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वर्तमान संकट
लिवरपूल डायोसीज़ के वार्षिक सम्मेलन में दिया गया एक सम्बोधन,
1892।
पूज्य पादरी भाइयो और सामान्य विश्वासी भाइयो, मुझे एक बार फिर आपके साथ हमारे वार्षिक डायोसीज़ सम्मेलन में मिलने का अवसर मिला है, और मुझे आशा है कि हमारी कार्यवाही पूर्व अवसरों की अपेक्षा कम रोचक या कम लाभदायक न होगी। ग्यारह वर्ष के अनुभव के बाद मुझे इस बात का विश्वास नहीं है कि हमारी व्यवस्थाओं में बहुत सुधार की गुंजाइश है। मैं अन्य सम्मेलनों के विवरण सावधान कौतूहल से पढ़ता हूँ, और मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि हमारा अपना सम्मेलन किसी भी सम्मेलन से तुलना में ठहर सकता है। जो सभा वर्ष में केवल दो दिन के लिए बैठती है, वह समय गँवाना सहन नहीं कर सकती, और अपना अधिकांश समय अनेक छोटे और कम महत्त्व के प्रस्तावों के बजाय चार भली-भाँति चुने हुए विषयों को देने की योजना मेरे विचार में सबसे बुद्धिमानी की और सबसे उत्तम है।
अपनी पिछली रीति के अनुसार मैं तुरन्त अपने ही डायोसीज़ और सामान्यतः कलीसिया के उन कुछ विषयों के विषय में कुछ बातें कहूँगा, जिनके बारे में आप अपने अध्यक्ष से कुछ जानकारी और कुछ मत की अभिव्यक्ति की उचित अपेक्षा कर सकते हैं। मैं दोनों को संक्षेप में ही छुऊँगा, क्योंकि मैं आपका ध्यान एक ऐसे विषय की ओर खींचना चाहता हूँ जिसका महत्त्व किसी एक डायोसीज़ की दशा से, या मसीह की दृश्य कलीसिया की किसी एक शाखा से, कहीं अधिक व्यापक है। वह विषय तथाकथित ‘पुराने नियम की उच्चतर आलोचना’ है।
1. जहाँ तक हमारे अपने डायोसीज़ के विषयों का सम्बन्ध है, वार्षिक विवरण सदा की भाँति मिला-जुला है। हमारे क्षितिज पर अनेक बादल हैं, परन्तु नीले आकाश के भी कुछ टुकड़े कम नहीं हैं। नीले पक्ष में मैं सबसे पहले और सबसे प्रमुख स्थान पर उस प्रयास की सन्तोषजनक सफलता को रखता हूँ जो हमारे डायोसीज़ के अनेक पादरियों की बहुत अल्प आय को प्रतिवर्ष पूरा करने के लिए एक भरण-पोषण निधि स्थापित करने के लिए किया गया था। इस प्रारम्भिक आन्दोलन को अनेक उदार सामान्य विश्वासियों से जो दयापूर्ण प्रत्युत्तर मिला, उसने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया है, और मेरी समिति को कम वेतन पानेवाले अनेक पादरियों के हृदय आनन्दित करने में समर्थ किया है। मुझे सन्तोष है कि यह योजना सही दिशा में एक कदम है, और मुझे आशा है कि यह उत्तरोत्तर उन्नति करती रहेगी। जिन सब ने मेरी सहायता की है, उन्हें मैं सार्वजनिक रूप से अपना हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। मेरा विश्वास है कि यदि अनेक और सामान्य विश्वासियों को इस योजना के अस्तित्व का पता होता, तो वे इसे सहयोग देते, और मुझे विश्वास है कि थोड़े और परिश्रम से प्रत्येक पदवृत्ति की वार्षिक आय सरलता से 250 या 300 पौंड प्रतिवर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि भरण-पोषण का सिद्धान्त लंकाशायर में उतना ही सफल क्यों न हो जितना स्कॉटलैंड में होता है, जबकि इतनी बड़ी पूँजी जुटाने की सम्भावना कि उसके ब्याज से सब निर्धन पदवृत्तियों को सम्पन्न किया जा सके, मुझे कल्पनालोक की बात और पहले से भी अधिक दूर की लगती है, क्योंकि दूर क्षितिज में राजकीय संरक्षण की समाप्ति विशाल रूप में मँडरा रही है। नीले आकाश के अन्य टुकड़ों के विषय में, यदि समय अनुमति देता, तो मैं बहुत कुछ कह सकता था। चर्च मिशनरी सोसाइटी, पवित्रशास्त्र-पाठक सोसाइटी और मर्सी नाविक-मिशन को डायोसीज़ द्वारा दिया गया निरन्तर और बढ़ता हुआ सहयोग; दृढ़ीकरण के लिए उम्मीदवारों की बहुत बड़ी संख्या, यह ध्यान में रखते हुए कि डायोसीज़ में हमारे केवल दो सौ उपासनागृह हैं; उपासनागृहों और मिशन-कक्षों के निर्माण की स्थिर प्रगति, यद्यपि अभी बहुत कुछ करना शेष है, जैसे वाल्टन और केन्सिंग्टन फ़ील्ड्स में; और अन्त में, परन्तु कम नहीं, संयम के उद्देश्य को जीवित रखने की वह निरन्तर ऊर्जा, इस भारी क्षति के होते हुए भी जो उसे मेरे अपने प्रिय मित्र, उसके अमूल्य पक्षधर, श्रीमान क्लार्क एस्पिनॉल के उठ जाने से हुई है—ये सब गहरे धन्यवाद के कारण हैं, और मैं आपके अध्यक्ष के रूप में इन्हें सामने लाना अपना कर्तव्य समझता हूँ। बाहर के लोगों में से बहुत कम को उन कठिनाइयों का थोड़ा भी अनुमान है जिनसे लिवरपूल जैसे नए डायोसीज़ की शैशवावस्था घिरी हुई है, और यदि मैं पादरियों और सामान्य विश्वासियों का, तथा परमेश्वर का भी, उस सारी सहायता के लिए सार्वजनिक धन्यवाद न करूँ जो आपके बीच आने के बाद से मुझे मिली है, तो मुझे अपने आप पर लज्जा होगी।
हमारे डायोसीज़ के क्षितिज के बादलों वाले पक्ष में कुछ ऐसी बातें हैं जिनका प्रतिवर्ष उल्लेख करना पीड़ादायक है, पर उन्हें छिपाना व्यर्थ है। मैं जानता हूँ कि जो अध्यक्ष सब कुछ गुलाबी रंगों में चित्रित नहीं करता और अपने डायोसीज़ की ‘कमियों’ को दबाकर नहीं रखता, उसे निराशावादी कहकर दोष दिया जाता है। मेरा विवेक मुझे ऐसा करने नहीं देगा, और मुझे निश्चय है कि यह बुरी नीति है। व्यापारिक मामलों में ‘हिसाब में हेरा-फेरी’ करना कभी काम नहीं आता।
कलीसिया के मामलों में अपनी कमियों को जानना उन्हें सुधारने की ओर एक कदम है। इससे इनकार करना व्यर्थ है कि हमारी जनसंख्या के बड़े-बड़े समूह किसी भी आराधना में कभी उपस्थित नहीं होते, कि हमारे कम नहीं उपासनागृह आधे से अधिक खाली रहते हैं, कि निर्धन क्षेत्रों में हमारी कुछ कलीसियाई पाठशालाएँ समाप्त हो जाने के संकट में हैं और उन्हें तुरन्त और उदार सहायता की आवश्यकता है, कि हमारी डायोसीज़ की संस्थाओं को अत्यन्त दयनीय रूप से सहायता मिलती है, फिर भी उन्हें वह धन न देने का दोष दिया जाता है जो उन्हें प्राप्त ही नहीं हुआ, और कि कुछ पल्लियों में दृढ़ीकरण पाने वालों और प्रभु-भोज में सम्मिलित होने वालों की संख्या जितनी होनी चाहिए उससे कहीं कम है। निःसन्देह ये सब पीड़ादायक तथ्य हैं, और इनसे आँखें मूँदना व्यर्थ है। इसके विपरीत, हमारी सर्वोच्च बुद्धिमानी यही है कि हम अपनी आँखें यथासम्भव पूरी खोलें, इन्हें स्थिर दृष्टि से देखें, और अपनी दशा सुधारने के लिए हर उपाय काम में लाएँ। फिर भी मेरा विश्वास है कि हमारे पास लज्जित होने का कोई बड़ा कारण नहीं है। हम इस डायोसीज़ में अपने निर्बल स्थानों को जानते हैं, और वे हमें व्यथित करते हैं। बहुत सम्भव है कि यदि हम अन्य डायोसीज़ की भीतरी दशा जानते, तो पाते कि वे हमसे बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं, और परिश्रमी पादरियों के एक बहुत बड़े अनुपात के विषय में मुझे निश्चय है कि हमारा क्षेत्र देश के किसी भी क्षेत्र से तुलना में ठहर सकता है।
मैं अपने धर्मप्रान्त के दो सौ पदधारी पादरियों और उनके सहायकों का, उस सब के लिए जो वे कर रहे हैं, हृदय से धन्यवाद करता हूँ। मैं आपकी भारी कठिनाइयों को जानता हूँ—धर्मप्रान्त में 12,00,000 लोग हैं, प्रत्येक पदधारी पर 6,000, ऐसा असन्तुलन देश के किसी और भाग में नहीं मिलता—मैं उन्हें जानता हूँ, और मुझे आपके लिए गहरी संवेदना है। परन्तु यहोशू के पहले अध्याय के ये शब्द स्मरण रखिए, 'दृढ़ और साहसी बने रहो।' आगे बढ़ते जाइए, डटे रहिए, और कभी निराशा या 'भलाई करने में थकावट' के आगे न झुकिए। इफिसुस और कुरिन्थ में पौलुस की दशा आपसे कहीं बुरी थी, और उसे मनुष्यों की सहायता भी बहुत कम मिली थी। फिर भी वह थका होने पर भी पीछा करते हुए सदा आगे बढ़ता गया। हर प्रकार का आक्रामक सुसमाचार-प्रचार कीजिए। नियमित, धैर्यपूर्ण घर-घर की भेंट को दुगुना और फिर दुगुना कीजिए। जवानों को इकट्ठा कीजिए और उनसे दयालुता और सौहार्द से व्यवहार कीजिए। सब बातों में अपने स्थिर और भक्त साधारण विश्वासियों की सहायता माँगिए, और उन्हें दिखाइए कि आप उन्हें भी उतना ही कलीसिया का अंग मानते हैं जितना अपने आप को। अपने प्रचार-मंचों से प्रभु यीशु मसीह को, उसके सब पदों में, यथासम्भव प्रेम से, स्पष्टता से और सरलतम भाषा में ऊँचा कीजिए। जिस स्थान पर आप रहते हैं उसके और आज के दिन के घेर लेनेवाले पापों पर निरन्तर गोलाबारी करते रहिए। सीधा निशाना लगाइए और नीचे निशाना लगाइए—सब्त तोड़ने, मद्यपान, सट्टेबाज़ी और जुए पर—और उन्हें चैन न लेने दीजिए। अपने सहभागियों से दैनिक जीवन में व्यावहारिक पवित्रता के ऊँचे स्तर का आग्रह निरन्तर करते रहिए। मसीही विश्वास का इससे बड़ा कोई प्रमाण नहीं! सबसे बढ़कर, अपने सारे कार्य को पवित्र आत्मा की आशीष के लिए प्रार्थना से सींचिए, और अनुग्रह के सिंहासन तक आपका मार्ग कभी झाड़-झंखाड़ से न ढके। हे मेरे प्रिय पादरियो, अपने आप को पूरी तरह इन बातों में लगा दीजिए, और मुझे निश्चय है कि प्रभु में आपका परिश्रम व्यर्थ न होगा।
