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वर्तमान संकट
सत्रहवें लिवरपूल धर्मप्रान्तीय सम्मेलन में दिए गए सम्बोधन का एक अंश,
नवम्बर 1898।
मेरे आदरणीय पादरी और सामान्यजन भाइयो, धर्मप्रान्त सम्बन्धी विषयों से अब मैं चार ऐसे विषयों की ओर मुड़ता हूँ जो कहीं अधिक गम्भीर हैं, ऐसे विषय जिनमें, मेरे विचार से, आज के समय में कलीसिया के हर सदस्य को गहरी रुचि लेनी चाहिए। मैं उन्हें क्रम से उठाने के लिए कोई क्षमा नहीं माँगूँगा, और आप में से हर एक से आग्रह करूँगा कि उन्हें स्थिर दृष्टि से देखें। वे विषय ये हैं—कलीसिया का सुधार, कलीसिया की रक्षा, कलीसिया में फूट, और कलीसिया में सहिष्णुता। (1) मैं कलीसिया के सुधार से आरम्भ करूँगा। यह एक पुराना और व्यापक विषय है, जो तेज़ी से गम्भीर महत्त्व का बनता जा रहा है। मुझे वह समय याद है, सत्रह वर्ष पहले, जब इस सम्मेलन के कुछ सदस्य इसे उठानेवालों को भले-मानुस उत्साही कहकर मुस्कुरा दिया करते थे। यदि वे आज जीवित होते तो अब न मुस्कुराते। बेनिफ़िसेज़ बिल और उस विधेयक के साथ हुई तीखी बहसों ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स को चौकन्ना कर दिया और उसका ध्यान खींचने पर विवश किया है। देश के हर भाग में लोग कलीसिया के सुधार के विषय में जाग उठे हैं और सक्रिय हैं। इसे प्राप्त करने के लिए समितियाँ और संस्थाएँ, जिनमें हर पद के सक्रिय सदस्य हैं, हर कहीं आगे आ रही हैं। यह कहना व्यर्थ है कि कलीसिया के सुधार की आवश्यकता नहीं है। दो सदियों से अधिक समय के बाद यह प्राचीन और महान जहाज़, जिसने इतने युद्ध और इतनी आँधियाँ झेली हैं, कई मरम्मतों और संशोधनों की माँग करता है। बुद्धि और सामान्य ज्ञान दोनों बताते हैं कि मनुष्य के हाथ की हर कृति में दोष निरन्तर बढ़ते जाते हैं और उसमें क्रमशः क्षय की प्रवृत्ति रहती है। ज्ञान, विज्ञान और शिक्षा की प्रगति ऐसे कमज़ोर पक्षों को उजागर करती है जिनके सुधार की कल्पना हमारे पूर्वजों ने कभी नहीं की थी। यदि हमारी कलीसिया को जीवित रहना है, मरना नहीं, तो कलीसिया का सुधार तेज़ी से अनिवार्यता बनता जा रहा है।
यह विषय हर वर्ष किसी न किसी रूप में बार-बार उठ खड़ा होता है, चाहे हमें अच्छा लगे या नहीं। केवल यही तथ्य कि अनेक प्रभावशाली समर्थकों वाली एक सुधार-लीग हाल ही में अस्तित्व में आई है, अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। हमें याद रखना चाहिए कि अनाज-कानूनों का निरसन एक लीग से ही आरम्भ हुआ था।
पाद-टिप्पणी: एंटी-कॉर्न-लॉ लीग, जिसकी स्थापना 1839 में कॉब्डेन और ब्राइट ने की थी। अनाज-कानून 1846 में निरस्त किए गए।
पिछले सत्र का बेनिफ़िसेज़ बिल, कैंटरबरी और यॉर्क, दोनों प्रान्तों में से प्रत्येक में सामान्यजनों के एक सदन का अपेक्षाकृत हाल में बनना, पद रिक्त होने पर मण्डलियों की यह बढ़ती माँग कि नए सेवक के चुनाव में उनकी भी कुछ आवाज़ हो—ये सब बातें स्पष्ट दिखाती हैं कि कलीसिया के सुधार की हवा चल पड़ी है। आज मैं हमारे सम्मेलन के सदस्यों के मन में यह बात बैठाना चाहता हूँ कि इसे गम्भीरता से देखना और जहाँ तक सम्भव हो अपना मन बना लेना नितान्त आवश्यक है।
आपको यह बताना अनावश्यक है कि कलीसिया का सुधार एक बहुत बड़ा विषय है, और कलीसिया तथा राज्य के सम्बन्ध के कारण अत्यन्त जटिल भी है। फिर भी इसकी कुछ शाखाएँ मुझे पहुँच के भीतर लगती हैं, और यदि कलीसिया के सदस्य उन्हें पाने के प्रयास में केवल एक हो जाएँ तो कुछ किया जा सकता है। यद्यपि मैं पुरानी भूमि पर फिर से चलूँगा, जिसका सर्वेक्षण मैं एक से अधिक बार कर चुका हूँ, तथापि मैं उन सुधारों का उल्लेख करूँगा जो मुझे अत्यावश्यक प्रतीत होते हैं।
(i) हमें अपने कलीसियाई न्यायालयों में सुधार की आवश्यकता है, झूठे सिद्धान्त और अनैतिकता, दोनों प्रकार के मामलों में। इस समय उनका गठन दोषपूर्ण है, उनकी कार्यप्रणाली महँगी, बोझिल, थकाऊ और विलम्बकारी है, और उनके दण्ड अत्यन्त असन्तोषजनक हैं। किसी पादरी को झूठा सिद्धान्त रखने के कारण कारावास देना अन्धकार-युग में लौट जाना है। (ii) हमें इंग्लैंड की कलीसिया की सारी कार्यवाहियों के नियमन के लिए नई धर्म-विधियों (कैनन्स) की आवश्यकता है। हमारे पास जो वर्तमान हैं, उनमें से बहुतेरी व्यवहार में निरर्थक हैं, और कानून में हुए परिवर्तनों के कारण अनावश्यक हो चुके जीवाश्मों से कुछ ही अधिक हैं। इस विषय में हम आयरलैंड की विघटित कलीसिया के नए कैनन्स से कुछ बातें सीख सकते हैं।
