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होशे की पुस्तक पर टीका
जॉन कैल्विन
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अनुवादक की प्रस्तावना
अनुवादक की प्रस्तावना
पूर्वाग्रह ने बहुधा बहुतों को उन लाभों से वंचित कर दिया है जो वे अन्यथा प्राप्त कर सकते थे; और कैल्विन की रचनाओं के विषय में भी बहुत कुछ ऐसा ही हुआ है: लेखक के प्रति प्रतिकूल धारणाओं के कारण वे लम्बे समय तक लगभग पूर्णतः उपेक्षित रहीं। उसके अपने युग में और उसके बाद के युग में, एक धर्मविज्ञानी के रूप में, और विशेषकर पवित्रशास्त्र के व्याख्याता के रूप में, कैल्विन का अधिकार बहुत ऊँचा था, और सुधारकों में से किसी के भी अधिकार से ऊँचा था। यद्यपि वर्तमान समय के एक प्रतिष्ठित लेखक, डॉ. डौबिन्ये ने मेलांक्थन को "धर्मसुधार का धर्मविज्ञानी" घोषित किया है, तौभी यह विशिष्टता कैल्विन को देने के लिए पर्याप्त कारण है; और निस्सन्देह यह उस स्मरणीय काल में परमेश्वर द्वारा खड़े किए गए अनेक यशस्वी पुरुषों में से किसी अन्य की अपेक्षा कहीं अधिक न्यायपूर्वक उसी की है।
हमारे लेखक के साथ जो हुआ, उसका कारण बताना कठिन नहीं है। अनेक बातों ने मिलकर उसकी प्रतिष्ठा को घटा दिया। इस देश में कलीसिया-शासन के विषय में उसके विचारों ने बहुतों के मन में उसके विरुद्ध पूर्वाग्रह उत्पन्न कर दिया; और फिर एक ऐसी धर्मवैज्ञानिक प्रणाली की प्रगति ने, जो उसके मत के उतनी ही विरुद्ध थी जितनी हमारे अपने सुधारकों की मान्यताओं के, इस पूर्वाग्रह को और बढ़ा दिया; और जहाँ मतभेद और अरुचि का पहला आधार नहीं था, वहाँ दूसरा प्रबल हो गया: इस प्रकार सामान्यतः हमारी कलीसिया में और भिन्न-मतावलम्बी समुदायों में कैल्विन के आदरणीय नाम को न तो स्नेह से, और न आदर से ही देखा गया; न कोई विवेक बरता गया, और न पवित्रशास्त्र के व्याख्याता के रूप में उसकी महान् विशेषताओं तथा कलीसियाई अनुशासन और पूर्वनियति के सिद्धान्त पर उसके विशिष्ट विचारों के बीच कोई भेद किया गया।
यूरोप महाद्वीप पर अन्य बातें उसकी प्रतिष्ठा के विरुद्ध काम करती रहीं। पोपवाद उससे गहरा बैर रखता था; क्योंकि सुधारकों में से किसी ने भी उसकी अधर्मताओं की गहराइयों को इतने विवेक के साथ और इतने निर्मम हाथ से नहीं टटोला था जितना उसने। उसकी असाधारण रूप से तीक्ष्ण बुद्धि ने उसे यह कार्य अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से करने में समर्थ किया; और प्रस्तुत ग्रन्थ में इस विषय पर बहुत कुछ है, जो इसे इस समय विशेष रूप से मूल्यवान बनाता है, जब पोपवाद अपनी भूलों और भ्रान्तियों को फैलाने के लिए इतने प्रयत्न कर रहा है। जिन दो हथियारों का वह सामान्यतः प्रयोग करता था, वे थे पवित्रशास्त्र और सामान्य बुद्धि,—ऐसे हथियार जिनसे पोपवाद सदा डरता रहा है; और उनकी धार को कुन्द करना सदा से उसका प्रयत्न रहा है: पहले की धार को व्यर्थ परम्परा के द्वारा, और दूसरे की धार को अन्धविश्वास के द्वारा—परमेश्वर में या परमेश्वर के वचन में नहीं, वरन् एक प्रत्यक्ष रूप से पतित कलीसिया में। परन्तु कैल्विन ने इन हथियारों को असाधारण कौशल, निपुणता और सामर्थ्य के साथ चलाया, क्योंकि वह पवित्रशास्त्र में गहराई से पारंगत था और खरे तथा पैने विवेक के असाधारण भाग से सम्पन्न था। इसके अतिरिक्त, उसके सैद्धान्तिक विचार पोपवाद के विचारों के, और विशेषकर उस पोपीय प्रणाली के, जो जेसुइटवाद द्वारा परिवर्तित होकर उसमें केन्द्रित हो गई है—और जिसे पोपवाद का सबसे पूर्ण रूप माना जा सकता है—सर्वथा विपरीत थे। इन कारणों से कैल्विन के लेख रोमी कलीसिया के अनुयायियों को अत्यन्त अप्रिय लगे बिना रह ही नहीं सकते थे: और परिणाम यह हुआ कि उन्होंने उसके नाम को कलंकित करने और उसकी प्रतिष्ठा को घटाने में कोई प्रयत्न नहीं छोड़ा।
इस देश में प्रतिष्ठा और मान्य विद्वत्ता वाला पहला लेखक, जिसने कैल्विन के साथ कुछ भी न्याय जैसा किया, बिशप हॉर्सली था; और जब हम उस अत्यन्त प्रबल पूर्वाग्रह पर विचार करते हैं जो उस समय लगभग सभी ओर कैल्विन के विरुद्ध फैला हुआ था, तो उसके चरित्र का पक्ष-समर्थन करना नैतिक साहस का कोई साधारण प्रमाण न था। निस्सन्देह कुछ बातों में ये दोनों बहुत मिलते-जुलते थे। दोनों के मन असाधारण बल और ओज से युक्त थे, और जितने ओजस्वी थे उतने ही विवेकशील भी। स्पष्ट बोध में भी उनके समकक्ष बहुत थोड़े थे; यहाँ तक कि किसी को उन दोनों में से किसी के लेखों का कोई अंश उसका अर्थ समझने के लिए शायद ही कभी दोबारा पढ़ना पड़ता है। परन्तु सम्भवतः उनकी समानता की सबसे उल्लेखनीय बात उनकी मानसिक स्वतन्त्रता थी। वे प्राचीन या आधुनिक किसी भी अधिकार से प्रभावित हुए बिना स्वयं सोचते थे, और धर्म में ईश्वरीय नियम और अधिकार को छोड़ और किसी नियम या अधिकार को स्वीकार नहीं करते थे। बिशप में कल्पना-शक्ति अधिक थी, परन्तु जिनेवा के पास्टर में विवेक अधिक खरा था। इसलिए बिशप अपने दृढ़ मन और बड़ी तीक्ष्णता के होते हुए भी कभी-कभी आकर्षक और नवीन बातों के बहकावे में आ जाता था; परन्तु कैल्विन सदा संयमी और विवेकी रहा, और किसी अंश पर वह जो भी नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, वह सामान्यतः भली-भाँति प्रमाणित होता है, और अधिकांशतः तुरन्त हमारी स्वीकृति पा लेता है।
परन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। इसमें पुराने नियम का वह भाग समाविष्ट है जो कुछ दृष्टियों से सबसे कठिन है, और उस भाग में भी, जैसा सब स्वीकार करते हैं, सबसे कठिन होशे भविष्यद्वक्ता की पुस्तक है। सम्भवतः पवित्रशास्त्र का कोई भी भाग सामान्यतः इतने कम लाभ के साथ नहीं पढ़ा जाता जितना छोटे भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकें; और इसका कारण निस्सन्देह वह अस्पष्टता है जिसमें उनके कुछ भाग लिपटे हुए हैं। लेखक का पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रन्थ में अनेक गूढ़ अंशों पर बहुत प्रकाश डाला गया है, और हमारी भाषा में उपलब्ध किसी भी टीका से अधिक। तीक्ष्ण, सूक्ष्मदर्शी और कभी-कभी गम्भीर होते हुए भी लेखक साथ ही उल्लेखनीय रूप से सरल, सुबोध और स्पष्ट है, और सदा व्यावहारिक तथा उपयोगी है। सबसे बड़े विद्वान् भी यहाँ शिक्षा पा सकते हैं, और सबसे अनपढ़ भी लगभग सब कुछ समझ सकते हैं जो कहा गया है। लेखक का सम्पूर्ण उद्देश्य मूल पाठ को समझाना, सरल करना और स्पष्ट करना प्रतीत होता है, और वह कभी अन्य विषयों की ओर नहीं मुड़ता। वह आरम्भ से अन्त तक एक व्याख्याता है, दृढ़ता से अपने कर्तव्य में बना रहता है, और प्रत्येक अंश को सन्दर्भ के अनुसार उसका पूरा और उचित अर्थ देता है, जिस पर वह सदा विशेष ध्यान देता है।
होशे की शैली कुछ विलक्षण है। जेरोम ने बहुत पहले ही उसे खण्डित और सूक्तिमय (commatic, sententious) बताया था; और वे कड़ियाँ, अर्थात् संयोजक अव्यय, जिनके द्वारा भिन्न-भिन्न भाग परस्पर जोड़े जाते हैं, कभी-कभी छोड़ दी जाती हैं। वास्तव में यह कुछ हद तक सभी भविष्यद्वक्ताओं की शैली की विशेषता है, परन्तु किसी अन्य की अपेक्षा होशे में अधिक। साथ ही जो बात सबसे बड़ी कठिनाई उत्पन्न करती है, वह है उसके विषय-परिवर्तनों की तीव्रता, तथा पुरुष, वचन और लिंग का बदलना। कभी-कभी एक ही पद में लोगों से बात भी की जाती है और उनके विषय में बात भी की जाती है; और वह एकवचन से बहुवचन पर, और बहुवचन से एकवचन पर, और कभी-कभी पुल्लिंग से स्त्रीलिंग पर चला जाता है। इन परिवर्तनों का कारण बताना सदा सरल नहीं होता।
