यह हिन्दी संस्करण UECF.NET के लिए AI-सहायता से किए गए पूर्ण अनुवाद और सम्पादकीय गुणवत्ता-समीक्षा के द्वारा तैयार किया गया है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
होशे 12
होशे 12:1
1. एप्रैम पवन खाता और पुरवाई का पीछा करता रहता है; वह लगातार झूठ और उत्पात को बढ़ाता रहता है; और वे अश्शूर के साथ वाचा बाँधते और मिस्र में तेल भेजते हैं।
1. Ephraim pascitur vento, et sequitur orientem: quotidie mendacium et vastitatem multiplicat: foedus cum Assyrio percutiunt, et oleum in Aegyptum portatur.
भविष्यद्वक्ता यहाँ लोगों की व्यर्थ आशाओं पर कठोर प्रहार करता है, क्योंकि वे ऐसे अहंकार से फूले हुए थे कि वे सारी शिक्षा और सारी चेतावनियों को तुच्छ जानते थे।
इसलिए सबसे पहले इसी दुर्गुण को सुधारना आवश्यक था, और इसी कारण वह कहता है, एप्रैम पवन खाता है। क्योंकि जब कोई पवन को निगलता है, तो ऐसा प्रतीत तो होता है कि वह अपना मुँह, अपना गला, अपनी छाती और अपना सारा पेट भर रहा है; परन्तु उसमें वायु के सिवा और कुछ नहीं, कोई पोषण नहीं। इसी प्रकार वह कहता है कि इस्राएल अपनी धूर्त युक्तियों पर बहुत भरोसा तो रखता था, परन्तु वह केवल पवन खाना था। वे स्वप्न देखते थे कि जब वे सन्धियाँ कर लेते हैं, जब अश्शूरी और मिस्री दोनों उनके साथी हैं, तब वे सुखी हैं। भविष्यद्वक्ता कहता है, ये केवल झोंके हैं; वरन् वह कहता है, ये हानिकारक झोंके हैं; क्योंकि पूर्व से उसका अभिप्राय पुरवाई से है, जो सूर्योदय की दिशा से बहती है; और यह, जैसा कहा जाता है, यहूदिया में एक सूखी और प्रायः आँधी वाली हवा है। अन्य हवाएँ या तो वर्षा लाती हैं या कोई और लाभ; परन्तु यह हवा सूखे और आँधियों के सिवा कुछ नहीं लाती। अतः इससे प्रकट होता है कि भविष्यद्वक्ता का आशय यह था कि इस्राएल ने अपने इस व्यर्थ भरोसे के द्वारा अपने ऊपर बहुत-से दुःख ले आया और सदा रीता और खोखला ही रहा। तो एप्रैम पवन खाता है, और इससे भी बढ़कर, वह पुरवाई का पीछा करता है।
इसके पश्चात् होशे अपना आशय और भी स्पष्ट करता है; वह कहता है, वह प्रतिदिन झूठ और उजाड़ को बढ़ाता है। झूठ से, मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं, वह उन छलों की ओर संकेत करता है जिनके द्वारा लोग अपने आप को धोखा देते थे, जैसा कपटी लोग करते हैं, जो परमेश्वर को धोखा देने के लिए अपनी बुद्धि को पैना करके अपने आप को बहुत-से घातक फन्दों में उलझा लेते हैं। इसी प्रकार इस्राएल के विषय में भी कहा गया है कि उसने झूठ को बढ़ाया; क्योंकि उन्होंने अपने आप को इतना हठीला बना लिया था कि वे परमेश्वर की शिक्षा के विरुद्ध बिल्कुल कठोर हो गए थे; और इस हठ को इस कारण झूठ कहा गया है कि अविश्वासी मनुष्य, जैसा हम देखते हैं, अपने लिए बहुत-से बहाने गढ़ लेते हैं; और यद्यपि वे छल ही हैं, तौभी जब तक वे कोई ऐसी बात खड़ी कर लेते हैं जिसे वे पर्याप्त रूप से कारगर समझते हैं — न जाने क्या — तब तक वे अपने आप को परमेश्वर की सारी धमकियों से सुरक्षित समझते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता फिर दोहराता है कि उनकी सारी धूर्त योजनाओं में झूठ के सिवा और कुछ नहीं था।
फिर वह इस बात पर और भी अधिक बल देता है, और कहता है कि यह “उजाड़” था, अर्थात् उजाड़ का कारण। तो पहले वह लोगों के व्यर्थ भरोसे का उपहास करता है, क्योंकि वे सोचते थे कि अपने व्यर्थ आडम्बरों से वे परमेश्वर की आँखों पर पट्टी बाँध सकते हैं; वह कहता है, “यह झूठ है, यह छल है।” फिर वह उन पर और भी भारी दबाव डालता है और कहता है, “यह तुम्हारा विनाश है: अन्त में तुम जान लोगे कि अपनी युक्तियों से तुमने विनाश के सिवा और कुछ नहीं पाया।”
यह कैसे? क्योंकि उन्होंने वाचा बाँधी। मैं इस पिछले वाक्यांश को व्याख्यात्मक समझता हूँ: क्योंकि यदि भविष्यद्वक्ता ने केवल सामान्य रूप से बात कही होती, तो लोगों की अभक्ति पर्याप्त रूप से प्रकट न होती; और निश्चिन्त मनुष्यों के मुखौटे फाड़ डालने चाहिए, और उनके अपराधों को मानो चित्रित करके दिखाना चाहिए, कि वे लज्जित हों; क्योंकि जब तक उन्हें मानो सबके सामने घसीट कर न लाया जाए, और उनकी नीचता सबकी दृष्टि के सामने न खोली जाए, तब तक वे सदा अपने गुप्त स्थानों में छिपे रहेंगे। तो यही कारण है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उनके उन छलों को विशेष रूप से बताता है जिनका उसने पहले उल्लेख किया था।
वह कहता है, देखो, उन्होंने अश्शूरी के साथ वाचा बाँधी, और अपना तेल मिस्र को ले जाते हैं; अर्थात्, एक ओर वे अश्शूरी की मित्रता के पीछे दौड़ते हैं, और दूसरी ओर बड़े आग्रह के साथ मिस्रियों को प्रसन्न करते हैं; वरन् वे अपनी सम्पत्ति को भी नहीं बचाते, क्योंकि उन्हें अपनी ओर करने के लिए वे भेंटें ले जाते हैं। अब हम समझते हैं कि इस्राएल ने किस प्रकार झूठ और उजाड़ को बढ़ाया था; क्योंकि उन्होंने अपने आप को अवैध सन्धियों में उलझा लिया। परन्तु उनका अश्शूरियों और मिस्रियों की शरण में भागना क्यों अनुचित था, इसकी व्याख्या हम अन्यत्र कर चुके हैं, और जो कहा जा चुका है उसे यहाँ विस्तार से दोहराने की आवश्यकता नहीं: परमेश्वर चाहता था कि लोग उसकी रक्षा के अधीन रहें; और जब परमेश्वर ने उनकी सुरक्षा का रक्षक होने की प्रतिज्ञा की थी, तो उन्हें केवल उसी की रक्षा से सन्तुष्ट रहना चाहिए था: परन्तु जब उन्होंने मिस्र और अश्शूर की शरण ली, तो यह अविश्वास का स्पष्ट प्रमाण था; क्योंकि यह परमेश्वर की सामर्थ्य को अपने लिए अपर्याप्त ठहराने के बराबर था। और हम यह भी जानते हैं कि इस्राएली अश्शूर या मिस्र को कभी नहीं गए, सिवाय उस समय के जब वे अपने ही भाइयों के विनाश की युक्ति करते थे; क्योंकि वे प्रायः यहूदा के राज्य को उलट देने का यत्न करते थे: वे केवल अपनी क्रूरता को तृप्त करने के लिए साथी ढूँढ़ते थे। परन्तु उन्हें दोषी ठहराने के लिए यही एक कारण भरपूर पर्याप्त था, कि जब परमेश्वर उन्हें मानो अपने ही पंखों के नीचे घेरकर रखना चाहता था, तब उन्होंने विदेशी सहायता से अपने आप को दृढ़ किया। तो जब कभी हम अनुचित साधनों से अपना प्रबन्ध करने का यत्न करते हैं, तो यह वैसा ही है मानो हम परमेश्वर का इन्कार करते हों; क्योंकि वह हमें अपनी रक्षा के अधीन आने के लिए बुलाता और आमन्त्रित करता है: परन्तु जब हम अपने विचारों में इधर-उधर भटकते हैं और कोई व्यर्थ सहारे खोजते हैं, तो हम परमेश्वर का घोर अनादर करते हैं: यह मानो मिस्र या अश्शूर को भाग जाना है। और इस पद की शिक्षा को इसी उद्देश्य के लिए लागू किया जाना चाहिए। आगे लिखा है —
होशे 12:2
2. यहूदा के साथ भी यहोवा का मुक़द्दमा है, और वह याकूब को उसके चालचलन के अनुसार दण्ड देगा; उसके कामों के अनुसार वह उसको बदला देगा।
2. Contentio Jehovae cum Jehudah, et ad visitandum super Jacob: secundum vias ejus, secundum opera ejus rependet ei.
यह विचित्र लग सकता है कि भविष्यद्वक्ता अब यह कहे कि परमेश्वर का यहूदा के साथ मुक़द्दमा था; क्योंकि उसने पहले कहा था कि यहूदा पवित्र जनों के साथ विश्वासयोग्य बना रहा। यह सचमुच असंगत प्रतीत होता है कि परमेश्वर यहूदियों से वाद-विवाद करे, और फिर भी उन्हें सीधा घोषित करे और उन्हें विश्वासघातियों और अभक्तों से अलग करे। तो इसका क्या अर्थ है? जैसा हम कह चुके हैं, भविष्यद्वक्ता ने यहूदा के गोत्र के विषय में तुलनात्मक रूप से बात कही थी, जब उसने कहा कि वे पवित्र जनों के साथ विश्वासयोग्य बने रहे: क्योंकि उसका अभिप्राय यहूदियों को पूर्णतः निर्दोष ठहराना नहीं था, जो स्वयं भी घोर बुराइयों से भरे हुए थे; परन्तु उसका अभिप्राय उस आराधना की प्रशंसा करना था जो अब तक यरूशलेम में प्रचलित थी, ताकि दस गोत्रों की अभक्ति और भी कम क्षमा-योग्य दिखाई दे, जिन्होंने अपनी ही इच्छा से उस नियम को छोड़ दिया था जो परमेश्वर ने दिया था।
आज के दिन जब कोई पोप के अनुयायियों को डाँटता है, तो वे कहते हैं कि उन्हें आराधना की कोई और रीति ज्ञात नहीं, और उनके पुरखाओं ने उन्हें इसी प्रकार सिखाया है, और जिस आराधना का वे पालन करते हैं वह प्राचीनकाल से इसी प्रकार चली आई है, कि वे न तो उसे बदलने का और न उससे हटने का साहस करते हैं। इस्राएलियों ने भी ऐसा ही बहाना बनाया होगा। परन्तु भविष्यद्वक्ता उन पर स्वेच्छापूर्ण धर्मत्याग का दोष लगाता है, क्योंकि जिस मन्दिर को परमेश्वर ने अपने लिए चुना था वह उनकी आँखों के सामने खड़ा था; वहाँ मानो परमेश्वर का मुख देखा जा सकता था; क्योंकि सब वस्तुएँ उस स्वर्गीय नमूने के अनुसार व्यवस्थित की गई थीं जो मूसा को पर्वत पर दिखाया गया था। तो जब शुद्ध धर्म उनकी आँखों के सामने था, तो क्या इसी तथ्य से उनका पाप प्रमाणित न हुआ कि उन्होंने परमेश्वर के वचन की उपेक्षा करके अपने आप को आराधना की नई और गढ़ी हुई रीतियों को सौंप दिया? तो भविष्यद्वक्ता ने पहले यहूदा के गोत्र की आराधना की प्रशंसा की थी, परन्तु उसके आचरण की नहीं; और अब वह उनके आचरण पर आता है, और कहता है कि यहूदा में बहुत-सी बातें थीं जिनकी परमेश्वर ताड़ना करेगा।
तो यहोवा का यहूदा के साथ मुक़द्दमा है; और वह उसी गोत्र से आरम्भ करेगा, और फिर याकूब के घराने पर उतरेगा। तौभी भविष्यद्वक्ता यहाँ यहूदा के घराने के विषय में केवल प्रसंगवश बोलता है, और लोगों के उस भाग के साथ परमेश्वर के मुक़द्दमे को केवल हल्के से छूता है। ऐसा क्यों था? क्योंकि, जैसा पहले कहा जा चुका है, वह यहूदा के राज्य पर नियुक्त शिक्षक नहीं था, वरन् केवल इस्राएलियों पर।
वह अब उस राज्य का उल्लेख केवल अपने ही लोगों के मन में भय उत्पन्न करने के उद्देश्य से करता है: मानो वह कहता हो, “क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर की सहनशीलता सदा बनी रहेगी, क्योंकि उसने अब तक तुम्हें सहा है? नहीं, परमेश्वर यहूदा के गोत्र के साथ वाद-विवाद आरम्भ करेगा। मैंने सचमुच कहा है कि तुम्हारी तुलना में वे निर्दोष हैं; परन्तु तौभी वे दण्ड से नहीं बचेंगे; क्योंकि थोड़े ही समय में परमेश्वर उन्हें न्याय के लिए बुलाएगा। यदि वह यहूदियों को नहीं छोड़ेगा, तो तुम्हारे बड़े-बड़े अपराध बिना दण्ड के कैसे रह सकते हैं?
क्योंकि निश्चय ही यहूदियों की तुलना में तुम सौ बार मृत्यु के योग्य हो, जिनमें कम से कम कुछ खराई और सीधाई तो है; क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की आराधना में कोई परिवर्तन नहीं किया। उनका जीवन भ्रष्ट है; परन्तु तौभी परमेश्वर की व्यवस्था और धर्म को वे वैसे तुच्छ नहीं जानते जैसे तुम जानते हो। तो यदि परमेश्वर उन्हें नहीं छोड़ेगा, तो वह तुम्हें तो और भी कम छोड़ेगा।”
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता किस उद्देश्य से कहता है कि परमेश्वर का यहूदा के साथ मुक़द्दमा था; क्योंकि उसका अभिप्राय स्वयं यहूदियों को भयभीत करना, या उन्हें पश्चाताप के लिए उभारना नहीं था, सिवाय कदाचित् प्रसंगवश; परन्तु उसका उद्देश्य इस्राएलियों के सामने एक उदाहरण रखना था, कि वे डरें; क्योंकि उन्हें अपने मन में यह सोचना चाहिए था, “जब हरे पेड़ के साथ ऐसा किया जाता है, तो सूखे पेड़ के साथ क्या कुछ न किया जाएगा? (लूका 23:31।) यदि परमेश्वर हमारे भाई यहूदियों के विरुद्ध, जिनमें अब तक शुद्ध धर्म विद्यमान है, इतनी कठोरता से अपना पलटा लेगा, तो हमारी बाट कैसा अन्त जोह रहा है, और वह कितना भयानक है, जो परमेश्वर की व्यवस्था, आराधना, शिक्षा और आज्ञाकारिता से हट गए हैं, जो वाचा तोड़नेवाले और पतित हो गए हैं, और हर प्रकार से अपवित्र हैं?”
इसलिए वह तुरन्त जोड़ता है, और वह याकूब को दण्ड देगा। “परमेश्वर सचमुच यहूदा के गोत्र से आरम्भ करेगा; यह भूमिका होगी, और वह यहूदियों के साथ तुम्हारी अपेक्षा अधिक नम्रता से व्यवहार करेगा; परन्तु तुम्हारे विरुद्ध वह पूरे बल से गरजेगा। तब यह कोई ऐसी उलाहना न होगी जो तुम्हें पश्चाताप की ओर खींचे, वरन् ऐसा दण्ड होगा जिसके तुम योग्य हो; क्योंकि वह तुम्हारे साथ पहले ही आवश्यकता से अधिक वाद-विवाद कर चुका है।”
उसके चालचलन के अनुसार, उसके कामों के अनुसार, वह उसको बदला देगा। वह यहाँ चालचलन और काम दोनों रखता है, किसी अनावश्यक दोहराव के लिए नहीं, परन्तु यह दिखाने के लिए कि इन लोगों के पश्चाताप की बाट पहले ही आवश्यकता से अधिक जोही जा चुकी थी; क्योंकि वे बहुत समय से अपनी दुष्टता के पीछे चलना नहीं छोड़ रहे थे। तो भविष्यद्वक्ता यहाँ निःसन्देह यहूदियों को उनकी टेढ़ी दुष्टता के कारण दोषी ठहराता है, कि उन्होंने अपने पापों को कभी नहीं छोड़ा, यद्यपि अब उन्हें बहुत समय से चेतावनी दी जा रही थी, और भविष्यद्वक्ताओं ने उन्हें बार-बार डाँटा था। अब आगे लिखा है —
होशे 12:3-5
3. अपनी माँ की कोख ही में उसने अपने भाई की एड़ी पकड़ी, और अपने बल से वह परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ:
3. In utero apprehendit plantam fratri suo; et in fortitudine sua dominatus est cum Deo (quanquam nomen {,}אלהיםAleim, transfertur etiam saepe ad Angelos.)
