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चिन्तकों के लिए विचार
लिवरपूल का सोलहवाँ धर्माध्यक्षीय सम्मेलन, सेंट जॉर्ज हॉल में
2 नवम्बर, 1897.
आदरणीय पादरी भाइयो और सामान्य विश्वासी भाइयो, मैं आपका हमारे सोलहवें धर्माध्यक्षीय सम्मेलन में हार्दिक स्वागत करता हूँ, और सदस्यों की इतनी बड़ी उपस्थिति देखकर मुझे प्रसन्नता है। साथ ही मुझे सच्चाई से कहना होगा कि मैं चाहता कि उपस्थिति और भी अधिक होती। इस समय इस धर्मप्रान्त के आधे पादरी भी इन महत्त्वपूर्ण वार्षिक सभाओं में कभी उपस्थित नहीं होते, और जो सामान्य विश्वासी हमारे निमंत्रणों को स्वीकार करते हैं और हमारी कार्यवाही में कोई रुचि दिखाते हैं, उनका अनुपात दुःखद रूप से बहुत कम है। यह स्वस्थ स्थिति नहीं है; परन्तु मुझे भय है कि देश के हर धर्मप्रान्त में यही हाल है। इस बात में प्रेस्बिटेरियन और वेस्लियन लोग हमसे बहुत आगे निकल गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो इंग्लैंड की कलीसिया आधी भी जागी हुई नहीं है।
(1) हमारे अपने धर्मप्रान्त का वार्षिक इतिहास शायद ही कभी बहुत घटनापूर्ण होता है। हमारी कृपालु और प्रिय साम्राज्ञी, महारानी विक्टोरिया की हीरक जयन्ती ने स्वाभाविक रूप से 1897 की अन्य सब घटनाओं को ढक लिया है और सब लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। फिर भी पिछले बारह महीनों में दो बातें हुई हैं जो विशेष उल्लेख के योग्य हैं।
इनमें से एक बात है लिवरपूल सिटी चर्चेज़ एक्ट का संसद में सफलतापूर्वक पारित होना। जब मैं पहली बार आपका धर्माध्यक्ष बना था, तब इस नगर के सांसद स्वर्गीय श्री व्हिटली ने इस अधिनियम का महत्त्व मुझ पर ज़ोर देकर बताया था। 16 वर्ष बाद यह अधिनियम प्राप्त हुआ है, और लिवरपूल के नौ पुराने गिरजाघर अब नगर निगम से मिलनेवाली वार्षिक राशि पर निर्भर रहने से सदा के लिए मुक्त हो गए हैं, और इसके बदले उन्हें कलीसियाई आयुक्तों से एक निश्चित आय प्राप्त होगी। इस अत्यन्त वांछनीय उद्देश्य के लिए नगरपालिका संस्था ने नौ वृत्तियों के अनुदान, तथा संरक्षकों और अधिकारियों के निहित हितों के बदले में, एकमुश्त £95,000 की राशि दी है। दो गिरजाघर, सेंट जॉर्ज और सेंट जॉन, गिराए जाएँगे, और हमें आशा है कि कम से कम दो अन्य गिरजाघर बनाने के लिए पर्याप्त धन जुटाया जाएगा। जिन शर्तों पर यह पूरा प्रबन्ध किया गया है, उनकी बहुत सावधानी से गणना की गई थी, और मेरे विचार में वे न्यायसंगत और उचित हैं। मेरा विश्वास है कि इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लेन-देन के किसी भी पक्ष को शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है; और मुझे निश्चय है कि सारा परिणाम उपयोगी होगा और शान्ति का कारण बनेगा।
(2) पिछले बारह महीनों के धर्मप्रान्त-इतिहास की दूसरी असाधारण घटना लिवरपूल धर्मप्रान्त के लिए एक चर्च हाउस की महत्त्वाकांक्षी योजना का आरम्भ होना है। मेरे धर्माध्यक्षीय कार्यकाल के आरम्भ में हमारे नए धर्मप्रान्त के योग्य एक गिरजाघर (कैथेड्रल) बनाने का जो असफल प्रयास हुआ, और इस विषय पर टाउन हॉल में हुई अनेक थकाऊ समिति-बैठकें, अब पुराने इतिहास की बातें हो गई हैं, और बहुत से लोग उनसे पूरी तरह अनजान प्रतीत होते हैं। मैं अवसर पाकर कहता हूँ कि मैं उन सभी बैठकों में उपस्थित था, और यह आम निन्दात्मक चर्चा कि धर्माध्यक्ष को इस विषय में कोई रुचि नहीं थी और वह नहीं चाहता था कि कैथेड्रल बने, सत्य के एक कण से भी रहित है। परन्तु उन समिति-बैठकों ने अन्ततः मुझे कायल कर दिया कि कैथेड्रल के स्थान के विषय में लिवरपूल के निवासियों के बीच सहमति की कोई आशा नहीं थी, और इस पीढ़ी में धर्मप्रान्त द्वारा एक उपयुक्त महानगरीय गिरजाघर के निर्माण और अनुदान के लिए पाँच लाख की राशि जुटाए जाने की ज़रा भी सम्भावना नहीं थी। उसी समय से मैंने चर्च हाउस के निर्माण को आगे बढ़ाने का निश्चय किया, और बुरे दिनों के कारण हुई लम्बी देरी के बाद, मैं इसकी नींव पड़ते देखने तक जीवित रहा हूँ। ऐसी संस्था की बड़ी उपयोगिता के विषय में मुझे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, और मुझे इसमें कभी कोई सन्देह नहीं रहा। यह इंग्लैंड की कलीसिया को ऐसे अनेक प्रकार से दृढ़ करेगा जिनका वर्णन मुझे आज करने की आवश्यकता नहीं; यह एकता को बढ़ाएगा, पादरियों को एक साथ लाएगा, और हर प्रकार के धर्मप्रान्त-कार्य को सुगम बनाएगा। मैं इस योजना को मिली स्वीकृति और बड़े पैमाने के सहयोग के लिए, तथा लॉर्ड स्ट्रीट में प्राप्त किए गए उत्तम स्थान के लिए, बहुत धन्यवादी हूँ। परन्तु मुझे आपको ज़ोर देकर स्मरण दिलाना चाहिए कि चर्च हाउस बनने से पहले अभी बहुत अधिक धन की आवश्यकता होगी, और मुझे स्पष्ट स्वीकार करना होगा कि अपनी इस बढ़ी हुई आयु में मुझे यह आशा कम ही है कि मैं कभी उसकी दीवारों के भीतर बैठ पाऊँगा। कलीसिया के कार्यों के लिए धन इस धर्मप्रान्त में इतनी आसानी से नहीं जुटाया जा सकता जितना इंग्लैंड के अन्य भागों के रहनेवाले समझते हैं। परन्तु मैं निराश नहीं हूँ।
(3) हमारी स्थापित कलीसिया से सम्बन्धित सामान्य रुचि की जो बातें पिछले वर्ष में सामने आई हैं, उनमें दो प्रमुख बातें हैं जो आपके ध्यान की माँग करती हैं।