बहुत-से समीक्षकों का यह विचार रहा है कि होशे का मान्य इब्रानी पाठ पवित्रशास्त्र के किसी भी अन्य भाग की अपेक्षा अधिक अपूर्ण दशा में है; परन्तु बिशप हॉर्सली अत्यन्त निःसंकोच ढंग से इसका खण्डन करता है; और आर्चबिशप न्यूकम ने अपने अनुवाद में जो लगभग 51 संशोधन प्रस्तुत किए थे, उन्हें बिशप ने अप्रमाणित, और वास्तव में अनावश्यक कहकर हटा दिया है, क्योंकि उनमें से अधिकांश इस भविष्यद्वक्ता की शैली की विशिष्ट असंगतियों का उपचार करने के लिए प्रस्तावित किए गए थे; और बिशप ने स्वयं हस्तलिपियों के प्रमाण पर जो थोड़े-से संशोधन प्रस्तुत किए, उनमें से कुछ को कैल्विन की व्याख्या अनावश्यक सिद्ध करती है। तथ्य यह है कि परिश्रमी केनिकॉट और अन्य लोगों द्वारा संकलित पाठ-भेदों ने मुख्यतः यही बड़ा उपकार किया है—हमारे मान्य पाठ की असाधारण शुद्धता को प्रकट करना। इस पूरे भविष्यद्वक्ता में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण है जहाँ हस्तलिपियों के मिलान से कोई सुधार प्राप्त हुआ हो, और निश्चय ही कोई महत्त्वपूर्ण सुधार तो नहीं।
कैल्विन का यह ग्रन्थ अब पहली बार अंग्रेज़ी भाषा में प्रकट हो रहा है। इसका एक फ्रांसीसी अनुवाद है, परन्तु वह स्वयं लेखक द्वारा नहीं किया गया, जैसा उसकी रचनाओं के कुछ अन्य भागों के विषय में हुआ, और इसलिए उसका कोई प्रामाणिक अधिकार नहीं हो सकता। निम्नलिखित अनुवाद कैल्विन की मृत्यु के तीन वर्ष पश्चात् 1567 में जिनेवा में मुद्रित एक संस्करण से किया गया है, और उसका मिलान 1610 में जिनेवा में ही मुद्रित एक अन्य संस्करण से किया गया है।
यह उचित समझा गया है कि हमारे सामान्य अनुवाद को मूल पाठ के रूप में अपनाया जाए, और कैल्विन के लैटिन अनुवाद को समानान्तर स्तम्भ में रखा जाए। उसका अनुवाद मुहावरे का कोई ध्यान रखे बिना मूल का अक्षरशः अनुवाद है, और उसका अनुवाद करना असम्भव पाया गया है, कम-से-कम इस प्रकार कि सामान्य पाठक उसे समझ सकें। स्पष्टतः उसकी रीति यह थी कि वह इब्रानी का शब्दशः अनुवाद करके उसे अपना मूल पाठ बनाता, और फिर अपनी टीका में अभिव्यक्तियों को इस प्रकार परिवर्तित करता कि वे पढ़ने योग्य लैटिन बन जाएँ; और इस प्रकार परिवर्तित उसका अनुवाद अधिकांश स्थानों में हमारे अधिकृत अनुवाद से मेल खाता है। यह मेल इतना उल्लेखनीय है कि एकमात्र निष्कर्ष यही निकलता है कि हमारे अनुवादकों ने इस ग्रन्थ से बहुत परामर्श लिया होगा।
पवित्रशास्त्र से उद्धरण देते समय लेखक ने किसी अनुवाद का अनुसरण नहीं किया प्रतीत होता, वरन् अपना ही अनुवाद किया है; और वे बहुधा भावानुवाद के रूप में दिए गए हैं, जिनमें शब्दों की अपेक्षा अर्थ का अधिक ध्यान रखा गया है। व्याख्या किए जानेवाले अंशों के विषय में भी बहुधा ऐसा ही किया गया है, और शब्द बार-बार बदले गए हैं। इन स्थलों पर इस अनुवाद में सर्वत्र लेखक का दृढ़ता से अनुसरण किया गया है, और उसके उद्धरणों को, तथा जहाँ मूल पाठ भावानुवाद में दिया गया है वहाँ उसे भी, एकल उद्धरण-चिह्न से अंकित किया गया है।
व्याख्यानों में आनेवाले इब्रानी शब्द स्वर-चिह्नों (points) के साथ नहीं दिए गए हैं, और उन्हें जोड़ना आवश्यक नहीं समझा गया है। शब्द तदनुरूप अंग्रेज़ी अक्षरों में दिए गए हैं, और उनमें केवल वे ही स्वर जोड़े गए हैं जो उनके उच्चारण के लिए आवश्यक हैं; और इन स्वरों को इब्रानी स्वरों से अलग पहचानने के लिए रोमन अक्षरों में रखा गया है। इब्रानी स्वरों को सर्वत्र एक ही रूप में दिया गया है, न कि ध्वनियों की उस लगभग अनन्त विविधता के साथ जिसमें स्वर-चिह्नों ने उन्हें बाँट दिया है। {}וvau को सदा u द्वारा दर्शाया गया है, सिवाय उन कुछ स्थलों के जहाँ उसके बाद कोई स्वर आता है, और तब उसे v द्वारा दर्शाया गया है। इब्रानियों के चार स्वर हैं, जो अंग्रेज़ी के a, e, u, i और o के अनुरूप हैं।
यह ग्रन्थ अनुवाद-कार्य में लगे लोगों के लिए ठोस सहायता देने योग्य है। हमारे मिशनरी इससे कोई कम सहायता नहीं पा सकते, क्योंकि यह इब्रानी का उतना अक्षरशः अनुवाद देता है जितना भली-भाँति किया जा सकता है, और इसमें बहुत-सी मूल्यवान समीक्षा है, और यह अनेक कठिन अंशों के आशय और अर्थ को अत्यन्त स्पष्ट और सन्तोषजनक ढंग से खोलता है। ऐसी कोई विद्यमान टीका नहीं जिसमें मूल पाठ की इतनी सूक्ष्मता से जाँच की गई हो, और जिसे इतनी स्पष्टता से समझाया गया हो। इसमें अन्य लोगों द्वारा दी गई सर्वाधिक मान्य व्याख्याओं में से भी बहुतों का उल्लेख और वर्णन है; और अनुवादक ने रोचक और कठिन अंशों पर वह सब जोड़ दिया है जो लेखक के समय के बाद से विद्वान् समीक्षकों ने सुझाया है।
यदि यह उचित नियम हो कि अब जनता के सम्मुख प्रस्तुत इस खण्ड के अध्ययन से दूसरों पर जो प्रभाव पड़ सकता है, उसका अनुमान इस बात से लगाया जाए कि स्वयं उसने क्या अनुभव किया है, तो सम्पादक विशेष रूप से एक बात का उल्लेख करेगा, और वह यह है कि उसे पूरी आशा है कि जो लोग इस खण्ड को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे, वे मूर्तिपूजा की ओर मानव-स्वभाव के अत्यधिक झुकाव से, और अन्धविश्वास की आश्चर्यजनक शक्ति और अन्धा कर देनेवाले प्रभावों से पहले से कहीं अधिक प्रभावित होंगे। इस्राएलियों को परमेश्वर की सच्ची आराधना में लौटा लाने के लिए जितने भी साधन काम में लाए गए, उन सबके होते हुए भी उनका जो आचरण रहा, उसका यहाँ असाधारण सूक्ष्मता और विशदता से वर्णन किया गया है। यद्यपि परमेश्वर ने अपने भविष्यद्वक्ताओं को उनके पास भेजा कि वे उन्हें उनके पापों का स्मरण कराएँ, उनसे तर्क और वाद-विवाद करें, उन्हें धमकाएँ और उपदेश दें, क्षमा और ग्रहणयोग्यता की प्रतिज्ञाओं के द्वारा उन्हें खींचें और लुभाएँ; और यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें विविध प्रकार से ताड़ना दी, और फिर अपने कोप को रोक रखा और उन पर कृपा दिखाई, तौभी वे हठपूर्वक अपनी मूर्तिपूजा और अन्धविश्वास से चिपके रहे, और साथ ही यह दावा और घमण्ड करते रहे कि वे सच्चे परमेश्वर की आराधना करते हैं, और टेढ़ेपन से यह मानते रहे कि उनकी मिश्रित सेवा—परमेश्वर की आराधना और मूर्तियों की आराधना—उचित और विधिसम्मत है, और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा बताई गई आराधना से कहीं श्रेष्ठ है।
इस्राएलियों के इस उदाहरण को ध्यान में रखते हुए हमें पोपवाद के मोहक और अन्धा कर देनेवाले प्रभाव पर आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं, जिसकी मूर्तिपूजा और अन्धविश्वास ठीक वैसे ही हैं जैसे इस्राएलियों के थे; कोई भी दो उदाहरण इनसे अधिक समान नहीं हो सकते। इनकी एकरूपता विशेष रूप से इसमें दिखाई देती है,—कि इनमें दो आराधनाओं का मेल है—परमेश्वर की और प्रतिमाओं की; और यही मेल वह मूर्तिपूजा थी जिसके लिए इस्राएली दोषी ठहराए गए, और ठीक यही मूर्तिपूजा आज रोमी कलीसिया में विद्यमान है: और जैसे इस्राएलियों में, वैसे ही पोपवादियों में भी, यद्यपि परमेश्वर को बहिष्कृत नहीं किया जाता वरन् माना जाता है, तौभी प्रमुख आराधना झूठे देवताओं और उनकी प्रतिमाओं को दी जाती है। ये दोनों प्रणालियाँ एक ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं कर सकता, सिवाय उनके जो प्रबल भ्रम के वश में हैं; और इस ग्रन्थ में इसी बात का बार-बार उल्लेख किया गया है और इसे भरपूर रूप से सिद्ध किया गया है।
यहाँ उस समय का विवरण जोड़ देना उपयोगी हो सकता है जिसमें बारह छोटे भविष्यद्वक्ता जीवित रहे। ठीक-ठीक समय निश्चित नहीं किया जा सकता: वे उन दो तिथियों के बीच सक्रिय रहे जो यहाँ दी गई हैं। अन्य चार भविष्यद्वक्ताओं के नाम भी जोड़ दिए गए हैं।
बाबुली बन्धुआई से पहले — मसीह से पूर्व — I. योना,… 856-784. II. आमोस,… 810-785. III. होशे,… 810-725. 1 यशायाह,…. 810-698. IV. योएल,… 810-660. V. मीका,… 758-699. VI. नहूम,… 720-698. VII. सपन्याह,… 640-609.
