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भ्रातृ-संघ
हल कलीसिया सम्मेलन, 1890 में दिया गया एक संबोधन। एक बात पर मैं आर्कडीकन फरार से पूरी तरह सहमत हूँ। (फ्रेडरिक विलियम फरार, जो 1883 में वेस्टमिंस्टर के आर्कडीकन नियुक्त हुए।) मैं बिना किसी संकोच के मानता हूँ कि हमारे अनेक बड़े और अत्यधिक फैले हुए पल्लियों में निम्न वर्गों के एक बहुत बड़े भाग की दशा, नैतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से, सचमुच शोचनीय है। इससे आँखें मूँद लेना व्यर्थ है। मैं लिवरपूल में रहता हूँ, जो महारानी के राज्य का दूसरा सबसे बड़ा नगर है, और जो कह रहा हूँ वह जानकर कह रहा हूँ! हमारे सब बड़े नगरों के कुछ भागों में, भव्य नगर-भवनों और महलों से थोड़ी ही दूर, ऐसी स्थिति है जो इंग्लैंड के विरुद्ध स्वर्ग तक दुहाई देती है, और स्वर्गदूत को भी रुला देने के लिए काफ़ी है।
स्मरण रहे, जिस वर्ग की मैं बात कर रहा हूँ, वे अविश्वासी या तर्क करनेवाले संशयवादी नहीं हैं, जैसे हमारे क्लबों और चौकों में रहनेवाले ऊँचे दस हज़ार में से बहुत से लोग हैं। ऐसा बिलकुल नहीं! उनमें से अत्यधिक बहुमत की मानसिक स्थिति सब धर्म के प्रति पूर्ण उदासीनता की है। न कलीसिया उन्हें छूती है, न गिरजाघर। वे मसीह के बिना, परमेश्वर के बिना, और स्वाभाविक रूप से किसी नैतिक मानदंड के बिना बहते चले जाते हैं। हमारे फ्रांसीसी पड़ोसी उन्हें ठीक ही 'खतरनाक वर्ग' कहते हैं; और इसमें आश्चर्य नहीं। क्योंकि वे कलीसिया, राज्य और सामाजिक व्यवस्था के लिए एक स्थायी खतरा हैं। सामान्य लूट-खसोट में उनके पास खोने को कुछ नहीं है, और वे सदा उन बातूनी हस्तक्षेपकारियों का शिकार बनने को तैयार रहते हैं जो श्रम को पूँजी के विरुद्ध खड़ा करने, असन्तोष को बढ़ावा देने, और अपने संगी मनुष्यों की अज्ञानता से अपनी रोटी कमाने में आनन्द लेते हैं। इन्हीं खतरनाक वर्गों ने आर्कडीकन फरार के हृदय को झकझोरा है; और मैं पूरे मन से उनके साथ सहानुभूति रखता हूँ।
फिर भी मेरा विश्वास है कि अंग्रेज़ मानवता के इन विशाल समूहों की दशा में ऐसा कुछ नहीं है जिस तक पहुँचा न जा सके, यदि हम सही साधनों का सही उपयोग करें। उन्हें बनानेवाले स्त्री-पुरुषों की धार्मिक और नैतिक दशा में ऐसा कुछ भी असाध्य नहीं है जो तिबेरियुस, नीरो और कालिगुला के दिनों में रोम में न रहा हो। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो पिछली शताब्दी में लंदन में इससे बुरा न रहा हो, जैसा हम होगार्थ के चित्रों से जान सकते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं जिसके लिए मसीह का पुराना सुसमाचार, यदि ठीक रीति से प्रस्तुत किया जाए, पूरी तरह पर्याप्त उपाय न हो। हमें न 'रॉबर्ट एल्समियर' चाहिए, न खेलों की संशोधित पुस्तक, न यूरोप महाद्वीप का-सा रविवार। अस्पष्ट और बेचैन परोपकारवाद, या संगीत, या