2. जो बातें सामान्यतः इंग्लैंड की कलीसिया से सम्बन्ध रखती हैं, और स्वाभाविक है कि हमें भी प्रभावित करती हैं, उनके विषय में मैं अधिक न कहूँगा। फिर भी दो बातें विशेष ध्यान की माँग करती हैं—पादरियों के अनुशासन का नया अधिनियम, और 'लिंकन का मामला' कहलाने वाले विषय में प्रिवी काउंसिल का हाल का निर्णय।
पाद-टिप्पणी: 1885 में लिंकन के अध्यक्ष नियुक्त किए गए डॉ. एडवर्ड किंग पर (प्रोटेस्टेंट) चर्च एसोसिएशन ने अवैध कर्मकाण्डवादी रीतियों का आरोप लगाया, और 1889 में छह अध्यक्षों के एक न्यायालय ने, जिसकी अध्यक्षता कैंटरबरी के आर्चबिशप ने की, उनका विचार किया। बाद में अपील पर यह मामला प्रिवी काउंसिल के सामने गया। परिणाम 'मूल रूप से कर्मकाण्डवादियों की बड़ी विजय' रहा।
इन दोनों के विषय में आप स्वाभाविक रूप से मेरी राय सुनने की आशा रखेंगे, और मैं स्पष्टता से बता दूँगा कि मैं क्या सोचता हूँ।
(1) पादरियों के अनुशासन के अधिनियम से मेरे मन में कोई बड़ा उत्साह नहीं जागता, क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा कि पुराना अधिनियम बहुत दोषपूर्ण था, यदि उसे ठीक रीति से चलाया जाता और प्रथम दृष्टया जाँच के लिए समझदार और विवेकी आयोग नियुक्त किए जाते। मैं इंग्लैंड के एक से अधिक भागों में उसके संचालन के कुछ अनुभव के आधार पर, और आपका अध्यक्ष बनने से बहुत पहले से, यह कह रहा हूँ। फिर भी, यदि नया अधिनियम पादरियों पर नैतिक अपराधों के अभियोग की कार्यवाही को अधिक सरल, कम खर्चीली और अधिक शीघ्र बनाता है, तो मैं अत्यन्त आभारी होऊँगा। सौभाग्य से ऐसे मामले बहुत कम होते हैं। परन्तु जब वे होते हैं, तो इंग्लैंड की कलीसिया और धर्म के उद्देश्य की जो हानि वे करते हैं वह अपार है। यह सचमुच एक सर्वोच्च दया होगी यदि भविष्य में उनका निपटारा शीघ्रता से हो सके, उन्हें जनता की दृष्टि के सामने लम्बे समय तक न रखा जाए, और जितनी जल्दी हो सके उन्हें विस्मृति में दबा दिया जाए। जब विधेयक पर बहस हो रही थी तब बहुतों ने पदच्युत करने का दण्ड सुनाने का विशेषाधिकार अध्यक्षों के लिए सुरक्षित रखने की जो चिन्ता दिखाई, वह चिन्ता, मैं मानता हूँ, मैंने कभी नहीं बाँटी, और मैं नहीं समझता कि उससे विधेयक में कोई सुधार हुआ। मेरी दृष्टि में सबसे गम्भीर दोष अध्यक्ष के निषेधाधिकार का बना रहना है, जो एक अध्यक्ष को अपने धर्मप्रान्त में किसी न किसी दल को अप्रसन्न करने के लिए विवश करने की सबसे चतुर युक्ति है। फिर भी मैं जानता हूँ कि इस विषय में मैं बहुत अकेला खड़ा हूँ।
(2) लिंकन के मामले में प्रिवी काउंसिल का हाल का निर्णय पादरियों के अनुशासन के अधिनियम से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण विषय है, और मैं आपसे विशेष ध्यान की प्रार्थना करता हूँ कि इसके विषय में मैं जो कुछ बातें कहने जा रहा हूँ उन्हें सुनें।
मैं एक क्षण के लिए भी यह प्रस्ताव नहीं करता कि निर्णय की विषय-वस्तु की जाँच करूँ और उस पर एक-एक बिन्दु करके चर्चा करूँ। ऐसा करना व्यर्थ होगा, और लगभग अनादरपूर्ण भी। अन्य बहुतों के समान मैं भी उसके तर्कों और व्याख्याओं की यथार्थता तथा उसके निष्कर्षों की शुद्धता को स्वीकार नहीं कर सकता। न ही मैं यह मान सकता हूँ कि विवादित प्रसिद्ध कर्मकाण्डीय बातों का कोई सैद्धान्तिक अर्थ नहीं है, जबकि मैं जानता हूँ कि उनके प्रमुख पक्षधर यह बात एक क्षण के लिए भी स्वीकार नहीं करते।
पाद-टिप्पणी: प्रिवी काउंसिल के निर्णय पर टाइम्स समाचारपत्र के प्रमुख लेख में यह वाक्य है:— 'उन कार्यों को तटस्थ या रंगहीन मानने के प्रयास में एक अवास्तविकता का भाव है, जिन्हें हम सब जानते हैं कि कलीसिया के एक दल की दृष्टि में वे तकनीकी प्रतीक और असन्दिग्ध सैद्धान्तिक चिह्न हैं।'
फिर भी यह निर्णय राज्य के सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है, और इस समय उस निर्णय को पलटा नहीं जा सकता, यद्यपि भविष्य की कोई न्यायिक समिति सम्भवतः उसे पलट दे। एक विधि-पालक अंग्रेज़ और राजकीय सर्वोच्चता में विश्वास रखनेवाले के रूप में मैं उसे मानता हूँ, यद्यपि न उसका अनुमोदन कर सकता हूँ, न उसकी सराहना। इसलिए मैं आपको तर्कों से परेशान नहीं करूँगा। मैं केवल यह बताऊँगा कि मेरे विश्वास में इस निर्णय के परिणाम क्या होंगे, वर्तमान में भी और भविष्य में भी। अन्ततः यही व्यावहारिक बात है।
(i) निर्णय के वर्तमान और तात्कालिक परिणामों के विषय में मुझे ज़रा भी सन्देह नहीं है। यद्यपि यह कलीसियाई अभियोगों को समाप्त कर देता है, फिर भी इससे शान्ति और एकता उत्पन्न नहीं होगी, जैसा कि कुछ लोग आशा करते हैं। विचारहीन साधारण जन, जिन्होंने शायद उनतालीस अनुच्छेद कभी पढ़े ही नहीं, जो धर्मशास्त्रीय विवादों के विषय में बहुत कम जानते हैं, और यह समझते हैं कि हमारी कलीसिया के मतभेद केवल निरर्थक बाहरी तुच्छ बातों को लेकर हैं, वे शायद इसे न समझ सकें। परन्तु मुझे उन अनेक भले मनुष्यों की भोली सरलता पर आश्चर्य होता है जो यह स्वप्न देख रहे हैं कि अब से कोई और झगड़ा न होगा, और हम एक प्रकार के सुखी परिवार बन जाएँगे, जिसमें सब सही होंगे और कोई गलत नहीं होगा! वे भूल जाते हैं कि जब वे अपनी ही दाखलताओं और अंजीर के वृक्षों के तले निश्चिन्त बैठे ‘शान्ति, शान्ति’ पुकार रहे हैं, तब हमारी कलीसिया के भीतर ऐसे अन्य लोग भी हैं जो कभी चुप नहीं बैठते, और किसी दिन उनकी शान्ति को बेरहमी से भंग कर सकते हैं। मेरा अपना विश्वास यह है कि हमारे ‘दुःखद विभाजन’ और चौड़े, और गहरे, और कठोर हो जाएँगे और बढ़ेंगे, और हमारे दायरे के भीतर दलों के बीच मेल-जोल से काम करना पहले से भी अधिक कठिन हो जाएगा। शान्ति एक बहुमूल्य वस्तु है, परन्तु वह सम्मान सहित शान्ति होनी चाहिए, किसी भी कीमत पर मोल ली हुई शान्ति नहीं। स्वतन्त्रता और सहिष्णुता निस्सन्देह सुन्दर, फैशन में चलनेवाले और भारी-भरकम शब्द हैं, परन्तु उनकी भी कुछ सीमाएँ होनी चाहिए। स्वतन्त्रता और सहिष्णुता के मनोहर बहाने ही के अधीन राजा जेम्स द्वितीय ने अपनी प्रसिद्ध ‘दयालुता की घोषणा’ जारी की थी, जिसके द्वारा वह पोप-मत को फिर से राज्य में लौटा लाना चाहता था, परन्तु इससे उसने कलीसिया और असहमत दल, दोनों का विश्वास खो दिया, और अपना मुकुट भी। मेरा दृढ़ मत है कि इस स्वतन्त्र देश की स्थापित कलीसिया को यथासम्भव सहिष्णु और व्यापक होना चाहिए, और अपने पादरी-वर्ग को बड़ी स्वतन्त्रता देनी चाहिए। परन्तु क्या हाल के निर्णय की यह अत्यन्त विस्तृत सहिष्णुता कलीसिया के लोगों के बीच सामान्य शान्ति का राज्य लाएगी, इसमें मुझे अत्यधिक सन्देह है, यह कहने की मैं अनुमति चाहता हूँ। मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि उन बातों के इतिहास पर शान्ति से विचार करें जिन्हें हाल का निर्णय भविष्य में अवैध नहीं, वरन् अनुमत घोषित करता है, अर्थात् प्रभु-भोज के संचालन में की जानेवाली बातें। ये ऐसी बातें हैं जिनका उल्लेख हमारी प्रार्थना-पुस्तक के सहभागिता-विधान में है ही नहीं। ये कोई छोटे महत्व की बातें नहीं हैं। इनमें से अधिकांश को एडवर्ड षष्ठ की पहली प्रार्थना-पुस्तक (1549) में स्थान मिला था, जो उस समय संकलित हुई जब अंग्रेज़ धर्म-सुधार पूरा नहीं हुआ था। जब एडवर्ड की दूसरी प्रार्थना-पुस्तक (1552) निकाली गई, तब उन्हें जान-बूझकर और सोद्देश्य छोड़ दिया गया और निकाल दिया गया, क्योंकि वे रोमी मिस्सा के पक्ष में प्रतीत होती थीं। रानी एलिज़ाबेथ के समय तैयार की गई और प्रयुक्त प्रार्थना-पुस्तक में उन्हें फिर नहीं लिया गया, और अन्त में जब चार्ल्स द्वितीय के दिनों में प्रार्थना-पुस्तक का अन्तिम संशोधन हुआ, तब भी उन्हें पुनः प्रविष्ट नहीं किया गया और वापस नहीं लाया गया। इन तथ्यों के सामने, मुझे आश्चर्य नहीं कि हाल का निर्णय कलीसिया के उन अनेक लोगों को अप्रिय और पीड़ादायक लगता है जो प्रार्थना-पुस्तक को जैसी है वैसी ही मानकर सन्तुष्ट हैं। वे इसे धर्म-सुधार से पीछे हटा हुआ एक कदम मानते हैं, और यह हमारे सहभागिता-विधान में उन बातों को लौटा लाता प्रतीत होता है जो बहुत पहले अस्वीकार की जा चुकी थीं। इसलिए मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकता कि इससे विभाजन बढ़ने की सम्भावना अधिक है, शान्ति को बढ़ावा मिलने की नहीं।
