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होशे 7
अठारहवाँ व्याख्यान
होशे 7:1
1. जब मैं इस्राएल को चंगा करना चाहता था, तब एप्रैम का अधर्म और शोमरोन की दुष्टता प्रगट हो गई; क्योंकि वे छल का काम करते हैं; चोर भीतर घुस आता है, और डाकुओं का दल बाहर लूट लेता है।
1. Dum medeor Israel, tunc retecta fuit iniquitas Ephraim et malitiae Samariae, quia gesserunt se mendaciter (vel, fallaciter; ad verbum, fecerunt fellaciam;) et fur ingressus est, spoliavit praedo foris.
परमेश्वर, यह दिखाने के लिए कि इस्राएल की सारी प्रजा की दशा कितनी भ्रष्ट थी, यहाँ अपनी तुलना एक वैद्य से करता है, जो उपचार आज़माना चाहते हुए यह जान लेता है कि भीतर और भी भारी रोग छिपे हुए हैं; और ऐसा प्रायः होता है। जब कोई रोगी वैद्य को बुलवाता है, तो उसका रोग शीघ्र ही पहचान लिया जाता है; परन्तु हो सकता है कि वह बहुत वर्षों से अन्य छिपे हुए विकारों से पीड़ित रहा हो, जो तुरन्त वैद्य की जानकारी में नहीं आते। वह भले ही यह सोचे कि रोग के लक्षण किसी अधिक गुप्त स्रोत से निकल रहे हैं; परन्तु कुछ उपचार आज़माने के तीसरे या चौथे दिन ही उसे पता चलता है कि भीतर कोई छिपा हुआ रोग है। तो परमेश्वर कहता है कि उपचार करते हुए उसने यह जान लिया कि इस्राएल कितना भ्रष्ट था। वह कहता है, जब मैं अपनी प्रजा को चंगा कर रहा था, तब मैंने जाना कि शोमरोन का और सारे एप्रैम का अधर्म क्या था।
शोमरोन से उसका अभिप्राय राज्य के मुख्य भाग से है; क्योंकि वह नगर, जैसा भली-भाँति ज्ञात है, राजधानी और शासन का प्रधान केन्द्र था। अतः भविष्यद्वक्ता कहता है कि तब यह प्रगट हो गया कि शोमरोन के अधर्म साधारण नहीं, वरन् पुराने और जड़ पकड़े हुए रोग थे। यही इसका अर्थ है। अब हम देखते हैं कि परमेश्वर का अभिप्राय क्या था; क्योंकि प्रजा अपने आप को धोखा दे सकती थी, जैसा प्रायः होता है, और कह सकती थी, "हम निश्चय ही हर दोष से पूर्णतः मुक्त तो नहीं हैं; परन्तु तौभी परमेश्वर को हमें इतनी कठोरता से दण्ड नहीं देना चाहिए, क्योंकि सूर्य के नीचे ऐसी कौन-सी जाति है जो सामान्य रोगों से पीड़ित न हो?" परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ उत्तर देता है कि इस्राएल की प्रजा इतनी भ्रष्ट थी कि हल्के उपचार उसके लिए पर्याप्त न थे। तो परमेश्वर यहाँ वैद्य का पद अपने ऊपर लेता है, और कहता है, "मैं अब तक इस्राएल को चंगा करना चाहता रहा हूँ, और जब मैंने अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उन्हें काटा, और अपने वचन को तलवार के समान काम में लिया, तब मेरा यही उद्देश्य था; और उसके बाद भी, जब मैंने ताड़नाएँ जोड़ीं; परन्तु अब मैंने पाया है कि उनकी दुष्टता इतनी बड़ी है कि ऐसे उपचारों से उसका सुधार नहीं हो सकता।" तो वह कहता है, एप्रैम का अधर्म प्रगट हो गया है, और तब मैंने शोमरोन के दुर्गुणों को पहचाना।