नृत्य, या चित्रों, या नाटकों से हमें कोई ठोस और स्थायी परिणाम नहीं मिलेगा। ये बातें बुराई की ऊपरी त्वचा को तो छू सकती हैं, पर हृदयों तक नहीं पहुँचतीं। हमें कुछ नया नहीं चाहिए, केवल क्रूस की, लहू की, प्रेम की और हमारे प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य की वही पुरानी कथा चाहिए। ये स्त्री-पुरुष जिन्हें हम नैतिक, सभ्य और मसीही बनाना चाहते हैं, हमारे ही समान मांस और लहू के बने हैं। हमारी तरह उनके भी हृदय और विवेक हैं। यदि मसीह और पवित्र आत्मा ने आपका और मेरा भला किया है, तो मेरा मानना है कि हमें मनुष्यों के किसी भी 'पद, वर्ग या दशा' से कभी निराश नहीं होना चाहिए, चाहे वे इस समय कितने ही गिरे हुए और पतित क्यों न दिखाई देते हों। पुराना सुसमाचार घिस नहीं गया है, और जो उसने किया है वह फिर कर सकता है।
पर यह कहना अनावश्यक है कि किसी उपाय का मूल्य बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस रीति से किया जाता है। क्या कलीसिया हमारी आराधना न करनेवाली जनसंख्या की विशाल भीड़ तक सुसमाचार पहुँचाने के लिए सर्वोत्तम और सबसे प्रभावी साधन का उपयोग करती है? आर्कडीकन फरार का तर्क है कि वह नहीं करती, और वे चाहते हैं कि हम भ्रातृ-संघों के रूप में एक नया यंत्र आज़माएँ। यहीं वह बिन्दु है जहाँ, उनके उत्साह और सक्षम पैरवी के प्रति पूर्ण आदर रखते हुए भी, मुझे उनका और उनके समर्थकों का साथ छोड़ना पड़ता है। मेरा कहना है कि जहाँ कहीं इंग्लैंड की कलीसिया का वर्तमान तंत्र ठीक रीति से चलाया जाता है, वहाँ हमें और कुछ नहीं चाहिए। हमारी वर्तमान व्यवस्था, योग्य हाथों में, असफल नहीं है। जनसाधारण तक पहुँचने के लिए हमें भ्रातृ-संघ नहीं चाहिए। संक्षेप में, मेरी आपत्ति दोहरी है। मेरा तर्क है कि अच्छी तरह चलाए जानेवाले पल्लियों में इस नेक इरादे से बनाए गए नए यंत्र की आवश्यकता नहीं है; और किसी भी पल्ली में यह कभी सुविधाजनक रूप से काम नहीं करेगा।
मेरे अभी-अभी कहे गए कथन को कुछ शब्दों की व्याख्या से सुरक्षित करना आवश्यक है। यदि बड़ी मज़दूर-वर्गीय पल्लियों के संरक्षक अनुचित नियुक्तियाँ करना चाहें और गोल खूँटियों को चौकोर छेदों में ठोंकना चाहें; यदि वे ऐसे शान्त, नीरस पुरुषों को नियुक्त करें जिनमें लोकप्रिय वरदानों का अभाव है, जो सोने के समान खरे तो हैं, पर उतने ही भारी भी; यदि वे ऐसे पुरुषों को नियुक्त करें जो केवल प्रचारक हैं और पासबान नहीं, जिनका सारा समय मंच की आतिशबाज़ी रचने में लगता है, जो केवल उपदेश-कला के वक्ता हैं, जो रविवार को समझ में नहीं आते और सप्ताह के दिनों में दिखाई नहीं देते; या ऐसे पुरुषों को जो संगीत, गायन और कलीसिया की धार्मिक-विधि की सेवाओं के सिवा और कुछ सोच ही नहीं सकते—यदि इंग्लैण्ड की कलीसिया का यही चित्र है, तो मैं खुलकर मानता हूँ कि आप जनसाधारण तक नहीं पहुँचेंगे। जिस बड़ी खाई