इनमें से एक शिक्षा अधिनियम (1896) है, जो संसद में लम्बी और थका देनेवाली चर्चा के बाद अब देश का कानून बन गया है। इस अधिनियम के विषय में आप सब ने बहुत सुन लिया है, शायद आवश्यकता से अधिक, इसलिए मैं इस पर केवल थोड़ी-सी संक्षिप्त बातें कहूँगा। यह एक मित्रवत् सरकार का सद्भावनापूर्ण प्रयास है कि वह अभावग्रस्त स्वैच्छिक विद्यालयों की सहायता प्रति विद्यार्थी चार शिलिंग के एक नए अतिरिक्त अनुदान से करे; और यह प्रयास उस निरर्थक, अनावश्यक और कृतघ्न उपाय, अर्थात् निःशुल्क शिक्षा अधिनियम, के कारण आवश्यक हो गया था। यह अनुदान मुख्यतः निर्धन विद्यालयों को दिया जाना है, और इसका प्रबन्ध सारे देश के विद्यालयों के संगठित संघों या समितियों द्वारा किया जाना है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के निर्धन बोर्ड विद्यालय भी इसके लाभ में भागी होंगे। यह अधिनियम अच्छा चलेगा या नहीं, यह अभी सिद्ध होना है; पर उच्च स्तरों पर इसे केवल ‘परीक्षणात्मक’ कहा जाना ही स्पष्ट दिखाता है कि कुछ कठिनाइयों की आशंका है। मुझे इस पर आश्चर्य नहीं होता। जब तक मानव स्वभाव जैसा है वैसा बना है, मुझे आशा नहीं कि ‘संघ’ का सिद्धान्त कभी लोकप्रिय होगा। मेरी केवल यही आशा है कि हमारे अपने धर्मप्रान्त में कम से कम मतभेद हो, और विद्यालयों के प्रबन्धक स्मरण रखें कि इस संसार में हम सदा सब कुछ अपनी ही इच्छा के अनुसार नहीं पा सकते, और सब ओर से कुछ मात्रा में रियायत और समझौता सहना ही पड़ता है। यूरोप की छः महाशक्तियों के बड़े-बड़े राजनेताओं को भी यूनान और तुर्की के विषय में सुगमता से मिलकर काम करना सरल नहीं लगा, इसलिए यदि हमें आरम्भ में लंकाशायर में शिक्षा-सम्बन्धी कुछ घर्षण दिखाई दे तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। फिर भी मुझे भरोसा है कि इस नए अधिनियम के विषय में सब समिति-सभाओं और चर्चाओं में प्रकाश अधिकतम और ताप न्यूनतम रहेगा।
(4) इंग्लैंड की कलीसिया को प्रभावित करनेवाली दूसरी बड़ी घटना, जो पिछले बारह महीनों में सामने आई, लैम्बेथ सम्मेलन है, अर्थात् संसार के प्रत्येक भाग से आए ऐंग्लिकन सहभागिता के अध्यक्षों की दशवार्षिक सभा। इसके विषय में मैं बहुत कम कहूँगा, क्योंकि मैं वहाँ उपस्थित नहीं था; एक कष्टदायक सर्दी और चिकित्सक की सलाह के कारण, जिसकी उपेक्षा 81 वर्ष की आयु में कोई अध्यक्ष नहीं कर सकता। मुझे कार्यवाही का कुछ पता नहीं, क्योंकि वह सब निजी रूप से और बन्द कमरे में हुई। पर विचार-विमर्श के परिणाम ‘ख्रीष्टीय ज्ञान समिति’ द्वारा प्रकाशित किए गए हैं, और कोई भी उन्हें पढ़ सकता है। जिन विषयों पर चर्चा हुई, या सम्मेलन की विभिन्न समितियों ने जो निष्कर्ष प्रस्तुत किए, या अन्तिम महान परिपत्र के विरुद्ध मुझे कुछ नहीं कहना है। वे सब न्यूनाधिक शिक्षाप्रद पठन-सामग्री हैं, अच्छी हैं, और जहाँ तक वे जाती हैं, उपयोगी हैं। पर मैं एक सामान्य मत प्रकट किए बिना नहीं रह सकता। मुझे गहरा खेद है कि लैम्बेथ सम्मेलन ने आज के इंग्लैंड की कलीसिया की ‘दुःखद फूटों’ को, सिद्धान्त और विधि-विधान दोनों के विषय में, पूरी तरह अनदेखा करके छोड़ दिया। ये फूटें धर्म-सुधार के कार्य को मिटा देने की धमकी देती हैं, स्थापित कलीसिया को धीरे-धीरे दो भिन्न दलों में चीर रही हैं, और परिवारों, पल्लियों और मण्डलियों की शान्ति नष्ट कर रही हैं। इसमें सन्देह नहीं कि इन फूटों के विषय में सम्मेलन की सावधान मौन-नीति ने बहुत झंझट बचाया, असुविधाजनक टकरावों को रोका, और कार्य को सुचारु रखा। पर इस महासभा के संचालकों के प्रति पूरे आदर के साथ मैं एक अध्यक्ष की हैसियत से यह कहे बिना नहीं रह सकता कि मेरी राय में यह ‘मौन’ की नीति वास्तव में बुद्धिमानी की नहीं थी। जब मैं देखता हूँ कि कर्ण-स्वीकारोक्ति, मरियम-पूजा और रोमी मिस्सा की नकलों की सहन की गई वृद्धि से इंग्लैंड की कलीसिया को निरन्तर कितनी भारी हानि पहुँच रही है, तो मुझे लगता है कि जिस मौन का मैंने उल्लेख किया वह हानि करेगा, और निश्चय ही एकता को बढ़ावा नहीं देगा। 1878 की लैम्बेथ महासभा के ‘आधिकारिक पत्र’ में ऐसा कोई ‘मौन’ नहीं था, और मुझे नहीं लगता कि हम अब अधिक स्वस्थ दशा में हैं। मेरा विश्वास है कि कलीसिया के सच्चे मित्रों को हमारी फूटों के विषय में कम से कम खेद की कुछ अभिव्यक्ति की आशा करने का अधिकार था, और मैं समझता हूँ कि स्थापित कलीसिया की संकटपूर्ण दशा के विषय में किसी भी मत-प्रकटन का स्पष्ट अभाव बहुत पीड़ा और निराशा उत्पन्न करेगा। हमारी कलीसिया की वर्तमान दशा में एकता के लिए बार-बार दोहराई जानेवाली पुकार समय की बर्बादी लगती है, और मेथोडिस्टों या प्रेस्बिटेरियनों के साथ पुनर्मिलन असम्भव प्रतीत होता है। इंग्लैंड के प्रोटेस्टेंट असहमत लोग ऐसी कलीसिया में कभी सम्मिलित नहीं होंगे जो हमारी अपनी कलीसिया की तरह इतनी गम्भीर रूप से बँटी हुई हो; और मुझे इस पर आश्चर्य नहीं। मेरा विश्वास है कि वे शान्ति के लिए बहुत कुछ निगल लेंगे; पर मैं नहीं मानता कि वे याजकवाद को निगलेंगे।