(iii) हमें इस विषय में सुधार की आवश्यकता है कि सामान्यजनों की बात किसी न किसी रूप में सुनी जाए, चाहे वह पल्ली की कलीसिया की आराधना-विधि के विषय में हो या रिक्त पदों के लिए सेवकों के चुनाव के विषय में। (iv) हमें कलीसिया की सारी संरक्षकता (पैट्रोनेज) के विषय में सुधार की आवश्यकता है। मैं खुलकर मानता हूँ कि इसका उल्लेख मैं बड़ी झिझक के साथ कर रहा हूँ। इस समय विविधता से भरी वर्तमान प्रणाली के पक्ष में बहुत कुछ कहा जा सकता है। परन्तु मुझे पूरा विश्वास नहीं है कि पुरानी प्रणाली में बहुत अधिक सुधार किया जा सकता है। उसमें दोष निकालना उसे सुधारने से आसान है। फिर भी, जब तक कलीसिया और राज्य का मेल बना रहता है, वर्तमान प्रणाली के त्यागे जाने की सम्भावना अधिक नहीं है; और पदों की बिक्री पर रोक उसकी आधी हानि को रोक देगी।
(v) अन्तिम, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, सुधार जिसकी आवश्यकता है, वह कन्वोकेशन का सुधार है। जिस सुधार की सचमुच आवश्यकता है, वह दोनों सदनों में सामान्यजनों का प्रवेश है। जब तक हमारी कलीसियाई सभा की कार्यवाही में सामान्यजनों को उचित स्थान, आवाज़ और मत नहीं मिल जाता, मेरा विश्वास है कि कन्वोकेशन को देश का पूरा भरोसा कभी प्राप्त न होगा, और थोड़े ही अंग्रेज़ उसकी बहसों की परवाह करेंगे। ऐसे सुधरे हुए कन्वोकेशन को विधायी अधिकार तो निश्चय ही नहीं होने चाहिए। इंग्लैंड दो संसदें सहन नहीं करेगा। परन्तु यदि कन्वोकेशन की राय और इच्छाएँ संसद के पास ऐसी संस्था की ओर से आएँ जिसमें पादरियों के साथ योग्य सामान्यजन भी हों, तो मुझे विश्वास है कि हाउस ऑफ़ कॉमन्स में उन पर अब की अपेक्षा कहीं अधिक आदरपूर्ण ध्यान दिया जाएगा।
(2) कलीसिया-सुधार से अब मैं कलीसिया की रक्षा की ओर आता हूँ। मेरा दृढ़ विश्वास है कि एक समुदाय के रूप में अंग्रेज़ कलीसिया-जनों से अधिक अपने ही समुदाय के सिद्धान्तों और इतिहास से अनजान कोई मसीही नहीं हैं, और मैं मानता हूँ कि अब वह समय आ गया है जब सारे देश में स्पष्ट सिद्धान्त और ऐतिहासिक मसीही धर्म की समझ बढ़ाने का कठोर प्रयत्न किया जाना चाहिए। मैं चाहूँगा कि पादरी-वर्ग विश्वास-वचनों और अनुच्छेदों का प्रचार और व्याख्या अधिक बार करे, और लोगों को स्पष्ट रूप से समझाए कि एक कलीसिया-जन को क्या जानना और मानना चाहिए। मैं चाहूँगा कि पिछली तीन शताब्दियों में हमारी कलीसिया के इतिहास की प्रमुख घटनाएँ हमारे लोगों को भली-भाँति परिचित हो जाएँ, ताकि वे उन विरोधियों को उत्तर दे सकें जो हमारे विषय में भ्रमपूर्ण बातें और लापरवाह कथन कहते हैं। नींद से जागने का समय आ गया है। कलीसिया को राज्य से पृथक करने का अभियान शीघ्र ही फिर हम पर आ सकता है। हमें कलीसिया को शुद्ध करने के साथ-साथ उसकी रक्षा के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
परन्तु इस युग की अज्ञानता का सामना करने के लिए केवल मंच से व्यवस्थित शिक्षा देना ही पर्याप्त नहीं है। हमें अंग्रेज़ कलीसिया के इतिहास की जानकारी की आपूर्ति का प्रबन्ध करना चाहिए। हमें योग्य व्याख्याताओं का एक दल तैयार करना चाहिए जिसका एकमात्र काम हर धर्मप्रदेश में जाकर लोगों को बताना हो कि इंग्लैंड की कलीसिया की वास्तविक कथा क्या है। केवल एक सावधानी याद रखनी होगी। व्याख्याता पूर्णतः निष्पक्ष हों, एकतरफ़ा झुकाव वाले न हों। उदाहरणार्थ, यदि वे सब जगह लोगों से कहते फिरें कि आर्चबिशप लॉड एक धन्य शहीद थे, और रिडले तथा लैटिमर के विषय में कुछ न कहें; या यदि वे जेम्स द्वितीय की प्रशंसा करें और प्यूरिटनों को बुरा कहें; तो ऐसे व्याख्यान से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होगी। फिर भी मुझे आशा है कि ये शंकाएँ और भय निराधार सिद्ध होंगे। मेरा विश्वास है कि ईमानदार और सक्षम व्याख्याताओं का दल बहुत प्रकाश फैलाएगा और वर्तमान में फैली हुई अज्ञानता का बड़ा भाग दूर करेगा। फिर भी, अन्त में मुझे अपना दृढ़ विश्वास प्रकट करना चाहिए कि आज के समय में इंग्लैंड की कलीसिया की सबसे उत्तम रक्षा पादरी-वर्ग के पासबानीय कार्य पर अधिक ध्यान देना है।