पर आर्कडीकन और मैं दोनों समान रूप से शोक करते हैं, वह पाटी नहीं जाएगी। परन्तु मुझे ऐसा पादरी दीजिए जो सचमुच मसीह को जानता हो और जिसमें पवित्र आत्मा हो, जो प्रचारक होने के साथ-साथ पूरा पासबान भी हो; निश्चित और स्पष्ट मत रखनेवाला पुरुष, उन अभागे पादरियों में से नहीं जो कहते हैं कि धर्म में कुछ भी निश्चित नहीं है और यह कोई मायने नहीं रखता कि मनुष्य क्या सिखाता है, बस वह सच्चे मन का हो; ऐसा पुरुष जो इस बात का ध्यान रखता है कि कलीसिया में प्रार्थना-पुस्तक की सेवाओं के साथ-साथ मिशन-कक्षों में आराधना की सादी, हार्दिक और उत्साहपूर्ण सभाएँ भी हों; जो पुरोहिती चोगे के बिना सड़क पर भी उसी तरह प्रचार कर सके जैसे मंच पर; जो अपने क्षेत्र की हर गली में आए-जाए और किसी गन्दे तहखाने में आधे दर्जन फटेहाल लोगों से भी उसी हार्दिकता से सीधा सुसमाचार कहे जैसे कलीसिया में पाँच सौ सुवेशित लोगों से; ऐसा पुरुष जो आग, प्रेम, सहानुभूति, चतुराई, धीरज और पवित्र किए गए सामान्य विवेक से भरा हो, चाहे वह बुद्धि और पुस्तकीय विद्या में दिग्गज न भी हो। मुझे ऐसा पादरी दीजिए जिसके पास सहायक पादरियों, क्षेत्र-भ्रमण करनेवालों, पवित्रशास्त्र-पाठकों, बाइबल-स्त्रियों और अपनी कक्षाओं के घर-घर जानेवाले रविवारीय पाठशाला-शिक्षकों का नियमित दल तो हो ही, साथ ही प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवाले ऐसे अनेक लोग भी हों जो स्वेच्छा से मसीह के काम में हाथ बँटाते हैं, और आक्रामक सुसमाचार-प्रचार का काम निरन्तर करते रहना अपना सौभाग्य और कर्तव्य समझते हैं। ऐसे स्वभाव का पादरी मुझे किसी बड़ी मज़दूर-वर्गीय आबादी में दीजिए (और ऐसे पादरी मिलते भी हैं), तो मुझे किसी बन्धुत्व-संघ की आवश्यकता नहीं दिखती। मुझे इस नई मशीन के लिए कोई स्थान नहीं दिखता, और मुझे विश्वास नहीं कि ऐसा पादरी उसे चाहेगा भी। मेरा विश्वास है कि वह आपसे कहेगा, ‘मुझे कुछ नया नहीं चाहिए। हमारी पुरानी मशीनरी बिलकुल पर्याप्त है।’
मैं यह नहीं कहता कि जैसे पादरी का मैंने वर्णन किया है वह असम्भव को सम्भव कर दिखाएगा, यदि आप इतने नासमझ हों कि उसे 15,000 या 20,000 लोगों की पल्ली सौंप दें। मैं यह नहीं कहता कि वह किसी भी पल्ली के हर पुरुष या स्त्री को परिवर्तित कर देगा, या उन तक पहुँच जाएगा, या उन्हें सदाचारी बना देगा। मैं प्रभु के आने से पहले सहस्राब्दी की आशा नहीं रखता। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि वह गहरी छाप छोड़ेगा, और यह प्रमाणित कर देगा कि हमारे लोगों के सबसे निचले स्तरों तक भी हमारी पुरानी मशीनरी से पहुँचा जा सकता है, और बन्धुत्व-संघों की कोई आवश्यकता है ही नहीं।
फिर भी, मेरे विचार में बन्धुत्व-संघों की इस योजना पर तीन भारी विशेष आपत्तियाँ हैं, जिन्हें मैं यथासम्भव संक्षेप में कहूँगा।