सीधी सच्ची बात यह है कि जिस कलीसिया में प्रभु-भोज और याजकवाद जैसे प्रमुख विषयों के दो परस्पर विरोधी मत, जो रोमी विवाद की बड़ी कुंजियाँ ही हैं, औपचारिक रूप से अवैध नहीं घोषित किए जाते, वह ऐसी कलीसिया नहीं है जिसमें पादरी-वर्ग हार्दिकता और सुख से मिलकर काम कर सके, और उसके विचारशील साधारण जन धीरे-धीरे दो शिविरों में बँट जाएँगे। हम जितने ऊँचे स्वर में चाहें गा लें--
हम बँटे हुए नहीं हैं, हम सब एक देह हैं; परन्तु हम इन शब्दों को वास्तविकता नहीं बना सकते। एक जहाज़ में दो मार्गदर्शक, एक गाड़ी में दो चालक, एक घराने में दो भण्डारी, स्पष्टतः साथ-साथ नहीं चल सकते। मुझे पूर्ण शान्ति की कोई आशा नहीं दिखती। इसके विपरीत, मैं समझता हूँ कि हम एक ऐसे संकट पर पहुँच गए हैं जिसमें, यदि इस पुरानी व्यवस्था को चलना ही है, तो सब ओर से अत्यन्त शिष्टता और सहनशीलता की माँग है। दूसरे दलों के साथ व्यवहार में प्रेम, सुशीलता, विचारशीलता और वाणी की कोमलता को बढ़ाना इससे अधिक आवश्यक कभी न था। हम सब लिवरपूल के धर्मप्रान्त में ऐसा ही करने का प्रयत्न करें! यदि लोग मतभेद रखे बिना रह नहीं सकते, तो वे सुहावने ढंग से मतभेद रखने का प्रयत्न करें, और उन ‘कठोर बातों’ से बचें जो निश्चय ही ठेस पहुँचाती हैं। ऐसा करने से हमारी शान्ति कुछ और लम्बी हो सकती है, और यद्यपि इससे हमारी कलीसिया पर चरम तनाव पड़ेगा, फिर भी सम्भव है कि हम जीवित रहें।
(ii) हाल के निर्णय के भावी और दूरवर्ती परिणामों के विषय में मैं कुछ झिझक के साथ बोलूँगा, और इसके दो बहुत गम्भीर कारण हैं।
एक बात तो यह है कि बहुत कुछ उस सक्रिय और दृढ़ निश्चयी कलीसिया-जन-समूह के आचरण पर निर्भर करेगा, जिसने कई वर्षों से ईमानदारी से यह इच्छा प्रकट की है कि धर्म-सुधार की घड़ी को पीछे घुमा दिया जाए और इंग्लैंड की कलीसिया को अप्रोटेस्टेंट बना दिया जाए। अब उन्हें अपने कुछ प्रिय विचारों के लिए व्यावहारिक रूप से कानूनी स्वीकृति मिल गई है, और देखना यह है कि वे आगे क्या करने जा रहे हैं। यदि यह समूह आगे ही बढ़ते जाने पर अड़ा रहे, और तब तक चैन न ले जब तक अधिकाधिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता और रियायतों की औपचारिक स्वीकृति न पा ले—चासुबल, लोबान, प्रभु-भोज के तत्वों की आराधना, मृतकों के लिए प्रार्थना, पाप-स्वीकार-प्रथा और मिस्सा की निकट नकल के लिए—तो मैं आपको तुरन्त बता सकता हूँ कि परिणाम क्या होंगे। मैं कोई भविष्यद्वक्ता नहीं हूँ, फिर भी पूरे विश्वास से कहता हूँ कि संकट के दिन आएँगे। दूसरी बात यह है कि बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि उन निष्ठावान कलीसिया-जनों के साथ कैसा व्यवहार होता है जो अपने विवेक के अनुसार हाल के न्याय-निर्णय को अस्वीकार करते हैं, और सामान्यतः सुसमाचारवादी समूह के साथ कैसा व्यवहार होता है। ऐसे लोगों से निश्चय ही यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे अपने सिद्धान्त और अनुष्ठान में रत्ती भर भी परिवर्तन करें, या अपने पुराने मार्गों को छोड़ दें। इससे बढ़कर, ईमानदार कलीसिया-जनों के रूप में, और हमारी कलीसिया के सिद्धान्तों, प्रार्थना-पुस्तक और धर्म-अनुच्छेदों के प्रति पूर्णतः समर्पित लोगों के रूप में, उन्हें यह अधिकार है कि उनके साथ पूर्ण न्याय और निष्पक्षता का व्यवहार हो। परन्तु यदि इस न्याय-निर्णय के बाद किसी भी ओर से यह मूर्खतापूर्ण प्रयास किया जाए कि उन्हें पराजित या मौन किए गए अल्पसंख्यक के रूप में कुचला जाए; यदि उनकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करके उन्हें निरन्तर सताया और खिजाया जाए, और परोक्ष रूप से उन पर दबाव डाला जाए कि वे अपनी प्रिय संस्थाओं को छोड़ दें; यदि इस कारण उन पर भौंहें चढ़ाई जाएँ कि वे सन्ध्या के प्रभु-भोज को बन्द करने या पूर्वमुखी स्थिति अपनाने से इनकार करते हैं; यदि उन पर सदा यह आरोप लगाया जाए कि वे संस्कार के अनुग्रह को नकारते हैं, जबकि वे संस्कारों के प्रभाव के विषय में पच्चीसवें और उनतीसवें धर्म-अनुच्छेदों के सिद्धान्त को दृढ़ता से थामे हुए हैं; यदि उन्हें इसलिए लगातार ‘प्यूरिटन’ कहकर ताने दिए जाएँ कि वे आर्चबिशप लॉड की अपेक्षा ज्यूएल और हूकर को अधिक पसंद करते हैं; यदि ये बातें निरन्तर सामने उछाली जाती रहें, और उन्हें बुद्धिमानी से पीछे नहीं धकेला जाए, जैसा कि किया जाना चाहिए—तो मैं फिर कहता हूँ, मैं आपको तुरन्त बता सकता हूँ कि परिणाम क्या होंगे। बहुत संकट के दिन आएँगे।
यह भली-भाँति स्मरण रखिए कि मैं केवल उस निर्णय के कुछ विशेष परिस्थितियों में होनेवाले दूरगामी परिणामों की बात कर रहा हूँ। मैं यह तो नहीं जानता कि वे परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी या नहीं। यह बहुत सम्भव है कि कलीसिया के लोगों का आगे बढ़ा हुआ और उग्र दल यह समझदारी की बात माने कि अभी चुपचाप रुका रहे और और रियायतें न माँगे। यह भी सम्भव है कि हमारी सीमा के भीतर का प्रभावशाली बहुमत अल्पसंख्यकों के प्रति मेल-मिलाप की नीति अपनाना उचित समझे। परन्तु ये सब अनिश्चित बातें हैं, और यह कहना असम्भव है कि कुछ वर्ष क्या ले आएँगे। फिर भी मुझे पूरा निश्चय है कि उस निर्णय के प्रकाशित होने के बाद से आगे चट्टानें हैं, और हमारे संकट अधिकांश लोगों की समझ से कहीं अधिक बड़े हैं, और इन संकटों में सबसे छोटा संकट यह नहीं कि राज्य से कलीसिया का सम्बन्ध-विच्छेद धीरे-धीरे निकट आ रहा है। यह कहने के कारण आप मुझे डरानेवाला समझ सकते हैं। परन्तु जब इस महान देश का प्रधानमंत्री इंग्लैंड की कलीसिया के एक अभिन्न अंग के ‘राज्य-सम्बन्ध-विच्छेद और सम्पत्ति-अपहरण’ की सम्भावनाओं की गम्भीरता से चर्चा करता है, और जिन जनसाधारण को हमने राजनीतिक शक्ति दी है उनके लाखों लोग उसकी सब बातें लालच से निगल लेते हैं, तब कलीसिया के लिए अपना घर व्यवस्थित करने, अपनी शक्तियों को गिनने, और घमासान संघर्ष की तैयारी करने का समय आ चुका है। अब मैं पूछता हूँ, इस आनेवाले संघर्ष को देखते हुए हम कहाँ खड़े हैं? क्या हम उसके लिए तैयार हैं? क्या हम एक हैं? क्या हम कन्धे से कन्धा मिलाकर खड़े होने को तैयार हैं, जैसे कात्र ब्रा के मैदान में 42वीं रेजिमेंट खड़ी हुई थी? (वाटरलू के युद्ध (1815) से एक दिन पहले नेपोलियन और वेलिंगटन की सेनाओं की भिड़न्त का स्थान।) काश मैं इन प्रश्नों के सन्तोषजनक उत्तर दे सकता। परन्तु इस समय नहीं दे सकता। यदि उन्नति-दल को बिना रोक-टोक आगे बढ़ने दिया गया, और वह हमारे प्रभु-भोज के विधि-पत्र में एक के बाद एक रोमी नवाचार घुसाता रहा, यहाँ तक कि कलीसिया की आराधना परस्पर विरोधी शिक्षाओं का बाबुल बन जाए, तो यह आशा करना व्यर्थ है कि जब युद्ध आरम्भ होगा तब हम अपने शत्रुओं के सामने एकजुट मोर्चा प्रस्तुत करेंगे। कलीसिया के लोगों का वह ठोस अल्पसंख्यक वर्ग, जो धर्म-सुधार के सिद्धान्तों से दृढ़ता से चिपका हुआ है और प्रार्थना-पुस्तक जैसी है वैसी ही से सन्तुष्ट है, मुझे डर है कि युद्ध के दिन अलग खड़ा रहेगा, और हमारी पंक्तियों में बड़े-बड़े अन्तराल पड़ जाएँगे, जिन्हें कलीसिया सह नहीं सकती। एक प्रोटेस्टेंट राज्य-कलीसिया के लिए, मेरा विश्वास है, वे अन्तिम साँस तक लड़ेंगे। पर आधी पोपवादी राज्य-कलीसिया के लिए मुझे सन्देह है कि वे एक प्रहार भी करेंगे। मैं जानता हूँ कि वे पादरियों में अल्पसंख्यक हैं, और स्टुअर्ट राजाओं के दिनों से सदा ऐसे ही रहे हैं। परन्तु मुझे निश्चय नहीं कि वे सामान्य विश्वासियों में भी अल्पसंख्यक हैं, और किसी भी दशा में बड़े धार्मिक सिद्धान्तों के लिए संघर्ष करनेवाला अल्पसंख्यक (उल्स्टर की तरह) तुच्छ नहीं समझा जाना चाहिए। देर-सबेर, यदि बातें वैसी ही चलती रहीं जैसी पिछले वर्षों में चली हैं, तो मैं भविष्यवाणी करता हूँ कि यह अल्पसंख्यक वर्ग इंग्लैंड की कलीसिया की रक्षा करने में कोई लाभ न देखेगा। तब एक लोकतांत्रिक कॉमन्स सभा के रहते अन्त शीघ्र आ जाएगा। अधीर लोगों के कुछ अलग हो जाने से और निरन्तर आपसी कलह से दुर्बल होकर कलीसिया राज्य-सम्बन्ध-विच्छेद और सम्पत्ति-अपहरण को टाल न सकेगी। तब फूट पड़ेगी, और वह भव्य पुराना जहाज़ अपने ही अधिकारियों और नाविकों के ‘दुःखद विभाजनों’ से टूट जाएगा। मेरी बस यही आशा है कि ‘कोई तख्तों पर, और कोई जहाज़ के टूटे टुकड़ों पर’ आप सब सुरक्षित किनारे पर पहुँच जाएँ। मैं इस पीड़ादायक विषय पर और नहीं ठहरूँगा। परन्तु एक वृद्ध पुरुष के रूप में, जो शीघ्र ही इस मंच से विदा लेकर एक उत्तम संसार की उत्तम कलीसिया में सम्मिलित होनेवाला है, और जिसने पचास वर्ष तक कलीसियाई घटनाओं की प्रगति को ध्यान से देखा है, मैं इसे अपना स्पष्ट कर्तव्य समझता हूँ कि आपको उन सम्भावनाओं के विषय में चेतावनी दूँ जो आपके और आपके बच्चों के सामने हैं। घबराने और निराश होने का कोई कारण नहीं है।
