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जॉन चार्ल्स राइल (आगे)
नए धर्मप्रान्त के नाम पहला आरोप-पत्र, 19 अक्टूबर 1881।
यह लिवरपूल के सेंट पीटर के प्रो-कैथेड्रल में उनके प्रथम निरीक्षण-अवसर पर पढ़ा गया; विगन में दिए गए अगले आरोप-पत्र को छोड़कर, निरीक्षण-अवसरों के सभी आरोप-पत्र यहीं दिए गए थे।
मेरे आदरणीय पासबान और सामान्य विश्वासी भाइयो, आज हम एक ऐसे अवसर पर एकत्र हुए हैं जो बहुत रुचिकर और सचमुच गम्भीर है। यह एक नए अंग्रेज़ धर्मप्रान्त के पहले अध्यक्ष का प्रथम निरीक्षण-अवसर है। सब बातों के अन्त से पहले कितने निरीक्षण-अवसर होंगे और कितने अध्यक्षीय आरोप-पत्र पढ़े जाएँगे, यह कोई मनुष्य नहीं बता सकता। आइए हम प्रार्थना करें कि इस धर्मप्रान्त में सदा एक ऐसी तुरही मिले जो 'अनिश्चित स्वर' न दे, और एक ऐसा अध्यक्ष मिले जो इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के सच्चे हित को बढ़ाए।
मैं आपसे विनती करता हूँ कि यह मानें कि मैं अपनी निर्बलता और भूल-चूक की गहरी अनुभूति के साथ आपसे मिल रहा हूँ। मुझे अप्रत्याशित रूप से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और बहुत असाधारण स्वरूप वाले धर्मप्रान्त का प्रधान पासबान होने के लिए बुलाया गया है, ऐसा धर्मप्रान्त जिसके विषय में, पवित्रशास्त्र के शब्दों में, 'अभी बहुत देश बाकी है जिस पर अधिकार करना है।' (यहोशू 13:1) मैं तीव्रता से अनुभव करता हूँ कि आजकल एक अध्यक्ष से कितनी अपेक्षा की जाती है, और वास्तव में वह कितना कम कर सकता है; हमारे दुःखद मतभेदों से उसके पद की कठिनाइयाँ कितनी बढ़ गई हैं; और किसी भी अध्यक्ष के लिए कितना कठिन है कि वह अपना कर्तव्य निभाए और कुछ को निराश न करे तथा दूसरों को अप्रसन्न न करे। मैं दोहराता हूँ, ये सब बातें मैं बहुत तीव्रता से अनुभव करता हूँ। परन्तु मुझे निराश होने या हताश होने का कोई कारण नहीं दिखता। प्रार्थना, परिश्रम और यीशु मसीह पर विश्वास के साथ कुछ भी असम्भव नहीं। निःसन्देह लैंकाशायर में कलीसिया को बहुत कुछ करना है। परन्तु वह जो यहोशू और इस्राएलियों का प्रभु परमेश्वर था, जब उन्होंने यरदन पार करके कनान में प्रवेश किया, मरा नहीं, जीवित है। यदि हम पर उसकी आशीष है, और यदि अध्यक्ष, पासबानों और सामान्य विश्वासियों के बीच अच्छी समझ है, तो मेरा दृढ़ विश्वास है कि लिवरपूल के नए धर्मप्रान्त की स्थापना से बड़े परिणाम निकलेंगे, और थोड़े ही वर्षों में इंग्लैंड की कलीसिया इस काउंटी के वेस्ट डर्बी हंड्रेड में एक बहुत भिन्न और सुधरी हुई स्थिति में होगी।
हमारे जैसे नए धर्मप्रान्त में सही आँकड़े अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। जब तक हम अपनी स्थिति को भली-भाँति न समझें, तब तक 'जो वस्तुएँ घट रही हैं' उनका अनुमान हम कदापि नहीं लगा सकते। इसलिए अपने आरोप-पत्र के आरम्भ में ही मैं कुछ मोटे तथ्यों की ओर आपका ध्यान दिलाने के लिए क्षमा नहीं माँगता, जिन्हें याद रखना हमारे लिए भला होगा। लिवरपूल के धर्मप्रान्त की कुछ बहुत विशेष बातें हैं जो इसे देश के किसी भी अन्य धर्मप्रान्त से अलग करती हैं, और मैं उन्हें क्रम से आपके सामने रखने का प्रयत्न करूँगा।
(1) भौगोलिक दृष्टि से, हमारा धर्मप्रान्त ग्रेट ब्रिटेन में लंदन को छोड़कर किसी भी अन्य धर्मप्रान्त से कम भूमि-क्षेत्र को घेरता है। लंदन के धर्मप्रान्त में 1,81,000 एकड़ हैं, और लिवरपूल में 2,62,000। यह केवल लैंकेस्टर काउंटी का वेस्ट डर्बी हंड्रेड है, एक ऐसा क्षेत्र जो रेलमार्गों से इतनी भली-भाँति जुड़ा है कि लिवरपूल में रहनेवाला अध्यक्ष अपने धर्मप्रान्त की लगभग हर कलीसिया तक करीब एक घंटे में पहुँच सकता है।
(2) पिछली जनगणना के अनुसार हमारे धर्मप्रान्त की जनसंख्या 11,00,000 से थोड़ी ही कम है। नौ अंग्रेज़ धर्मप्रान्तों की गणना इससे बड़ी है: अर्थात् लंदन, विंचेस्टर, लिचफील्ड, रोचेस्टर, वर्सेस्टर, यॉर्क, डरहम और मैनचेस्टर। फिर भी लंदन को छोड़कर किसी में भी प्रति एकड़ जनसंख्या इतनी घनी और सटी हुई नहीं है। 11,00,000 में से अकेले लिवरपूल और उसके उपनगर कम से कम 6,50,000 गली-निवासी बनाते हैं। विगन और उसके उपनगर, वारिंग्टन, सेंट हेलेन्स, साउथपोर्ट, फ़ार्नवर्थ, विडनेस और गारस्टन कुल मिलाकर कम से कम 2,50,000 और देते हैं। सम्भवतः हमारे धर्मप्रान्त के 2,00,000 से अधिक निवासी नगरों के बाहर नहीं मिलेंगे। महारानी के अधिराज्य के शायद ही किसी भाग में पिछले दशक के दौरान जनसंख्या इतनी तेज़ी से बढ़ी हो, मुख्यतः श्रम की माँग के कारण और उस माँग को पूरा करने के लिए हुए परिणामी आप्रवासन के कारण।
(3) हमारी विशाल जनसंख्या की जातीयताएँ, पेशे और व्यवसाय विचित्र रूप से भिन्न-भिन्न हैं। शायद ग्रेट ब्रिटेन में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ आप वर्गों की ऐसी असाधारण विविधता देखें। स्वयं लिवरपूल में हमारे बन्दरगाहों और जहाज़रानी से जुड़े निवासियों का एक विशाल समुदाय है, और यूरोप महाद्वीप से अमेरिका की ओर जाने वाले प्रवासियों की निरन्तर धारा है। नगर के एक छोर पर धुआँ उगलते कारखाने और दयनीय निर्धनता है, और दो-तीन मील के भीतर सुन्दर गलियाँ और अपेक्षाकृत सम्पन्नता है। विगन, वारिंग्टन, सेंट हेलेन्स, विडनेस और इन स्थानों के आस-पास के क्षेत्रों में कोयले की खानों, लोहे की भट्टियों, सूती कपड़े के कारखानों, काँच और रसायन के कारखानों में काम करने वाले लोगों के झुण्ड हैं। ओर्म्सकर्क, सेफ़्टन, हेल और स्पीक के आस-पास आप उत्तम खेती देखेंगे। इंग्लैण्ड के शायद किसी भी भाग में आपको व्यवसायों की ऐसी विविधता नहीं मिलेगी, और सभी बेचैन सक्रियता के साथ किए जाते हैं। और अन्त में, पर महत्त्व में कम नहीं; किसी भी भाग में आपको महारानी की प्रजा का ऐसा मिश्रण नहीं मिलेगा। हमारे धर्मप्रान्त के 11,00,000 निवासियों में से यह मानने का कारण है कि कम से कम 2,00,000 आयरिश और 50,000 वेल्श हैं। स्कॉटलैण्ड के लोगों की संख्या का मैंने कोई अनुमान नहीं सुना। परन्तु यदि लंकाशायर और यॉर्कशायर के इस महान व्यापारिक बन्दरगाह जैसे व्यस्त और समृद्ध समुदाय में स्कॉटलैण्ड का तत्त्व बहुत बड़ी मात्रा में उपस्थित न हो, तो मैं बहुत बड़ी भूल में हूँ। (4) इंग्लैण्ड की कलीसिया ने अब तक हमारे धर्मप्रान्त के 11,00,000 निवासियों के लिए जो आत्मिक व्यवस्था की है, वह दुःखद रूप से अपर्याप्त प्रतीत होती है। इस विषय को छूते समय मैं स्पष्ट रूप से समझा देना चाहता हूँ कि हमारे गैर-अनुरूपतावादी भाइयों द्वारा किए गए अच्छे कार्य की मैं उपेक्षा नहीं करता। लिवरपूल में मसीह