अब यह स्थल यह सिखाता है कि यद्यपि मनुष्यों के दुर्गुण तुरन्त प्रगट नहीं होते, तौभी जो अपने आप को धोखा देते हैं और दूसरों के सामने अपना भेष बदलते हैं, उन्हें कुछ लाभ नहीं होता; न वे परमेश्वर के सामने निर्दोष ठहरते हैं, न उनका दोष घटता है, न वे अपराध से छूटते हैं; क्योंकि अन्त में उनके छिपे हुए दुर्गुण प्रकाश में आ ही जाएँगे: और यह विशेष रूप से तब होता है जब प्रभु उनके प्रति वैद्य का काम करता है; क्योंकि हम देखते हैं कि जब प्रभु मनुष्यों की भ्रष्टताओं को चंगा करना चाहता है, तभी वे अपनी कड़वाहट उगल देते हैं। पोपतन्त्र के अधीन तो जो सबसे बुरे हैं वे भी अपने दुर्गुणों को छिपाए रहते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि परमेश्वर उन्हें परखता नहीं; वहाँ कोई ऐसी शिक्षा नहीं जो दाग़े या लहू निकाले। तो जब पोपपन्थी अपनी ही तलछट में चैन से पड़े रहते हैं, तब उनकी हठीली दुष्टता प्रगट नहीं होती। परन्तु अन्य स्थानों में, जहाँ परमेश्वर अपने वचन की सामर्थ्य प्रगट करता है, और जहाँ वह अपने सेवकों के द्वारा प्रभावशाली रीति से बोलता है, वहाँ मनुष्य दिखा देते हैं कि उनमें पहले कितनी बड़ी अभक्ति छिपी हुई थी; क्योंकि वे पूरे क्रोध में परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े होते हैं, और कोई भी चेतावनी सह नहीं सकते। तो ज्यों ही परमेश्वर वैद्य का काम करने लगता है, त्यों ही मनुष्य अपने रोग प्रगट कर देते हैं। और यही कारण है कि संसार स्वर्गीय शिक्षा के प्रकाश से इतना भागता है; क्योंकि जो बुराई करता है वह ज्योति से बैर रखता है (यूहन्ना 3:20)। ताड़नाओं के विषय में भी हम यही देख सकते हैं। जब परमेश्वर दुष्टों के साथ नरमी बरतता है, तब वे कम से कम मुँह से तो उसे धन्य कहते हैं; परन्तु जब वह उनके पापों का दण्ड देने लगता है, तब वे उसके विरुद्ध चिल्लाते और क्रुद्ध होते हैं, और अन्त में दिखा देते हैं कि उनके हृदयों में पहले कितना रोष छिपा हुआ था। अब हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएल की प्रजा पर कौन-सा दोष लगाता है। आज के दिन भी सारे संसार में यह देखा जा सकता है कि रोगों का उपचार उन बुराइयों को प्रगट कर देता है जो पहले अज्ञात थीं।
परन्तु हम कह चुके हैं, और यह बात स्मरण रखनी चाहिए, कि भविष्यद्वक्ता ने यहाँ स्पष्ट रूप से एप्रैम का, और शोमरोन नगर का भी, नाम लिया है, क्योंकि वह यह संकेत करना चाहता था कि उनके रोग पुराने और जड़ पकड़े हुए थे, जो केवल बाहरी अंगों में ही नहीं थे, वरन् सिर और अँतड़ियों में गहराई से जमे हुए थे, और प्राण-अंगों पर छा गए थे। फिर आगे आता है, क्योंकि उन्होंने झूठ का व्यवहार किया है, या, छल किया है। इस वाक्यांश से भविष्यद्वक्ता सूचित करता है कि सारी प्रजा में कुछ भी खरा न था, क्योंकि वे अपनी ही भ्रष्टताओं में लिप्त थे। {,}שקרshikor शब्द से उसका अभिप्राय हर प्रकार के छल से है, अर्थात् यह कि मनुष्य भ्रष्ट अभिलाषाओं से पूरी तरह सने हुए थे, और अब उनमें कुछ भी खरा या साबुत शेष न रहा था। तो मुख्य बात यह है कि प्रजा की दुष्टता प्रगट हो गई थी, और वह साधारण कठोरता से चंगी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वह अँतड़ियों तक में घुस गई थी और सारे शरीर में फैल गई थी।