हमें घर-घर जाकर अधिक भेंट करने, लोगों की आत्माओं से अधिक सीधे व्यक्तिगत सम्पर्क करने, और अधिक दयालु, मित्रतापूर्ण, सुसमाचारीय उत्साह की आवश्यकता है। पादरी-वर्ग के कार्य की सारी शैली बहुत बदल गई है। बढ़ती हुई आराधना-सभाएँ और प्रभु-भोज बहुत-सा समय और ध्यान ले लेते हैं। परन्तु मुझे गम्भीर सन्देह है कि यदि पुराने ढंग की पासबानीय भेंटें अधिक होतीं तो क्या हमारी कलीसिया कहीं अधिक सशक्त न होती।
मेरा दृढ़ विश्वास है कि कलीसिया के इतिहास के इस संकट-काल में मज़दूर वर्गों की सहानुभूति और विश्वास ही इंग्लैंड की कलीसिया की मुख्य रक्षा है। मेरा मानना है कि यदि पादरी-वर्ग सही रीति से कार्य करे तो उसे यह सहानुभूति और विश्वास पाने में कोई कठिनाई नहीं होगी।
मैं पूरे विश्वास से कहता हूँ कि अंग्रेज़ मज़दूर विशेष रूप से सहानुभूतिपूर्ण ध्यान के योग्य है, और पादरी को इसे दिखाने के विशेष अवसर मिलते हैं। मज़दूर शायद किसी दीन-हीन घर में रहता हो; और कोयले की खान, या कपास की मिल, या लोहे की भट्ठी, या बन्दरगाह, या रासायनिक कारख़ाने में दिन भर परिश्रम करने के बाद वह प्रायः बहुत रूखा और मैला दिखाई दे सकता है। परन्तु अन्ततः वह भी हमारे ही समान हाड़-मांस का मनुष्य है। अपने बाहरी रूखेपन के नीचे उसके पास हृदय और विवेक है, न्याय की तीव्र भावना है, और एक मनुष्य तथा एक ब्रिटेनवासी होने के नाते अपने अधिकारों की सजग स्मृति है। वह न तो यह चाहता है कि कोई उसे संरक्षण दे या उसकी चापलूसी करे, और न यह कि कोई उसे रौंदे, डाँटे या उपेक्षित छोड़े; परन्तु वह यह अवश्य चाहता है कि उसके साथ भाई के समान, मित्रता, कृपा और सहानुभूति से व्यवहार किया जाए। उसे दैनिक सभाओं या भोर के प्रभु-भोजों में आने के लिए विवश नहीं किया जा सकता, और सचमुच ऐसी बातों के लिए उसके पास समय भी नहीं है। जो पादरी ठण्डा और कठोर कर्मकाण्डी है, चाहे वह विधि-विधान में कितना ही सही क्यों न हो, उसके लिए वह बहुत कम करेगा। परन्तु उसे ऐसा पादरी दीजिए जो सचमुच समझता हो कि मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला उसका हृदय है, उसका कोट नहीं, और अशर्फ़ी का मूल्य सोने में है, उस पर लगी मुहर में नहीं; उसे ऐसा पादरी दीजिए जो केवल मंच से मसीह का प्रचार ही न करे, वरन् सप्ताह के दिनों में उसके घर आकर बैठे और मसीह के समान आत्मीय ढंग से उसका हाथ थामे; उसे ऐसा पादरी दीजिए जो यह जानता हो कि मसीह के पवित्र धर्म में किसी का पक्षपात नहीं, कि धनी और निर्धन ‘एक ही लहू से बने’ हैं और उन्हें एक ही प्रायश्चित्त करने वाले लहू की आवश्यकता है, और कि स्वामियों और सेवकों दोनों के लिए एक ही उद्धारकर्ता, पाप के लिए एक ही सोता और एक ही स्वर्ग है; उसे ऐसा पादरी दीजिए जो रोनेवालों के साथ रो सके और आनन्द करनेवालों के साथ आनन्द कर सके, और जो अपने क्षेत्र के सबसे दीन निवासी की चिन्ताओं और कष्टों, जन्मों, विवाहों और मृत्युओं में कोमल रुचि रखता हो; मैं कहता हूँ, मज़दूर को इस प्रकार का पादरी दीजिए, और सामान्य नियम के रूप में मज़दूर उसकी कलीसिया में आएगा। ऐसा पादरी ख़ाली बेंचों को उपदेश नहीं देगा। ऐसा पादरी इंग्लैण्ड की स्थापित कलीसिया का सबसे उत्तम और सबसे प्रभावी बचाव है, और उसकी एक ऐसी मण्डली होगी जो उसकी सर्वोत्तम रक्षक और समर्थक होगी। (3) अब मैं कलीसिया के विभाजनों के पीड़ादायक विषय की ओर मुड़ता हूँ। आप में से अधिकांश को यह बताना व्यर्थ है कि उस अभागे व्यक्ति, आर्चबिशप लॉड के दिनों से हमारी कलीसिया कभी विभाजनों से मुक्त नहीं रही। मैं जानता हूँ कि आजकल उसकी प्रशंसा करना चलन बन गया है, और मैंने एक के बाद एक ऐसी पुस्तकें देखी हैं जो यह दिखाने के लिए लिखी गई हैं कि इंग्लैण्ड की कलीसिया लॉड की कितनी ऋणी है। मैं इन पुस्तकों के लेखकों से सहमत नहीं हो सकता, और मैं सदा लॉड को अंग्रेज़ी असहमति का वास्तविक संस्थापक मानूँगा। परन्तु आज के विभाजन उन सब विभाजनों से कहीं अधिक गम्भीर हैं जिन्होंने कभी हमारी कलीसिया को व्याकुल किया है, और वे हमारे अत्यन्त गम्भीर विचार की माँग करते हैं। जब लोकमत का वह महान अंग, द टाइम्स समाचार-पत्र, कर्ण-स्वीकारोक्ति जैसे विषयों पर लम्बे विवादास्पद पत्राचार के लिए अपने स्तम्भ खोल देता है, और जनता को विवादित धार्मिक बातों पर चर्चा करने वाले सशक्त लेख देता है, तो यह अपनी आँखें मलने और अपने आप से पूछने का समय है कि इस सबका अर्थ क्या है। देश के हर भाग में धर्म के विषय में जो आन्दोलन और उत्तेजना, बेचैनी और अशान्ति और उपद्रव सुनाई देता है, उसका कारण हम कैसे बताएँ? मैं इन प्रश्नों का एक उत्तर देता हूँ। मैं चरम कर्मकाण्डवाद की ओर संकेत करता हूँ।