4 हाँ, वह दूत पर प्रबल हुआ, और जीत गया; वह रोया और उससे गिड़गिड़ाकर विनती की: बेतेल में वह उसको मिला, और वहीं उसने हम से बातें कीं; 4 Et dominatus est cum Angelo (vel, adversus Angelum; vel, luctatus est, si quis malit, quanquam ad verbum ita habetur; sed quia sequitur {,}יוכלiucal, praevaluit, ideo libenter admitto luctandi verbum, non quod proprie conveniat, sed rem potius respicio quam verba) et praevaluit; flevit et rogavit eum: in Bethel invenit eum, et illic locutus est cum eo; 5 अर्थात् यहोवा, सेनाओं का परमेश्वर; यहोवा उसका स्मरण-नाम है।
5 Et Jehova Deus exercituum; Jehova memoria ejus.
इस सारे प्रवचन में भविष्यद्वक्ता लोगों की कृतघ्नता को दोषी ठहराता है; और फिर वह दिखाता है कि वे अपने उस पिता के आदर्श से कितनी लज्जाजनक रीति से हट गए थे, जिसके नाम पर वे फिर भी घमण्ड करते थे। यही इसका सार है। उनकी कृतघ्नता इसमें दिखाई देती है कि उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि अपने पिता याकूब के व्यक्ति में परमेश्वर की सेंतमेंत दया उनसे पहले ही उन तक पहुँच चुकी थी। पहला वृत्तान्त सचमुच इसी उद्देश्य से उद्धृत किया गया है, कि याकूब के वंशज समझें कि वे जन्म लेने से पहले ही परमेश्वर द्वारा चुने गए थे। क्योंकि याकूब ने अपनी इच्छा या योजना से अपनी माँ की कोख में अपने भाई की एड़ी नहीं पकड़ी थी; परन्तु यह एक असाधारण बात थी। तो वह परमेश्वर ही था जिसने उस शिशु के हाथ का मार्गदर्शन किया, और इस चिह्न के द्वारा यह साक्षी दी कि उसका लेपालकपन सेंतमेंत है। संक्षेप में, यह कहकर कि याकूब ने अपनी माँ की कोख में अपने भाई का पाँव पकड़ा, वही बात अभिप्रेत है मानो परमेश्वर ने इस्राएलियों को स्मरण दिलाया हो कि वे अपने या अपने माता-पिता के सद्गुण के कारण अन्य लोगों से श्रेष्ठ नहीं थे; परन्तु परमेश्वर ने अपनी ही सुइच्छा से उन्हें चुना था। यही बात मलाकी भी उनके विरुद्ध कहता है, ‘क्या एसाव याकूब का भाई न था? तौभी मैंने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसाव को अप्रिय जाना,’ (मलाकी 1:2,3।) 84 Praeventum fuisse. इस शब्द का ठीक-ठीक और सुबोध अनुवाद करना अत्यन्त कठिन है। “पहले जाने” के अर्थ में “prevent” शब्द अब प्रचलित नहीं है। यहाँ अर्थ यह है कि उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया कि याकूब के विषय में सेंतमेंत दया उसकी ओर से किसी भी भलाई से पहले थी। — सं.
क्योंकि हम जानते हैं कि इस जाति ने सदा कैसे अहंकार से अपने आप को ऊँचा उठाया है। “परन्तु तुम कहाँ से उत्पन्न हुए हो? अपने मूल की ओर पीछे देखो: तुम सचमुच अब्राहम और इसहाक की सन्तान हो। तो तुम एदोमियों से किस बात में भिन्न हो? वे निश्चय ही एसाव से उत्पन्न हुए हैं; और एसाव इसहाक का पुत्र और याकूब का भाई था, और वास्तव में पहिलौठा भी। तो तुम अपने में विद्यमान किसी प्रतिष्ठा के कारण श्रेष्ठ नहीं हो। इसलिए अपने मूल को स्वीकार करो, और जान लो कि तुम में जो कुछ श्रेष्ठता हो, वह केवल परमेश्वर के अनुग्रह से निकलती है, और यह बात तुम्हें उससे और भी अधिक बाँधनी चाहिए। तो यह घमण्ड कहाँ से आया?”
ठीक इसी प्रकार हमारा भविष्यद्वक्ता अब कहता है, याकूब ने अपनी माँ की कोख में अपने भाई का पाँव पकड़ा; अर्थात्, “एसाव और उसके वंशजों के साथ तुम्हारा निकट का सम्बन्ध है; परन्तु तुम उनसे घृणा करते हो। यह कहाँ से है? क्या यह तुम्हारी अपनी किसी योग्यता के कारण है?
घमण्ड तब करना जब तुम दिखा सको कि तुमसे कोई ऐसी बात निकली है जिससे परमेश्वर के सामने अनुग्रह प्राप्त हो सके। नहीं, तुम्हारे पिता याकूब ने, जो सचमुच अत्यन्त पवित्र मनुष्य था, अपनी माँ की कोख में रहते हुए ही अपने भाई एसाव का पाँव पकड़ा; अर्थात्, जब वह अपने भाई से श्रेष्ठ हुआ और पहिलौठे का अधिकार प्राप्त किया, तब वह बड़ा नहीं हुआ था, और अपनी इच्छा या शक्ति से कुछ नहीं कर सकता था, क्योंकि वह तब अपनी माँ की कोख में बन्द था, और उसमें न कोई योग्यता थी, न कोई गुण। तो अब तुम्हारी कृतघ्नता और भी अधिक नीच है, क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे जन्म से पहले ही तुम्हें अपना ऋणी बना लिया था; पवित्र कुलपिता के व्यक्ति में उसने तुम्हें अपनी निज सम्पत्ति होने के लिए चुना। परन्तु अब तुम उसे त्यागकर, और जो आराधना उसने अपनी व्यवस्था में सिखाई है उसे छोड़कर, अपने आप को मूर्तियों और अभक्तिपूर्ण अन्धविश्वासों के हवाले कर देते हो। अब अपने वे बहाने लाओ जिनसे तुम अपनी अभक्ति को ढाँपते हो! क्या तुम्हारी नीचता इतनी स्थूल और स्पष्ट नहीं कि तुम्हें उस पर लज्जित होना चाहिए?” तो अब हम उस उद्देश्य को समझते हैं जिसके लिए भविष्यद्वक्ता ने कहा कि याकूब ने अपनी माँ की कोख में एसाव का पाँव पकड़ा।
इसके अतिरिक्त, यह स्थल स्पष्ट रूप से दिखाता है कि मनुष्य अपनी स्वतंत्र इच्छा से परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त नहीं करते, वरन् जन्म से पहले केवल उसकी भलाई से चुने जाते हैं, और कर्मों के कारण नहीं चुने जाते, जैसा पोप के अनुयायी कल्पना करते हैं, जो परमेश्वर के लिए कुछ चुनाव तो मानते हैं, परन्तु सोचते हैं कि वह भविष्य के कर्मों पर निर्भर है। परन्तु यदि ऐसा हो, तो भविष्यद्वक्ता का आरोप फीका और नीरस होता। अब जबकि परमेश्वर केवल अपनी सुइच्छा से मनुष्यों से पहले ही उन तक पहुँचता है, और जिन्हें चाहता है उन्हें कर्मों के कारण नहीं, वरन् अपनी दया से लेपालक बनाता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जो चुने गए हैं वे उसके प्रति और भी अधिक बँधे हुए हैं, और जब वे अपने सामने प्रस्तुत अनुग्रह को ठुकराते हैं तो वे और भी कम क्षमा-योग्य हैं।
परन्तु यहाँ कोई आपत्ति करके कह सकता है कि यह विचित्र है कि याकूब के वंशजों के विषय में कहा जाए कि वे उसके व्यक्ति में चुने गए थे, और तौभी वे इस बीच परमेश्वर से हट गए थे; क्योंकि इस दशा में परमेश्वर का चुनाव निश्चित और स्थायी न होगा; और हम जानते हैं कि जिन्हें परमेश्वर चुनता है उन्हें वह धर्मी भी ठहराता है, और उनका उद्धार ऐसा सुरक्षित है कि उनमें से कोई नाश नहीं हो सकता; सब चुने हुए लोग अपने रक्षक मसीह को भी सौंपे गए हैं, कि वह अपनी दिव्य सामर्थ्य से, जो अजेय है, उनकी रक्षा करे, जैसा यूहन्ना अध्याय 10 में सिखाता है। तो इसका क्या अर्थ है? अब हम जानते हैं, और यह पहले कहा जा चुका है, कि उन लोगों के विषय में परमेश्वर का चुनाव दो प्रकार का था; क्योंकि एक सामान्य था, और दूसरा विशेष। पवित्र याकूब का चुनाव विशेष था, क्योंकि वह सचमुच परमेश्वर की सन्तानों में से एक था; उन लोगों का चुनाव भी विशेष था जिन्हें पौलुस प्रतिज्ञा की सन्तान कहता है, (रोमियों 9:8।) एक दूसरा, सामान्य चुनाव भी था; क्योंकि उसने उसके सारे वंश को अपने भरोसे में ग्रहण किया, और सब के सामने अपनी वाचा प्रस्तुत की। तौभी वे सब नया जन्म पाए हुए नहीं थे, उन सब को लेपालकपन का आत्मा नहीं दिया गया था। तो यह सामान्य चुनाव सब में प्रभावशाली नहीं था। अब विवादित प्रश्न का समाधान हो गया, कि चुने हुए लोगों में से कोई नाश नहीं होगा; क्योंकि सारे लोग विशेष रीति से नहीं चुने गए थे; परन्तु परमेश्वर जानता था कि उसने उन लोगों में से किन्हें चुना था; और उन्हें, जैसा हम कह चुके हैं, उसने लेपालकपन का आत्मा प्रदान किया, और अपना अनुग्रह दिया, कि वे कभी गिर न जाएँ। अन्य लोग भी एक प्रकार से चुने तो गए थे, अर्थात् परमेश्वर ने उनके सामने उद्धार की वाचा प्रस्तुत की; परन्तु तौभी अपनी कृतघ्नता के द्वारा उन्होंने परमेश्वर को इस बात के लिए विवश किया कि वह उन्हें त्याग दे, और उन्हें अपनी सन्तान मानने से इन्कार कर दे।
परन्तु भविष्यद्वक्ता आगे जोड़ता है कि याकूब अपने बल से परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ, और दूत पर भी जयवन्त हुआ। वह यहाँ इस्राएलियों को इस बात के लिए धिक्कारता है कि वे याकूब के नाम पर झूठा दावा करते थे, जबकि उनमें उसके साथ कुछ भी समान नहीं था, वरन् वे लज्जाजनक रीति से उसके आदर्श से हट गए थे। तो वह दूत के साथ और स्वयं परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ; और वह दूत पर जयवन्त हुआ। परन्तु वे किस प्रकार के लोग थे? जैसे अन्यजाति कवियों ने रोमियों को, जब वे पतित और स्त्रैण हो गए, “रोमुलिडी” कहा, और कहा कि वे उन विलक्षण और प्रसिद्ध वीरों से उत्पन्न हुए थे जिनके पराक्रम तब भली-भाँति ज्ञात थे, और इसी कारण उन्हें “स्किपियाडी” भी कहा; वैसे ही भविष्यद्वक्ता भी कहता है, “आओ, हे याकूब की सन्तान, तुम किस प्रकार के मनुष्य हो? वह वीरोचित, वरन् स्वर्गदूतीय सामर्थ्य से सम्पन्न था, और स्वर्गदूतीय से भी बढ़कर; क्योंकि उसने परमेश्वर से मल्लयुद्ध किया और विजय पाई: परन्तु तुम मूर्तियों के दास हो; शैतान तुम्हें अपने प्रति समर्पित बनाए रखता है; तुम मानो एक वेश्यालय में हो; क्योंकि तुम्हारा मन्दिर वेश्यालय के सिवा और क्या है? और फिर तुम व्यभिचारियों के समान हो, और प्रतिदिन अपनी मूर्तियों के साथ व्यभिचार करते हो। तुम्हारी घृणित वस्तुएँ घिनौनी जंजीरों के सिवा और क्या हैं, जो यह प्रमाणित करती हैं कि तुम में न कोई ज्ञान है और न कोई समझ? क्योंकि जब तुमने परमेश्वर को त्यागा और आराधना की नई और अपवित्र रीतियाँ अपनाईं, तो अवश्य ही तुम पर कोई मोहिनी डाली गई होगी।” पवित्र कुलपिता याकूब और उसके वंशजों के बीच के इस अन्तर पर ध्यान देना चाहिए, अन्यथा हम भविष्यद्वक्ता के उद्देश्य को नहीं समझेंगे; और विभिन्न मतों को एकत्र करने से बहुत कम लाभ होगा, जब तक कि हम पहले यह न जान लें कि भविष्यद्वक्ता का क्या अभिप्राय था, और इस उलाहने का, और इस वृत्तान्त का कि याकूब परमेश्वर और दूत के साथ प्रबल हुआ, क्या आशय था।
परन्तु ध्यान देना चाहिए कि यहाँ परमेश्वर और दूत एक ही अर्थ में उल्लिखित हैं; हम वास्तव में दोनों स्थानों पर इसका अनुवाद दूत कर सकते हैं; क्योंकि {,}אלהיםAleim, और {,}מלאך melac भी, दूत का अर्थ देते हैं। परन्तु तौभी भविष्यद्वक्ता हर सन्देह को दूर कर देता है, जब वह अन्त में जोड़ता है, यहोवा, सेनाओं का परमेश्वर, यहोवा उसका नाम है, क्योंकि यहाँ भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से परमेश्वर के सारभूत नाम का उल्लेख करता है, जिसके द्वारा वह साक्षी देता है कि वही सनातन और एकमात्र सच्चा परमेश्वर था, जो फिर भी उसी समय एक दूत भी था। परन्तु यह पूछा जा सकता है, वह सनातन परमेश्वर और उसी समय एक दूत कैसे था? पवित्रशास्त्र में यह बात इतनी बार आती है कि हमें भली-भाँति ज्ञात होनी चाहिए, कि जब प्रभु अपने दूत के द्वारा प्रकट हुआ, तो यहोवा का नाम उन्हें दिया गया, परन्तु निश्चय ही सब दूतों को बिना भेद के नहीं, वरन् उस प्रधान दूत को, जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपने आप को प्रकट किया।