आगे जो आता है उसे व्याख्याकार प्रायः उस दण्ड के रूप में लेते हैं जो परमेश्वर पहले ही दे चुका था। भविष्यद्वक्ता कहता है, चोर भीतर घुस आया है, और डाकू ने बाहर लूट लिया है। अतः वे सोचते हैं कि इसे उस रीति से जोड़ना चाहिए जिससे परमेश्वर ने दण्ड के द्वारा प्रजा को सुबुद्धि की ओर लौटा लाना आरम्भ कर दिया था; मानो वह कहता हो, "तुम चोरों के द्वारा लूटे भी गए हो और डाकुओं के द्वारा सताए भी गए हो।" परन्तु मैं यह समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उसी विषय को आगे बढ़ाता है, और दिखाता है कि प्रजा भीतर और बाहर दुर्गुणों से इतनी संक्रमित थी कि अब कोई भाग साबुत न रहा था; और यह कि अंश को सम्पूर्ण के स्थान पर रखकर वह यहाँ हर प्रकार की बुराई को सूचित करता है, क्योंकि वह दो प्रकार गिनाता है जो सामान्य रूप से सब बातों के प्रतिनिधि हो सकते हैं। अतः वह कहता है, चोर भीतर घुस आया है, अर्थात् चुपके से, और कपट से हानि करता है, या फिर डाकुओं के समान खुलेआम, जो खुली हिंसा करते हैं; जिसका अर्थ यह है कि अभक्ति चाहे छल के द्वारा, चाहे खुले युद्ध के द्वारा, इतनी प्रबल हो गई थी कि वे हर प्रकार से भ्रष्ट थे। परन्तु जब वह कहता है कि चोर भीतर घुस आया था, तो उसका अर्थ है कि प्रजा में से बहुत से लोमड़ियों के समान थे, जो चतुराई से हानि करती हैं; और जब वह कहता है कि डाकू ने बाहर लूट लिया था, तो उसका अर्थ है कि अन्य लोग सिंहों के समान खुलेआम और बिना लज्जा के पराई वस्तुओं को छीन लेते थे, और इस प्रकार खुले बल से दुखियों और कंगालों को उजाड़ते और लूटते थे।
अब हम भविष्यद्वक्ता का अर्थ समझते हैं। यह कहकर कि इस्राएलियों और शोमरोन के नागरिकों ने इतने छल से व्यवहार किया था, वह अब दो बातें गिनाकर दिखाता है कि वे किस प्रकार सारी सीधाई से हट गए थे, और अपने आप को हर प्रकार की दुष्टता के हाथ बेच दिया था; क्योंकि जहाँ हिंसा राज्य करती थी, वहाँ छल और हर प्रकार की बुराई भी राज्य करती थी। तो चोर भीतर घुस आया था, और डाकू ने बाहर लूट लिया था; अर्थात् वे गुप्त रूप से अपने पड़ोसियों को फँसाते थे, और डाकुओं के समान खुलेआम और बिना किसी लज्जा के निकल भी पड़ते थे। फिर आगे आता है — होशे 7:2
2. और वे अपने मन में नहीं सोचते कि मैं उनकी सारी बुराई को स्मरण रखता हूँ: अब उनके कामों ने उन्हें घेर लिया है; वे मेरी दृष्टि में हैं।
2. Et non sixerunt in corde suo, omnis malitiae eorum recordatus sum (hoc est, quod recordatus sim omnis malitiae ipsorum:) nunc circumdederunt ipsos facinora eorum, in conspectu meo sunt.
भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि इस्राएली सारी दुष्टता के सबसे ऊँचे शिखर तक पहुँच गए थे; क्योंकि वे सोचते थे कि उन्हें परमेश्वर को कभी कोई लेखा नहीं देना पड़ेगा। परमेश्वर का तिरस्कार यहीं से उत्पन्न होता है; अर्थात् जब मनुष्य यह कल्पना करते हैं कि वह मानो स्वर्ग में सो रहा है, और हर काम से विश्राम कर रहा है। वे परमेश्वर का इन्कार करने का साहस तो नहीं करते, तौभी जो बात विशेष रूप से उसके ईश्वरत्व से सम्बन्ध रखती है उसे उससे छीन लेते हैं, क्योंकि वे उसे न्यायी के पद से अलग कर देते हैं। अतः मनुष्य इसी कारण अपने आप को इतनी स्वच्छन्दता देते हैं, क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के साथ सन्धि कर ली है; वरन् वे सोचते हैं कि वे निर्भय होकर कुछ भी कर सकते हैं, मानो उन्होंने मृत्यु और अधोलोक से वाचा बाँध ली हो, जैसा यशायाह कहता है (यशायाह 28:15)। तो भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएलियों पर इसी मूढ़ता का दोष लगाता है। वह कहता है, उन्होंने अपने मन में नहीं कहा कि मैं उनकी सारी बुराई को स्मरण रखता हूँ; अर्थात्, "वे इतनी ढिठाई से मेरा उपहास करते हैं, मानो मैं जगत का न्यायी ही न होऊँ; वे नहीं सोचते कि सब बातें मेरी दृष्टि में हैं, और मुझसे कुछ भी छिपा नहीं। तो जब वे मुझे एक मृत मूरत के समान समझते हैं, तब उन्हें कोई भय नहीं रहता, वरन् वे अपने आप को हर दुष्टता के हाथ सौंप देते हैं।"
फिर वह आगे कहता है, अब उनके दुष्ट कामों ने उन्हें घेर लिया है, क्योंकि वे मेरी दृष्टि में हैं; अर्थात्, "यद्यपि वे अपने आप को दण्ड से छूट जाने का वचन देते हैं, और अपने कपट में अपनी चापलूसी करते हैं, तौभी उनके सारे काम मेरे सामने हैं; और इस प्रकार वे उन्हें घेर लेते हैं;" अर्थात्, "अन्त में वे अनुभव करेंगे कि वे अपने ही पापों में लपेट दिए गए हैं, और उनके लिए बच निकलने का कोई मार्ग खुला न रहेगा।" अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं; क्योंकि प्रजा की जड़ता की शिकायत करने के बाद वह अब कहता है कि वे इस प्रकार व्यर्थ ही अपनी चापलूसी करते थे, क्योंकि इस बीच परमेश्वर अन्धा नहीं है। तो यद्यपि वे सोचते हैं कि उनके पापों पर परदा डाल दिया गया है, तौभी वे भूल में हैं; क्योंकि उनके सारे पाप मेरी दृष्टि में हैं, और अन्त में वे स्वयं इसे अनुभव से जान लेंगे, क्योंकि उनके पाप उन्हें घेर लेंगे या घेराबन्दी कर लेंगे।
आइए हम इस स्थल से यह सीखें कि इससे बढ़कर डरने की कोई बात नहीं कि शैतान हम पर ऐसा जादू कर दे कि हम यह सोचने लगें कि परमेश्वर स्वर्ग में निष्क्रिय होकर विश्राम कर रहा है। हमें पश्चाताप के लिए इससे अधिक उभारनेवाली कोई बात नहीं, जितनी यह कि हम परमेश्वर को उसकी अपनी सामर्थ्य से विभूषित करें, और यह निश्चय रखें कि वह जगत का न्यायी है, और यह भी कि हम मानो उसकी दृष्टि में चलें, और जानें कि हमारे पाप विस्मृति में नहीं जा सकते, सिवाय इसके कि वह क्षमा के द्वारा उन्हें गाड़ दे। तो पद के पहले भाग में भविष्यद्वक्ता यही सिखाता है। अब जब हम यह