यह कहते हुए मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे गलत न समझें। कर्मकाण्डी और कर्मकाण्डी में अन्तर है। कुछ ऐसे हैं जो अनेक भ्रमों के होते हुए भी हृदय से निष्ठावान और विश्वासयोग्य मनुष्य हैं; और अन्य ऐसे हैं जो ऐसे विचित्र और विधर्मी मत रखते हैं कि यह समझना कठिन है कि वे इंग्लैण्ड की कलीसिया के भीतर रहते ही क्यों हैं। ये हमारे इस्राएल को व्याकुल करने वाले हैं। चरम कर्मकाण्डी से मेरा यही तात्पर्य है। मुझे दृढ़ विश्वास है कि वर्तमान स्थिति की जड़ और कारण यह प्रबल धारणा है जो अनेक साधारण कलीसिया-सदस्यों में है कि कुछ थोड़े-से पादरियों का गुप्त अभिप्राय प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के कार्य को उलट देना और रोमी कलीसिया के भ्रामक सिद्धान्तों और आराधना को फिर से इंग्लैण्ड में ले आना है। चाहे सही हो या गलत, वे चरम कर्मकाण्डी दल के आन्दोलन को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और उसे पोपवाद का राजमार्ग मानते हैं। उनमें से कुछ ने निःसन्देह अंग्रेज़ी इतिहास पढ़ा है, और वे याकूब द्वितीय के शासनकाल के विषय में कुछ जानते हैं। वे उस पथभ्रष्ट राजा के उन अभागे प्रयासों को नहीं भूलते जो उसने प्रोटेस्टेंट धर्म को दबाने और पोपवाद को फिर से देश में लाने के लिए किए, जिनसे उसे अपना मुकुट खोना पड़ा, वह निर्वासित हुआ, और 1688 की क्रान्ति हुई। वे उन बातों को स्मरण करते हैं, और 1898 में रोमवाद की ओर लौटने के तनिक-से आभास पर भी क्रुद्ध होते हैं।
देश भर के साधारण सदस्य उन रीति-सम्बन्धी नवीनताओं के विषय में उचित ही शिकायत करते हैं जो चरम कर्मकाण्डियों ने पिछले चालीस वर्षों में हमारी कलीसिया की आराधना में घुसा दी हैं। वे सब एक ही दिशा में रही हैं, चाहे वे पहनावे की हों या हाव-भाव की या मुद्रा की या क्रिया की या किसी और बात की। वे यथासम्भव अप्रोटेस्टेंट रही हैं। वे पोपवाद से उधार ली गई या उसकी नकल की गई हैं। उनमें एक ही सामान्य झुकाव और भावना दिखाई दी है, अर्थात् धर्म-सुधारकों के मार्गों से यथासम्भव दूर जाने और, वैध रीति से या अवैध रीति से, रोम के मार्गों के यथासम्भव निकट पहुँचने की उत्कट इच्छा। उन्होंने एक ही सामान्य व्यवस्थित संकल्प दिखाया है कि इंग्लैण्ड की कलीसिया की सरल आराधना को यथासम्भव अप्रोटेस्टेंट बना दिया जाए, और उसे पोपवाद की भड़कीली और इन्द्रिय-सुखद आराधना के यथासम्भव समान बना दिया जाए। नमूनों की एक संक्षिप्त सूची मेरा आशय स्पष्ट कर देगी।
(1) हमारे धर्म-सुधारकों ने मिस्सा के बलिदान को हमारी कलीसिया में पाया। उन्होंने उसे ‘निन्दात्मक कथा और ख़तरनाक छल’ कहकर बाहर निकाल दिया, और प्रभु-भोज को संस्कार कहा। चरम कर्मकाण्डियों ने बलिदान शब्द को फिर से चला दिया है, और प्रायः प्रभु-भोज को मिस्सा कहने में गर्व करते हैं।
(2) हमारे धर्म-सुधारकों ने हमारी सब कलीसियाओं में वेदियाँ पाईं। उन्होंने आज्ञा दी कि उन्हें उतार दिया जाए, और 'वेदी' शब्द को हमारी प्रार्थना-पुस्तक से पूरी तरह निकाल फेंका, और केवल प्रभु की मेज़ और प्रभु के पटल की ही बात की। प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के सौ वर्ष बाद भी, जब हमारी आराधना-विधि का अन्तिम संशोधन हुआ और उसे उसके वर्तमान आधार पर स्थापित किया गया, चार्ल्स द्वितीय के शासनकाल में, संशोधन करनेवालों ने हमारी प्रभु-भोज की विधि में 'वेदी' शब्द को फिर लौटाने का प्रयत्न नहीं किया। अतिवादी रीतिवादी प्रभु की मेज़ को 'वेदी' कहने में आनन्दित होते हैं, और अपनी सब कलीसियाओं में वेदियाँ खड़ी करते हैं।
(3) हमारे धर्म-सुधारकों ने हमारे पादरी-वर्ग को बलिदान चढ़ानेवाले याजक पाया, और उन्हें प्रार्थना पढ़नेवाले, प्रचार करनेवाले सेवक बना दिया—परमेश्वर के वचन और संस्कारों के सेवक। अतिवादी रीतिवादी हर पादरी को बलिदान चढ़ानेवाला 'याजक' कहने में गौरव मानते हैं।