के कार्य के लिए उन्होंने जो सेवा की है, उसे मैं धन्यवाद के साथ स्वीकार करता हूँ। न मैं रोमी कलीसिया के उस प्रशंसनीय उत्साह को भूल सकता हूँ जिससे उसने अपने अनुयायियों के लिए व्यवस्था की है। फिर भी, हर कटौती के बाद, मेरे विचार में इससे इनकार करना असम्भव है कि हमारे धर्मप्रान्त में असंख्य निवासी ऐसे हैं जिनकी आत्माओं के लिए अनुग्रह के कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं, और जिनकी दशा कलीसिया के सदस्यों का ध्यान तुरन्त माँगती है। यदि इस देश की स्थापित कलीसिया यह दावा करती है कि वह 'लोगों की कलीसिया' है, तो यह उसका अनिवार्य कर्तव्य है कि वह देखे कि 'लोगों' का कोई भी भाग बिना चरवाहे की भेड़ों के समान न छोड़ा जाए। यदि वह स्वयं को किसी क्षेत्र की कलीसिया कहती है, केवल मण्डली की नहीं, तो उसे तब तक विश्राम नहीं करना चाहिए जब तक कोई गली, कोई सड़क, कोई घर, कोई अटारी, कोई तहखाना, कोई परिवार ऐसा न रहे जिसकी उसके अधिकारियों द्वारा नियमित देखभाल न की जाती हो और जिसे अनुग्रह के साधनों का प्रस्ताव न दिया जाता हो। निस्सन्देह वह लोगों से धर्म का मूल्य नहीं करवा सकती, न ही यह कि वे उन साधनों की परवाह करें जो वह प्रदान करती है। परन्तु उसका लक्ष्य ऐसी स्थिति उत्पन्न करना होना चाहिए कि कोई यह न कह सके, 'मैं किसी का पल्लीवासी नहीं हूँ। कोई मेरे पास नहीं आता, न मुझसे बात करता है; किसी को मेरी आत्मा की चिन्ता नहीं।'
हम इस वांछनीय स्थिति से इस समय कितनी दूर हैं, यह आप में से अधिकतर लोग उतना ही जानते हैं जितना मैं। मेरे निरीक्षण-प्रश्नों के पूर्ण और सम्पूर्ण उत्तर (जिनके लिए, मुझे कहने दीजिए, मैं सचमुच आभारी हूँ) इस दुःखद तथ्य को प्रकट करते हैं कि हमारे धर्मप्रान्त में अनेक पल्लियाँ ऐसी हैं जिनकी जनसंख्या किसी एक पदधारी की देखरेख की सामर्थ्य से कहीं अधिक बढ़ चुकी है, और जहाँ तीन-चार स्वतन्त्र पल्ली-पदधारियों के लिए भरपूर काम होता, यदि वे उपलब्ध कराए जा सकें। इस समय 11,00,000 लोगों के लिए हमारे पास केवल 200 पदधारी और 140 सहायक पादरी हैं। मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि सारे इंग्लैण्ड में कोई दूसरा धर्मप्रान्त नहीं है जिसमें कलीसिया से की जाने वाली माँगों और कलीसिया द्वारा दी गई पूर्ति के बीच का अन्तर इतना चौंकाने वाला और इतना गम्भीर हो। नॉर्विच धर्मप्रान्त में (राइल पहले नॉर्विच धर्मप्रान्त की पल्लियों में सेवा कर चुके थे) आपको 6,60,000 लोगों के लिए 914 पद और 1160 पादरी मिलेंगे। यहाँ लिवरपूल धर्मप्रान्त में 200 पद, 340 पादरी और 11,00,000 आत्माएँ हैं। यह अन्तर कितना स्पष्ट है!
परन्तु जो कथन मैंने अभी किया, वह भी लिवरपूल धर्मप्रान्त में कलीसिया की आर्थिक स्थिति का बहुत अपर्याप्त चित्र देता है। नॉर्विच जैसे पुराने धर्मप्रान्त में अधिकांश पद रेक्टरी या विकरेज हैं, और उन्हें दशमांश या भूमि का अनुदान प्राप्त है। हमारे नये धर्मप्रान्त में मेरा अनुमान है कि 200 वर्ष पहले कुल मिलाकर पच्चीस कलीसियाएँ भी इस प्रकार अनुदानित नहीं थीं, और अब भी इससे अधिक नहीं हैं। हमारी वर्तमान कलीसियाओं का अधिकांश भाग अपेक्षाकृत आधुनिक है, और उनके पास अनुदान कहलाने योग्य कुछ भी नहीं है। उनके पदधारी पूरी तरह एक अनिश्चित और घटते-बढ़ते आय पर निर्भर हैं, जो शुल्कों, बैठने के स्थान के किराए या चढ़ावों से आती है, और उन्हें प्रायः अत्यन्त दयनीय रूप से कम वेतन मिलता है। वस्तुतः, यदि कभी अनुदान छीने जाने के साथ कलीसिया की राजकीय मान्यता समाप्त हो जाए, तो मुझे सन्देह है कि इंग्लैण्ड में कोई ऐसा धर्मप्रान्त होगा जहाँ पादरियों को हमारे धर्मप्रान्त से कम हानि होगी! अधिकांश के पास न दशमांश है, न भूमि, जिससे वे वंचित किए जा सकें।
इस असाधारण स्थिति के कारणों का पता लगाना कठिन नहीं है। पिछले 180 वर्षों में वेस्ट डर्बी हण्ड्रेड की जनसंख्या अभूतपूर्व तेज़ी से बढ़ी है। छोटी बस्तियाँ गाँव बन गईं और गाँव नगर। मर्सी नदी पर हमारा विशाल बन्दरगाह-नगर कुछ ही छलाँगों में महारानी के राज्य के अग्रणी स्थान पर पहुँच गया है, और लंकाशायर तथा यॉर्कशायर को अपने पीछे लिए हुए, उसके और भी बढ़ने की सम्भावना दिखाई देती है। हमारे धर्मक्षेत्र के पूर्वी भाग में खनन और निर्माण-उद्योग के भारी विकास ने मज़दूरों की एक बहुत बड़ी संख्या को एकत्र कर दिया है। लिवरपूल के भीतर भी और बाहर भी इस क्षेत्र में लोगों का निरन्तर आना और बसना होता रहा है। परन्तु इस सारे समय में, खेद की बात है कि इंग्लैण्ड की कलीसिया ने, पिछले कुछ वर्षों तक, उन आत्माओं के लिए जो यहाँ एकत्र हुईं अपेक्षाकृत बहुत कम किया। बीते दिनों में, मुझे भय है, प्रायः सम्पत्तियाँ बनाई और समेटकर ले जाई जाती रहीं, जबकि उन्हें बनाने में सहायता करनेवाले हाथों को भुला दिया गया और उपेक्षित छोड़ दिया गया।
अनुग्रह के साधनों के इस अभाव के परिणाम ठीक वैसे ही हैं जैसे बाइबल और मानव स्वभाव के प्रत्येक विद्यार्थी को अपेक्षित होने चाहिए। अकेले और अपने ही भरोसे छोड़ दिए जाने पर हमारी जनसंख्या के बड़े-बड़े समूह व्यवहार में बिना किसी धर्म के ही प्रतीत होते हैं। हमारे लिवरपूल के दैनिक समाचार-पत्रों में पुलिस की रिपोर्टें या मृत्यु-जाँच के विवरण पढ़ते समय कोई भी व्यक्ति मद्यपान, अनैतिकता और अपराध के हृदय-विदारक वृत्तान्तों से बचकर नहीं निकल सकता। कोई भी समझदार दर्शक, उदाहरण के लिए, रविवार को इस नगर के अधिक घनी आबादीवाले मोहल्लों में घूमे, तो इस पीड़ादायक निष्कर्ष से बच नहीं सकता कि जिन स्त्री-पुरुषों को वह देखता है उनमें से अनेक कभी किसी आराधना-स्थान में नहीं जाते। उनके वस्त्र, उनके चेहरे, उनका पूरा रंग-ढंग ऐसा प्रमाण देते हैं जिसे भूल से नहीं समझा जा सकता। आलस्य, गप्पबाज़ी, मिलने-जुलने, या मदिरालय खुले होने पर और मदिरा मिल सकने पर पीने के लिए तो वे बहुत तैयार रहते हैं, परन्तु परमेश्वर के भवन के लिए नहीं। मसीही धर्म और नैतिकता के प्रत्येक मित्र के लिए यह अत्यन्त दुःखद दृश्य है। सब्त को न मानने से परमेश्वर को न मानने तक केवल कुछ ही सीढ़ियों की दूरी है। परन्तु इसमें आश्चर्य किसे हो? जैसी स्थिति अभी है, उसमें हमारे लोगों में हज़ारों ऐसे अवश्य होंगे जिन्हें बिलकुल अकेला छोड़ दिया गया है। यदि लिवरपूल का प्रत्येक वयस्क स्त्री-पुरुष, जो स्वस्थ हो और सुरक्षित रूप से घर से निकल सके, अगले रविवार को किसी आराधना-स्थान में जाने का निश्चय कर ले, तो यह निश्चित है कि हमारे नगर का प्रत्येक गिरजाघर, प्रार्थनालय और मिशन-कक्ष दम घुटने की सीमा तक भर जाएगा, और स्थान के अभाव में असंख्य लोगों को घर लौटना पड़ेगा! लिवरपूल के प्रथम अध्यक्ष के सामने खड़ी स्थिति का यही संक्षिप्त चित्र है। ये वे तथ्य हैं जिन पर विचार करने, जिनका सामना करने और जिनसे जूझने के लिए मैं इस नए धर्मक्षेत्र के कलीसिया-जनों से कहता हूँ। मुझे नहीं लगता कि मैंने कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर या अतिशयोक्ति के साथ कहा है। इसके विपरीत, जब मैं कुछ पल्लियों के आँकड़े देखता हूँ, जिनका नाम मैं नहीं लूँगा, तो मेरा विश्वास है कि मैंने अपनी बात को कम करके ही कहा है। न ही मैं आपका समय व्यर्थ विलाप और दोष-ढूँढ़ने में गँवाऊँगा। मैं इसे मानकर चलना अधिक पसन्द करता हूँ कि हम सब सहमत हैं कि कुछ किया जाना चाहिए, और प्रश्न केवल यह है कि वह कुछ क्या हो। मैं जानता हूँ कि लंकाशायर के लोग व्यावहारिक और कार्यकुशल लोग हैं। मैं इस विषय पर कार्यकुशलता के ढंग से ही आना चाहता हूँ।