कलीसिया का भाग्य कलीसिया के लोगों के हाथ में है। यदि वे उसके मूल सिद्धान्तों के प्रति सच्चे रहें, तो मेरा विश्वास है कि वह कभी न गिरेगी। हम नहीं जानते कि एक दिन क्या ले आएगा। स्वर्ग में एक ऐसा है जिसने ग्रोसटेस्ट (लिंकन का अध्यक्ष (मृत्यु, 1253)) और वाइक्लिफ़ के दिनों में, रानी मेरी ट्यूडर के राज्यकाल में, लॉड और चार्ल्स प्रथम के समयों में, और 1662 के उस अन्धकारमय युग में हमारी कलीसिया को जीवित रखा, जब दो हज़ार योग्य सेवक मूर्खतापूर्वक हमारी सीमा से बाहर निकाल दिए गए और इंग्लैंड के असहमत सम्प्रदायों की नींव पड़ी। वह जीवित है और राज्य करता है, और पृथ्वी पर सब कुछ का प्रबन्ध करता है, और प्रत्यक्ष अन्धकार में से ज्योति उत्पन्न कर सकता है। वर्तमान समय के लिए हम धीरज से उसकी बाट जोहें, और उससे प्रार्थना करें कि वह हमारे शासकों को बुद्धि और हमारे पादरियों को पवित्र किया हुआ सामान्य विवेक दे, और हमारी जाति से उसके पापों के अनुसार व्यवहार न करे।
3. अब मैं एक ऐसे धर्मवैज्ञानिक विषय की ओर मुड़ता हूँ जिसका महत्त्व सारे संसार के लिए है, और जो आजकल अनेक मसीही कहलानेवालों के मन को उलझा रहा है और उनके विश्वास को हिला रहा है। मेरा संकेत उस विषय की ओर है जिसे सामान्यतः ‘पुराने नियम के पवित्रशास्त्र की उच्चतर आलोचना’ कहा जाता है। यह विषय इस समय पुस्तकों और पर्चों में, व्याख्यानों और उपदेशों में, समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में, सम्मेलनों और महासम्मेलनों में बार-बार हमारे सामने लाया जा रहा है। हमें अच्छा लगे या न लगे, हम इसे बाहर नहीं रख सकते। मिस्र की महामारी के मेंढ़कों की तरह यह हर कहीं घुस आता है, और अपनी नवीनता के कारण अधपढ़े लोगों और जवानों के लिए विशेष रूप से आकर्षक है।
मैं इस अत्यन्त गम्भीर विषय पर कुछ सीधी-सादी बातें कहना चाहता हूँ। यह हमारे क्षितिज को बादलों से भर रहा है, और एक पुराने पहरेदार के रूप में मैं चुप रहने का साहस नहीं कर सकता। मेरी बातें लगभग सब एक ही दिशा में होंगी। इस विवाद की अनेक शाखाओं के विषय में मैं कुछ भी न कहूँगा। उन्हें मैं उन लोगों पर छोड़ता हूँ जिनके पास लंकाशायर के एक अध्यक्ष से अधिक समय है। मैं केवल एक बात पर ठहरना चाहता हूँ, जो मुझे कुछ अनदेखी की गई लगती है, और जिसे उससे कहीं कम ध्यान मिला है जितने की वह योग्य है। वह बात यह है कि ‘उच्चतर आलोचना’ की सब योजनाओं और सिद्धान्तों की सम्भावना अत्यन्त क्षीण है।
मैं ‘असम्भाव्यता’ शब्द का प्रयोग विशेष बल देकर करता हूँ। सब समझदार मनुष्य जानते हैं कि अनेक विषयों में सम्भाव्यता ही हमारा एकमात्र मार्गदर्शक होती है। उस महान तर्कशास्त्री बिशप बटलर ने कहा है, ‘हमारे लिए सम्भाव्यता ही जीवन का सच्चा मार्गदर्शक है।’ (धर्म की उपमा (1756), भूमिका।) मेरा विचार है कि पुराने नियम की आलोचना इसी बात का उदाहरण है। यह सारा विषय अन्धकारमय और रहस्यमय है, और हम इसके विषय में पूर्ण निश्चय के साथ कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। एक विशाल अन्तराल या खाई है, जिसे पार करने के लिए हमारे पास कोई पुल नहीं, और जिसे हमें थोड़ी-सी सामग्री से जैसे-तैसे भरना पड़ता है। पुराने नियम की पुस्तकों की हस्तलिखित प्रतियाँ बहुत पहले लुप्त हो चुकी हैं। उस समय का कोई साहित्य नहीं है जो उनके विषय में जानकारी दे। सेप्टुआजिन्ट, अर्थात् पुराने नियम का यूनानी अनुवाद, मलाकी की पुस्तक के पूरे होने के सौ वर्ष बाद तक आंशिक रूप में भी प्रकाशित नहीं हुआ था, और यह मूसा की मृत्यु के कम से कम बारह सौ वर्ष बाद की बात है। जो पुस्तक पुराना नियम कहलाती है, वह अब दो हजार वर्ष से बहुत अधिक पुरानी है—इतना विशाल समय कि हमारा मन उसे उतना ही कम समझ और अनुभव कर सकता है जितना स्थिर तारों और पृथ्वी के बीच की दूरी को। यह वह पुस्तक है जो छापाखाने के आविष्कार से अनेक शताब्दियों पहले लिखी गई थी, और उस समय जब यूरोप के अधिकांश नगर अस्तित्व में ही नहीं थे। ऐसे अनुसन्धान-क्षेत्र के विषय में मैं यही देखकर सन्तुष्ट हूँ कि क्या सम्भाव्य है। हठधर्मी निश्चयता मैं दूसरों के लिए छोड़ता हूँ, और आज के समय में मुझे उसकी कुछ अधिकता ही दिखाई देती है। मुझे प्रायः ओलिवर क्रॉमवेल के वे शब्द स्मरण आते हैं जो उसने स्कॉटलैण्ड की कलीसिया की महासभा से कहे थे (3 अगस्त, 1650): ‘महाशयो, मैं मसीह की करुणा के नाम पर आपसे विनती करता हूँ, यह सम्भव मानिए कि आप भूल में हो सकते हैं।’
मैं पहले यह कहता हूँ कि मैं उन पुराने ढंग के मसीहियों में से एक हूँ जो उत्पत्ति से लेकर मलाकी तक पुराने नियम के पवित्रशास्त्र की सब पुस्तकों के पूर्ण प्रेरणा-प्राप्त होने में निःसंकोच विश्वास करते हैं। मैं खुलकर मानता हूँ कि ऐतिहासिक पुस्तकों में लेखकों को सिखाया गया और उन्हें अनुमति दी गई कि वे विद्यमान दस्तावेजों से नामों की सूचियाँ और वंशावलियाँ सम्मिलित करें, और ईश्वरीय निर्देशन में अपने हाथ में तैयार सामग्री का उपयोग करें। मुझे निस्सन्देह कोई सन्देह नहीं कि मूसा ने व्यवस्थाविवरण के अन्त में अपनी ही मृत्यु और गाड़े जाने का वृत्तान्त नहीं लिखा, और वह किसी अज्ञात प्रेरित लेखक द्वारा जोड़ा गया, सम्भवतः यहोशू या शमूएल द्वारा। मैं मानता हूँ कि बिना छपी इब्री पुस्तकों की नकल करते समय यहाँ-वहाँ कुछ गलत पाठ घुस गए होंगे। परन्तु पुराने नियम के विषय में जो परम्परागत दृष्टिकोण है, जैसा यूसुफुस हमें देता है—अर्थात् अलग-अलग पुस्तकों के लेखकत्व के विषय में, उनके लिखे जाने के समय के विषय में, और ऐतिहासिक भागों में उल्लिखित घटनाओं और व्यक्तियों की वास्तविकता के विषय में—मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि सामान्य रूप से कहें तो यही एकमात्र सच्चा और सुरक्षित दृष्टिकोण है। मैं जानता हूँ कि यह अनेक कठिनाइयों से घिरा है। परन्तु क्या हमारे ऊपर आकाश में और हमारे पाँवों के नीचे पृथ्वी में असंख्य कठिनाइयाँ नहीं हैं? निश्चय ही परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई पुस्तक की उत्पत्ति और विषय-वस्तु के विषय में अनेक कठिनाइयाँ होना अनिवार्य है! ओरिजन का वह कथन, जिसे बिशप बटलर ने ‘उपमा’ की भूमिका में उद्धृत किया है, कभी भूलना नहीं चाहिए: ‘जो यह विश्वास करता है कि पवित्रशास्त्र उसी से निकला है जो प्रकृति का रचयिता है, वह उसमें वैसी ही कठिनाइयों की आशा रख सकता है जैसी प्रकृति की रचना में पाई जाती हैं।’ मैं मानता हूँ कि इन प्रेरित पुस्तकों का अनेक शताब्दियों तक सुरक्षित बना रहना और आगे पहुँचना केवल परमेश्वर के चमत्कारिक हस्तक्षेप से ही समझाया जा सकता है। परन्तु मैं उनमें से हूँ जो चमत्कारों में विश्वास करते हैं, और मैं बाइबल को एक चमत्कारिक पुस्तक मानता हूँ। इसलिए पुराने नियम के पुराने परम्परागत दृष्टिकोण की कठिनाइयाँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, मेरा मत है कि वही सबसे अधिक सम्भाव्य और सबसे सुरक्षित दृष्टिकोण है, और मैं अपने भाइयों को सलाह देता हूँ कि इसे सहज ही न छोड़ें। मैं कलीसिया के पुराने विश्वास पर दृढ़ता से खड़ा हूँ, और जब तक मुझे इससे उत्तम कुछ न मिले, इसे छोड़ने से इनकार करता हूँ।
