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होशे 14
होशे 14:1-2
1. हे इस्राएल, अपने परमेश्वर यहोवा के पास लौट आ, क्योंकि तू ने अपने अधर्म के कारण ठोकर खाई है।
1. Revertere Israel ad Jehovam Deum tuum; quia orruisti in iniquitate tua.
2. बातें सीखकर और यहोवा की ओर लौटकर, उस से कह, सब अधर्म दूर कर; अनुग्रह से हम को ग्रहण कर; तब हम धन्यवाद रूपी बलि चढ़ाएँगे, अर्थात् अपने होंठों के बछड़े।
2. Tollite vobiscum verba, et convertimini ad Jehovam: et dicite ei, Omnem tolle iniquitatem, et sume (vel, attolle) bonum; et solvemus vitulos labiorum nostrorum.
यहाँ भविष्यद्वक्ता इस्राएलियों को पश्चाताप के लिए उभारता है, और फिर भी दया की कुछ आशा उनके सामने रखता है। परन्तु यह असंगत प्रतीत हो सकता है, क्योंकि वह पहले ही यह साक्षी दे चुका था कि अब कोई उपाय शेष न रहेगा, इसलिए कि उन्होंने परमेश्वर को अत्यन्त क्रोध दिलाया था।
इस विषय में भविष्यद्वक्ता अपनी ही बात का खण्डन करता हुआ दिखाई देता है। परन्तु इसका समाधान सहज ही उपलब्ध है, और वह यह है,—प्रजा के अन्तिम विनाश के विषय में पहले बोलते समय उसकी दृष्टि प्रजा के सम्पूर्ण समूह पर थी; परन्तु अब वह अपना वचन उन थोड़े लोगों की ओर मोड़ता है जो अब तक विश्वासयोग्य बने रहे थे। और यह भेद, जैसा हम अन्य स्थानों पर आपको स्मरण दिला चुके हैं, सावधानी से ध्यान में रखा जाना चाहिए; नहीं तो पवित्रशास्त्र के अनेक भागों में हम उलझन में पड़ जाएँगे। अतः अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने यह कहने के बाद कि परमेश्वर इस्राएल की प्रजा के प्रति अटल रहेगा, यह उपदेश किस प्रयोजन से जोड़ा; क्योंकि सम्पूर्ण समूह के विषय में छुटकारे की कोई आशा न थी; परमेश्वर ने अब सचमुच उन्हें नष्ट करने का निश्चय कर लिया था, और वह चाहता था कि होशे के प्रचार के द्वारा यह उन पर प्रकट किया जाए। तौभी अपनी चुनी हुई प्रजा के बीच परमेश्वर का कुछ बीज सदा शेष रहता था: यद्यपि वह देह, सम्पूर्ण रूप से, सड़ी और भ्रष्ट थी, तौभी कुछ स्वस्थ अंग बचे रहे, जैसे भूसे के बड़े ढेर में कुछ दाने छिपे हुए पाए जा सकते हैं। सो जब परमेश्वर ने कुछ लोगों को बचा रखा था (जैसा वह सदा करता आया है), तब वह उनके सामने अपनी दया प्रस्तुत करता है: और चूँकि वे भी, मानो किसी आँधी के द्वारा, बहा ले जाए गए थे, जब प्रजा में अधर्म इतना प्रबल हो गया था कि कुछ भी स्वस्थ न रहा, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ उन्हीं को सम्बोधित करता है, क्योंकि वे सर्वथा असाध्य न थे।
अतः हम यह जान लें कि जो सुधर नहीं सकते थे, अर्थात् प्रजा का सम्पूर्ण समूह, वे अब छोड़ दिए गए हैं; क्योंकि वे ऐसे हठीले थे कि भविष्यद्वक्ता सफलता की किसी आशा के साथ उन्हें सम्बोधित न कर सकता था। तब यहाँ उसका यह उपदेश विशेष रूप से परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर लागू किया जाना चाहिए, जो कुछ समय के लिए भटक गए थे और उस युग की सामान्य बुराइयों में उलझ गए थे, तौभी सर्वथा असाध्य न थे। भविष्यद्वक्ता अब उन्हें उपदेश देता और कहता है, हे इस्राएल, अपने परमेश्वर यहोवा के पास लौट आ; क्योंकि तू अपने अधर्म के कारण गिर पड़ा है। यह कारण इसलिए जोड़ा गया है कि मनुष्य जब तक दीन न किए जाएँ, तब तक कभी पश्चाताप न करेंगे; और सच्ची और खरी दीनता पाप के बोध के सिवा और कहाँ से आती है? अतः जब तक मनुष्य अपने आप से अप्रसन्न न हों, और यह स्वीकार न करें कि वे विनाश के योग्य हैं, तब तक वे पश्चाताप की सच्ची भावना से कभी प्रभावित न होंगे। इसलिए होशे ने इन दोनों बातों को बुद्धिमानी से एक साथ जोड़ा है, कि इस्राएल अपने अधर्मों के कारण गिर पड़ा था, और फिर यह कि यहोवा के पास लौटने का समय आ गया था। ऐसा क्यों? क्योंकि जब हमें यह निश्चय हो जाता है कि हम विनाश के योग्य हैं, वरन् इतनी बार परमेश्वर को क्रोध दिलाने के कारण हम पहले ही मृत्यु के दण्ड के भागी ठहर चुके हैं, तब हम अपने आप से घृणा करने लगते हैं; और पाप के प्रति घृणा हमें पश्चाताप की खोज की ओर प्रेरित करती है।
परन्तु वह कहता है, हे इस्राएल, तू अपने परमेश्वर की ओर फिर। भविष्यद्वक्ता अब उन्हें कृपापूर्वक बुलाता है; क्योंकि अनुग्रह की आशा मिलाए बिना केवल कठोर वचनों से वह सफल न हो सकता था, जैसा हम जानते हैं कि विश्वास के बिना पश्चाताप की कोई आशा नहीं हो सकती। इसलिए भविष्यद्वक्ता केवल यही नहीं दिखाता कि क्या करना आवश्यक था, वरन् यह भी कहता है, ‘तू इस्राएल है, तू एक चुनी हुई प्रजा है।’ तौभी, जैसा पहले कहा जा चुका है, वह सब को बिना भेद के सम्बोधित नहीं करता, परन्तु उन्हीं को जो अब्राहम की सच्ची सन्तान थे, यद्यपि वे कुछ समय के लिए पतित हो गए थे। “सो हे इस्राएल, तू अपने परमेश्वर की ओर फिर; क्योंकि तू कुछ समय के लिए चाहे कितना ही भटक गया हो, तौभी परमेश्वर ने तुझे त्यागा नहीं है: केवल उसके पास लौट आ, और तू अनुग्रह पाएगा, क्योंकि वह अपनी प्रजा के प्रति सहज ही मान जानेवाला है।”
इसके बाद वह पश्चाताप का मार्ग दिखाता है: और यह स्थल ध्यान देने योग्य है; क्योंकि हम जानते हैं कि जब मनुष्य पश्चाताप की चर्चा करते हैं तब वे निरी तुच्छ बातें आगे रखते हैं। इसलिए जब पश्चाताप शब्द का उल्लेख होता है, तब मनुष्य यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर को इस या उस विधि से शान्त किया जा सकता है, जैसा हम पोपतन्त्र के अधीन रहनेवालों में होता देखते हैं। और उनका पश्चाताप क्या है? बस यही,—यदि वे कुछ निश्चित दिनों में उपवास करें, यदि वे छोटी-छोटी प्रार्थनाएँ बुदबुदाएँ, यदि वे मन्नत की तीर्थयात्राएँ करें, यदि वे मिस्सा मोल लें,—यदि वे इन तुच्छ बातों से अपने को थका डालें, तो वे सोचते हैं कि उचित और अपेक्षित पश्चाताप परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत हो गया: परन्तु यह सब सर्वथा मूर्खतापूर्ण है। अतः चूँकि संसार नहीं समझता कि पश्चाताप का अर्थ क्या है और वह किस ओर ले जाता है, इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ सच्चे पश्चाताप को उसके फलों के द्वारा प्रस्तुत करता है। इसलिए वह कहता है, अपने साथ बातें लेकर यहोवा की ओर फिरो; और उससे कहो, सब अधर्म दूर कर और भलाई ला, और हम तुझे अपने होंठों के बछड़े चढ़ाएँगे। जब वह उन्हें आज्ञा देता है कि बलिदान के स्थान पर प्रस्तुत करने के लिए बातें लें या ढूँढ़ें, तब निःसन्देह उसका संकेत उस बात की ओर था जो व्यवस्था सिखाती है।
पहले, यह निश्चित है कि भविष्यद्वक्ता बनावटी बातों की चर्चा नहीं करता; क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर यशायाह के द्वारा क्या घोषित करता है, ‘ये लोग मुँह से तो मेरे निकट आते हैं, परन्तु उनका मन मुझ से बहुत दूर रहता है’ (यशायाह 29:13)।
परन्तु वह उन्हें ऐसी बातें लेने की आज्ञा देता है जिनके द्वारा वे यह प्रकट करें कि उनके हृदय में क्या उत्पन्न हुआ और क्या अनुभव किया गया। तब पहले उसका आशय यह है कि उनकी बातें उनकी भावना के अनुरूप हों।