अपनी जाँच के आरम्भ में ही मैं गहरी कृतज्ञता के साथ उस बड़े भले कार्य को स्वीकार करना चाहता हूँ जो मैंने लिवरपूल धर्मक्षेत्र में कलीसिया-जनों के हाथों होता हुआ पाया है। यदि इंग्लैण्ड के किसी दूर भाग में रहनेवाला और लंकाशायर से अपरिचित कोई व्यक्ति यह मानता है कि मर्सी के तट पर नव-स्थापित अध्यक्षपीठ के अध्यक्ष को कलीसिया-कार्य जैसा कुछ भी होता हुआ नहीं मिला, न कोई संगठन, न कोई तंत्र, न कोई परोपकारी संस्थाएँ, न कोई धार्मिक समितियाँ, तो मैं उससे कहता हूँ कि वह पूरी तरह भूल में है। यह विचार कि वेस्ट डर्बी हण्ड्रेड में इंग्लैण्ड की कलीसिया किसी नव-स्थापित औपनिवेशिक धर्मक्षेत्र के समान एक प्रकार का कलीसियाई जंगल पाई जाएगी, एक भ्रम है। सत्य से इससे अधिक दूर कुछ नहीं हो सकता। चेस्टर के अध्यक्षों की परिश्रमी देखरेख के लिए, जिनके अधीन पहले लंकाशायर का यह भाग था, और यहाँ के निवासी पादरियों और सामान्य जनों के स्वैच्छिक उत्साह के लिए धन्यवाद, मैं धर्मक्षेत्र का बहुत बड़ा तंत्र उत्कृष्ट रूप से चलता हुआ पाता हूँ, ऐसा तंत्र जिसकी तुलना देश के सबसे पुराने धर्मक्षेत्र के तंत्र से भी अनुकूल रीति से की जा सकती है। मैं प्रत्येक डीनरी में ग्रामीण-डीनरी सम्मेलन पाता हूँ। शिक्षा, संयम, रविवारीय पाठशालाओं, विदेशी और देशीय मिशनों के कार्य को मैं व्यवस्थित रूप से और भली-भाँति समर्थित पाता हूँ। मैं एक सशक्त पवित्रशास्त्र-वाचक समिति पाता हूँ, और स्वयं लिवरपूल में बाइबल-स्त्री संघ। मैं एक उत्तम नाविक-गृह पाता हूँ। मैं नौ अस्पताल पाता हूँ। मैं सभी मसीही कहलानेवालों के सामान्य सहयोग से विशेष वर्गों के लिए, जैसे नाविकों, जहाज़-निर्माताओं, गाड़ीवानों, तथा किराये की गाड़ी और बस चलानेवालों के लिए, विशेष कार्य होता हुआ पाता हूँ। अनाथ, अन्धे, गूँगे-बहरे, सड़कों के आवारा बच्चे और नालियों के बालक, यहाँ तक कि अख़बार बेचनेवाले लड़के भी भुलाए नहीं गए हैं। मैं एक अत्यन्त उपयोगी धर्मक्षेत्रीय वित्त-समिति पाता हूँ। सबसे बढ़कर, मैं पादरियों का एक समूह पाता हूँ, चाहे वह कितना ही छोटा और कार्य से लदा हुआ हो, और उनमें से बहुतों को खेदजनक रूप से कम वेतन मिलता है, फिर भी वे एक समूह के रूप में इंग्लैण्ड की कलीसिया के प्रशंसनीय प्रतिनिधि हैं। ये सब ऐसे तथ्य हैं जिन्हें मैं अत्यन्त कृतज्ञता से स्वीकार करता हूँ और जिन्हें एक क्षण के लिए भी अनदेखा नहीं करूँगा। फिर भी मुझे निश्चय है कि आज जिन्हें मैं सम्बोधित कर रहा हूँ वे सब मुझसे सहमत होंगे कि बहुत कुछ करना शेष है। और इसे कैसे आरम्भ किया जाए, तथा किससे शुरू किया जाए, यही अगला विषय है जिस पर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ।
(1) तो एक बात यह है कि हमारे धर्मप्रान्त में इंग्लैण्ड की कलीसिया को मुझे जीवित कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या की आवश्यकता प्रतीत होती है। जीवित कार्यकर्ताओं से मेरा अभिप्राय वचन के नियुक्त सेवकों से है। यह कहते समय मैं नहीं चाहता कि मुझे गलत समझा जाए। पवित्रशास्त्र पाठकों और साधारण विश्वासी कार्यकर्ताओं के काम का मूल्य जितना मैं आँकता हूँ, उससे अधिक कोई नहीं आँक सकता । अपने क्षेत्र में वे जो भलाई करते हैं वह सचमुच अगणनीय है। परन्तु यदि कलीसिया को किसी नए क्षेत्र में व्यवस्थित रूप से संगठित करना है और उसे स्थायी नींव पर स्थापित करना है; यदि नियमित मण्डली खड़ी करनी है, संस्कार विधिपूर्वक सम्पन्न कराने हैं और हमारी आराधना-पद्धति की सेवाएँ स्थापित करनी हैं; तो हमारी गणना की इकाई एक प्रेस्बिटर होना चाहिए। प्रत्येक नए क्षेत्र के निवासियों को यह अनुभव होना चाहिए कि उनका अपना विशेष सेवक है, और वे उसके विशेष पल्लीवासी हैं। साधारण कार्यकर्ता बीज बोकर और फसल काटकर उत्तम सेवा कर सकता है। परन्तु यदि फसल को भूमि पर ही सड़ना नहीं है, तो पूलों को बाँधकर खत्ते में रखना होगा। और यही प्रेस्बिटर का काम है। पवित्रशास्त्र-पाठक रंगरूटों को इकट्ठा कर सकता है और उन्हें राजा की सेवा में भर्ती होने के लिए मना सकता है। परन्तु प्रेस्बिटर को ही उन्हें कवायद सिखानी, प्रशिक्षित करना और अनुशासन में रखना होगा, और उन्हें दिखाना होगा कि मिलकर कैसे कार्य करें, साथ-साथ कैसे चलें और एक सक्षम पलटन कैसे बनें।
मेरी अपनी राय बहुत दृढ़ है कि इंग्लैण्ड की कलीसिया कभी सही स्थिति में नहीं होगी, और ‘जनसाधारण की कलीसिया’ के रूप में अपना कर्तव्य और अपना न्यायोचित स्थान तब तक नहीं निभा सकेगी, जब तक सामान्य नियम के रूप में उसका कोई भी पल्ली-क्षेत्र 5,000 से अधिक जनसंख्या का न हो; और जब तक प्रत्येक ऐसे पल्ली-क्षेत्र के लिए उसके पास कार्यभार सँभालनेवाला एक प्रेस्बिटर न हो। यदि कोई पादरी सच्चा पासबान और घर-घर जानेवाला व्यक्ति है, तो 5,000 भी बड़ी संख्या है। परन्तु रोमन कैथोलिकों और असहमतिवादियों के एक निश्चित अनुपात के लिए अवश्य ही छूट देनी चाहिए, जिनकी देखभाल उनके अपने सेवक करते हैं। जैसे ही किसी पादरी का क्षेत्र 5,000 से अधिक हो जाता है, मुझे पूरा विश्वास है कि उसके लिए अपना सारा काम सन्तोषजनक रूप से पूरा करना लगभग असम्भव हो जाता है। जहाँ तक उन पल्लियों या क्षेत्रों का प्रश्न है जिनमें 10,000, 12,000, 15,000 या 20,000 प्राण हैं और केवल एक ही प्रभारी है, यह मान लेना व्यर्थ है कि ऐसे क्षेत्रों का पादरी अपने पल्लीवासियों के बड़े अंश को जान सकता है या उन तक पहुँच सकता है।
लिवरपूल में इंग्लैण्ड की कलीसिया इस समय कितनी भयंकर रूप से कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है, यह किसी को भी थोड़ा-सा विचार करने पर स्पष्ट हो जाएगा!