यह, जैसा मैंने कहा है, हमें भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए। तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह दूत सचमुच और सारतः परमेश्वर था। परन्तु यह बात परमेश्वर पर ठीक-ठीक लागू न होती, जब तक कि व्यक्तियों में कोई भेद न हो। तो ईश्वरत्व में कोई ऐसा व्यक्ति होना ही चाहिए जिस पर दूत का यह नाम और यह पदवी लागू हो सके; क्योंकि यदि हम “परमेश्वर” नाम को बिना किसी भेद या अन्तर के लें, और उसे उसके सार का बोधक मानें, तो यह कहना निश्चय ही असंगत होगा कि वह परमेश्वर भी है और दूत भी; परन्तु जब हम ईश्वरत्व में व्यक्तियों का भेद करते हैं, तो कोई असंगति नहीं रहती। यह कैसे? क्योंकि मसीह ने, जो परमेश्वर की सनातन बुद्धि है, हमारा शरीर धारण करने से पहले ही मध्यस्थ का स्वरूप धारण कर लिया था। इसलिए वह तब भी मध्यस्थ था, और उस पद में वह दूत भी था। वह उसी समय यहोवा था, जो अब शरीर में प्रकट हुआ परमेश्वर है।
परन्तु दूसरी ओर, हमें उस कुतर्की सर्वेटस के प्रलाप, या शैतानी उन्माद, का खण्डन करना चाहिए, जिसने यह कल्पना की कि मसीह आरम्भ से एक दूत था, मानो वह कोई छाया-मूर्ति हो, और एक अलग व्यक्ति हो जिसका सार पिता से पृथक् हो; क्योंकि वह कहता है कि वह तीन अनसृजे तत्त्वों से रचा गया था। इस शैतानी कल्पना को हमें पूर्णतः त्याग देना चाहिए। परन्तु मसीह, यद्यपि वह परमेश्वर था, तौभी मध्यस्थ भी था; और मध्यस्थ के रूप में उसे उचित और यथायोग्य रीति से परमेश्वर का दूत या सन्देशवाहक कहा जाता है, क्योंकि उसने अपनी ही इच्छा से अपने आप को पिता और मनुष्यों के बीच में रखा है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जैसे तू आज के दिन हम पर अपने आप को ऐसे कृपालु पिता के रूप में प्रकट करता है, और तू ने अपने एकलौते पुत्र में हमें अपने अनुग्रह की एक अनुपम और अमूल्य बयाना दी है, — हाँ, यह वरदान दे कि हम अपने आप को पूर्णतः तुझे समर्पित करें, और सच्चाई से तुझे वह स्वेच्छापूर्ण सेवा और आज्ञाकारिता अर्पित करें जो एक पिता के योग्य है, ताकि जीवन में हमारा और कोई लक्ष्य न हो सिवाय उस लेपालकपन को दृढ़ करने के, जिससे तू ने हमें एक बार अनुग्रहित किया है, जब तक कि हम अन्त में तेरे अनन्त राज्य में एकत्र किए जाकर, तेरे पुत्र मसीह यीशु के साथ, उसके फल के सहभागी न हों। आमीन।
बत्तीसवाँ व्याख्यान
कल हमने समझाया था कि जो पवित्र याकूब को बेतेल में दिखाई दिया, उसे परमेश्वर और दूत दोनों कहना किस प्रकार उचित प्रतीत होता है; क्योंकि यहोवा नाम, जिसके द्वारा परमेश्वर की सनातन सामर्थ्य, सार और महिमा व्यक्त की जाती है, किसी मात्र दूत पर लागू नहीं किया जा सकता था। इसलिए यह निश्चित है कि वह एकमात्र सच्चा परमेश्वर था। परन्तु यह नहीं हो सकता था कि उसे सीधे-सीधे और बिना किसी भेद के दूत कहा जाए; परन्तु क्योंकि मसीह उस समय भी मध्यस्थ का स्वरूप धारण किए हुए था, इसलिए उसे दूत कहना असंगत न था; और फिर भी हम जानते हैं कि वह सनातन परमेश्वर है। अतः यह स्थल स्मरण रखने योग्य है, क्योंकि यह मसीह के ईश्वरत्व की साक्षी देता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से पुष्टि करता है कि वह यहोवा है, आकाश और पृथ्वी का सृजनहार, और कि वह अपनी ही सामर्थ्य से ऐसा है; और कि वह किसी दूसरे में स्थित नहीं, जैसे सब सृजी हुई वस्तुएँ हैं। तो जब वह ऐसा है, तो उसकी प्रभुता प्रमाणित होती है, जिससे वह पिता से कम नहीं है।
परन्तु वह कहता है कि यह उसका स्मारक, या स्मरण, है। यह कथन मनुष्यों के सम्बन्ध में है; तो भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि जब मसीह प्रकट किया जाएगा, तब यह अद्भुत और प्रतापी नाम संसार में भली-भाँति ज्ञात होगा। लोग सचमुच उस समय भी यह स्वीकार करते थे कि सच्चा परमेश्वर उनके पिता याकूब को दिखाई दिया था; परन्तु मध्यस्थ का ज्ञान अब तक धुँधला था। तो ऐसा प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ मसीह के आगमन की ओर दृष्टि रखता है; मानो वह कहता हो कि जब मध्यस्थ और भी स्पष्ट रूप से प्रकट किया जाएगा, तब यहोवा नाम सब पर व्यापक रूप से ज्ञात होगा।
परन्तु अब मैं इस स्थल के अन्य भागों पर आऊँगा।
भविष्यद्वक्ता कहता है कि वह अपने बल से परमेश्वर के साथ प्रधान था, या प्रबल हुआ।
इस कथन का क्या आशय है, यह मैं संक्षेप में समझाऊँगा। याकूब को इस्राएल नाम उस विजय के कारण दिया गया जो उसने उस महान मल्लयुद्ध में प्राप्त की, जिसका उल्लेख उत्पत्ति 32 में है: क्योंकि उस पवित्र मनुष्य का संघर्ष किसी नश्वर प्राणी से नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर से था; और वह उस युद्ध में जयवन्त हुआ, और इसलिए परमेश्वर का विजेता कहलाता है। क्योंकि यह कहने की रीति कठोर है, इसलिए कुछ लोगों ने किसी व्याख्या के द्वारा इसे कुछ अधिक सौम्य अर्थ की ओर मोड़ने का यत्न किया है, अर्थात् यह कि याकूब परमेश्वर के सामने एक प्रधान था, जिसका अर्थ यह है कि परमेश्वर ने उसके असाधारण साहस को स्वीकार किया। परन्तु जब परमेश्वर ने अपने दास को यह नाम दिया, तब उसका अभिप्राय कुछ और अधिक व्यक्त करना था; क्योंकि उसने स्वीकार किया कि वह मानो पराजित होकर पीछे हट गया, और विजय का सेहरा पवित्र याकूब को सौंप दिया। और यह हमें विचित्र नहीं लगना चाहिए; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कभी परमेश्वर हमारे विश्वास को परखता है, और परीक्षाओं के द्वारा हमें जाँचता है, तो ये सब इतने युद्ध हैं जिनके द्वारा वह हमसे संघर्ष करता है; क्योंकि वह यह जानना चाहता है कि हमारे विश्वास का बल कितना है।
अब जब यह कहा जाता है कि हम परमेश्वर से मल्लयुद्ध करते हैं, और संघर्ष का परिणाम ऐसा होता है कि परमेश्वर विजय हमारे लिए छोड़ देता है, तो हमें विजेता, वरन् स्वयं परमेश्वर के भी विजेता, कहा जाना अनुचित नहीं। परन्तु कैसे? क्योंकि परमेश्वर अपने पवित्र जनों में अद्भुत रीति से कार्य करता है, यहाँ तक कि अपनी ही सामर्थ्य से वह अपने आप को गिरा देता है; और जब वह हमसे मल्लयुद्ध करता है, तो वह हमें बल प्रदान करता है, जिसके द्वारा हम संघर्ष के भार और दबाव को सहने योग्य होते हैं। यदि परमेश्वर हम पर आक्रमण करे, तो वह दुर्बलता के सिवा और क्या पाएगा? परन्तु जब वह हमें संघर्ष के लिए बुलाता है, तो साथ ही वह हमें आवश्यक हथियार भी प्रदान करता है।
और यह संघर्ष की एक अद्भुत व्यूह-रचना है, जब परमेश्वर एक ओर अपने आप को प्रतिद्वन्द्वी बनाता है, और दूसरी ओर हम में होकर अपनी ही परीक्षाओं के विरुद्ध, या उन सब मल्लयुद्धों के विरुद्ध लड़ता है जिनके द्वारा वह हमारे विश्वास को परखता है। इसलिए कहा जाता है कि परमेश्वर हमसे पराजित होता है, जब वह अपने आत्मा की सामर्थ्य और सहायता से हमें दृढ़ करता और अजेय बनाता है; वरन् जब वह हमें परीक्षाओं पर जयवन्त करता है; और जब हम सब बातों पर विचार करते हैं, तो स्थिति ऐसी है कि परमेश्वर चाहता है कि बल का अधिक भाग हमारी ओर हो, और वह हमें परखने और जाँचने के लिए केवल दुर्बल भाग ही लेता है। निश्चय ही इस विषय में हमें ऐसे किसी विभाजन की कल्पना नहीं करनी चाहिए, मानो परमेश्वर अपने ही विरुद्ध बँटा हुआ हो; परन्तु हम जानते हैं कि जब वह हमारे विश्वास को परखता है, तो वह मानो एक प्रतिद्वन्द्वी के समान आगे आता है, या मानो हमें संघर्ष के लिए ललकारता है। यह बात सचमुच निश्चित है। क्योंकि परीक्षाएँ क्या हैं, या उनका उद्देश्य क्या है, सिवाय इसके कि वे हमें मानो रणभूमि पर अपने बल और दृढ़ता का उदाहरण और प्रमाण दिखाने का अवसर दें? परन्तु यह किसी प्रतिपक्षी के बिना नहीं हो सकता; क्योंकि छाया से लड़ने में क्या लाभ होगा? या तब, जब कोई हमसे भिड़ता ही न हो? इसलिए जब कभी परमेश्वर हमारे विश्वास को परखता है, तो वह एक प्रतिपक्षी के समान होता है; और, जैसा पहले कहा जा चुका है, हमारा यह संघर्ष मनुष्यों से नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर से है। निश्चय ही हमें शैतान से भी लड़ना है; क्योंकि पौलुस कहता है कि हमारा मल्लयुद्ध (केवल) लहू और मांस से नहीं, वरन् प्रबल शक्तियों से है, (इफिसियों 6:12।) यह निःसन्देह सत्य है; परन्तु साथ ही प्रभु प्रथम स्थान रखता है, जैसा अय्यूब का वह विलक्षण वचन साक्षी देता है, ‘यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने ले लिया,’ (अय्यूब 1:21।) तो इस प्रकार हमें स्वयं परमेश्वर से भिड़ना है। यह कैसे? क्योंकि वह हमें परखता और जाँचता है। परन्तु वह हमारी परीक्षा नहीं करता, जैसा याकूब कहता है, (याकूब 1:13,14;) क्योंकि मनुष्य तब परीक्षा में पड़ता है जब वह अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर फँसता है। वह हमें बुराई की परीक्षा में नहीं डालता; वह हम में भ्रष्ट अभिलाषाएँ नहीं डालता, जो अपने आप उगती हैं, और जो हमारे स्वभाव में जन्मजात हैं: परन्तु वह परीक्षा करता है, अर्थात् हमें परखता है, जैसा कहा गया है कि उसने अब्राहम की परीक्षा की, (उत्पत्ति 22:1।) 86 उत्पत्ति 32:24-30। — fj.
जब ऐसा है, तो हमें अब परमेश्वर से मल्लयुद्ध करना है; परन्तु किस उद्देश्य से? इसलिए कि हम जय पाएँ: क्योंकि जब परमेश्वर हमारे विश्वास और आज्ञाकारिता की स्थिरता को प्रकट कर रहा होता है, तब उसका अभिप्राय हमें कुचल डालने का नहीं होता; वरन्, इसके विपरीत, वह एक रंगमंच बनाता है, जिस पर वह अपने वरदानों को दिखाए। इसलिए हम जय पाने की आशा के साथ संघर्ष में उतरते हैं। हम जय पाएँ, इसके लिए वह, जैसा मैं कह चुका हूँ, हमें केवल दृढ़ होने का उपदेश ही नहीं देता, वरन् हमें हथियार भी देता है, हमें बल से भरता है, और एक प्रकार से स्वयं भी हमारे साथ होकर लड़ता है, और हम में सामर्थी होता है, और हमें अपनी परीक्षाओं पर जय पाने के योग्य बनाता है। इसी कारण याकूब के विषय में कहा गया है कि वह परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ, अथवा परमेश्वर पर विजयी हुआ।
परन्तु भविष्यद्वक्ता जो आगे जोड़ता है वह विचित्र जान पड़ सकता है, कि यह उसके अपने बल से हुआ।
वह कहता है, वह अपने ही बल से परमेश्वर के साथ प्रबल हुआ। परन्तु यदि इस्राएल अपने ही पराक्रम से लड़ा होता, तो वह परमेश्वर की छाया तक को सह न सकता, क्योंकि उसे अवश्य गिर पड़ना था। यदि उसके पास मनुष्य के बल से बड़ा बल न होता, तो वह अवश्य नष्ट होकर कुछ भी न रहता। तो फिर इसका क्या अर्थ है कि वह अपने ही बल से विजयी हुआ?
