ष बीत चुके हैं, और चूँकि प्रधान गिरजाघर की नींव का पत्थर अभी तक नहीं रखा गया है, इसलिए दूर रहनेवाले लोग शायद यह समझें कि बात छोड़ दी गई है और कुछ नहीं किया गया। इससे अधिक सत्य से दूर कोई धारणा नहीं हो सकती। कलीसिया के प्रमुख सदस्यों की एक समिति ने इस विषय को हाथ में लिया, इस पर विचार-विमर्श किया और अत्यन्त सावधानी से इसकी जाँच की है। उस समिति की कितनी बैठकें हुई हैं और इस विषय पर कितनी चिन्तापूर्ण चर्चा हुई है, यह मैं बताने का प्रयत्न नहीं करूँगा। बाहर की जनता को इसके बारे में बहुत कम जानकारी है। वस्तुतः बहुत कम लोगों ने उस भारी कठिनाई को समझा और अनुभव किया है जो समिति के कार्य के आरम्भ में ही उसके सामने आ खड़ी हुई थी। वह कठिनाई स्थल के चुनाव की थी। लिवरपूल जैसे बड़े नगर में एक विशाल नए कलीसिया-भवन के लिए उचित स्थान खोजना ऐसी समस्या है जो संसार के सबसे चतुर लोगों के समूह को भी उलझा दे, और निर्णय पर पहुँचने में हुई देरी पर किसी को आश्चर्य करने का अधिकार नहीं है। लिवरपूल के हृदय-स्थल में भूमि का मूल्य इतना अधिक है और खुले स्थान इतने कम हैं कि निर्णय करना अत्यन्त कठिन रहा है। सीधी सच्चाई यह है कि एक भी ऐसा स्थल नहीं मिल सका जिस पर अत्यन्त गम्भीर आपत्तियाँ न हों; और समिति अधिक से अधिक यही आशा कर सकती थी कि वह ऐसा स्थल ढूँढ़ ले जो सबसे कम आपत्तिजनक हो और जिसके पक्ष में सबसे अधिक बातें हों। जिस स्थल को समिति के बहुमत ने अन्त में चुना, अर्थात् सेंट जॉर्ज हॉल के पीछे सेंट जॉन के कब्रिस्तान का स्थल, वह निस्सन्देह पूर्ण स्थल नहीं है। उसके दोष बताना सरल है। परन्तु इससे अच्छा स्थल कहाँ मिल सकता है, सिवाय इसके कि भवनों को खरीदने और भूमि साफ़ करने पर इतना व्यय किया जाए जिसकी कल्पना भी भयावह है? यह निश्चित है कि ऐसा कोई उपलब्ध स्थल नहीं बताया जा सकता जो तीनों रेलवे स्टेशनों के इतना निकट हो और इस कारण धर्मप्रान्त के हर भाग से पहुँच के भीतर हो; ऐसा कोई स्थल नहीं जो डेल स्ट्रीट, कैसल स्ट्रीट, बोल्ड स्ट्रीट, टाउन हॉल, एक्सचेंज, क्लबों, होटलों और भीड़-भाड़ के सब प्रमुख स्थानों के इतना निकट हो; और ऐसा कोई स्थल नहीं जिसके आनेवाले सब समयों के लिए लिवरपूल का केन्द्र बने रहने की इतनी सम्भावना हो। जहाँ तक साम्राज्य के दूसरे सबसे बड़े नगर के योग्य भवन के निर्माण के लिए इस स्थल की क्षमता का प्रश्न है, उसके बारे में अपनी ओर से कोई राय देने का साहस मैं नहीं करूँगा। मैं केवल इतना कहूँगा कि इस काल के सबसे अनुभवी वास्तुकारों में से एक ने इसे ऐसा ही घोषित किया है।
इस प्रकार के मामलों में यह आशा करना सर्वथा व्यर्थ है कि सब लोग एक मन के होंगे, चाहे हम इसकी कितनी ही इच्छा क्यों न करें; और यदि हम पूर्ण सहमति की प्रतीक्षा करें, तो नया गिरजाघर कभी बनेगा ही नहीं। इस समय मैं केवल अपना यह विश्वास प्रकट कर सकता हूँ कि समिति ने कटु आलोचना के बीच भी ईमानदारी से वही किया है जो वह कर सकती थी, और मुझे विश्वास है कि वह दिन आएगा जब जनता उनके साथ न्याय करेगी। देरी निस्सन्देह बहुत लग सकती है, और कुछ लोग अधीर होकर त्रूरो के गिरजाघर की ओर संकेत कर सकते हैं, जो इस वर्ष बहुत से पंचांगों के मुखपृष्ठ पर दिखाई देता है। परन्तु लोग सचमुच यह भूल जाते प्रतीत होते हैं कि त्रूरो और लिवरपूल में इसके सिवा कि दोनों एक धर्म-प्रदेश के प्रमुख नगर हैं, ज़रा भी समानता नहीं है। लिवरपूल में जो कठिनाइयाँ पाई जाती हैं वे त्रूरो में नहीं हैं, जो एक छोटा नगर है और जिसकी कुल जनसंख्या लिवरपूल के कई बड़े पल्लियों की जनसंख्या से भी कम है, जबकि त्रूरो का सारा धर्म-प्रदेश कलीसियाओं से इतना भली-भाँति सम्पन्न है कि नई कलीसिया बनाने की आवश्यकता बहुत कम है, और धर्म-प्रदेश का सारा ध्यान गिरजाघर पर केन्द्रित किया जा सकता है।