यह मानते हुए कि इस विशाल नगर और इसके उपनगरों में 6,50,000 लोग हैं, यहाँ 5,000-5,000 के 130 पल्ली-क्षेत्र होने चाहिए, और इन क्षेत्रों का कार्यभार सँभालनेवाले 130 प्रभारी होने चाहिए। आज जिनसे मैं बात कर रहा हूँ, उन्हें मुझे यह याद दिलाने की शायद ही आवश्यकता है कि हमारे पादरियों की वर्तमान संख्या मेरे बताए आँकड़े से शोचनीय रूप से कम है। ऐसी स्थिति में इंग्लैण्ड की कलीसिया अपना कर्तव्य कदापि पूरा नहीं कर सकती, और उससे लिवरपूल में ‘जनसाधारण की कलीसिया’ होने की आशा करना निरी मूर्खता है। यह वैसा ही है जैसे मर्सी नदी से कनार्ड या व्हाइट स्टार का कोई जहाज़ केवल बीस आदमियों के दल के साथ, अधिकारियों, नाविकों, इंजीनियरों और भट्ठी झोंकनेवालों सहित, रवाना कर दिया जाए, और आशा की जाए कि वह अटलांटिक पार करके न्यूयॉर्क सुरक्षित पहुँच जाएगा। मैं निःसंकोच कहता हूँ कि हमारी पहली, सबसे प्रमुख और मुख्य आवश्यकता कार्यरत पादरियों की संख्या में बड़ी वृद्धि है।
(2) लिवरपूल के धर्मप्रान्त में इंग्लैण्ड की कलीसिया की दूसरी मुख्य आवश्यकता मुझे आराधना-स्थलों की अधिक संख्या प्रतीत होती है। जहाँ तक स्वयं लिवरपूल नगर में और अधिक गिरजाघरों की आवश्यकता का प्रश्न है, चेस्टर के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक समिति ने दो वर्ष से भी पहले एक मूल्यवान प्रतिवेदन तैयार किया था। इस प्रतिवेदन में घोषित किया गया था कि उस समय भी बारह नए गिरजाघरों की तत्काल आवश्यकता थी, और उपयुक्त स्थान भी सावधानी से बताए गए थे। फिर भी उस प्रतिवेदन की तिथि के बाद से बहुत कम किया गया है, और आवश्यकता आज भी उतनी ही बड़ी है। हमारे विशाल नगर की जनसंख्या प्रतिवर्ष लगभग 5,000 की दर से बढ़ती प्रतीत होती है, और इस वृद्धि के साथ चलने के लिए प्रतिवर्ष एक नया गिरजाघर बनना चाहिए! इस समय हमने खोई हुई भूमि को वापस पाने के लिए उल्लेख करने योग्य कुछ भी नहीं किया है। यह भी न भूला जाए कि प्रत्येक बड़ी पल्ली में आराधना-पद्धति से भिन्न सभाओं, प्रार्थना-सभाओं और ऐसे ही कार्यों के लिए एक सादा, खुला मिशन-कक्ष पल्ली के कार्य-तन्त्र का अनिवार्य अंग है, जिसके बिना कोई परिश्रमी पादरी कभी सुविधा से काम नहीं कर सकता। ऐसे अमूल्य कक्ष लिवरपूल में और कितने चाहिए, यह बताने का मैं दिखावा नहीं करूँगा; परन्तु कलीसिया के काम को आरम्भ करने और चलाए रखने की उपयोगिता की दृष्टि से मेरा विश्वास है कि वे गिरजाघरों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
हमारे नगर की विशेष आवश्यकताओं को देखते हुए, क्या हमें लिवरपूल के लिए एक विशेष बारह कलीसिया निधि स्थापित करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए—यह ऐसा प्रश्न है जो इन दिनों मेरे मन में बहुत बना हुआ है, और जिस पर मैं लिवरपूल में अच्छे कार्य के सभी परखे हुए और अनुभवी अगुवों की, चाहे वे पादरी-वर्ग के हों या सामान्य जन, सलाह हार्दिक रूप से चाहता हूँ। मुझे निश्चय है कि धन कोई दुर्लंघ्य कठिनाई नहीं होनी चाहिए, यदि केवल इच्छा हो। जिस नगर ने पाँच वर्ष के भीतर दो बार लगभग £100,000 जुटाए—एक बार अपना अध्यक्ष-पद स्थापित करने के लिए और एक बार विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए—वह एक और £100,000 जुटाने में असमर्थ नहीं है, ताकि लिवरपूल में इंग्लैंड की कलीसिया लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप हो सके। मैं फिर कहता हूँ, धन सरलता से जुटाया जा सकता है। यदि ऐसी कोई बारह कलीसिया निधि, जैसा मैंने सुझाया है, कभी आरम्भ की जाए, तो मुझे आशा है कि केवल दो बातें निरन्तर ध्यान में रखी जाएँगी। पहली यह कि जिस किसी क्षेत्र में नई कलीसिया का प्रस्ताव हो, वहाँ की जनसंख्या में सक्रिय रूप से घर-घर जाकर सम्पर्क किया जाए और सब सम्पत्ति-स्वामियों से हार्दिक अपील की जाए कि वे स्थानीय योगदान देकर सार्वजनिक निधि का साथ दें। लोग नई कलीसिया का मोल तब सबसे अधिक आँकते हैं जब उन्होंने अपनी सामर्थ्य भर उसे बनाने में स्वयं हाथ बँटाया हो। दूसरी बात जिसका मैं उल्लेख करूँगा, वह है सार्वजनिक धन से बननेवाली सब नई कलीसियाओं के निर्माण में यथासम्भव मितव्ययिता और व्यावहारिक उपयोगिता पर ध्यान देने का महत्व। हम धन को यथासम्भव दूर तक पहुँचाएँ, और उसे बाहरी अनावश्यक सजावट में नष्ट न करें, वरन् भीतरी भाग को यथासम्भव सुविधाजनक बनाने का लक्ष्य रखें। जब भूमि बहुत महँगी हो, तब पाठशाला को कलीसिया के नीचे बनाना बुद्धिमानी है, जैसा सेंट स्टीफन्स, बायरम स्ट्रीट में किया गया है। जब क्षेत्र का चरित्र निम्न हो और वहाँ अच्छे घर न हों, तब कलीसिया के साथ पासबान का निवास भी होना चाहिए। हर स्थिति में मैं दृढ़ता से एक बड़े, सुविधाजनक वेस्ट्री की अनुशंसा करता हूँ, जो दृढ़ीकरण की कक्षाओं और प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवालों की सभाओं के काम आए। फिर भी, मैं कभी यह भूलना नहीं चाहता कि धर्मक्षेत्र के अन्य बड़े और महत्वपूर्ण स्थानों को भी लिवरपूल के समान नई कलीसियाओं की आवश्यकता है। कई अन्य नगरों की आत्मिक आवश्यकताएँ बड़ी और पुकार-पुकारकर कहनेवाली हैं। मुझे निश्चय है कि इंग्लैंड की कलीसिया का कोई सच्चा मित्र तब तक सन्तुष्ट नहीं हो सकता जब तक सम्पूर्ण वेस्ट डर्बी हन्ड्रेड की जनसंख्या के लिए और आराधना-स्थल और और पादरी उपलब्ध न कराए जाएँ। परन्तु इस विषय पर जो कुछ मुझे कहना है, उसे मैं उस निरीक्षण-सभा के लिए रख छोड़ता हूँ जो मैं कल विगन में करने का प्रस्ताव रखता हूँ।
महान प्रश्न का उत्तर अभी शेष है: हमारे नए धर्मक्षेत्र की भारी आवश्यकताएँ कैसे पूरी की जाएँगी? इस प्रश्न का मैं केवल एक ही उत्तर दे सकता हूँ। हमारे पास सामान्य जनों की स्वैच्छिक उदारता के सिवा निर्भर होने को और कुछ नहीं है। एक निश्चित जनसंख्यावाले नए क्षेत्र के पादरी के निर्वाह के लिए, खनन-क्षेत्रों के पल्लियों में नए सहायक पादरियों के लिए, और बहुत ही असाधारण स्थितियों में अत्यन्त निर्धन, बड़े पल्लियों में सहायक पादरियों के लिए हम निश्चय ही देर-सबेर कलीसिया-सम्बन्धी आयुक्तों की सहायता मिलने की आशा कर सकते हैं। परन्तु नई कलीसियाओं और मिशन-कक्षों के निर्माण के लिए, और पादरियों की किसी भी बड़ी वृद्धि के लिए, मैं फिर कहता हूँ, हमें सामान्य जनों की स्वैच्छिक सहायता पर ही निर्भर रहना होगा। मैं हार्दिक आशा करता हूँ कि यह सहायता दी जाएगी। यदि वे सराहनीय संस्थाएँ, धर्मक्षेत्रीय कलीसिया सहायता समिति और धर्मक्षेत्रीय कलीसिया निर्माण समिति, प्रत्येक वर्ष £10,000 की आय जुटा सकें, तो जो भलाई शीघ्र ही की जा सकती है वह अगणनीय है।
यह शीघ्र ही दिखाया जा सकता है कि यदि धर्मक्षेत्र के सभी कलीसिया-जन अपने उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक हों और देना अपना कर्तव्य समझें, तो आवश्यक निधि कितनी सरलता से जुटाई जा सकती है। बहुत कम लोगों को इसका तनिक भी अनुमान है कि धार्मिक कार्यों के लिए चन्दा देनेवालों की संख्या कितनी थोड़ी है, और आप जो भी चन्दा-सूची पढ़ते हैं उसमें उन्हीं उदार-चित्त, बड़े हृदयवाले पुरुषों के नाम आपको बार-बार मिलते हैं।
