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क्या आवश्यक है? (जारी)
लिवरपूल डायोसीज़ के पन्द्रहवें वार्षिक सम्मेलन में दिया गया एक संबोधन, सेंट जॉर्ज हॉल में, 3 नवम्बर, 1896। आदरणीय पादरी भाइयो और सामान्य विश्वासी भाइयो, एक बार फिर, पन्द्रहवीं बार, मुझे हमारे वार्षिक डायोसीज़ सम्मेलन की अध्यक्षता करने की अनुमति मिली है, और मैं आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। हम इंग्लैंड की स्थापित कलीसिया के इतिहास के एक कुछ संकटपूर्ण समय में एकत्र हुए हैं। उसके हितों को गंभीर रूप से प्रभावित करनेवाले, और विशेष रूप से गंभीर तथा नाज़ुक स्वभाव के प्रश्न निरन्तर सामने आ रहे हैं, और सभी निष्ठावान कलीसिया-जनों का विचारपूर्ण ध्यान माँगते हैं। उनमें से दो को आपकी स्थायी समिति ने इस सप्ताह की चर्चा के लिए बुद्धिमानी से चुना है। मेरा संकेत कलीसिया-सुधार और एंग्लिकन अभिषेक-पद की ओर है। खेद है कि ये दो ही प्रश्न अकेले नहीं हैं। और भी हैं जिनके समाधान की आवश्यकता कम नहीं है, और जो आजकल संसद में भी और प्रेस में भी हमारे सामने रखे जा रहे हैं; इस संबोधन में मैं उन पर विचार करना चाहता हूँ। इन सबके विषय में किसी डायोसीज़ को अधिकार है कि वह अपने अध्यक्ष से अपेक्षा करे कि वह अपना मत प्रकट करे। अधिक भूमिका के बिना, मैं आज प्रातः ऐसा ही करने चलता हूँ। मैं पहले कलीसिया की वर्तमान समस्याओं को और फिर कलीसिया की वर्तमान स्थिति को लेने का प्रयत्न करूँगा।
1. पहला और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विषय, जो आपके ध्यान की माँग करता है, कलीसिया का राज्य से अलग किया जाना है।
मुझे आपको यह याद दिलाने की शायद ही आवश्यकता है कि एक वर्ष पहले हमने इस विषय के बारे में कितना सुना था। पिछली सरकार का वेल्स की कलीसिया को राज्य से अलग करने और उसकी सम्पत्ति छीनने का, कलीसिया और राज्य के मेल को भंग करने और वेल्स के पादरियों को उनकी आय से वंचित करने का साहसिक प्रयत्न सारे देश में अप्रत्याशित रूप से प्रबल भावना जगा गया, और हज़ारों सोए हुए कलीसिया-जनों को जगाकर उठ बैठने और आँखें खोलने पर विवश कर गया।
टिप्पणी: मार्च 1895 में एच. एच. एस्क्विथ (रोज़बरी सरकार के गृह-सचिव) ने हाउस ऑफ कॉमन्स में वेल्स कलीसिया-विच्छेद विधेयक प्रस्तुत किया था।
आपको स्मरण होगा कि वह प्रयत्न इतनी पूरी तरह विफल हुआ कि यह समझना कठिन है कि वह कभी किया ही क्यों गया। कलीसिया के शत्रुओं ने अपने ही बल का सर्वथा गलत अनुमान लगाया था, और रक्षक भी उस समर्थन से कम चकित नहीं हुए जो उन्हें उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक लगभग हर कोने से मिला, और कहीं अधिक नहीं तो लंकाशायर में तो सबसे अधिक मिला।
परन्तु क्या हम कलीसिया-विच्छेद के प्रश्न से छूट गए हैं? क्या यह विषय सदा के लिए ताक पर रखकर दफ़ना दिया गया है? क्या यह कोई पुराना जीवाश्म है जिसका कोई पुनरुत्थान नहीं होगा? मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि इस विचार के आगे न झुकें। जानुस के मन्दिर के द्वार अभी बन्द नहीं हुए हैं। यह शस्त्र रखकर सो जाने का समय नहीं है, बल्कि जागते रहने और सावधान रहने का समय है। पिछले चार वर्षों के भीतर हाउस ऑफ कॉमन्स एक बार कलीसिया-विच्छेद को स्वीकार कर चुका है। क्या कोई यह कहने का दायित्व लेगा कि अगला संसदीय चुनाव क्या परिणाम लाएगा? आज के दिनों में राजनीतिक शक्ति बहुत कुछ श्रमजीवी वर्गों के हाथ में है, और ऊपर के दस हज़ार लोग तुलनात्मक रूप से एक छोटा अल्पमत हैं। झूला कलीसिया-विरोधी दिशा में प्रचण्ड वेग से झूल सकता है। मतदाताओं के मन में एक बार यह धारणा बैठ जाए कि सब पादरी संकीर्ण-हृदय पुरोहितवादी हैं और इंग्लैंड की कलीसिया को रोमी बनाना चाहते हैं, तो कलीसिया-विच्छेद आ जाएगा। पिछले चुनाव के बारे में हम चाहे जो सोचें, लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। श्रमजीवी वर्ग एक अर्ध-रोमी स्थापित कलीसिया को बनाए रखने के लिए मत नहीं देंगे, और यदि कलीसिया उनका भरोसा खो दे तो वह नष्ट हो जाएगी।
कलीसिया-विच्छेद और सम्पत्ति-हरण से कितनी और कितने विस्तार की हानि होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन है। एक के साथ दूसरा निश्चय ही आएगा। यह सोचना मूर्खता है कि कलीसिया को राज्य के साथ साझेदारी तोड़ने और अपनी सारी आय लेकर चल देने दिया जाएगा। कृषि-प्रधान क्षेत्रों में सैकड़ों गिरजाघर बन्द करने पड़ेंगे। अकेले किसान और मज़दूर किसी सेवक का भरण-पोषण नहीं कर सकते। सभाएँ छोड़नी पड़ेंगी, और लोग बिना चरवाहे की भेड़ों के समान रह जाएँगे। नगरों में भी इंग्लैंड की कलीसिया के हाथ बहुत दुर्बल हो जाएँगे, विदेशी और देशी मिशन बुरी तरह लंगड़े हो जाएँगे, और हर परोपकारी संस्था को घटा हुआ सहारा मिलेगा। निस्सन्देह पुरानी भली इंग्लैंड की कलीसिया फिर भी जीवित रहेगी और मरेगी नहीं, परन्तु वह उपयोगिता की बहुत घटी हुई सामर्थ्य के साथ जीवित रहेगी; और कलीसिया-विच्छेद और सम्पत्ति-हरण के साथ फूट भी आएगी। निस्सन्देह कुछ अविचारी कलीसिया-जन सोच सकते हैं कि कलीसिया और राज्य का अलग होना निरा लाभ और आशीष होगा। मैं इसमें सन्देह करने की अनुमति चाहता हूँ। स्थापित कलीसिया की दुर्बलताएँ निस्सन्देह बहुत हैं, परन्तु स्वैच्छिक कलीसियाओं की दुर्बलताएँ भी न थोड़ी हैं न छोटी।
मेरा विश्वास है कि यदि कलीसिया-विच्छेद का विवाद फिर लौटे, तो कलीसिया-जनों का वर्तमान कर्तव्य बहुत स्पष्ट है। हमें अपनी बारूद सूखी रखनी चाहिए, और आवश्यकता पड़े तो अन्त तक लड़ने को तैयार रहना चाहिए। जो लोग हमारी तुलनात्मक समृद्धि से डाह रखते हैं और व्यापक परिवर्तन के लिए भूखे-प्यासे हैं, उनकी हास्यास्पद निन्दाओं और झूठे चित्रणों का हमें निरन्तर भण्डाफोड़ करना और उत्तर देना चाहिए।