दूसरी ओर, पुराने नियम की पुस्तकों के लेखकत्व, उनकी रचना के समय तथा उनमें नामित और वर्णित व्यक्तियों और घटनाओं की ऐतिहासिक वास्तविकता के विषय में 'उच्चतर आलोचना' के समर्थकों के प्रमुख सिद्धान्तों को मैं पूर्णतः अस्वीकार करता हूँ। यह विचित्र, परन्तु खेदजनक रूप से प्रचलित धारणा कि पुराने नियम का इतिहास 'सत्य के एक छोटे से केन्द्र को घेरे हुए किंवदन्तियों के विशाल प्रभामण्डल' से अधिक कुछ नहीं है—इसे मैं सर्वथा अविश्वसनीय मानकर ठुकराता हूँ। मैं विश्वास करता हूँ कि बाइबल की प्रथम पाँचों पुस्तकों को तीन या चार लोगों ने नहीं, वरन् एक ही व्यक्ति ने लिखा और संकलित किया, और वह व्यक्ति मूसा था। मैं विश्वास करता हूँ कि इन पुस्तकों में वर्णित सब अद्भुत घटनाएँ सचमुच घटित हुईं—जैसे पतन, जल-प्रलय, बाबेल के निर्माण के पश्चात् लोगों का तितर-बितर होना, सदोम और अमोरा का विनाश, मिस्र की विपत्तियाँ, लाल समुद्र का पार किया जाना, तथा निर्गमन में लिखे हुए आगे के तथ्य और चमत्कार। मुझे कोई सन्देह नहीं कि आदम और हव्वा, कैन और हाबिल, अब्राहम और लूत, इसहाक और याकूब, तथा बारह कुलपति सचमुच ऐसे व्यक्ति थे, कि वे पृथ्वी पर सचमुच जीए, और उत्पत्ति में उनके नाम से जो बातें कही और जो काम बताए गए हैं वे उन्होंने कहे और किए। मैं इस आधुनिक सिद्धान्त को पूर्णतः अस्वीकार करता हूँ कि मूसा की पाँचों पुस्तकें अपने वर्तमान रूप में एज्रा और नहेम्याह के समय से पहले संकलित नहीं हुईं, और कि उनमें लिखे हुए अनेक तथ्य, विशेषकर प्रथम ग्यारह अध्यायों के, मात्र मिथक, दन्तकथाएँ और किंवदन्तियाँ हैं, जो कल्पित या गढ़ी हुई हैं और ठोस तथा ईश्वरीय आधार से सर्वथा रहित हैं। और यदि कोई मुझसे पूछे कि मैं यह पक्ष क्यों लेता हूँ, तो मेरा उत्तर यह है कि जिन सिद्धान्तों को मैं अस्वीकार करता हूँ, वे मुझे उन पुराने परम्परागत मतों की अपेक्षा, जिन्हें मैं मानता हूँ, कहीं अधिक अनन्त कठिनाइयों से भरे हुए प्रतीत होते हैं। मैं यथासम्भव संक्षेप में बताऊँगा कि वे कठिनाइयाँ क्या हैं, और अपनी टिप्पणियों को पुराने नियम की प्रथम पाँच पुस्तकों के विषय में आधुनिक सिद्धान्तों तक ही सीमित रखूँगा।
(1) मेरी पहली कठिनाई यह है। मैं जानना चाहता हूँ कि मूसा की पाँचों पुस्तकों के लेखकत्व, समय और विषय-वस्तु के बारे में 'उच्चतर आलोचना' के विचार पूर्णतः आधुनिक उत्पत्ति के क्यों हैं। यह स्वीकार किया जाता है कि स्विट्ज़रलैण्ड के चिकित्सक अस्त्रुक ने, जो 1684-1766 में जीवित रहा, जब तक उन्हें प्रस्तुत नहीं किया, तब तक इनके विषय में सुना तक नहीं गया था। यूसुफुस के समय से लगभग सत्रह सौ वर्ष तक मैं किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में नहीं पढ़ पाता जिसने कभी इस बात से इनकार करने की सोची हो कि उत्पत्ति, निर्गमन, लैव्यव्यवस्था, गिनती और व्यवस्थाविवरण मूसा के हाथ से लिखी गई पुस्तकें थीं और किसी और के हाथ से नहीं, और न मैं किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में पढ़ पाता हूँ जिसने कभी सन्देह किया हो कि इन पुस्तकों में लिखे हुए तथ्य ऐतिहासिक रूप से सत्य थे। आदि कलीसियाओं, यूनानी और लातीनी प्राचीन पिताओं, मध्ययुग के विद्वानों, रोमी और यूनानी कलीसियाओं, धर्म-सुधारकों, प्यूरिटनों और पुराने आंग्लीय कलीसियाई जनों—सब, सब का इस विषय में एक ही मत रहा है। अन्य बातों में उनके मतभेद चाहे कितने ही व्यापक और गहरे रहे हों, उन सब ने यही माना है कि मूसा मूसा की पाँचों पुस्तकों का लेखक था।
पिछले डेढ़ सौ वर्षों के 'उच्चतर आलोचकों' ने सर्वथा नया पक्ष लिया है। वे हमसे चाहते हैं कि हम यह विश्वास करें कि सत्रह शताब्दियों तक पवित्रशास्त्र के विद्यार्थी अपेक्षाकृत अन्धेपन में जीए और मरे। उस लम्बी अवधि में पुराने नियम को हज़ारों-लाखों भक्त और विद्वान पुरुष निरन्तर पढ़ते और प्रार्थनापूर्वक खोजते रहे। उन दिनों में रहते हुए जब पुस्तकें थोड़ी थीं और धार्मिक उपयोगिता के अवसर उनसे भी कम थे, उन्होंने सम्भवतः बाइबल पर आज के अधिकांश मसीहियों से कहीं अधिक समय बिताया होगा। और यह भी नहीं कहा जा सकता कि इन सत्रह सौ वर्षों के सब बाइबल पढ़नेवाले निर्बल बुद्धि के, अशिक्षित और गहरे प्रश्नों को समझने में असमर्थ थे। ऐसा कहना केवल हास्यास्पद होगा। प्राचीन पिताओं में जेरोम, ओरिजन, क्रिसोस्तम और आगस्टीन जैसे पुरुषों को देखिए; मध्ययुगीन विद्वानों में थॉमस एक्विनास, पीटर लोम्बार्ड, अल्बर्टस मैग्नस, बोनावेंतुरा को देखिए; यूरोप महाद्वीप के प्रोटेस्टेंटों में लूथर, कैल्विन, मेलांखथॉन, ब्रेंतियुस, ज़्विंग्ली, पीटर मार्टिर, बूसर, बुलिंगर, गुआल्टर, बेज़ा, मुस्कुलुस, केम्निशियुस, गेरहार्ड, परेयुस को देखिए; अंग्रेज़ धर्म-सुधारकों में क्रैन्मर, टिंडेल, रिडले, ज्यूल, ह्विटगिफ़्ट को देखिए; आंग्लीय धर्मशास्त्रियों में हूकर, एन्ड्रयूज़, ह्विटेकर, पीयर्सन, हॉल, डेवेनेंट, विलेट, रेनॉल्ड्स, अशर, स्टिलिंगफ़्लीट, हैमंड, बुल, वॉटरलैण्ड, बैरो, होडी को देखिए; प्यूरिटनों में ओवेन, गुडविन, बैक्सटर, मैन्टन, चार्नॉक, पूल को देखिए—मैं कहता हूँ, इन पुरुषों को देखिए, और मुझे बताइए कि क्या वे निर्बल और निम्न बुद्धि के पुरुष थे। निश्चय ही, मेरे विचार में, धर्मशास्त्रीय जीवनियों का जानकार कोई भी व्यक्ति यह स्वीकार करेगा कि इस सूची में ऐसे पुरुषों के नाम हैं जो उतने ही दृढ़ बुद्धि के, उतने ही गहरे विचारक और सही निर्णय बनाने में उतने ही सक्षम थे जितने कि अब तक के कोई भी धर्मशास्त्री। अनेक प्रश्नों पर उनके बीच व्यापक मतभेद थे। परन्तु एक बात पर वे पूर्णतः सहमत थे। उनमें से किसी ने भी कभी यह नहीं माना कि मूसा की पाँचों पुस्तकें मूसा ने और केवल मूसा ने नहीं लिखीं। यह तो डेढ़ सौ वर्ष पहले की गई एक खोज है! संक्षेप में, हमसे यह विश्वास करने को कहा जाता है कि पिछली डेढ़ शताब्दी के विद्यार्थियों ने ऐसी बातें खोज निकाली हैं जो पिछले सत्रह सौ वर्षों के बौद्धिक दिग्गजों से छिपी रहीं! यह मेरी पहली कठिनाई है, और मैं इसे पार नहीं कर पाता। मुझे लगता है कि इसमें एक भारी असम्भाव्यता निहित है।
(2) मेरी दूसरी कठिनाई यह है। मुझे इसका कोई सन्तोषजनक प्रमाण नहीं मिलता कि पुराने नियम की आधुनिक आलोचना के पक्षधरों को इब्रानी भाषा का उन विद्वानों से अधिक गहन ज्ञान है जो उनसे पहले हुए। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आज के इस बड़े विवाद की धुरी ठीक यही है। नए सम्प्रदाय के अगुवे और मित्र हमें निरन्तर बताते हैं कि मूसा की पाँच पुस्तकों के शब्दों, शैली और भाषा की सूक्ष्म जाँच से यह अकाट्य आन्तरिक प्रमाण मिलता है कि वे एक ही व्यक्ति के हाथ से और एक ही जीवनकाल में नहीं लिखी जा सकती थीं, और उत्पत्ति तथा निर्गमन के कई बड़े अंश पुरानी मिथक-कथाओं और किंवदन्तियों से बढ़कर कुछ नहीं हैं, जिनके लेखक का कुछ भी निश्चित पता नहीं। यदि आप इन चौंकानेवाले दावों की सत्यता पर सन्देह करें, तो आपको बताया जाता है कि आपका सन्देह इब्रानी भाषा के प्रति आपकी अज्ञानता से उपजा है, और यदि आप इब्रानी के बेहतर ज्ञाता होते तो पुराने नियम की आधुनिक आलोचना की बुद्धिमत्ता देख पाते। इस समय आपसे इसे देख पाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, उतनी ही जितनी एक दुधमुँहे बच्चे से। आप राय रखने के योग्य नहीं हैं, और आपको चुपचाप बैठे रहना और मुँह बन्द रखना चाहिए। फिर भी एक बहुत गम्भीर प्रश्न पीछे रह जाता है, जिसका उत्तर मुझे अभी तक नहीं सूझता। एक क्षण के लिए मान लें, यद्यपि यह प्रमाणित नहीं है, कि संसार में ‘उच्चतर आलोचना’ के पक्षधरों के सिवा कोई प्रथम श्रेणी का इब्रानी विद्वान नहीं है, और अन्य जीवित इब्रानी-ज्ञाताओं की राय अपेक्षाकृत कम मूल्य की है। परन्तु आधुनिक आलोचक किस अधिकार से यह दावा करते हैं कि वे इब्रानी के विषय में उन लोगों से अधिक जानते हैं जिन्होंने डेढ़ सौ वर्ष से भी अधिक पहले उस पवित्र मृत भाषा का अध्ययन किया? रोयख्लिन, राजा याकूब प्रथम के समय के पुराने नियम के अनुवादक, एन्सवर्थ, ह्यू ब्रॉटन, फेजियस, पेलिकन, जॉन लाइटफुट, गैटेकर, ट्रेमेलियस, बक्सटॉर्फ, मर्सर, एरियास मोन्टानस, पैग्निनी, वेटेब्लस, उबिगों, वॉल्टन — ये सब इब्रानी से भली-भाँति परिचित माने जाते थे, और उस भाषा के सूक्ष्मतम शब्दों, अक्षरों, मात्राओं और बिन्दुओं तक के आजीवन गहन अध्येता थे। फिर भी उनमें से किसी ने कभी यह नहीं खोजा कि मूसा की पाँच पुस्तकें एज्रा के समय तक संकलित ही नहीं हुई थीं! वे सब इसी विश्वास में जिए और मरे कि परमेश्वर की प्रेरणा से मूसा, और केवल मूसा ही, बाइबल की पहली पाँच पुस्तकों का लेखक था, और उन पुस्तकों के सारे कथन ‘परमेश्वर का वचन’ हैं। क्या ये सब लोग भूल में थे? वे अब क्या कहते? वे तो बहुत पहले मर चुके हैं और अपनी रक्षा नहीं कर सकते। 1862 में उन्हें तुच्छ ठहराना सस्ता और सरल काम है। परन्तु उनमें से अधिकांश इब्रानी विद्वानों के रूप में ऐसी प्रतिष्ठा छोड़ गए जो कम अधिकार की नहीं थी, और अपने समय में उन्होंने गहरी छाप छोड़ी। मैं देश और विदेश के आधुनिक आलोचकों के उत्साह और परिश्रम का आदर करता हूँ। परन्तु उनके मूल सिद्धान्त मुझे असम्भावनाओं के एक विशाल ढेर पर विश्वास करने की माँग करते जान पड़ते हैं। जब तक वे यह प्रमाणित न कर दें कि एन्सवर्थ, ब्रॉटन और उनके साथी इब्रानी में अपेक्षाकृत अनजान थे, और उस पवित्र भाषा को उतनी अच्छी तरह नहीं समझते थे जितनी इन पिछले दिनों के जर्मनी, ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज के प्राध्यापक समझते हैं, तब तक मैं उनकी ‘उच्चतर आलोचना’ को स्वीकार नहीं कर सकता।