फुटनोट ‘धर्मक्षेत्रीय वित्त संघ’ के सचिव ने मुझे सूचित किया है कि इस समय कलीसिया निर्माण, कलीसिया सहायता, शिक्षा आदि के लिए हमारी धर्मक्षेत्रीय संस्थाओं के केवल 300 सामान्य-जन चन्दा देनेवाले हैं। इसके अतिरिक्त, यह भी प्रकट होता है कि इन 300 की सूची में:
1 सामान्य जन का नाम 7 बार आता है। 1 सामान्य जन का नाम 6 बार आता है।
17 सामान्य जनों के नाम 5 बार आते हैं। 15 सामान्य जनों के नाम 4 बार आते हैं। 23 सामान्य जनों के नाम 3 बार आते हैं।
67 सामान्य जनों के नाम दो बार आते हैं। 176 सामान्य जनों के नाम एक बार आते हैं।
वेस्ट डर्बी हन्ड्रेड में धन की ऐसी मानवीय खदानें हैं जिन्हें अभी तक छुआ तक नहीं गया है। जितनी कलीसियाओं की हमें आवश्यकता है वे सब शीघ्र ही बन सकती हैं, और जितने अतिरिक्त पादरी चाहिए वे सब शीघ्र ही उपलब्ध कराए जा सकते हैं, यदि सब सामान्य कलीसिया-जन अपनी आँखें खोलें, साहस के साथ आगे आएँ, और भलाई करने तथा परमेश्वर के राज्य को आगे बढ़ाने के लिए धन देने के आनन्द का अनुभव करें। इस समय यह आनन्द केवल चुने हुए थोड़े-से लोग ही भोगते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।
सीधी-सच्ची बात यह है कि मसीह के कार्य के लिए धन देने के विषय में अंग्रेज़ कलीसिया के अधिकांश सदस्य खेदजनक रूप से समय से पीछे हैं और उन्हें शिक्षा की आवश्यकता है। स्कॉटलैंड के प्रेस्बिटेरियन, इंग्लैंड के वेस्लियन और इंडिपेंडेंट लोगों को हमें लज्जित करना चाहिए। हमें ऐसे और लोग चाहिए जो उसी प्रकार आगे आएँ जैसे लंदन में स्वर्गीय उदारचित्त जॉर्ज मूर आए थे, और जैसे पहले लिवरपूल में कुछ लोग आए थे, और कहा, 'मैं स्वयं एक कलीसिया बनवाऊँगा और किसी से सहायता न माँगूँगा।' विलासिता और मनोरंजन पर प्रायः कितनी बड़ी-बड़ी राशियाँ व्यर्थ उड़ा दी जाती हैं और सदा के लिए नष्ट हो जाती हैं! परन्तु 'जो प्रभु को उधार देता है उसे चुकौती मिलने' की प्रतिज्ञाओं को किसने कभी निष्फल पाया है? वर्ष के अन्त में अपना लेखा-जोखा मिलाते समय किसने कभी यह पाया कि जो धन उसने आत्मिक कार्यों के लिए दिया था, उसकी कमी उसे खली? आत्माओं की भलाई करके कौन कभी दिवालिया न्यायालय पहुँचा है? आख़िर, यद्यपि यह केवल एक निम्न उद्देश्य है, धनवानों को कभी न भूलना चाहिए कि सच्चे धर्म के प्रसार को बढ़ावा देना ही सबसे सच्ची नीति और सबसे ऊँची बुद्धिमानी है। तर्क स्वयं बताता है कि लम्बे वर्षों के क्रम में किसी नगर या राष्ट्र का नैतिक स्तर ही उसकी समृद्धि का सबसे बड़ा रहस्य है। सोने की खानें, कारख़ाने, वैज्ञानिक आविष्कार, गोदियाँ, सड़कें, वाक्पटु भाषण, व्यापारिक सक्रियता और लोकतांत्रिक संस्थाएँ राष्ट्रों को महान बनाने या बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सोर और सीदोन, कार्थेज, एथेन्स, रोम, वेनिस तथा स्पेन और पुर्तगाल के पास ऐसी सम्पदाएँ भरपूर थीं, फिर भी वे पतन को प्राप्त हुए। किसी राष्ट्र की शक्ति की नसें हैं: सच्चाई, ईमानदारी, संयम, पवित्रता, मिताचार, मितव्ययिता, परिश्रम, भाईचारे की दयालुता, अपने निवासियों में प्रेम-भाव, और परिणामस्वरूप मनुष्यों में अच्छी साख। जिसमें साहस हो वह इसका खण्डन करे। और क्या कोई कहेगा कि किसी जाति में ये गुण उत्पन्न करने का इससे अधिक निश्चित उपाय कोई और है कि शुद्ध, पवित्रशास्त्र-सम्मत मसीही धर्म को प्रोत्साहित किया जाए, पोषित किया जाए, फैलाया जाए और सिखाया जाए? जो मनुष्य कहता है कि इससे निश्चित कोई और मार्ग है, वह अविश्वासी ही होगा। तब, यदि बातें ऐसी हैं, तो प्रत्येक नगर के धनवान लोगों का पहला कर्त्तव्य यह होना चाहिए कि अपने आस-पास के लोगों में हर सम्भव रीति से धर्म को प्रोत्साहन और समर्थन दें। क्या कोई मनुष्य चाहता है कि उसके निर्धन पड़ोसी और जिन्हें वह काम पर रखता है, वे स्थिर, दूरदर्शी, सत्यवादी, परिश्रमी, संयमी, ईमानदार, नैतिक और दानशील हों? चाहता है या नहीं? यदि चाहता है, तो उसे धर्म का समर्थन करना चाहिए। पाप को दण्ड देना और फिर भी पुण्य को पोषित न करना, पुलिस के वेतन और कारागार बनाने पर सार्वजनिक धन ख़र्च करना और फिर भी सेवकों की वृद्धि और कलीसियाओं के निर्माण को प्रोत्साहन न देना, कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि हास्यास्पद रूप से असंगत नीति है। जितना अधिक सच्चा धर्म, उतने ही अच्छे लोग! जितने अधिक अच्छे लोग, उतनी अधिक समृद्धि! किसी नगर के जो धनवान लोग धर्म की उपेक्षा करते हैं और निश्चिन्त होकर कहते हैं कि उन्हें इसकी चिन्ता नहीं कि निवासी मसीही हैं या नहीं, वे आत्मघाती मूर्खता के अपराधी हैं। अधर्म, सांसारिक दृष्टि से भी, किसी राष्ट्र या नगर का सबसे बड़ा शत्रु है।
बेशक मैं जानता हूँ कि और कलीसियाओं के लिए मेरी विनती के उत्तर में एक प्रिय उत्तर यह दुखद तथ्य दिया जाता है कि वर्तमान कलीसियाएँ अभी भरी हुई नहीं हैं। 'अपनी पुरानी कलीसियाओं को भरो,' यही पुकार है, 'फिर हम तुम्हारे लिए नई कलीसियाएँ बनवा देंगे।' मुझे यह कहने की अनुमति दें कि यह एक बहाना है, तर्क नहीं। मैं विशेष रूप से लिवरपूल की बात नहीं कह रहा, परन्तु जब तक संरक्षक-जन अयोग्य पादरियों को नियुक्त करते रहेंगे, जिनमें अपने पद के योग्य कोई वरदान नहीं, और जब तक कलीसिया रोगी या अधिक आयु के पादरियों को पेंशन देकर सेवानिवृत्त करने की कोई व्यवस्था नहीं करती, तब तक कुछ कलीसियाएँ सदा खाली मिलेंगी। परन्तु किसी नगर के एक छोर पर खाली कलीसियाओं का होना इसका कारण नहीं कि हम दूसरे छोर पर नई कलीसियाएँ न बनाएँ। सभी सेवक सब प्रकार के पल्लियों और जनसंख्या के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होते। पादरी के चुनाव में केवल सामान्य बुद्धि से काम लीजिए, और वह ऐसा मनुष्य हो जो बुद्धिमानी और प्रेम से सुसमाचार का प्रचार करे, उसके अनुसार जीए और उसका काम करे, तो मुझे निश्चय है कि उसे कभी खाली बेंचों को प्रचार नहीं सुनाना पड़ेगा। इस धर्मप्रान्त में बहुत से प्रमाण हैं कि मैं सत्य कह रहा हूँ। परन्तु हाय, जब लोगों में मसीह के काम में सहायता करने की इच्छा कम होती है, तब अपनी इच्छा की पुष्टि के लिए उनके पास कारणों की कभी कमी नहीं होती! बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि कलीसिया-भवन बनाने में, या मसीह के किसी भी काम में, कर्तव्य हमारे हैं, और परिणाम परमेश्वर के हाथ में हैं। (3) लिवरपूल धर्मप्रान्त की तीसरी मुख्य आवश्यकता ऐसी है जिसे सँभालना मुझे बहुत कठिन लगता है। मेरा संकेत, निस्सन्देह, एक गिरजाघर की आवश्यकता की ओर है, जो हमारे धर्मप्रान्त के आकार और धन के, और ग्रेट ब्रिटेन के दूसरे सबसे बड़े नगर के महत्त्व के अनुकूल हो। मैं इस विषय पर नाज़ुकता से आता हूँ। यह उससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा विषय है