उदाहरण के लिए, यह सच नहीं है, जैसा कि कभी-कभी कहा जाता है, कि पादरी, एक समूह के रूप में, सब पुरोहितवादी हैं और इंग्लैंड की कलीसिया को रोमी बनाना चाहते हैं। आज के दिनों में हज़ारों पादरी हैं जो हर रूप में पुरोहितवाद और रोमवाद को नापसन्द करते हैं, और देश के किसी भी कलीसिया-विच्छेद समर्थक के समान ही खरे प्रोटेस्टेंट हैं।
यह सच नहीं है कि स्थापित कलीसिया के अध्यक्ष और पादरी-वर्ग धन में लोट रहे हैं और अपनी आय का आधा भाग छोड़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के हज़ारों पादरी कृषि-मन्दी से लगभग बरबाद हो चुके हैं। नगरों में भी मेरा अनुमान है कि अनेक प्रमुख नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट सेवकों को हमारे अपने पल्ली के पादरियों से अधिक आर्थिक सहायता मिलती है। जहाँ तक अध्यक्षों का प्रश्न है, उनमें से बहुतों को अपनी जेब पर निरन्तर पड़ती माँगों के कारण दोनों सिरे मिलाना कठिन लगता है। स्वर्गीय आर्चबिशप लॉन्गली कहा करते थे कि जब वे हैरो स्कूल के प्रधानाध्यापक थे तब उनका निर्वाह अच्छी तरह चल जाता था, पर रिपन के अध्यक्ष बनने पर वे निर्धन होने लगे, यॉर्क के आर्चबिशप बनाए जाने पर और भी निर्धन हो गए, और कैंटरबरी के आर्चबिशप होने पर सबसे अधिक निर्धन हो गए। (यहाँ गिनाई गई नियुक्तियाँ 1829-68 की अवधि की हैं (लॉन्गली चार वर्ष तक डरहम के अध्यक्ष भी रहे)।)
यह सच नहीं है कि प्रार्थना-पुस्तक केवल पोप-पंथी संकलन है। इसका अधिकांश भाग पत्रियों, सुसमाचारों और भजन संहिता से लिया गया है। समग्र रूप से इसकी प्रार्थनाएँ बिना-अध्यक्षीय आराधना-स्थलों की अधिकतर तात्कालिक प्रार्थनाओं और मध्यस्थता की प्रार्थनाओं के साथ अच्छी तरह तुलना में ठहर सकती हैं।
जैसे अज्ञानतापूर्ण कथन मैंने अभी बताए हैं, वैसे कथन पिछले दो-तीन वर्षों में बहुत ही अधिक बार कहे गए हैं, और सार्वजनिक अवसरों पर उनका निडरता और दृढ़ता से खण्डन और सुधार किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से स्थापित कलीसिया के शत्रुओं में उन्हें बड़ी उत्सुकता से माना, निगला और फैलाया जाता है। एक चीनी कहावत है, ‘निन्दा एक ऐसा कीड़ा है जिसके पंख लम्बे हैं पर पैर नहीं। वह खड़ा नहीं हो सकता, पर उड़ सकता है।’
कलीसिया को राज्य से अलग करने के आन्दोलन का विरोध करने में मुद्रणालय का भी, पुलपिट और मंच के समान, परिश्रम से उपयोग किया जाना चाहिए। सस्ता और सरल साहित्य व्यापक रूप से बाँटा जाए, और विशेषकर ऐसा साहित्य जो पिछले साढ़े तीन सौ वर्षों में इंग्लैंड की कलीसिया का सीधा और ईमानदार वृत्तान्त दे। कम ही कलीसिया-जनों को इस बात का स्पष्ट ज्ञान है कि धर्म-सुधार का हम पर कितना बड़ा ऋण है, और वह हमें भ्रम और अन्धविश्वास के कितने विशाल ढेर से छुड़ा लाया। कुछ तो यह मूर्खतापूर्ण धारणा रखते हैं कि आर्चबिशप लॉड के उठने से पहले हमारी कलीसिया अन्धकार की दशा में थी, और पार्कर, ग्रिंडल, व्हिटगिफ़्ट, ज्यूएल और हूकर द्वारा किए गए उत्तम कार्य से बिलकुल अनजान हैं। उपयोगी ज्ञान फैलाना और अन्धी आँखों में ज्योति पहुँचाना एक बड़ा कार्य है जो स्थापित कलीसिया के मित्रों को अपने हाथ में लेना चाहिए, यदि वे अपने शत्रुओं के आक्रमणों को रोकना चाहते हैं।
मैं कलीसिया को राज्य से अलग करने के विषय को एक दुःखभरे विचार के साथ छोड़ता हूँ। मैं अपना यह दृढ़ विश्वास प्रकट किए बिना नहीं रह सकता कि इस आन्दोलन के कुछ सबसे कारगर सहायक हमारी अपनी ही कलीसिया की सीमा के भीतर हैं। पादरियों और उच्च वर्ग के साधारण जनों का वह बड़ा और प्रभावशाली समुदाय, जो इंग्लैंड की प्रोटेस्टेंट कलीसिया को रोमी रंग में रंगने पर तुला दिखता है, धीरे-धीरे अनेक कलीसिया-जनों के भरोसे को हिला रहा है, स्थापित कलीसिया की कब्र खोद रहा है, और अगले संसदीय चुनाव के लिए काम तैयार कर रहा है। मैं तुम्हें एक बार फिर चेतावनी देता हूँ कि मध्य और श्रमिक वर्गों के हाथ में अब अपार राजनीतिक शक्ति आ गई है, और वे उसका उपयोग करने को दृढ़ हैं। मुझे निश्चय है कि वे ऐसा हाउस ऑफ़ कॉमन्स नहीं चुनेंगे जो याजकवाद, मिस्सा और पाप-स्वीकार का पक्ष ले। यदि उन्हें कलीसिया के उम्मीदवारों पर भरोसा न हुआ तो वे मतदान-स्थल पर कलीसिया का समर्थन करने से इनकार कर देंगे; और तब कलीसिया को राज्य से अलग करने की घड़ी आएगी। मैं उसे देखने के लिए बहुत बूढ़ा हूँ। पर मेरे शब्द स्मरण रखना: वह घड़ी आएगी।
2. दूसरा विषय जिस पर मैं आज तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहता हूँ, वह प्रारम्भिक कलीसिया-शिक्षा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय है। यह, मुझे कहने की आवश्यकता नहीं, बहुत कठिन और काँटेदार प्रश्न है, और इसमें ऐसी गाँठें हैं जिन्हें सबसे योग्य राजनेता भी खोलना कठिन पाते हैं। मेरी राय में कठिनाई की जड़ें दो बड़ी राजनीतिक भूलों में खोजी जा सकती हैं, जिनका दुःख हम आज तक भोग रहे हैं। इनमें से एक भूल 1870 में हुई, जब बोर्ड स्कूल प्रणाली अस्तित्व में लाई गई। यदि उस समय सरकार ने साहस के साथ यह आग्रह किया होता कि राज्य से सहायता पानेवाले स्कूलों में हर बालक को दी जानेवाली धार्मिक शिक्षा में बाइबल, विश्वास-वचन, प्रभु की प्रार्थना और दस आज्ञाएँ सम्मिलित हों, जब तक कि कोई माता-पिता विवेक के आधार पर आपत्ति न करें, तो मुझे सन्देह है कि सारे देश में बीस में से एक व्यक्ति ने भी इस योजना का विरोध किया होता। मेरा विश्वास है कि हर बोर्ड के लिए बाइबल को वैकल्पिक बना देना और विश्वास-वचन को पूरी तरह छोड़ देना भयंकर चूक थी। दूसरी भूल केवल कुछ वर्ष पहले हुई, जब ‘निःशुल्क शिक्षा’ का अधिनियम इस व्यर्थ विचार से पारित किया गया कि वह आवश्यक है और लोकप्रिय होगा। (1891। इस अधिनियम ने अधिकांश प्रारम्भिक स्कूलों को निःशुल्क कर दिया और शेष में शुल्क घटा दिया।) मेरे विचार में इससे बड़ी भूल कभी नहीं हुई। वास्तव में ‘निःशुल्क शिक्षा’ किसी को नहीं चाहिए थी। किसी ने उसे माँगा नहीं। किसी ने उसके लिए ‘धन्यवाद’ नहीं कहा। जब वह आई तो अनेक स्थानों में स्कूल-शुल्क की आय नष्ट हो गई, और लगभग तीन करोड़ की राशि लापरवाही से बहा दी गई, बचाई नहीं गई, जबकि सफ़क में दस शिलिंग प्रति सप्ताह कमानेवाले मज़दूर अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए उतने ही इच्छुक थे जितने उनके कपड़ों या भोजन के लिए। फिर भी ये दोनों भूलें हो चुकी हैं और इनके छोड़े या रद्द किए जाने की सम्भावना नहीं है। राजनीतिक घड़ियाँ कभी पीछे नहीं की जातीं। इसका परिणाम है बोर्ड स्कूलों में धर्म को लेकर निरन्तर शिकायत और कलीसिया के स्कूलों में धन को लेकर निरन्तर चिन्ता।