मैं इस नाज़ुक और अप्रिय विषय से हटकर कुछ अन्य बातों की ओर मुड़ता हूँ, जो मुझे आज के समय में आपके विचारशील ध्यान की माँग करती प्रतीत होती हैं। मैं ‘विचारशील’ शब्द ज़ोर देकर और जानबूझकर कहता हूँ। हमारे जैसे धर्मप्रान्तीय सम्मेलन के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होता, और मुझे प्रसन्नता है कि नहीं होता। पर यदि इसे किसी काम का होना है तो इसे लोगों के मन को झकझोरना और उन्हें सोचने पर लगाना चाहिए। विचार ही कर्म की जननी है, और यदि हम प्रति वर्ष कलीसिया-जनों के मन की घड़ी में चाबी भर सकें, और उन्हें कलीसिया और धर्मप्रान्त को प्रभावित करनेवाली बातों के विषय में, जितना वे अब सोचते हैं उससे कुछ अधिक सोचने के लिए घर भेज सकें, तो हम उनकी भलाई करेंगे, और हमारा मिलना व्यर्थ न होगा।
(5) अपनी अध्यक्षीय सेवकाई के बीते 16 वर्षों पर दृष्टि डालने पर मुझे धन्यवाद के अनेक कारण दिखाई देते हैं; परन्तु एक गम्भीर अपवाद भी दिखाई देता है। धन्यवाद की ओर से मैं कई बातों का नाम लूँगा। वॉल्टन विकरेज अधिनियम, जिसने लिवरपूल के अध्यक्षीय क्षेत्र को अन्य अध्यक्षीय क्षेत्रों के समान स्तर पर ला खड़ा किया; 'टर्नर पेंशन निधि', जो एक मसीही महिला की राजसी उदारता से स्थापित हुई; हमारी धर्मप्रान्तीय निर्वाह निधि की सफल प्रगति; नगर कलीसिया अधिनियम; 42 नई कलीसियाओं का निर्माण और प्रतिष्ठा, और 48 अनुज्ञप्त मिशन-कक्षों का आरम्भ; पदधारियों, सहायक पादरियों और दृढ़ीकरण-संस्कारों की संख्या में बड़ी वृद्धि; और अन्त में, पर कम महत्त्व का नहीं, धर्मप्रान्तीय कलीसिया-भवन का आशाजनक आरम्भ—ये सब हमारे धर्मप्रान्त के पिछले इतिहास के उजले बिन्दु हैं। मैंने अपनी अध्यक्षीय सेवकाई 170 पदधारियों के साथ आरम्भ की थी; अब 205 हैं। मैंने 120 सहायक पादरियों के साथ आरम्भ की थी; अब 220 हैं। पहले वर्ष में दृढ़ीकरण के लिए मेरे सामने 4,500 युवा प्रस्तुत किए गए थे। 1896 में 8,300 प्रस्तुत हुए। यदि मैं इन अनपेक्षित दयाओं के लिए प्रतिदिन परमेश्वर का धन्यवाद न करूँ तो मैं बड़ा कृतघ्न ठहरूँगा।
परन्तु हमारे धर्मप्रान्त की वर्तमान स्थिति में एक असन्तोषजनक बात है, जिसकी ओर मैं आप सब का गम्भीर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक समझता हूँ। मेरा संकेत हमारी धर्मप्रान्तीय संस्थाओं की आर्थिक दशा की ओर है। 1880 में जब धर्मप्रान्त की स्थापना हुई, तब इनकी कुल वार्षिक आय £1,900 थी। उस वर्ष से यह प्रतिवर्ष घटती और गिरती गई है, और अब केवल £900 रह गई है। सीधे शब्दों में, धर्मप्रान्त 1897 में कलीसिया-भवन निर्माण, कलीसिया-सहायता, धर्मदान-वृद्धि और शिक्षा की समितियों को उसका आधा ही देता है जितना 1880 में देता था। यह दशा ऐसी नहीं होनी चाहिए। धर्मप्रान्त इसलिए अस्तित्व में नहीं लाया जाता कि वह अलग-अलग स्वतन्त्र पल्लियों का संग्रह हो, परन्तु इसलिए कि वह कलीसिया के सदस्यों का एक संगठित समुदाय हो, जो अध्यक्षीय क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं के भीतर इंग्लैंड की कलीसिया को एक सामूहिक इकाई के रूप में हर प्रकार से सम्भालने और सारे समुदाय के भले के लिए धर्मप्रान्तीय संस्थाओं को बनाए रखने का दायित्व उठाए। इस समय हम ऐसा करने में सर्वथा विफल हैं। वर्ष-प्रतिवर्ष पल्ली-चन्दे घटते जा रहे हैं, और बहुत-सी पल्लियों में तो कोई चन्दा होता ही नहीं। यह मुझे अच्छा नहीं लगता, यद्यपि मैं जानता हूँ कि धर्मप्रान्तीय संस्थाओं को जो धन दिया जाता है, वह धर्मप्रान्त में कलीसिया के कार्यों के लिए दिए गए कुल धन को कदापि प्रकट नहीं करता। फिर भी मैं इसे उचित नहीं मान सकता; और धर्मप्रान्त के पादरी-वर्ग और सामान्य विश्वासियों का ध्यान इस ओर दिलाना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ।
यदि धर्मप्रान्तीय संस्थाएँ रखना बुरी बात है, और हर पल्ली को केवल अपनी ही चिन्ता करनी है और अपने पड़ोसियों के विषय में कहना है, 'क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?', तो मैं चाहूँगा कि लोग साफ़-साफ़ यही कह दें। परन्तु यदि हर धर्मप्रान्त के लिए कलीसिया-निर्माण, कलीसिया-सहायता या शिक्षा के लिए एक साझा निधि रखना बुद्धिमानी और विवेक की बात है, जिसके लिए सहायता चाहनेवाला कोई भी पादरी आवेदन कर सके, और जिससे सबल लोग निर्बलों की सहायता कर सकें, तो मैं नहीं समझता कि हमारा धर्मप्रान्त अपना कर्तव्य निभा रहा है। मैं इस सारे विषय को सम्मेलन के गम्भीर विचार के लिए सौंपता हूँ। इसमें परिवर्तन होना चाहिए। जिस गति से बातें चल रही हैं, उसमें हम शीघ्र ही तली तक पहुँच जाएँगे, और हमें सार्वजनिक सूचना देनी पड़ेगी कि अब कोई साझा धर्मप्रान्तीय निधि नहीं बची जिससे अनुदान दिए जा सकें, और कि हमारे धर्मप्रान्त की जिन पल्लियों को सहायता चाहिए, उन्हें आगे से अपना प्रबन्ध स्वयं करना होगा। मुझे आशा है कि मुझे इस सम्मेलन को यह बताने की आवश्यकता नहीं कि कोई भी धर्मप्रान्तीय संस्था न होना हमारे नए अध्यक्षीय क्षेत्र के लिए प्रतिष्ठा की बात नहीं होगी, और हमें एक अपवादपूर्ण स्थिति में डाल देगा। सीधी सच्चाई यह है कि जो पुराने मित्र चले गए, उनका स्थान लेने के लिए हमें और नए चन्दा देनेवाले चाहिए। मुझे भरोसा है कि बहुत-से लोग हमारी सहायता के लिए आगे आएँगे।