(3) मेरी तीसरी कठिनाई यह है। आधुनिक पुराने नियम के आलोचकों के विचारों का मेल मैं उस उपयोग से नहीं बैठा सकता जो हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सुसमाचारों में पुराने नियम के पवित्रशास्त्र का निरन्तर किया, और न उस रीति से जिससे वह मूसा की पाँच पुस्तकों में, और विशेषकर उत्पत्ति की पुस्तक में, घटनाओं, व्यक्तियों और बातों के विषय में बोलते थे। मेरे विचार में सारे विवादित विषय की यही अन्तिम कसौटी है। जब परमेश्वर का अनन्त पुत्र 'शरीर में प्रकट हुआ,' तब उसने पुराने नियम के विषय में क्या कहा, और प्रत्यक्षतः क्या सोचा? उसने उसे किस दृष्टि से देखा? उसने उसे कौन-सा अधिकार दिया? मैं इन प्रश्नों का उत्तर बिना हिचकिचाहट के देता हूँ। मुझे प्रतीत होता है कि सुसमाचारों में प्रभु यीशु सदा पुराने नियम के पवित्रशास्त्र को उसके हर भाग में 'परमेश्वर का वचन' मानता है, जो किसी भी दोष, भूल या अपूर्णता से रहित है, परमेश्वर की कलीसिया के लिए विश्वास का एकमात्र नियम और सत्य की एकमात्र कसौटी है। मेरा विश्वास है कि 'पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो,' 'व्यवस्था में क्या लिखा है,' 'तू कैसे पढ़ता है?' जैसे वाक्य हमारे प्रभु की शिक्षा में निरन्तर सुनाई देते थे। (मैं इसे मानता हूँ, यद्यपि निःसन्देह इसे प्रमाणित नहीं कर सकता।) एक अमेरिकी धर्मशास्त्री ने ठीक ही कहा है, 'हमारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह ने पुराने नियम के पवित्रशास्त्र के सिवा कभी कोई और पुस्तक पढ़ी हो। परन्तु उसकी शिक्षाएँ उन्हीं से भरी हैं: वह उन्हीं में जीता था। सुसमाचारों में आदि से अन्त तक उसके साथ यहूदी धर्मग्रन्थ-संग्रह, अर्थात् व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की निर्विवाद स्वीकृति दिखाई देती है।' व्यवस्था के विषय में उसने कहा, 'जब तक सब कुछ पूरा न हो जाए, तब तक उसकी एक मात्रा या एक बिन्दु भी न टलेगा।' (मत्ती 5:18) भविष्यद्वक्ताओं के विषय में, उसने नासरत में अपनी सेवकाई यशायाह 61 का एक अंश पढ़कर और यह कहकर आरम्भ की, 'आज यह पवित्रशास्त्र पूरा हुआ।' दानिय्येल, जिसके अधिकार पर बहुत लोग विवाद करते हैं, उसे उसने 'दानिय्येल भविष्यद्वक्ता' कहकर प्रमाणित किया। (मत्ती 24:15) भजनों के विषय में, वह उन्हें बार-बार उद्धृत करता है। क्रूस पर उसके मुख से निकला अन्तिम वचन भजन संहिता का एक पद था। (भजन संहिता 31:5, लूका 23:46) और भजन संहिता 110 को, जिसे कुछ आधुनिक आलोचक मक्काबियों के युग का ठहराते हैं, उसके विषय में वह स्पष्ट कहता है कि दाऊद ने उसके शब्द 'पवित्र आत्मा के द्वारा' कहे। (मरकुस 12:36) अन्त में, यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि व्यवस्थाविवरण, पुराने नियम का वह भाग जिसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह बाबुल की बन्धुआई के बाद संकलित हुआ, ठीक वही पुस्तक है जिसे उसने शैतान की परीक्षा का सामना करते समय तीन बार उद्धृत किया, और इस प्रकार उस पर विशेष मूल्य और अधिकार की मुहर लगा दी।
मुझे इसका लेशमात्र संकेत भी नहीं मिलता कि हमारे प्रभु ने सारी पाँच पुस्तकों को मूसा की लिखी हुई न समझा हो। वह बार-बार उनमें से उद्धृत करता है, और मूसा को निर्गमन, लैव्यव्यवस्था, गिनती और व्यवस्थाविवरण का लेखक कहकर बोलता है। (लूका 20:37; मत्ती 8:4; मरकुस 10:3) वह निर्गमन को 'मूसा की पुस्तक' कहता है। (मरकुस 12:26) वह स्पष्ट कहता है, 'मूसा ने मेरे विषय में लिखा है। यदि तुम उसकी लिखी हुई बातों की प्रतीति नहीं करते, तो मेरी बातों की कैसे प्रतीति करोगे?' (यूहन्ना 5:46-47) वह बार-बार उत्पत्ति में वर्णित घटनाओं को वास्तविक ऐतिहासिक घटनाएँ, और उत्पत्ति में उल्लिखित व्यक्तियों को वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति मानकर बोलता है। कोई भी भली-भाँति सिखाया हुआ रविवारीय पाठशाला का विद्यार्थी हमें बता सकता है कि यीशु मसीह विश्रामदिन, विवाह और खतने की स्थापना की, जलप्रलय, जहाज़, सदोम के विनाश की, शैतान की जो 'आरम्भ से झूठ बोलनेवाला' है, तथा हाबिल, नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब, लूत और लूत की पत्नी की चर्चा करता है। हर अवसर पर उसकी भाषा उस व्यक्ति की है जिसके मन के सामने निर्विवाद अधिकार के अभिलेख हैं, जिन्हें वह बिना हिचकिचाहट के पूर्ण भरोसे से काम में लाता है। मेरी दृष्टि में वह पाँचों पुस्तकों के आरम्भ से अन्त तक केवल एक ही लेखक का हाथ देखता है, और उस लेखक के विषय में उसने अपने सुननेवालों को सिखाया कि वह मूसा था। यदि आधुनिक पुराने नियम के आलोचकों के सिद्धान्त सच हैं, तो मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना में उनके समर्थन का एक उल्लेखनीय अभाव तो है ही।
बेशक मैं यह नहीं भूलता कि बहुत-से 'उच्चतर आलोचक' यह मानते हैं कि हमारे प्रभु ने अपने मन में सचमुच यह विश्वास नहीं किया था कि मूसा ने पंचग्रन्थ लिखा, या कि उत्पत्ति में वर्णित घटनाएँ वास्तव में घटी थीं। वे कहते हैं कि किसी को ठेस न पहुँचाने के लिए उसने अपने सुननेवालों की परम्परागत धारणाओं को अपना लिया, और उनकी अज्ञानभरी किंवदन्तियों के अनुसार स्वयं को ढाल लिया। किसी कठिनाई का इससे अधिक असम्भव समाधान मैं सोच भी नहीं सकता! यदि कभी कोई ऐसा शिक्षक हुआ जो अपने सुननेवालों की चापलूसी करने या उनके पूर्वाग्रहों के अनुसार अपनी भाषा ढालने से ऊपर था, तो वह हमारा प्रभु था। वह कहता है, 'तुम पवित्रशास्त्र को नहीं जानते, इसलिए भूल में पड़े हो।' (मत्ती 22:29)। एक ही अध्याय (मत्ती 23) में वह शास्त्रियों और फरीसियों से आठ बार कहता है, 'हे कपटियो, तुम पर हाय।' एक बार वह कहता है, 'हे सर्पो, हे करैतों के बच्चो, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे?' (मत्ती 23:33)। एक बार वह कहता है, 'तुम अपने पिता शैतान से हो, और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो।' (यूहन्ना 8:44)। क्या कोई हमें बताएगा कि ऐसा शिक्षक कभी अपने सुननेवालों के अनुसार स्वयं को ढालता, और उन बातों को तथ्य कहकर बोलता जिन्हें वह जानता था कि तथ्य नहीं हैं, और ऐसे स्त्री-पुरुषों को वास्तविक व्यक्ति कहकर बताता जिनके बारे में वह जानता था कि वे कभी थे ही नहीं, केवल अपने श्रोताओं को प्रसन्न और सन्तुष्ट करने के लिए? जो मान सकते हैं वे मानें। मेरे विचार से, हमारे प्रभु की भाषा को इस प्रकार समझाने का प्रयास हमसे अत्यधिक असम्भावनाओं पर विश्वास करवाता है।
मैं यह भी नहीं भूलता कि पुराने नियम के कुछ अन्य 'उच्चतर आलोचक' हमारे सामने की इस कठिनाई को यह कहकर समझाने का प्रयास करते हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह का ज्ञान सीमित था, कि वह कुछ विषयों में अन्य मनुष्यों के समान अनजान था, और पंचग्रन्थ के रचयिता तथा उत्पत्ति में वर्णित घटनाओं और व्यक्तियों के विषय में भूल कर सकता था। यह ऐसी व्याख्या है जिसे मैं स्वीकार करने से इनकार करता हूँ, और जिसे मैं अत्यन्त खतरनाक मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि हमारा प्रभु सचमुच और यथार्थ में मनुष्य था, और जन्म से ही वह अन्य मनुष्यों के समान 'बुद्धि और डील-डौल में बढ़ता गया।' (लूका 2:52)। परन्तु यह कि पूर्ण आयु को पहुँचने पर उसका ज्ञान किसी ऐसे अन्य मनुष्य के ज्ञान के समान अपूर्ण और सीमित था जो केवल आदम की पतित सन्तान होता, इसे मैं क्षण-भर के लिए भी नहीं मान सकता। क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि वह सदा मनुष्य के साथ-साथ परमेश्वर भी था, और उसके आश्चर्यजनक तथा रहस्यमय व्यक्तित्व में 'ईश्वरत्व और मनुष्यत्व ऐसे जुड़ गए कि कभी अलग न किए जाएँगे।' (दूसरा अनुच्छेद।) यह मान लेना कि अपनी पृथ्वी की सेवकाई के तीन वर्षों में किसी भी समय वह बीती बातों के विषय में अज्ञानता से बोल सकता था, और ऐसी बातें सिखा सकता था जो सचमुच सत्य नहीं थीं, मुझे एक गम्भीर भूल, और सोसिनियन मत की ओर बढ़ा हुआ एक कदम प्रतीत होता है। मेरी आत्मा एक भूल कर सकनेवाले उद्धारकर्ता, छुड़ानेवाले, महायाजक और न्यायी के विचार मात्र से ही विद्रोह कर उठती है! इस हिसाब से हमारा प्रभु केवल मनुष्य भविष्यद्वक्ताओं में सबसे महान ठहरता है, इससे अधिक कुछ नहीं, और 'शरीर में प्रगट हुआ परमेश्वर' नहीं। एक