दूसरे, यह ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता यहाँ किसी भी प्रकार की बातों की चर्चा नहीं करता, परन्तु यह कि परमेश्वर के वचनों और मनुष्यों के वचनों के बीच परस्पर सम्बन्ध होना चाहिए। तब हम परमेश्वर के पास ऐसी बातें कैसे लाएँ जो हमारी भक्ति की सच्चाई को प्रमाणित करें? इसी प्रकार से कि हम सीखने को तत्पर और अधीन हों; जब वह हमें ताड़ना दे तब हम स्वेच्छा से सहें, जब वह हमें डाँटे तब हम स्वीकार करें कि हम किस योग्य हैं, जब वह हमें धमकाए तब हम दीनता से प्रतिशोध के टल जाने की विनती करें, जब वह क्षमा की प्रतिज्ञा करे तब हम उसे ग्रहण करें। जब हम इस प्रकार परमेश्वर के मुख से बातें लेकर उन्हें उसके पास लाते हैं, तब यही इस स्थल पर भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय के अनुसार बातें लेना है। इससे हम भविष्यद्वक्ता के उपदेश का आशय देखते हैं, जब वह हमें बातें लेने की आज्ञा देता है: परन्तु अभी मैं इससे आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे हम अब इस नश्वर देह को अपने साथ लिए फिरते हैं, हाँ, और पाप के द्वारा अपने भीतर सहस्रों मृत्युओं को पालते हैं,—ऐसा अनुग्रह कर कि हम विश्वास के द्वारा अपनी आँखें सदा स्वर्ग की ओर, और उस अगम्य सामर्थ्य की ओर लगाए रहें, जो अन्तिम दिन हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा प्रकट की जाएगी, ताकि मृत्यु के बीच भी हम यह आशा रखें कि तू हमारा छुड़ानेवाला होगा, और उस छुटकारे का आनन्द उठाएँ जिसे उसने मरे हुओं में से जी उठकर पूरा किया; और इसमें सन्देह न करें कि जो फल उसने तब अपने आत्मा के द्वारा उत्पन्न किया, वह हम तक भी पहुँचेगा, जब स्वयं मसीह जगत का न्याय करने आएगा; और हम तेरे नाम के भय में ऐसे चलें कि सचमुच उसके अंगों में एकत्र किए जाएँ, और उस महिमा के सहभागी बनाए जाएँ जो उसने अपनी मृत्यु के द्वारा हमारे लिए प्राप्त की है। आमीन।
सैंतीसवाँ व्याख्यान
अपने साथ बातें लेकर यहोवा की ओर फिरो, और उससे कहो, सब अधर्म दूर कर, और भलाई ला, और हम तुझे अपने होंठों के बछड़े अर्पित करेंगे। पिछले व्याख्यान में हमने बताया था कि भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएलियों को पश्चाताप का उपदेश देते हुए किस प्रकार की बातें लेने की आज्ञा देता है: क्योंकि वे अब तक बहरे और गूँगे बने रहे थे, इसलिए वह उन्हें आज्ञा देता है कि वे न केवल प्रभु के वचन पर ध्यान दें, वरन् उत्तर देने को भी तत्पर हों, ताकि सुनी हुई शिक्षा और उनके अपने अंगीकार के बीच परस्पर सहमति हो। अब वह अपनी बात स्पष्ट करता और कहता है, सब अधर्म दूर कर, और भलाई ला। ये वे बातें हैं जिनके साथ वह उन्हें परमेश्वर के पास आने की आज्ञा देता है। वह उन्हें वह अंगीकार बोलकर लिखवाता है जिसकी प्रभु माँग करता है।
पहले वह उन्हें पापों की क्षमा और माफ़ी माँगने की आज्ञा देता है; क्योंकि यदि कोई पापी परमेश्वर के अनुग्रह में लौटना चाहे, और फिर भी अपना दोष स्वीकार न करे, तो वह अत्यन्त विचित्र मार्ग अपनाता है। बिलकुल आरम्भ ही ऐसा अंगीकार होना चाहिए जैसा भविष्यद्वक्ता यहाँ वर्णन करता है। क्योंकि इस्राएलियों ने परमेश्वर से अपने पाप क्षमा करने की विनती करके उसी समय यह स्वीकार किया कि वे उसके सम्मुख दोषी हैं; हाँ, उन्होंने अपने आप को दोषी ठहराया ताकि सेंत-मेंत दोषमुक्ति प्राप्त करें। और जो उन्होंने कहा, सब अधर्म दूर कर, वह बलपूर्ण है। इस प्रकार उन्होंने स्वीकार किया कि वे केवल एक ही पाप के नहीं, वरन् अनेक पापों के दोषी हैं, जिनके लिए परमेश्वर उन्हें न्यायपूर्वक दण्ड दे सकता था, यदि वह उन पर कृपालु न होता। संक्षेप में, वे यहाँ अपने विविध और बहुगुणित दोष को स्वीकार करते हैं।
परन्तु वे आगे कहते हैं, भलाई ला। इस वाक्य की व्याख्या सामान्यतः ऐसे की जाती है मानो इस्राएली कहते हों कि वे अब तक भले कामों से बाँझ और खाली रहे थे, परन्तु अब मेल हो जाने पर वे परमेश्वर के उपयोगी और लाभदायक दास होंगे। परन्तु यह अर्थ मुझे इस स्थान के उपयुक्त नहीं जान पड़ता; क्योंकि वह इसके बाद कृतज्ञता का प्रमाण जोड़ता है, हम अपने होंठों के बछड़े अर्पित करेंगे। मुझे सन्देह नहीं कि वह यहाँ परमेश्वर की आशीष की चर्चा करता है, जो पापों की सेंत-मेंत क्षमा से प्रवाहित होती है: क्योंकि परमेश्वर हमें केवल अनुग्रह में ग्रहण ही नहीं करता, वरन् वास्तव में यह भी दिखाता है कि उसने व्यर्थ ही हम से मेल नहीं किया; क्योंकि वह अपनी कृपा से हमें अनुगृहीत करके अपने पितृ-प्रेम के फल भी जोड़ देता है। सो जैसे भविष्यद्वक्ता ने इस्राएलियों को परमेश्वर के सम्मुख बातें लाने की आज्ञा दी, वैसे ही अब वह उन्हें यह प्रार्थना करते हुए प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर भलाई लाए: और पवित्रशास्त्र प्रायः इन दोनों को एक साथ जोड़ता है,—परमेश्वर का वह अनुग्रह, जिसके द्वारा वह सेंत-मेंत पाप क्षमा करता है,—और उसकी वह आशीष, जो वह अपनी सन्तान को अपने पितृ-प्रेम में अपना लेने के बाद प्रदान करता है। इसलिए भलाई ला; अर्थात् “हे प्रभु, पहले हमें अनुग्रह में ग्रहण कर, और फिर वास्तव में, बाहरी उपकारों के द्वारा भी, यह प्रमाणित कर कि तू हम पर कृपालु है।”
अब यह आता है, और हम अपने होंठों के बछड़े अर्पित करेंगे, या चुकाएँगे। इस स्थल में विश्वासयोग्य लोग स्वीकार करते हैं कि जब परमेश्वर ने उदारता से उन्हें सब कुछ प्रदान किया है, तब उनके पास उसे बदले में चुकाने को कुछ भी नहीं, सिवा इसके कि वे अपनी स्तुतियों में उसकी भलाई का गुणगान करेंगे, और स्वीकार करेंगे कि वे सब बातों के लिए उसके ऋणी हैं। अतः यह एक उल्लेखनीय स्थल है; क्योंकि यह मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की भलाई को प्रस्तुत करता है, और फिर यह सिखाता है कि मनुष्य बदले में कोई प्रतिफल नहीं दे सकते, परन्तु केवल ऐसी स्तुतियाँ ला सकते हैं जिनके द्वारा वे परमेश्वर की भलाई का गुणगान करें, और इससे अधिक कुछ नहीं, जैसा भजन संहिता 116 में कहा गया है, ‘यहोवा ने मेरे जितने उपकार किए हैं, उनका बदला मैं उसको क्या दूँ? मैं उद्धार का कटोरा उठाकर यहोवा से प्रार्थना करूँगा।’
वहाँ भी भविष्यद्वक्ता यह साक्षी देता है कि परमेश्वर मनुष्यों के प्रति इसलिए उदार नहीं है कि वह उनसे कुछ पाने की आशा या माँग रखता है, क्योंकि वे दे ही क्या सकते हैं? परन्तु यह कि वह फिर भी धन्यवाद चाहता है, और स्तुतिरूपी बलिदान से सन्तुष्ट रहता है, जैसा हम भजन संहिता 116 में भी कहा हुआ पाते हैं। परन्तु यही बात हम इस स्थल से भी सीखते हैं। वे कहते हैं, हे प्रभु, भलाई ला; अर्थात् “यद्यपि हमने अनेक प्रकार से अपने आप को तेरे न्याय के अधीन कर दिया है, और अपने असंख्य पापों से तेरा क्रोध भड़काया है, तौभी तेरी भलाई हमारे सब अधर्मों से बढ़कर हो; हमें शुद्ध करके वह भलाई भी ला जो अब तक मानो हम से बहुत दूर रही है।” क्योंकि जब तक परमेश्वर अपने क्रोध के चिह्न दिखाता है, तब तक हम उसकी सब आशीषों से वंचित रहते हैं। इसलिए वे परमेश्वर से विनती करते हैं कि उन्हें अनुग्रह में फिर से लौटाकर वह उन पर अपनी कृपा प्रकट करे। और अन्त में वे क्या कहते हैं?
हे प्रभु, हम तुझ से कोई प्रतिफल देने की प्रतिज्ञा नहीं करते, क्योंकि तू कोई प्रतिफल नहीं चाहता, और न कुछ देना हमारे वश में है; परन्तु हम तुझे होंठों के बछड़े अर्पित करेंगे; अर्थात् “हम स्वीकार करेंगे कि हम सब बातों के लिए तेरे ऋणी हैं; क्योंकि जब तू ने हमें सब प्रकार की आशीषों से लाद दिया है, तब केवल स्तुतिरूपी बलिदान ही है जो हम तुझे अर्पित कर सकते हैं।”
और भविष्यद्वक्ता उचित ही उन स्तुतियों को होंठों के बछड़े कहता है जिन्हें परमेश्वर मुख्य बलिदान के रूप में चाहता है; क्योंकि व्यवस्था के अधीन कुछ लोग अपनी मन्नतें पूरी करते समय बछड़े चढ़ाते थे। परन्तु भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि परमेश्वर बाहरी बलिदानों पर ध्यान नहीं देता, परन्तु केवल उन अभ्यासों पर जो मनुष्य दूसरी रीति से करते हैं, अर्थात् धन्यवाद के बलिदानों पर।
तब इस रूपक का अर्थ यही है; मानो वह कहता हो, “जो बछड़े प्रायः चढ़ाए जाते हैं वे सच्चे बलिदान नहीं जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है, वरन् वे यह दिखाने के लिए हैं कि मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति अर्पित करनी चाहिए।” अब हम इस पद का अर्थ समझते हैं। आगे लिखा है—
होशे 14:3
3. अश्शूर हमारा उद्धार न करेगा, हम घोड़ों पर सवार न होंगे; और न हम फिर कभी अपनी बनाई हुई वस्तुओं से कहेंगे, तुम हमारे ईश्वर हो; क्योंकि अनाथ पर तू ही दया करता है।
3. Assur (Assyrius) non servabit nos: super equum non ascendemus, et non dicemus posthac, Dii nostri, operi manuum nostrorum; quia in te misericordiam consequetur pupillus.