(6) अब मैं धर्मप्रान्तीय संस्थाओं के अपेक्षाकृत फीके विषय से हटकर कहीं अधिक सार्वजनिक महत्त्व की बात की ओर आता हूँ। मेरा संकेत कलीसिया-सुधार की ओर है। यह ऐसा विषय है जो प्रतिवर्ष अधिकाधिक सामने आता जा रहा है, और उन सब का सावधान ध्यान माँगता है जो इंग्लैंड की कलीसिया से सचमुच प्रेम रखते हैं और उसे स्वस्थ और सबल बनाए रखना चाहते हैं। यह कहना व्यर्थ है, और अब बहुत देर हो चुकी है, कि किसी सुधार की आवश्यकता नहीं और पुराने अच्छे जहाज़ को मरम्मत की कोई ज़रूरत नहीं। मनुष्य के बनाए सब प्राचीन यन्त्रों और उपकरणों में घिस जाने और बिगड़ने की प्रवृत्ति होती है, और नियमतः सब में सुधार की गुंजाइश रहती है। इस सार्वभौमिक नियम से हमारी राजकीय कलीसिया भी अपने को मुक्त होने का दावा नहीं कर सकती।
यह विषय हर वर्ष किसी न किसी रूप में बार-बार उठता रहता है, चाहे हमें अच्छा लगे या न लगे। पिछले अधिवेशन का 'बेनिफिस बिल', कैंटरबरी और यॉर्क के प्रत्येक प्रान्त में 'सामान्यजन-सभा' का अपेक्षाकृत हाल ही में गठन, और पद रिक्त होने पर नए सेवक के चुनाव में कुछ अधिकार पाने की कलीसियाओं की बढ़ती माँगें—ये सब बातें स्पष्ट दिखाती हैं कि 'कलीसिया-सुधार' की हवा चल रही है। आज मैं हमारे सम्मेलन के सदस्यों के मन में यह बात बैठाना चाहता हूँ कि इस पर गम्भीरता से विचार करना और जहाँ तक सम्भव हो अपना मन बना लेना नितान्त आवश्यक है। शिक्षा देश का स्वरूप बदल रही है, और सब श्रेणियों और वर्गों के सामान्यजन अब अनपढ़ कठपुतलियाँ नहीं रहे, वे स्वयं सोचते हैं। इस युग में कलीसिया के लोगों से यह कहना कि चुपचाप बैठे रहो, आँखें बन्द रखो, अध्यक्षों पर भरोसा रखो, और उन्हीं तन्त्रों और व्यवस्थाओं से सन्तुष्ट रहो जिनसे हमारे दादा-परदादा सन्तुष्ट थे, उतना ही निरर्थक है जितना गार्ड्स सैनिकों को जिब्राल्टर की रखवाली के लिए भेजकर उन्हें चकमक बन्दूकों या लम्बे धनुषों से लैस करना। नहीं! मेरे भाइयो, 'कलीसिया-सुधार' निश्चय ही आएगा। उसके ऊपरी पाल अभी से क्षितिज पर दिख रहे हैं, और शीघ्र ही वह हमारे बगल में आ पहुँचेगा। यदि हम नहीं चाहते कि हमारी प्रिय पुरानी कलीसिया राज्य से पृथक कर दी जाए, तो हमें जब तक समय है अपना घर ठीक कर लेना चाहिए, और ध्यान से विचार करना चाहिए कि वास्तव में क्या चाहिए। क्या व्यावहारिक है और क्या अव्यावहारिक? क्या सम्भव है और क्या असम्भव? किससे भलाई होगी और किससे हानि? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका हमें सामना करना चाहिए और जिनके उत्तर के लिए तैयार रहना चाहिए।
आपको यह बताना अनावश्यक है कि कलीसिया-सुधार एक बहुत व्यापक विषय है, और कलीसिया तथा राज्य के सम्बन्ध के कारण अत्यन्त जटिल हो गया है। फिर भी इसकी कुछ शाखाएँ मुझे बिलकुल पहुँच के भीतर दिखती हैं, और यदि कलीसिया के लोग केवल जाग उठें और उन्हें हाथ में लें, तो मुझे विश्वास है कि कोई भी संसद उन्हें स्वीकृति देने से इनकार नहीं करेगी। (i) हमें पदों की बिक्री के विषय में सुधार चाहिए। यह दुहाई देने योग्य कलंक है कि आत्माओं की आत्मिक देखभाल भेड़ों के झुण्ड या सूअरों के बच्चों की तरह खरीद-बिक्री का विषय बने, और जितनी शीघ्र यह सारी प्रथा अवैध घोषित की जाए उतना ही कलीसिया के लिए अच्छा होगा। (ii) हमें अपने कलीसियाई न्यायालयों में सुधार चाहिए, झूठे सिद्धान्त और अनैतिकता, दोनों प्रकार के मामलों में। इस समय उनकी कार्य-विधि खर्चीली, बोझिल, थकाऊ और विलम्बकारी है, और उनके दण्ड अत्यन्त असन्तोषजनक हैं। किसी पादरी को झूठा सिद्धान्त रखने के कारण कारागार में डालना अन्धकार-युग में लौट जाना है।
(iii) हमें रिक्त पदों पर नियुक्ति के विषय में अध्यक्षों के अधिकार के सम्बन्ध में सुधार चाहिए। इस समय किसी अध्यक्ष को ऐसे किसी भी प्रस्तुत पदधारी को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है जो कुछ वैधानिक अपेक्षाएँ पूरी करता हो, चाहे उसे भीतर से विश्वास हो कि वह व्यक्ति मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक रूप से उस पद के योग्य नहीं है जिसे वह भरना चाहता है। मैं जानता हूँ कि अंग्रेज़ अध्यक्ष रोम के अध्यक्ष से अधिक अचूक नहीं हैं। परन्तु उन्हें कुछ विवेकाधिकार तो होना ही चाहिए।
(iv) हमें इस विषय में सुधार चाहिए कि गाँव की कलीसिया की सभाओं की रीति के विषय में और रिक्त पदों के लिए सेवकों के चुनाव के विषय में सामान्यजन की बात किसी रूप में सुनी जाए। मैं खुले मन से मानता हूँ कि यह बहुत कठिन और नाजुक प्रश्न है, और मुझे सन्देह है कि जो सामान्यजन इसे उठाते हैं वे यह समझते भी हैं कि इसमें क्या-क्या निहित है। क्या कोई चाहता है कि प्रत्येक करदाता और ग्रामवासी को नए पदधारी के लिए मत देने का अधिकार हो? मैं यह विश्वास नहीं कर सकता। क्या चुनाव उन पर छोड़ा जाए जो कलीसिया में आते हैं, या केवल उन पर जो प्रभु-भोज में सहभागी होते हैं? ये ऐसी गाँठें हैं जिन्हें खोलना सरल नहीं, और मैं इन्हें उन भले लोगों के गम्भीर विचार के लिए सौंपता हूँ जो किसी पद के रिक्त होते ही समाचारपत्रों को लिखने के शौकीन हैं। यदि आप मण्डली की राय को कोई अधिकार देते हैं, तो उसे किसी बुद्धिमान और सावधानी से चुनी हुई समिति के द्वारा ही व्यक्त होना चाहिए।