(4) हमारे धर्म-सुधारकों ने हमारी कलीसिया में शारीरिक वास्तविक उपस्थिति का सिद्धान्त पाया, और उसका विरोध करने के लिए अपने प्राण दे दिए। उन्होंने 'वास्तविक उपस्थिति' की अभिव्यक्ति को भी हमारी प्रार्थना-पुस्तक में स्थान नहीं दिया। उन्होंने रोमी पद्धति के ट्रांसबस्टैंशिएशन (तत्त्व-परिवर्तन) और लूथर-पंथी कन्सबस्टैंशिएशन (तत्त्व-सह-अस्तित्व), दोनों को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया। उन्होंने अपने 29वें अनुच्छेद में घोषणा की कि विश्वासहीन भोज में सम्मिलित होनेवाले 'किसी रीति से (nullo modo) मसीह के सहभागी नहीं' होते। अतिवादी रीतिवादियों ने इस सिद्धान्त को फिर से चलाया है, और प्रभु-भोज के पवित्र किए हुए पदार्थों का आदर प्रायः ऐसे करते हैं मानो उनमें मसीह की स्वाभाविक देह और लहू हों।
(5) हमारे धर्म-सुधारकों ने हमारी सब कलीसियाओं में मूर्तियाँ, रूड-स्क्रीन, क्रूस-मूर्तियाँ और पवित्र स्थान पाए, और क्रोध के साथ उन्हें बाहर फेंक दिया। अतिवादी रीतिवादी निरन्तर उन्हें वापस लाने का प्रयत्न करते रहते हैं। (6) हमारे धर्म-सुधारकों ने हमारी आराधना को जुलूसों, धूप जलाने, झण्डे ढोने, मोमबत्तियों, मुद्राओं, आसनों, फूलों और भड़कीले बलिदान-वस्त्रों से भरा पाया, और आज्ञा दी कि वे सब हटा दिए जाएँ। अतिवादी रीतिवादी प्रायः उन्हें फिर से चलाने के लिए परिश्रम कर रहे हैं। मैं यहाँ रुकता हूँ, और आगे नहीं जाऊँगा। मैं सहज ही अन्य बातों के नाम ले सकता हूँ जिनके लिए मुझे खेद है, और जिन्हें मैं इस समय के खतरनाक नवाचार समझता हूँ। ऐसी बातें हैं: दिन के उजाले में प्रभु-भोज के समय पवित्र मेज़ पर जलती मोमबत्तियाँ, धूप, मिलाया हुआ प्याला, रीतिगत धुलाई, पवित्र जल, और बच्चों के लिए हानिकारक प्रश्नोत्तरियों का प्रयोग, ऐसी प्रश्नोत्तरियाँ जो मरियम-पूजा सिखाती हैं, और दो संस्कारों के स्थान पर सात संस्कार, और सबसे बुरी बात, बलपूर्वक कान में की जानेवाली पाप-स्वीकृति। मैं इन सबको छोड़ देता हूँ, क्योंकि कलीसियाई अनुशासन की वर्तमान दशा में, जब पूर्ण स्वतन्त्रता ही एकमात्र नियम जान पड़ती है, खेद प्रकट करने से अधिक कुछ करना समय गँवाना है। मैं केवल देख सकता हूँ और शोक कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग इन बातों को ऐसी तुच्छ बातें समझते हैं जो ध्यान देने योग्य नहीं। मैं उनकी आँखों से नहीं देख सकता। ये बहुत हानिकारक तुच्छ बातें हैं। ये ठीक वैसी ही बातें हैं जो आज के दिनों में इंग्लैण्ड की कलीसिया की नींव को धीरे-धीरे खोखला कर रही हैं। ये मध्यम और निम्न वर्ग को चिढ़ाती और खिझाती हैं, जो इन्हें उसी प्रार्थना-पुस्तक में नहीं पा सकते जिसे उन्होंने बचपन से प्रयोग किया है, और जिसका आदर और सम्मान करने के लिए उनसे निरन्तर आग्रह किया गया है। इन्हें स्थापित कलीसिया को प्रोटेस्टेंट-विहीन करने का प्रयास समझा जाता है। यदि ये बढ़ती रहीं और इन्हें रोका न गया, तो अन्त में स्थापित कलीसिया का पद छिन जाएगा, उसकी सम्पत्ति छिन जाएगी, और वह टूट जाएगी। कम से कम, यह मेरा सोचा-समझा मत है।
सीधी सच्ची बात यह है कि अतिवादी रीतिवाद, अपनी अनेक नई बातों के साथ, मध्यम और निम्न वर्गों को इंग्लैण्ड की कलीसिया से धीरे-धीरे दूर करता जान पड़ता है। अब मतदान की शक्ति इन्हीं के हाथ में है, और निश्चय है कि वे अगले चुनाव में उसका प्रयोग करेंगे, और ऊपर के दस हज़ार को अल्पसंख्यक छोड़ देंगे। हज़ारों दुकानदारों, किसानों और कारीगरों को पोप-मत से स्वाभाविक भय है। उन्हें अनपढ़ और अज्ञानी लोग कहकर उनका उपहास करना बुद्धिमानी नहीं है, जैसा कि कुछ लोग करते हैं। वे धर्मशास्त्र की बातों में शायद बहुत समझदार या गहरे पढ़े हुए न हों, परन्तु वे पोप-मत को सहने के लिए तैयार नहीं हैं। वे बारीक भेद नहीं कर सकते; वे हर बात को सीधे-सीधे कह देते हैं, और चीज़ों को उनका सही नाम देते हैं। वे शायद जॉन ब्राइट की तरह बोल या मैकाले की तरह लिख न सकें, परन्तु उनके कन्धों पर सिर हैं, और वे सोच सकते हैं और सोचेंगे। और यदि वे हमारी गाँव-गाँव की कलीसियाओं में पोप-मत की रीतियों को फिर से लाने का थोड़ा-सा भी प्रयत्न देखते हैं, तो उनके सन्देह जाग उठते हैं, और वे चल देते हैं और चैपल में चले जाते हैं। जो कलीसिया-सदस्य इन सन्देहों को जागने देता है, वह गम्भीर, भले आशयवाला, निर्दोष मन का और उत्साही हो सकता है, परन्तु वह इंग्लैण्ड की कलीसिया का सच्चा मित्र नहीं है।
एक बार स्पष्ट रूप से मैं ईमानदारी से कहना चाहता हूँ कि अतिवादी रीतिवाद से मेरे मुख्य भय उस प्रभाव से उत्पन्न होते हैं जो वह निम्न और मध्यम वर्गों के मन पर डालता है। उन्हें यह पसन्द नहीं। वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे। वे इसे पोप-मत कहते हैं।