यह पद पिछले पद के साथ जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि इस्राएली यहाँ अधिक स्पष्टता और पूर्णता से दिखाते हैं कि उन्होंने किस बात में पाप किया था, और साथ ही अपने पश्चाताप का प्रमाण देते हैं; क्योंकि जब वे कहते हैं, अश्शूर हमारा उद्धार न करेगा, हम घोड़ों पर सवार न होंगे, हम हाथों की बनाई वस्तु से न कहेंगे, तुम हमारे ईश्वर हो, तब इसे इस अंगीकार के रूप में समझना चाहिए कि उन्होंने इन विविध रीतियों से परमेश्वर का प्रतिशोध अपने विरुद्ध भड़काया था; क्योंकि उन्होंने अश्शूरियों से सुरक्षा की आशा रखी थी, इधर-उधर दौड़े थे, और इस प्रकार अपने आप को परमेश्वर से अलग कर लिया था; वे मूर्तियों और प्रतिमाओं की शरण में भी भागे थे, और जो आदर केवल एकमात्र सच्चे परमेश्वर का है उसे गूँगी मूरतों को दे दिया था।
इससे हम देखते हैं कि यद्यपि विश्वासयोग्य लोग भविष्य काल की बात करते हैं, तौभी वे परोक्ष रूप से यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने घोर पाप किया था, एकमात्र सच्चे परमेश्वर को त्याग दिया था, और अपनी आशाएँ दूसरों पर, अर्थात् अश्शूरियों पर या कल्पित देवताओं पर, लगा दी थीं। परन्तु साथ ही वे प्रतिज्ञा करते हैं कि भविष्य में वे भिन्न होंगे; मानो वह कहता हो कि वे न केवल परमेश्वर की स्तुति का गुणगान करके उसके प्रति कृतज्ञ होंगे, वरन् उनके जीवन की रीति भी नई होगी, ताकि वे परमेश्वर की भलाई का दुरुपयोग न करें। यहाँ जो कहा गया है उसका सार यही है।
यह कहकर कि अश्शूर हमारा उद्धार न करेगा, उन्होंने निःसन्देह, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, उस झूठे भरोसे को दोषी ठहराया जिससे वे पहले धोखा खाते थे, जब वे अश्शूरियों के द्वारा छुटकारा ढूँढ़ते थे। इसमें सचमुच कोई सन्देह नहीं कि इस्राएली सदा परमेश्वर के नाम पर भरोसा रखने का दिखावा करते थे; परन्तु अश्शूरियों की सहायता के बिना अपने आप को नष्ट समझकर उन्होंने निश्चय ही परमेश्वर को उसके उचित आदर से वंचित किया, और उससे छीनी हुई लूट से मनुष्यों को सजाया। क्योंकि जब तक हमें यह निश्चय न हो कि केवल परमेश्वर ही हमारे लिए पर्याप्त है, उस समय भी जब सब पार्थिव सहायताएँ हमें छोड़ दें, तब तक हम अपने उद्धार की आशा उस पर नहीं रखते; वरन् इसके विपरीत, जो केवल उसी का है उसे नश्वर मनुष्यों को सौंप देते हैं। इसलिए इस्राएली इस ईश-निन्दक अपहरण के लिए अपने आप को दोषी ठहराते हैं, और साथ ही दिखाते हैं कि उनके पश्चाताप का फल यह होगा कि वे अपना मन परमेश्वर पर लगाएँगे, ताकि वे पहले के समान इधर-उधर खिंचे न जाएँ, और न यह सोचें कि मनुष्यों की सहायता से वे बचाए जा सकते हैं। अतः हम इससे सीखें कि मनुष्य तब तक परमेश्वर की ओर नहीं फिरते जब तक वे सब सृष्ट वस्तुओं से विदा न ले लें, और फिर उन पर अपनी आशाएँ न टिकाएँ। यह एक बात है।
जो आगे आता है, हम घोड़े पर सवार न होंगे, उसकी व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है;—मानो वे कहते हों कि वे अब ऐसे पागल न होंगे कि अपनी ही शक्ति पर घमण्ड करें, या घोड़ों और रथों से भली-भाँति सुसज्जित होने के कारण अपने आप को सुरक्षित समझें;—परन्तु इस वाक्यांश की व्याख्या अधिक सरलता से यों की जा सकती है कि वे पहले के समान अपने लिए सहायक सेनाएँ जुटाने को इधर-उधर न भटकेंगे; सो हम घोड़े पर सवार न होंगे, परन्तु अपने देश में शान्त बने रहेंगे; और यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है। अतः मैं नहीं समझता कि भविष्यद्वक्ता यहाँ कोई नया विचार प्रस्तुत करता है, परन्तु मैं दोनों वाक्यों को एक साथ पढ़ता हूँ, अश्शूर हमारा उद्धार न करेगा, सो हम घोड़े पर सवार न होंगे, अर्थात् इसलिए कि शीघ्रता से सवारी करें; क्योंकि वे पहले लम्बी यात्राओं से अपने आप को थका चुके थे: जैसे ही कोई संकट निकट आता, वे सहायता ढूँढ़ने के लिए दूर अश्शूर को चले जाते थे, जबकि परमेश्वर ने उन्हें शान्त बने रहने की आज्ञा दी थी।
इसका अर्थ उन अन्य स्थलों को देखने से और अच्छी तरह समझ में आएगा जो यहाँ कही गई बात से मेल खाते हैं। परमेश्वर यशायाह के द्वारा कहता है, ‘घोड़ों पर मत चढ़ो; परन्तु तुम ने कहा, हम चढ़ेंगे: तो चढ़ो,’ वह कहता है (यशायाह 30:16)। यहाँ एक स्पष्ट संकेत है कि यहूदी परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध सहायता ढूँढ़ने को सवार होकर दौड़ते थे। वह कहता है, “मैं देखता हूँ कि तुम बड़े तत्पर और फुर्तीले हो: तो चढ़ो, परन्तु यह भागने के लिए होगा।” हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता की इस डाँट का क्या उद्देश्य था; यह दिखाना कि यहूदी, जिन्हें स्थिर और शान्त बने रहना चाहिए था, सहायता ढूँढ़ने के लिए इधर-उधर भागते फिरे। इसी प्रकार इस स्थान पर भी, जब वे अपने पश्चाताप का फल दिखाना चाहते हैं, तब वे कहते हैं, “हम आगे से घोड़े पर सवार न होंगे, क्योंकि प्रभु, जो हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है, किसी दूर रहनेवाले के समान ढूँढ़ा जाने योग्य नहीं: सो हम फिर व्यर्थ अपने आप को न थकाएँगे।” मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता का यही आशय है।
फिर वह आगे कहता है, और हम अपने हाथों की बनाई वस्तु से न कहेंगे, तुम हमारे ईश्वर हो। जैसे उन्होंने मनुष्यों पर रखे हुए अपने झूठे भरोसे की चर्चा की थी, वैसे ही अब वे अपने अन्धविश्वास को दोषी ठहराते हैं। और ये वे दो महामारियाँ हैं जो प्रायः मनुष्यों पर विनाश लाती हैं; क्योंकि अपनी आशा को परमेश्वर से हटा लेने से बढ़कर विनाशकारी कुछ नहीं; और यह दो प्रकार से होता है, या तो जब मनुष्य अपनी ही शक्ति पर भरोसा रखते हैं, या मानवीय सहायताओं पर घमण्ड करते हैं और परमेश्वर को तुच्छ जानते हैं, मानो वे उसके बिना सुरक्षित रह सकते हों,—या जब वे अपने आप को झूठे अन्धविश्वासों के हवाले कर देते हैं। ये दोनों रोग संसार में सदा फैले रहते हैं, जब मनुष्य अपने ही अन्धविश्वासों में उलझ जाते हैं, और अपने लिए नए देवता गढ़ लेते हैं जिनसे वे सुरक्षा की आशा रखते हैं; जैसा हम पोपतन्त्र के अधीन रहनेवालों में होता देखते हैं। उनके यहाँ परमेश्वर का लगभग कोई मूल्य नहीं, मसीह पर्याप्त नहीं। क्योंकि ऐसा क्यों है कि वे अपने लिए इतने संरक्षक गढ़ लेते हैं, इतनी रक्षाएँ कल्पित कर लेते हैं, सिवा इसके कि वे परमेश्वर की सहायता को तुच्छ जानते हैं, या उसे इतना घटा देते हैं कि उससे उद्धार की आशा रखने का साहस नहीं करते? इससे हम देखते हैं कि अन्धविश्वास मनुष्यों को परमेश्वर से दूर खींच ले जाता है, और इस प्रकार घोरतम विनाश का कारण बनता है। परन्तु कुछ ऐसे भी हैं जो इस प्रकार अन्धविश्वासों के हवाले नहीं होते, परन्तु अपनी ही वीरता या बुद्धि से आशा प्राप्त करते हैं; क्योंकि इस संसार की सन्तान अपनी ही शक्ति से फूल जाती है; और जब राजाओं की सेनाएँ तैयार होती हैं, जब उन्होंने नगरों को दृढ़ कर लिया होता है, जब उनके पास धन की बहुतायत होती है, जब वे अनेक सन्धियों से दृढ़ किए गए होते हैं, तब वे झूठे भरोसे से अन्धे हो जाते हैं। सो यह पद हमें सिखाता है कि ये दो विनाशकारी महामारियाँ हैं, जो प्रायः मनुष्यों को सच्ची सुरक्षा से दूर खींच ले जाती हैं; और यदि हम हृदय से सच्चा पश्चाताप करना चाहते हैं, तो हमें अपने मनों को इन दोनों बुराइयों से शुद्ध करना होगा, ताकि हम न तो अपनी शक्ति को या पार्थिव सहायताओं को कुछ श्रेय दें, न परमेश्वर के स्थान पर कोई मूर्ति गढ़ें, परन्तु यह निश्चय जानें कि केवल परमेश्वर ही हमारे लिए पर्याप्त सहायता है।
परन्तु आगे लिखा है, क्योंकि अनाथ तुझ में दया पाएगा। यहाँ इस्राएली दिखाते हैं कि यह आवश्यक है कि हम नीचे किए जाएँ ताकि केवल परमेश्वर पर निर्भर बने रहें; क्योंकि अनाथों से उनकी तुलना की गई है जो इतने दीन किए गए हैं कि वे सब व्यर्थ आशाएँ फेंक देते हैं, और अपनी नग्नता और दरिद्रता के बोध के साथ केवल परमेश्वर पर टिकते हैं। इसलिए, कि परमेश्वर की दया को हम तक पहुँचने का मार्ग खुला मिले, हमें अनाथ बनना होगा। इस रूपक का अर्थ हमें भली-भाँति ज्ञात है। हम जानते हैं कि अनाथ पहले तो सहायता से, और दूसरे बुद्धि से वंचित होते हैं; और वे बल से भी रहित होते हैं। तब वे दूसरे की सहायता पर निर्भर होते हैं, और उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है; संक्षेप में, उनकी सुरक्षा दूसरों की सहायता पर निर्भर होती है। इसी प्रकार हम भी सचमुच अनाथ हैं, जब हम न अपनी चतुराई पर भरोसा रखते हैं, न अपनी शक्ति पर टिकते हैं, न यह सोचते हैं कि पृथ्वी से आनेवाली सहायताओं के द्वारा हम सुरक्षित रह सकते हैं, परन्तु अपनी सब आशाएँ और चिन्ताएँ केवल परमेश्वर पर डाल देते हैं। यह एक बात है। सो अनाथ तुझ में दया पाएगा; अर्थात् “हे प्रभु, जब तू हमें इतना दुःख देता है कि हम पूर्णतः गिरा दिए जाते हैं, तब हम तुझ में दया पाएँगे; और यह दया हमारे लिए पर्याप्त होगी, ताकि हम फिर न भटकें और न झूठी युक्तियों के द्वारा बहकाए जाएँ, जैसा अब तक हमारे साथ होता आया है।” अतः जब वे कहते हैं कि अनाथ परमेश्वर में दया पाएगा, तब उनका अर्थ यह है कि प्रभु के द्वारा दिया गया अनुग्रह पर्याप्त होगा, ताकि फिर किसी और से सहायता माँगने की आवश्यकता न रहे। अब हम समझते हैं कि इस पद में भविष्यद्वक्ता का क्या आशय है। आगे लिखा है—
होशे 14:4
4. मैं उनकी भटक जाने की आदत को दूर करूँगा; मैं सेंतमेंत उन से प्रेम करूँगा, क्योंकि मेरा क्रोध उन पर से उतर गया है।