इस समय शिक्षा के महान प्रश्न की स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक और संकटपूर्ण है। आपको स्मरण होगा कि सरकार पिछले सत्र में हाउस ऑफ कॉमन्स में एक विशाल विधेयक लाई थी, जिसमें सम्पूर्ण विषय को सुलझाने का प्रस्ताव था। यह किसी भी आधुनिक ब्रिटिश सदन के निगलने के लिए बहुत बड़ा कौर था। वह एक लम्बा, जटिल और व्यापक उपाय था, जिसे अत्यधिक थकाऊ वाद-विवाद के बाद वापस ले लिया गया, और वह समाप्त हो गया। हमें अगले सत्र में एक और विधेयक का वचन दिया गया है, परन्तु अभी कोई नहीं बता सकता कि वह कैसा होगा। क्या वह लम्बा होगा या छोटा? क्या वह सरल होगा या जटिल? क्या उसमें उस डूबे हुए पुराने विधेयक के बहुत से प्रावधान फिर से निकालकर और ढालकर रखे जाएँगे, या वह बिल्कुल नया उपाय होगा? ये सब ऐसी पूछताछें हैं जिनका उत्तर मैं नहीं दे सकता; और जैसा फैराडे कहा करते थे, अच्छा यही है कि हम अपने मन को विवेकपूर्ण अनिश्चितता की स्थिति में रखें। फिर भी तीन बातें ऐसी हैं जिन पर कलीसिया के लोगों को दृढ़ता से पाँव जमाकर खड़े होना चाहिए, और सरकार को निःसंकोच बता देना चाहिए कि वे किसी भी नए शिक्षा विधेयक से क्या अपेक्षा रखते हैं। मैं आपको बताता हूँ कि वे क्या हैं। एक है आपत्तिजनक 17 शिलिंग 6 पेंस की सीमा को समाप्त करना। (17 शिलिंग 6 पेंस विद्यालय में पढ़ने वाले प्रति बालक को दी जाने वाली राज्य-सहायता का अधिकतम वार्षिक अनुदान ठहराया गया था।) दूसरी है सब विद्यालयों और विद्यालय-भवनों को करों से पूर्णतः मुक्त रखना। तीसरी है सरकार से सब प्राथमिक कलीसिया-विद्यालयों के लिए उचित वार्षिक सहायता माँगने का न्यायसंगत अधिकार, क्योंकि वे देश के आधे बालकों को शिक्षा देते हैं, और बहुत से मामलों में निःशुल्क देते हैं। इन तीन बातों पर मुझे आशा है कि कलीसिया के सब लोग एक साथ खड़े होंगे, कोई उपाय अछूता न छोड़ेंगे, और यदि आवश्यक हो तो अन्त तक लड़ेंगे।
फिर भी हमारे सामने शिक्षा-अभियान में तीन बातें ऐसी हैं जिन्हें मैं खुलकर मानता हूँ कि वे विवादास्पद हैं, और जिनके विषय में दोनों पक्षों में बहुत कुछ कहा जा सकता है, यह मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ। मुझे आशा है कि मैं उनके विषय में खुला मन रखने को तैयार हूँ। तथापि इस समय मेरे विचार इन तीनों के विषय में काफी निश्चित हैं, और मैं उन्हें यथासम्भव संक्षेप में कहूँगा।
(1) एक बात तो यह कि मैं निश्चय ही राज्य-सहायता की अपेक्षा रेट-सहायता को अधिक पसन्द करता हूँ। प्रति विद्यार्थी निश्चित राज्य-सहायता कुछ विद्यालयों में बहुत सन्तोषजनक होती, परन्तु अन्य विद्यालयों में बहुत असन्तोषजनक। रेट-सहायता का प्रबन्ध काउण्टी काउंसिलों और निगमों द्वारा कहीं अधिक अच्छी रीति से होता, जो उसे प्रत्येक विद्यालय की आवश्यकता के अनुसार बाँटते, किसी को अधिक और किसी को कम देते। जितना कुछ लोग भयभीत दिखाई देते हैं, उतना मैं इस बात से नहीं डरता कि रेट-सहायता के अधीन कलीसिया के विद्यालयों का प्रबन्ध बुरे हाथों में चला जाएगा। मुझे अंग्रेज़ सामान्य विश्वासियों की निष्पक्षता और सामान्य बुद्धि पर बड़ा भरोसा है, और मैं नहीं मानता कि वे कलीसिया के विद्यालयों के प्रबन्धकों के विचार की उपेक्षा करके धार्मिक शिक्षा या शिक्षकों में अनावश्यक हस्तक्षेप करेंगे। राज्य-सहायता पर मेरी सबसे भारी आपत्ति मेरा यह दृढ़ मत है कि वह नितान्त अपर्याप्त और अपूर्ण होगी। मैं भूला नहीं हूँ कि हाल ही में समाप्त हुए विधेयक में केवल चार शिलिंग प्रति विद्यार्थी का प्रस्ताव था, (अर्थात् पहले की 17 शिलिंग 6 पेंस की सीमा के ऊपर 4 शिलिंग।) यह ऐसी राशि थी जो उत्तर में कलीसिया के विद्यालयों के लिए बहुत कम काम करती, चाहे दक्षिण में वह जो कुछ भी करती। आपको स्मरण होगा कि यह उस सत्र में प्रस्तावित हुआ था जब संकट में पड़े कृषि-हित को थोड़ी-सी राज्य-सहायता देने के एक विनम्र प्रस्ताव ने हाउस ऑफ कॉमन्स में तूफ़ान खड़ा कर दिया था, और वह बड़ी कठिनाई से पारित हुआ था। आख़िरकार राज्य-सहायता में एक बहुत असुविधाजनक बात है जिसे कभी भूलना नहीं चाहिए। यदि शब्दों का कोई अर्थ है, तो 'राज्य-सहायता' का अर्थ है कलीसिया के विद्यालयों के निर्वाह के लिए हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रतिवर्ष धन का मतदान। क्या कोई सन्देह कर सकता है कि ऐसा मतदान बीते दिनों के प्रसिद्ध मेनूथ अनुदान जैसा वार्षिक संघर्ष खड़ा कर देगा? (सन् 1845 में सर रॉबर्ट पील ने संसद से मेनूथ रोमन कैथोलिक कॉलेज (डबलिन) को 26,360 पाउण्ड का वार्षिक अनुदान दिलवाया।) मैं ऐसे वार्षिक संघर्षों से डरता हूँ, और दक्षिण के मेरे उत्तम भाई चाहे जो कहें, मुझे राज्य-सहायता पर आपत्ति करनी ही होगी। यदि उन्हें राज्य-सहायता भाती है, तो कम से कम हमें उत्तर में रेट-सहायता पाने दें।