हमारे नए गिरजाघर की लागत कितनी होगी, यह इस समय बताना असम्भव है। समिति की ओर से कोई विशेष राशि निर्धारित करके प्रतिस्पर्धी वास्तुकारों को बाँधने की ज़रा भी इच्छा नहीं है। मुझे निश्चय है कि समिति के प्रत्येक सदस्य की एकमात्र प्रबल इच्छा यही रही है कि जो सबसे उत्तम और सबसे सुन्दर गिरजाघर बनाया जा सके, वही प्राप्त हो। यह बेनामी आरोप, जो बहुत बार लगाया गया है, कि मैं या समिति का कोई भी सदस्य एक साधारण बड़े पल्ली-गिरजे से बढ़कर किसी चीज़ से सन्तुष्ट होने का विचार रखता है, इतना निराधार है कि मैं उस पर ध्यान देना भी उचित नहीं समझता। हमारे अनुभवी सलाहकार ने हमें स्पष्ट रूप से आश्वासन दिया है कि सेंट जॉन के कब्रिस्तान में इतना स्थान है कि वहाँ सब व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए पर्याप्त बड़ा गिरजाघर बनाया जा सकता है, और वह इंग्लैंड के कुछ सबसे पुराने और सर्वोत्तम गिरजाघरों जितना बड़ा होगा। मेरा अनुमान है कि कोई भी ऐसा गिरजाघर बनाना नहीं चाहेगा जिसके एक छोर पर विशाल निरर्थक मरियम-प्रार्थनालय हो या दूसरे छोर पर गलील-द्वार हो, और वह सेंट पॉल, यॉर्क मिन्स्टर, लिंकन, विनचेस्टर या सेंट आल्बन्स जितना लम्बा हो।
यह मैं नहीं कह सकता कि हमारे नए गिरजाघर को बनाने और उसके निर्वाह के लिए जो धन चाहिए, वह तुरन्त मिल जाएगा या नहीं। इसमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लिवरपूल में ऐसे परिवार हैं जिन्होंने पिछले पचास वर्षों में इतना धन कमाया है कि वे सरलता से £100,000 दे सकते हैं और उन्हें उसका अभाव भी खटकेगा नहीं। यह मसीही उदारता का और सब धन के देनेवाले के प्रति उचित कृतज्ञता का एक उत्कृष्ट उदाहरण होगा, यदि लिवरपूल का कोई साधारण विश्वासी आगे आए, जैसे श्री गिनेस सेंट पैट्रिक के लिए और श्री रो डबलिन के क्राइस्ट चर्च के लिए आगे आए थे, और बर्फ़ तोड़कर किसी भव्य दान से होड़ की भावना जगाए। परन्तु मैं सारा काम उसके हाथ में छोड़कर पूर्णतः सन्तुष्ट हूँ जिसके वश में सब हृदय हैं। यदि हम गिरजाघर चाहते हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि काम आरम्भ करें, और यदि हम उसे पूरा होते देखने को जीवित न रहें, तो यह विश्वास रखें कि हमारे बाद आनेवाले उस पर शिखर-पत्थर रखेंगे। इस समय, यदि हमारे पास कोई बहुत भव्य गिरजाघर नहीं है, तो हमारे पास एक उत्तम गिरजाघर-आराधना अवश्य है, और ऐसी जिस पर धर्म-प्रदेश को लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। इसके लिए, मैं कहना उचित और न्यायसंगत समझता हूँ, हम लिवरपूल के रेक्टर की देखभाल और परिश्रम के बहुत ऋणी हैं। मैं केवल यह चाहता हूँ कि धर्म-प्रदेश के कलीसिया-जन यह समझें कि हमारी गिरजाघर-आराधना पूर्णतः स्वैच्छिक दान पर निर्भर है, और उसके निर्वाह के लिए अधिक उदारता से चन्दा दें।
2. केवल धर्म-प्रदेश के हित के विषयों से अब मैं कहीं अधिक व्यापक विषय की ओर मुड़ता हूँ, अर्थात् इंग्लैंड की कलीसिया की सामान्य दशा। हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारा धर्म-प्रदेश एक महान समुदाय का केवल एक अंश है, और प्रत्येक कलीसिया-जन के लिए उचित है कि वह उस महान समुदाय की सामान्य दशा में रुचि ले जिसका वह सदस्य है।