4. Sanabo defectiones eorum, diligam eos sponte (vel, liberaliter;) quia aversus est furor meus ab eo.
परमेश्वर यहाँ उस बात की पुष्टि करता है जो हमने उसके सेंत-मेंत मेल-मिलाप के विषय में देखी है, और यह दोहराव व्यर्थ नहीं; क्योंकि जैसे मनुष्य व्यर्थ और झूठी आशाएँ पालने की ओर झुके रहते हैं, वैसे ही उन्हें एकमात्र परमेश्वर पर निर्भर बनाए रखने, और उनके मनों को ऐसा शान्त करने से कि वे व्याकुल न हों और न कुढ़ें, बढ़कर कठिन कुछ नहीं, जैसा अनुभव हम सब को सिखाता है। क्योंकि जब हम सेंत-मेंत क्षमा की प्रतिज्ञाओं को ग्रहण करते हैं, तब हमारा शरीर हमें सदा अविश्वास की ओर ले जाता है, और हम विविध कल्पनाओं से सताए जाते हैं। “क्या! क्या तू निश्चय के साथ अपने आप से यह प्रतिज्ञा कर सकता है या करने का साहस कर सकता है कि परमेश्वर तुझ पर कृपालु होगा, जबकि तू जानता है कि अनेक कारणों से वह तुझ पर न्यायपूर्वक क्रुद्ध है?” अतः चूँकि हम अविश्वास को आश्रय देने की ओर इतने झुके हुए हैं, इसलिए भविष्यद्वक्ता फिर उस सत्य की पुष्टि करता है जिसे हम पहले देख चुके हैं, अर्थात् यह कि परमेश्वर मेल करने को तैयार है, और वह अपनी प्रजा को ग्रहण करने और गले लगाने से बढ़कर और कुछ नहीं चाहता।
इसलिए वह कहता है, मैं उनके विद्रोहों को चंगा करूँगा। चंगा करने का मार्ग सेंत-मेंत क्षमा है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा हमें नया जन्म देकर हमारे विद्रोह को चंगा करता है, अर्थात् हमें आज्ञाकारिता के अधीन करता है, और हमारी उन भ्रष्टताओं को हम से दूर करता है जो हमें पाप की ओर उकसाती हैं; तौभी इस स्थान पर भविष्यद्वक्ता निःसन्देह परमेश्वर के व्यक्तित्व में यह घोषित करता है कि इस्राएली अपने विद्रोहों से बचाए जाएँगे, ताकि वे न्याय में उनके विरुद्ध न आएँ, और न उनके लेखे में गिने जाएँ। अतः हम जान लें कि हमारे पापों को चंगा करते समय परमेश्वर दो प्रकार से वैद्य है: वह अपने आत्मा के द्वारा हमें शुद्ध करता है, और वह हमारे सब अपराधों को मिटा देता और गाड़ देता है। परन्तु भविष्यद्वक्ता अब दूसरे प्रकार की चंगाई की चर्चा करता है, जब वह कहता है, मैं उनके फिर जाने को चंगा करूँगा: और वह एक प्रबल शब्द का प्रयोग करता है, क्योंकि वह कह सकता था, “तुम्हारे दोष या भूलें,” परन्तु वह कहता है, “परमेश्वर से तुम्हारे विद्रोह;” मानो वह कहता हो, “यद्यपि उन्होंने ऐसा घोर पाप किया है कि अपने अपराधों के द्वारा वे सौ मृत्युओं के योग्य ठहरे हैं, तौभी मैं उन्हें उनके इन जघन्य पापों से चंगा करूँगा, और मैं सेंत-मेंत उनसे प्रेम करूँगा।”
शब्द {,}נדבהnudebe की व्याख्या या तो सेंत-मेंत या उदारता से की जा सकती है। तब, मैं उदारता से उनसे प्रेम करूँगा, अर्थात् उमड़ते हुए और असाधारण प्रेम से; या मैं सेंत-मेंत, अर्थात् बिना मूल्य, उनसे प्रेम करूँगा। परन्तु जो लोग इन शब्दों का अनुवाद यों करते हैं, “मैं अपनी ही इच्छा से उनसे प्रेम करूँगा,” अर्थात् किसी विवशता से नहीं, वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को बिगाड़ देते हैं; क्योंकि यह कथन कितना नीरस है कि परमेश्वर हम से प्रेम करने को विवश नहीं किया जाता; और इससे क्या अर्थ निकाला जा सकता है? परन्तु प्रभु के विषय में यह कहा गया है कि वह सेंत-मेंत हम से प्रेम करता है, क्योंकि वह हम में प्रेम का कोई कारण नहीं पाता, क्योंकि हम इस योग्य नहीं कि किसी अनुग्रह के साथ हम पर दृष्टि की जाए या हमारा ध्यान रखा जाए; परन्तु अयोग्यों पर अपना प्रेम प्रकट करने के इसी कार्य में वह अपने आप को उदार और परोपकारी दिखाता है।
अतः हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अर्थ यह है कि यद्यपि इस्राएलियों ने अनेक प्रकार से परमेश्वर का क्रोध भड़काया था, और मानो जान-बूझकर नष्ट होना चाहा था, और चाहा था कि वह उन पर क्रुद्ध हो; तौभी प्रभु उन पर कृपालु होने की प्रतिज्ञा करता है। किस प्रकार? इसी प्रकार कि जब वह इस रीति से उन्हें सेंत-मेंत गले लगाएगा, तब वह अपनी उदारता का प्रमाण देगा। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार हमारा पिता बनता है, और हमें अपनी सन्तान मानता है, अर्थात् जब वह हमारे पापों को मिटा देता है, और जब वह सेंत-मेंत हमें अपने प्रेम के आनन्द में सम्मिलित करता है। और इस सत्य पर सावधानी से ध्यान देना चाहिए; क्योंकि संसार सदा यह कल्पना करता है कि लोग परमेश्वर के पास आकर कुछ ऐसा लाते हैं जिससे वे उसे अपने से प्रेम करने के लिए मोड़ या झुका सकें। इस व्यर्थ कल्पना से बढ़कर हमारे उद्धार का शत्रु और कुछ नहीं हो सकता।
अतः हम इस स्थल से सीखें कि परमेश्वर हमारा वैद्य बनकर और हमारे अपराधों को चंगा करके ही हमारा पिता हो सकता है, अन्यथा नहीं। परन्तु क्रम भी उल्लेखनीय है, क्योंकि परमेश्वर प्रेम को चंगाई के बाद रखता है। क्यों? क्योंकि वह धर्मी है, इसलिए यह अवश्य है कि जब तक वह पापों को लेखे में गिनता है, तब तक वह हमें घृणा की दृष्टि से देखे। अतः प्रेम का आरम्भ तब होता है जब वह हमें हमारी बुराइयों से शुद्ध करता है, और हमारे कलंकों को पोंछ डालता है।
इसलिए जब यह पूछा जाता है कि परमेश्वर मनुष्यों से कैसे प्रेम करता है, तो उत्तर यह है कि वह सेंत-मेंत क्षमा के द्वारा उनसे प्रेम करना आरम्भ करता है; क्योंकि जब तक परमेश्वर पापों को लेखे में गिनता है, तब तक यह अवश्य है कि मनुष्य उसकी घृणा के पात्र हों। अतः वह हम से प्रेम करना तब आरम्भ करता है, जब वह हमारे रोगों को चंगा करता है।
यह अकारण नहीं कि वह आगे कहता है कि परमेश्वर का प्रकोप इस्राएल पर से हट गया है। क्योंकि भविष्यद्वक्ता ने इसे इस अभिप्राय से जोड़ा कि यह उसकी शिक्षा की पुष्टि करनेवाली मुहर हो; क्योंकि जब मनुष्य सुनते हैं कि परमेश्वर उन पर कृपालु है, तब वे सदा अपने आप से विवाद करते हैं। “यह क्या है कि वह तेरी दुर्बलताओं को चंगा करता है? क्योंकि अब तक तू ने उसे अपने ऊपर क्रुद्ध पाया है, फिर अब तुझे कैसे निश्चय हो गया कि उसका क्रोध शान्त हो गया है?” इसलिए भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के प्रेम के विषय में अपनी साक्षी पर मुहर लगाता है, जब वह कहता है कि उसका क्रोध अब थम गया है। सो मेरा प्रकोप हट गया है। “यद्यपि अब तक मैंने अनेक प्रमाणों के द्वारा तुझ पर अपना क्रोध प्रकट किया है, तौभी अब मैं बदले हुए के समान तेरे पास आता हूँ। अतः बीते हुए समय के अनुसार मेरा न्याय न कर, क्योंकि अब मैं तेरे प्रति शान्त हो गया हूँ, और मेरा प्रकोप तुझ पर से हट गया है।” आगे लिखा है—
होशे 14:5
5. मैं इस्राएल के लिये ओस के समान होऊँगा; वह सोसन के समान फूले फलेगा, और लबानोन के समान जड़ फैलाएगा।
5. Ego quasi ros Israeli; florebit quasi lilium (alii vertunt, rosam:) figet radices suas quasi Libanus (vel, quasi Libani.)