(i) मेरी प्रमुख आपत्ति यह है कि उन्हें बनाने के लिए योग्य व्यक्तियों की पर्याप्त संख्या मिलने की सम्भावना अत्यन्त कम है। बारूद के बिना किसी गढ़ पर गोलाबारी नहीं की जा सकती, और आटे के बिना रोटी नहीं बनाई जा सकती। जो पुरुष अपनी जीविका के लिए पेशेवर आय पर बिलकुल निर्भर नहीं हैं, उनकी संख्या सदा बहुत सीमित होती है, और यदि बन्धुत्व-संघों के सदस्यों को वेतन नहीं मिलना है, तो मुझे विश्वास है कि वे बहुत थोड़े होंगे, सम्भवतः लन्दन को छोड़कर। यदि उन्हें वेतन मिलना है, तो मुझे नहीं दिखता कि वे सहायक पादरियों और साधारण-जन सेवकों से किस बात में भिन्न होंगे। फिर भी मैं इस बात पर अधिक नहीं ठहरूँगा। मैं मान लूँगा कि ऐसे पुरुष मिल सकते हैं।
(2) मेरी दूसरी आपत्ति यह है कि मैं कल्पना नहीं कर सकता कि भाईचारा-संघों को हमारी वर्तमान पल्ली-व्यवस्था में कैसे बिठाया जा सकता है, और उनसे बिना निरन्तर टकराव, संघर्ष, मनमुटाव और लज्जाजनक झगड़ों के जोखिम के काम कैसे लिया जा सकता है। यदि संघ के सदस्य पादरी हैं, तो क्या उन्हें अध्यक्ष के अधीन अनुज्ञापत्र दिया जाएगा कि वे अध्यक्ष के निर्देशों के अनुसार इन्कम्बेंट से स्वतन्त्र होकर काम करें, या उन्हें इन्कम्बेंट के अधीन अनुज्ञापत्र दिया जाएगा, और वे उसके वर्तमान सहायक पादरियों के दल की अतिरिक्त पूर्ति बन जाएँगे? और यदि दूसरी ओर वे सामान्य जन होंगे, तो मैं जानना चाहूँगा कि उन्हें कौन चुनेगा, उनकी योग्यताओं का निर्णय कौन करेगा, उनके दैनिक कार्य की रूपरेखा कौन बनाएगा और उसकी देखरेख कौन करेगा, और वे हमारे वर्तमान पवित्रशास्त्र-वाचकों और सामान्य जन सहायकों से किस बात में अधिक उपयोगी होंगे। इन सब बातों में मुझे कठिनाइयों की भारी फसल दिखाई देती है। इंग्लैंड की कलीसिया की पल्ली-व्यवस्था कभी सफलतापूर्वक नहीं चलेगी, यदि आप बागडोर को एक से अधिक हाथों में थमाने का प्रयत्न करें। यह वैसा ही होगा जैसा एक जहाज़ में दो कप्तान रखना। रेक्टर और विकर स्वर्गदूत और सराप नहीं, वरन् हाड़-माँस के मनुष्य हैं। उनकी भी अन्य मनुष्यों के समान भावनाएँ हैं, और उन्हें अपनी योजनाओं और अपने पदीय स्थान में हस्तक्षेप पसन्द नहीं। किसी सही सोच रखनेवाले इन्कम्बेंट को जितने चाहें और जीवित कार्यकर्ता दे दीजिए, वह उन सबके लिए कुछ न कुछ काम ढूँढ़ लेगा। चाहें तो उन्हें भाईचारा-संघ कहिए, और यदि वे चाहें तो सब साथ रहें। परन्तु शान्ति के लिए वे सब इन्कम्बेंट के निर्देशन में ही काम करें। (3) मन्नतों के विषय में मैं बहुत कुछ कह सकता हूँ। परन्तु समय इस विवादित विषय की पूरी चर्चा की अनुमति नहीं देता। मुझे साफ़ कहना चाहिए कि मुझे उनकी बढ़ती संख्या से तीव्र अरुचि है। हमारी कलीसिया के सब सदस्यों से जो बपतिस्मा और दृढ़ीकरण की मन्नतें अपेक्षित हैं, उनसे मैं सन्तुष्ट हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं चाहता। आरम्भिक पन्द्रह शताब्दियों के