हम यह मानते हैं कि यह बल, जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता बोलता है, पवित्र याकूब का कहा जा सकता है जब उसने प्रभुता पाई। जैसा लोग प्रायः कहते हैं, दान से बढ़कर कोई स्वत्व नहीं; और परमेश्वर की यह रीति है कि जो कुछ वह हमें प्रदान करता है उसे हमें ऐसा सौंप देता है मानो वह हमारा ही हो। इसलिए यहाँ उस बल में, जो मनुष्य के अपने भीतर है, और उस बल में, जो परमेश्वर उसे प्रदान करता है, बुद्धिमानी से भेद करना आवश्यक है। पोपवादी, ज्योंही मनुष्य के बल या सामर्थ्य का कहीं उल्लेख होता है, तुरन्त उसे पकड़ लेते हैं और कहते हैं, "यदि मनुष्य में स्वतन्त्र इच्छा नहीं, तो उसमें कोई बल नहीं, अथवा विरोध करने की कोई सामर्थ्य नहीं।"
परन्तु वे अपनी ही मूढ़ता और विचारहीनता को प्रकट करते हैं, क्योंकि वे उस आन्तरिक बल में, जो स्वभाव से मनुष्य के अपने भीतर है, और उस बाहर से आए हुए बल में, जिससे परमेश्वर मनुष्यों को सम्पन्न करता है और जो पवित्र आत्मा का दान है, भेद नहीं कर सकते। और भविष्यद्वक्ता, जब वह यहाँ पवित्र याकूब के बल की प्रशंसा करता है, तो उसकी स्वतन्त्र इच्छा की बड़ाई नहीं करता, मानो उसने अपने आप से वह बल पाया हो जिससे उसने परमेश्वर पर जय पाई; वरन् उसका आशय यह है कि वह ईश्वरीय रीति से अजेय सामर्थ्य से सम्पन्न किया गया था, जिससे वह उस संघर्ष में विजयी होकर निकला। तो अब हम भविष्यद्वक्ता का आशय समझते हैं।
और क्योंकि यह बात विशेष रूप से स्मरण रखने योग्य थी, इसलिए वह दोहराता है कि वह स्वर्गदूत के साथ प्रबल हुआ और जीत गया। परन्तु हम पहले ही कह चुके हैं कि याकूब कैसे प्रबल हुआ — निश्चय अपने आप से नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य को ऐसा बाँटा था कि उसका अधिक भाग स्वयं याकूब में था। इसलिए जब मैं उस मल्लयुद्ध और उन दैनिक संघर्षों के विषय में बोलता हूँ जिनके द्वारा परमेश्वर भक्तों को अभ्यास कराता है, तब मैं प्रायः यह उपमा देता हूँ — कि परमेश्वर अपने बाएँ हाथ से हम से लड़ता है, और अपने दाहिने हाथ से हमारी रक्षा करता है; अर्थात्, वह (यों कहें) निर्बल रीति से हम पर आक्रमण करता है, और उसी समय हमारी रक्षा के लिए अपना दाहिना हाथ बढ़ाता है: और इस दूसरी बात में वह अपनी अधिक बड़ी सामर्थ्य दिखाता है, जिससे हम संघर्ष में विजयी हों। और बोलने की यह रीति, यद्यपि पहली दृष्टि में कठोर जान पड़ती है, तो भी परमेश्वर के अनुग्रह और भलाई को अद्भुत रीति से प्रकट करती है, क्योंकि वह हमारे लिए अपने आप को इतना दीन करने की कृपा करता है कि विजय की प्रशंसा हमें देना चुनता है; इसलिए नहीं कि हम अपने आप पर घमण्ड करें, वरन् इसलिए कि जब वह अपनी सामर्थ्य को हमें कुचल डालने के बदले हमारी रक्षा करने में लगाना अधिक पसन्द करता है — जबकि वह अपने मुँह की एक फूँक से हमें कुचल सकता था — तब इस प्रकार उसकी और भी अधिक महिमा हो। क्योंकि हमें शून्य कर देने के लिए उसे कोई प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं: यदि वह केवल सारी मानवजाति पर फूँक मारना चाहे, तो सारा संसार पल भर में बुझ जाएगा। परन्तु प्रभु हम से लड़ता है, और साथ ही हमें कुचला जाने नहीं देता; वरन् वह हमें ऊँचे पर उठाता है, और, जैसा मैं कह चुका हूँ, विजय हमें देता है। अब हम आगे बढ़ें।
भविष्यद्वक्ता आगे कहता है कि वह रोया और उसने विनती की: वह कहता है, वह रोया और उससे गिड़गिड़ाकर विनती की। कुछ लोग इस वाक्यांश को स्वर्गदूत पर लागू करते हैं; परन्तु मैं नहीं जानता कि रोना उसके लिए उपयुक्त था या नहीं। यह कथन निश्चय इस प्रकार समर्थित किया जा सकता है कि स्वर्गदूत मानो विनती करनेवाला था, जब उसने उस पवित्र पुरुष को विजय सौंप दी; क्योंकि यह ऐसा ही था मानो कोई, जो संघर्ष में अपने आप को बराबरी का न माने, भूमि पर गिर पड़े। तब वे रोने की व्याख्या इस प्रकार करते हैं, "स्वर्गदूत ने कुलपिता से विनती की जब उसने कहा, 'मुझे जाने दे;' और यह विजय का अंगीकार था।" तब अर्थ यह होगा कि कुलपिता याकूब ने कोई साधारण वस्तु नहीं पाई जब वह संघर्ष में विजयी होकर निकला; क्योंकि परमेश्वर एक प्रकार से विनती करनेवाला बना, क्योंकि उसने उसे विजेता का नाम और प्रशंसा प्रदान की। परन्तु मैं इसकी व्याख्या कुलपिता के विषय में करना अधिक पसन्द करता हूँ, और ऐसा करना, मेरे विचार में, अधिक उपयुक्त है। यह सच है कि यह नहीं कहा गया कि याकूब रोया; अर्थात्, मैं मानता हूँ कि मूसा ने यह स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से नहीं लिखा; परन्तु रोने को उस दीनता के अर्थ में लिया जा सकता है जिसे विश्वासी परमेश्वर की उपस्थिति में सदा लाते हैं: और तब रोना कुलपिता के लिए उचित था; क्योंकि उसने उस मल्लयुद्ध में ऐसी विजय पाई कि वह बिना दुःख और हानि के नहीं लौटा, क्योंकि हम जानते हैं कि उसकी टाँग उखड़ गई थी और उसकी जाँघ की नस चढ़ गई थी, जिससे वह जीवन भर लँगड़ाता रहा। तो याकूब ने विजय पाई, और परमेश्वर की स्वीकृति से वहाँ जयवन्त हुआ: परन्तु तो भी वह पूर्ण स्वस्थ होकर नहीं लौटा, क्योंकि परमेश्वर ने उसे लँगड़ा छोड़ दिया था। तब उसने कोई छोटा दुःख अनुभव नहीं किया, क्योंकि उसकी देह की यह निर्बलता जीवन भर बनी रही। इसलिए उस पवित्र पुरुष के लिए, जो उस संघर्ष में दीन किया गया था, रोना अनुचित न था, यद्यपि वह विजय का जयपत्र लेकर गया।
और इस बात पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए; क्योंकि यहाँ भविष्यद्वक्ता सब मिथ्या आरोपों का उत्तर दे देता है, जब वह कथन को ऐसा संयत करता है कि परमेश्वर और उसकी महिमा में से कुछ भी नहीं घटाता, यद्यपि वह इस प्रकार कुलपिता की विजय को बड़ी शोभा से सुशोभित करता है। तो वह परमेश्वर के साथ प्रधान ठहरा; वह प्रबल भी हुआ, वह विजयी हुआ, — परन्तु कैसे? वह तो भी रोया और उससे विनती की; जिसका अर्थ यह है कि इस बात में घमण्ड का कोई कारण न था कि वह संघर्ष से विजय का जयपत्र ले गया, वरन् यह कि परमेश्वर ने उसकी जाँघ या टाँग के उखड़ जाने के द्वारा भी उसे दीनता की ओर ले चला: और इस प्रकार उसने उससे विनती की। याकूब की वह प्रार्थना मूसा ने लिखी है, जो उसने आशीष माँगते समय की थी। परन्तु, जैसा प्रेरित कहता है, छोटा बड़े से आशीष पाता है (इब्रानियों 7:7)। तो याकूब ने अपने आप को ऊँचा नहीं किया, जैसा अन्धे मनुष्य करते हैं जो अपने लिए पुण्य का दावा करते हैं; वरन् उसने परमेश्वर से प्रार्थना की, और उसी से आशीष माँगी जिसने अपने आप को पराजित स्वीकार किया था। और इस पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, विशेषकर इस अतिरिक्त परिस्थिति पर; क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि जो लोग परीक्षाओं के द्वारा परखे जाते हैं उनके लिए परमेश्वर से दूर भागने का कोई कारण नहीं, यद्यपि हमारा शरीर तो चैन चाहता है और छोड़ दिए जाने की इच्छा करता है।
परन्तु जब कोई परीक्षा निकट होती है, तब हम अपने आप को पीछे खींच लेते हैं, और ऐसा कोई नहीं जो प्रसन्नता से सन्धि न कर ले, और परमेश्वर की उपस्थिति से दूर जाकर छिप भी न जाए। इसलिए जब हम चाहते हैं कि परमेश्वर हम से दूर रहे, जब वह हमारे विश्वास को परखने के लिए विरोधी के रूप में सामने आता है, तब याकूब की यह प्रार्थना स्मरण रखनी चाहिए; क्योंकि यद्यपि उसकी टाँग उखड़ गई थी, यद्यपि वह थकावट से चूर हो गया था, तो भी उसने अपने आप को पीछे नहीं खींचा, उसने स्वर्गदूत के चले जाने की इच्छा नहीं की, वरन् मानो बलपूर्वक उसे रोके रखा: "तू मुझे आशीष देगा; तेरे मुझे आशीष देने से पहले तुझे जाने देने की अपेक्षा मैं तुझ से लड़ते रहना और पूरी रीति से नष्ट हो जाना अधिक पसन्द करूँगा।" इससे हम देखते हैं कि हमें परमेश्वर की उपस्थिति को खोजना चाहिए; चाहे वह हमें कठोरता से परखे, चाहे हम बहुत दुःख उठाएँ, चाहे हमारा बल जाता रहे, चाहे हम जीवन भर के लिए लँगड़े कर दिए जाएँ, तो भी हमें परमेश्वर की उपस्थिति से नहीं भागना चाहिए, वरन् दोनों भुजाओं से उसे थाम लेना चाहिए और मानो बलपूर्वक उसे रोके रखना चाहिए; क्योंकि अपने बोझ के नीचे कराहना और उसकी सामर्थ्य का अनुभव करना जो हम से ऊपर है, इससे कहीं उत्तम है कि हम परिश्रम से मुक्त रहें और अपने सुख-विलासों में सड़ते रहें, जैसा वे करते हैं जिन्हें परमेश्वर त्याग देता है। और हम देखते हैं कि ऐसी ढील से हमें कितना डरना चाहिए; क्योंकि यदि हम नाना प्रकार की परीक्षाओं के द्वारा प्रतिदिन तेज़ न किए जाएँ, तो हम तुरन्त जंग और अन्य बुराइयाँ बटोर लेते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि, हम स्वस्थ दशा में बने रहें, इसके लिए हमारे संघर्ष प्रतिदिन नए किए जाएँ: और इसी कारण मैंने कहा है कि हमें परमेश्वर की उपस्थिति को खोजना चाहिए, मल्लयुद्ध चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो।
आगे यह आता है, उसने उसे बेतेल में पाया। सब सन्दिग्धता दूर करने के लिए मैं इसका अनुवाद यों करूँगा, "बेतेल में उसने उसे पाया था।" यह सच है कि क्रिया भविष्यत् काल में है; परन्तु यह निश्चित है कि भविष्यद्वक्ता बीते हुए समय की बात कहता है। परन्तु जब हम भूतकाल लेते हैं, तब भी भाषा में सन्दिग्धता बनी रहती है; क्योंकि कुछ लोग इस स्थल को इस प्रकार समझते हैं कि परमेश्वर ने बाद में याकूब को बेतेल में पाया, अथवा याकूब ने परमेश्वर को पाया; अर्थात्, जब शकेम नगर के विनाश के पश्चात् इस्राएल नाम उसके लिए पुष्ट किया गया; क्योंकि उसके दुःख में उसे शान्ति देने के लिए परमेश्वर वहाँ फिर उस पर प्रकट हुआ। तो वे इसकी व्याख्या उस स्थान पर हुए दूसरे दर्शन के विषय में करते हैं। परन्तु मुझे ऐसा जान पड़ता है कि भविष्यद्वक्ता के ध्यान में कोई और बात थी, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने याकूब को पहले ही बेतेल में पा लिया था, कि वह उससे तब मिला था जब वह अराम को भाग गया था, और अपने भाई के भय से चला गया था। तभी पहली बार परमेश्वर अपने दास पर प्रकट हुआ, और उसे विश्वासयोग्यता का उपदेश दिया: उसने उससे अपने देश में सकुशल लौट आने की प्रतिज्ञा की। तो भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि याकूब ने विजय पाई, क्योंकि परमेश्वर ने बहुत पहले से ही उसे अपने प्रेम में गले लगाना आरम्भ कर दिया था, और जब उसने बेतेल में अपने आप को उस पर प्रकट किया तब भी अपने प्रेम की साक्षी दी थी।
इसलिए उसने उसे बेतेल में पाया। निश्चय यह याकूब पर भी लागू किया जा सकता है, "उसने उसे बेतेल में पाया;" अर्थात्, उसने परमेश्वर को पाया। परन्तु क्योंकि तुरन्त यह जोड़ा गया है, वहाँ उसने हम से बातें कीं, और क्योंकि यह स्वयं परमेश्वर को छोड़ और किसी पर लागू नहीं हो सकता, इसलिए मेरा झुकाव यह भी जोड़ने की ओर है कि परमेश्वर ने याकूब को बेतेल में पाया था। और भविष्यद्वक्ता फिर से याकूब के प्रति परमेश्वर की सेंतमेंत भलाई की हम से सराहना करता है, क्योंकि उसने उससे मार्ग में मिलने की, और यह दिखाने की कृपा की कि वह यात्रा में याकूब का अगुवा था: क्योंकि पहले उसने यह न सोचा था कि परमेश्वर उसके निकट है, जैसा वह स्वयं कहता है, "... यह परमेश्वर का भवन और स्वर्ग का फाटक है, और मैं इसे न जानता था" (उत्पत्ति 28:16, 17)।
इसलिए जब वह पवित्र पुरुष अपने आप को मानो परमेश्वर द्वारा त्यागा हुआ और सब सहायता से रहित समझता था, जब वह अकेला और बिना किसी आशा के था, तब कहा गया है कि परमेश्वर ने उसे पाया; क्योंकि अपनी ही सद्इच्छा से उसने अपने आप को उस पर प्रकट किया, जब उस पवित्र पुरुष ने ऐसी किसी बात की आशा न की थी, और न अपने मन में ऐसी किसी बात की कल्पना की थी। इसलिए परमेश्वर ने अपने दास को पहले ही बेतेल में पा लिया था; और वहाँ उसने बातें कीं, अथवा (कि वही लय बनी रहे) उससे बातें की थीं।
वहाँ उसने हम से बातें की थीं। कुछ लोग {,}עמנוomnu को {,}עמוomu के स्थान पर लेते हैं, अर्थात् "उसने उससे बातें की थीं;" और वे आवश्यकता से विवश होकर ऐसा करते हैं; क्योंकि उन्हें इन शब्दों में कोई अर्थ नहीं मिलता कि परमेश्वर ने बेतेल में हम से बातें कीं। परन्तु व्याकरण के नियमों के विरुद्ध शब्दों को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं। अन्य लोग, जो भविष्यद्वक्ता के शब्दों से हटने का साहस नहीं करते, एक बिलकुल भिन्न अर्थ की कल्पना करते हैं। कुछ कहते हैं, "उसने वहाँ हम से बातें कीं;" अर्थात्, "प्रभु मुझ होशे के द्वारा, और आमोस के द्वारा, जो मेरा सहकर्मी और मित्र है, बोलता है: क्योंकि हम उसके अधिकार से तुम पर पूर्ण विनाश और सर्वनाश की घोषणा करते हैं; और जो कुछ हम तुम्हारे पास लाते हैं वह सब परमेश्वर ने बेतेल में हम पर प्रकट किया है।" परन्तु यह कितना खींचतान भरा है, यह सब को दिखाई देना चाहिए: यह पवित्रशास्त्र को मरोड़ना है, उसकी व्याख्या करना नहीं। अन्य लोग इससे भी अधिक फीकी बात कहते हैं: "वहाँ उसने हम से बातें कीं," मानो स्वर्गदूत ने कहा हो, "ठहर, प्रभु हम से बातें करेगा; मैंने तुझे इस्राएल कहा है, परन्तु प्रभु अन्त में आएगा, जो उस बात को पुष्ट करेगा जो मैं अभी तुझ से कहता हूँ:" मानो वह सचमुच सनातन परमेश्वर न था; परन्तु यह बात वह तुरन्त प्रकट करता है जब वह कहता है, यहोवा उसका स्मरण-नाम है, सेनाओं का यहोवा।
परन्तु यहूदी इसी प्रकार खिलवाड़ करते हैं, जो जब कभी मसीह की ओर संकेत होता है तब विवेकहीन प्राणियों के समान हो जाते हैं।
तो भी भविष्यद्वक्ता के शब्दों पर बहुत परिश्रम करने का कोई बड़ा कारण नहीं जान पड़ता: और कुछ रब्बियों ने भी (उनकी उचित प्रशंसा से उन्हें वंचित न करें) यह अर्थ देखा है, कि प्रभु ने याकूब से ऐसे बातें कीं कि जो कुछ उसने कहा वह सारी प्रजा से सम्बन्ध रखता था। क्योंकि निःसन्देह जो कुछ परमेश्वर ने तब अपने दास से प्रतिज्ञा की, वह प्रजा के सारे समुदाय से और उसके सारे वंश से सम्बन्ध रखता था। तो फिर व्याख्याकार अपने आप को इतना क्यों सताते हैं, जबकि यह प्रत्यक्ष है कि परमेश्वर ने एक मनुष्य के व्यक्तित्व के द्वारा अब्राहम के सारे वंश से बातें कीं? और यह प्रसंग से सबसे अच्छी तरह मेल खाता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता अब, यों कहें, सारी प्रजा पर वह बात लागू करता है जो उसने अब तक कुलपिता याकूब के विषय में लिखी थी।
तो, जिससे वे यह न सोचें कि केवल एक मनुष्य का इतिहास बताया गया है, वह कहता है कि वह सब से सम्बन्ध रखता है। कैसे? क्योंकि प्रभु ने पवित्र याकूब से ऐसे बातें की थीं कि उसका शब्द सब के कानों में गूँजना चाहिए था। क्योंकि उस पवित्र पुरुष से क्या कहा गया? क्या परमेश्वर ने केवल उसी पर अपने आप को प्रकट किया? क्या उसने केवल उसी का पिता होने की प्रतिज्ञा की? नहीं, वरन् उसने उसके सारे वंश को लेपालक बनाया, और अपनी कृपा उसकी सारी सन्तान तक फैलाई। तो जब उसने इस प्रकार सब इस्राएलियों से बातें की थीं, तब उन्हें अब अपने धर्मत्याग पर और भी अधिक लज्जित होना चाहिए था, क्योंकि वे अपने उस पिता से इतने गिर गए थे जिससे वे तो भी जुड़े हुए थे। क्योंकि याकूब और उसकी सन्तान के बीच एकता का एक पवित्र बन्धन था, क्योंकि परमेश्वर ने उन सब को अपने प्रेम में गले लगाया, और उन सब पर अपने लेपालकपन की कृपा की। अब हम भविष्यद्वक्ता का मन समझते हैं। आओ, हम आगे बढ़ें — 87 यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें आलोचकों ने, किसी स्थल का आशय न समझने के कारण, ऐसे संशोधन सुझाए हैं जो विश्वसनीय तो जान पड़ते हैं, परन्तु तो भी, जैसा हम इस प्रसंग में देखेंगे, कैल्विन की व्याख्या में से एक महत्त्वपूर्ण अर्थ को छीन लेते हैं। हॉर्सली भी कैल्विन के समान ही विचार रखता है, यद्यपि न्यूकम नहीं। — सं.