(2) दूसरी बात यह कि मुझे स्पष्ट कहना चाहिए कि मुझे इसमें कोई बुद्धिमानी या औचित्य नहीं दिखाई देता कि इंग्लैण्ड की कलीसिया से बाहर के धार्मिक समुदायों के सेवकों या सदस्यों को कलीसिया के विद्यालयों में जाकर अपने ही युवाओं को धार्मिक शिक्षा देने की अनुमति दी जाए। मैं नहीं मान सकता कि यह विचार, चाहे सिद्धान्त में कितना ही उदार और भला लगे, व्यवहार में सन्तोषजनक रूप से सफल होगा। सैकड़ों विद्यालयों में अलग स्थान उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, जब तक कि इस प्रयोजन के लिए कोई कक्ष विशेष रूप से न दिया जाए। अनेक अन्य विद्यालयों में किसी योग्य शिक्षक की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना असम्भव होगा, क्योंकि सम्भवतः उसके समय पर और माँगें भी होंगी। परिणाम यह होगा कि अनुरूपता न मानने वाले बेचारे बच्चों को कलीसिया के बच्चों से कम धार्मिक शिक्षा मिलेगी, और साथ ही यह बड़ा जोखिम भी रहेगा कि जब कलीसिया का शिक्षक अपने कुछ विद्यार्थियों को निरन्तर अपने पास से हटाए जाते देखेगा, मानो वह उन्हें पढ़ाने योग्य ही न हो, तब मनमुटाव पैदा हो। हो सकता है मैं ग़लत होऊँ, और मैं अचूक होने का कोई दावा नहीं करता; परन्तु मेरी वर्तमान धारणा यह है कि प्रस्तावित योजना, चाहे कितने ही अच्छे उद्देश्य से रखी गई हो, कभी सफल नहीं होगी।
(3) एक और बात, जिसके विषय में मैं इस समय आश्वस्त नहीं हूँ, वह है विद्यालयों के संघ-निर्माण (फेडरेशन) का प्रस्ताव। मुझे निश्चय नहीं कि मैं इस शब्द का अर्थ पूरी तरह समझता हूँ। यदि इसका अर्थ केवल इतना है कि किसी निश्चित क्षेत्र के सभी कलीसिया-विद्यालय एक हो जाएँ, ताकि उनका एक ही बैंक-खाता हो, शिक्षा-विभाग से पत्र-व्यवहार के लिए एक ही प्रतिनिधि हो, और भवनों में सब परिवर्तनों की देख-रेख के लिए एक ही वास्तुकार हो, तो मेरे विचार में यह बहुत उपयोगी होगा। इससे मितव्ययिता को बढ़ावा मिलेगा, बैंकों में अधिक रकम निकाल लेने की स्थिति से बचाव होगा, और ईंट-गारे पर होनेवाले अविवेकपूर्ण व्यय पर अंकुश लगेगा। परन्तु यदि संघ-निर्माण का अर्थ यह भी है कि अच्छे विद्यालय नक़द धन देकर बुरे विद्यालयों को अपने पैरों पर खड़ा करें, तो मैं नहीं कह सकता कि मैं इस विचार का समर्थन करता हूँ, और मैं यह भी नहीं सोच सकता कि यह सफल होगा।
हम सब जानते हैं कि विद्यालय-विद्यालय में अन्तर होता है; कुछ विद्यालयों का प्रबन्ध और कार्य अच्छा होता है, और कुछ की प्रायः उपेक्षा ही की जाती है, पादरी-वर्ग उनके पास कम ही जाता है, और शिक्षकों का उत्साह बढ़ाने, उन्हें प्रोत्साहन और प्रेरणा देने के लिए कुछ नहीं किया जाता। ऐसी स्थितियों में मैं नहीं मानता कि एक प्रकार के विद्यालयों के प्रबन्धक अपनी आय का कोई भाग उन दूसरे विद्यालयों के निर्वाह के लिए देना चाहेंगे, जो इसलिए निर्बल और शिथिल पड़े हैं कि उन्होंने सफलता के योग्य बनने के लिए बहुत कम या कुछ भी नहीं किया। विद्यालय-प्रबन्धकों, शिक्षकों और पादरी-वर्ग में मानव स्वभाव बहुत है; और यदि संघ-निर्माण का यही अर्थ है, तो मुझे यह पसन्द नहीं। फिर भी मैं यह मानने को तैयार हूँ कि इसमें कुछ ऐसा हो सकता है जो मेरी समझ में नहीं आता। अपने सम्बोधन के इस भाग को समाप्त करने से पहले मैं प्रत्येक ऐसे पादरी से, जिसका कोई प्राथमिक दिवा-विद्यालय है, आग्रह करता हूँ कि वह इस बात के अत्यन्त महत्त्व को समझे कि शिक्षा के प्रत्येक अंग को उत्कृष्टता के सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए वह अपनी पूरी शक्ति लगाए। हमारी शिक्षा-परिषद की वार्षिक बड़ी सभाओं में कई अवसरों पर मैंने पीड़ा के साथ देखा है कि पुरस्कारों और सम्मानों का कहीं बड़ा अनुपात बोर्ड-विद्यालय ले जाते हैं, कलीसिया के विद्यालय नहीं। मैं जानता हूँ, निस्सन्देह, कि यह एक ऐसी प्रतिस्पर्धा है जिसमें हमारे अधिकांश कलीसिया-विद्यालयों पर बहुत भारी बोझ है, और सीमित साधनों के कारण उन्हें अपना स्थान बनाए रखना कठिन लगता है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि वे किसी से पीछे न रहें, और मैं प्रत्येक ऐसे पादरी से, जिसका कोई कलीसिया-विद्यालय है, आग्रह करता हूँ कि इस महान शैक्षिक दौड़ में वह अपनी सारी शक्ति झोंक दे। अपने विद्यालय में बार-बार जाना, मित्रवत् मुख दिखाना और उसके कार्य पर मित्रवत् दृष्टि रखना, चाहे थोड़ी ही देर के लिए हो, स्वयं पढ़ाने के लिए इतना नहीं जितना यह देखने के लिए कि शिक्षण वास्तविक और प्रभावी है, इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। जब मैं सोलह वर्ष पहले पहली बार लिवरपूल आया था, तो मुझे स्मरण है कि मैं अचानक अकेला एक बड़े विद्यालय में चला गया और प्रधानाध्यापक से पूछा कि उस मण्डली का पादरी उसके पास कितनी बार आता है, और मुझे यह पीड़ादायक उत्तर मिला कि ‘तीन वर्ष से कोई पादरी विद्यालय के भीतर नहीं आया!’ मुझे कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसा उपेक्षित विद्यालय उन्नति करे, इसकी सम्भावना कम ही थी। लम्बे अनुभव के बाद मुझे निश्चय है कि शिक्षकों के प्रति, सबसे ऊँचे से लेकर सबसे नीचे तक, दयालु ध्यान, उनके हर काम में मित्रवत् रुचि, और बच्चों पर प्रसन्नता और सौहार्द से भरी दृष्टि, ये ऐसी बातें हैं जिनका फल सदा मिलता है। इनमें व्यय थोड़ा है, परन्तु मूल्य बहुत है।
शिक्षा के इस काँटेदार प्रश्न को मैं यहीं बहुत चिन्ता के साथ छोड़ता हूँ। हमारे सामने की स्थिति अत्यन्त अन्धकारमय और अनिश्चित है। यदि एक ओर सरकार यह निश्चय कर ले कि कलीसिया के विद्यालयों को सचमुच पर्याप्त सहायता देगी, चाहे वह राज्य की ओर से हो या स्थानीय कर की ओर से, तो मेरा विश्वास है कि वे अपना स्थान बनाए रख सकेंगे, चाहे कलीसिया के शत्रु उस सहायता का कितना ही उग्र विरोध करें। यदि दूसरी ओर सरकार कलीसिया के विद्यालयों को पर्याप्त सहायता देने से इनकार कर दे, तो उनमें जो सबसे निर्बल और निर्धन हैं, वे दीवार से जा लगेंगे, अन्त में भूखों मर जाएँगे, और उन्हें बन्द करके उनके स्थान पर बोर्ड-विद्यालय खोलने पड़ेंगे। इसके परिणाम अत्यन्त विनाशकारी होंगे। भूखों मरकर बन्द हुए विद्यालयों को खरीदने या उनकी जगह दूसरे खड़े करने के लिए सार्वजनिक धन का बहुत बड़ा व्यय करना पड़ेगा। श्रमिक वर्ग में बहुत असन्तोष और कुड़कुड़ाहट होगी, जब वे देखेंगे कि उनके बच्चे बोर्ड-विद्यालयों में धकेले जा रहे हैं, जहाँ अनेक मामलों में उन्हें यह नहीं सिखाया जाएगा कि मसीह परमेश्वर है। सबसे बढ़कर, कलीसिया के सामान्य सदस्यों में अन्याय की एक गहरी और स्थायी भावना उत्पन्न होगी। ये बहुत कठिन गाँठें हैं, और मैं इन्हें खोलने का प्रयास नहीं करूँगा।