(v) हमें कलीसिया के सारे संरक्षण-अधिकार (पेट्रोनेज) के विषय में सुधार चाहिए। मैं खुले मन से मानता हूँ कि इसका उल्लेख मैं बड़ी झिझक के साथ कर रहा हूँ। इस समय विद्यमान व्यापक विविधता वाली प्रणाली के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। राजमुकुट, अध्यक्ष, लॉर्ड चांसलर, महाविद्यालय, नगर-संघ, गिरजाघरों के मण्डल, निजी संरक्षक, न्यासियों के निकाय—सब लगातार रिक्त पद भरते रहते हैं, और निःसन्देह सब लगातार भूलें भी करते रहते हैं। परन्तु मुझे पूरा विश्वास नहीं कि पुरानी प्रणाली में बहुत सुधार हो सकता है। उसमें दोष निकालना उसे सुधारने से अधिक सरल है। सब संरक्षकों को हटाकर और उनके अधिकार छीनकर, आयरलैंड की कलीसिया की तरह धर्मप्रान्तीय संरक्षण-मण्डल स्थापित करना बहुतों को इस समस्या का उचित हल लगता है। परन्तु मैं सन्तुष्ट नहीं हो सकता कि वह अच्छी तरह काम करेगा। ऐसे मण्डल तभी बन सकते हैं जब उनमें कलीसिया के सब विचार-पक्षों के प्रतिनिधि रखे जाएँ। उनकी नियुक्तियाँ आपस में बहुत समझौता करके और निरन्तर एक-दूसरे के लिए झुककर ही हो सकेंगी। सारा परिणाम यह होगा कि ज्योति और नेतृत्व रखनेवाले बलवान, सामर्थी पुरुषों को सामान्यतः शान्ति के नाम पर छोड़ दिया जाएगा, और सहमति पाने के लिए कोई निश्चित मत न रखनेवाले फीके-फुसफुसे लोगों को प्राथमिकता मिलेगी। मुझे अत्यन्त सन्देह है कि ऐसे धर्मप्रान्तीय मण्डल वर्तमान प्रणाली से अच्छा काम करेंगे। कम से कम मुझे उन पर कोई दृढ़ भरोसा नहीं। मेरा विश्वास है कि वे धीरे-धीरे धर्मप्रान्तों को ऐसे दब्बू, दलहीन, बेरंग लोगों से भर देंगे जिनके पास न बुद्धि है, न दाँत, न पंजे, जिनका किसी भी विषय पर कोई स्पष्ट मत नहीं, और जो कोई भलाई नहीं करेंगे। फिर भी, जब तक कलीसिया और राज्य का मेल बना रहता है, वर्तमान प्रणाली के त्यागे जाने की कोई सम्भावना नहीं; और पदों की बिक्री का निषेध उसकी आधी हानि को रोक देगा।
(6) अन्तिम, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, जिस सुधार की आवश्यकता है वह है महासभा (कन्वोकेशन) का सुधार। निस्सन्देह मुझे आपको यह स्मरण दिलाने की आवश्यकता नहीं कि डीनों और अध्याय-सभाओं के प्रतिनिधित्व की तुलना में पल्ली के पादरियों का प्रतिनिधित्व अत्यन्त त्रुटिपूर्ण और असन्तोषजनक है। कैन्टरबरी के निचले सदन में यह साधारण तथ्य ही कि सारे लन्दन का प्रतिनिधित्व केवल दो प्रॉक्टर करते हैं, एक स्पष्ट कलंक है। जिस सुधार की सचमुच आवश्यकता है वह है दोनों सदनों में सामान्य विश्वासियों का प्रवेश। मैं यह नहीं भूला हूँ कि कैन्टरबरी और यॉर्क के लिए 'सामान्य जनों के सदन' अस्तित्व में लाए गए हैं। मैं इसे भूला नहीं हूँ, परन्तु मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि ये सदन हमारे समय की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, या देश में उनका कोई विशेष प्रभाव है। हमें चुने हुए, योग्य, निर्वाचित, प्रतिनिधि सामान्य जन चाहिए, जो पादरियों के साथ उसी सदन में बैठें, उनके सब वाद-विवादों में भाग लें, और सब विषयों में बराबरी के स्तर पर उनसे मिलें। जब तक हमारी कलीसिया की सभा की कार्यवाही में सामान्य जनों को उचित स्थान, वाणी और मत का अधिकार नहीं मिलता, मुझे विश्वास है कि महासभा को देश का पूरा भरोसा कभी प्राप्त न होगा, और थोड़े ही अंग्रेज़ उसके वाद-विवादों की चिन्ता करेंगे। ऐसी सुधरी हुई महासभा को विधायी अधिकार तो निश्चय ही नहीं होने चाहिए। इंग्लैंड दो संसदें सहन नहीं करेगा। परन्तु यदि महासभा की सम्मतियाँ और इच्छाएँ ऐसी संस्था से संसद के पास पहुँचें जिसमें पादरियों के साथ योग्य सामान्य जन भी हों, तो मुझे निश्चय है कि कॉमन्स सभा में उन पर अब की अपेक्षा कहीं अधिक आदरपूर्वक ध्यान दिया जाएगा। यह प्रयोग उपनिवेशों में और अमेरिका की एपिस्कोपल कलीसिया में सफलतापूर्वक किया जा चुका है, और मैं नहीं देखता कि यहाँ क्यों सफल न होगा। जो भी हो, मैं इसके परिणामों से नहीं डरता। मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी भी मिली-जुली महासभा में सबसे संयमी, रूढ़िवादी और सतर्क भाग सामान्य जनों का ही होगा। मैंने बहुत विश्वसनीय सूत्र से सुना है कि ऑस्ट्रेलिया में निश्चय ही ऐसा पाया गया है। कलीसिया-सुधार के इस विस्तृत विषय को मैं यहीं छोड़ता हूँ। इसकी कुछ शाखाएँ ऐसी हैं जिन पर मैं चर्चा करना अस्वीकार करता हूँ, क्योंकि वे मुझे सर्वथा अव्यावहारिक लगती हैं। मुझे आशा नहीं कि सहायक पादरियों का संघ लोगों को यह मनवा लेगा कि पदोन्नति का अधिकार वरदानों या अनुग्रह की अपेक्षा वरिष्ठता को है। उपासना-पद्धति के संशोधन के विषय में, जो कुछ उत्साही लोगों की प्रिय योजना है, मैं कुछ नहीं कहूँगा। जब तक हमारे 'दुःखद मतभेद' बने हैं, मुझे कोई सम्भावना नहीं दिखती कि हमारी आदरणीय प्रार्थना-पुस्तक सुधार की भट्टी में डाली जाएगी, विशेषकर तब जब कुछ लोग धर्म-सुधार से भी पीछे जाना, घड़ी की सुइयाँ उलटी घुमाना, और एडवर्ड षष्ठ की पहली प्रार्थना-पुस्तक पर लौट जाना चाहते हैं। इसलिए मैं उस विषय की चर्चा में आपका समय नष्ट नहीं करूँगा। मुझे विश्वास नहीं कि पादरियों की आर्थिक दशा सब बड़ी वृत्तियों को छीनकर और बाँटकर, और उस लूट में से हर पादरी को सब जगह एक-सी, केवल 250 पाउंड वार्षिक की आय देकर कभी सुधारी जा सकेगी; इससे तो सब पादरी मिलकर कंगाल हो जाएँगे। मैं नहीं समझता कि हर पदाधिकारी के पद को चुनाव का विषय बनाना, और हर अध्यक्ष-पद, महाधर्माध्यक्षीय पद, ग्रामीण डीनपद, डीनपद और कैनन-पद को धर्मप्रदेश में प्रतिस्पर्धा और मतदान के लिए खोल देना ठीक होगा। ऐसे हवाई महलों को आप मुझे अकेला छोड़ने की अनुमति देंगे, जब तक कि वे धरती पर पाँव न टिका लें।