बन्धुआई से ठीक पहले और उसके दौरान — 2. यिर्मयाह,… 628-586. VIII. हबक्कूक,… 612-598. 3. दानिय्येल,… 606-534. IX. ओबद्याह,… 588-583. 4. यहेजकेल,… 595-536. बन्धुआई के पश्चात् — X. हाग्गै,… 520-518. XI. जकर्याह,… 520-518. XII. मलाकी,… 436-420.
अन्तिम, अर्थात् चौथे खण्ड में, मूल ग्रन्थ के साथ संलग्न दोनों अनुक्रमणिकाएँ दी जाएँगी।
जे. ओ. थ्रसिंगटन, 1 सितम्बर, 1816.
पश्चलेख — उपर्युक्त प्रस्तावना के छप जाने के पश्चात् यह ज्ञात हुआ है कि बारह छोटे भविष्यद्वक्ताओं को उस आकार के चार खण्डों में समाविष्ट नहीं किया जा सकता जिस आकार में "जॉन कैल्विन की रचनाएँ" की वर्तमान श्रृंखला सामान्यतः प्रकाशित होती है।
अनुवाद, यद्यपि वह उतना ही संक्षिप्त और सुगठित है जितना अंग्रेज़ी भाषा का मुहावरा भली-भाँति अनुमति देता है, सम्पादक के आरम्भिक अनुमान से अधिक स्थान घेरता है। उसकी पहली गणना लैटिन के आधार पर की गई थी: तब उसे शैली के सापेक्ष विस्तार के विषय में दोनों भाषाओं के बीच के बड़े अन्तर का पूरा ज्ञान नहीं था। तब से उसने सूक्ष्म तुलना के द्वारा पाया है कि लैटिन में पाँच खण्डों में समाया हुआ ग्रन्थ अंग्रेज़ी में उसी आकार और अक्षरों के कम-से-कम छह खण्ड माँगेगा: और प्रस्तुत स्थिति में, जिसके चार खण्डों में समा जाने का अनुमान था, उसे पाँच खण्डों तक बढ़ाना पड़ेगा, क्योंकि सम्पादक की ओर से सम्बन्धित प्रस्तावनाएँ और टिप्पणियाँ आदि हैं, और इनके अतिरिक्त बारह छोटे भविष्यद्वक्ताओं की प्रत्येक पुस्तक के अक्षरशः अनुवाद भी हैं, जिनके विषय में बाद में यह निश्चय किया गया है कि वे प्रत्येक क्रमिक टीका के साथ संलग्न किए जाएँगे। इस ग्रन्थ की व्यवस्था, जो अब कुछ निश्चितता के साथ की गई है, इस प्रकार है: पहले खण्ड में होशे होगा; दूसरे खण्ड में योएल, आमोस और ओबद्याह; तीसरे खण्ड में योना, मीका और नहूम; चौथे खण्ड में हबक्कूक, सपन्याह और हाग्गै; और पाँचवें खण्ड में जकर्याह और मलाकी।
इस कारण सभी खण्ड समान आकार के नहीं हो सकते; कुछ कैल्विन की रचनाओं की वर्तमान श्रृंखला के औसत विस्तार से—जो औसतन 500 पृष्ठ है—काफ़ी अधिक होंगे, और कुछ उससे कम। ऐसी असमानता से बचने के लिए कुछ पुस्तकों को विभाजित करना आवश्यक होता—जो किसी भी स्थिति में कदापि वांछनीय नहीं, और जिससे अन्य सभी टीकाओं में सावधानी से बचा गया है।
जो मूलतः विचार किया गया था, उसके अतिरिक्त प्रत्येक पुस्तक के अन्त में कैल्विन के लैटिन अनुवाद का, जैसा वह उसकी टीका द्वारा परिवर्तित हुआ है, एक सतत अक्षरशः अनुवाद दिया जाएगा; और सम्पादक से यह कहने का अनुरोध किया गया है कि पुराने नियम की अन्य सभी भविष्यद्वाणी-पुस्तकों में भी ऐसी ही योजना अपनाई जाएगी।
सम्पादक। थ्रसिंगटन, सितम्बर 1846.
कैल्विन का समर्पण-पत्र
समर्पण-पत्र
जॉन कैल्विन की ओर से परम प्रशान्त और परम पराक्रमी राजा गुस्तावस को,
जो गोथों और वैण्डलों का राजा है। हे परम श्रेष्ठ राजा, जब मेरे व्याख्यानों से लिए गए होशे पर टिप्पण प्रकाशित हुए थे, तब मैंने जो कहा था, उसे अब फिर दोहराता हूँ,—कि उस संस्करण का कर्ता मैं नहीं था: क्योंकि मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो उन रचनाओं से भी सहज ही सन्तुष्ट नहीं होता जिन्हें मैं अधिक परिश्रम और सावधानी से पूरा करता हूँ। यदि मेरे वश में होता, तो मैं उस तात्कालिक प्रकार की शिक्षा के व्यापक प्रसार को रोकने का ही यत्न करता, जो मेरे श्रोताओं के विशेष लाभ के लिए अभिप्रेत थी, और उस लाभ से मैं भरपूर सन्तुष्ट था।
परन्तु जब उस नमूने ने (अर्थात् होशे पर टीका ने), जो मेरी आशा से अधिक सफलता के साथ प्रकाशित हुआ, बहुतों में यह इच्छा जगा दी कि उस एक भविष्यद्वक्ता के पश्चात् शेष ग्यारह छोटे भविष्यद्वक्ताओं को भी देखें, तो मैंने महामहिम को उपयुक्त विस्तार का और महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं से भरपूर एक ग्रन्थ समर्पित करना असामयिक नहीं समझा, केवल इसलिए नहीं कि यह मेरे गहरे आदर का प्रतीक हो, वरन् इसलिए भी कि इतने प्रसिद्ध नाम को किया गया समर्पण इसके लिए कुछ अनुग्रह प्राप्त करा सके। तौभी यह कार्य मैंने महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होकर नहीं किया, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही संसार की प्रशंसा की लालसा न करना सीख लिया है, और बहुतों की कृतघ्नता के प्रति कठोर हो गया हूँ; परन्तु मेरी इच्छा यह थी कि हमारे पर्वतों के एकान्त से आपकी पदवी के लोगों को कुछ फल पहुँचे; और मेरा यह उचित प्रयत्न भी रहा है कि बहुत-से लोग, जिनके लिए मैं अपरिचित हूँ, अपने राजा की पवित्र स्वीकृति से प्रभावित होकर अधिक निष्पक्ष बनें, और इस ग्रन्थ को पढ़ने के लिए अधिक तैयार होकर आएँ। 1 गुस्तावस स्वीडन का राजा था, जिसके निवासी उस समय गोथ और वैण्डल कहलाते थे। वह स्वीडन में उस नाम का पहला राजा था, और उसका कुलनाम वासा था। उसका जन्म 1490 में हुआ था, और वह स्वीडन के राजवंश का वंशज था। उसने डेनमार्क के क्रिश्चियन द्वितीय के राज्य हड़पने के प्रयत्न से राज्य को छुड़ाया, और 1523 में राजा बनाया गया; उसने पोपवाद को समाप्त किया, और 1530 में लूथरवाद को प्रचलित किया, और सत्तर वर्ष की आयु में 1560 में, अर्थात् इस पत्र की तिथि के अगले वर्ष, उसकी मृत्यु हुई। — सं.
और मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा ही होगा, क्योंकि आपकी सारी प्रजा में आपका इतना आदर है, बशर्ते आप कृपा करके अपना निर्णय दें, जैसा आपकी अद्वितीय बुद्धि सुझाए; या, यदि वृद्धावस्था पढ़ने का श्रम सम्भवतः न सह सके, तो जैसा महामहिम के ज्येष्ठ पुत्र, सिंहासन के उत्तराधिकारी एरिक सुझाएँ, जिन्हें आपने उदार विद्याओं में ऐसी शिक्षा दिलाने का ध्यान रखा है कि यह कार्य निश्चिन्त होकर उन्हें सौंपा जा सकता है। और आपकी कृपालुता पर मुझे कम सन्देह हो, इसके लिए आपके सद्गुणों के बहुत-से घोषक हैं, और कुछ ऐसे विवेकी और बुद्धिमान पुरुष भी हैं जो योग्य साक्षी माने जाने के अधिकारी हैं। इसलिए, हे परम कुलीन राजा, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि इतने दूर के प्रदेश से एक ऐसा व्यक्ति, जो अभी तक आपके लिए अपरिचित है, महामहिम को यह भेंट अर्पित करे, जो मन और हृदय की उन उत्कृष्ट और वीरोचित विभूतियों के कारण, जिनमें उसने आपको श्रेष्ठ समझा है, अपने आप को विशेष रूप से आपसे अनुरक्त मानता है।
परन्तु यद्यपि इस पुस्तक की उत्कृष्टता सम्भवतः ऐसी न हो जो मेरे लिए अधिक अनुग्रह प्राप्त कराए, तौभी आप उस इच्छा का तिरस्कार न करेंगे जिससे प्रेरित होकर मैंने महामहिम के प्रति अपने गहरे आदर को प्रकट किया है, और न आप इस भेंट को, जो अब आपको अर्पित है, सर्वथा अयोग्य पाएँगे, चाहे वह इतने महान् राजा की उच्च पदवी से कितनी ही नीचे क्यों न हो। यदि परमेश्वर ने मुझे पवित्रशास्त्र की व्याख्या के लिए कुछ भी योग्यता प्रदान की है, तो मुझे पूरा निश्चय है कि मैंने विश्वासयोग्यता और सावधानी से यह प्रयत्न किया है कि उसमें से सारी निष्फल बारीकियों को, चाहे वे कितनी ही आकर्षक और कानों को सुहानेवाली क्यों न हों, बाहर रखूँ, और उस सच्ची सरलता को बनाए रखूँ जो परमेश्वर की सन्तानों की ठोस उन्नति के योग्य है, जो छिलके से सन्तुष्ट न होकर गूदे तक पहुँचना चाहती हैं। मैंने वास्तव में क्या किया है, यह कहना मेरा काम नहीं, सिवाय इसके कि भक्त और विद्वान् पुरुष मुझे यह विश्वास दिलाते हैं कि मेरा परिश्रम निष्फल नहीं गया। परन्तु सम्भव है कि ये टीकाएँ सबकी इच्छाओं और अपेक्षाओं को पूरा न करें; और मैं स्वयं भी चाहता था कि मैं कुछ अधिक उत्कृष्ट और अधिक पूर्ण दे पाता, या कम-से-कम ऐसा कुछ जो भविष्यद्वाणी के आत्मा के अधिक निकट पहुँचता। परन्तु मुझे भरोसा है कि परिणाम यह होगा,—कि सीधे और निष्पक्ष पाठकों को, और खरे विवेक से सम्पन्न लोगों को, बशर्ते वे जो कुछ मैंने उनके लाभ के लिए लिखा है उसे उदार मन से, न कि नुक्ताचीनी के भाव से पढ़ें, अनुभव यह सिद्ध कर देगा कि बारह भविष्यद्वक्ताओं पर इतना अधिक प्रकाश डाला गया है जितना कहने की अनुमति मुझे विनम्रता नहीं देती।
मैं दूसरों के परिश्रम से अपने परिश्रम की तुलना नहीं करता (जो अनुचित होगा), और न मैं इसके सिवाय और कुछ माँगता हूँ कि समझदार और विवेकी पाठक मेरे परिश्रम से लाभ उठाकर कलीसिया के सार्वजनिक हित के लिए और अधिक व्यापक रूप से उपयोगी होने का यत्न करें; परन्तु क्योंकि इस पुस्तक को विविध आकर्षणों से सजाना न तो मेरी चिन्ता रही है और न मेरी इच्छा ही, इसलिए यह चेतावनी असामयिक नहीं; क्योंकि यह अधिक आलसी लोगों को भी पढ़ने के लिए आमन्त्रित कर सकती है, जब तक कि वे परख करके यह निर्णय न कर सकें कि अपने अध्ययन में आगे बढ़ना उनके लिए उपयोगी होगा या नहीं। वास्तव में, पवित्रशास्त्र की व्याख्या में मेरे अन्य प्रयत्नों ने जो फल उत्पन्न किया है, और इस ग्रन्थ की उपयोगिता के विषय में जो आशा मैं रखता हूँ, वे मुझे इतने भाते हैं कि मैं अपने शेष जीवन को, जहाँ तक मेरे निरन्तर और बहुगुणित कार्य अनुमति दें, इसी प्रकार के परिश्रम में बिताना चाहता हूँ। क्योंकि जो कुछ एक अवकाश-प्राप्त मनुष्य से अपेक्षित हो सकता है, वह मुझसे अपेक्षित नहीं हो सकता, जिसके ऊपर पास्टर के सामान्य पद के अतिरिक्त अन्य कर्तव्य भी हैं, जो मुझे तनिक भी विश्राम नहीं करने देते: तौभी मैं अपने बचे हुए समय को किसी अन्य प्रकार से इससे अधिक अच्छी तरह व्यतीत किया हुआ नहीं समझूँगा।
हे परम पराक्रमी राजा, अब मैं फिर आपकी ओर लौटता हूँ। जो सार्वजनिक कार्यों के संचालन में आपकी दूरदर्शिता और न्यायशीलता को, आपके नैतिक आचरण को, आपके सम्पूर्ण चरित्र और सद्गुणों को जानता है, वह इस पर आश्चर्य नहीं करेगा कि मैंने यह ग्रन्थ आपको समर्पित करने का निश्चय किया है। परन्तु क्योंकि आपकी प्रशंसनीय बातों पर लम्बा स्तुति-गान लिखना मेरा उद्देश्य नहीं, इसलिए मैं केवल संक्षेप में उन बातों को छूऊँगा जो जनश्रुति और सार्वजनिक लेखों दोनों के द्वारा सुविदित हैं:—परमेश्वर ने आपको सिंहासन पर बैठाने से पहले अद्भुत रीति से परखा, न केवल इसलिए कि आपमें अपनी प्रभुता-पूर्ण व्यवस्था (providence) का एक अनोखा प्रमाण प्रदर्शित करे, वरन् इसलिए भी कि हमारे युग के और आनेवाली पीढ़ियों के सामने सही मार्ग में दृढ़ धीरज का एक उज्ज्वल उदाहरण रखे। निस्सन्देह आप दोनों प्रकार के भाग्य से इस प्रकार परखे गए, कि समृद्धि में आपके संयम और मर्यादा की, और विपत्ति में आपके धीरज की उचित परीक्षा की कमी न रहे, जब तक कि ऊपर से आपको यह न दिया गया कि आप अन्ततः इतने संकटों, जोखिमों, कठिनाइयों और बाधाओं से न केवल सुखपूर्वक वरन् प्रशंसनीय रीति से उबर आएँ, ताकि राज्य को व्यवस्थित करके आप सार्वजनिक और निजी रूप से प्रसन्न शान्ति का आनन्द ले सकें। और अब सभी वर्गों की सर्वसम्मति से आप एक ऐसा भार उठाए हुए हैं जो आपके लिए कष्टदायक होने की अपेक्षा कहीं अधिक तेजस्वी और सम्मानजनक है, क्योंकि सब आपके अधिकार का आदर करते हैं, और प्रेम तथा प्रशंसा दोनों के द्वारा अपना सम्मान प्रकट करते हैं।
परमेश्वर के इन उपकारों के अतिरिक्त यह प्रमुख उपकार भी है, जिसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए,—कि आपके ज्येष्ठ पुत्र एरिक, जो आपके अपने रक्त में से आपके द्वारा चुना गया उत्तराधिकारी है, न केवल उदार स्वभाव के हैं, वरन् परिपक्व सद्गुणों से भी विभूषित हैं; और यदि आपके कोई सन्तान न होती, तो प्रजा अपने लिए इनसे अधिक योग्य किसी को शायद ही चुन पाती। और अन्य बातों के साथ उनकी यह दुर्लभ प्रशंसा है कि उन्होंने उदार विद्याओं में इतनी उन्नति की है कि विद्वानों में उनका ऊँचा स्थान है, और वे उनमें परिश्रमपूर्वक लगे रहने से नहीं थकते, जहाँ तक उन अनेक चिन्ताओं और व्यस्तताओं के बीच, जिनमें राजकीय पद उलझा रहता है, उन्हें अवकाश मिलता है। साथ ही मेरे लिए मुख्य बात यह है कि उन्होंने अपने राजभवन में न केवल अन्यजातीय कला-देवियों (muses) के लिए, वरन् स्वर्गीय ज्ञान के लिए भी एक पवित्र-स्थान समर्पित किया है। इसलिए मुझे और भी अधिक भरोसा है कि वहाँ इन टीकाओं को कुछ स्थान मिलेगा और कुछ अनुग्रह दिखाया जाएगा, जिन्हें वे सच्चे धर्म के नियम के अनुसार लिखी हुई पाएँगे, और जिन्हें वे अपने लिए भी कुछ थोड़ी-सी सहायता देनेवाली समझेंगे।