भविष्यद्वक्ता अब फिर वही दोहराता है जो वह कह चुका था, कि परमेश्वर प्रजा को अनुग्रह में फिर से लौटाने के बाद ऐसा उपकारी होगा कि मेल-मिलाप का फल प्रत्यक्ष हो जाएगा। जब इस्राएली दुःख में डाले गए थे, तब उन्हें इसका कारण अपने ही पापों को मानना चाहिए था, उन्हें ऐसे प्रमाणों से परमेश्वर का क्रोध पहचानना चाहिए था।
परन्तु वे ऐसे मूढ़ हो गए थे कि इसके विपरीत यह कल्पना करते थे कि उनकी विपत्तियाँ संयोग से उन पर आ पड़ी हैं। भविष्यद्वक्ता इस सत्य को सिखाने में बहुत लगा रहा था कि जब तक इस्राएली परमेश्वर की ओर न फिरें तब तक वे सदा दुखी रहेंगे, और यह भी कि जब तक वे क्षमा न पाएँ तब तक उनके सब काम अभागे रहेंगे। अब वह एक परिवर्तन की चर्चा करता है, कि परमेश्वर केवल वचनों से ही अपने आप को उन पर कृपालु न दिखाएगा, वरन् ऐसा प्रमाण भी देगा जिससे इस्राएली जान लें कि वे अब धन्य हैं, क्योंकि उनका परमेश्वर से मेल हो गया है; क्योंकि उसकी आशीष उसके सेंत-मेंत प्रेम का फल होगी। अतः इस वाक्य, मैं इस्राएल के लिए ओस के समान होऊँगा, को इसी प्रकार जोड़ना चाहिए: वह संकेत करता है कि वे पहले सूखे थे, क्योंकि वे परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रहे थे। वह उनकी तुलना गुलाब या सोसन से करता है: क्योंकि जब खेत या चरागाह सूर्य की गर्मी से झुलस जाते हैं, और आकाश से कोई ओस नहीं टपकती, तब सब वस्तुएँ मुरझा जाती हैं। तब सोसन और गुलाब कैसे फूल सकते हैं, जब तक वे आकाश से नमी न पाएँ, और ओस भूमि को ताज़ा न करे कि वे अपना बल प्रकट करें? अतः इस उपमा का कारण यह है कि जब परमेश्वर अपना अनुग्रह हटा लेता है, तब मनुष्य सूखे और सब प्रकार के ओज से रहित हो जाते हैं। क्यों? क्योंकि परमेश्वर को, मानो, ओस टपकानी ही होगी, नहीं तो, जैसा कहा जा चुका है, हम पूर्णतः बाँझ और सूखे हो जाते हैं। सो मैं इस्राएल के लिए ओस के समान होऊँगा।
और आगे, वह सोसन के समान फूलेगा, और अपनी जड़ें फैलाएगा। कुछ लोग {,}ויךvaic का अनुवाद “और वह मारेगा” करते हैं; और {,}נכהnuke का अर्थ मारना है। अन्य लोग इन शब्दों का अनुवाद करते हैं, “उसकी डालियाँ फैलेंगी:” परन्तु क्रिया एकवचन में है, और संज्ञा, “जड़ें,” बहुवचन में है। अतः भविष्यद्वक्ता इस्राएल के विषय में कहता है कि वह अपनी जड़ें मारता है; परन्तु उसका आशय लाक्षणिक अर्थ में गाड़ना है: सो वह अपनी जड़ें गाड़ेगा। जैसे जब हम मारते हैं तो प्रहार करते हैं और अपनी भुजाएँ फैलाते हैं; वैसे ही वह लबानोन के समान अपनी जड़ें फैलाएगा। यह परमेश्वर के अनुग्रह और आशीष का दूसरा परिणाम है; जिसका अर्थ यह है कि प्रजा का सुख चिरस्थायी होगा। गुलाब या सोसन के विषय में रूपक का अर्थ यह है कि परमेश्वर इस्राएलियों को, यद्यपि वे मृतकों के समान थे, अचानक और मानो एक क्षण में जीवित कर देगा। जैसे एक ही रात में सोसन उग आता है, और अनपेक्षित रूप से गुलाब भी; वैसे ही इस रूपक के द्वारा सूचित परिवर्तन अचानक होगा। परन्तु चूँकि सोसन और गुलाब शीघ्र मुरझा जाते हैं, इसलिए इस्राएल से केवल यह प्रतिज्ञा करना पर्याप्त न था कि उनका उद्धार अचानक आएगा; परन्तु यह दूसरा वाक्यांश जोड़ना आवश्यक था,—कि यद्यपि वे सोसनों और गुलाबों के समान होंगे, तौभी वे उन ऊँचे वृक्षों के समान भी होंगे जिनकी जड़ें भूमि में गहरी होती हैं, जिनके द्वारा वे दृढ़ बने रहते हैं और दीर्घ काल तक फलते-फूलते हैं।
अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं। वह यहाँ इस्राएलियों के सम्बन्ध में परमेश्वर की आशीष के दोहरे परिणाम का उल्लेख करता है,—कि जैसे ही परमेश्वर ओस के समान अपना अनुग्रह उन पर टपकाएगा, उनकी पुनःस्थापना अचानक होगी, और यह भी कि यह सुख मुरझानेवाला नहीं, वरन् टिकाऊ और स्थायी होगा। और इन शब्दों का अनुवाद लबानोन के समान, या लबानोन के वृक्षों के समान किया जा सकता है: लबानोन के समान वह अपनी जड़ें फैलाएगा, अर्थात् वहाँ उगनेवाले वृक्षों के समान; या, वह लबानोन में खड़े वृक्षों के समान अपनी जड़ें फैलाएगा। परन्तु अर्थ की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं। आगे लिखा है—
होशे 14:6-7
6. उसकी डालियाँ फैलेंगी; उसकी शोभा जैतून की सी, और उसकी सुगन्ध लबानोन की सी होगी।
6. Ibunt rami ejus, et erit quasi olivae decor ejus, et odor ei quasi Libani.
7. जो उसकी छाया में बसते हैं वे लौट आएँगे; वे अन्न के समान फिर जी उठेंगे, और दाखलता के समान बढ़ेंगे; उसकी सुगन्ध लबानोन के दाखमधु की सी होगी।
7. Revertentur incolae umbrae ejus (qui habitant sub ejus umbra) et se vivificabunt tritico (vel, quasi triticum,) et germinabunt tanquam vitis: odor ejus (alii vertunt, Memoriam; sed male; nam {,}זכרsaicar, proprie memoriam significat, a verbo est Recordari; sed metaphorice etiam Hebraei odorem vocant memoriam; quia etiamsi res non videtur, tamen diffundit suam fragrantiam: odor igitur ejus tanquam vini Libani.
भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, परन्तु वह पहले पद के आरम्भ को पिछले पद के दूसरे वाक्यांश के साथ जोड़ता है। उसने कहा था कि जब परमेश्वर लोगों को फिर से बहाल करेगा, तब उनकी जड़ें गहरी होंगी। अब वह जोड़ता है कि उनकी डालियाँ आगे बढ़ेंगी। यहाँ वह “आगे बढ़ने” की बात रूपक के रूप में दूर तक फैलने के अर्थ में करता है; क्योंकि वृक्षों की डालियाँ जब दूर-दूर तक फैलती और विस्तार पाती हैं, तब वे मानो आगे बढ़ती हुई जान पड़ती हैं। सो उसकी डालियाँ आगे बढ़ेंगी; जिसका अर्थ यह है कि वृक्ष जड़ पकड़ लेने के बाद उसी दशा में नहीं रहता, परन्तु बढ़ता है और अपनी डालियाँ चारों ओर फैलाता है। संक्षेप में, परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि जब वह एक बार इस्राएल के लोगों पर अपनी उदारता प्रकट करना आरम्भ कर देगा, तब उसकी आशीष में प्रतिदिन वृद्धि होगी। “मैं आरम्भ ही में उदार रहूँगा; और इससे बढ़कर,” वह कहता है, “समय बीतने के साथ मेरी आशीष बढ़ेगी और बहुगुणित होगी।”
फिर वह जोड़ता है, उसकी शोभा जैतून के समान होगी। भविष्यद्वक्ता एक के बाद एक उपमाएँ इकट्ठी करता है, ताकि वह लोगों को और भी पूरी रीति से दृढ़ करे। और हम निश्चय ही देखते हैं कि जब मनुष्य इस या उस ओर से समृद्धि की बाट जोहते हैं, तब उनके मन शिथिल हो जाते हैं; क्योंकि सौ में से कठिनता से एक भी ऐसा है जो पूरी रीति से इस बात का निश्चय रखता हो कि जब परमेश्वर कृपालु होता है, तब सब बातें भली और सुखद रीति से सम्पन्न होती हैं: क्योंकि जब मनुष्य अपना भला चाहते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान नहीं देते, परन्तु सारे संसार में इधर-उधर भटकते फिरते हैं; और कभी वे अपने आप से समृद्धि खोजते हैं, कभी पृथ्वी से, कभी आकाश से, और कभी समुद्र से। सो जब मनुष्यों के हृदयों पर यह सत्य पूरी रीति से अंकित करना इतना कठिन है कि परमेश्वर का प्रेम ही सब आशीषों का सोता है, तब भविष्यद्वक्ता ने अपनी शिक्षा को दृढ़ करने के लिए अनेक उपमाएँ एकत्र की हैं। तब वह कहता है, उसकी शोभा जैतून के समान होगी; और फिर, उसकी सुगन्ध लबानोन की सी होगी: और हम जानते हैं कि लबानोन पर्वत पर सुगन्धित वृक्ष उगते हैं।
परन्तु इन विविध उपमाओं के द्वारा भविष्यद्वक्ता यह दिखाता है कि ज्योंही परमेश्वर लोगों को अपने अनुग्रह में ग्रहण कर लेगा, त्योंही उनकी दशा समृद्ध और सुखी हो जाएगी।