सारा विषय कठिनाइयों से भरा है, और मुझे सन्देह है कि आप में से बहुतेरे उन 'घटियों' को सुधरते हुए देखने के लिए जीवित रहेंगे, जब तक कि कोई बड़ी राजनीतिक क्रान्ति न हो जाए। कलीसिया का काम प्रसिद्ध रूप से धीमा काम है। यह सर्वविदित है कि कॉमन्स सभा कलीसिया के विषयों से तंग किया जाना पसन्द नहीं करती, और सांसारिक कामों से दबी हुई है। लॉर्ड्स और कॉमन्स में ऐसे पुरुषों का भयंकर अभाव है जिनकी सदन सुनता हो और जो कलीसिया-सुधार को हाथ में लेने के लिए तैयार और इच्छुक हों। यदि मैं जॉन ब्राइट या रिचर्ड कॉब्डेन के स्तर का कोई कलीसिया-हितैषी पुरुष देखता, जो वाक्पटुता, बुद्धि, सामर्थ्य और दृढ़ता के साथ आगे आकर अपनी बात सुनवा लेता, तो मैं अधिक आशावान होता। अभी तो मैं ऐसे पुरुषों को व्यर्थ ढूँढ़ता हूँ। फिर भी, मैं यह नहीं भूल सकता कि वह दल अब भी जीवित है जिसने हाल ही में वेल्स में कलीसिया को राज्य से पृथक् करने का सोचा-समझा प्रयत्न किया था, और अगला चुनाव सारी राजनीतिक स्थिति को बदल सकता है और कलीसिया के लोगों को कठोर रीति से जगा सकता है। इस बीच मैं लोगों को सोचने पर लगाना चाहता हूँ। देर-सवेर कलीसिया-सुधार आएगा, और मैं केवल यही आशा करता हूँ कि वह ऐसी कलीसिया के पास न आए जो राज्य से पृथक् होकर खण्डहर हो चुकी हो। वेल्स का अभियान स्पष्ट कथा सुनाता है। वह हमें पुकारता है कि जब तक हम कर सकते हैं और जब तक हमें अवसर है, अपनी कलीसिया में सुधार करें। जैसा कि रुडयार्ड किपलिंग अपने भव्य हीरक जयन्ती भजन में कहते हैं: 'कहीं हम भूल न जाएँ; कहीं हम भूल न जाएँ।' (7) अब मुझे इस लम्बे भाषण को एक अत्यन्त अस्वस्थ और पीड़ादायक लक्षण के विषय में कुछ टिप्पणियों के साथ समाप्त करना है, जो मुझे उस युग की पहचान लगता है जिसमें हम जी रहे हैं। मैं जिस लक्षण की ओर संकेत कर रहा हूँ वह है धर्म के विशिष्ट सिद्धान्तों और मतों के प्रति बढ़ती हुई उदासीनता, जो देश के हर भाग में दिखती है। मैं बल देकर कहता हूँ: धार्मिक उदासीनता का बढ़ना।
यह कहते हुए मैं आप से विनती करता हूँ कि मेरा आशय गलत न समझें। मेरे मन में लन्दन और हमारे बड़े नगरों के वे विशाल जनसमूह नहीं हैं जो कहीं आराधना नहीं करते और जिनमें कोई धर्म दिखाई ही नहीं देता। मैं उन असंख्य लोगों की बात कर रहा हूँ जो इस युग में हमारी सब कलीसियाओं में पाए जाते हैं, जो प्रभु-भोज में सम्मिलित नहीं होते, और जीवित धर्म में कभी कोई रुचि नहीं दिखाते। मैं यह नहीं भूलता कि मनुष्य स्वभाव से एक दीन पतित प्राणी है। मैं यह आशा नहीं रखता कि जो अपने आप को मसीही कहते और मानते हैं वे सब स्वर्गदूत हों। परन्तु मैं अपना यह विश्वास घोषित करता हूँ कि उदासीनता के इस सम्प्रदाय का आकार और उसकी तीव्र वृद्धि उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त के समय के सबसे ख़तरनाक चिह्नों में से एक है। इस सम्प्रदाय के लोगों की बहुत बड़ी संख्या विश्वास और मसीह के उद्देश्य के खुले विरोधी नहीं हैं; वे बस चुपचाप बैठे रहते हैं और घर में या विदेश में धर्म के लिए कुछ नहीं करते। किसी भी भले पादरी से, जो अपने पल्ली में काम करता है, अपने लोगों से भेंट करता है और उनके चरित्र को जानता है, पूछिए कि उसे सबसे बड़ी कठिनाई किस से जूझना पड़ता है? मुझे निश्चय है कि वह आप से कहेगा कि वह न रोमी मत है, न अति कर्मकाण्डवाद, न राज्य-अधीन कलीसियावाद, न उदार कलीसियावाद, न योजनाबद्ध संशयवाद, न कोई अन्य 'वाद', परन्तु किसी भी प्रकार के धर्म के विषय में अधमरी, सुस्त उदासीनता है। (i) आप जिस ख़तरे की बात मैं कर रहा हूँ उसे पिछले पचास वर्षों में रोमी मत के विषय में जनभावना के अत्यन्त बदले हुए स्वर में देख सकते हैं। पोप-मत के प्रति अब वह सामान्य घृणा और विरोध नहीं रहा जो कभी इस राज्य में लगभग सार्वभौमिक था। प्रोटेस्टेंट मत के विषय में पुरानी ब्रिटिश भावना की धार कुण्ठित और मन्द प्रतीत होती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे सब धार्मिक विवादों से थक चुके हैं और शान्ति के लिए परमेश्वर के सत्य का बलिदान करने को तैयार हैं। कुछ रोमी मत को अंग्रेज़ी धर्म के अनेक रूपों में से केवल एक मानते हैं, जो न औरों से बुरा है न अच्छा। कुछ हमें मनाने का यत्न करते हैं कि रोमी मत बदल गया है और अब उतना बुरा नहीं रहा जितना पहले था। कुछ निडर होकर प्रोटेस्टेंटों के दोष गिनाते हैं और ऊँचे स्वर में कहते हैं कि रोमी मतावलम्बी हमारे ही समान भले हैं। और फिर भी वे दो महान ऐतिहासिक तथ्य,
(1) कि चार सौ वर्ष पहले इंग्लैंड में पोप-मत के अधीन अज्ञानता, अनैतिकता और अन्धविश्वास का बोलबाला था, (2) कि धर्म-सुधार वह सबसे बड़ी आशीष थी जो परमेश्वर ने इस देश को कभी दी—ये दोनों ऐसे तथ्य हैं जिन पर पचास वर्ष पहले पोप के अनुयायी को छोड़ कोई विवाद करने की सोचता भी न था! आज के दिन, हाय, इन्हें भूल जाना सुविधाजनक और प्रचलित हो गया है!