बार यह मान लीजिए कि वह अपनी शिक्षा के किसी भी भाग में भूल कर सकता था, तब मैं नहीं देखता कि आप सीमा-रेखा कहाँ खींचेंगे। तब कोई भी निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकेगा कि उसने कब अज्ञानता से कहा और कब नहीं; और उसके सारे वचनों पर अनिश्चितता का कुहासा छा जाता है। यह कि अनन्त त्रिएकता की रहस्यमय योजनाओं में यह ठहराया गया था कि पुत्र अपनी पृथ्वी की सेवकाई के दौरान, कलीसिया पर प्रकट की जानेवाली बात के रूप में, अपने दूसरे आगमन और जगत के अन्त की ठीक तिथि को न जाने, इसे मैं मान सकता हूँ, और मैं श्रद्धापूर्वक सोचता हूँ कि इस ठहराव में मुझे बुद्धि दिखाई देती है। (मरकुस 13:32)। वह कहता है, 'पिता जिसने मुझे भेजा है, उसी ने मुझे आज्ञा दी है कि क्या कहूँ और क्या बोलूँ।' (यूहन्ना 12:49)। परन्तु यह कि उसने कभी कोई अशुद्ध बात कही, इसे मैं क्षण-भर के लिए भी नहीं मान सकता। यदि वह ऐसा था, तो वह कलीसिया का अचूक शिक्षक और 'जगत की ज्योति' नहीं हो सकता था। जहाँ तक इब्री पवित्रशास्त्र के पाठ और भाषा का सम्बन्ध है, मैं मुश्किल से सोच सकता हूँ कि मसीह उसे किसी भी जर्मन या अंग्रेज़ प्राध्यापक से, जो कभी हुआ हो, अधिक अच्छी तरह नहीं समझता था। कम से कम, मैं समझता हूँ कि उसके पुनरुत्थान के बाद उसके ज्ञान पर कोई प्रश्न उठाने का साहस नहीं करेगा। हम पढ़ते हैं कि उसके पुनरुत्थान के बाद ही, 'उसने मूसा से और सब भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से, अपने विषय में जो बातें लिखी हैं, उनका अर्थ उन्हें समझा दिया।' (लूका 24:27)। यदि उस स्थान पर 'मूसा' का अर्थ पंचग्रन्थ नहीं है, तो मैं नहीं देखता कि उसका और क्या अर्थ हो सकता है। आखिरकार, यदि वह जो कुँवारी मरियम से जन्मा था, धन्य त्रिएकता का दूसरा जन था, जो वाचा के स्वर्गदूत के रूप में सदोम के नाश से ठीक एक दिन पहले अब्राहम को दिखाई दिया था, तो मुझे यह अविश्वसनीय लगता है कि बाद में 'अपने शरीर के दिनों में' वह अब्राहम के समय की घटनाओं से अनजान रहा हो। मुझसे यह मनवाना कि वह उन घटनाओं को नहीं जानता था जिन्हें उसने उन्नीस शताब्दी पहले देखा था, मुझसे एक बड़ी असम्भावना पर विश्वास करवाना है।
(4) मेरी चौथी कठिनाई यह है। मैं पुराने नियम के आधुनिक आलोचकों के सिद्धान्तों का मेल पवित्रशास्त्र की सर्वोच्चता और पर्याप्तता से नहीं बैठा सकता। यदि ये सिद्धान्त सच हैं, तो मसीही विश्वास के उस पुराने मूल सिद्धान्त का अन्त हो जाता है कि बाइबल विश्वास और आचरण का नियम है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि सदियों से अधिकांश रूढ़िवादी मसीही 'बाइबल' नामक इस ग्रन्थ को सत्य और भ्रम की प्रामाणिक कसौटी, और सारे सच्चे धर्म का स्रोत मानते आए हैं। मेरे लिए और बहुतों के लिए यह अन्धकार में पड़े और पतित संसार के प्रति परमेश्वर का मुखपत्र है, और धर्म के विषय में वह अन्तिम अपील-न्यायालय है जो कभी भूल नहीं करता। जो कुछ हमें आत्मिक सत्य के रूप में मानने को कहा गया है, उसके विषय में केवल यही एक प्रश्न पूछा गया है: क्या वह बाइबल में है? यदि वह वहाँ है, तो भरोसे के योग्य है और ग्रहण किया जाना चाहिए; यदि वह वहाँ नहीं है, तो उसे हमारी सहमति माँगने का कोई अधिकार नहीं। देश भर में प्रचारक, बाइबल-कक्षा के शिक्षक और रविवारीय पाठशाला के शिक्षक, सब आपसे कहते हैं कि जो वे कहते हैं उस पर विश्वास कीजिए और उसे स्वीकार कीजिए, क्योंकि वह एक ऐसी पुस्तक में लिखा है जिसके विषय में वे आपको बताते हैं कि वह 'परमेश्वर का लिखा हुआ वचन, परमेश्वर का वचन' है। पवित्रशास्त्र का एक सीधा-सा पद सब कुछ निपटा देता है। हमारे अपने उनतालीस अनुच्छेद इस दृष्टि से बाइबल का हवाला पूरे उन्नीस बार देते हैं। परन्तु यदि 'उच्चतर आलोचना' के सिद्धान्त सही हैं, तो इस सबके विषय में हम क्या कहें? यदि पवित्रशास्त्र के कुछ भाग अप्रेरित मनुष्यों की अनिश्चित रचनाएँ हैं; यदि उदाहरण के लिए उत्पत्ति केवल चार-पाँच अलग-अलग हाथों के योगदानों की जोड़-तोड़ है; यदि उसके ऐतिहासिक भाग मात्र दन्तकथाएँ, कल्पित कहानियाँ और मिथक हैं, जिनमें कोई ईश्वरीय अधिकार नहीं; तो प्रचारक, व्याख्याता और रविवारीय पाठशाला के शिक्षक, सब अपने मुख्य हथियार से वंचित हो जाते हैं। उन्हें अपने सुननेवालों से कहना पड़ेगा, 'जो बातें हम आपको बताते हैं वे सम्भव है कि सच हों, परन्तु हमें निश्चय नहीं कि वे सच हैं।' इस हिसाब से तो मुझे दिखता है कि बाइबल का मुख्य उपयोग ही नष्ट हो गया। इस पुरानी पुस्तक को परमेश्वर के शुद्ध वचन होने के उस ऊँचे पद से उतार दिया गया है, क्योंकि उसे पतित मनुष्य के मात्र अप्रेरित शब्दों के साथ मिला दिया गया है। यदि हम एक बार अनिश्चितता की पतली-सी दरार को भी स्वीकार कर लें, तो कौन तय करेगा कि पुराने नियम के कौन-से भाग अचूक 'परमेश्वर की वाणी' हैं, और कौन-से भाग आदम की भटकी हुई और भ्रष्ट सन्तानों के चूक करनेवाले लेख हैं? उत्पत्ति के ऐतिहासिक भागों में कौन-से सच्चा इतिहास हैं, और कौन-से मात्र निराधार मिथक और दन्तकथाएँ हैं जिनका कोई अधिकार नहीं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर, मेरा विश्वास है, कोई नहीं दे सकता। मैं नहीं जानता कि 'उच्चतर आलोचना' के पादरी-पक्षधर कभी उत्पत्ति के ऐसे भागों से उपदेश देते हैं या नहीं, जैसे पतन की कथा, या जलप्रलय की, या बाबुल के गुम्मट की। यदि देते हैं, तो मैं जानना चाहूँगा कि क्या वे अपनी मण्डलियों से कहते हैं कि वे उन्हें प्रेरित 'परमेश्वर के वचन' से शिक्षाएँ दे रहे हैं। यदि वे ऐसा करने में आपत्ति करते हैं, तो मैं जानना चाहता हूँ कि वे कहाँ जाकर रुकेंगे, और किस अधिकार से अपने सुननेवालों से अब्राहम, इसहाक और याकूब की कथा पर विश्वास करने को कहेंगे। यदि आप उत्पत्ति के एक भाग को अस्वीकार करते हैं, तो आप किसी भी भाग के विषय में निश्चित नहीं हो सकते।
अन्त में, मैं अपनी पहली स्थिति पर लौट आता हूँ। मेरा आग्रह है कि जिस पुस्तक में दोष, भूलें, त्रुटियाँ, अपूर्णताएँ, अशुद्धियाँ और असत्य हों, वह किसी कलीसिया के लिए विश्वास का नियम नहीं हो सकती। उसमें सत्य और रोचक विषय की बड़ी मात्रा हो सकती है, परन्तु उसे निश्चय ही अचूक 'परमेश्वर का वचन' नहीं कहा जा सकता। मुझे चूक-योग्य बाइबल की धारणा से लगभग उतनी ही घृणा है जितनी चूक-योग्य उद्धारकर्ता की धारणा से। यदि बाइबल कुछ भी है, तो वह परमेश्वर के राज्य की विधि-संहिता है, उन व्यवस्थाओं और नियमों का संग्रह है जिनके अनुसार उस राज्य की प्रजा को जीवन बिताना है, और उन शर्तों का पंजीकृत विलेख है जिन पर उन्हें अभी शान्ति और आगे महिमा प्राप्त होगी। तो फिर हम यह क्यों मानें कि ऐसी पुस्तक ढीले-ढाले और अपूर्ण ढंग से तैयार की गई होगी, जबकि पृथ्वी पर कानूनी विलेख भी ऐसे नहीं बनाए जाते? हर वकील हमें बता सकता है कि कानूनी विलेखों और विधियों में हर शब्द महत्वपूर्ण होता है, और सम्पत्ति, जीवन या मृत्यु तक प्रायः एक ही शब्द पर टिकी हो सकती है। सोचिए कि यदि वसीयतनामे, बन्दोबस्त, हस्तान्तरण-पत्र, साझेदारी के विलेख, पट्टे, अनुबन्ध और संसद के अधिनियम सावधानी से तैयार न किए जाएँ और सावधानी से उनकी व्याख्या न की जाए, और हर शब्द को उसका उचित महत्व न दिया जाए, तो कैसी गड़बड़ी मच जाएगी। ऐसे दस्तावेज़ों का क्या लाभ, यदि विशेष शब्दों का कोई मूल्य ही न हो, और हर किसी को अधिकार हो कि अपनी इच्छा से शब्द जोड़े, घटाए, बदले, उनकी वैधता से इनकार करे, या शब्द मिटा दे? इस हिसाब से तो हम अपने सारे कानूनी दस्तावेज़ ही एक ओर रख दें! यदि परमेश्वर की विधि-संहिता प्रेरित नहीं है, और उसका हर भाग, एक-एक मात्रा और बिन्दु ईश्वरीय अधिकार से युक्त नहीं है, तो परमेश्वर की प्रजा की दशा बड़ी दयनीय है! 'उच्चतर आलोचना' विश्वास का पुराना नियम और सत्य व भ्रम की पुरानी कसौटी छीन लेती है, और उसके स्थान पर उन्हें अनुमानों और कल्पनाओं, संदिग्ध बातों और अनिश्चितताओं से भरी पुस्तक थमा देती है। कोलचेस्टर के बिशप ने जून 1892 की द कंटेम्पररी रिव्यू में एक सक्षम लेख में ठीक और बुद्धिमानी से कहा है: 'अति-बुद्धिवादी विचारों का पहला और सबसे स्पष्ट परिणाम यह है कि जहाँ तक पुराने नियम का सम्बन्ध है, हमारे पास कोई बाइबल बचेगी ही नहीं। पुस्तकों का ऐसा संग्रह, जो इतना अविश्वसनीय हो, और जो आरपार नकलीपन और छल से छलनी हो, अब पवित्रशास्त्र के रूप में आदर के योग्य नहीं रह सकता! उन्हें अब प्रकाशन से युक्त नहीं माना जा सकता!'