फिर वह जोड़ता है, उसकी छाया के नीचे बसनेवाले लौट आएँगे; परन्तु इसे मैं कल तक के लिए स्थगित करता हूँ।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे हम उसी क्षण दयनीय हो जाते हैं जिस क्षण तू अपना अनुग्रह हम से हटा लेता है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम इस निश्चय को गहराई से अनुभव करें, और इस प्रकार तेरे सम्मुख दीन बनना और अपने आप से घृणा करना सीखें, और इस बीच हम उन प्रलोभनों के द्वारा अपने आप को धोखा न दें जो सामान्यतः प्रबल रहते हैं, कि हम अपनी आशा सृष्ट वस्तुओं पर या इस संसार पर रखें, परन्तु अपने मनों को ऊपर तेरी ओर उठाएँ, और अपने हृदय तुझ पर स्थिर करें, और कभी सन्देह न करें, वरन् निश्चय जानें कि जब तू हमें अपने पितृवत् प्रेम से गले लगाता है, तब हमें किसी बात की घटी न होगी। और इस बीच हम विनती करते हुए तेरी दया की शरण में भागें, और सच्चे और निष्कपट अंगीकार के साथ यह मान लें कि हमारा एकमात्र आश्रय यही है — कि तू हमें अपने अनुग्रह में ग्रहण करने और हमारे पापों को मिटा देने की कृपा करे, जिनमें हम न केवल प्रतिदिन गिरते हैं, वरन् जिनके कारण हम अनन्त मृत्यु के योग्य भी ठहरते हैं, ताकि हम तेरी सेंतमेंत क्षमा के द्वारा प्रतिदिन उठते रहें, जब तक कि अन्त में हमारा उद्धारकर्ता, तेरा पुत्र मसीह, स्वर्ग से हम पर प्रकट न हो। आमीन।
अड़तीसवाँ व्याख्यान
उसकी छाया के नीचे बसनेवाले लौट आएँगे, (शब्दशः यही है;) वे अन्न से अपने आप को फिर जीवित करेंगे, (या, अन्न के समान फिर जी उठेंगे;) वे दाखलता के समान बढ़ेंगे: उसकी सुगन्ध लबानोन के दाखमधु की सी होगी। भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, कि परमेश्वर अपनी प्रजा के प्रति अपने आप को उदार दिखाएगा, ताकि उनकी बदली हुई दशा से स्पष्ट प्रकट हो जाए कि उन्होंने पहले न्यायोचित दण्ड भोगा था। और वह कहता है, उसकी छाया के नीचे बसनेवाले लौट आएँगे। परन्तु {,}ישבוishibu क्रिया का इस स्थान में ठीक अर्थ है “ताज़गी पाना,” जैसा कि भजन संहिता 19 में है, जहाँ परमेश्वर की व्यवस्था के विषय में कहा गया है कि वह {,}משיבתmeshibet है, अर्थात् प्राण को फेर लानेवाली; जिसका अर्थ वही है जो प्राण को ताज़ा करना या बहाल करना है। सो भविष्यद्वक्ता संकेत करता है कि जब इस्राएली फिर से फलने-फूलने लगेंगे, तब उनकी छाया जीवनदायिनी होगी, ऐसी जो उसके नीचे लेटे हुओं को बहाल करे और ताज़गी दे। “उसकी छाया के नीचे बसनेवाले” से वह उन सब को अभिप्रेत करता है जो प्रजा में सम्मिलित हैं; और वह इस्राएल की प्रजा की सामान्य दशा की तुलना पत्तों से भरे एक ऐसे वृक्ष से करता है जो अपनी डालियाँ दूर-दूर तक फैलाता है, जिससे जो उसकी छाया में शरण लेते हैं वे सूर्य की तपन से बचे रहते हैं। अब हम इस रूपक का अभिप्राय देखते हैं, और यह भी कि {,}ישבוishibu क्रिया से भविष्यद्वक्ता का क्या आशय है।
फिर वह जोड़ता है, वे अन्न से अपने आप को जीवित करेंगे, या, अन्न के समान फिर जी उठेंगे। यदि हम इस शब्द को कर्ता कारक में पढ़ें, तो {,}כcaph उपसर्ग को अध्याहृत समझना होगा।
कुछ लोग अपादान कारक को अधिक उचित मानते हैं, “वे अन्न से अपने आप को जीवित करेंगे।” परन्तु पहला अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है; क्योंकि, जैसा मैंने कल कहा था, भविष्यद्वक्ता चूँकि एक ऐसे सत्य को प्रस्तुत कर रहा है जिस पर विश्वास करना कठिन है, इसी कारण वह ऐसी उपमाएँ एक के बाद एक इकट्ठी करता है जो उसकी पुष्टि का काम दें। इसलिए वे अन्न के समान फिर जी उठेंगे; अर्थात् वे बढ़ेंगे। जैसे हम जानते हैं कि एक ही दाने से अनेक डंठल निकलते हैं; वैसे ही, चूँकि भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के अनुग्रह में फिर से बहाल होने के बाद प्रजा की वृद्धि के विषय में बोल रहा है, वह कहता है कि वे अन्न के समान बढ़ेंगे।
परन्तु वह जोड़ता है, वे दाखलता के समान अंकुरित होंगे। यह उपमा उस बात को दृढ़ करती है जो मैंने अभी कही है, कि प्रजा की तुलना वृक्षों से भी, अन्न से भी, और दाखलताओं से भी की गई है। और बसनेवालों के विषय में जो कहा गया है वह विचित्र नहीं लगना चाहिए, क्योंकि वह और भी पूरी रीति से यह व्यक्त करना चाहता था कि यह सामान्य लाभ किस प्रकार आएगा, अर्थात् हर एक जन तक।
फिर वह जोड़ता है, उसकी सुगन्ध लबानोन के दाखमधु की सी होगी; अर्थात् जब वे दाखलता के समान अंकुरित होंगे, तब वे साधारण या खट्टा दाखमधु उत्पन्न न करेंगे, परन्तु सबसे मधुर दाखमधु, जैसा लबानोन पर्वत पर बनता है, और जिसकी सुगन्ध सर्वोत्तम होती है। परन्तु भविष्यद्वक्ता का आशय इसके सिवा और कुछ नहीं कि जब इस्राएली अपने अन्धविश्वासों और अन्य दुर्गुणों से फिर जाएँगे, और अपने आप को पूर्णतः परमेश्वर के शासन के अधीन सौंप देंगे, तब वे सुखी होंगे, और उनकी दशा समृद्ध और आनन्दमय होगी। यही अर्थ है। अब हम आगे बढ़ें —
होशे 14:8
8. एप्रैम कहेगा, अब मूरतों से मेरा और क्या काम? मैंने उसकी सुनी है, और उस पर दृष्टि की है: मैं हरे सनौवर के समान हूँ। मुझ ही से तेरा फल पाया जाता है।
8. Ephraim, quid mihi adhuc cum idolis? 100 Ego respondi et respexi eum (vel, exaudivi:) Ego tanquam abies frondosa: a me fructus tuus inventus est.
भविष्यद्वक्ता फिर से इस्राएलियों को पहले की नाईं बोलते हुए प्रस्तुत करता है, कि वे अपने अन्धेपन और मूर्खता पर विलाप करेंगे, और भविष्य में अपने अन्धविश्वासों को त्याग देंगे। अतः जिस अंगीकार पर हम पहले ध्यान दे चुके हैं, वही यहाँ दोहराया गया है; और यह सच्चे पश्चाताप की गवाही है, जब मनुष्य लज्जित होकर अपने पापों के कारण अपने आप से अप्रसन्न होते हैं, और अपने मन को परमेश्वर की सेवा में लगाते हैं, और अपने सारे पिछले जीवन से घृणा करते हैं। भविष्यद्वक्ता अब जो कहता है वह इसी विषय से सम्बन्ध रखता है। यह एक संक्षिप्त वचन है; तौभी उसकी संक्षिप्तता में कुछ भी अस्पष्ट नहीं है। वह कहता है, एप्रैम, मूरतों से मेरा क्या काम? वास्तव में यहाँ एक क्रिया अध्याहृत है, ‘एप्रैम “कहेगा,” मूरतों से मेरा क्या काम?’ परन्तु तौभी भविष्यद्वक्ता का आशय पर्याप्त रूप से स्पष्ट है। तो जैसा मैंने कहा है, इन शब्दों में एक सच्चा अंगीकार है; क्योंकि दसों गोत्र अपनी उस मूर्खता के प्रति घृणा प्रकट करते हैं, कि उन्होंने अपने आप को सच्चे परमेश्वर से अलग कर लिया था, और झूठे और घिनौने अन्धविश्वासों में उलझ गए थे: इसलिए वे कहते हैं, मूरतों से हमारा क्या काम? और जब वे अब और जोड़ते हैं, तब वे अंगीकार करते हैं कि उनका पिछला जीवन भ्रष्ट और दुराचारी था: साथ ही वे अपने पश्चाताप की घोषणा करते हैं, जब वे कहते हैं कि अब उन्हें कल्पित देवताओं से और कुछ लेना-देना न होगा।
इसका कारण आगे आता है, क्योंकि परमेश्वर इस्राएल की सुनेगा और उस पर दृष्टि करेगा, यहाँ तक कि उसके लिए एक छायादार वृक्ष बन जाएगा। कुछ लोग इसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की हो कि जब इस्राएली अपना पश्चाताप प्रकट कर देंगे, तब वह उन पर कृपालु होगा। परन्तु वे भविष्यद्वक्ता के अर्थ को विकृत करते हैं; क्योंकि इसके विपरीत वह कहता है कि जब इस्राएली यह समझ लेंगे, और परिणाम से भी यह जान लेंगे कि परमेश्वर उन पर कृपालु है, तब वे कहेंगे, “जब हम मूरतों के पीछे चलते थे, तब हम कितने मूर्ख और उन्मत्त थे! तो अब समय है कि हमारे प्राण परमेश्वर पर टिकें।” क्यों? “क्योंकि हम देखते हैं कि उसकी रक्षा और शरण में जीने से बढ़कर हमारे लिए और कुछ भला नहीं है; क्योंकि वह हमारी सुनता है, वह हम पर ध्यान देता है, वह हमारे लिए एक छायादार वृक्ष के समान है, यहाँ तक कि वह अपनी छाया के नीचे हमारी रक्षा करता है।” अब हम समझते हैं कि ये दोनों वाक्यांश आपस में किस प्रकार जुड़े हुए हैं; क्योंकि परमेश्वर यह कारण दिखाता है कि एप्रैम अपनी मूरतों को क्यों त्याग देगा, क्योंकि वह समझ जाएगा कि जब तक वह अपनी मूरतों के पीछे भटकता रहा, तब तक वह बुरी रीति से धोखा खाता रहा। वह यह कैसे समझेगा? क्योंकि वह देखेगा कि अब प्रभु उस पर अनुग्रह करता है, और पहले वह उसकी सहायता से वंचित था।
तो जब परमेश्वर अपनी प्रजा को ऐसा प्रमाण देगा, तब वह साथ ही यह प्रभाव भी उत्पन्न करेगा कि वे सब झूठे भरोसों को फेंक देंगे, और अंगीकार करेंगे कि जब तक वे मूरतों से लिपटे रहे, तब तक वे दुखी और अभागे थे। इसलिए वह कहता है, मैंने उसकी सुनी है और उस पर अनुग्रह किया है। तो जो भविष्यद्वक्ता के शब्दों में बाद में आता है, वह वास्तव में पहले है; वस्तुओं के क्रम में यह वाक्यांश इस वाक्यांश से पहले आता है, एप्रैम कहेगा, मूरतों से मेरा क्या काम?