कलीसिया-इतिहास का प्रकाश मुझे मठवाद को पुनर्जीवित करने के प्रत्येक प्रकट प्रयास को गहरे सन्देह से देखने को विवश करता है। स्त्री-पुरुषों के संघ बहुधा घोषित निर्धनता और ब्रह्मचर्य की पताका के नीचे स्थापित किए गए, और अत्यन्त लज्जाजनक रीति से समाप्त हुए। अनुभव ‘मनमानी उपासना’ और स्वयं थोपे हुए तपस्वी जीवन के पक्ष में नहीं है। ऐसी बातों में ‘बुद्धि का दिखावा’ बहुत होता है, और अज्ञानी और उथले मसीहियों को कुछ समय तक बहुत भाती हैं। परन्तु वे केवल ‘शरीर की तृप्ति’ करती हैं। यदि वे लोग जो अपने को परिवर्तित और क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के सच्चे विश्वासी कहते हैं, बिना गम्भीरता से मन्नत दर्ज कराए पवित्र, आत्म-त्यागी और आज्ञाकारी नहीं हो सकते, तो मुझे साफ़ कहना होगा कि मेरे विचार में उनसे अधिक भलाई की आशा नहीं की जा सकती। इस समय मैं देखता हूँ कि बीसियों सहायक पादरी और पवित्रशास्त्र-वाचक केवल अनुज्ञापत्र-प्राप्त मनुष्यों के रूप में, बिना किसी मन्नत के, अत्युत्तम काम कर रहे हैं। यदि प्रस्तावित भाईचारा-संघों के सदस्य बिना मन्नतों के वैसा काम नहीं कर सकते, तो मेरे विचार में यह सार्वजनिक स्वीकारोक्ति होगी कि वे निम्न श्रेणी के मनुष्य हैं।
परन्तु अन्त में, मुझे कांग्रेस से स्पष्ट कहना चाहिए कि अनपहुँचे वर्गों के विषय में हमारे ‘वर्तमान संकट’ की जड़ें सामान्यतः समझी जानेवाली जड़ों से कहीं अधिक गहरी हैं। भाईचारा-संघों या किसी भी अन्य नवीनतम तन्त्र से वे नहीं छुई जाएँगी। इस समस्या का सच्चा समाधान यह है कि सारे देश में हमारे सामान्य जन प्रभु-भोज में सहभागी होनेवालों को जगाया जाए, और उन्हें अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों का बोध कराया जाए। यही सच्चा विकल्प है। हमें अपने प्रभु-भोजियों के बीच उतने ही जागृति की आवश्यकता है जितनी आराधना न करनेवाले वर्गों के बीच। हम इस विषय में बहुत समय से अन्धे और सोए हुए रहे हैं। मैं अपना आशय समझाता हूँ। तो मैं निःसंकोच कहता हूँ कि इस समय हमारी कलीसिया के सामान्य जन मसीह के प्रत्यक्ष कार्य में और देश में मसीही धर्म की उन्नति में वहाँ नहीं हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए। पहली शताब्दी की कलीसिया और उन्नीसवीं शताब्दी की अंग्रेज़ कलीसिया के बीच एक शोचनीय खाई है। सारे धर्म-कर्म को पल्ली के पादरी पर छोड़ देने की एक हानिकारक आदत सारे देश में फैल गई है, और अधिकांश सामान्य कलीसियाई जन समझते हैं कि कलीसिया से उनका बस इतना ही नाता है कि वे उसके अनुग्रह के साधनों का लाभ उठाएँ, जबकि उसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए अपनी ओर से व्यक्तिगत सक्रिय परिश्रम के रूप में कुछ भी योगदान नहीं देते। कलीसिया जानेवालों की विशाल बहुसंख्या ऐसा मानती प्रतीत होती है कि जब वे रविवार को कलीसिया जा चुके और