होशे 12:6-7
6. इसलिए तू अपने परमेश्वर की ओर फिर; कृपा और न्याय के काम करता रह, और अपने परमेश्वर की बाट निरन्तर जोहता रह।
6. Et tu ad Deum tuum convertere; bonitatem et judicium custodi; et spera in Deo tuo semper.
7. वह सौदागर है, उसके हाथ में छल का तराज़ू है; अन्धेर करना ही उसको भाता है।
7. Chanaan! In manu ejus statera fraudis (vel, dolosa;) praedari diligit.
भविष्यद्वक्ता अब यहाँ प्रजा पर दबाव डालता है। कुलपिता का उदाहरण देकर वह दिखाता है कि उसकी सन्तान उससे कितनी भिन्न थी, जिनके साथ परमेश्वर खरी शिक्षा के द्वारा कुछ भी न कर सका, यद्यपि वह निरन्तर उनके उद्धार के लिए चिन्तित रहा, और अपने भविष्यद्वक्ताओं को उभारता रहा कि वे खोए हुओं और तितर-बितर हुओं को उद्धार के मार्ग पर लौटा लाएँ।
तो जब ऐसा था, तब भविष्यद्वक्ता उन पर कृतघ्नता का दोष लगाता है। परन्तु पहले वह मन फिराव की बात करता है; और फिर वह दिखाता है कि उसने और परमेश्वर के अन्य सेवकों ने व्यर्थ परिश्रम किया था; क्योंकि प्रजा की हठधर्मिता ऐसी थी कि शिक्षा का कोई प्रभाव न हुआ। उसका उपदेश छोटा है, तो भी उसमें बहुत कुछ समाया है।
वह कहता है, अपने परमेश्वर की ओर फिर। वह यहाँ प्रजा के धर्मत्याग की ओर संकेत करता है, जब वह उन्हें अपने परमेश्वर की ओर फिरने की आज्ञा देता है, और साथ ही उन सब बातों को दोषी ठहराता है जिन्हें इस्राएली, जब भविष्यद्वक्ता उन्हें डाँटते थे, अपने बचाव के रूप में खड़ा करने के आदी थे। क्योंकि वे चाहते थे कि उनकी अपनी कल्पित उपासना-विधियाँ तर्क के रूप में सामने आएँ; वे चाहते थे कि उनके अपने गढ़े हुए देवता सच्चे परमेश्वर का स्थान ले लें। भविष्यद्वक्ता प्रजा को अपने परमेश्वर की ओर फिरने की आज्ञा देकर इस प्रकार के बहानों की जड़ ही काट देता है। वह कहता है, "हाँ, तुम देवताओं की उपासना तो करते हो, और अपने अन्धविश्वासों में अपने आप को बहुत थकाते हो; परन्तु मान लो कि तुम धर्मत्यागी हो, जिन्होंने उस व्यवस्था को ठुकरा दिया है जो सच्चे परमेश्वर ने तुम्हें दी थी। इसलिए अपने परमेश्वर की ओर लौट आओ।" और वह परमेश्वर को इस्राएल का परमेश्वर कहता है, उनका आदर करने के लिए नहीं, वरन् उन्हें धिक्कारने के लिए, क्योंकि उन्होंने जान-बूझकर और इच्छापूर्वक उस सच्चे परमेश्वर की उपासना को त्याग दिया था जिसने अपने आप को उन पर प्रकट किया था।
इसके बाद मन फिराव का सच्चा मार्ग दिखाया गया है। पद का आरम्भ, जैसा मैं कह चुका हूँ, प्रजा से मन फिराने की माँग करता है; परन्तु क्योंकि हम जानते हैं कि जब मनुष्य मन फिराने के लिए बुलाए जाते हैं तब वे परमेश्वर से खिलवाड़ करते हैं, इसलिए यह व्यर्थ नहीं कि मन फिराव की एक परिभाषा, अथवा कम से कम एक संक्षिप्त वर्णन, जोड़ा गया है, जिसके द्वारा यह प्रत्यक्ष किया गया है कि मन फिराना, अथवा परमेश्वर की ओर फिरना, क्या है। तब भविष्यद्वक्ता कहता है, — कृपा, अथवा दया, और न्याय को बनाए रख। वह दूसरी पटिया से आरम्भ करता है, और फिर परमेश्वर के प्रति भक्ति को जोड़ता है। परन्तु वह केवल दो बातें रखता है, जिनमें उसने दूसरी पटिया की सारी शिक्षा समाहित कर दी। क्योंकि पाँचवीं से अन्तिम आज्ञा तक परमेश्वर का अभिप्राय इसके सिवा और क्या है कि वह हमें प्रेम के नियम के अनुसार अपना जीवन ढालना सिखाए? तो व्यवस्था की दूसरी पटिया में हमें सिखाया जाता है कि हमें अपने भाइयों के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए; अथवा यदि कोई और भी छोटा सार चाहे, तो व्यवस्था की दूसरी पटिया में मनुष्यों के परस्पर कर्तव्य दिखाए गए हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ व्यवस्था के दूसरे भाग से आरम्भ करता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता क्रम का कठोरता से पालन करने के आदी नहीं, और न वे सदा किसी नियमित पद्धति का पालन करते हैं; वरन् उनके लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे उन मुख्य बातों का उल्लेख करें जिनके द्वारा वे अपने विषय को समझाते हैं; और इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ, अपनी सामान्य रीति के अनुसार, पहले स्थान पर प्रेम का उल्लेख करता है, और फिर परमेश्वर की उपासना की ओर बढ़ता है। यह क्रम, जैसा मैं कह चुका हूँ, न तो स्वाभाविक है और न विधिसम्मत; परन्तु इसका कोई महत्त्व नहीं; वरन् भविष्यद्वक्ता बिना उत्तम कारण के ऐसा नहीं करते थे; क्योंकि मन फिराव की परख ईश्वरीय उपासना की अपेक्षा दूसरी पटिया के पालन के द्वारा अधिक अच्छी तरह होती है। क्योंकि जैसे कपटी ढोंग करते हैं, और अद्भुत आवरणों से अपने आप को छिपाते हैं, वैसे ही प्रभु एक कसौटी लगाता है, और वह यह तब करता है जब वह उन्हें प्रकाश में खींच लाता है, और उनके छल, लूटपाट, क्रूरता, झूठी शपथें, चोरियाँ और ऐसी ही बुराइयाँ सब के सामने खोल देता है। तो जब कपटी व्यवस्था की दूसरी पटिया के द्वारा अधिक अच्छी तरह दोषी ठहराए जा सकते हैं, तब प्रभु उचित ही है कि जब वह मन फिराव की बात करता है तब इसी का सहारा लेता है; मानो उसने कहा, "अब यह प्रत्यक्ष हो जाए कि तुम्हारा मन फिराव क्या है, बनावटी है या सच्चा; क्योंकि यदि तुम अपने पड़ोसियों के प्रति न्याय और सीधाई से व्यवहार करते हो, यदि तुम समता और खराई का पालन करते हो, तो यह तुम्हारे मन फिराव का निश्चित प्रमाण है।"
साथ ही, भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की उपासना की उपेक्षा नहीं करता; क्योंकि वह आगे कहता है, —
अपने परमेश्वर पर सदा आशा रख। "आशा" शब्द के द्वारा वह पहले विश्वास की माँग करता है, और फिर प्रार्थना की, जो उससे उत्पन्न होती है, और धन्यवाद की, जो अवश्य उसके पीछे आता है। इस प्रकार "आशा" शब्द में, अंश के द्वारा पूर्ण के रूप में, परमेश्वर की सारी उपासना संक्षेप में समाहित है। तो भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि इस्राएल अपने अन्धविश्वासों को त्यागकर एक ही सच्चे परमेश्वर पर टिके, और अपना सारा उद्धार उसी पर रखे, कि वे उसी की शरण में भागें, और सब आशीषों के लिए उचित प्रशंसा केवल उसी को दें। ऐसा करके वे परमेश्वर की शुद्ध उपासना को पुनः स्थापित करते, और अपने सब व्यभिचारी अन्धविश्वासों को दूर फेंक देते। व्यवस्था की दूसरी पटिया के विषय में वह पहले ही बोल चुका था।
इससे हम देखते हैं कि मन फिराव परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार सारे जीवन के सुधार के सिवा और कुछ नहीं। क्योंकि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में अपनी इच्छा प्रकट की है; और हम उससे जितना हटते या भटकते हैं, उतना ही हम प्रभु से दूर हो जाते हैं। परन्तु जब हम परमेश्वर की ओर फिरते हैं, तब सच्चा प्रमाण यह है कि हम उसकी व्यवस्था के अनुसार अपने जीवन को सुधारें, और आत्मिक रीति से उसकी उपासना करने से आरम्भ करें, जिस उपासना का मुख्य भाग विश्वास है, जिससे प्रार्थना निकलती है; और जब, इसके अतिरिक्त, हम अपने पड़ोसियों के प्रति कृपा और न्याय से व्यवहार करें, और सब प्रकार की हानि, छल, लूटपाट और हर प्रकार की दुष्टता से दूर रहें। यही मन फिराव का सच्चा प्रमाण है।
परन्तु जब भविष्यद्वक्ता ने इस्राएलियों को मन फिराने का उपदेश दिया, तब वह आगे कहता है कि उनकी हठधर्मिता ऐसी थी कि वह बिना किसी फल के हुआ। वह कहता है, कनान! मैं इसे अलग पढ़ता हूँ; क्योंकि जो कुछ लोग यहाँ अध्याहार मानते हैं वह फीका है, जैसे, "वह कनान के सदृश हो गया, अथवा कनान के समान था, जिसके हाथ में," इत्यादि। परन्तु, इसके विपरीत, भविष्यद्वक्ता यहाँ एक ही शब्द से इस्राएलियों को दोषी ठहराता है; मानो उसने कहा कि वे पूर्णतः परदेशी थे, और अब्राहम की सन्तान कहलाने के अयोग्य थे। और इसी प्रकार जब हम क्रोध में बोलते हैं, तब हमारी बात प्रायः अचानक टूटी हुई होती है। तो भविष्यद्वक्ता क्रोध के कारण उन्हें "कनान" कहता है; जिसका अर्थ यह है, "तुम अब्राहम की सन्तान नहीं हो; तुम झूठमूठ उसके नाम पर घमण्ड करते हो, जो तुम्हें शोभा नहीं दे सकता; क्योंकि तुम कनान हो।"
इसके बाद वह जोड़ता है, उसके हाथ में छल का तराज़ू है, वह लूटना, अथवा छीनना, पसन्द करता है। शब्दशः यह है, वह छीनने से प्रेम रखता है। परन्तु अर्थ स्पष्ट है, कि वे लूटपाट से प्रीति रखते थे; अर्थात्, वे पूरे लालच के साथ डकैती के कामों की ओर बह जाते थे। पहले यह ध्यान देना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता यहाँ अब्राहम के शारीरिक वंशजों को कनान कहकर कलंकित करता है, और यह दोषारोपण भविष्यद्वक्ताओं में बार-बार मिलता है। और उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किए जाने का कारण यह था कि ये मूर्ख मनुष्य घमण्ड से अपनी जाति की विशिष्टता को अपनी ढाल बनाकर खड़ा करने के आदी थे। "क्या! हम तो पवित्र प्रजा हैं।" क्योंकि इस बहाने से वे भविष्यद्वक्ताओं की सब चेतावनियों को ठुकरा देते थे, इसलिए परमेश्वर यह निन्दा उन्हीं पर लौटा देता है, "तुम अब्राहम की सन्तान नहीं हो; वरन् तुम कनान हो:" मानो उसने कहा, "उस जाति में अब तक कुछ भी नहीं बदला, इस्राएली सदा अपने ही समान बने रहते हैं।" प्रभु ने एक बार उस देश को भक्तिहीन मनुष्यों से शुद्ध किया था: परन्तु जब अब्राहम के वंशज कनानियों के समान हो गए, तब वे कनान का वंश कहलाए; मानो वही जाति, जो पहले वहाँ थी, अब भी बनी रही हो; क्योंकि उनके चाल-चलन में कोई अन्तर न था, क्योंकि वे भ्रष्टता में बराबर या एक-से थे।
परन्तु इसके बाद वह कारण आता है कि वह उन्हें कनान की जाति क्यों कहता है — अर्थात् इसलिए कि वे अपने हाथ में छल का तराज़ू रखते थे, और पूरी लालसा के साथ लूटपाट में लगे रहते थे। छल का तराज़ू उनके ढोंग, धोखों और झूठों तक भी फैलाया जा सकता है, जिनसे, जैसा परमेश्वर पहले शिकायत कर चुका था, वह घिरा हुआ था; परन्तु क्योंकि तुरन्त यह आता है, वह लूटपाट से प्रीति रखता है, इसलिए मैं यहाँ हानि पहुँचाने की उन दो रीतियों को समझना अधिक पसन्द करता हूँ जिनमें लगभग हर प्रकार की दुष्टता समाहित है; क्योंकि मनुष्य जब दूसरों को हानि पहुँचाते हैं, तब या तो चतुराई से ठगते हैं, या खुले बल से अपने पड़ोसियों की हानि करते हैं। तो जब वे लोग जो अपने पड़ोसियों के साथ अन्याय करते हैं, या तो खुलेआम उनकी हानि करते हैं, या अपने छल और कपटपूर्ण व्यवहार से भोले-भाले लोगों को फँसाते हैं, तब होशे यहाँ पहले स्थान पर छल का तराज़ू रखता है, और फिर उनके छीनने या लूटने के लालच को जोड़ता है। तो यह ऐसा ही है मानो उसने कहा कि वे धोखेबाज़ थे, और वे ऐसे डाकू भी थे जो खुली हिंसा से काम लेते थे। उसका आशय यह है कि वे बिना किसी व्यवस्था या अंकुश के अन्याय और अधर्म के कामों में लगे रहते थे, और हानि करने में ऐसे तत्पर थे कि वे उसे या तो चतुराई से या खुले बल से करते थे। तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे एक खतनारहित जाति कहलाए। क्यों? क्योंकि परमेश्वर से उनका कोई सम्बन्ध न था, क्योंकि वे इस प्रकार उसकी व्यवस्था से हट गए थे; हाँ, वे कृपा और दया से घृणा करते थे। इससे यह भी निकलता है कि वे सब भक्ति से रहित थे, क्योंकि वे इस प्रकार अपने पड़ोसियों के प्रति सारी समता को भूल गए थे। यही इसका अर्थ है।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, यह वरदान दे कि जिस प्रकार तू अब हम पर, जैसे पूर्वकाल में पवित्र पूर्वजों पर, छायाओं और प्रतीकों में नहीं, वरन् अपने एकलौते पुत्र में स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है, —
हाँ, यह वरदान दे कि हम तेरे उस स्वरूप के ध्यान में, जो इस प्रकार हमारे सामने चमकता है, पूर्णतः लीन हो जाएँ; और हम उसी में ऐसे रूपान्तरित किए जाएँ कि निरन्तर आगे बढ़ते जाएँ, यहाँ तक कि अन्त में अपने शरीर की सारी मलिनता को उतारकर हम उस शुद्ध और सिद्ध पवित्रता के पूर्णतः अनुरूप हो जाएँ जो मसीह में वास करती है, क्योंकि उसी में सब आशीषों की परिपूर्णता वास करती है; और इस प्रकार अन्त में उस महिमा के सहभागी हों जो हमारे प्रभु ने अपने पुनरुत्थान के द्वारा हमारे लिए प्राप्त की है। आमीन।
तैंतीसवाँ व्याख्यान
होशे 12:8
8. और एप्रैम ने कहा, तौभी मैं धनी हो गया हूँ, मैंने अपने लिए सम्पत्ति पाई है: मेरे सारे परिश्रम में वे मुझ में कोई ऐसा अधर्म न पाएँगे जो पाप हो।
8. Et dixit Ephraim, Attamen ditatus sum; inveni opes mihi: in omnibus laboribus meis non invenient mihi iniquitatem, quia scelus (vel, piaculum.)