3. दूसरा सामान्य विषय, जिसकी ओर मैं आपका ध्यान दिलाना अपना कर्तव्य समझता हूँ, ऐसा है जो पिछले दो वर्षों में बहुत उभरकर सामने आया है। मेरा संकेत कलीसिया-सुधार की ओर है। स्थापित कलीसिया के बचाव में चले हाल के अभियान के दौरान हमें बार-बार, समाचार-पत्रों में भी और मंच से भी, बताया गया है कि यदि हम युद्ध के लिए तैयार होना और कार्रवाई की तैयारी करना चाहते हैं, तो हमें बुराइयों को सुधारना और फालतू बोझ को जहाज़ से बाहर फेंकना होगा। संक्षेप में, यह एक प्रकार की लोकोक्ति बन गई है कि कलीसिया का सर्वोत्तम बचाव कलीसिया-सुधार ही है। अब मैं आज इस व्यापक विषय को बहुत संक्षेप में ही लूँगा, और इसके दो पर्याप्त कारण हैं। एक कारण यह है कि इसकी दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण शाखाओं पर हमारे इस सम्मेलन के एक सत्र में चर्चा होगी, और मुझे बहुत प्रसन्नता है कि उन्हें दो सामान्य विश्वासी (गैर-पादरी) प्रस्तुत करेंगे। स्पष्ट कारणों से पादरी-वर्ग को यह जानकर प्रसन्न होना चाहिए कि सामान्य विश्वासी उनके और उनकी स्थिति के विषय में क्या सोचते हैं। मेरे संक्षिप्त रहने का दूसरा कारण यह सीधा-सा तथ्य है कि कलीसिया-सुधार एक वर्ष पहले इसी कक्ष में दिए गए मेरे लम्बे सम्मेलन-भाषण का एक बड़ा भाग था, जिसमें मैंने पूरे विषय को काफ़ी विस्तार और सम्पूर्णता से लिया था। फिर भी, ऐसा लगता है कि बहुत कम लोगों ने उस समय मेरी कही बातों पर ध्यान दिया, और टाइम्स में पिछली 8 सितम्बर को छपे तीन स्तम्भों के एक बड़े अक्षरों वाले पत्र ने मेरे सब कथनों को पूरी तरह अनदेखा करके जनता को बताया कि रोचेस्टर के अध्यक्ष धर्माध्यक्ष-मण्डल में अकेले हैं जो सुधार-संघ को मान्यता देते हैं। परन्तु इससे मुझे आश्चर्य नहीं होता। मैंने बहुत समय से देखा है कि उत्तरी प्रान्त के कलीसिया-जनों की कही बातों की ओर दक्षिण में कम ही ध्यान जाता है। फिर भी, आप में से जो पिछले नवम्बर में इस कक्ष में थे, उन्हें शायद स्मरण होगा कि मैंने आपको कलीसिया-सुधार के विषय में कम से कम आधा घण्टा दिया था। इसी कारण, मैं फिर कहता हूँ, मैं उस भूमि पर दोबारा नहीं चलूँगा, विशेषकर इसलिए कि यह प्रश्न सार्वजनिक चर्चा के लिए उठने ही वाला है।
तथापि मैं इस महान विषय को बिना छुए छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता, इसलिए दो चेतावनियाँ देता हूँ।
एक ओर, मैं कलीसिया-सुधार के मित्रों और समर्थकों को सलाह देता हूँ कि वे प्रस्तावित बेनिफ़िसेज़ विधेयक पर सतर्क दृष्टि रखें, जो अधर में छूट गया था और संसद के पिछले सत्र में कानून नहीं बन सका। निस्सन्देह यह सही दिशा में उठाया गया कदम है और इसमें बहुत उपयोगिता के तत्व हैं। इस समय यह एक गम्भीर बुराई है कि अध्यक्षों को बार-बार ऐसे लोगों को कलीसिया-पदों पर नियुक्त करना पड़ता है जो शारीरिक, मानसिक या सैद्धान्तिक रूप से उनके अयोग्य हैं। परन्तु साथ ही, प्रस्तावित व्यक्ति को अस्वीकार करने की शक्ति की सावधानी से रक्षा की जानी चाहिए, संरक्षकों के उचित अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए, और मण्डलियों की भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। सबसे बढ़कर, जहाँ अध्यक्ष के निर्णय पर विवाद हो और कानूनी जाँच की माँग की जाए, वहाँ अध्यक्ष के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि उसे एक योग्य कानूनी सलाहकार की सहायता प्राप्त हो। परन्तु यह अभी देखना बाकी है कि बेनिफ़िसेज़ विधेयक फिर लाया जाएगा या नहीं, और यदि हाँ, तो किस रूप में और किन संशोधनों के साथ।
दूसरी ओर, मैं सुधार के समर्थकों को सलाह देता हूँ कि वे यह न भूलें कि रिक्त कलीसिया के लिए सेवक के चुनाव में सामान्य विश्वासियों को आवाज़ देते समय उन्हें ध्यान से सोचना होगा कि 'सामान्य विश्वासियों' से उनका आशय क्या है। यह सिद्धान्त चाहे कितना ही सही और अच्छा हो, इसमें बहुत गम्भीर कठिनाइयाँ हैं, और उनका सामना करने के लिए बड़ी बुद्धि की आवश्यकता होगी। मेरा विचार है कि कोई भी समझदार मनुष्य यह नहीं चाहेगा कि पादरी लोकप्रिय चुनाव से चुने जाएँ, चाहे वह कर देनेवालों द्वारा हो, या केवल कलीसिया जानेवालों द्वारा, या प्रभु-भोज में भाग लेनेवालों द्वारा। ऐसे प्रत्येक चुनाव में आप लगभग सदा मण्डली में दो दल बना देंगे और एक निराश अल्पसंख्या पैदा कर देंगे। न ही हम क्षण भर के लिए यह मान सकते हैं कि राजमुकुट, महाविद्यालय और अध्यक्ष, बड़े भूस्वामियों की तो बात ही क्या, संरक्षकों के रूप में अपने सब अधिकार छोड़ने को सहमत होंगे। ये सब कठिन बातें हैं और इन्हें बहुत नाज़ुकता से सम्भालना होगा। अभी मैं केवल इतना कहता हूँ कि मुझे आशा है कि चर्चा से हमें इन पर और प्रकाश मिलेगा। आयरलैण्ड की स्थापना-मुक्त कलीसिया में रिक्त पदों को भरने की प्रथा और उस पद्धति के परिणाम सावधानी से जाँचे जाने योग्य हैं।
4. चौथा और अन्तिम सार्वजनिक विषय, जिसकी ओर पिछले कुछ वर्षों में कलीसिया का ध्यान खींचा गया है, मसीही जगत का पुनर्मिलन है। इसे मैं बहुत संक्षेप में लूँगा।