मेरा अपना विश्वास है कि उग्र रीतिवादियों का बल मुख्यतः उच्च वर्गों में है। अंग्रेज़ अभिजात वर्ग के वे सदस्य जिन्हें संगीत और गायन से भरी हुई सजीली आराधना पसन्द है और जिन्हें प्रचार और प्रार्थना कम भाती है; अधपढ़े लोग जो धीरे-धीरे सुसमाचारवादी घरानों से अलग हो गए हैं; निठल्ली युवतियाँ और विचारहीन युवक जो कदाचित् ही अपनी बाइबल पढ़ते हैं और जिन्हें जोशीली, सनसनीखेज़ आराधना अच्छी लगती है और जो हर उस वस्तु को नापसन्द करते हैं जो सीधी-सादी और नीरस दिखती है—ऐसे ही लोग आज के दिनों में निरन्तर भटककर यह घोषणा कर रहे हैं कि वे पुराने ढंग के प्रोटेस्टेंट मत से सन्तुष्ट नहीं हैं। वे उन बच्चों के समान हैं जो अनाज की अपेक्षा अफ़ीम के फूलों की प्रशंसा करते हैं, और उन शिशुओं के समान हैं जिन्हें भोजन से अधिक खिलौनों की चिन्ता रहती है। परन्तु उग्र रीतिवाद उन परिश्रमी, पक्के विचारवाले और मेहनतकश हाथोंवाले जनसमूहों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता जो विशाल मध्य वर्ग और समझदार कारीगरों में हैं, अर्थात् इंग्लैण्ड के मस्तिष्क और भुजा की। इन मनुष्यों को अपनी आत्माओं के लिए भोजन और अपने विवेक के लिए विश्राम चाहिए। उन्हें जीवन इतना कठिन और हृदय को थका देनेवाला लगता है कि वे आराधना में तुच्छ बातों और खिलौनों से सन्तुष्ट नहीं हो सकते। यदि कलीसिया उन्हें शुद्ध सुसमाचार की वह सादी रोटी न दे जो मिलावट और मेल से रहित हो, तो वे उसे छोड़कर अपने तम्बू कहीं और गाड़ लेंगे।
हमारे इन दुःखद विभाजनों और वर्तमान कष्टदायक दशा का अन्त क्या होगा, यह कहना असम्भव है। मैं अशुभ भविष्यवक्ता बनना नहीं चाहता। मुझे अपनी कलीसिया की जीवन-शक्ति की दृढ़ता पर बड़ा विश्वास है। वह ‘खूनी मरियम’ के शासन-काल में प्रोटेस्टेंट मत के अस्थायी दमन से बची रही। वह कॉमनवेल्थ के दिनों में धर्माध्यक्षीय प्रणाली के उखाड़े जाने और प्रार्थना-विधि पर रोक लगने से बची रही। वह 1662 में एकरूपता के अधिनियम द्वारा 2,000 अत्यन्त योग्य पादरियों के निष्कासन से बची रही, जिनमें से अनेक विद्वान और उत्तम महाविद्यालय-फ़ेलो थे। वह विलियम तृतीय के राजसिंहासन पर आने पर शपथ न लेनेवालों के अलग हो जाने से बची रही। वह पिछली शताब्दी में मेथोडिस्ट समुदाय की हानि से बची रही। वह हमारे ही दिनों में मैनिंग, न्यूमैन, ओकली, फ़ेबर, दोनों विल्बरफ़ोर्स और अन्य अनेकों के अपने स्थान को चले जाने से बची रही है। यदि वह प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के उन महान पुराने सिद्धान्तों के प्रति विश्वासयोग्य रहे, तो मेरा विश्वास है कि वह अब भी जीवित रहेगी, मरेगी नहीं। परन्तु इस समय मुझे दृढ़ विश्वास है कि उग्र रीतिवाद कहलानेवाले आन्दोलन से उत्पन्न विशाल विभाजन इंग्लैण्ड की कलीसिया के जीवन को गम्भीर संकट में डाल रहे हैं।
(4) अन्तिम विषय जिसे मैं इस सम्मेलन-पत्र में उठाना चाहता हूँ, वह है ‘कलीसिया में सहिष्णुता’। एक सीमा तक सहिष्णुता सदा एक स्वस्थ प्रोटेस्टेंट कलीसिया का एक चिह्न होगी। जब तक मानव स्वभाव जैसा है वैसा बना रहेगा, तब तक यह आशा करना व्यर्थ है कि सब मसीही लोग सब बातों को, चाहे बड़ी हों या छोटी, ठीक एक ही दृष्टि से देखें और उनसे चीनी ढंग की एकरूपता की माँग की जाए। सामान्य बुद्धि हमें बताती है कि कलीसिया के लोगों को उन उदासीन बातों में भिन्नताओं को सहन करना चाहिए जिनके विषय में पवित्रशास्त्र, प्रार्थना-पुस्तक और विधि-निर्देश सब मौन हैं और जिनमें कोई सिद्धान्त-सम्बन्धी प्रश्न सम्मिलित नहीं है। इस प्रकार की बहुत-सी छोटी बातें हैं, जैसा कि हम सब जानते हैं। इन छोटी बातों में हमसे सहमत न होने के कारण मनुष्यों को पाखण्डी और अशुद्ध ठहराना मुझे संकीर्णता और असहिष्णुता की पराकाष्ठा प्रतीत होता है। हम अपने भाई को इसलिए मूर्ख समझ सकते हैं कि वह बातों को हमारे जैसा नहीं देखता; परन्तु जहाँ बाइबल और प्रार्थना-पुस्तक का कोई प्रमाण नहीं है, वहाँ उसे भी अपना मत रखने का उतना ही अधिकार है जितना हमें। परन्तु सहिष्णुता की सीमाएँ अवश्य होनी चाहिए; और ठीक इसी बिन्दु पर मुझे आज के दिनों में आगे संकट दिखाई देता है। वह संकट उस बढ़ती हुई माँग में है जो अनेक लोग इंग्लैण्ड की कलीसिया की सीमा के भीतर हर प्रकार के धार्मिक मत और रीति-व्यवहार की सहिष्णुता के लिए कर रहे हैं। हमें गम्भीरता से बताया जाता है कि ऐसी नीति ही ‘वर्तमान संकट’ का सच्चा उपाय है। प्रत्येक पादरी को छूट दी जाए कि वह जो चाहे माने, सिखाए और करे। प्रभु-भोज की मेज़ पर उसके कर्मकाण्डीय कार्यों या मंच से उसके उपदेशों के लिए किसी से कभी जवाब न माँगा जाए। विचार का हर सम्प्रदाय, चाहे कितना ही उग्र हो, सहन किया जाए। किसी भी न्यायालय में, चाहे आत्मिक हो या लौकिक, कोई अभियोग न चलाया जाए। एंग्लिकन कलीसिया का आदर्श न्यायियों के दिनों का इस्राएल हो, जब ‘जिसको जो ठीक जान पड़ता था वही वह करता था’ (न्यायियों 21:25)।