प्रभु-भोज ले चुके, तब उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया, और दूसरों को चेताने, सिखाने, डाँटने, उन्नत करने, दया के कामों को बढ़ाने, सुसमाचार-प्रचार में सहायता करने, या पाप को रोकने और संसार में मसीह के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए उँगली उठाने तक की उन पर तनिक भी बाध्यता नहीं है। उनका बस यही विचार है कि निरन्तर पाते रहें, परन्तु स्वयं कुछ भी न करें। वे सही रेलगाड़ी में अपनी सीटों पर बैठ चुके हैं, और उन्हें बस चुपचाप बैठे रहना है, जबकि पादरीय इंजन उन्हें स्वर्ग की ओर खींचता है, और शायद वे आधे सोए हुए हैं। यदि कोई इफिसुस, फिलिप्पी या थिस्सलुनीके का सामान्य कलीसियाई जन मृतकों में से जी उठे और देखे कि अधिकांश सामान्य कलीसियाई जन इंग्लैंड की कलीसिया के लिए कितना कम काम करते हैं, तो उसे अपनी आँखों पर विश्वास न होगा। आदिम कलीसिया के सामान्य जन के आदर्श और अंग्रेज़ आदर्श में वही अन्तर है जो प्रकाश और अन्धकार में, काले और सफ़ेद में है। एक जागता हुआ और जीवित था, और सदा अपने स्वामी के काम में लगा रहता था। दूसरा बहुधा व्यावहारिक रूप से सोया हुआ, सुस्त और निकम्मा है, और पल्ली का धर्म-कर्म पादरी के हाथों में छोड़कर सन्तुष्ट है।
मैं समझता हूँ कि कोई भी इस बात से इनकार करने की सोच नहीं सकेगा कि जिन कलीसियाओं को नए नियम की पत्रियाँ लिखी गई थीं, वे आज हमारी अपनी कलीसिया की तुलना में कहीं अधिक जीवन्त दशा में थीं। उनके पास न छपी हुई पुस्तकें थीं, न दान-सम्पत्ति, न बड़े गिरजाघर। फिर भी उन्होंने जगत को उलट-पुलट कर दिया, अन्यजातियों के मन्दिर खाली कर दिए, यूनानी और रोमी दार्शनिकों को निरुत्तर कर दिया, और हर वर्ष संख्या तथा प्रभाव में बढ़ती गईं। इसका कारण क्या था? मैं उत्तर देता हूँ कि इन आदि समुदायों में सामान्य विश्वासियों को जो प्रमुख स्थान प्राप्त था, वही उनके निर्विवाद बल, वृद्धि, समृद्धि और सफलता का सबसे बड़ा रहस्य था। उन दिनों कोई निष्क्रिय साझेदार नहीं थे। कलीसिया-देह का प्रत्येक सदस्य काम करता था। हर एक अपने ऊपर कुछ न कुछ करने का दायित्व समझता था। उन्हें भ्रातृ-मण्डलियों की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि सब भाई ही थे। यदि रोमियों की पत्री के 16वें अध्याय से अनुमान लगाया जाए, तो सब बपतिस्मा पाए हुए सदस्य, चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ, पूरी कलीसिया-देह की भलाई और उन्नति में सीधा और सक्रिय रुचि रखते थे। वे ऐसी पालतू, अज्ञानी भेड़ें नहीं थीं जिन्हें कोई निरंकुश याजकीय चरवाहा अपने इशारे पर इधर-उधर हाँकता हो। सेना की सर्वोत्तम रेजिमेंट वही होती है जिसमें अधिकारी और सिपाही दोनों पूरी टुकड़ी की कार्यकुशलता में समान रुचि रखते हैं। यह वह रेजिमेंट है जिसमें अधिकारी सिपाहियों पर भरोसा करते हैं और सिपाही अधिकारियों पर, जैसा उन्होंने तब किया था जब ज़ूलू युद्ध में रॉर्क्स ड्रिफ्ट की उस घटनापूर्ण रात भर वे लड़े थे।