(5) मेरी पाँचवीं और अन्तिम कठिनाई यह है। मैं यह नहीं समझ पाता कि जिस पुस्तक में इतनी त्रुटियाँ, अशुद्धियाँ और अपूर्णताएँ हैं; जिस पुस्तक के अनेक अंशों की रचना के विषय में ‘उच्चतर आलोचना’ के अनुसार इतना सन्देह है, जितना बाइबल के विषय में बताया जाता है—मैं यह नहीं समझ पाता कि ऐसी अपूर्ण पुस्तक संसार में वह महान कार्य कैसे कर सकी है जो बाइबल ने निश्चय ही किया है। यही एक पुस्तक, जिसका अनुवाद पृथ्वी की सब प्रमुख भाषाओं में हो चुका है, बहुत वर्षों से लाखों स्त्री-पुरुषों द्वारा आदि से अन्त तक सत्य मानकर ग्रहण की गई है, और आत्मा को उद्धार देनेवाले धर्म की अचूक शिक्षक तथा अनन्त जीवन की निश्चित और विश्वासयोग्य मार्गदर्शक मानी गई है। यही वह पुस्तक है जिसने अकेले ही, कलीसियाओं, सेवकों, संस्कारों या पाठशालाओं की सहायता के बिना, मेडागास्कर में हज़ारों मसीही बने मूर्तिपूजकों के बीच बीस वर्ष तक मसीही विश्वास को जीवित रखा, जबकि सब विदेशी मिशनरी और शिक्षक उस देश से बलपूर्वक निकाल दिए गए थे। यही वह पुस्तक है जिसके सिद्धान्त-कथन और जिसके अकेले पद पिछली तीन शताब्दियों से 1. सन् 1837 से। रानी रानावालोना उत्पीड़क थी, अगणित अमर प्राणियों का आत्मिक भोजन और सान्त्वना रहे हैं। उन्होंने उसकी शिक्षा के अधीन पवित्र जीवन बिताया है, और पूरी तरह उसके कथनों पर भरोसा रखते हुए तथा उसकी सारी विषय-वस्तु पर विश्वास करते हुए शान्ति से कब्र में उतरे हैं। मैं समझता हूँ कि कोई भी इससे इनकार करने का साहस न करेगा।
परन्तु यदि हम ‘उच्चतर आलोचना’ के दावों को स्वीकार कर लें तो हम कहाँ खड़े होंगे? हमसे कहा जाता है कि बाइबल नामक इस पुस्तक के बड़े-बड़े भागों की रचना के विषय में इतनी अनिश्चितता है कि उन्हें सच्चाई से ‘परमेश्वर का वचन’ नहीं कहा जा सकता। हमसे कहा जाता है कि मूसा के पंचग्रन्थ के बड़े भाग मूसा ने नहीं लिखे, और यदि लिखा भी तो थोड़ा-सा ही; और दाऊद ने केवल एक भजन लिखा, वह भी 110वाँ नहीं। हमसे कहा जाता है कि उत्पत्ति की पुस्तक अनेक हाथों के लेखों का संकलन है, और उसके बहुत-से ऐतिहासिक कथन अनिश्चित उत्पत्ति की मात्र परम्पराएँ हैं, या ऐसी कथाएँ और दन्तकथाएँ हैं जिनकी कोई ठोस नींव नहीं। दानिय्येल और योना की पुस्तकों के विषय में हमें यह मानना है कि उनकी विषय-वस्तु चतुराई से गढ़ी हुई, कहानियों जैसी रचनाओं से बढ़कर कुछ नहीं। यह सब, और इससे भी बहुत कुछ जो मैं जोड़ सकता हूँ, हमसे बहुत कमज़ोर और अनिर्णायक प्रमाण के आधार पर मानने को कहा जाता है, जबकि जो लोग हमसे अपने सिद्धान्त मानने को कहते हैं वे स्वयं आपस में बँटे हुए हैं।
अब मैं उन सब की सामान्य बुद्धि से अपील करता हूँ जिनके हाथों में यह सम्बोधन पहुँचे। क्या यह तनिक भी सम्भव है कि जिस पुस्तक ने—चाहे उसका अनुवाद कभी-कभी कितना ही कमज़ोर क्यों न हो—पृथ्वी के हर भाग में लाखों मनुष्यों के हृदयों, मन-मस्तिष्कों और जीवनों पर इतना विशाल प्रभाव पाया है और आज भी बनाए रखा है, वह ऐसी पुस्तक हो जिसमें अनेक अपूर्णताएँ, अनेक सन्देहास्पद कथन और अनेक स्पष्ट असत्य हों? क्या यह सम्भव और सम्भावित है कि परमेश्वर ऐसी पुस्तक को काम में लाए? मैं मानता हूँ कि उसका अनुवाद कभी-कभी बुरा हो सकता है। यह भी मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि जिन पतित मानवीय साधनों को वह उसके प्रयोग के लिए काम में लाता है वे अपूर्ण हों। परन्तु यह कि जो सारी पुस्तक वह उनके हाथों में काम करने के हथियार के रूप में देता है वह उतनी अपूर्ण हो जितनी ‘उच्चतर आलोचना’ उसे बताती है, इस पर विश्वास करने के लिए जितनी भोली-भाली मानने की प्रवृत्ति मुझमें है, उससे अधिक चाहिए। मेरी दृष्टि में यह एक गम्भीर असम्भावना है।
निस्सन्देह मैंने एक बहुत बड़े विषय के केवल एक पक्ष को छूने का प्रयत्न किया है। मैं स्पष्ट मानता हूँ कि ‘उच्चतर आलोचना’ के समर्थक पुराने नियम के विषय में सौ प्रश्न पूछ सकते हैं, जिनका उत्तर मैं, पुरानी परम्परागत मान्यता के अन्य समर्थकों की तरह, बिलकुल नहीं दे सकता। परन्तु मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि उनकी प्रणाली की कठिनाइयाँ हमारी प्रणाली की कठिनाइयों से कहीं अधिक बड़ी हैं, और सम्भावना का तर्क निश्चय ही हमारे पक्ष में है। न ही मैं यह कहे बिना रह सकता हूँ कि उस पूरे सम्प्रदाय के लेखों में मुझे बहुत-सी उद्दाम कल्पनाएँ, बिना प्रमाण की मान्यताएँ, अतार्किक कथन और स्वयं को काटनेवाले वक्तव्य दिखाई देते हैं। जो लोग इस विषय में और गहराई से जाना चाहें, उन्हें मैं बिशप क्रिस्टोफर वर्ड्सवर्थ की ‘उत्पत्ति की भूमिका’ पढ़ने की ज़ोरदार सिफ़ारिश करता हूँ, जो उनकी सम्पूर्ण बाइबल की टीका के आरम्भ में है।
It is vain to deny that the whole subject of inspiration has always been, and will always be, a very mysterious one. I greatly admire the wisdom of our own Church of England in abstaining from dogmatism about it. I expect there will be shades of differences among us as long as the world stands. Most truly has Dean Burgon said, ‘You cannot dissect inspiration into substance and form. As for the thoughts being inspired, apart from the words which gave them expression, you might as well talk of a tune without notes, or a sum without figures. No such dream can abide the daylight for a moment. No such theory of inspiration is even intelligible. It is as illogical as it is worthless.’ How and in what precise manner the Holy Spirit worked on the minds of those who wrote the Bible, I for one would never attempt to explain. Minds cannot be anatomized like bodies, or inspected like physical objects with the microscope. I certainly do not believe that inspired writers, like reporters, only wrote down what they had seen with their own eyes, or heard with their own ears, or been told by other people. I hold that, after a miraculous manner, the Holy Ghost suggested matter to be written down by those whom He inspired, and also suggested the words and language in which that matter should be clothed. But in all this the mental process is a deep miracle which I do not pretend to explain, any more than to explain how Lazarus was raised from the dead. I only know that the result is a firm conviction in my soul, that the whole book has something about it utterly unlike any other book in the world, and is rightly called ‘the Word of God.’
I humbly confess that when I sit down to read the Scriptures I always expect to meet ’some things hard to be understood.’ Sometimes I feel that I do not know who wrote this or that book in the Bible, or when it was written, or why such and such things were written in it, or what they all mean. But then I fall back on the thought, that this is part of a miraculous book given by inspiration. This is God’s word, and what I know not now I shall know hereafter. To use the words of Hooker, ‘The little thereof which we darkly apprehend we admire; the rest, with religious ignorance, we humbly and meekly adore.’ (Eccles. Polity, Bk. I. ch. 2. 5) I agree entirely with Augustine when he says: ‘If I meet with anything in the canonical books of Scripture which seems to me at variance with the truth, I do not doubt but that either my copy of that book is faulty, or that the translation of it which I am using has missed the sense, or that I myself have failed to understand the true meaning of the writer.’ (Augustine, Epistle to Jerome, 82). It is a wise remark of old Thomas Fuller in his Commentary on the Book of Ruth, ‘Even as a man that hath a piece of gold, which he knows to be the right weight, and sees it stamped with the king’s image, careth not to know the name of the man who minted or coined it; so we, seeing the book to have the superscription of Caesar, the stamp of the Holy Ghost, need not to be curious to know who was the penman thereof.’
I conclude all with a striking passage from Gaussen, the Swiss divine: ‘One trembles when, after beholding the Son of Man commanding the elements, stilling the tempests, and despoiling the tomb, and solemnly declaring that He will, on an appointed day, return to judge, by this book, the quick and the dead--one trembles to see a poor accountable mortal, seated in a professor’s chair, and handling the Word of God as he would handle Terence or Thucydides, retrenching, adding, praising, blaming; lopping off whole chapters as containing mistakes, inconclusive arguments, rash assertions, and the like! Yet in a few years the learned professor and his pupils will all be in the tomb, while not a particle of the divine book will have passed away, and when the Son of Man shall descend from heaven, by this book shall they all be judged.’ I will not detain the Conference any longer, and I wish I could have made my address shorter. But we meet in peculiar times, and the burning questions I have tried to handle cannot be dismissed in a few brief sentences. Of course I do not expect you all to agree with me. But I hope you will all believe that I have told you frankly and honestly what I think. We only ‘know in part,’ and I lay no claim to infallibility.