कल्पना करते हैं कि हमारा परमेश्वर से, और मृत्यु और अधोलोक से मेल है, जैसा यशायाह उस स्थल में कहता है जिसे हमने उद्धृत किया है, तब भविष्यद्वक्ता सिखाता है कि परमेश्वर तौभी जागता है, और उसका पद उससे छीना नहीं जा सकता, क्योंकि जो कुछ इस संसार में होता है वह सब जानता है; और यह अन्त में खुले रूप से प्रगट कर दिया जाएगा, जब हमारे पाप हमें घेर लेंगे, जैसा उत्पत्ति के चौथे अध्याय में भी कहा गया है, 'पाप तेरे द्वार पर पड़ा रहेगा।' क्योंकि हम कुछ समय के लिए यह कल्पना कर सकते हैं कि हमारे पास बच निकलने के बहुत से मार्ग, या कम से कम छिपने के स्थान हैं; परन्तु परमेश्वर अन्त में दिखा देगा कि यह सब व्यर्थ है, क्योंकि वह हम पर आ पड़ेगा, और उसे इधर-उधर से जुटाई हुई सेनाओं की कोई आवश्यकता नहीं; हमारे अपने ही दुर्गुणों में हमारे लिए पर्याप्त शत्रु होंगे, क्योंकि वे हमें ऐसे घेर लेंगे मानो परमेश्वर ने सारे संसार को हमारे विरुद्ध हथियारबन्द कर दिया हो। आइए हम आगे बढ़ें — होशे 7:3
3. वे अपनी बुराई से राजा को, और अपने झूठ से हाकिमों को आनन्दित करते हैं।
3. In malitia sua exhilarant regem, et in mendaciis suis principes. भविष्यद्वक्ता अब शोमरोन के सब नागरिकों पर, और उनके व्यक्तित्व में सारी प्रजा पर, दोष लगाता है, क्योंकि वे चापलूसी से राजा की, और दुष्ट बातों में हाकिमों की, आज्ञा मानते थे, जिनके विषय में उनका अपना विवेक उन्हें दोषी ठहराता था। वह पाँचवें अध्याय में प्रजा के इस विषय के धर्मत्याग का उल्लेख पहले ही कर चुका था, कि उन्होंने राजाज्ञा का पालन किया था। निस्सन्देह यह प्रशंसा के योग्य बात प्रतीत हो सकती थी कि प्रजा ने राजा की आज्ञा को चुपचाप स्वीकार कर लिया था। आज के दिन बहुतों की यही दशा है, जो इसी प्रकार का बहाना आगे करते हैं। पोपतन्त्र के अधीन वे अपनी अभक्त अन्धविश्वासपूर्ण रीतियों से अलग होने का साहस नहीं करते, और यह बहाना प्रस्तुत करते हैं कि उन्हें अपने शासकों की आज्ञा माननी चाहिए। परन्तु, जैसा मैं कह चुका हूँ, भविष्यद्वक्ता इस प्रकार की आज्ञाकारिता को पहले ही दोषी ठहरा चुका है, और अब वह दिखाता है कि जो धर्मत्याग उस समय सारे इस्राएल में फैला हुआ था, उसका दोष राजा पर या थोड़े से मनुष्यों पर नहीं डाला जाना चाहिए, वरन् वह एक सामान्य बुराई थी, जिसने बिना किसी अपवाद के सब को एक ही अपराध में फँसा दिया था। ऐसा कैसे? वह कहता है, अपनी दुष्टता से उन्होंने राजा को, और अपने झूठ से हाकिमों को आनन्दित किया है; अर्थात्, यदि वे दोष अपने शासकों पर डालना चाहें, तो वह व्यर्थ होगा; क्योंकि फिर ऐसी तत्परता कहाँ से आई? ज्यों ही यारोबाम ने बछड़े बनाए, ज्यों ही उसने मन्दिर बनाए, त्यों ही धर्म तुरन्त ढह गया, और जो कुछ पहले शुद्ध था वह बिगड़ गया; यह परिवर्तन इतना अचानक कैसे हुआ? इसी कारण कि प्रजा ने भीतर ही भीतर अपनी दुष्टता गढ़ रखी थी, जो अवसर मिलते ही प्रगट हो गई; क्योंकि कपट सब में छिपा हुआ था, और तब वह प्रगट हो गया। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या था।
39 उत्पत्ति 4:7। — fj.