यह कहते हुए कि मैं छायादार सनौवर के समान होऊँगा, और साथ ही यह जोड़ते हुए कि मुझ ही से तेरा फल पाया जाता है, ये दोनों उपमाएँ परस्पर मेल खाती हुई नहीं जान पड़तीं; क्योंकि, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, सनौवर कोई फल नहीं देता। तो फल का उल्लेख क्यों किया गया है? उत्तर यह है कि ये दोनों उपमाएँ आपस में जुड़ी हुई नहीं हैं। क्योंकि जब परमेश्वर अपनी तुलना सनौवर से करता है, तब वह केवल संरक्षण की बात करता है: और हम जानते हैं कि जब कोई शीतल छाया खोजता है, तो वह उसे सनौवर के नीचे पा सकता है; इसके अतिरिक्त, जैसा हम सब जानते हैं, जब दूसरे वृक्षों के पत्ते झड़ जाते हैं, तब भी वह सदा हरा रहता है; और फिर, उसकी ऊँचाई और घनापन अच्छी छाया देते हैं। तो परमेश्वर अपनी प्रजा के लिए सनौवर के समान होने की प्रतिज्ञा इसी कारण करता है, क्योंकि जितने उसकी छाया के नीचे भागकर आएँगे वे सब तपन से बचाए जाएँगे। परन्तु दूसरी उपमा का, कि परमेश्वर अपनी प्रजा को फल प्रदान करेगा, अर्थ भिन्न है। भविष्यद्वक्ता ने पहले कहा था कि इस्राएली एक ऐसे वृक्ष के समान होंगे जो अपनी जड़ें भूमि में गहरी जमाता है। अब वह वृक्ष का नाम परमेश्वर पर लागू करता है। ये दोनों बातें सत्य हैं; क्योंकि जब परमेश्वर हमें फलवन्त बनाता है, तब हम सर्वोत्तम दाखलता में लगाई हुई डालियाँ होते हैं; और यह भी सत्य है कि हमारे पास जो कुछ फल है वह सब उसी से है; क्योंकि यदि परमेश्वर हमें नमी, वरन् स्वयं जीवन भी, प्रदान न करे, तो हमारी सारी शक्ति जाती रहेगी। सो अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के शब्दों में कोई असंगति नहीं है, क्योंकि उद्देश्य भिन्न है। तो मुझ ही से तेरा फल पाया जाता है; मानो परमेश्वर ने कहा हो कि इस्राएली, यदि वे बुद्धिमान होते, तो उसके अनुग्रह से सन्तुष्ट रहते; क्योंकि जो उससे सहारा खोजते हैं वे तृप्त होंगे; इसलिए कि वे उससे पर्याप्त रूप से समृद्ध और भरपूर फल पाएँगे। अब हम समझते हैं कि इसका क्या अर्थ है। परन्तु आगे लिखा है —
100 हॉर्सली पहले वाक्यांश का अनुवाद इस प्रकार करता है, — “एप्रैम! अब मूरतों से मेरा और क्या काम?” वह इसे “मूरतों पर यहोवा का जयजयकार” मानता है; परन्तु इस अर्थ में लेने पर यह अभिव्यक्ति इतनी विचित्र है कि यह मत ग्रहण नहीं किया जा सकता। निस्सन्देह यह एप्रैम का अंगीकार है, जैसा अधिकांश व्याख्याकार इसे मानते हैं। केवल सेप्टुआजिन्ट पर आधारित न्यूकम का संशोधन भी उतना ही अस्वीकार्य है, — “एप्रैम को अब मूरतों से और क्या काम?” वह {{ליको .{}לוमें बदल देता है। हमारा और कैल्विन का अनुवाद निस्सन्देह सर्वोत्तम, सबसे प्रभावशाली, और सबसे उत्तम अर्थ देनेवाला है। — सं.
होशे 14:9
9. कौन बुद्धिमान है, कि वह इन बातों को समझे? कौन प्रवीण है, कि वह इन्हें जाने? क्योंकि यहोवा के मार्ग सीधे हैं, और धर्मी उन में चलेंगे; परन्तु अपराधी उन में ठोकर खाकर गिरेंगे।
9. Quis sapiens, et intelliget haec? Intelligens, et cognoscet ea? Quia rectae viae Jehovae, et justi ambulabunt in illis; et impii impingent in illis.
मुझे कोई सन्देह नहीं कि जो बात भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है, उसे उसने बहुत बार सिखाया, और बार-बार स्मरण दिलाया, क्योंकि हम जानते हैं कि उसे अत्यन्त हठीलेपन के साथ निरन्तर संघर्ष करना पड़ा। उसने लोगों को केवल एक ही दिन कठोर और टेढ़ा नहीं पाया, वरन् अपने प्रचार के सारे काल में ऐसा ही पाया। तो जब इस्राएली या तो खुले रूप से भविष्यद्वक्ता की शिक्षा को तुच्छ जानते रहे, या कम से कम उसके मुँह से सुनी हुई बातों को कहानियाँ समझते रहे, या शब्दों से उसे झिड़कते, और यहाँ तक कि धमकाते भी रहे, जब वह उनसे कठोरता से व्यवहार करता था; और जब भविष्यद्वक्ता ने देखा कि लोगों की दुष्टता सुधारी नहीं जा सकती, तब निस्सन्देह वह भरोसे से सुसज्जित होकर बहुत बार उनके बीच गया, और कहा, “तुम सोचते हो कि जब तक तुम मेरी शिक्षा का उपहास करते रहोगे तब तक दण्ड से बचे रहोगे; परन्तु अन्त में तुम निश्चय पाओगे कि यहोवा के मार्ग सीधे हैं।” और मैं तुम्हें पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ कि भविष्यद्वक्ता लोगों को विस्तार से और बहुत शब्दों में उपदेश देने के पश्चात्, अन्त में अपनी सिखाई हुई बातों को संक्षिप्त शीर्षकों में समेट देते थे; क्योंकि यह सम्भव नहीं कि होशे ने, जिसने इतने लम्बे समय तक शिक्षक का पद निभाया, केवल ये थोड़ी-सी बातें ही कही हों, जो तीन घण्टों में पूरी पढ़ी जा सकती थीं। यह असंगत है। परन्तु जब उसने अपने को सौंपे गए पद का परिश्रम से पालन कर लिया, तब बाद में, जैसा मैंने कहा है, उसने इन थोड़े-से अध्यायों को एकत्र किया, ताकि उसकी शिक्षा का स्मरण चिरस्थायी बना रहे। तो जो बात उसे बार-बार दोहरानी पड़ती थी, उसे वह अब अपनी पुस्तक के अन्त में रखता है, ताकि वह मानो उसकी शिक्षा पर एक पूर्ण मुहर हो।
वह कहता है, कौन बुद्धिमान है, कि वह इन बातों को समझे? कौन समझदार है, कि वह इन्हें जाने? यह प्रश्नवाचक शैली अर्थपूर्ण है; क्योंकि होशे उन लोगों की अल्पता पर चकित था जिन्होंने अपने आप को परमेश्वर से शिक्षा पाने के लिए सौंप दिया था। निस्सन्देह इस्राएली, जैसा भक्तिहीन मनुष्यों का स्वभाव होता है, अपने आप में बड़ी बुद्धि का दावा करते थे।
क्योंकि वे अपने आप को तब विशेष रूप से तीक्ष्णबुद्धि समझते हैं, जब वे भक्ति से मिलती-जुलती हर बात पर हँसते हैं, जब वे परमेश्वर के नाम को घृणा से तुच्छ जानते हैं, और, जैसा हम आज के दिन देखते हैं, अपनी ही अभक्ति में रत रहते हैं। और यह शैतानी उन्माद बहुतों को इसलिए जकड़ लेता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि यदि वे पवित्रशास्त्र में लिखी किसी भी बात को ग्रहण करें, तो वे बड़े भोले और मूढ़ ठहरेंगे। “ओह! विश्वास मूर्खतापूर्ण अन्धश्रद्धा के सिवा और क्या है?” यही विचार उनके मन में आता है। ऐसे घिनौने कुत्ते भी हैं जो इस प्रकार की निन्दा उगलने में संकोच नहीं करते, “बस विश्वास करो! परन्तु तेरा यह विश्वास करना इसके सिवा और क्या है कि तू जान-बूझकर सारा विवेक और सारा चुनाव त्याग दे, और अपने आप को गूँगे पशुओं के समान इधर-उधर हाँके जाने दे? सो यदि तू बुद्धिमान है, तो किसी बात पर विश्वास मत कर।” भक्तिहीन मनुष्य इसी प्रकार बोलते हैं; और इसलिए, जैसा मैंने कहा है, जब वे परमेश्वर का सारा भय और ईश्वरीय सत्य का सारा आदर झटक कर फेंक सकते हैं, तब वे अपनी तीक्ष्णबुद्धि पर घमण्ड करते हैं।
हम सहज ही विश्वास कर सकते हैं कि भविष्यद्वक्ता के समय में ऐसे बहुत लोग थे। तो जब सारा देश परमेश्वर के प्रति भयानक तिरस्कार से भरा हुआ था, और तौभी मनुष्य सामान्यतः अपने आप को बुद्धिमान समझते थे, वरन्, जैसा यशायाह कहता है, अपने गहरे विचारों में यह कल्पना करते थे कि वे परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं, तब वह अब पूछता है, कौन बुद्धिमान है, कि वह समझे? मानो उसने कहा हो, “मैं सचमुच देखता हूँ कि यदि मैं तुम्हारी बात मानूँ, तो तुम सब बुद्धिमान हो; क्योंकि दानवों का अनुकरण करते हुए तुम परमेश्वर के विरुद्ध उठने का साहस करते हो, और जब तुम हर सत्य को टाल देते हो, जब तुम घमण्ड से धर्म को पाँव तले रौंदते हो, तब तुम अपने आप को चतुर समझते हो; इस रीति से तुम सब बुद्धिमान हो। परन्तु साथ ही, यदि तुम में बुद्धि का कोई कण भी है, तो तुम्हें निश्चय यह मानना होगा कि मैं परमेश्वर की ओर से भेजा गया हूँ, और जो कुछ मैं घोषित करता हूँ वह मनुष्यों का आविष्कार नहीं, परन्तु जीवते परमेश्वर का वचन है।” अब हम देखते हैं कि इस प्रश्न में कितना बल है, जब भविष्यद्वक्ता कहता है, कौन बुद्धिमान है, कि वह इन बातों को समझे?
कौन समझदार है, कि वह इन्हें जाने?