यहाँ परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के द्वारा शिकायत करता है कि इस्राएली अपनी बुराइयों में अपनी चापलूसी करते थे, क्योंकि उनके काम सफलतापूर्वक और उनकी इच्छाओं के अनुसार बनते जाते थे: और यह एक अति सामान्य दोष है कि जब तक भाग्य, जैसा लोग प्रायः कहते हैं, उन पर मुस्कराता है, तब तक मनुष्य अपने आप को धन्य समझते हैं, और सोचते हैं कि उस समय परमेश्वर उन पर प्रसन्न है। तो जब प्रजा की दशा ऐसी थी, तब उन्होंने सब भविष्यद्वक्ताओं और उनकी डाँटों को तुच्छ जाना। इसी ढिठाई की प्रभु अब शिकायत करता है। एप्रैम ने कहा है, तौभी मैं धनी हो गया हूँ। यहाँ विरोधसूचक अव्यय में एक विशेष बल है जिस पर ध्यान देना चाहिए।
इब्रानी में यह कभी-कभी एक साधारण स्वीकृतिसूचक शब्द होता है; परन्तु यहाँ भविष्यद्वक्ता एक और बात प्रकट करना चाहता था, अर्थात् यह कि इस्राएली सब डाँटों पर हँसते थे, क्योंकि परमेश्वर उन पर प्रसन्न जान पड़ता था, मानो वह समृद्धि के द्वारा अपनी कृपा प्रकट कर रहा हो। "तौभी मैं धनी हो गया हूँ; और इसलिए भविष्यद्वक्ता चाहे जो कहें, मुझे उसकी कुछ चिन्ता नहीं, क्योंकि मैं अपने भाग से सन्तुष्ट हूँ।" यह, जैसा मैं कह चुका हूँ, एक सामान्य बुराई है; और इसलिए इस स्थल पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि जब प्रभु कुछ समय के लिए हमें छोड़ देता है, तब हम सोचें कि हम उसके सामने निर्दोष हैं; क्योंकि समृद्ध और मनचाही परिस्थितियों के द्वारा हमारी आँखों के चौंधिया जाने से बढ़कर डरने योग्य और कुछ नहीं। इसलिए यद्यपि प्रभु हमें सह ले, और तुरन्त हमारे विरुद्ध अपना पलटा न निकाले, वरन्, इसके विपरीत, मानो कृपापूर्वक हमें अपनी गोद में पाले; तो भी यदि वह अपने वचन के द्वारा हमें डाँटता है, तो हमें उसकी धमकियों पर ध्यान देना चाहिए।
परन्तु वे आगे यह भी जोड़ते हैं, मेरे सारे परिश्रम अधर्म न पाएँगे, अथवा, वे मेरे सारे परिश्रम में अधर्म न पाएँगे। बहुत से लोग शब्दों के अनुसार सीधा यों पढ़ते हैं, "मेरे परिश्रम अधर्म न पाएँगे:" परन्तु क्योंकि यह अभिव्यक्ति कठोर जान पड़ती है, इसलिए मैंने, जैसा अन्य लोगों ने भी किया है, इसका अधिक सरल अनुवाद करने का यत्न किया है, "वे मेरे सारे परिश्रम में अधर्म न पाएँगे।" यह डींग और आगे बढ़ गई, क्योंकि भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि प्रजा केवल इसलिए निश्चिन्त नहीं थी कि प्रभु ने उन्हें अपनी पितृतुल्य कृपा के कुछ चिह्न दिए थे; वरन् वे इस अधर्मी भरोसे से मतवाले भी हो गए थे कि यदि वे हर दोष और बुराई से मुक्त न होते, तो परमेश्वर उन पर कृपा न करता: और इस दूसरे वाक्यांश पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए। अब यह एक ऐसी भ्रष्टता है जो किसी प्रकार सहने योग्य नहीं, जब मनुष्य परमेश्वर को इसलिए तुच्छ जानने लगते हैं कि वह उनसे कृपा का व्यवहार करता है, और जब वे उसकी नम्रता का ऐसा दुरुपयोग करते हैं कि उसकी सारी शिक्षा और उसकी सारी धमकियों को तुच्छ ठहराते हैं; यह निश्चय ही बहुत बड़ा विकार है: परन्तु जब इस सब के साथ ऐसा घमण्ड भी जुड़ जाता है कि भक्तिहीन और त्यागे हुए मनुष्य अपने आप को यह विश्वास दिला लेते हैं कि वे धर्मी हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें तुरन्त दण्ड नहीं देता, — तो यह मानो एक शैतानी उन्माद है; और तो भी हम देखते हैं कि यह एक सामान्य बात है। क्योंकि भक्तिहीन मनुष्य केवल अपने धन पर घमण्ड ही नहीं करते, वे केवल अपनी शक्ति से फूले ही नहीं रहते; वरन् वे यह भी सोचते हैं कि परमेश्वर किसी प्रकार उनका ऋणी है। "क्यों! अवश्य परमेश्वर मुझे निर्दोष और हर बुराई से शुद्ध समझता है, क्योंकि वह मुझ पर कृपा करता है: तो वह मुझ में कोई दण्ड के योग्य बात नहीं पाता।" इस प्रकार दुष्ट लोग परमेश्वर के विरुद्ध अपने सींग उठाते हैं, जबकि वह उन्हें ढील देता है, और उनके प्रति उतना कठोर नहीं दिखाई देता जितने के वे योग्य हैं।
जब आज के दिन हम मानवजाति के अधिकांश भाग में इन बुराइयों को प्रबल होते देखते हैं, तो चकित होने का कोई कारण नहीं: परन्तु साथ ही हमें भविष्यद्वक्ता की शिक्षा से लाभ उठाना चाहिए, जिससे हम समृद्धि से अन्धे न हो जाएँ, और डाँटों को तुच्छ न जानें, और अपने पाप में अपनी चापलूसी न करें; और यह भी कि जब वह हम से कृपा का व्यवहार करता है, तब हम अपने लिए परमेश्वर के क्रोध का भण्डार इकट्ठा न करें। तो आओ, हम उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग न करें; हम यह न सोचें कि हम उसके सामने निर्दोष हैं, क्योंकि वह तुरन्त अपने दण्ड नहीं देता; वरन् हम अपने आप को जाँचना और अपनी बुराइयों को झाड़ फेंकना सीखें, जिससे हम उसके हाथ के नीचे अपने आप को दीन करें, यद्यपि वह दण्ड देने से अपने आप को रोके रखता है। यही वर्तमान शिक्षा का प्रयोग है।
परन्तु हमें इस पर ध्यान देना चाहिए जो भविष्यद्वक्ता आगे जोड़ता है, वे मेरे परिश्रमों में अधर्म न पाएँगे; अर्थात्, मेरे परिश्रमों में अधर्म न पाया जाएगा, क्योंकि यह दुष्टता है, अथवा ऐसा अपराध है जिसके लिए प्रायश्चित्त आवश्यक है। मुझे आश्चर्य है कि व्याख्याकार इस स्थल की इतनी फीकी व्याख्या करते हैं; क्योंकि वे कहते हैं कि मेरे परिश्रमों में अधर्म या पाप न पाया जाएगा। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ समुच्चयबोधक नहीं रखता, वरन् {,}אשרasher अव्यय का प्रयोग करता है, जिसे यहाँ व्याख्यात्मक अर्थ में लेना चाहिए। और अर्थ यह है कि कपटी, जब वे अपने लिए निर्दोषता की प्रशंसा का दावा करते हैं, तब ढोंग के लिए ऊपरी तौर पर हर दुष्टता और अपराध से घृणा प्रकट करते हैं। "मेरे परिश्रमों में अधर्म न पाया जाएगा, क्योंकि यह तो दुष्टता है; परमेश्वर न करे कि मैं अपने कामों में दुष्ट व्यक्ति पाया जाऊँ; क्योंकि मैं अपने सब व्यवहारों में छल से रहित हूँ।" परन्तु क्या ऐसा है? कदापि नहीं; परन्तु क्योंकि वे समृद्ध भाग्य के द्वारा परमेश्वर की कृपा का अनुमान लगाते हैं, इसलिए वे सोचते हैं कि यदि परमेश्वर उन्हें धर्मी और शुद्ध न समझता, तो वह उन पर इतना कृपालु न होता। इससे हम देखते हैं कि कपटी, जब वे उसकी शिक्षा और चेतावनियों को तुच्छ जानने लगते हैं, तब कितनी निश्चिन्तता से परमेश्वर का ठट्ठा करते हैं। तो हमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं कि आज के दिन संसार में सब कहीं इतनी हठधर्मिता प्रबल है। परन्तु आओ, हम भी शिक्षा की इस रीति का प्रयोग करें जो भविष्यद्वक्ता हमारे सामने रखता है। अब हम आगे बढ़ें —
होशे 12:9
9. और मैं, जो मिस्र देश ही से तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, फिर तुझे नियत पर्व के दिनों के समान तम्बुओं में बसाऊँगा।
9. Ego autem Jehova Deus tuus a terra Aegypti: habitare te faciam in tabernaculis, sicut diebus conventus.
पहले वाक्यांश में परमेश्वर इस्राएलियों को इस बात के लिए धिक्कारता है कि वे उसके छुटकारे के उपकार को भूल गए थे, जिसका स्मरण उनके बीच सदा प्रबल और जीवित बना रहना चाहिए था। वह कहता है, तौभी मैं मिस्र देश ही से तेरा परमेश्वर हूँ; अर्थात्, "यह विचित्र बात है कि तुम इतने भुलक्कड़ हो कि तुम्हारा छुटकारा तुम्हारे मन में आता ही नहीं, जो तुम्हें भली-भाँति ज्ञात होना चाहिए था, और मानो सदा तुम्हारी आँखों के सामने रहना चाहिए था।" जैसा हम जानते हैं, वह परमेश्वर की करुणा का एक स्मरणीय उदाहरण था। परन्तु जब वह कहता है कि वह मिस्र देश ही से उस प्रजा का परमेश्वर है, तब वह छुटकारे के उद्देश्य की ओर संकेत करता है, मानो वह कहता हो, "मैंने तुझे इसी उद्देश्य से छुड़ाया कि तू सदा के लिए मुझसे बँधा रहे।" क्योंकि हम जानते हैं कि जब उसने उस प्रजा को उनके क्रूर अत्याचार से छुड़ाया, तब उसने उसी समय अपने लिए एक अनन्त राज्य प्राप्त किया; तब वह अपनी चुनी हुई प्रजा में पवित्र ठहराया गया। अतः भविष्यद्वक्ता के शब्दों में छुटकारे के उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए: वह कहता है, "मैं मिस्र देश ही से तेरा परमेश्वर हूँ; नहीं तो तू अपनी कब्र में से कैसे निकल सकता था?" क्योंकि जब परमेश्वर ने उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया, तब वे मृतकों के समान थे। सो मिस्र देश ही से मैं तेरा परमेश्वर हूँ, जिसका अर्थ यह है: "जब कि मेरे अनुग्रह से तू ऐसी अद्भुत रीति से मृत्यु से जीवन में लौटाया गया है, तो क्या मैं उसी दिन से तेरा परमेश्वर नहीं हूँ? इसलिए तू अपने आप को और अपना सब कुछ मेरा ऋणी है; क्योंकि मैंने तुझे अपनी निज सम्पत्ति होने के लिए मोल लिया है। अब जब तू ढिठाई से मेरे भविष्यद्वक्ताओं को, जो मेरे नाम से बोलते हैं, ठुकराने का साहस करता है, तो यह निश्चय ही असहनीय कृतघ्नता है कि तू अपने छुटकारे को, और उस उद्देश्य को भूल जाता है जिसके लिए मैंने तुझ पर अपनी सामर्थ्य और अपना अनुग्रह प्रकट किया।"
परन्तु दूसरे वाक्यांश के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है; कुछ इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि परमेश्वर इस्राएलियों पर, वे चाहे कितने ही अयोग्य क्यों न हों, दया दिखाना बन्द न करेगा: मैं तुझे तेरे तम्बुओं में बसाऊँगा; और वे तम्बुओं को ठीक-ठीक शाब्दिक अर्थ में नहीं, वरन् घरों के अर्थ में लेते हैं। फिर वे कहते हैं, मोएद के दिनों के अनुसार, अर्थात् प्राचीन वाचा के अनुसार, या ठहराए हुए दिनों के अनुसार; क्योंकि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वह कनान देश अब्राहम के वंश को उनके सदा के विश्राम के लिए देगा। परन्तु यह व्याख्या उपयुक्त प्रतीत नहीं होती। दूसरे कहते हैं कि यहाँ इस्राएलियों को इसलिए डाँटा गया है कि उन्होंने परमेश्वर की उस आज्ञा की उपेक्षा की, जिसने एक पर्व-दिन ठहराया था, जिस पर उन्हें प्रतिवर्ष अपने छुटकारे का स्मरण करना था। हम निःसन्देह जानते हैं कि झोपड़ियों का वार्षिक पर्व होता था: अतः वे समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का आशय यह है, "मैंने तुझे केवल एक बार ही नहीं छुड़ाया, वरन् मैंने यह भी चाहा कि इस उपकार का एक स्मारक बना रहे; और मैंने तुम्हें प्रतिवर्ष पर्व मनाने की आज्ञा किस प्रयोजन से दी, सिवाय इसके कि जो बात अन्यथा भुला दी जाती उसे तुम अपनी स्मृति में बनाए रखो? परन्तु इस विधि से मैंने कुछ भी सिद्ध नहीं किया, क्योंकि अब मैं ठुकराया गया हूँ, और मेरे भविष्यद्वक्ताओं का तुम्हारे बीच कोई अधिकार नहीं।" परन्तु यह अर्थ भी फीका है। कुछ लोग समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएलियों को धमकी देता है, मानो वह कहता हो, "परमेश्वर तुम्हें फिर से निकाल देगा, कि तुम तम्बुओं में वैसे ही रहो जैसे पहले जंगल में रहते थे।" यद्यपि मैं इस मत को अस्वीकार नहीं करता, तौभी मैं समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता के शब्दों में कुछ और अधिक बलपूर्ण बात है, अर्थात् यह कि परमेश्वर यहाँ परोक्ष रीति से कहता है कि एक नये छुटकारे की आवश्यकता थी, जिससे वह प्रजा को और भी अधिक अपने साथ बाँध ले; मानो वह कहता हो, "मैं देखता हूँ कि तुम मेरे पहले छुटकारे को भूल गए हो; क्योंकि मैं देखता हूँ कि तुम उसे कुछ भी नहीं समझते, मानो वह पुराना पड़ गया हो; अतः यदि मेरे प्राचीन उपकार की स्मृति नई न की जाए, तो मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ जाएगा: इसलिए मैं तुझे फिर से तम्बुओं में बसाऊँगा। यह आवश्यक है कि तुझे फिर से तेरे निज भाग से निकाला जाए, और फिर से लौटाया जाए, और वह भी ऐसी रीति से जो असाधारण हो और जिसकी सबसे कम आशा हो, जिससे तू समझ ले कि मैं ही तेरा छुड़ानेवाला हूँ।"
अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का आशय क्या था। परमेश्वर यह कहने के बाद कि वह मिस्र देश ही से इस्राएल का परमेश्वर है, आगे जोड़ता है, "क्योंकि तुम्हारा पहला छुटकारा तुम्हारी दुष्ट विस्मृति के कारण अपना सारा प्रभाव खो चुका है, इसलिए मैं फिर से तुम्हारा छुड़ानेवाला बनूँगा; अतः मैं तुझे पहले के समान तम्बुओं में ठहराऊँगा या बसाऊँगा; जब कि तुम्हारा पहला छुटकारा कुछ लाभ नहीं देता, तो मैं एक दूसरा जोड़ूँगा, जिससे तुम अन्त में पश्चात्ताप करो, और जानो कि तुम मेरे कितने ऋणी हो।" मोएद के दिनों से वह जंगल में उनकी उस यात्रा-रीति को लेता है जिसका वर्णन मूसा ने किया है; क्योंकि वे अपनी छावनियों से बलिदानों के लिए एकत्र होते थे। अतः परमेश्वर यहाँ उस वाचा की बात नहीं करता जो उसने अपनी प्रजा से बाँधी थी, मानो वह किसी सनातन अनुबन्ध की ओर संकेत करता हो; वरन् वह उन दिनों को मोएद के दिन कहता है जिनमें इस्राएली एकत्र होते थे, जब वे मूसा के दिए हुए वृत्तान्त के अनुसार अपनी छावनियों में ठहराए गए थे। अब आगे आता है —
होशे 12:10
10. मैंने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें भी कीं, और बहुत से दर्शन दिखाए, और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा दृष्टान्तों का प्रयोग किया।
10. Et locutus sum super Prophetas, et ego visionem multiplicavi, et in manu Prophetarum assimilavi (vel, similitudines posui.)