हे परम प्रशान्त राजा! परमेश्वर महामहिम को दीर्घकाल तक समृद्धि में बनाए रखे, और आपको सब प्रकार की आशीषों से निरन्तर सम्पन्न करता रहे। वह अपने आत्मा के द्वारा आपकी अगुवाई करे, जब तक कि आप अपनी दौड़ पूरी करके पृथ्वी से स्वर्गीय राज्य को प्रस्थान न करें, और अपने पीछे परम प्रशान्त राजा एरिक को, जो आपका उत्तराधिकारी है, और उसके परम यशस्वी भाइयों, जॉन मैग्नस और चार्ल्स को जीवित छोड़ जाएँ: और आपकी मृत्यु के पश्चात् परमेश्वर का वही अनुग्रह उनमें भी प्रमुख रूप से प्रकट हो, और साथ ही भाईचारे का एकचित्त मेल भी।
जिनेवा, 26 जनवरी, 1559।
कैल्विन का पाठक के नाम पत्र
मसीही पाठक को, कुशल-क्षेम। चूँकि मैं सच्चाई और न्याय के साथ यह कह सकता हूँ, और योग्य साक्षियों के द्वारा प्रमाणित भी कर सकता हूँ, कि जो रचनाएँ मैंने अब तक जनता के सामने प्रकाशित की हैं, और जिन्हें अधिक सावधानी और ध्यान के साथ पूरा किया जा सकता था, वे लगभग आग्रह के बल पर मुझसे छीन ली गई हैं, इसलिए यह स्पष्ट है कि ये टिप्पणियाँ, जिन्हें मैंने सुनने योग्य तो समझा था परन्तु पढ़े जाने योग्य नहीं, मेरे द्वारा कभी प्रकाश में न लाई जातीं। क्योंकि यदि बहुत-सी रातें जागकर भी मैं अपने मनन के द्वारा कलीसिया को थोड़ा-सा भी लाभ पहुँचाने में कठिनाई से सफल हो पाता हूँ, तो मेरे लिए यह कितनी मूर्खता होती कि मैं अपने प्रवचनों के लिए प्रकाशित ग्रन्थों के बीच स्थान का दावा करूँ? इसके अतिरिक्त, यदि उन रचनाओं के विषय में भी, जिन्हें मैं घर पर एकान्त में लिखता या लिखवाता हूँ, जब मनन के लिए अधिक अवकाश होता है और जब सावधानी और परिश्रम से परिपूर्ण संक्षिप्तता प्राप्त होती है, द्वेषी और ईर्ष्यालु लोग मेरे परिश्रम को अपराध ठहराते हैं, तो मैं ढिठाई के आरोप से कैसे बच सकता हूँ, यदि अब मैं उन विचारों को, जिन्हें मैंने अपने श्रोताओं की तात्कालिक उन्नति के लिए स्वतन्त्रता से उँडेल दिया था, सारे संसार पर पढ़ने के लिए थोप दूँ? परन्तु चूँकि उन्हें दबा देना मेरे वश में न था, और उनके प्रकाशन को मैं किसी और रीति से नहीं रोक सकता था सिवाय इसके कि सारी सामग्री को नए सिरे से लिखने का परिश्रम उठाऊँ (जिसकी मेरी परिस्थितियाँ अनुमति नहीं देती थीं), और बहुत-से मित्र, यह समझकर कि मैं अपने परिश्रम का अत्यन्त कठोर न्यायी हूँ, पुकार उठे कि मैं कलीसिया की हानि कर रहा हूँ, इसलिए मैंने यही उचित समझा कि यह खण्ड, जैसा मेरे मुख से लिया गया है वैसा ही, जनता के बीच जाने दूँ, बजाय इसके कि मना करके मैं स्वयं पर लिखने की विवशता डाल लूँ; जैसा कि भजन संहिता के विषय में मुझे करना पड़ा, इससे पहले कि उस लम्बे और कठिन कार्य के द्वारा मैं यह जान पाता कि इतना अधिक लिखने के लिए मैं कितना असमर्थ हूँ।
2 उस समय वह भजन संहिता पर अपनी टीकाएँ लिखने में लगा हुआ था; और वे अगले जुलाई में प्रकाशित हुईं। — सं.
अतः होशे पर ये व्याख्याएँ प्रकाशित हों, जिन्हें जनता से रोक रखना मेरे वश में नहीं है। परन्तु वे किस प्रकार लिखी गईं, यह बताना आवश्यक है, न केवल इसलिए कि जिन लोगों ने कलीसिया के लिए यह परिश्रम किया है उनकी लगन, उद्यम और कौशल अपनी प्रशंसा से वंचित न रहें, परन्तु इसलिए भी कि पाठक पूर्ण रूप से आश्वस्त हो जाएँ कि यहाँ कुछ भी जोड़ा नहीं गया है, और लिखनेवालों ने किसी एक शब्द को भी उससे उत्तम शब्द से बदलने की छूट स्वयं को नहीं दी। उन्होंने एक दूसरे की किस प्रकार सहायता की, इसे उन्हीं में से एक, मेरा परम मित्र, जो अपने सद्गुणों के कारण सब भले लोगों का प्रिय है, श्रीमान जॉन बुडेयस, जैसी मुझे आशा है, अधिक विस्तार से समझाएगा।
परन्तु यह मुझे अविश्वसनीय लगता, यदि मैंने स्पष्ट रूप से न देखा होता, जब अगले दिन उन्होंने सारी सामग्री मुझे पढ़कर सुनाई, कि जो कुछ उन्होंने लिखा था वह मेरे प्रवचन से तनिक भी भिन्न न था। सम्भवतः अच्छा होता यदि अनावश्यक बातों को काट देने, क्रम को अधिक व्यवस्थित करने, और कहीं-कहीं अधिक स्पष्ट या सुरुचिपूर्ण भाषा का प्रयोग करने की अधिक स्वतन्त्रता ली जाती; परन्तु मैं अपना निर्णय बीच में नहीं डालता; केवल इतनी ही गवाही मैं अपने हाथ से देना चाहता हूँ कि जो कुछ उन्होंने मेरे मुख से सुना, उसे उन्होंने इतनी विश्वासयोग्यता से लिखा है कि मुझे कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। हे मसीही पाठक, तू जो कोई भी हो, जो मेरे साथ स्वर्गीय सत्य में उन्नति करने की अभिलाषा रखता है, विदा।
जिनेवा, 13 फ़रवरी, 1557।
बुडेयस का पाठक के नाम पत्र
मसीही पाठकों को, कुशल-क्षेम। जब कुछ वर्ष पहले परम विद्वान जॉन कैल्विन ने अपने मित्रों के अनुरोध और विनती पर पाठशाला में दाऊद के भजनों की व्याख्या करने का कार्य हाथ में लिया, तब हममें से कुछ, जो उसके श्रोता थे, आरम्भ से ही अपनी-अपनी रीति से, अपने निजी मनन के लिए, अपने विवेक और समझ के अनुसार, कुछ थोड़ी-सी बातें लिख लिया करते थे। परन्तु अन्ततः अपने ही अनुभव से चेतावनी पाकर हम सोचने लगे कि यदि ऐसे व्याख्यानों का लाभ कुछ ही श्रोताओं तक सीमित रह जाए तो बहुतों की, वरन् लगभग समस्त कलीसिया की, कितनी बड़ी हानि होगी। इसलिए साहस बटोरकर हमने पूर्ण रूप से यह समझा कि अपने निजी लाभ के साथ सार्वजनिक हित की चिन्ता और परवाह को जोड़ना हमारा कर्तव्य है; और यह सम्भव प्रतीत हुआ, यदि अपनी सामान्य रीति पर चलने के बजाय हम, जहाँ तक हो सके, व्याख्यानों को शब्दशः लिखने का प्रयत्न करें। बिना विलम्ब मैं इस उद्यम में दो उत्साही भाइयों के साथ तीसरा होकर जुड़ गया; और परमेश्वर की कृपा से ऐसा हुआ कि हमारे प्रयास को शुभ परिणाम से पूरी तरह वंचित नहीं रहना पड़ा: क्योंकि जब हममें से प्रत्येक के परिश्रम की आपस में तुलना की गई, और व्याख्यान तुरन्त लिखकर तैयार किए गए, तब हमने पाया कि इतनी कम बातें हमसे छूटी थीं कि उन रिक्त स्थानों को सहज ही भरा जा सकता था। और जिस कार्य में हमारी क्षमताओं की पहली परीक्षा हुई, उसके विषय में ऐसा ही था, इसका साक्षी स्वयं कैल्विन है; और होशे पर दिए गए व्याख्यानों के विषय में यह कहीं अधिक पूर्ण रूप से हुआ है (क्योंकि लम्बे अभ्यास और प्रयोग से हम अधिक निपुण हो गए थे), इसे सब श्रोता भी सहर्ष स्वीकार करेंगे।
परन्तु इस अवसर पर हमारा उद्देश्य यह था कि, यदि सम्भव हो, उसे इस लेखक पर सम्पूर्ण टीकाएँ प्रकाशित करने के लिए प्रेरित करें; परन्तु तब हमारी अपेक्षा के विपरीत हुआ: क्योंकि इस उद्देश्य को प्राप्त करने की सारी आशा उसने ब्यूसर के प्रति आदर के कारण हमसे काट दी, जिसने इस विषय में भी, जैसे अन्य सब बातों में, अत्यन्त विश्वासयोग्य और अत्यन्त उपयोगी सेवाएँ की थीं, जैसा कि सारी कलीसिया स्वीकार करती है, और जैसा कि विशेष रूप से कैल्विन ने सदा हमारे सामने और सबके सामने अत्यन्त सम्मान के साथ घोषित किया है। अतः यही शेष रहा कि व्याख्यान, जैसे हमने लिखे थे, प्रकाशित किए जाएँ। और चूँकि सब परम भक्त लोगों ने हमारे परिश्रम से अपने लिए बड़े लाभ की आशा बाँधी थी, इसलिए हम प्रतिदिन अपने प्रयत्न बढ़ाते गए, ताकि ऐसी आशा धुएँ में उड़ न जाए। इन अभिलाषाओं से, और निःसन्देह भक्तों को लाभ पहुँचाने की सम्भावना से भी प्रेरित होकर, हमने इतना परिश्रम किया कि सबने सहज ही स्वीकार किया कि हमने बड़ी से बड़ी लगन से कम कुछ नहीं किया। इससे यह और भी आश्चर्यजनक प्रतीत हो सकता है कि बाद में वह अपना मन बदलने