यह तथ्य कि जैसी भयंकर नीति का मैंने वर्णन किया है, वह अनेक कलीसिया-जनों को स्वीकार्य है, मेरे विचार में इंग्लैण्ड की कलीसिया के सबसे बड़े संकटों में से एक है; और उग्र रीतिवाद के समान उसके अपनाए जाने का भी एक ही परिणाम हो सकता है। वह परिणाम अन्ततः फूट, विघटन, सम्पत्ति-हरण और राजकीय संरक्षण की समाप्ति होगा। एक ही सहभागिता के भीतर दो या तीन अलग-अलग कलीसियाएँ हो ही नहीं सकतीं। मुझे आश्चर्य है कि इस सार्वभौमिक सहिष्णुता की उल्लेखनीय नीति के पक्षधर यह नहीं देखते कि इसका निश्चित अन्त हमारी कलीसिया के टुकड़े-टुकड़े हो जाने में होगा।
इसमें सन्देह नहीं कि पहली दृष्टि में सार्वभौमिक सहिष्णुता की नीति बड़ी लुभावनी लगती है। वह समय के स्वभाव के अनुकूल है। शान्ति स्थापित करने और झगड़ा रोकने के लिए इससे अधिक सम्भावित उपाय और क्या होगा कि कलीसिया को एक प्रकार का सुखी परिवार या नूह का जहाज़ घोषित कर दिया जाए, जिसके भीतर हर प्रकार का मत और धर्म-सिद्धान्त और हर प्राणी सुरक्षित और निर्विघ्न रहे, और सहभागिता की एकमात्र शर्त यह हो कि भीतर आने को तैयार रहो और अपने पड़ोसी को छोड़ दो? तथापि, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं यह समझने में सर्वथा असमर्थ हूँ कि यह नीति सब अनुच्छेदों और धर्म-सूत्रों को त्यागे बिना, सब हस्ताक्षरों को समाप्त किए बिना, संक्षेप में इंग्लैण्ड की कलीसिया के सम्पूर्ण संविधान को बदले बिना कभी कैसे लागू की जा सकती है।
यह स्थिति कभी स्वीकृत और अनुमत होगी या नहीं, मैं नहीं कह सकता। आजकल कुछ भी असम्भव नहीं है। विचारों की पूर्ण स्वतंत्रता और मतों की निरंकुश स्वाधीनता के वर्तमान उन्माद में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे मान लेना और अनुमति दे देना अति-हास्यास्पद हो। मैं अपने सुनने वालों से केवल इतना कहूँगा कि वे ध्यान से विचार करें कि इस नई व्यवस्था का व्यावहारिक रूप क्या होगा।
सामान्य विश्वासियों की क्या स्थिति होगी? इस समय इंग्लैंड का साधारण कलीसिया-सदस्य, इंग्लैंड में जहाँ कहीं भी रहता या जाता हो, यह उचित ही अपेक्षा कर सकता है कि उसे स्थानीय कलीसिया की आराधना और उपदेशों में एक निश्चित सीमा तक एकरूपता मिलेगी। निःसन्देह एक स्थान पर उसे दूसरे की अपेक्षा अधिक गायन, सर्प्लिस पहनावा और बाहरी कर्मकाण्ड मिल सकता है। एक पादरी किसी एक समूह के सत्यों पर दूसरे की अपेक्षा अधिक बल दे सकता है। परन्तु कुल मिलाकर यह भिन्नता प्रायः सीमाओं के भीतर ही रहती है। जब सार्वभौमिक सहिष्णुता का राज्य आरम्भ होगा तब यह सब समाप्त हो जाएगा। उसे एक मंच से यह सुनकर चौंकना पड़ेगा कि पुराने नियम का बहुत-सा भाग त्रुटिपूर्ण और अप्रेरित है, या कि शैतान नाम का कोई है ही नहीं, और भविष्य में कोई दण्ड नहीं है। यदि वह किसी दूसरे गाँव में जाए, तो उसे यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि प्रभु-भोज बलिदानीय वस्त्र पहनकर, धूप और दिन-दहाड़े जलती मोमबत्तियों के साथ और पवित्र किए गए तत्त्वों की आराधना के साथ मनाया जा रहा है। यदि उसे यह सब अच्छा न लगे तो उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए! चाहे वह कितना ही आहत हो, उससे कहा जाएगा कि यह सहिष्णुता की वही प्रसिद्ध नई नीति है, और उसे इसके आगे झुकना होगा! क्या सामान्य विश्वासी इस स्थिति से सन्तुष्ट और सहमत होंगे? मुझे इसमें अत्यन्त सन्देह है। सारे देश में व्यापक असन्तोष फैलेगा। मध्यम वर्ग के असंख्य लोग कलीसिया को छोड़कर असहमत सम्प्रदायों में चले जाएँगे।