इंग्लैंड की कलीसिया की वर्तमान दशा में निस्सन्देह ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके लिए हमारे पास अत्यन्त धन्यवादी होने का कारण है। उत्साह, ऊर्जा, सक्रियता और कार्य की ऐसी बड़ी मात्रा है जो सौ वर्ष पहले नहीं थी। लालफ़ीताशाही की बेड़ियाँ टूटी हुई प्रतीत होती हैं, और कलीसिया को अब ‘प्रतिष्ठा के कारण मर जाने’ या जंग खा जाने का भय नहीं है। नए धर्म-प्रदेशों का निर्माण, जो अब भी चल रहा है; हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या के सब वर्गों की आत्मिक, नैतिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने की सामान्य इच्छा; हमारी आराधनाओं की व्यवस्था में अधिक लचीलापन लाने का व्यापक प्रयत्न; पादरियों और साधारण जनों की यह जागी हुई तत्परता कि वे मिलें, परामर्श करें और स्वीकृत बुराइयों को दूर करने के सर्वोत्तम उपायों पर विचार करें; पिछले चालीस वर्षों में कलीसियाओं के निर्माण और जीर्णोद्धार के लिए दिया गया अपार धन; और बची हुई वस्तुओं को दृढ़ करने तथा जिनकी कमी है उनकी पूर्ति करने की सार्वभौमिक इच्छा—ये सब बातें, मैं कहता हूँ, निर्विवाद तथ्य हैं, और चाहे इस ऊर्जा का बहुत सा अंश कितना ही ग़लत दिशा में क्यों न हो, हमें धन्यवादी होना चाहिए। आलस्य, सुस्ती और नींद से कुछ भी अच्छा है। निःशब्दता और निश्चलता मृत्यु के लक्षण हैं। अपने सब दोषों और कमियों के होते हुए भी हमारी कलीसिया तुलनात्मक रूप से जागी हुई है।
यह सब कहते हुए मैं ग़लत न समझा जाऊँ। मैं खुलकर मानता हूँ कि आज के दिन राजकीय कलीसिया के क्षितिज पर बहुत से असन्तोषजनक बिन्दु हैं, और कुछ नहीं, बहुत से काले बादल हैं। मैं संक्षेप में बताऊँगा कि मेरा क्या तात्पर्य है।
(1) एक काला बादल यह है कि हमारे बीच कलीसिया के लोगों का एक दल निरन्तर बना हुआ है, जो — यदि शब्दों का कोई अर्थ है तो — इंग्लैंड की कलीसिया को रोमी रंग में रंगने, धर्म-सुधार से पीछे लौट जाने, हमारी सहभागिता में मिस्सा और पापस्वीकार की प्रथा को फिर से लाने, और एक शब्द में कहें तो हमारी कलीसिया में उलट-फेर करने पर तुला हुआ प्रतीत होता है। मैं 'तुला हुआ प्रतीत होता है' ये शब्द सोच-समझकर कहता हूँ। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि इस दल के सदस्य सदा इससे इनकार करते हैं कि उनका ऐसा कोई अभिप्राय है जैसा मैंने वर्णन किया है। यदि ऐसा है, तो मैं केवल यही कह सकता हूँ कि समाचार-पत्रों में उनके मुखपत्र जिस भाषा का निरन्तर प्रयोग करते हैं, उसके कारण वे बड़े ही अभागे हैं। जिस आन्दोलन का मैं उल्लेख कर रहा हूँ, वह कभी सफल होगा, इसकी मुझे एक क्षण के लिए भी आशा नहीं है; मैं नहीं मानता कि इंग्लैंड के लोग कभी स्थापित कलीसिया को रोम की ओर लौट जाने देंगे। परन्तु मैं यह अवश्य मानता हूँ कि जब तक जिस रोमी रंग चढ़ानेवाले आन्दोलन की मैं बात कर रहा हूँ, उसे हमारी सीमा के भीतर के सब निष्ठावान दलों के संयमी लोगों के सक्रिय सहयोग से रोका नहीं जाता, तब तक अन्ततः वही फूट और स्थापना की समाप्ति का कारण बनेगा। सबसे बढ़कर, मैं मानता हूँ कि जब तक साधारण विश्वासियों को यह समझाया नहीं जा सकता कि न्यायालयों के सामने जिन बातों पर विवाद हुआ है, वे केवल सजावट, पोशाक, संगीत और अलंकरण जैसे छोटे-मोटे प्रश्न नहीं हैं, बल्कि कलीसिया के प्रोटेस्टेंट सिद्धान्तों को उलट देने और रोमी मत के कुछ अत्यन्त संकटपूर्ण सिद्धान्तों को फिर से लाने के प्रयास हैं, तब तक यदि कुछ ही वर्षों में इंग्लैंड की सारी कलीसिया टुकड़े-टुकड़े हो जाए तो उन्हें चकित नहीं होना चाहिए। विवादित प्रश्नों की अत्यन्त गम्भीरता को समझने में साधारण विश्वासियों की यह स्पष्ट असमर्थता, और उन्हें केवल रुचि के प्रश्न मानकर हल्के में लेने की सामान्य प्रवृत्ति, मेरे विचार में हमारे समय के सबसे चिन्ताजनक लक्षणों में से एक है।