के लिए प्रेरित हुआ, जिससे हमारी और बहुत-से भक्तों की आशा निष्फल हो गई; और दूसरी ओर, कलीसिया की अत्यन्त उपयोगी सेवा करने के लिए चाहे वह कितना ही उत्सुक क्यों न हो, उसे बहुतों की बड़ी ईर्ष्या और अमिट घृणा का भागी बनने के लिए विवश होना पड़ा। परन्तु जो लोग इस विषय में केवल ब्यूसर के अधिकार की दुहाई देते हैं, वे, मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ, ऐसे कारण से प्रेरित हैं जो पूर्णतः अनुचित नहीं है; तौभी वे मुझे अत्यन्त हठी और अडिग प्रतीत होंगे, यदि वे पर्याप्त सफ़ाई से प्रभावित होना स्वीकार न करें; और मुझे आशा है कि शीघ्र ही ऐसा हो जाएगा। परन्तु जो लोग निन्दा करने के उन्मत्त प्रेम में बह जाते हैं, और कलह का छोटे से छोटा अवसर भी हाथ से नहीं जाने देते, जैसे सब भक्तों को उनकी उपेक्षा करनी चाहिए और उन्हें दानवों के समान घृणित समझना चाहिए, वैसे ही उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए अधिक परिश्रम करना आवश्यक नहीं; क्योंकि कुत्तों का भौंकना, यदि वह कलीसिया को हानि न पहुँचाए, बिना किसी बड़े संकट के अनसुना और तुच्छ किया जा सकता है।
ये बातें हमने वास्तव में उन लोगों के लिए आरम्भ में कही हैं जिन्होंने भजन संहिता पर दिए गए व्याख्यानों के विषय में हमसे बार-बार आग्रह किया है, ताकि वे यह न समझें कि हमने उन्हें व्यर्थ की आशा देकर धोखा दिया है; क्योंकि वे जान लें कि परमेश्वर की कृपा से किसी समय उन्हें भजन संहिता की पुस्तक पर शुद्ध और सम्पूर्ण टीकाएँ प्राप्त होंगी। परन्तु यदि यह लम्बी लालसा उन्हें बहुत व्याकुल करती है, तो वे स्मरण रखें कि हम भी उस महान निधि की उतनी ही उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। परन्तु उचित है कि हम दोनों उस मनुष्य को क्षमा करें जो निरन्तर और अत्यन्त भारी कार्यों में लगा रहता है, और अपनी अत्यधिक उतावली और असामयिक इच्छाओं को कुछ संयमित करें: और उसके प्रति रियायत करना इसी एक कारण से भी उचित प्रतीत होता है कि वह स्वयं अपने प्रति सबसे कम रियायत करता है, और अपने विशाल परिश्रम से कभी विश्राम या मन का अवकाश नहीं लेता; यहाँ तक कि किसी को इसमें सन्देह नहीं कि वह एक छोटी-सी देह को, केवल ईश्वरीय कृपा से ही नहीं, वरन् एक अनुपम आश्चर्यकर्म से, जिसका वर्णन आनेवाली पीढ़ियों से नहीं किया जा सकता, घसीटता चलता है, — ऐसी देह जो स्वभाव से दुर्बल है, बार-बार की बीमारियों से बुरी तरह आक्रान्त है, और फिर अपार परिश्रम से थकी हुई है; और अन्त में, अभक्तों के निरन्तर डंकों से बिंधी हुई, और चारों ओर से सब प्रकार की निन्दाओं से पीड़ित और सताई हुई है।
परन्तु चूँकि यह शिकायतें करने का स्थान नहीं है, इसलिए अब मैं आपके पास आता हूँ, हे मसीही पाठको, जिन्हें यह कार्य, अर्थात् भविष्यद्वक्ता होशे पर व्याख्यान, समर्पित करना हमारा उद्देश्य है; और हम इसे समर्पित करते हैं, इसलिए नहीं कि हम इसमें किसी बात को अपना होने का दावा करते हैं, सिवाय उस लगन के जो हमने इसे संकलित करने में लगाई; परन्तु हम इसे, मानो, अपना बनाने में संकोच नहीं करते, क्योंकि हमारी सहायता के बिना यह आप तक कभी न पहुँचता। क्योंकि यद्यपि जो कार्य अब कलीसिया को अर्पित किया जा रहा है उसे हमने सर्वथा उत्कृष्ट समझा, तौभी अन्त में हम उसके लेखक को इस बात का विश्वास कठिनाई से दिला सके; और उसने केवल इस शर्त पर हमारी आग्रहपूर्ण विनतियों के आगे स्वयं को हारने दिया कि भले लोग इस कार्य के विषय में जो भी निर्णय करें उसके उत्तरदायी हम होंगे: अपनी रचनाओं का वह ऐसा अयोग्य न्यायी है। परन्तु हम, यद्यपि वह नम्रता से उन्हें उचित से अधिक घटाकर आँके, तौभी अपने लिए यह आशा करने का साहस करते हैं कि न केवल लेखक के परिश्रम का आप उचित मूल्यांकन करेंगे, वरन् हम भी अपने लिए कोई साधारण नहीं, वरन् विशेष अनुग्रह प्राप्त करेंगे।
हमें भरोसा है कि ये व्याख्यान आपको इस कारण कम ग्रहणयोग्य न होंगे कि लेखक ने पाठशाला के लाभ का ध्यान रखते हुए (जैसा कि उचित था) अपनी अन्य सब रचनाओं की सामान्य लालित्य-शैली और शैली के अलंकरण से कुछ हद तक हटकर बात कही। क्योंकि कार्यों के विशाल भार से दबे होने के कारण उसे अधिकतर इन व्याख्यानों पर मनन करने के लिए कठिनाई से आधा घण्टा मिलने के बाद ही घर से निकलना पड़ता था: उसने शब्दों के व्यर्थ आडम्बर से अपने श्रोताओं के कानों को प्रसन्न करने, या दिखावे और अपनी महिमा का ध्यान रखने के बजाय, सच्चे अर्थ को निकालकर और उसे स्पष्ट करके उनकी उन्नति और लाभ को बढ़ाना अधिक उचित समझा। साथ ही, मैं इस बात से इनकार नहीं करूँगा कि ये व्याख्यान वक्तृत्व की शैली की अपेक्षा अधिकतर पाठशाला की शैली में दिए गए थे। तौभी, यदि यह सरल, यद्यपि अनगढ़ नहीं, बोलने की रीति किसी को खटके, तो वह दूसरों की रचनाओं की ओर, या स्वयं इसी लेखक की रचनाओं की ओर मुड़े, विशेषकर उनकी ओर जिनमें वह पाठशाला के नियमों से मुक्त होकर किसी प्रख्यात धर्मविज्ञानी से कम वक्ता नहीं दिखाई देता: और यह बात हम बिना संकोच, और उतनी ही नम्रता के साथ जितनी परम श्रेष्ठ और परम विद्वान लोगों की पूर्ण सहमति और अनुमोदन के साथ, घोषित करते हैं।
हम सचमुच इस प्रकार इसलिए नहीं बोलते कि मानो छिद्रान्वेषी अहंकार से हम वक्ता होने की महिमा केवल उसी के लिए माँगें, या उसे धर्मविज्ञानी कहकर बहुत-से अन्य लोगों को प्रसिद्ध पुरुष स्वीकार न करें। ऐसी मूर्खता हमसे दूर रहे। परन्तु अपने मन की गवाही देने का ऐसा अवसर मिलने पर हम किसी अन्य रीति से भक्तों के सामने अपनी उपेक्षा का कठिनाई से ही कोई बहाना कर सकते थे, जिन्हें यह भली-भाँति ज्ञात है कि कैल्विन के विषय में हमारी चुप्पी अब तक उपद्रवी लोगों को अच्छी नहीं लगी है; जो इस बात को अधिक पसन्द करते हैं कि हम स्पष्ट शब्दों में उनकी व्यर्थता की निन्दा करें, बजाय इसके कि वे हमें मौन सहमति और नम्र चुप्पी के द्वारा या तो उसकी शिक्षा का अनुमोदन करने, और उसमें अपने प्रति परमेश्वर की कृपा का अत्यन्त स्पष्ट प्रमाण स्वीकार करने दें, या भाईचारे की उपेक्षा से उनके उन्माद को ढाँप देने दें; और इस प्रकार हममें से प्रत्येक को अकेले मौन में विलाप करना पड़ता।
परन्तु, जैसा मैंने कहा, यहाँ भाषा अलंकाररहित और सरल है, ठीक वैसी ही जैसी हम जानते हैं कि पहले व्याख्यानों में सदा प्रयोग की जाती थी: वैसी नहीं जैसी बहुत-से लोग, जिनके विषय में हमने सुना है, प्रयोग करते हैं, जो अपने श्रोताओं के सामने किसी लिखे हुए कागज़ से वह दोहराते हैं जो पहले घर पर तैयार किया गया था; परन्तु ऐसी जो उसी समय गढ़ी और रची जा सकती थी, और जो कानों को प्रसन्न करने की अपेक्षा सिखाने और उन्नति करने के लिए अधिक उपयुक्त थी। अतः यदि हम बहुत बड़ी भूल में नहीं हैं, तो वह भविष्यद्वक्ता के मन को लगभग सजीव रूप में ऐसा व्यक्त करता है कि उसमें कुछ भी जोड़ना सम्भव नहीं प्रतीत होता। क्योंकि प्रत्येक वाक्य की सावधानी से जाँच करने के बाद वह संक्षेप में शिक्षा का उपयोग और प्रयोग दिखाता है, जिससे कोई भी, चाहे वह कितना ही अज्ञानी क्यों न हो, अर्थ समझने में भूल नहीं कर सकता: संक्षेप में, वह सच्चे धर्मविज्ञान के विषयों और सोतों को इस प्रकार खोलता और प्रकट करता है कि किसी के लिए भी उनमें से वह सब निकाल लेना सहज है जो प्राण को पुनर्स्थापित करने और ताज़गी देने के लिए आवश्यक है; हाँ, वचन के सेवक यहाँ से लाभ के साथ भरपूर धाराएँ प्राप्त कर सकते हैं, जिनसे, मानो स्वर्गीय ओस के द्वारा, वे परमेश्वर की प्रजा को, चाहे उपदेश से, चाहे शान्ति से, चाहे ताड़ना से, चाहे उन्नति से, भरपूर ताज़गी दे सकें। और इन बातों के कुछ दृष्टान्त और उदाहरण हम उसके सब प्रवचनों में स्पष्ट देखते हैं, विशेषकर उनमें जिनमें वह भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा को हमारे अपने समय के अनुरूप ऐसा ढालता है कि वह उनके युग के लिए हमारे युग से अधिक उपयुक्त नहीं प्रतीत होती।