पाद-टिप्पणी: जनवरी 1879। 103 जनों की एक ब्रिटिश टुकड़ी ने ज़ूलुओं की एक विशाल भीड़ के विरुद्ध अपना घेरा-शिविर सफलतापूर्वक बनाए रखा।
,br /> यह वह रेजिमेंट है जिसका प्रत्येक सिपाही समझदार है और इस प्रकार व्यवहार करता है मानो अभियान की सफलता उसी पर निर्भर हो। यह वह रेजिमेंट है जिसका प्रत्येक सिपाही अपना कर्तव्य जानता है, अपने पेशे पर सम्मानपूर्वक गर्व करता है, और झण्डे के लिए अन्तिम साँस तक लड़ेगा चाहे सारे अधिकारी गिर जाएँ। आदि कलीसिया प्रेरितों के दिनों में ऐसी ही रेजिमेंट थी। उसके अपने अधिकारी थे, अर्थात् अध्यक्ष और सेवक। उसमें पद-क्रम, उचित अधीनता और अनुशासन था। परन्तु उसके बल की मुख्य कमानी और रीढ़ उसके सामान्य विश्वासियों का उत्साह, समझ और सक्रियता थी। फिलिप्पियों की पत्री ‘अध्यक्षों और सेवकों समेत’ पवित्र लोगों के नाम लिखी गई थी। काश कि इंग्लैंड की कलीसिया के संगठन में भी कुछ ऐसा ही होता! तब हमें भ्रातृ-मण्डलियों की आवश्यकता ही न पड़ती।
इंग्लैंड की कलीसिया के प्रति गहरे स्नेह के होते हुए भी मैं इस निष्कर्ष से बच नहीं सकता कि सामान्य विश्वासियों के विषय में उसकी व्यवस्था इस समय दोषपूर्ण और पवित्रशास्त्र से हटकर है, और इसी कारण भ्रातृ-मण्डलियों की यह भली-नीयत की योजना सामने आई है। मैं सन् 1890 के अंग्रेज़ सामान्य एपिस्कोपल विश्वासी की स्थिति का मेल अठारह शताब्दी पहले की किसी भी प्रेरितिक कलीसिया में उसके भाई की स्थिति से नहीं बैठा सकता। मैं इन दोनों को आपस में सुसंगत नहीं कर पाता। मुझे ऐसा दिखता है कि इंग्लैंड की कलीसिया के नियमित कार्य-संचालन में प्रायः सब कुछ पादरी-वर्ग के हाथों में छोड़ दिया गया है और सामान्य विश्वासियों को लगभग कुछ भी नहीं सौंपा गया! पादरी-वर्ग ही सब कुछ तय करता है! पादरी-वर्ग ही सब कुछ चलाता है! पादरी-वर्ग ही सब कुछ व्यवस्थित करता है! सामान्य विश्वासियों को व्यवहार में न कोई वाणी, न स्थान, न मत, न अधिकार दिया गया है, और पादरी-वर्ग जो भी उनके लिए ठहरा दे, उन्हें वही मानना पड़ता है। इस सब में कोई जान-बूझकर किया गया अनादर नहीं है। सामान्य विश्वासियों की विश्वसनीयता और योग्यता पर रंचमात्र भी आक्षेप नहीं है। परन्तु किसी न किसी कारण से वे उपेक्षित छोड़ दिए गए हैं, एक विशाल कलीसियाई निगम में सक्रिय सदस्य नहीं बल्कि निष्क्रिय ग्रहणकर्ता, एक भारी-भरकम और बुरी तरह चलाए जा रहे कारोबार में कार्यकर्ता नहीं बल्कि निष्क्रिय साझेदार। संक्षेप में, इंग्लैंड की कलीसिया के सामान्य संचालन में सामान्य कलीसिया-सदस्यों को एक किनारे की पटरी पर डाल दिया गया है। अनावश्यक समझे गए सिपाहियों की तरह वे पंक्ति से बाहर निकल गए, पीछे हट गए और दृष्टि से ओझल हो गए। आज का परिणाम यह है कि