भविष्यद्वक्ता प्रजा के पाप को बढ़ाकर दिखाता है, कि उन्होंने सदा हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध किया था, यहाँ तक कि उनके पास अज्ञानता का कोई बहाना न रहा: क्योंकि हम जानते हैं कि जब तक मनुष्य अज्ञानता या असावधानी की दुहाई दे सकते हैं, तब तक वे परमेश्वर के भयानक न्याय से बचने का प्रयत्न करते हैं। भविष्यद्वक्ता इस बात का खण्डन करता है कि प्रजा शिक्षा के अभाव में गिरी थी, क्योंकि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें बार-बार, वरन् निरन्तर चिताया गया था। अतः यह प्रकट होता है कि यह प्रजा मानो जान-बूझकर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही बन गई थी; क्योंकि उन्होंने भविष्यद्वक्ताओं को सदा तुच्छ जाना था, एक या दो बार नहीं, वरन् तब जब प्रभु ने उन्हें एक के बाद एक भेजा: वह कहता है, मैंने अपने भविष्यद्वक्ताओं पर बातें कीं, या, अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा; क्योंकि {,}על ol के कई अर्थ लिए जाते हैं: 'मैंने अपने भविष्यद्वक्ताओं पर बातें कीं,' अर्थात्, मैंने उनके पास वह शिक्षा सौंप दी जिसे तुम्हें सही मार्ग पर लौटा लाना चाहिए था; और केवल इतना ही नहीं, वरन् मैंने दर्शनों को बहुत बढ़ाया; मैंने तुम्हें एकत्र करने का प्रयत्न केवल एक ही रीति से नहीं किया, वरन् मैंने बहुत से दर्शन एकत्र किए: और फिर वह कहता है, भविष्यद्वक्ताओं के हाथ में मैंने दृष्टान्त रखे; अर्थात्, मैंने हर सम्भव रीति से तुम्हें स्वस्थ बुद्धि में लौटा लाने का यत्न किया है; क्योंकि परमेश्वर मनुष्यों की रीति पर बोलता है। वह चाहता तो निःसन्देह अपने आत्मा की गुप्त प्रेरणा से यह कार्य कर सकता था; परन्तु मनुष्यों से हर बहाना छीन लेने के लिए यह तथ्य प्रस्तुत करना पर्याप्त है कि वे वचन का पालन नहीं करते, और जब वह अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें पश्चात्ताप के लिए उभारता है, तब वे अपने आप को परमेश्वर के सामने आज्ञाकारी और सीखने योग्य बनाकर प्रस्तुत नहीं करते। अतः यह पाप की एक ऐसी वृद्धि है जो ध्यान देने योग्य है, जब परमेश्वर उलाहना देता है और कहता है कि उसने तितर-बितर इस्राएल को एकत्र करने में अपना सारा प्रयत्न व्यर्थ लगाया, यद्यपि वह निरन्तर अपने भविष्यद्वक्ताओं के परिश्रम का उपयोग करता रहा।
परन्तु यह उलाहना आज हम पर भी लागू किया जा सकता है; हाँ, भविष्यद्वक्ता ने अब तक जो कुछ कहा है, वह सब उचित रूप से हमारे विरुद्ध भी लगाया जा सकता है। क्योंकि हम देखते हैं कि संसार सब चितावनियों के विरुद्ध अपने आप को कैसे कठोर कर लेता है; और हम यह भी देखते हैं कि प्रभु कितने समय तक अपने न्याय को रोके रहता है, और उन मनुष्यों को सहता है जो उसकी सहनशीलता का ठट्ठा करते हैं। अतः वही दुष्टता जिसका वर्णन भविष्यद्वक्ता इस स्थान में करता है, आज संसार में प्रचण्ड है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने हमें केवल मिस्र से ही नहीं, वरन् अधोलोक की गहराइयों से छुड़ाया है, और हम जानते हैं कि हम मसीह के द्वारा इसी उद्देश्य से छुड़ाए गए हैं, — कि हम पूर्णतः परमेश्वर के प्रति समर्पित हों; क्योंकि मसीह इसी प्रयोजन से मरा और जी उठा, — कि वह जीवितों और मरे हुओं दोनों का प्रभु हो। परन्तु हम देखते हैं कि मनुष्यों की हठधर्मिता कितनी बड़ी है, और वे कैसे निडर होकर परमेश्वर के विरुद्ध स्वच्छन्द हो जाते हैं। हममें से कौन स्मरण रखता है कि वे अब अपने नहीं रहे, क्योंकि वे मसीह के लहू से मोल लिए गए हैं? थोड़े ही लोग इस पर विचार करते हैं। और केवल यही एकमात्र सच्चा और सनातन छुटकारा ही हमें स्मरण नहीं रखना चाहिए; क्योंकि जब हम पोपतन्त्र के गड्ढे में डूबे हुए थे, तब प्रभु ने हमें फिर से छुड़ाया; और वह प्रतिदिन भी हमारे प्रति उसी करुणा को नया करता है; तौभी हम ऐसे भुलक्कड़ हैं कि प्रायः परमेश्वर का अनुग्रह हमें स्मरण नहीं रहता।
अब हम देखते हैं कि यह शिक्षा हमारे युग के लिए भी कितनी आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, परमेश्वर प्रतिदिन हमें उकसाने और प्रेरित करने से नहीं रुकता; वह भविष्यद्वाणियों और दृष्टान्तों को बढ़ाता है; अर्थात्, वह नाना प्रकार से अपने आप को हमारे अनुकूल बनाता है; क्योंकि दृष्टान्तों से उसका तात्पर्य शिक्षा के सब रूपों से है। और निःसन्देह हम देखते हैं कि परमेश्वर एक प्रकार से अपने वचन में अपना रूप बदल लेता है, क्योंकि वह अपनी महिमा के अनुसार नहीं बोलता, वरन् जैसा वह हमारी समझ और दुर्बलता के उपयुक्त देखता है वैसा बोलता है; क्योंकि पवित्रशास्त्र हमारे सामने नाना प्रकार के चित्र रखता है, जो हमें परमेश्वर का मुख दिखाते हैं। सो जब परमेश्वर इस प्रकार हमारी अज्ञानता के अनुकूल अपने आप को ढालता है, तब यदि कोई फल न निकले तो हमारी कृतघ्नता कितनी बड़ी है? अतः हम स्मरण रखें कि भविष्यद्वक्ता ने अपने युग के मनुष्यों को इस प्रकार डाँटा कि वह आज हमसे भी बात करता है। अब हम आगे बढ़ें —
होशे 12:11
11. क्या गिलाद में अधर्म है? निश्चय वे व्यर्थ हैं: वे गिलगाल में बैलों के बलिदान चढ़ाते हैं; हाँ, उनकी वेदियाँ खेत की रेघारियों पर पड़े ढेरों के समान हैं।
11. An in Gilead iniquitas? (vel, an Gilead coepit peccare?) certe vanitas (vel, mendacium) fuerunt in Gilgal (alii disjungunt istud {,}בגלגלut contexant cum sequentibus) boves sacrificarunt, etiam altaria eorum sicut acervi super sulcos agrorum.
जब भविष्यद्वक्ता कहता है, क्या गिलाद में अधर्म है? तो यह एक व्यंग्यपूर्ण प्रश्न है; और वह उनके उन्माद का उपहास करता है जो ऐसे घोर दोषों में आनन्द मनाते थे, जब कि उनकी उपासना पूर्णतः खोटी और भ्रष्ट हो चुकी थी। जब वे जानते थे कि वे परमेश्वर के प्रति विश्वासघाती हैं, और ऐसी उपासना के पीछे चलते हैं जो उसकी व्यवस्था से अलग हो गई है, तौभी वे ऐसे टेढ़े थे कि वे घमण्ड से सब चितावनियों को ठुकरा देते थे। सो जब वे अपने दोषों में अन्धे हो गए थे, तब भविष्यद्वक्ता व्यंग्य से उनसे पूछता है, क्या गिलाद में अधर्म है? वे अब तक, मानो, सन्देह में हैं कि क्या वे परमेश्वर के सामने दोषी हैं, क्या उन पर कोई दोष है। वह कहता है, निश्चय वे व्यर्थ हैं; अर्थात्, "वे अपने लिए चाहे कितने ही सुन्दर दिखनेवाले बहाने क्यों न ढूँढ़ें, और इस बात से इन्कार करें कि उन्हें अपने बुरा करने का बोध है, और सन्देह के बहुत से कारण भी प्रस्तुत करें, जिससे उन्हें अपना पाप मानने को विवश न होना पड़े, तौभी," वह कहता है, "वे झूठ के दोषी हैं; उनकी सारी लीपापोती में कुछ भी ठोस नहीं, वरन् वे केवल छद्मवेश हैं, जो परमेश्वर के सामने कुछ काम नहीं आते।" सो अब हम भविष्यद्वक्ता का आशय समझते हैं।
परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह यहाँ उनकी भ्रष्ट उपासना को भी दोषी ठहराता है, जिसके द्वारा इस्राएली उसी समय यह समझते थे कि वे परमेश्वर की सबसे उत्तम सेवा कर रहे हैं। परन्तु हम जानते हैं कि आज्ञा मानना सब बलिदानों से उत्तम है। सो भविष्यद्वक्ता यहाँ उपासना की उन सब कल्पित रीतियों के विरुद्ध कड़ा प्रहार करता है जो परमेश्वर के बिना, परमेश्वर की व्यवस्था के अधिकार के विरुद्ध, गढ़ी गई थीं। परन्तु उसी समय, जैसा हमने अभी संकेत किया है, वह परोक्ष रूप से उनकी उस असावधानी को प्रकट करता है कि वे अपने आप को निर्दोष ठहराए जाने योग्य समझते थे, बशर्ते वे अपनी भली मनसा को आगे रख दें, जैसा सामान्यतः किया जाता है, और कहें कि उन्होंने वेदियाँ और किसी उद्देश्य से नहीं, केवल इसलिए बनाईं कि परमेश्वर का नाम सब स्थानों में प्रकट करें, और अपने बीच धर्म के कुछ चिह्न बनाए रखें। सो जब वे इस प्रकार अपनी अभक्ति को ढाँपने के लिए धुएँ का बादल उठाते थे, तब भविष्यद्वक्ता कहता है, "वे अब भी, मानो किसी सन्दिग्ध बात के विषय में, पूछताछ करते हैं कि क्या गिलाद में अधर्म है; वे पूछताछ करें और विवाद करें; निश्चय," वह कहता है, "वे व्यर्थ हैं;" शब्दशः, निश्चय वे झूठ रहे हैं: परन्तु उसका तात्पर्य यह है कि वे मूर्खता से वे निरर्थक बहाने प्रस्तुत करते थे, जिनके द्वारा वे अपराध से और उसके दण्ड से बच निकलने का यत्न करते थे। वे व्यर्थ कैसे थे?
इसलिए कि परमेश्वर मनुष्यों की सारी लीपापोती से बढ़कर अपनी व्यवस्था को मूल्यवान समझता है, और वह चाहता है कि सब मनुष्य बिना विवाद के उसके अपने वचन का पालन करें: परन्तु जब वे इस प्रकार स्वच्छन्दता से उसकी आज्ञाओं से हट जाते हैं, तो यह वह बात है जिसे वह सह नहीं सकता। अतः जो लोग समझते हैं कि उनके अपने आविष्कार परमेश्वर के सामने कुछ मूल्य रखते हैं, वे झूठे हैं और अपने आप को धोखा देते हैं। फिर वह उनके अपराधों का वर्णन करता है।
वह कहता है, गिलगाल में उन्होंने बैलों के बलिदान चढ़ाए हैं। जेरोम अनुवाद करता है, "वे बैलों को बलि चढ़ाते हैं," और समझता है कि यहाँ इस्राएलियों को बछड़ों को बलि चढ़ाने के कारण डाँटा गया है: परन्तु यह भविष्यद्वक्ता के शब्दों से बहुत दूर प्रतीत होता है। अतः भविष्यद्वक्ता उनके पाप का उल्लेख करता है — कि उन्होंने बैलों के बलिदान चढ़ाए और वेदियों को बढ़ाया। और तौभी यह प्रशंसा के योग्य परिश्रम प्रतीत होता था कि उन्होंने बहुत सी वेदियाँ बढ़ाईं, कि वे सब स्थानों में परमेश्वर की उपासना करते थे, कि उन्होंने न खर्च की चिन्ता की न परिश्रम की, कि वे थोड़े से बलिदानों से सन्तुष्ट न थे, वरन् बहुत बड़ी संख्या जोड़ते थे; — यह सब कुछ असाधारण प्रशंसा के योग्य प्रतीत होता था: परन्तु, जैसा पहले कहा जा चुका है, प्रभु ने इन भ्रष्ट रीतियों को कुछ मूल्य नहीं दिया; क्योंकि वह चाहता था कि उसकी प्रजा केवल उसी की उपासना करे, और कि उनकी भक्ति इसी एक प्रमाण से प्रमाणित हो — उसके वचन के प्रति उनकी आज्ञाकारिता से। सो जब हम परमेश्वर के वचन से हट जाते हैं, वरन् जब हम ढीली लगाम से अपने आप को नये आविष्कारों के हवाले कर देते हैं, तो चाहे हम कितनी ही विश्वसनीय रीति से यह दावा करें कि हमारा उद्देश्य परमेश्वर की उपासना करना है, तौभी यह सब एक व्यर्थ और छलपूर्ण बहाना है, जैसा भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषित करता है।
जेरोम यह समझने में भूल करता है कि गिलगाल यहूदा के गोत्र का एक नगर था; और यह धारणा इस स्थान के अनुकूल नहीं हो सकती: क्योंकि हम जानते हैं कि उस समय यहूदा उन घोर अशुद्धताओं से मुक्त था; यहूदा अब तक उन मलिनताओं से अशुद्ध नहीं हुआ था जिन्हें भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएल के राज्य में दोषी ठहराता है। अतः यह निश्चित है कि गिलगाल इस्राएल का एक नगर था; और हम जानते हैं कि वहाँ एक प्रसिद्ध मन्दिर और वेदी थी: इसलिए वह विशेष रूप से इस स्थान का उल्लेख करता है।
परन्तु वह आगे जोड़ता है, उनकी वेदियाँ खेत की रेघारियों पर पड़े ढेरों के समान हैं। हम जानते हैं कि तब केवल एक ही वैध वेदी थी; और परमेश्वर नहीं चाहता था कि उसके लिए एक स्थान को छोड़ और कहीं बलिदान चढ़ाए जाएँ। इसलिए इस्राएली वेदियों को बढ़ाने में जितने अधिक तत्पर थे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर के पलटे को भड़काते थे: उनका उद्देश्य परमेश्वर की उपासना करना चाहे कितना ही क्यों न रहा हो, तौभी परमेश्वर ने उस मूर्खतापूर्ण दिखावे को ठुकरा दिया।
सो हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उन वेदियों की, जो उस समय इस्राएल के राज्य में खड़ी की गई थीं, पत्थरों के ढेरों से तुलना क्यों करता है; मानो वह कहता हो, "जैसे भूमि पथरीली होने पर कोई पत्थरों को बटोरकर ढेर लगा देता है, जिससे वह अपना हल अधिक सरलता से चला सके, वैसे ही हर कोई अपने लिए एक वेदी बना लेता है, मानो वह अपने खेत में एक टीला खड़ा कर रहा हो: इस प्रकार ऐसा होता है कि वे उस शुद्ध और वैध उपासना को, जिसे मैंने ठहराया है, टेढ़ेपन से भ्रष्ट कर देते हैं।" सो अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का आशय यह है कि अन्धविश्वासी मनुष्य कुछ भी लाभ नहीं पाते, जब वे साहस और खुलेपन से यह डींग मारते हैं कि वे परमेश्वर की उपासना करते हैं; क्योंकि वे अपने और दूसरों के लिए चाहे कैसा ही छद्मवेश क्यों न गढ़ लें, तौभी प्रभु हर उस बात से घृणा करता है जो उसके वचन के विपरीत है: और परमेश्वर की उपासना करने की हमारी रीति तभी सच्ची और वैध है, जब हम केवल उसी के पीछे चलते हैं जो वह ठहराता है, और अपने लिए ऐसी किसी बात की छूट नहीं लेते जो उसकी आज्ञा और विधि के अनुसार न हो। यही आशय है। आइए हम आगे बढ़ें —
होशे 12:12-13
12. और याकूब अराम के मैदान में भाग गया, और इस्राएल ने एक पत्नी के लिए सेवा की, और पत्नी के लिए उसने भेड़ें चराईं।
12. Et fugit Jacob in agrum Syriae, et servivit Israel in uxore (hoc est, pro uxore,) et pro uxore custodivit (id est, custos fuit gregis.)