परन्तु अन्ततः समाप्त करने के लिए, हे मसीही पाठको, यह शेष रहता है कि हम परमेश्वर के अन्य सब असंख्य वरदानों को, जिन्हें वह प्रतिदिन बड़ी बहुतायत से हम पर उँडेलता है, और उसकी भलाई की इस अनुपम निधि को भी, उचित कृतज्ञता के साथ ग्रहण करें और अपनाएँ, और उन्हें उसके नाम की महिमा के लिए और अपने भाइयों की उन्नति के लिए पवित्र और भक्तिपूर्ण जीवन बिताने के उद्देश्य से काम में लाएँ: और ऐसा हो सके, इसके लिए हमें परमेश्वर के आत्मा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, कि हम उससे शिक्षा पाकर पवित्रशास्त्र के पठन के लिए आएँ, और शरीर की अशुद्धताओं से शुद्ध किया हुआ मन, और स्वर्गीय सत्य को ग्रहण करने योग्य नम्र आत्मा लेकर आएँ। और इस उद्देश्य के लिए उन छोटी प्रार्थनाओं से हमें बहुत सहायता मिल सकती है जिन्हें हमने प्रत्येक व्याख्यान के अन्त में जोड़ने का ध्यान रखा है, क्योंकि वे हमारे द्वारा उसी सावधानी और विश्वासयोग्यता से एकत्र की गई हैं जिससे व्याख्यान: इनके द्वारा भक्तों के मन ताज़गी पा सकते हैं, और अगले व्याख्यान के लिए नई शक्ति बटोर सकते हैं; और अज्ञानी लोगों के सामने भी इनमें, मानो, एक चित्रित आदर्श होगा, जिसके अनुसार वे पवित्रशास्त्र के शब्दों से अपनी प्रार्थनाएँ रच सकें। क्योंकि जैसे व्याख्यानों के आरम्भ में वह सदा प्रार्थना के एक ही रूप का प्रयोग करता था, जिसे हम भी जोड़ने का विचार रखते हैं, ताकि उसकी शिक्षा देने की रीति आपको पूर्ण रूप से ज्ञात हो जाए; वैसे ही वह प्रत्येक व्याख्यान को उसी समय रची गई एक नई प्रार्थना से समाप्त करने का अभ्यस्त था, जैसी परमेश्वर का आत्मा उसे देता था, और जो व्याख्यान के विषय के अनुरूप होती थी।
यदि हमें यह ज्ञात हो कि ये टीकाएँ आपको ग्रहणयोग्य होंगी, यद्यपि यह कार्य दूसरे के परिश्रम का फल है, तो भी हम, परमेश्वर की कृपा से, शेष भविष्यद्वक्ताओं के विषय में भी ऐसा ही करने का वचन देंगे। जब वह उन पर व्याख्यान देना आरम्भ करेगा, तब हमारा उद्देश्य है कि उतनी ही लगन से उसका अनुसरण करें, और जो कुछ शेष है उसे अन्त तक लिख लें। तब तक, इनका आनन्द लें। विदा।
जिनेवा, 14 फ़रवरी, 1557।
क्रिस्पिन का पाठक के नाम पत्र
मसीही पाठकों को, कुशल-क्षेम। चूँकि कुछ लोगों को यह आश्चर्यजनक, और वास्तव में अविश्वसनीय, प्रतीत हो सकता है कि ये व्याख्यान ऐसी विश्वासयोग्यता और सावधानी से लिखे गए कि श्रीमान जॉन कैल्विन ने उन्हें देते समय एक भी ऐसा शब्द नहीं कहा जो तुरन्त लिख न लिया गया हो; इसलिए यहाँ भक्त पाठकों को संक्षेप में उस रीति का स्मरण दिलाना आवश्यक हो सकता है जिसका अनुसरण उन लोगों ने किया जिन्होंने इन्हें हम तक पहुँचाया है। और यह इसलिए किया जाता है कि उनकी अनुपम लगन और उद्यम दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए उत्तेजित करें, और यह बात स्वयं अविश्वसनीय न लगे।
और, पहले, यह स्मरण रखना चाहिए कि कैल्विन ने स्वयं, जैसा बहुत-से लोग करते हैं, अपने किसी व्याख्यान को कभी नहीं लिखवाया, न ही कोई आदेश दिया कि जब वह पवित्रशास्त्र की व्याख्या कर रहा हो तब कुछ लिख लिया जाए, व्याख्यान समाप्त होने के बाद या उसके दिए जाने के अगले दिन तो और भी कम; परन्तु वह पूरा एक घण्टा बोलने में लगाता था, और अपनी स्मृति की सहायता के लिए अपनी पुस्तक में एक शब्द भी लिखने का अभ्यस्त न था। इसलिए जब कुछ वर्ष पहले श्रीमान जॉन बुडेयस और चार्ल्स जॉनविल ने, दो अन्य भाइयों के साथ (जिनका उल्लेख बुडेयस ने स्वयं अपनी प्रस्तावना में किया है, और ऐसा ही था, यह बहुत-से लोग जानते हैं), भजन संहिता की व्याख्या लिखते समय पाया कि उनका सम्मिलित परिश्रम पूर्णतः व्यर्थ न होगा, तब वे और भी प्रबल अभिलाषा और मन की तत्परता से प्रेरित हुए, यहाँ तक कि उन्होंने निश्चय किया कि, यदि सम्भव हो, पहले से अधिक लगन के साथ उस सम्पूर्ण व्याख्या को लिख लें जो बारह लघु भविष्यद्वक्ता कहलानेवाली पुस्तकों पर दी जाएगी। और लिखने में उन्होंने यह रीति अपनाई। प्रत्येक ने अपना कागज़ सबसे सुविधाजनक रूप में तैयार रखा, और प्रत्येक अपने आप बड़ी से बड़ी शीघ्रता से लिखता था। यदि कोई शब्द किसी एक से छूट जाता (जो कभी-कभी होता था, विशेषकर विवाद के विषयों पर और उन अंशों में जो कुछ आवेश के साथ कहे जाते थे), तो उसे दूसरा पकड़ लेता था; और जब ऐसा होता, तो लिखनेवाला उसे सहज ही फिर से लिख लेता था। व्याख्यान समाप्त होते ही जॉनविल अन्य दो के कागज़ अपने साथ ले जाता, उन्हें अपने सामने रखकर, और अपने कागज़ों को देखते हुए, और उन सबको आपस में मिलाते हुए, वह किसी अन्य व्यक्ति को लिखवाता था ताकि जो उन्होंने जल्दी में लिखा था उसकी प्रतिलिपि तैयार हो जाए। अन्त में वह स्वयं सारी सामग्री को पढ़ता था, ताकि अगले दिन घर पर श्रीमान कैल्विन के सामने उसे सुना सके। जब कभी कोई छोटा-सा शब्द छूटा होता, तो उसे उसके स्थान पर जोड़ दिया जाता था; या, यदि कोई बात पर्याप्त रूप से स्पष्ट न दिखाई देती, तो उसे तत्परता से और अधिक स्पष्ट कर दिया जाता था।
इस प्रकार ये व्याख्यान प्रकाश में आए; और जो लोग इन्हें गम्भीरता से पढ़ेंगे वे इनसे कितना बड़ा लाभ प्राप्त करेंगे, इसका वर्णन किसी प्रकार नहीं किया जा सकता: क्योंकि स्वस्थ विवेक से सम्पन्न कौन ऐसा है जो यह न देखे कि पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने की जो रीति इस परम प्रतिष्ठित पुरुष के पास थी, वह बहुत ही थोड़े लोगों में उसके समान पाई जाती है? वह सर्वत्र पवित्र आत्मा के अभिप्राय को ऐसा खोलता है, उसका वास्तविक अर्थ ऐसा देता है, और प्रत्येक गूढ़ शिक्षा को भी हमारी आँखों के सामने ऐसा रखता है कि आप ऐसा कुछ नहीं पाते जो खुलकर समझाया न गया हो; और इसी की गवाही उसकी बहुत-सी रचनाएँ अत्यन्त भरपूरी से देती हैं, जिनमें उसने मसीही धर्म के प्रत्येक विषय को इतना स्पष्ट कर दिया है कि सब लोग, जब तक वे सूर्य के प्रति पूर्णतः अन्धे न हों, उसे अत्यन्त विश्वासयोग्य व्याख्याता स्वीकार करते हैं।