मसीहियों के बीच एकता, यह कहना अनावश्यक है, अत्यन्त वांछनीय वस्तु है। यह उन चार विषयों में से एक है जिनका उल्लेख हमारे प्रभु ने क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले की अपनी अद्भुत अन्तिम प्रार्थना में, यूहन्ना के 17वें अध्याय में किया। इसका अभाव कलीसिया की दुर्बलता है और अविश्वासी का प्रिय शस्त्र। बड़ी दृश्य सार्वभौमिक कलीसिया में, जिसकी विभिन्न शाखाएँ रीति-विधि और सिद्धान्त दोनों में बहुत भिन्न हैं, और जहाँ बुरे लोग सदा भले लोगों के साथ मिले रहते हैं, इससे अधिक आशा रखना व्यर्थ है। आपको इसे उस पवित्र सार्वभौमिक कलीसिया में खोजना चाहिए जो, जैसा हमारी प्रार्थना-पुस्तक कहती है, 'मसीह की रहस्यमय देह, और सब विश्वासी लोगों की धन्य मण्डली' है। यह, जैसा उस महान पुरुष आइज़क बैरो ने कहा है, 'उन लोगों की संगति है जिनके लिए मसीह ने प्रार्थना की कि वे एक हों।' फिर भी उनके बीच भी यह बहुत अपूर्ण है, और जब तक हम स्वर्ग नहीं पहुँचते, अपूर्ण ही रहेगा। यहाँ नीचे प्रायः एकरूपता के बिना एकता होती है, और एकता के बिना एकरूपता। जहाँ तक सारे मसीही जगत के पुनर्मिलन का प्रश्न है, वह केवल हवाई किला है।
क्या इंग्लैंड की कलीसिया और ग्रेट ब्रिटेन में त्रिएकतावादी प्रोटेस्टेंट मसीहियों के अन्य समुदायों के बीच कभी कोई पुनर्मिलन हो सकता है? मैं निश्चयपूर्वक उत्तर देता हूँ कि मुझे यह निराशाजनक प्रतीत होता है। महारानी एलिज़ाबेथ के शासनकाल में यह सम्भव हो सकता था, यदि उस निरंकुश ट्यूडर शासिका ने पार्कर और ज्यूएल को धर्म-सुधार का कार्य पूरा करने दिया होता। परन्तु दुर्भाग्य से उसने उन्हें कड़ाई से रोक दिया और हर दिशा में उनका तिरस्कार किया, और अनुरूपता-विरोध की फ़सल के बीज चारों ओर बिखेर दिए गए। याकूब प्रथम और चार्ल्स प्रथम के शासनकालों ने स्थिति को केवल और बिगाड़ा, और उस अभागे, अत्यधिक सराहे गए व्यक्ति, आर्चबिशप लॉड, की कलीसियाई नीति ने अंग्रेज़ी असहमति की नींव गहरी डाल दी। लॉड के समय से लेकर आज तक घटनाओं की धारा सदा एक ही ओर बही है, हर शताब्दी में विभाजन और गहरा और चौड़ा होता गया है। राष्ट्रमण्डल के दिनों के वे दुःखद संघर्ष, चार्ल्स द्वितीय के आत्मघाती कलीसियाई उपाय, विलियम तृतीय के दिनों में सुधार के दुर्बल प्रयास, सौ वर्ष पहले मेथोडिस्ट आन्दोलन को समझने या उसका उपयोग करने में अंग्रेज़ी अध्यक्षों की अन्धी असमर्थता, और अन्त में, परन्तु कम महत्त्वपूर्ण नहीं, हमारे अपने समय में कलीसिया के कुछ भागों में रोम की ओर झुकाव की प्रवृत्तियाँ--मेरा विश्वास है कि इन सब बातों ने कलीसिया और असहमतों के बीच एक विशाल खाई खोद दी है जो कभी पाटी या भरी नहीं जाएगी-- कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं!
क्या इंग्लैंड की कलीसिया और रोम की कलीसिया के बीच कभी कोई पुनर्मिलन हो सकता है? मैं बिना हिचकिचाहट उत्तर देता हूँ कि यह विचार ही अप्राकृतिक है, और जिन्होंने इन पिछले दिनों में इसे उछाला है उनकी सामान्य बुद्धि के लिए यह कोई सम्मान की बात नहीं। एंग्लिकन अभिषेकों के विषय में पोप के हाल के आदेश की मुझे बहुत कम चिन्ता है। (पोप लियो तेरहवें के 1896 के 'अपोस्तोलिकाए क्यूरे' ने एंग्लिकन अभिषेकों को अमान्य ठहराया था।) मैं यह जानकर पूरी तरह सन्तुष्ट हूँ कि हमारे अपने अभिषेक पूर्णतः मान्य हैं, और मैंने कभी इस पर सन्देह नहीं किया। परन्तु मसीही सेवक के पद के विषय में हमारी धारणा पोप की धारणा से बहुत भिन्न है। एक ओर, रोमी कलीसिया का पादरी एक याजक है, जिसका मुख्य कार्य मिस्सा का बलिदान चढ़ाना है। दूसरी ओर, एंग्लिकन कलीसिया का पादरी वास्तव में याजक नहीं है, यद्यपि कहलाता है, वह केवल एक प्रेस्बिटर है, जिसका मुख्य कार्य कोई भौतिक बलिदान चढ़ाना नहीं, परन्तु परमेश्वर के वचन का प्रचार करना और संस्कारों का संचालन करना है। रोम के साथ पुनर्मिलन पर मेरी मुख्य आपत्ति यह स्पष्ट तथ्य है कि उसके विशिष्ट सैद्धान्तिक सिद्धान्त हमारे अपने सिद्धान्तों से सर्वथा मेल नहीं खाते। यदि रोम का हाल का आदेश संसार को औपचारिक रूप से घोषित कर देता कि पोप हमारे अभिषेकों की वैधता को स्वीकार करता है, और सब एंग्लिकन पादरियों को कैथोलिक याजक मानता है, तब भी मेरे लिए रत्ती भर अन्तर न पड़ता। रोम के साथ पुनर्मिलन में दुर्लंघ्य बाधा सिद्धान्त है, सिद्धान्त, अभिषेक नहीं। जब तक प्रत्येक अंग्रेज़ पादरी से लाइसेंस पाने या किसी पद पर नियुक्त होने से पहले उनतालीस धाराओं पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं; जब तक उन धाराओं में से नौ को न तो रद्द किया जाता है और न उनसे छेड़छाड़ की जाती है, और वे रोमी कलीसिया के कुछ सिद्धान्तों और प्रथाओं की, और विशेष रूप से मिस्सा की, स्पष्ट निन्दा करती हैं; तब तक मुझे पुनर्मिलन की बात करना बचकाना समय की बर्बादी प्रतीत होता है। डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज के प्रोवोस्ट, उस योग्य पुरुष डॉ. जॉर्ज सैल्मन, अपनी पुस्तक 'अचूकता' में कहते हैं: 'रोमी कलीसिया की जैसी इस समय प्रवृत्ति है, उसके साथ पूर्ण समर्पण की शर्तों के सिवा कोई मेल नहीं हो सकता; और उस समर्पण में यह स्वीकार करना भी सम्मिलित है कि हम अपने हृदय से उन बातों को सत्य मानते हैं जिनके झूठ होने का हमारे पास अच्छा कारण है।' (सैल्मन: कलीसिया की अचूकता, भूमिका v।) मैं उनसे पूर्णतः सहमत हूँ, और मैं नहीं मान सकता कि अंग्रेज़ कलीसिया के लोग ऐसे दीन आत्मसमर्पण के लिए, जैसा पुनर्मिलन माँगेगा, चुपचाप सहमत हो जाएँगे। (परिशिष्ट, अध्याय 14, टिप्पणी 1 देखें।)
पिछले सत्र में लॉर्ड सभा के सामने लाए गए, कलीसिया को प्रभावित करनेवाले एक अत्यन्त पीड़ादायक विषय पर मैं कुछ ही शब्द कहने से अधिक कहने से बचता हूँ। मेरा संकेत उस विधेयक की ओर है जिसमें मृत पत्नी की बहन से विवाह को वैध ठहराने का प्रस्ताव था, जो दुर्भाग्य से उच्च सभा में बड़े बहुमत से पारित हो गया, परन्तु सौभाग्य से कॉमन्स सभा तक कभी नहीं पहुँचा। यह एक अप्रिय प्रश्न है, जिस पर मतों की विचित्र विभिन्नता है, और जब इतनी स्त्रियाँ उपस्थित हैं तो मैं इस पर अधिक कहने में संकोच करता हूँ। धर्मप्रान्त के कार्यों के कारण संसद के मतविभाजन में मेरा उपस्थित होना असम्भव हो गया। परन्तु मैं अपने प्रति और अपने धर्मप्रान्त के प्रति यह कहना उचित समझता हूँ कि मैंने निश्चय ही विधेयक के विरुद्ध अल्पमत के साथ मत दिया होता। व्यवस्था का प्रस्तावित परिवर्तन मुझे सामाजिक असुविधा और अप्रसन्नता की भारी मात्रा उत्पन्न करनेवाला प्रतीत होता है, और मुझे लॉर्ड सभा में विधेयक की सफलता पर गहरा खेद है। जिन कठिन समस्याओं पर मैं विचार करने का प्रयत्न करता रहा हूँ, उनसे अब मुझे अन्य ऐसे विषयों की ओर मुड़ना है जो समान, या शायद उससे भी अधिक, महत्त्व के हैं। हम एक और शताब्दी के अन्त के निकट आ रहे हैं। आप में से बहुतेरे, सम्भावना है, सन् 1900 देखने के लिए जीवित रहेंगे, यदि मैं न रहूँ। मुझे, एक वृद्ध पुरुष के रूप में, इंग्लैंड की स्थापित कलीसिया की वर्तमान स्थिति और भविष्य की सम्भावनाओं को आपके सामने रखने और कुछ व्यावहारिक सलाह के शब्द कहने का प्रयत्न करने दीजिए।