इसमें सन्देह नहीं कि जनभावना के इस बदले हुए स्वर को इंग्लैंड की कलीसिया के एक अतिवादी दल की कार्यवाहियों से बहुत बढ़ावा मिला है, जिसने धीरे-धीरे लोगों को रोमी मत के हर विशिष्ट सिद्धान्त और रीति से परिचित करा दिया है—वास्तविक उपस्थिति, मिस्सा, कानों-कान पाप-स्वीकार और याजकीय पापमोचन, सेवकाई का याजकीय स्वरूप, मठ-प्रणाली, और आराधना की नाटकीय, इन्द्रियसुखद, दिखावटी शैली। और स्वाभाविक परिणाम यह है कि बहुत से सीधे-सादे लोग इंग्लैंड की कलीसिया और रोम की कलीसिया में कोई बड़ा अन्तर नहीं देखते। हमारे युग की झूठी उदारता भावना की इस प्रतिक्रिया को और बढ़ाती है। अब यह कहना प्रचलित है कि सब सम्प्रदाय बराबर होने चाहिए, कि राज्य का धर्म से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए, कि सब मतों को समान आदर और कृपा से देखा जाए, और कि सब धर्मों के तल में, चाहे बौद्ध मत हो, मुहम्मदी मत हो या मसीही धर्म, साझा सत्य की एक नींव है! परिणाम यह है कि अनगिनत अज्ञानी लोग सोचने लगे हैं कि पोप के अनुयायियों की मान्यताओं में कुछ विशेष ख़तरनाक नहीं है, उतना ही जितना मेथोडिस्टों, स्वतन्त्र मण्डलियों, प्रेस्बिटेरियनों या बैपटिस्टों की मान्यताओं में, और कि हमें रोमी मत को अकेला छोड़ देना चाहिए, उसके पवित्रशास्त्र-विरोधी स्वरूप को कभी प्रकट नहीं करना चाहिए, और विवाद से बचना चाहिए। एक बात तो हर ध्यान से देखनेवाली आँख को स्पष्ट और प्रत्यक्ष है। कारण चाहे जो हो, इंग्लैंड में रोम की कलीसिया के विषय में जनभावना विचित्र रूप से बदल गई है, और यह हमारे समय का अत्यन्त कष्टदायक लक्षण है।
(ii) आप उस ख़तरे को इस व्यापक प्रवृत्ति में भी देख सकते हैं कि चतुराई और उत्साह को ही धर्म में रूढ़िवादिता की एकमात्र कसौटी बना लिया गया है। आजकल हज़ारों मसीही कहलानेवाले भिन्न बातों में अन्तर कर पाने में बिलकुल असमर्थ दिखाई देते हैं। यदि कोई प्रचारक या व्याख्याता केवल चतुर, वाक्पटु और उत्साही है, तो वे समझते हैं कि वह सही है, चाहे उसके उपदेश या व्याख्यान कितने ही विचित्र और बेमेल क्यों न हों। पोप-मत या प्रोटेस्टेंट मत, प्रायश्चित या कोई प्रायश्चित नहीं, व्यक्तित्वधारी पवित्र आत्मा या कोई पवित्र आत्मा नहीं, भावी दण्ड या कोई भावी दण्ड नहीं, उच्च कलीसियावाद या निम्न कलीसियावाद या उदार कलीसियावाद, त्रिएकतावाद, एरियसवाद या एकेश्वरवाद—यदि वह चतुर है तो इन लोगों को कुछ भी अटपटा नहीं लगता। वे सब निगल सकते हैं, चाहे पचा न सकें! वे सिद्धान्त को महत्त्वहीन समझते हैं और सोचते हैं कि सबका उद्धार होने वाला है और कोई नाश नहीं होने वाला। उनका धर्म नकारात्मक बातों से बना है; और उनके विषय में एकमात्र सकारात्मक बात यह है कि उन्हें स्पष्टता से चिढ़ है और वे सोचते हैं कि सब चरम, निश्चित और दृढ़ मत बहुत बुरे और बहुत ग़लत हैं। वे सब विवादित बातों को कूड़ा समझकर एक ओर कर देने में सन्तुष्ट हैं, और यदि आप उन पर अनिर्णय का आरोप लगाएँ तो वे कहेंगे, 'मैं विवाद को समझने का दावा नहीं करता; मैं विवादित बातों की जाँच करने से इन्कार करता हूँ। मेरा विचार है कि अन्त में सब एक ही है।' कौन नहीं जानता कि ऐसे लोग हर कहीं भरे पड़े हैं? और कौन नहीं जानता कि जो कोई इस दशा की निन्दा करता है और आग्रह करता है कि पादरी को अपनी कलीसिया के अनुच्छेदों के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, उसे संकीर्ण, दलबन्दी करनेवाला, अनुदार व्यक्ति समझा जाता है, जो उन्नीसवीं शताब्दी के सर्वथा अयोग्य है।
(3) आप फिर इस खतरे को उस माँग में देख सकते हैं जो बहुत से लोग ऊँचे स्वर में कर रहे हैं कि इंग्लैंड की कलीसिया की सीमा के भीतर सहनशीलता और सहिष्णुता की एक सामान्य नीति अपनाई जाए। हमें गम्भीरता से बताया जाता है कि ऐसी नीति ही 'वर्तमान संकट' का सच्चा उपचार है। हर पादरी को छूट होगी कि वह जो चाहे माने, सिखाए और करे। प्रभु-भोज की मेज़ पर उसकी रीतिपरक क्रियाओं के लिए या मंच से दिए गए उसके उपदेशों के लिए किसी से कभी कोई जवाब नहीं माँगा जाए। हर विचारधारा को, चाहे वह कितनी ही अतिवादी हो, सहन किया जाए। लिंकन के मुकदमे के बाद किसी भी न्यायालय में, चाहे धार्मिक हो या लौकिक, कोई अभियोग न चलाया जाए। "ऐंग्लिकन कलीसिया का आदर्श न्यायियों के दिनों का इस्राएल होना चाहिए, जब 'हर एक अपनी ही दृष्टि में जो ठीक था वही करता था।'" (न्यायियों 21:25)।
मेरे विचार में यह तथ्य ही कि जैसी भयानक नीति का मैंने वर्णन किया है वह बहुत से कलीसिया-जनों को स्वीकार्य लगती है, इंग्लैंड की कलीसिया के सबसे बड़े खतरों में से एक है, और उसके अपनाए जाने का केवल एक ही परिणाम हो सकता है। वह परिणाम अन्ततः फूट, बिखराव और राजकीय संरक्षण का अन्त होगा।
एक ही संगति के भीतर दो या तीन सर्वथा भिन्न कलीसियाएँ हो ही नहीं सकतीं। मुझे आश्चर्य होता है कि सार्वभौमिक सहनशीलता की इस प्रसिद्ध नीति के पक्षधर यह नहीं देखते कि इसका अवश्य ही यह अन्त होगा कि हमारी कलीसिया टुकड़े-टुकड़े हो जाएगी।
इसमें सन्देह नहीं कि पहली दृष्टि में सार्वभौमिक सहनशीलता की यह नीति बहुत लुभावनी लगती है। यह आज के समय के स्वभाव के अनुकूल है। शान्ति स्थापित करने और झगड़े रोकने का इससे अधिक सम्भावित उपाय और क्या होगा कि कलीसिया को एक प्रकार का नूह का जहाज़ घोषित कर दिया जाए, जिसके भीतर हर प्रकार का प्राणी, और हर मत और विश्वास-वचन सुरक्षित और निर्विघ्न रहे, और संगति की एकमात्र शर्त यह हो कि आप भीतर आने को तैयार हों और अपने पड़ोसी को अकेला छोड़ दें? फिर भी मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं बिलकुल नहीं समझ पाता कि सब अनुच्छेदों और विश्वास-वचनों को त्यागे बिना, सब हस्ताक्षरों को हटाए बिना, संक्षेप में इंग्लैंड की कलीसिया का सारा संविधान बदले बिना, इस नीति को कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है।