परन्तु उसकी बहुत-सी टीकाओं के विषय में अभी कुछ न कहूँ, तो भी इन व्याख्यानों में उसने स्वयं को ऐसा पार कर लिया है कि कोई कठिनाई से ही अपने को यह विश्वास दिला सकता है कि इतनी सुरुचिपूर्ण और अपने सब अंगों में इतनी परिपूर्ण शैली बिना पूर्व-तैयारी के प्रवाहित हुई हो, क्योंकि वह सबसे गम्भीर विचारों को उपयुक्त शब्दों में समझाता है, अस्पष्ट बातों को स्पष्टता से प्रस्तुत करता है, उन्हें विविध अलंकारों से सुसज्जित करता है, और अपनी शिक्षा में ऐसे आगे बढ़ता है कि जो भाषा वह प्रयोग करता है, यद्यपि स्वाभाविक रूप से उँडेली गई, ऐसी प्रतीत होती है मानो उस पर लम्बे समय तक और बहुत परिश्रम किया गया हो। परन्तु इन सब बातों के विषय में मैं यह अधिक पसन्द करता हूँ कि पढ़कर निर्णय किया जाए, बजाय इसके कि मैं अलग-अलग बातों की लम्बी चर्चा से पाठकों को और अधिक रोके रखूँ। तो विदा, तुम सब जो इन व्याख्यानों से कुछ लाभ की आशा रखते हो।
जिनेवा, 1 फ़रवरी, 1559।
विषय-सार
भविष्यद्वक्ता होशे पर जॉन कैल्विन की टीकाएँ। वह प्रार्थना जिसका प्रयोग जॉन कैल्विन अपने व्याख्यानों के आरम्भ में किया करता था: प्रभु ऐसा अनुग्रह करे कि हम उसकी स्वर्गीय बुद्धि के भेदों के मनन में सचमुच बढ़ती हुई भक्ति के साथ लगे रहें, उसकी महिमा के लिए और अपनी उन्नति के लिए। आमीन।
विषय-सार। मैंने बारह लघु भविष्यद्वक्ताओं की व्याख्या करने का कार्य हाथ में लिया है। वे बहुत पहले से एक साथ जोड़ दिए गए हैं, और उनके लेख एक ही खण्ड में संकलित कर दिए गए हैं; और इसका कारण यह है कि कहीं ऐसा न हो कि हमारे हाथों में अलग-अलग विद्यमान रहने के कारण वे, जैसा प्रायः होता है, अपनी संक्षिप्तता के कारण समय बीतने पर लुप्त हो जाएँ।
अतः बारह लघु भविष्यद्वक्ता एक ही खण्ड बनाते हैं। उनमें से पहला होशे है, जो विशेष रूप से इस्राएल के राज्य के लिए ठहराया गया था: मीका और यशायाह ने उसी समय यहूदियों के बीच भविष्यद्वाणी की। परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि यह भविष्यद्वक्ता इस्राएल के राज्य में शिक्षक था, जैसे यशायाह और मीका यहूदा के राज्य में थे। निःसन्देह प्रभु का अभिप्राय उसे उसी भाग में काम में लाने का था; क्योंकि यदि उसने यहूदियों के बीच भविष्यद्वाणी की होती, तो वह उनकी चापलूसी न करता; क्योंकि उस समय दशा अत्यन्त बिगड़ी हुई थी, न केवल यहूदिया में, वरन् यरूशलेम में भी, यद्यपि परमेश्वर का राजभवन और पवित्रस्थान वहीं थे। हम देखते हैं कि यशायाह और मीका ने लोगों को कितनी तीक्ष्णता और कठोरता से डाँटा; और यदि प्रभु ने यहूदियों के बीच उसकी सेवा ली होती, तो हमारे भविष्यद्वक्ता की शैली भी वैसी ही होती: परन्तु उसने अपनी बुलाहट का अनुसरण किया। वह जानता था कि प्रभु ने उसे क्या सौंपा है; उसने अपना पद विश्वासयोग्यता से निभाया। भविष्यद्वक्ता आमोस के विषय में भी ऐसा ही था: क्योंकि भविष्यद्वक्ता आमोस इस्राएलियों के विरुद्ध तीक्ष्णता से बोलता है, और यहूदियों को छोड़ता हुआ प्रतीत होता है; और उसने होशे के ही समय में शिक्षा दी।
अतः हम देखते हैं कि ये चारों किस बात में भिन्न हैं: यशायाह और मीका अपनी ताड़नाएँ यहूदा के राज्य को सम्बोधित करते हैं; और होशे और आमोस केवल इस्राएल के राज्य पर आक्रमण करते हैं, और यहूदियों को छोड़ते हुए प्रतीत होते हैं। उनमें से प्रत्येक ने वही कार्य हाथ में लिया जो परमेश्वर ने उसे सौंपा था; और इस प्रकार प्रत्येक ने स्वयं को अपनी बुलाहट और पद की सीमाओं के भीतर रखा। क्योंकि यदि हम, जो कलीसिया को शिक्षा देने के लिए बुलाए गए हैं, उसमें प्रचलित पापों की ओर से अपनी आँखें मूँद लें, और उन लोगों की उपेक्षा करें जिन्हें प्रभु ने हमारे द्वारा सिखाए जाने के लिए ठहराया है, तो हम सारी व्यवस्था को गड़बड़ा देते हैं; क्योंकि जो दूसरे स्थानों के लिए ठहराए गए हैं, उन्हें उन्हीं पर ध्यान देना चाहिए जिनके पास वे प्रभु की बुलाहट के द्वारा भेजे गए हैं।
अतः अब हम देखते हैं कि होशे की यह सारी पुस्तक किससे सम्बन्ध रखती है, — अर्थात् इस्राएल के राज्य से।
परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के विषय में यह बात उन सब पर लागू होती है, जैसा हम कभी-कभी कह चुके हैं, कि वे व्यवस्था के व्याख्याता हैं। और व्यवस्था का सार यह है कि परमेश्वर उन लोगों पर, जिन्हें उसने गोद लिया है, अपने अधिकार से शासन करना चाहता है। परन्तु व्यवस्था के दो भाग हैं, — उद्धार और अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा, और भक्तिपूर्ण और पवित्र जीवन का नियम। इनके साथ एक तीसरा भाग जोड़ा गया है, — कि जो मनुष्य अपनी बुलाहट का प्रत्युत्तर नहीं देते, उन्हें धमकियों और ताड़नाओं के द्वारा परमेश्वर के भय में लौटाया जाए। भविष्यद्वक्ता आगे यह भी सिखाते हैं कि व्यवस्था ने परमेश्वर की सच्ची और शुद्ध आराधना के विषय में, और प्रेम के विषय में क्या आज्ञा दी है; संक्षेप में, वे लोगों को पवित्र और भक्तिपूर्ण जीवन की शिक्षा देते हैं, और फिर उनके सामने प्रभु की कृपा प्रस्तुत करते हैं। और चूँकि एक मध्यस्थ के बिना परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप की कोई आशा नहीं है, इसलिए वे सदा उस मसीह को सामने रखते हैं, जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने बहुत पहले की थी।
जहाँ तक तीसरे भाग का प्रश्न है, जिसमें धमकियाँ और ताड़नाएँ सम्मिलित हैं, वह भविष्यद्वक्ताओं की विशेषता थी; क्योंकि वे समय बताते हैं, और परमेश्वर के इस या उस न्याय की घोषणा करते हैं: "प्रभु तुम्हें इस रीति से दण्ड देगा, और अमुक समय पर दण्ड देगा।" अतः भविष्यद्वक्ता मनुष्यों को केवल परमेश्वर के न्यायासन के सामने ही नहीं बुलाते, वरन् दण्ड के कुछ निश्चित प्रकार भी बताते हैं, और उसी रीति से वे प्रभु के अनुग्रह और उसके छुटकारे के विषय में भी भविष्यद्वाणियाँ करते हैं। परन्तु इस विषय को मैं केवल संक्षेप में छूता हूँ; क्योंकि आगे बढ़ते हुए प्रत्येक बात पर ध्यान देना अधिक अच्छा होगा।
अब मैं होशे की ओर लौटता हूँ। मैं कह चुका हूँ कि उसकी सेवकाई विशेष रूप से इस्राएल के राज्य से सम्बन्धित थी; क्योंकि उस समय वहाँ परमेश्वर की सारी आराधना अशुद्ध हो चुकी थी, और यह भ्रष्टता हाल ही में आरम्भ नहीं हुई थी; वरन् वे अपने अन्धविश्वासों में इतने हठी थे कि पश्चाताप की कोई आशा न थी। हम निश्चय जानते हैं कि ज्योंही यारोबाम ने दस गोत्रों को सुलैमान के पुत्र रहूबियाम की अधीनता से अलग किया, त्योंही बनावटी आराधना स्थापित कर दी गई: और ऐसा प्रतीत हुआ कि यारोबाम ने यह युक्ति बड़ी चतुराई से रची थी, ताकि लोग दाऊद के घराने की ओर न लौटें; परन्तु साथ ही उसने अपने ऊपर और सारी प्रजा के ऊपर परमेश्वर का प्रतिशोध ला दिया। और जो उसके बाद आए उन्होंने भी उसी अभक्ति का अनुसरण किया। जब ऐसी कुटिलता असहनीय हो गई, तब परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य प्रकट करने, और अपनी अप्रसन्नता का कोई विशेष प्रमाण देने का निश्चय किया, ताकि लोग अन्ततः पश्चाताप करें। इसलिए परमेश्वर की आज्ञा से येहू का इस्राएल के राजा के रूप में अभिषेक किया गया, ताकि वह अहाब के सारे वंश का नाश करे: परन्तु वह भी शीघ्र ही उसी मूर्तिपूजा में फिर गिर पड़ा। उसने परमेश्वर का न्याय पूरा किया, उसने बड़े उत्साह का दिखावा किया; परन्तु उसका कपट शीघ्र ही प्रकट हो गया, क्योंकि उसने झूठी और विकृत आराधना को अपना लिया; और उसके उत्तराधिकारी भी यारोबाम तक, जिसके राज्यकाल में होशे ने भविष्यद्वाणी की, कुछ भी अच्छे न थे; परन्तु इस विषय में हम पुस्तक के शीर्षक पर विचार करते समय कहेंगे।