साथ ही हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ मनुष्यों की सारी बुद्धि को दोषी ठहराता है, और मानो स्वर्ग से उन लोगों के घमण्ड के विरुद्ध गरजता है जो इस प्रकार ढिठाई से परमेश्वर का उपहास करते हैं; क्योंकि वे अपने आप को चाहे कितना ही श्रेष्ठ समझते रहे हों, वह संकेत करता है कि वे अन्धे भी थे, मूढ़ भी और उन्मत्त भी। तो वह कहता है, कौन बुद्धिमान है? परन्तु साथ ही वह दिखाता है कि मनुष्यों की सच्ची बुद्धि परमेश्वर की आज्ञा मानना और उसके वचन को ग्रहण करना है; जैसा कि एक और स्थान में कहा गया है कि बुद्धि, और बुद्धि का आरम्भ, परमेश्वर का भय है, (नीतिवचन 1:7।) अतः जो कोई सचमुच बुद्धिमान होना चाहता है, उसे परमेश्वर के भय से और उसके वचन के प्रति श्रद्धा से आरम्भ करना होगा; क्योंकि जहाँ धर्म नहीं है, वहाँ मनुष्य निश्चय ही किसी बात को ठीक-ठीक नहीं समझ सकते। मान लीजिए कि मनुष्य न केवल मन की बड़ी स्पष्टता से, वरन् सब विद्याओं के ज्ञान से भी सम्पन्न हों; वे दार्शनिक हों, वे चिकित्सक हों, वे विधिवेत्ता हों, उन्हें किसी बात की घटी न हो, केवल इतना कि उन्हें अनन्त जीवन का कोई सच्चा ज्ञान न हो, तो क्या उनके लिए इस प्रकार बुद्धिमान होने से, अर्थात् थोड़े समय के लिए मिट जानेवाली वस्तुओं पर अपने मन लगाने से, और यह जानने से कि उनका सारा बहुमूल्य समझा गया धन उनके जीवन के साथ नष्ट हो जाएगा, कोरे पशु होना अच्छा न होता? निश्चय ही इस प्रकार बुद्धिमान होना उससे कहीं अधिक दयनीय है कि मनुष्य पूर्णतः समझ से रहित हों। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ ठीक ही संकेत करता है कि जो लोग स्वर्गीय सत्य पर ध्यान नहीं देते थे, और भविष्यद्वक्ताओं के प्रति बहरे थे, और यह नहीं पहचानते थे कि कब परमेश्वर बोला, और न उसके वचन की सामर्थ्य को समझते थे, वे न केवल मूर्ख थे, वरन् उन्मत्त भी, और सारी समझ से पूर्णतः रहित थे। अतः भविष्यद्वक्ता ठीक ही कहता है कि जितने इस प्रकार बुद्धिमान नहीं हैं, वे सब प्रकार की विवेकशीलता और विवेक से नितान्त शून्य हैं: इसलिए वह वही बात दोहराता है, कौन बुद्धिमान है, कि वह इन बातों को समझे? कौन समझदार है, कि वह इन्हें जाने? अर्थात्, “यदि कोई दूसरों से बढ़कर है, तो उसे निश्चय इसी बात में अपनी बुद्धि दिखानी चाहिए, और यदि किसी में साधारण समझ भी है, तो उसे जानना चाहिए कि इस शिक्षा का क्या अर्थ है, जिसमें परमेश्वर का स्वरूप और महिमा उज्ज्वल रूप से चमकती है। अतः जो इस विषय में कुछ नहीं जानते और कुछ नहीं समझते, वे निस्सन्देह पूर्णतः मूर्ख हैं।” 101 यशायाह 29:15। — fj.
फिर वह जोड़ता है, क्योंकि यहोवा के मार्ग सीधे हैं। वह यह सत्य मनुष्यों की उस अपवित्र उतावली के विरोध में प्रस्तुत करता है, जो घमण्ड से परमेश्वर को अस्वीकार करते हैं, और उसके वचन को तुच्छ जानने का साहस करते हैं। वह कहता है, प्रभु के मार्ग सीधे हैं: और यह कहकर कि वे सीधे हैं, वह निस्सन्देह उन घृणित निन्दाओं की ओर संकेत करता है जिनका सहारा भक्तिहीन तब लेते हैं जब वे परमेश्वर के वचन को न केवल घृणित और तुच्छ, वरन् असंगत भी ठहराना चाहते हैं, ताकि वह किसी आदर के योग्य न समझा जाए। इसी प्रकार हम आज के दिन देखते हैं कि भक्तिहीन मनुष्य न केवल शब्दों से व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं दोनों को अस्वीकार करते हैं, वरन् बहाने भी ढूँढ़ते हैं, ताकि परमेश्वर के वचनों पर से सारा विश्वास नष्ट करने में वे उचित करते हुए दिखाई दें। उदाहरण के लिए, वे पवित्रशास्त्र में हर प्रकार का विरोधाभास ढूँढ़ते हैं, हर वह बात जो भली-भाँति ग्रहण नहीं की जाती, हर वह बात जो सामान्य मत से भिन्न है, — इन सब असंगतियों को, जैसा वे उन्हें कहते हैं, वे इकट्ठा करते हैं, और फिर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जितने किसी भी धर्म के अधीन होते हैं वे सब मूर्ख हैं, क्योंकि, जैसा वे कहते हैं, परमेश्वर के वचन में इतनी असंगत बातें हैं। निस्सन्देह यह विक्षिप्त उन्माद उस समय भी संसार में प्रबल था: और भविष्यद्वक्ता यह कहकर कि यहोवा के मार्ग सीधे हैं, यह अभिप्रेत करता है कि भक्तिहीन चाहे कितना ही कोलाहल करें, या कुड़कुड़ाएँ, या ताने मारें, तौभी प्रभु के द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया जाता जो सीधा न हो, और हर दोष और त्रुटि से मुक्त न हो। अतः भक्तिहीन परमेश्वर के वचन के विरुद्ध चाहे कितनी ही निन्दाएँ उगलें, यह वैसा ही है जैसे वे सूर्य के प्रकाश को अन्धकारमय करने के लिए हवा में धूल फेंकें; वह मानो कहता है कि अपनी ढिठाई से वे बस इतना ही कर पाते हैं: क्योंकि प्रभु के मार्गों में सदा पूर्ण सीधाई पाई जाएगी; उसका वचन सदा हर कलंक या त्रुटि से मुक्त पाया जाएगा।
फिर वह जोड़ता है, और धर्मी उन में चलेंगे, परन्तु भक्तिहीन उन में ठोकर खाएँगे। यह कहकर कि धर्मी उन में चलेंगे, वह पिछले वाक्य की अनुभव के द्वारा पुष्टि करता है, क्योंकि धर्मी सचमुच प्रभु के मार्गों को सीधा पाते हैं। यदि हम उन सब अपवित्र झूठे आरोपों को साहस से खदेड़ना चाहते हैं, जो अपवित्र मनुष्यों द्वारा परमेश्वर के वचन के विरुद्ध प्रायः ढेर लगाए जाते हैं, तो हमें भी इस निश्चय से सुसज्जित होना चाहिए: क्योंकि यदि हम नहीं जानते कि प्रभु के मार्गों में चलना क्या है, तो निश्चय ही ज्योंही उनके विरुद्ध कोई बात कही जाएगी, त्योंही हम सन्देह में लटक जाएँगे, या पूर्णतः उलट जाएँगे; क्योंकि हम देखते हैं कि बहुत से लोग, जो परमेश्वर के वचन में गहरी जड़ नहीं पकड़े हुए हैं, ज्योंही उसके विरुद्ध कुछ कहा जाता है, त्योंही तुरन्त हिम्मत हार बैठते हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि प्रभु के मार्गों में चलना क्या है; परन्तु जो प्रभु के मार्गों में चलते हैं, वे संसार की सब परीक्षाओं के विरुद्ध साहस से लड़ते हैं; वे संघर्ष को आगे बढ़ाते हैं ताकि स्वर्गीय जीवन प्राप्त करें; उन्हें पक्का निश्चय है कि यद्यपि वे अभी कुछ समय के लिए दुखी हैं, तौभी वे धन्य होंगे, क्योंकि उन्होंने मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण किया है; वे अपने विवेक के द्वारा भी सम्भाले जाते हैं, यहाँ तक कि वे संसार की सब निन्दाओं और झूठे आरोपों को तुच्छ दृष्टि से देख सकते हैं, और अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं। तो जो इस प्रकार प्रभु के मार्गों में चलते हैं, वे अजेय हैं; हाँ, यदि सारा संसार भी उनका विरोध करे, और भक्तिहीन अपने अपवित्र शब्दों से सारे वायुमण्डल को दूषित कर दें, तौभी भक्त अपना मार्ग तब तक चलते रहेंगे जब तक वे अन्त तक न पहुँच जाएँ। अतः यहोवा के सब मार्ग सीधे हैं, धर्मी उन में चलेंगे; परन्तु भक्तिहीन उन में ठोकर खाएँगे, या गिरेंगे; क्योंकि {,}כשלcashel दोनों अर्थ देता है, परन्तु मैं इसका अनुवाद “ठोकर खाना” करना अधिक पसन्द करता हूँ, क्योंकि यह भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय के अधिक अनुकूल जान पड़ता है। तो धर्मी प्रभु के वचन में एक समतल और सीधा मार्ग पाते हैं, और उनके पथ में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो उनकी दौड़ में बाधा डाले, और वे प्रतिदिन आगे बढ़ते हुए उस तक पहुँचते हैं जिसके लिए प्रभु उन्हें बुलाता है, अर्थात् अपने स्वर्गीय उत्तराधिकार तक। इस प्रकार धर्मी प्रभु के मार्गों में चलेंगे, क्योंकि प्रभु मानो उन्हें अपने हाथ से ले चलेगा; विश्वास उनके लिए सौ आँखों का, और पंखों का भी काम देगा: और साथ ही आशा उन्हें सम्भाले रहती है; क्योंकि वे प्रतिज्ञाओं और प्रोत्साहनों से सुसज्जित हैं; जब कभी प्रभु उन्हें गम्भीरता से उपदेश देता है, तब उन्हें प्रेरणाएँ भी मिलती हैं; इसके अतिरिक्त, उसकी धमकियों में उन्हें ऐसे भय मिलते हैं जो उन्हें जागते रखते हैं। इस प्रकार विश्वासयोग्य जन प्रभु के वचन में सर्वोत्तम मार्ग पाते हैं, और उन पर चलते हैं। परन्तु भक्तिहीनों का क्या? वे सब सन्देहों को, छोटे से छोटे को भी, पहाड़ समझते हैं: क्योंकि ज्योंही उनका सामना किसी उलझी हुई या अस्पष्ट बात से होता है, त्योंही वे घबरा जाते हैं, और कहते हैं, “मैं पवित्रशास्त्र को जानने का यत्न सहर्ष करता, परन्तु मुझे इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।” इसलिए जब कोई सन्देह उठाया जाता है, तो वे उसे पहाड़ समझते हैं; वरन् वे जान-बूझकर सन्देहों का बहाना करते हैं, ताकि जब वे सत्य से बचना चाहें, और प्रभु के पीछे न चलने के लिए मुड़ जाना चाहें, तब उनके पास कोई बहाना रहे। तो भक्तिहीन यहोवा के मार्गों में ठोकर खाते हैं। परन्तु इसे विरोधवाचक रूप में पढ़ना चाहिए, “यद्यपि भक्तिहीन ठोकर खाते हैं, तौभी धर्मी सदा यहोवा के मार्गों में चलते रहेंगे;” जिसका अर्थ यह है कि कोई कारण नहीं कि भक्तिहीन अपनी निरन्तर ठोकरों के द्वारा, और यह चिल्लाकर कि परमेश्वर का वचन ठोकर दिलानेवाली बातों से भरा है, हमें रोकें या हमारी गति धीमी करें; क्योंकि हम उसमें एक समतल मार्ग पाएँगे, केवल इतना हो कि हम परमेश्वर को यह महिमा दें कि वह न्यायी है, और उसके मार्ग सीधे हैं। इस वाक्य का यही अर्थ है।
होशे की भविष्यद्वाणियों का समापन