अंग्रेज़ सामान्य विश्वासी उस स्थान से बहुत नीचे हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए, और अंग्रेज़ पादरी-वर्ग अपने स्थान से बहुत ऊपर। संक्षेप में, दोनों पक्ष गलत जगह पर हैं। पादरी-वर्ग के पास काम बहुत अधिक है और सामान्य विश्वासियों के पास बहुत कम, और सारा परिणाम यह है कि जन-समूह तक सुसमाचार नहीं पहुँचता। मैं नहीं जानता कि वर्तमान स्थिति अब सुधारी जा सकती है या नहीं। परन्तु मैं कभी यह मानना नहीं चाहता कि लड़ाई जीतने के लिए बहुत देर हो चुकी है, और मैं यह नहीं मान सकता कि भ्रातृ-मण्डलियों से बातें किसी भी प्रकार सुधरेंगी। मैं चाहूँगा कि प्रत्येक पल्ली-अधिकारी इसे अपना नियम बना ले कि हर सहभागी को सिखाए कि वह इंग्लैंड की कलीसिया का एक अभिन्न अंग है और उसकी भलाई के लिए जो कुछ कर सकता है, करने को बाध्य है—भेंट करने, सिखाने, चेतावनी देने, समझाने, उन्नति करने, सहायता करने, सम्मति देने, सांत्वना देने, सम्भालने और सुसमाचार सुनाने के लिए; सोए हुओं को जगाने, खोज करनेवालों को आगे ले चलने और पवित्र लोगों को दृढ़ करने के लिए; अपने वरदानों, समय और अवसर के अनुसार हर कहीं मन फिराव, विश्वास और पवित्रता को बढ़ावा देने के लिए। उसे अपने लोगों को शिक्षित करना चाहिए कि वे सब कुछ पादरी पर छोड़ देने की आजकल की आलसी रीति को छोड़ें और निष्क्रिय साझेदारों के बदले सक्रिय कार्यकर्ता बनें। इस विषय में मैं मानता हूँ कि पिछली शताब्दी में इस देश की आवश्यकताओं को समझनेवाले पहले व्यक्ति जॉन वेस्ली थे। पुराने मैथोडिस्टों ने कलीसिया-जनों को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया था। उनके यहाँ हर नया सदस्य उनके उद्देश्य के लिए एक नया स्वदेशी प्रचारक होता था, और नाम लिखे जाते ही पहला प्रश्न यह पूछा जाता था, ‘तुम क्या करने जा रहे हो?’ जिस अन्धी मूर्खता से जॉन वेस्ली के साथ व्यवहार किया गया, वह हमारी कलीसिया के लिए एक विपत्ति थी। हमें उसकी पुस्तक से एक पन्ना सीख लेना चाहिए था। इंग्लैंड की कलीसिया की दशा तब तक कभी अच्छी नहीं होगी जब तक उसका प्रत्येक सदस्य यह न समझ ले कि मसीह और उसकी कलीसिया के प्रति उसका एक कर्तव्य है, और उस कर्तव्य को निरन्तर अपने सामने न रखे।
मेरे आदरणीय पादरी भाइयो और सामान्य विश्वासी भाइयो, समय संकटपूर्ण है, और यही हमारे लिए भेंट का दिन है। हमारी स्थापित कलीसिया में यह कभी न चलेगा कि दीवारों पर तो अधिकारियों को तैनात किया जाए, और सामान्य सैनिक अपनी छावनियों में निठल्ले बैठे रहें। पादरी-वर्ग और सामान्य विश्वासियों को मिलकर काम करना सीखना होगा। यदि हमारी कलीसिया को और अधिक समय तक टिके रहना है, तो हमें केवल सेवकों की प्रेरितीय परम्परा ही नहीं, वरन् सामान्य विश्वासियों की भी प्रेरितीय परम्परा चाहिए। हमें इस दशा में एक कलीसिया दीजिए, तो हमें किसी भ्रातृ-संघ की आवश्यकता नहीं।