(4) अन्त में, उदासीनता का जो बढ़ता खतरा मैं बता रहा हूँ, उसे आप देश में सब्त के उल्लंघन की पीड़ादायक वृद्धि में देख सकते हैं। नगर में और देहात में, बेल्ग्रेविया में और बेथनल ग्रीन में, स्थिति एक जैसी है। रविवार को भरी हुई कलीसियाएँ अपवाद हैं, और आधी खाली कलीसियाएँ नियम। किसी भी बड़ी जनसंख्या की धार्मिक जनगणना यही कहानी कहती है। दस आज्ञाओं की चौथी आज्ञा मानो ठण्ड में अकेली छोड़ दी गई है और मरने को तैयार है। कुछ तो अविश्वास के फैलने से, जो प्रभु के दिन का पुराना शत्रु है; कुछ स्वतन्त्रता के रुग्ण प्रेम से और इससे कि हर कोई जो चाहे करे; कुछ इस युग की विशेषता, सुख-विलास के अतिशय प्रेम से; कुछ रेलगाड़ियों से सब्त के दिन यात्रा की जो सुविधाएँ मिली हैं, उनसे, जिनके विषय में हमारे पूर्वज कुछ नहीं जानते थे और उनके बिना भी भली-भाँति काम चलाते थे; कुछ एक कारण से और कुछ दूसरे कारण से, शैतान को इस समय प्रभु के दिन के विरुद्ध अपने प्रिय अभियान में उतनी सहायता मिल रही है जितनी धर्म-सुधार के बाद से कभी नहीं मिली। आप मेरा आशय उन निरन्तर प्रयासों में देख सकते हैं जो अब मनोरंजन के स्थानों, मत्स्यालयों, संग्रहालयों, चित्रशालाओं और ऐसे ही अन्य स्थानों को 'श्रमिक वर्गों को मनोरंजन उपलब्ध कराने' के लुभावने बहाने से खोलने के लिए किए जा रहे हैं।
मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि सब्त की उपेक्षा की यह स्पष्ट वृद्धि हमारे दिनों में जीवित धर्म के प्रति बढ़ती उदासीनता के सबसे बुरे लक्षणों में से एक है। प्रभु के दिन के पालन और सच्चे धर्म की उन्नति के बीच अटूट सम्बन्ध है। वॉल्टेयर ने बिलकुल ठीक कहा था कि जब तक वह रविवार को नष्ट न कर दे, तब तक वह मसीही धर्म को नष्ट करने में कभी सफल नहीं हो सकता। अँग्रेज़ इसे जानें या न जानें, उनका सब्त उनकी सबसे समृद्ध सम्पत्तियों में से एक रहा है, और संसार में उनकी स्थिति का महान रहस्य है। उसके विषय में वे प्रसिद्ध शब्द सच्चाई से कहे जा सकते हैं कि 'वह राष्ट्र की सस्ती सुरक्षा है।' (एडमंड बर्क: फ्रांसीसी क्रान्ति पर विचार।) यह अँग्रेज़ी रविवार ही है जिसने इंग्लैंड को वह बनाया है जो वह है। यह एक सीधा-सा तथ्य है कि जहाँ कहीं किसी कलीसिया में आत्मिक धर्म सशक्त और प्रबल होता है, वहाँ रविवार का सम्मान बढ़ता है, और जहाँ वह क्षीण होता है, वहाँ रविवार भली-भाँति नहीं मनाया जाता। एक शब्द में, रविवार हर तथाकथित मसीही राष्ट्र का वायुदाबमापी है। मुझे बताइए कि किसी देश में रविवार कैसे मनाया जाता है, और मैं बता दूँगा कि उस देश की कलीसिया कैसी है।
मैं इस विषय को यहीं छोड़ता हूँ, और एक दुखभरी टिप्पणी के साथ अपना सम्बोधन समाप्त करता हूँ। यदि खुला पाप, विलासिता, मतवालापन और संसार का प्रेम हज़ारों कलीसिया-जनों को बर्बाद कर रहे हैं, तो मुझे निश्चय है कि धर्म के विषय में पूर्ण उदासीनता दसों हज़ारों को बर्बाद कर रही है। अब क्या इस स्थिति का कोई उपचार नहीं? क्या इन अन्तिम दिनों में कलीसिया की इस भयंकर महामारी का कोई इलाज नहीं? कलीसिया के दलों के अन्तहीन संघर्ष के बीच, संस्कारों, सेवकाई और आराधना की रीतियों के विषय में थका देनेवाले, निष्फल विवादों के बीच, जो एकमात्र दल मुझे प्रतिवर्ष बढ़ता और फैलता दिखाई देता है, वह 'धार्मिक उदासीनता' का विशाल दल है। क्या इस दल की प्रगति को रोकने और हमारे सिय्योन को स्वास्थ्य लौटाने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता? मैं उत्तर देता हूँ: मेरे विचार में पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने के सिवा कुछ नहीं। और अधिक पाठशालाएँ और विश्वविद्यालय हमें ठीक नहीं करेंगे। वे सिरों को छूते हैं, हृदयों को नहीं। रोग आत्मिक है, इसलिए उपचार भी आत्मिक होना चाहिए। साफ़ शब्दों में, हमारे बीच पवित्र आत्मा की 'वास्तविक उपस्थिति' और अधिक होनी चाहिए। इसके लिए आइए हम सब प्रार्थना करें और अनुग्रह के सिंहासन को निरन्तर घेरे रहें।
मैं यह नहीं भूल सकता कि पहली चार शताब्दियों के आरम्भिक मसीहियों ने अपने सिद्धान्त से संसार को उलट-पुलट कर दिया, मूर्तिपूजकों के मन्दिरों को उनके आराधकों से खाली कर दिया, खूनी मल्लयुद्धों को बन्द करा दिया, यूनानी और रोमी दार्शनिकों को हक्का-बक्का कर दिया, स्त्रियों और बच्चों को एक नया स्थान दिलाया, और सारे यूरोप का नैतिक स्तर ऊँचा उठाया। फिर भी उनके पास हमारे ये बहुत-से लाभ न थे; न छपी हुई पुस्तकें, न बड़े गिरजाघर या भव्य कलीसियाएँ, न धार्मिक संस्थाएँ और न चन्दे की सूचियाँ! परन्तु उनके पास वह था जिसकी हममें सन् 1897 में कमी दिखाई देती है, अर्थात् उनके कार्य में, उनके प्रचार में, उनके चरित्र में और उनके जीवन में पवित्र आत्मा की वास्तविक उपस्थिति। यही उनकी सामर्थ्य का भेद था! उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हमारे बीच यही चाहिए: अधिक प्रार्थना, मसीह के साथ अधिक घनिष्ठ एकता, और पवित्र आत्मा परमेश्वर की अधिक वास्तविक उपस्थिति! इस देश के लिए कितना धन्य होता यदि देश के हर मसीही परिवार, हर पल्ली और हर मण्डली से प्रतिदिन यह पुकार उठती: ‘हे श्वास, चारों दिशाओं से आ, और इंग्लैण्ड की कलीसिया पर फूँक, कि वह अपने संकट को पहचानकर जाग उठे, अपनी बढ़ती हुई उदासीनता को झटक दे, अपने पहले कार्य करे और जीवित हो।’ हे भाइयो और पुरुषो, मैं एक बार फिर कहता हूँ, जिस औषधि की हमें सचमुच आवश्यकता है वह पवित्र आत्मा परमेश्वर की ‘वास्तविक उपस्थिति’ है। उसी उपस्थिति के लिए, जब हम इस सप्ताह के सम्मेलन से लौटें, तो आओ हम प्रार्थना करने और कभी प्रार्थना करना न छोड़ने का संकल्प करें।
उद्धारकर्ता की वाणी सुनो, प्रार्थना करो, भाइयो, प्रार्थना करो! क्या तुम उसके हृदय को आनन्दित करना चाहते हो?
प्रार्थना करो, भाइयो, प्रार्थना करो। पाप निरन्तर भय की माँग करता है, निर्बलता को बलवन्त का निकट रहना चाहिए;
जब तक तुम यहाँ संघर्ष करते हो,
प्रार्थना करो, भाइयो, प्रार्थना करो। (‘Hark, ‘tis the Watchman’s cry’ नामक भजन से उद्धृत, जो ‘The Revival’, 1859 में छपा था।)