इंग्लैंड के पादरी-वर्ग की क्या स्थिति होगी? इस समय बहुत खींचतान और टकराव के होते हुए भी, विचार की तीनों शाखाओं—ईमानदार उच्च, निम्न और उदार—के अधिकांश लोग, उग्र और अतिवादी जनों को छोड़कर, आपस में प्रायः मेल-जोल से निभा लेते हैं और विशेषकर शिक्षा, संयम और मिशनों जैसे विषयों में एक दूसरे का आदर करते हैं। इंग्लैंड की कलीसिया के प्रति निष्ठावान प्रेम में उनका एक साझा बन्धन है, और यह सच्ची अभिलाषा भी साझी है कि वे उसे अपनी सन्तानों को अक्षुण्ण सौंप जाएँ। हमारे विश्वास-वचनों और प्रार्थना-विधियों की सीमाओं के भीतर बने रहने और उनका उल्लंघन न करने का भी एक साझा संकल्प है। उन उग्र उत्साहियों के प्रति भी एक साझी अरुचि है जो कुछ जोड़कर, घटाकर या बदलकर पुराने मार्गों से हटने का प्रयास कर रहे हैं। जब सार्वभौम सहनशीलता का राज्य आरम्भ होगा, तब यह सब समाप्त हो जाएगा! जब एक ओर मिस्सा को और दूसरी ओर खुले संशयवाद को अधिकार की ओर से औपचारिक मान्यता मिल जाएगी, तब यह मान लेना व्यर्थ है कि कुछ ईमानदार पादरी हमारी सहभागिता से बड़ी संख्या में अलग न हो जाएँगे। जो अलग नहीं होंगे, वे सुरक्षा के लिए एकजुट हो जाएँगे, और अपने ही विशेष मतों को ठोस रूप देंगे तथा दूसरों को मान्यता देने से इनकार करेंगे। संक्षेप में, हमारे 'दुःखदायी विभाजनों' की संख्या और वृद्धि होगी, जिससे इंग्लैंड की कलीसिया का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा और वह जड़ तक हिल जाएगी।
सबसे बढ़कर, हमारे अंग्रेज़ अध्यक्षों की क्या स्थिति होगी? इस समय वे अपने अभिषेक के समय यह गम्भीर प्रतिज्ञा करते हैं कि वे 'पूरी विश्वासयोग्य तत्परता के साथ परमेश्वर के वचन के विपरीत हर भ्रामक और अनोखे सिद्धान्त को हटाने और दूर भगाने के लिए तैयार रहेंगे, और निजी तथा सार्वजनिक रूप से दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए पुकारेंगे और उनका उत्साह बढ़ाएँगे।' एक बार जब बहुप्रशंसित सार्वभौम सहनशीलता की नीति स्वीकार कर ली जाए और उसे औपचारिक मान्यता मिल जाए, तो मुझे इस प्रतिज्ञा का रत्ती भर भी उपयोग दिखाई नहीं देता। अध्यक्ष के कुछ पादरी प्रभु-भोज के विषय में रोमी मत रखेंगे और खुलेआम उसे मिस्सा कहेंगे। दूसरे प्रार्थना-पुस्तक के मतों से सन्तुष्ट रहेंगे और धूप, चासुबल, भौतिक उपस्थिति, वेदी और बलिदान को क्रोध से ठुकरा देंगे। पादरी-पद के उसके कुछ उम्मीदवार ऐसे उदार और विस्तृत सिद्धान्त रखेंगे जिनका किसी भी चतुराई से अनुच्छेदों के साथ मेल नहीं बैठाया जा सकता, और वे उन्हें अपनी परीक्षा-पुस्तिकाओं में लिख देंगे। अन्य लोग उतनी ही निश्चिन्तता से प्रेरणा और प्रायश्चित के विषय में संशयपूर्ण कथन प्रस्तुत करेंगे। तब बेचारा अध्यक्ष क्या करेगा? वह कुछ भी नहीं कर सकेगा। उसे 'विचार की सब शाखाओं का मानद सदस्य' बनना पड़ेगा। उसे सब पर एक-सी सन्तुष्टि से मुस्कुराना पड़ेगा, और बिना कोई प्रश्न पूछे या कोई घोषणा, प्रतिज्ञा, शपथ या हस्ताक्षर माँगे किसी को भी, सबको, अनुज्ञापत्र देना, नियुक्त करना और पादरी ठहराना पड़ेगा। यदि इंग्लैंड की कलीसिया ऐसी अव्यवस्थित दशा में देर तक बची रहे, तो यह सचमुच एक चमत्कार होगा। जहाँ कोई विधि या नियम नहीं, वहाँ किसी समुदाय में व्यवस्था नहीं रह सकती। जहाँ कोई विश्वास-वचन या सिद्धान्त की कसौटी नहीं, वहाँ कलीसिया नहीं, केवल बाबेल होगा। लोग जो चाहें कहें। दिशासूचक के बिना जहाज़, दीपक के बिना प्रकाश-स्तम्भ, और आग के बिना द्रुतगामी रेल-इंजन भी उतना निरर्थक न होगा जितनी निरर्थक वह कलीसिया होगी जो विश्वास-वचनों, अनुच्छेदों या प्रार्थना-विधियों के बिना हो और सार्वभौम सहनशीलता की पताका के नीचे चल रही हो।
मैं अपना वार्षिक सम्बोधन यहीं समाप्त करता हूँ... संसद हस्तक्षेप करके हमारी सहायता करेगी या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। किसी और ओर से छुटकारे की मुझे बहुत कम आशा दिखाई देती है। दीवार पर ऐसी लिखावटें हैं जिन्हें समझने के लिए किसी दानिय्येल की आवश्यकता नहीं। सब राष्ट्रीय कलीसियाओं के राज्य-संरक्षण को समाप्त करने की ओर एक धारा बह रही है, और यह प्रश्न है कि क्या हम पहले ही उसमें नहीं पड़ चुके हैं। हम प्रतिदिन नीचे की ओर बहते जा रहे हैं, चाहे कुछ लोग इसे न अनुभव करें और न देखें, और कुछ ही वर्षों में, यदि हमने प्रयत्न न किया, तो हम जलप्रपात से नीचे गिर पड़ेंगे। ऐसे समय में हर निष्ठावान कलीसिया-सदस्य को अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए, और परमेश्वर की सहायता से यह दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि वह धर्म-सुधार के शुद्ध विश्वास को अपने बच्चों की सन्तानों तक पहुँचाएगा।