13. और एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा यहोवा इस्राएल को मिस्र से निकाल लाया, और एक भविष्यद्वक्ता ही के द्वारा उसकी रक्षा की गई।
13. Et per Prophetam eduxit (ascendere fecit) Jehova Israelem ex Aegypto, et per Prophetam servatus est.
भविष्यद्वक्ता अब एक दूसरे प्रकार की डाँट का प्रयोग करता है, — कि इस्राएलियों ने यह विचार नहीं किया कि वे किस स्रोत से उत्पन्न हुए थे, और वे अपने मूल को भूल गए थे।
और भविष्यद्वक्ता जान-बूझकर इस बात को छूता है; क्योंकि हम जानते हैं कि वह प्रजा अपनी श्रेष्ठता पर कितने साहस और घमण्ड से डींग मारती थी। क्योंकि जैसे एक अन्यजाति मनुष्य इस बात पर गर्व करता था कि वह एथेन्स का निवासी है, वैसे ही यहूदी भी समझते हैं कि हम सब पशु हैं, और कल्पना करते हैं कि उनका मूल शेष मानवजाति से भिन्न है, क्योंकि वे अब्राहम के वंशज हैं। सो जब वे ऐसे घमण्ड से अन्धे हो गए थे, तब परमेश्वर ने उनका भ्रम दूर करना चाहा, जैसा वह यहाँ करता है: "तुम्हारा पिता याकूब, वह कौन था? उसकी दशा क्या थी? उसकी कुलीनता क्या थी? उसकी सामर्थ्य क्या थी? शरीर के अनुसार उसकी प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता क्या थी? हाँ, सच तो यह है कि वह अपने ही देश से भागा हुआ था: यदि वह सदा घर पर ही रहता, तौभी उसका पिता केवल एक परदेशी था; परन्तु उसे विवश होकर अराम को भागना पड़ा। और वहाँ वह कितने वैभव से रहा? वह निःसन्देह अपने मामा के यहाँ था; परन्तु उसके साथ किसी तुच्छ दास से अच्छा व्यवहार नहीं किया गया: उसने एक पत्नी के लिए सेवा की। और उसने कैसी सेवा की? वह भेड़ों का रखवाला था। सो अब जाओ और अपनी प्रतिष्ठा की डींग मारो, मानो तुम दूसरों से अधिक कुलीन हो, मानो तुम्हारी दशा साधारण लोगों की दशा से उत्तम हो।" अतः परमेश्वर उनके विरुद्ध उनके पिता की दशा प्रस्तुत करता है, जिसके नाम पर वे गर्व करते थे, परन्तु जो एक दीन-हीन व्यक्ति और भगोड़ा था, जो एक तुच्छ दास के समान था, जो भेड़ों का रखवाला था; जिसके पास, संक्षेप में, ऐसा कुछ भी न था जो मनुष्यों के बीच प्रतिष्ठित समझा जा सके।
वह कहता है, और परमेश्वर एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा तुम्हें मिस्र से निकाल लाया, और एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा तुम्हारी रक्षा की गई। यह मानो उनका दूसरा जन्म था। कुछ लोग समझते हैं कि यहाँ उनके पहले मूल और उनके छुटकारे के बीच तुलना है; मानो होशे ने कहा हो, "यद्यपि तुम एक अत्यन्त दरिद्र और कुलहीन मनुष्य से उत्पन्न हुए, तौभी परमेश्वर ने तुम पर अनोखा अनुग्रह किया है; क्योंकि उसने मूसा को तुम्हारे छुटकारे का सेवक ठहराया।" परन्तु मेरे विचार में भविष्यद्वक्ता अधिक सरल रीति से बोलता है; क्योंकि पहले वह दिखाता है कि प्रजा का पहला मूल क्या था, कि वे याकूब से थे; और फिर वह दिखाता है कि उनका दूसरा मूल क्या था; क्योंकि जब परमेश्वर उन्हें मिस्र से निकाल लाया, तब उसने उन्हें फिर से जन्म दिया। और जैसा भली-भाँति विदित है, वे वहाँ अत्यन्त दुःखी थे, और वे अपने पराक्रम से बाहर नहीं निकले, उन्होंने अपने लिए अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की; वरन् केवल मूसा ने, जो परमेश्वर की ओर से इसी उद्देश्य के लिए भेजा गया था, उनकी ओर अपना हाथ बढ़ाया। जब बात ऐसी थी, तो यह विचित्र था कि वे अब, जैसा वह पिछले पद में कहता है, अपनी वेदियों के द्वारा परमेश्वर को क्रोध दिलाते थे।
और भविष्यद्वक्ताओं में यह बहुत बार आता है कि परमेश्वर इस्राएलियों को स्मरण दिलाता है कि वे कहाँ से, या किस स्रोत से निकले थे, "अपने मूल पर, उस चट्टान पर ध्यान करो जिसमें से तुम खोदकर निकाले गए; क्योंकि अब्राहम अकेला और निःसन्तान था, और उसकी पत्नी भी बाँझ थी;" और तौभी परमेश्वर ने उनके वंश को बढ़ाया, (यशायाह 51:2।) यह इसलिए कहा गया था कि इस्राएली परमेश्वर की ओर नहीं देखते थे, वरन् विपत्ति में, जब कोई ऐसा मार्ग दिखाई न देता था जिससे वे पुनः स्थापित किए जा सकें, निराश हो जाते थे; परन्तु समृद्धि में वे घमण्डी हो जाते थे, और परमेश्वर के अनुग्रह को कुछ भी नहीं समझते थे। सो हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के मन में क्या था।
प्रभु कहता है, "जो कुछ तुम मेरे ऋणी हो उसे स्वीकार करो; क्योंकि मैंने तुम्हारे पिता याकूब को चुना, और उसे इसलिए नहीं चुना कि वह संसार में अपनी बड़ी प्रतिष्ठा के कारण विख्यात था; क्योंकि वह एक भगोड़ा और भेड़ों का रखवाला था, और उसने अपनी पत्नी के लिए सेवा की। इसके पश्चात् मैंने तुम्हें मिस्र देश से छुड़ाया; और उस निकलने में ऐसा कुछ भी न था जो तुमने किया हो; तुम्हारे पास यह डींग मारने का कोई कारण नहीं कि छुटकारा तुम्हारे पराक्रम से प्राप्त हुआ; क्योंकि उस छुटकारे में केवल मूसा ही मेरा सेवक था।
सो जब मैंने तुम्हें छुड़ाया, तब मैंने तुम्हें दूसरी बार जन्म दिया। तुम्हारी कृतघ्नता कितनी बड़ी है, जब तुम मुझे अपना छुड़ानेवाला मानकर स्वीकार नहीं करते और मेरी उपासना नहीं करते?" सो अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल की प्रजा के साथ इस प्रकार व्यवहार किया, जिससे हर रीति से यह प्रकट हो कि वे उन इतने और इतने बड़े उपकारों के अयोग्य थे जो परमेश्वर ने उन पर किए थे; क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के सब कार्यों को बिगाड़ दिया था, और ऐसा बिगाड़ा था कि वे यह नहीं समझते थे कि कोई भी बात उसकी है, और उन्होंने परमेश्वर का कुछ भी धन्यवाद नहीं किया; वरन् उन्होंने अपने आप को ऐसा ऊँचा उठाया मानो परमेश्वर ने उन पर कभी कोई कृपा की ही न हो।
परन्तु मैं याकूब के इतिहास पर अधिक नहीं ठहरूँगा, क्योंकि भविष्यद्वक्ता के आशय को स्पष्ट करने के लिए यह आवश्यक नहीं है, और यह भली-भाँति विदित है: केवल उतना ही बताना पर्याप्त है जितना इस स्थान के अनुकूल है। सो याकूब अराम के देश में भाग गया; और फिर वह कहता है, इस्राएल ने एक पत्नी के लिए सेवा की। वह याकूब के पश्चात् इस्राएल नाम का उल्लेख करता है। इस्राएल नाम कुलीन और स्मरणीय था; हाँ, यह परमेश्वर ने उस पवित्र कुलपिता को दिया था: परन्तु उसी समय याकूब अपने आप में या अपने व्यक्तित्व में श्रेष्ठ नहीं था; तौभी उसने सेवा की, और वह अत्यन्त दीन दशा में था, और उसने एक पत्नी के लिए सेवा की; अर्थात्, जिससे उसे पत्नी मिले; क्योंकि हम जानते हैं कि उसने अपने मामा लाबान के साथ कैसा अनुबन्ध किया।
आगे, एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा वह उन्हें मिस्र से निकाल लाया। यह उनका दूसरा जन्म था: और एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा इस्राएल की रक्षा की गई। यहाँ {,}שמר shimer शब्द की ओर संकेत है; क्योंकि मैं {,}נשמרnushimer शब्द को कर्मवाच्य में लेता हूँ। उसने पहले कहा था कि याकूब ने भेड़ों की रखवाली की; और अब वह कहता है, {,}נשמרnushimer, एक भविष्यद्वक्ता के द्वारा इस्राएल की रखवाली की गई; मानो वह कहता हो, "अब तुम देखते हो कि परमेश्वर ने तुम्हारे पिता में तुम्हें दीनता का एक कारण दिया है, क्योंकि उसे इतनी दुर्दशा में कष्ट भोगने दिया गया; और फिर उसने मनुष्यों की आशा से परे तुम्हारी रक्षा की, और किसी मानवीय साधन से नहीं, केवल मूसा के द्वारा, जो स्वयं भी एक भगोड़ा था और जो मानो एक गुफा में से निकल आया था, क्योंकि वह भी भेड़ों का रखवाला था। सो जब तुम परमेश्वर के अनुग्रह से इस प्रकार रखे गए हो, तो यह कैसे है कि तुम्हारी वर्तमान दशा तुम्हें मोहित कर लेती है, और तुम यह विचार नहीं करते कि प्रभु ने तुम्हें एक समय इसी उद्देश्य से छुड़ाया था कि तुम सदा के लिए पूर्णतः उसी के प्रति समर्पित रहो?"
अब वह आगे जोड़ता है — (मैं इस पद को भी शीघ्रता से देख लूँगा, क्योंकि कल व्याख्यान न होगा, और न परसों) —
होशे 12:14
14. एप्रैम ने अत्यन्त कड़वाहट से उसे क्रोध दिलाया है: इसलिए वह उसका लहू उसी पर रहने देगा, और उसका प्रभु उसकी नामधराई उसी पर लौटा देगा।
14. Provocavit Ephraim excelsis suis, et sanguis ejus super eum manebit (vel, fundetur:) et opprobrium ejus reddet illi Dominus suus.
भविष्यद्वक्ता पहले कहता है कि एप्रैम ने अपने ऊँचे स्थानों के द्वारा परमेश्वर को क्रोध दिलाया था। तौभी कुछ लोग {,}תמרוריםtamerurim शब्द को कड़वाहटों के अर्थ में लेते हैं। तब अर्थ यह होगा, "इस्राएल या एप्रैम ने परमेश्वर को कड़वाहट तक क्रोध दिलाया है।" परन्तु जब कि यह शब्द अन्य स्थानों में, जैसे यिर्मयाह के इकतीसवें अध्याय में, ऊँचे स्थानों के अर्थ में लिया गया है, और जब कि यह स्पष्ट प्रकट होता है कि भविष्यद्वक्ता यहाँ खुले तौर पर इस्राएल और उनकी दूषित उपासना के विरुद्ध कड़ा प्रहार करता है, तो मुझे सन्देह नहीं कि वह उन ऊँचे स्थानों की ओर संकेत करता है जिनमें इस्राएलियों ने अपनी झूठी और अधर्मी उपासना-रीतियाँ ठहराई थीं। सो एप्रैम ने अपने ऊँचे स्थानों के द्वारा उसे क्रोध दिलाया है: एप्रैम ने, इतनी रीतियों से अपने आप को अपने अन्धविश्वासों में डुबोकर, अपने ऊँचे स्थानों में परमेश्वर को क्रोध दिलाया।
88 कैल्विन इस शब्द के अर्थ के विषय में सही नहीं है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं जिसमें इसका अर्थ "ऊँचे स्थान" हो; यिर्मयाह 31:21 में, जिसका यहाँ हवाला दिया गया है, इसका अर्थ मार्ग-चिह्नों के रूप में खड़े किए गए स्तम्भ या खम्भे हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहाँ यह शब्द वही अर्थ देता है जो हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद में व्यक्त किया गया है। गेसेनियस कहता है कि इसे यहाँ क्रियाविशेषण के रूप में लेना चाहिए, और न्यूकम तथा अधिकांश समीक्षक उससे सहमत हैं। हॉर्स्ली इस वाक्यांश का अनुवाद इस प्रकार करता है, — "एप्रैम ने अत्यन्त कड़वा क्रोध दिलाया है।" — सं.
तब उसका लहू उसी पर रहेगा। क्योंकि {,}נתשnuthesh शब्द का अर्थ "उण्डेलना" है, और "बना रहना" भी है, इसलिए कुछ लोग इसका अनुवाद करते हैं, "उसका लहू बना रहेगा;" और दूसरे, "उस पर उण्डेला जाएगा।" परन्तु आशय के विषय में इससे बहुत थोड़ा ही अन्तर पड़ता है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यह दिखाना चाहता है कि एप्रैम को अपनी अभक्ति का दण्ड भोगना पड़ेगा; मानो वह कहता हो, "अन्त में वे परमेश्वर के हाथ से बच न सकेंगे, वे अपने अधर्म की मजदूरी पाएँगे।"
और उसका प्रभु उसकी नामधराई उसी पर लौटा देगा। यहाँ वह स्वयं परमेश्वर को इस्राएल का प्रभु कहता है, यद्यपि इस्राएल ने जूआ उतार फेंका था, और अपने आप को परमेश्वर की सेवा से अलग कर लिया था। वह कहता है, वे परमेश्वर के अधिकार से बच नहीं सकते, यद्यपि उन्होंने उसकी व्यवस्था को ठुकरा दिया है; यद्यपि वे अपने अन्धविश्वासों में स्वच्छन्द हो गए हैं, तौभी वे जानेंगे कि वे परमेश्वर के हाथ और अधिकार के अधीन बने हुए हैं, वे जानेंगे कि अपनी इस ढिठाई से वे कुछ भी सिद्ध नहीं करते; यद्यपि वे इस प्रकार अपने घृणित कामों के पीछे भटकते हैं, तौभी प्रभु अपना वह अधिकार न खोएगा जो उसने इस्राएल को छुड़ाकर अपने लिए प्राप्त किया था। सो उनका प्रभु उनकी अपनी नामधराई, जिसके वे योग्य हैं, उन्हीं पर लौटा देगा।
प्रार्थना
हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, ऐसा अनुग्रह कर कि जैसे तूने हमें केवल सृजा ही नहीं, वरन् इस संसार में रखकर हमें सब आशीषों की बहुतायत से धनी भी किया है, — हाँ, ऐसा अनुग्रह कर कि हम वह महिमा जो तेरे योग्य है दूसरों को न दें, और विशेषकर, जब कि हम प्रतिदिन तेरे वचन के द्वारा चिताए जाते हैं, वरन् कड़ाई से डाँटे भी जाते हैं, तो हम लोहे की-सी कठोरता से विरोध न करें, वरन् अपने आप को तेरे प्रति नम्र और कोमल बना दें, और अपने आप को अपनी ही युक्तियों के हवाले न करें, वरन् सच्ची शिक्षाग्रहणशीलता और नम्रता के साथ उस नियम के पीछे चलें जो तूने अपने वचन में ठहराया है, जब तक कि अन्त में हम भ्रान्तियों के सब अवशेष उतारकर उस धन्य ज्योति का आनन्द न उठाएँ, जिसे तूने स्वर्ग में हमारे लिए तैयार किया है, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा। आमीन।