जितना अधिकतर लोग समझते हैं। मुझसे बार-बार पूछा जाता है, 'आप अपना गिरजाघर कब आरम्भ करेंगे?' परन्तु थोड़े ही लोग समझते हैं कि इस विचार में क्या-क्या निहित है। सब गिरजाघरों का सिद्धान्त, निस्सन्देह, उत्तम है। हर धर्मप्रान्त के प्रमुख नगर में एक भव्य कलीसिया हो, जो भवन-शैली और व्यवस्था में अन्य सब कलीसियाओं से उतनी ही बढ़कर हो जितना एक अध्यक्ष अपने पद में एक प्राचीन से बढ़कर होता है! इस कलीसिया की सभाएँ सारे धर्मप्रान्त के लिए आदर्श हों, और सार्वजनिक प्रार्थना, स्तुति और प्रचार मसीही आराधना के सर्वोच्च स्तर का स्थायी नमूना हों! इस कलीसिया की देखरेख किसी गम्भीर, विद्वान और प्रतिष्ठित पादरी को सौंपी जाए जो डीन कहलाए, और तीन-चार अन्य पादरी, जो कैनन कहलाएँ, उसकी सहायता करें! ये कैनन चुने हुए पुरुष हों, जिन्हें केवल उनके विशेष गुणों के कारण चुना जाए, न कि पारिवारिक या राजनीतिक कारणों से, और जो गहरी धर्मशास्त्रीय विद्या, या प्रचार की महान शक्ति, या परामर्श की बुद्धि, या जीवन की आत्मिकता के लिए प्रसिद्ध हों! डीन और कैननों का ऐसा चुना हुआ दल अध्यक्ष से घनिष्ठ और मित्रतापूर्ण सम्बन्ध में रहे, उसका दाहिना हाथ और दाहिनी आँख हो, उसके सलाहकार, उसके सहायक, उसकी तलवार, उसके तीर और उसका धनुष हो! इस प्रकार गठित गिरजाघर-दल धर्मप्रान्त के हर भले काम का हृदय, मुख्य शक्ति और केन्द्र हो! उसके सदस्यों को अच्छा वेतन और अच्छे निवास मिलें, और उनके पास हर वर्ष का अधिकतर समय गिरजाघर-परिसर में रहने से बचने का कोई बहाना न हो! आत्मिकता और पवित्रता के सोते के रूप में गिरजाघर-दल का प्रभाव गिरजाघर-नगर में विशेष रूप से अनुभव किया जाए! उसकी सक्रिय उपयोगिता देश और विदेश में सुसमाचार फैलाने के हर प्रकार के धर्मप्रान्तीय तन्त्र के उत्साहपूर्ण संचालन में दिखाई दे! डीन और कैनन सब मनुष्यों में 'जलते और चमकते हुए दीपक' के रूप में जाने और पढ़े जाएँ, कलीसिया-जनों के सार और पुष्प हों, और इसके फलस्वरूप गिरजाघर-नगर हर धर्मप्रान्त का कलीसियाई एथेंस, उस क्षेत्र में कलीसिया के प्रभाव का गढ़, और धर्मशास्त्रीय विद्या की पौधशाला बन जाए! मैं समझता हूँ, अंग्रेज़ी गिरजाघर-व्यवस्था का सिद्धान्त ऐसा ही है। धर्म-सुधार के समय हमारे गिरजाघर-दलों के बने रहने की अनुमति देनेवालों का अभिप्राय ऐसा ही था। ऐसे गिरजाघर का सिद्धान्त उत्तम है। यदि लिवरपूल में हमारा ऐसा गिरजाघर और ऐसा दल होता, तो मुझसे बढ़कर कोई धन्यवादी न होता। यदि कोई ऐसा गिरजाघर बनाने और उसे निधि देने का प्रस्ताव रखे, तो मैं उस प्रस्ताव का हृदय से स्वागत करूँगा।
परन्तु आइए हम भली-भाँति विचार करें कि हम किस विषय पर बात कर रहे हैं। आइए हम खर्च का हिसाब लगाएँ। हमें आरम्भ में ही स्मरण रखना चाहिए कि इस विषय में लिवरपूल का नया धर्मप्रान्त आधुनिक समय के प्रत्येक नए धर्मप्रान्त की तुलना में बहुत बड़ी असुविधा के साथ आरम्भ कर रहा है। रिपन, मैनचेस्टर और सेंट अल्बन्स में से प्रत्येक के पास एक गिरजाघर था, या ऐसा गिरजा था जो गिरजाघर बनने के योग्य था, और रिपन तथा मैनचेस्टर में से प्रत्येक के पास निधि-सम्पन्न मण्डल (चैप्टर) भी था। साउथवेल के पास एक सुन्दर मिन्स्टर है। वेकफ़ील्ड और न्यूकैसल के स्थानीय गिरजे उत्कृष्ट इमारतें हैं, जो गिरजाघर होने के योग्य हैं। ट्रूरो के अध्यक्ष एक गिरजाघर बनवा रहे हैं, इसमें सन्देह नहीं। परन्तु कॉर्नवाल का प्रान्त, जो उनका धर्मप्रान्त है, उसमें शायद ही किसी और गिरजे के बनाए जाने की आवश्यकता है, और वे अपने सारे प्रयत्न सरलता से अपने गिरजाघर पर केन्द्रित कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, उनका गिरजाघर पहले से ही एक्सेटर की एक सम्पन्न कैनन-पदवी से निधि-सम्पन्न है। इसके विपरीत, लिवरपूल में हमें आरम्भ से ही सब कुछ करना है। हमारे नगर में एक भी गिरजा ऐसा नहीं जो गिरजाघर में बदले जाने के योग्य हो। नए गिरजाघर के लिए हमारे पास कोई स्थान नहीं है, सिवाय एक के, जो व्यायामशाला के पीछे एक अप्रयुक्त कब्रिस्तान में है, जो शायद बहुतों को पसन्द न आए; और कोई भी दूसरा स्थान भारी रकम का पड़ेगा। लिवरपूल के योग्य गिरजाघर बनाने में, पूरा होने से पहले, ढाई लाख पाउण्ड लग जाएँगे। डीन, कैनन और गिरजाघर के कर्मचारियों के लिए निधि की व्यवस्था करनी होगी। अभी भी हमारी वर्तमान स्वैच्छिक गिरजाघर-आराधनाओं को, साधारण स्तर पर भी, चलाए रखना बहुत बड़ी कठिनाई है। ये सब गम्भीर विचारणीय बातें हैं। क्या हम पाँच लाख पाउण्ड की रकम का सामना करने को तैयार हैं? हम निस्सन्देह उसका सामना कर सकते हैं; परन्तु क्या हम तैयार हैं? कोई मुझे गलत न समझे। कोई यह न सोचे कि मैं गिरजाघर का सर्वथा विरोधी हूँ। ऐसा बिलकुल नहीं! यदि कोई उन महिलाओं के समान उदार प्रस्ताव लेकर आगे आए जिन्होंने एडिनबरा का गिरजाघर बनवाया, या यदि कोई लिवरपूल में वह करे जो हाल ही में डब्लिन के सेंट पैट्रिक्स और क्राइस्ट चर्च गिरजाघरों में, या कॉर्क के सेंट फिनबार्स में किया गया है, तो मैं हृदय से कृतज्ञ हूँगा। जहाँ तक मैं जानता हूँ, यह भी सम्भव है कि अभी किसी के हृदय में ऐसा करने की इच्छा हो। मैं केवल इतना कहता हूँ कि एक नए धर्मप्रान्त के अध्यक्ष के रूप में मेरा पहला और सबसे प्रमुख कार्य उन आत्माओं के बीच, जिनकी अब तक पूरी तरह उपेक्षा हुई है और जिन तक कोई गिरजाघर नहीं पहुँचेगा, सुसमाचार के प्रचार की व्यवस्था करना है। इस समय मेरा पहला कार्य यह है कि और अधिक सेवक और आराधना के और अधिक स्थान उपलब्ध कराने का यत्न करूँ, और जहाँ तक मैं देख पाता हूँ, मेरी अध्यक्षता के थोड़े से वर्ष इसी में बीत जाएँगे। गिरजाघर के अभाव का प्रश्न मैं यहीं छोड़ता हूँ। मेरा विश्वास है कि आने वाले धर्मप्रान्तीय सम्मेलन में इस विषय पर पूरी तरह विचार होगा। जो लोग इसे हाथ में लेंगे, वे शायद इस पर मुझसे अधिक प्रकाश डालेंगे। मैं अचूक होने का दावा नहीं करता, और भूल भी सकता हूँ। मैं केवल उन सब से, जो इसे हाथ में लें, यह निवेदन करता हूँ कि वे 'खर्च का हिसाब लगा लें।' धर्मप्रान्त की आवश्यकताओं का विषय छोड़ने से पहले, मैं समझता हूँ कि यदि मैं उन अनेक बातों के लिए, जो मैंने यहाँ पाई हैं, सार्वजनिक रूप से अपनी कृतज्ञता प्रकट न करूँ तो यह अनुचित और कृतघ्नता होगी। मैंने 'जिन बातों की घटी है' उनके विषय में दृढ़ता से कहा है। मुझे उन बातों के विषय में भी दृढ़ता से कहने दीजिए जो विद्यमान हैं। (i) मैं यह देखकर हृदय से कृतज्ञ हूँ कि लिवरपूल के धर्मप्रान्त में इतने सारे पादरी ठोस और अच्छा कार्य कर रहे हैं। मैं कभी सिद्धता की खोज में नहीं रहता। मैं समझता हूँ कि प्रत्येक अध्यक्ष शीघ्र ही जान लेता है कि उसके धर्मप्रान्त में सेवक और सेवक में भेद होता है—कुछ सेवक थोड़ा काम करते हैं, और कुछ बहुत। परन्तु मुझे अत्यन्त सन्देह है कि इंग्लैण्ड और वेल्स में ऐसे बहुत से धर्मप्रान्त होंगे जहाँ इतने बड़े अनुपात में ऐसे पादरी हों जो 'ऐसे कार्यकर्ता