1. यदि हम सन् 1896 में इंग्लैंड की कलीसिया की दशा की तुलना सन् 1796 की दशा से करें, तो मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के प्रति धन्यवादी होने का हमारे पास बहुत बड़ा कारण है। सौ वर्ष पहले कलीसियाई बातों की दशा आज की दशा से इतनी भिन्न और इतनी अधिक असन्तोषजनक थी कि मुझे आश्चर्य होता है कि प्रथम फ्रांसीसी क्रान्ति के घातक संक्रमण में भी कलीसिया जीवित कैसे बची रही। जो सुधार, परिवर्तन और भलाई की ओर बदलाव हुए हैं वे इतने अनेक हैं कि ऐसा प्रतीत होता है मानो हमें दूसरा धर्म-सुधार मिल गया हो। हमारी दयालु महारानी के साठ वर्षों के शासनकाल में हमारे बहुत से पुराने भव्य गिरजाघरों की भली-भाँति मरम्मत हुई और उन्हें विनाश से बचाया गया, हमारे सैकड़ों पुराने पल्ली-गिरजाघर पुनः संवारे गए, और विशेषकर कारखानों वाले क्षेत्रों में और भी सैकड़ों नए गिरजाघर बनाए गए। गिरजाघरों के निर्माण, जीर्णोद्धार और नवीनीकरण पर अनुमानतः लगभग चालीस करोड़ पाउंड स्वेच्छा से जुटाए और व्यय किए गए हैं। इसी अवधि में पादरी-वर्ग में अनुपस्थिति और एक से अधिक पदों के धारण जैसे सब प्रकार के घोर दुरुपयोग पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। साथ ही सारे देश में पवित्रशास्त्र पर आधारित हजारों पाठशालाएँ बनाई गईं। विदेश और स्वदेश में मिशन के कार्य को बढ़ावा देनेवाली हमारी बड़ी धार्मिक संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। हर प्रकार की पल्ली-व्यवस्था रची गई और चालू की गई। सभी विचारधाराओं के पादरी-वर्ग में प्रचार और जीवन का स्तर निस्सन्देह सुधरा है। हमारे छत्ते में निठल्ले मधुमक्खियों की संख्या पहले से निश्चय ही कम है। इंग्लैंड के हर भाग में सब प्रकार की अनेक परोपकारी संस्थाएँ आरम्भ की गई हैं। हमारी सब त्रुटियों और फूटों के होते हुए भी स्थापित कलीसिया एक समुदाय के रूप में सो नहीं रही, वरन् जाग रही है। उसके बड़े से बड़े शत्रुओं को भी मानना पड़ेगा कि वह मरी नहीं, जीवित है। इन सब बातों के लिए मैं दृढ़ता से कहता हूँ कि हमें गहराई से धन्यवादी होना चाहिए।
साथ ही, हमारी कलीसिया की दशा में गम्भीर चिन्ता के कुछ कारण हैं या नहीं, इस विषय में मुझे कहना पड़ता है कि मुझे यह कुछ सन्देहजनक लगता है। बाहरी धर्म की निर्विवाद वृद्धि के साथ-साथ मुझे भय है कि व्यावहारिक मसीही जीवन का स्तर उतना ऊँचा नहीं है जितना होना चाहिए, और वह कुछ गिरावट की ओर है। सब्त के दिन की अवहेलना और आराधना की उपेक्षा की पीड़ादायक अधिकता, जुए और घुड़दौड़ की बढ़ोतरी, अत्यन्त ढीले-ढाले साहित्य का बढ़ना, सुख-विलास और मनोरंजन का अत्यधिक मोह, मतवालेपन का बना रहना, और नशीले पेयों पर प्रतिवर्ष चौदह करोड़ पाउंड का व्यय, जिसका आधा अनावश्यक है,—ये सब बातें हमारी कलीसिया के क्षितिज पर काले बादलों के समान हैं, और उन सब की सावधान दृष्टि की अधिकारी हैं जो उससे प्रेम रखते हैं। हम निश्चय जान सकते हैं कि व्यावहारिक भक्ति की वृद्धि ही किसी कलीसिया के स्वास्थ्य और समृद्धि की एकमात्र पक्की कसौटी है।
2. तथापि हमारे क्षितिज पर सबसे अँधेरा बादल हमारी दुखद फूटों का बने रहना और बढ़ना है, और विशेषकर, मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है, प्रभु-भोज के धन्य संस्कार को लेकर हमारी फूटें। इन फूटों से जो खतरे मँडरा रहे हैं, उन्हें मैं बहुत बड़ा मानता हूँ। मैं नहीं जानता कि आनेवाला लैम्बेथ सम्मेलन उनकी अनदेखी करेगा या नहीं, जैसा उसने सन् 1887 में किया था, यद्यपि अन्त में मैंने अपना दुर्बल विरोध दर्ज कराया था। परन्तु यदि उनकी अनदेखी की गई और उन्हें यों ही छोड़ दिया गया, तो मेरा विश्वास है कि हमारी कलीसिया को भारी हानि पहुँचेगी। जो घर अपने ही विरुद्ध बँट जाए, वह स्थिर नहीं रह सकता।
कैंटरबरी के दिवंगत और शोकभाजन आर्कबिशप (एडवर्ड व्हाइट बेन्सन (1883-96); लिंकन निर्णय के विषय में।) के प्रति पूर्ण आदर रखते हुए भी, मैं कभी यह नहीं देख पाया कि प्रसिद्ध लिंकन निर्णय ने हमारी फूटों को घटाने या भरने के लिए कुछ भी किया, चाहे दूसरे कुछ भी कहना चाहें। मेरी दृष्टि में उसने बातों को लगभग जैसा का तैसा छोड़ दिया, और इन उदारवादी दिनों में रीति-विधि और सिद्धान्त के विषय में सब मुकदमों की निरर्थकता सिद्ध कर दी, जब सब सही हैं और कोई गलत नहीं।
मुझे एक बार फिर, और सम्भवतः अन्तिम बार, हमारी फूटों के इस दुखद विषय पर कुछ सीधी बातें कहने दीजिए। आप सब भली-भाँति जानते हैं कि आज के समय में प्रभु-भोज के विषय में अनोखे और प्रत्यक्षतः रोमी मत हजारों पादरियों द्वारा प्रचारित, सिखाए और व्यवहार में लाए जाते हैं, जिन्हें ज्यूएल, हूकर, हॉल, अशर, डेवनेंट, बेवरिज और अन्य दिवंगत धर्मशास्त्रियों के समूह ने क्षण भर के लिए भी स्वीकृति नहीं दी; और नई-नई बातों की एक धुंध उठकर सारे देश पर फैल गई है, जो हर वर्ष और घनी होती जाती है। साथ ही, हम यह इनकार नहीं कर सकते कि इन नई बातों का समर्थन या अभ्यास करनेवाले बहुत से लोग मिलनसार, उत्साही, परिश्रमी, आत्मत्यागी और भक्त पादरी हैं। उनके सिद्धान्त चाहे जो हों, उनका जीवन आदर्श और निर्दोष है। वे दावा करते हैं कि वे इंग्लैंड की कलीसिया से उतना ही प्रेम रखते हैं जितना उनके अन्य भाई, और फिर भी प्रभु-भोज के सिद्धान्त और रीति-विधि के विषय में दोनों पक्ष एक-दूसरे से ध्रुवों के समान दूर हैं।