हैं जिन्हें लज्जित होने की आवश्यकता नहीं,' और जो चुपचाप तथा बिना दिखावे के 'ऐसा फल ला रहे हैं जो बना रहेगा।' (ii) मैं उन बहुत से सुसज्जित और भली-भाँति व्यवस्थित गिरजों के लिए, जो मैंने देखे हैं, और आराधनाओं की सामान्य सरगर्मी और जीवन्तता के लिए बहुत कृतज्ञ हूँ। मुझे इसके विषय में कहने की अनुमति दी जाए। मैं पहले ही 90 से अधिक अलग-अलग गिरजों में प्रचार कर चुका हूँ—अपने धर्मप्रान्त के लगभग आधे गिरजों में—और मेरी यह राय निजी अवलोकन का परिणाम है। केवल एक बात मुझे कुछ अच्छी नहीं लगी, वह है कुछ स्थानों में फसल-उत्सवों की सजावट पर किया गया अत्यधिक फ़िजूलखर्च, जबकि धर्मप्रान्त के अनेक कार्यों के लिए इतने धन की आवश्यकता है। मैं मानता हूँ कि ये मामले अपवाद हैं; परन्तु मुझे स्पष्ट कहना चाहिए कि मैं सजावट की मात्रा पर कोई सीमा लगी देखना चाहूँगा। परमेश्वर का भवन फूलों, अनाज, फलों, सदाबहार पौधों और फर्न की प्रदर्शनी के लिए नहीं बना है, परन्तु प्रार्थना, स्तुति और वचन के प्रचार का स्थान है। फिर भी, मैं यह मानने को तैयार हूँ कि अच्छे उद्देश्य से किए गए उत्साह की भी अति हो सकती है। (iii) मैं निम्न वर्गों के उन बहुत से सहभागी लोगों के लिए कृतज्ञ हूँ जिन्हें मैंने कुछ सायंकालीन प्रभु-भोजों में देखा है। मैं सायंकालीन प्रभु-भोजों के विरुद्ध वे आपत्तियाँ अनुभव नहीं कर पाता जो बहुत से लोग करते हैं। कुछ गरीब इलाकों में उन्हें मना करने का अर्थ होगा बहुत सी पत्नियों और माताओं को प्रभु की मेज़ से सर्वथा दूर कर देना। अपने निजी सुख के लिए मैं निश्चय ही प्रातःकाल संस्कार ग्रहण करना अधिक पसन्द करता हूँ। परन्तु यह स्मरण करते हुए कि यह विधि मूल रूप से सायंकाल स्थापित की गई थी, और कि हमारी कलीसिया इसे स्पष्ट रूप से प्रभु-भोज कहती है, मुझे समझ में नहीं आता कि सायंकालीन प्रभु-भोज निश्चित रूप से गलत कैसे हो सकता है। कि इंग्लैण्ड की कलीसिया, जब उसमें ठीक रीति से कार्य किया जाए, श्रमिक वर्गों का स्नेह पा सकती और बनाए रख सकती है, यह मैं सदा कहता आया हूँ। मैंने लिवरपूल में जिन सायंकालीन प्रभु-भोजों में भाग लिया है, उनसे मैं इसे प्रमाणित होता देखता हूँ।
(iv) मैं इस बात के लिये धन्यवादी हूँ कि मैं कलीसिया की रविवारीय पाठशालाओं में रुचि लिये जाते देखता हूँ। सप्ताह के दिनों के लिये बोर्ड स्कूलों (बोर्ड स्कूल ग्लैडस्टोन के पहले मंत्रित्वकाल में 1870 के फोर्स्टर शिक्षा अधिनियम के पारित होने के बाद स्थापित किये गये थे।) की स्थापना के बाद से रविवारीय पाठशालाओं के महत्त्व को आवश्यकता से अधिक आँकना असम्भव है। उनके बिना शीघ्र ही देश में युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी हो जाती जो इंग्लैंड की कलीसिया के विश्वास-सूत्रों, प्रश्नोत्तरी और प्रार्थना-पुस्तक से अनजान होती, और दृढ़ीकरण-विधि को समझने के लिये बिलकुल अप्रस्तुत होती। मैं अपनी हार्दिक आशा व्यक्त करता हूँ कि कलीसिया की रविवारीय पाठशालाओं में यह रुचि सब कहीं गहरी और अधिक होती जाये, और वे अत्यन्त उपयोगी तथा आत्म-त्यागी जन, अर्थात् रविवारीय पाठशाला के शिक्षक, हर प्रकार से प्रोत्साहित किये जायें। मेरा विश्वास है कि रविवारीय पाठशाला के शिक्षकों का एक योग्य दल पादरी का दाहिना हाथ होता है। (v) मैं यह देखकर धन्यवादी हूँ कि धर्मक्षेत्र के साधारण विश्वासी कलीसिया की कार्यवाहियों में सक्रिय और समझदारी-भरी रुचि लेते हुए दिखाई देते हैं। जिन कलीसियाओं में मैंने प्रचार किया है, वहाँ मैंने कलीसिया के churchwardens को शायद ही कभी इतनी योग्यता से आगे आकर अपना पद सँभालते देखा हो जितनी योग्यता से वे यहाँ सँभालते दिखाई देते हैं। और मैं उस अमूल्य सेवा की पर्याप्त सराहना नहीं कर सकता जो बहुत-से साधारण विश्वासी हमारी धर्मप्रान्तीय संस्थाओं के लिये स्वेच्छा से करते हैं! यह सब जैसा होना चाहिये वैसा ही है। साधारण विश्वासी भी पादरी-वर्ग के समान ही 'कलीसिया' हैं। जब साधारण विश्वासी निष्क्रिय, मौन साझेदार बने रहते हैं और कलीसिया के कार्य पादरी-वर्ग के हाथों में छोड़ देते हैं, तो यह कलीसिया-शरीर की अत्यन्त अस्वस्थ दशा का लक्षण है। मुझे आशा है कि लिवरपूल में ऐसा कभी न होगा।
उन सब बातों के लिये जिनका मैंने उल्लेख किया, उस एकसमान कृपा और शिष्टाचार के लिये जो मुझे सब से मिला, और मेरी इच्छाओं को पूरा करने की उस सामान्य तत्परता के लिये जो मैंने देखी, मैं अपने इस प्रथम निरीक्षण-सम्मेलन में सब के सामने अपनी गहरी और हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ। मैं बहुत चिन्ता के साथ आपके बीच आया था, और जितनी कठिनाइयों और टकराव की मुझे आशा थी, उनसे कहीं कम मेरे सामने आये हैं। परन्तु आपने बहुत प्रकार से मेरा मार्ग सुगम बनाया है, और मेरी राह को अपेक्षाकृत सरल कर दिया है। मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ, और आपका भी धन्यवाद करता हूँ।
अब मुझे केवल स्थानीय रुचि के विषयों से हटकर इंग्लैंड की कलीसिया की सामान्य स्थिति के विषय में कुछ कहना है। मैं यह काफ़ी झिझक के साथ करता हूँ। आज के बड़े कलीसियाई प्रश्न इतने ज्वलन्त हैं कि कोई मनुष्य उन्हें छुए बिना किसी न किसी की प्रिय मान्यताओं से टकराये नहीं रह सकता। परन्तु एक धर्मप्रान्त को अपने अध्यक्ष से यह अपेक्षा रखने का अधिकार है कि वह निरीक्षण-सम्मेलन में अपना मत बताये, और मैं उसकी उचित अपेक्षाओं को निराश नहीं करूँगा। आख़िर मैं मानता हूँ कि यहाँ कोई पादरी ऐसा नहीं जो चाहेगा कि उसका अध्यक्ष केवल एक रंगहीन, महत्त्वहीन व्यक्ति हो, जिसका कोई स्पष्ट मत न हो, या जो जहाज़ के अग्र-भाग की मूर्ति का स्थान भरे, जो चाहे कितनी ही सुन्दर हो, पोत की गति या स्थिरता में कुछ नहीं जोड़ती। इसलिये मैं अपने मन की बात खुलकर कहने का प्रयत्न करूँगा।
निश्चय ही हम सब अपने ही समय के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर आँकने की प्रवृत्ति रखते हैं। फिर भी मेरा साहस के साथ यह मत है कि इंग्लैंड की कलीसिया की वर्तमान स्थिति पिछली दो शताब्दियों के किसी भी काल की तुलना में अधिक संकटपूर्ण और जोखिम-भरी है। चारों ओर क्षितिज अँधेरा और घिरा हुआ है। आगे भी चट्टानों पर टूटती लहरें हैं और पीछे भी, दाहिने हाथ भी संकट हैं और बायें हाथ भी, बाहर से भी संकट हैं और भीतर से भी। यह देखना अभी शेष है कि यह पुराना जहाज़ तूफ़ान को सह पाएगा या नहीं। परन्तु मैं पूरी तरह निश्चित हूँ कि परमेश्वर के अधीन बहुत कुछ चालक-दल के आचरण पर निर्भर करता है। यदि विवेक और पवित्र किया हुआ सामान्य बोध प्रबल रहा, तो हम जीवित रहेंगे; यदि नहीं, तो नष्ट हो जायेंगे।
बाहर से आनेवाले संकटों के विषय में मैं थोड़ा ही कहूँगा। वे मुख्यतः लिबरेशन सोसाइटी की कार्यवाहियों से उत्पन्न होते हैं। वह बेचैन और उत्साही संस्था, रिचर्ड बैक्स्टर और जॉन ओवेन जैसे पुराने नॉनकन्फ़ॉर्मिस्टों के सिद्धान्तों से बहुत दूर हटकर, इंग्लैंड की कलीसिया को राज्य-कलीसिया के पद से हटाने और उसकी सम्पत्ति छीनने, तथा कलीसिया और राज्य के संयोग को समाप्त करने में लगी हुई है। आज तक मुझे इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिखता कि यह आन्दोलन सफल हो रहा है।
इसके विपरीत मेरी यह दृढ़ धारणा है कि कलीसिया अब उस समय से भी अधिक सशक्त है जब यह आन्दोलन पहले-पहल आरम्भ हुआ था।
सीधी सच्ची बात यह है कि जनता का मन उस दशा के लिये तैयार नहीं है जो राज्य-कलीसिया का पद छीने जाने से उत्पन्न होगी, यदि उसे उसके तर्कसंगत परिणामों तक पहुँचाया जाये। निश्चय ही, यदि कलीसिया और राज्य का संयोग टूट जाये, तो सब कलीसियाएँ और पंथ समानता के एक सपाट स्तर पर छोड़ दिये जायेंगे। राज्य किसी एक को दूसरे से बढ़कर कोई कृपा या विशेषाधिकार नहीं देगा। नास्तिक, ईश्वरवादी, मुसलमान, सोसिनियन, यहूदी, रोमन कैथोलिक, एपिस्कोपल, प्रेस्बिटेरियन, कांग्रेगेशनलिस्ट, मेथोडिस्ट, बैपटिस्ट, सब को एक समान उदासीनता से देखा जायेगा। राज्य का स्वयं धर्म से कोई सरोकार नहीं रहेगा, और वह उसकी पूर्ति को मुक्त व्यापार के सिद्धान्तों और स्वैच्छिक व्यवस्था की क्रिया पर छोड़ देगा। एक शब्द में, इंग्लैंड की सरकार अपनी सारी प्रजा को छूट देगी कि वह परमेश्वर की सेवा करे या बाल की, स्वर्ग जाये या किसी और स्थान को, जैसा उसे भाये। राज्य आत्मिक बातों की कोई सुध नहीं लेगा, और एपिक्यूरियन उदासीनता और बेफ़िक्री से देखता रहेगा। राज्य अपनी प्रजा के शरीरों की चिन्ता करता रहेगा, परन्तु उनकी आत्माओं की पूरी तरह उपेक्षा करेगा।
गल्लियो, जो मसीही विश्वास को केवल 'शब्दों और नामों' का विषय समझता था और 'इन बातों की कुछ चिन्ता नहीं करता था,' अंग्रेज़ राजनेता का आदर्श बन जाएगा। ग्रेट ब्रिटेन का शासक पोप का अनुयायी हो सकता है, प्रधानमंत्री मुसलमान, और लॉर्ड चांसलर यहूदी। संसद बिना प्रार्थना के आरम्भ होगी। न्यायालयों में शपथ की आवश्यकता नहीं रहेगी। अगले राजा का राज्याभिषेक वेस्टमिन्स्टर एबी में बिना किसी धार्मिक सेवा के होगा। कारागारों और निर्धनालयों, युद्धपोतों और सैन्य टुकड़ियों में कोई पादरी नहीं रखा जाएगा। संक्षेप में, अविश्वासियों को और उन लोगों को अप्रसन्न न करने के भय से जो मध्यस्थता की प्रार्थना द्वारा परमेश्वर को स्वीकार किए जाने पर आपत्ति करते हैं, मेरा अनुमान है कि सैन्य टुकड़ियों के बैंडों को तर्कसंगत रूप से 'गॉड सेव द क्वीन' बजाने से भी रोक दिया जाएगा। अब क्या ब्रिटिश जनता इस स्थिति को लाया हुआ देखना चाहती है? मैं इस समय एक क्षण के लिए भी इस पर विश्वास नहीं करता। जनता जानती है कि वर्तमान स्थिति में असहमति रखनेवालों को जो कुछ वे चाहें करने की स्वतंत्रता है, बशर्ते उनके पास उसके लिए धन हो। वे किसी नागरिक या धार्मिक प्रतिबन्ध के अधीन नहीं हैं। वे जहाँ चाहें जा सकते हैं, जहाँ चाहें निर्माण कर सकते हैं, जहाँ चाहें प्रचार कर सकते हैं, और जैसे चाहें आराधना कर सकते हैं, बिना किसी से अनुमति माँगे। वे तो कलीसिया के सदस्यों से भी अधिक कर सकते हैं, और उन्हें अधिक स्वतंत्रता है। कलीसिया का कोई सदस्य किसी पादरी के पल्ली में, चाहे वह कितनी ही बुरी तरह उपेक्षित क्यों न हो, उस पल्ली-पुरोहित की सहमति लिए बिना नया गिरजाघर नहीं बना सकता; परन्तु कोई भी असहमति रखनेवाला उसी पल्ली में जाकर प्रार्थनालय बना सकता है। जनता जानती है कि अपनी सब त्रुटियों के होते हुए भी स्थापित कलीसिया कुल मिलाकर हानि से अधिक भलाई करती है, और विशेष रूप से ग्रामीण पल्लियों में राज्य से सम्बन्ध-विच्छेद और सम्पत्ति-अधिग्रहण धर्म की लगभग मृत्यु ही होगी। ये सब बातें जनता देखती और जानती है; और इन्हें जानते हुए अधिकांश अंग्रेज़ों में राज्य से सम्बन्ध-विच्छेद की इच्छा बहुत कम दिखाई देती है। इन सब कारणों से मैं कलीसिया को बाहर से होनेवाले संकट पर अधिक नहीं ठहरूँगा। निस्सन्देह यह कहना असम्भव है कि हम अपनी ही आत्मघाती मूर्खता से अपने बाहरी शत्रुओं के हाथ किस सीमा तक मज़बूत कर सकते हैं। परन्तु जब तक कलीसिया अपने प्रति और धर्म-सुधार के महान सिद्धान्तों के प्रति सच्ची बनी रहेगी, तब तक, मेरा विश्वास है, साधारण विश्वासी जन उसे राज्य से अलग नहीं होने देंगे। उसकी परख उसके फलों से होगी। कलीसिया-रक्षा समिति का सबसे अच्छा सहयोगी वह पादरी है जो सत्य का प्रचार करता है, सत्य के अनुसार जीवन बिताता है, अपने क्षेत्र में परिश्रम करता है, अपने लोगों से भेंट करता है, और अपनी पल्ली के हर स्त्री-पुरुष के लिए एक भला वचन, सहायता का हाथ और प्रेम से भरा हृदय तैयार रखता है। मुक्ति-समिति का सबसे अच्छा मित्र वह आलसी पादरी है जो खाली बेंचों के सामने अधूरे उपदेश देकर सन्तुष्ट रहता है, जिसके यहाँ प्रभु-भोज में भाग लेनेवाले थोड़े हैं, पल्ली का कोई संगठन नहीं, कोई रविवारीय पाठशाला नहीं, रोगियों की कोई नियमित भेंट नहीं, अपने अधिकांश लोगों की कोई जानकारी नहीं, और जो सबको उनके हाल पर छोड़ देता है। ऐसे मनुष्य की पल्ली मुक्तिवाद के उद्देश्य के लिए सबसे निश्चित और सबसे अच्छी सहायता है।
इंग्लैंड की कलीसिया के प्रमुख संकट भीतर से उत्पन्न होते हैं। वे उन झगड़ों, संघर्षों और विवादों में हैं जो उसकी सीमा के भीतर इतने उग्र रूप से भड़क रहे हैं और उसे लगभग टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकी दे रहे हैं। हम जानते हैं किसने कहा है, 'जिस घर में फूट होती है वह खड़ा नहीं रह सकता।' यरूशलेम को तीतुस की सेना ने उतना नष्ट नहीं किया जितना नगर के भीतर यहूदियों के आपसी कलह ने। मैं मानता हूँ कि मुझे राज्य से सम्बन्ध-विच्छेद और सम्पत्ति-अधिग्रहण का भय उतना नहीं जितना अपने बीच के विभाजन और फूट का, और उससे उत्पन्न बिखराव और टूटन का।
मेरी राय में कलीसिया का प्रमुख आन्तरिक संकट हमारे बीच कलीसिया के सदस्यों के एक ऐसे समूह के निरन्तर बने रहने से उत्पन्न होता है, जो, यदि शब्दों और कामों का कोई अर्थ है, तो इंग्लैंड की कलीसिया को प्रोटेस्टेंट-विहीन करने पर तुले हुए दिखाई देते हैं, उन सिद्धान्तों और प्रथाओं को फिर से लाने पर जिन्हें हमारे पूर्वजों ने तीन शताब्दी पहले सोच-समझकर त्याग दिया था, और एक शब्द में, प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के पीछे लौट जाने पर। कि कलीसिया के सदस्यों का ऐसा समूह है, कि उनमें से सैकड़ों ने समय-समय पर रोम में जा मिलकर अपने विचारों की प्रवृत्ति दिखा दी है, कि पच्चीस वर्षों से उनकी कार्यवाहियों ने हमारे अधिकांश अध्यक्षों की ओर से आपत्तियाँ और चेतावनियाँ उत्पन्न की हैं, कि समस्त मसीही जगत की आँखें इसी समूह पर लगी हैं और लोग देख रहे और सोच रहे हैं कि यह कहाँ तक बढ़ेगा, कि रोमी कलीसिया के लोग इसके उदय और प्रगति पर आनन्दित हैं, और दूसरे देशों के सब सच्चे हृदयवाले प्रोटेस्टेंट शोक और विलाप करते हैं—ये सब, मैं कहता हूँ, ऐसे प्रत्यक्ष तथ्य हैं जिन्हें सिद्ध करने में समय गँवाना व्यर्थ है, क्योंकि इनका खण्डन नहीं हो सकता।