वे आपस में सुविधापूर्वक मिलकर काम नहीं कर सकते। वे शायद ही कभी एक साथ आराधना करते हैं। हर विषय पर वे दो अलग-अलग संस्थाओं का समर्थन करते हैं, और प्रत्येक अपनी ही संस्था को सही मानता है। संक्षेप में, हमारी कलीसिया के भीतर प्रभु-भोज के विषय में दो विरोधी मत हैं, और मैं नहीं देख पाता कि उनमें मेल कैसे हो सकता है। इनके विषय में पुराने कलीसियाई न्यायालयों से निवेदन करना व्यर्थ है, क्योंकि उनके निर्णय माने ही नहीं जाते। नये न्यायालयों की आशा करना भी स्पष्टतः व्यर्थ है, क्योंकि उन्हें बनाने का कोई प्रयास ही नहीं हो रहा। आशा के टलने से मन व्याकुल हो जाता है। कलीसियाई अनुशासन मानो मिट गया है, और उसके स्थान पर ऐसी अराजकता, उथल-पुथल और गड़बड़ी का राज्य है कि हर पादरी वही करता है जो उसकी अपनी दृष्टि में ठीक है। आपका भाग्य ऐसे ही दिनों में पड़ा है। मुझे आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं कि ये शोचनीय फूट बड़ी निर्बलता का कारण हैं, और इंग्लैंड की कलीसिया को भयंकर हानि पहुँचाती हैं।
अब मैं प्रभु-भोज के विषय में रोमी मत के विषय में लम्बे, घिसे-पिटे कथनों से आपको थकाने नहीं जा रहा, जैसे मिस्सा की मूल भूलें, पदार्थान्तरण, वास्तविक शारीरिक उपस्थिति, और याजकीय पद। परन्तु मैं इसे अपना स्पष्ट कर्तव्य समझता हूँ कि कुछ ऐसी बातों के विषय में चेतावनी का स्वर उठाऊँ जो मुझे इस समय विशेष हानि पहुँचाती दिखाई देती हैं, और मुझे अत्यन्त स्पष्टता से बोलना होगा। (1) मैं गहरे खेद के साथ सुनता हूँ कि देश भर के अनेक पादरी यह मानते और सिखाते हैं कि उपवास की अवस्था में प्रभु-भोज ग्रहण करना लाभदायक, उन्नतिकारक और वांछनीय है। मुझे भय है कि इस विषय में कुछ लोगों के मन में बहुत विचित्र धारणाएँ हैं। आप भली-भाँति समझ लें कि यदि लोग भोर के समय की सेवा पसंद करते हैं, तो मुझे उन पर लेशमात्र भी आपत्ति नहीं। प्रश्न यह नहीं है। मेरा आधार बिलकुल भिन्न प्रकार का है।
मेरा तर्क है कि उपवास की अवस्था में प्रभु-भोज लेने की प्रथा का न तो पवित्रशास्त्र में आदेश है और न ही सिफ़ारिश। यह पूर्णतया स्पष्ट है कि संस्कार की पहली स्थापना के समय प्रेरित उपवास की अवस्था में तत्त्व ग्रहण नहीं कर सकते थे, क्योंकि उन्होंने अभी-अभी फसह का भोजन खाया था। इसलिए इस बात में कोई बहुत बड़ी महत्ता नहीं हो सकती, और प्रत्येक विश्वासी अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करके वही कर सकता है जो उसे स्वयं के लिए उन्नतिकारक लगे, बिना दूसरों को दोषी ठहराए। परन्तु यह आशंका की जा सकती है कि जो अनेक लोग उपवास की अवस्था में प्रभु-भोज को बहुत मूल्य देते हैं, उनके मन में एक अस्पष्ट मान्यता बैठी है कि जो पवित्र किया हुआ रोटी और दाखरस हम ग्रहण करते हैं, वह किसी रहस्यमय रीति से वास्तविक रोटी और दाखरस नहीं है, और इसलिए उसे हमारे शरीर में अन्य भोजन के साथ नहीं मिलना चाहिए! ऐसी मान्यता प्रशंसा के योग्य नहीं। इसके अतिरिक्त, जो यह सिखाते हैं कि उपवास की अवस्था में प्रभु-भोज सब लोगों पर बाध्यकारी नियम है, वे ऐसी स्थिति अपनाते हैं जो न केवल पवित्रशास्त्र के विरुद्ध है, वरन् निष्ठुर भी है। भोर के प्रभु-भोज में उपवास की अवस्था में जाना कमज़ोर लोगों की मृत्यु का कारण बन सकता है।
मैं इसी विषय पर अध्यक्ष सैमुएल विल्बरफ़ोर्स के गम्भीर शब्दों की ओर आपका ध्यान दिलाता हूँ, और आपसे आग्रह करता हूँ कि स्मरण रखें कि वे सदा दृढ़ उच्च कलीसियावादी थे, और मैं उनसे अनेक बातों में सहमत नहीं था। ये शब्द उनकी मृत्यु से कुछ ही दिन पहले कहे गए थे। वे कहते हैं: ‘मैं यह हल्के अर्थ में नहीं कहता कि उपवास की अवस्था में प्रभु-भोज का यह नया सिद्धान्त ख़तरनाक है। इस प्रथा का समर्थन इसलिए नहीं किया जाता कि मनुष्य अधिक निर्मल आत्मा और कम विचलित शरीर और मन के साथ आए, और पूरी तरह प्रार्थना और अपने परमेश्वर के साथ सहभागिता में लग सके; वरन् एक तुच्छ और गिरी हुई धारणा के कारण कि पवित्र किए हुए तत्त्व पेट में अन्य भोजन से मिल जाएँगे। यह घृणित भौतिकवाद है। दार्शनिक दृष्टि से यह अपने आप का खण्डन है; क्योंकि जब सेवा समाप्त हो जाती है, तो आप जल्दी से भोजन करने जा सकते हैं, और वही प्रक्रिया, जिसके विषय में आप इतने सतर्क थे, तुरन्त घटित हो जाती है। पूरी धारणा केवल घिनौनी है।’ (जे. डब्ल्यू. बर्गन: बारह भले पुरुषों के जीवन-चरित्र, खण्ड 2, पृ. 56।)
(2) फिर, मैं गहरे खेद के साथ सुनता हूँ कि अनेक उत्साही पादरी प्रभु-भोज में भाग न लेनेवालों को कलीसिया में रुकने और प्रभु-भोज की सेवा के समय उपस्थित रहने की सलाह दे रहे हैं। आप में से कुछ यह सुनकर आश्चर्य करेंगे, और कुछ सीधेपन से पूछेंगे, ‘इसमें हानि क्या है?’ मेरा विश्वास है कि यह बढ़ती हुई बुराई है, और ऐसी बात है जिसका दृढ़ता से विरोध होना चाहिए। इसकी उत्पत्ति इस हानिकारक विचार से होती है कि प्रभु-भोज एक याजक द्वारा चढ़ाया गया बलिदान है, और स्मरण की वह विधि नहीं जिसमें सब उपस्थित लोगों को भाग लेना चाहिए। संक्षेप में, यह मिस्सा के रोमी बलिदानों की ओर सीधा कदम है, जिनके विषय में आपका इकतीसवाँ अनुच्छेद घोषित करता है कि वे ‘निन्दात्मक कथाएँ और ख़तरनाक धोखे’ हैं। कि पहली स्थापना के समय ऐसा कुछ न था, कि सब उपस्थित लोग भाग लेनेवाले थे और सबने रोटी और दाखरस ग्रहण किया, कि कोई केवल दर्शक नहीं था, कि प्रेरितों के काम या पत्रियों में इस बात का लेशमात्र भी प्रमाण नहीं कि बिना भाग लिए उपस्थित रहना मान्य या अनुमत था--ये सब बातें दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट हैं, और मैं इस विषय पर रुककर आपका समय नष्ट नहीं करूँगा। संस्कार-विषयक उपदेश-पत्र ठीक और बुद्धिमानी से कहता है, ‘हमें स्वयं इस मेज़ के सहभागी होना चाहिए, दूसरों की मेज़ के दर्शक नहीं।’