और इस स्थल पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए: क्योंकि प्रायः ऐसा होता है कि कोई दुर्गुण भीतर घुस आता है, जो एक ही मनुष्य से या थोड़े से मनुष्यों से निकलता है; परन्तु जब थोड़े लोग जो कुछ चलाते हैं उसे सब तत्परता से अपना लेते हैं, तो यह बिलकुल स्पष्ट है कि उनमें भक्ति की या परमेश्वर के भय की कोई जीवित जड़ नहीं है। तो जो लोग दुर्गुणों को अपनाने के लिए इतने तत्पर रहते हैं, वे पहले से ही कपटी थे; और हम प्रतिदिन यही पाते हैं। जब भक्त मनुष्यों के हाथ में किसी नगर का शासन होता है, और वे बुद्धिमानी से काम करते हैं, तब सारी प्रजा कुछ आशा दिलाएगी कि वह प्रभु का भय मानेगी; और जब कोई राजा परमेश्वर की महिमा को बढ़ाने की इच्छा से प्रेरित होकर अपनी सारी प्रजा को परमेश्वर की शुद्ध आराधना में बनाए रखने का प्रयत्न करता है, तब सब में भक्ति की वही भावना दिखाई देगी: परन्तु जब उसके स्थान पर कोई अभक्त राजा आता है, तब अधिकांश लोग तुरन्त फिर पीछे हट जाएँगे; और जब कोई न्यायाधीश अपने कर्तव्य की उपेक्षा करता है, तब प्रजा का अधिकतर भाग खुली अभक्ति में फूट पड़ेगा। काश इन बातों के कोई प्रमाण न होते; परन्तु प्रभु ने ठहराया है कि सारे संसार में इनके उदाहरण विद्यमान रहें।
अतः परमेश्वर के इस अभिप्राय पर ध्यान देना चाहिए; क्योंकि वह प्रजा पर यह दोष लगाता है कि उसने अपने आप को अत्यधिक चापलूस और लचीला बना लिया था। जब राजा यारोबाम ने भ्रष्ट आराधना स्थापित की, तब प्रजा तुरन्त आज्ञा मानने को तैयार होकर आगे आ गई: इसी से अभक्ति बिलकुल खुली हो गई। तो उन्होंने अपनी दुष्टता से राजा को, और अपने झूठ से हाकिमों को आनन्दित किया; मानो वह कहता हो, "वे दोष राजा और हाकिमों पर नहीं डाल सकते। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपनी दुष्टता से उन्हें प्रसन्न किया; अर्थात् उन्होंने अपनी दुष्टता से राजा की चापलूसी की और अपने झूठ से हाकिमों को प्रसन्न किया।" आगे आता है — होशे 7:4
4. वे सब के सब व्यभिचारी हैं, उस तन्दूर के समान जिसे नानबाई गर्म करता है, और जो आटा गूँधने के बाद, जब तक वह ख़मीर से फूल न जाए, आग उसकाना छोड़ देता है।
4. Omnes adulteri, sicut fornax incensa a pistore, cessabit ab excitando post conspersionem (vel, mixtionem) farinae, sonec fermentetur.
भविष्यद्वक्ता इस पद में उसी विषय को आगे बढ़ाता है: वह कहता है कि वे सब के सब व्यभिचारी थे। इस उपमा की व्याख्या पहले ही बहुत बार की जा चुकी है। वह यहाँ साधारण व्यभिचार की बात नहीं करता, वरन् उन्हें व्यभिचारी इसलिए कहता है कि उन्होंने परमेश्वर से की हुई अपनी विश्वासयोग्यता की प्रतिज्ञा को तोड़ दिया था, क्योंकि उन्होंने अपने आप को घृणित अन्धविश्वासों के हाथ सौंप दिया था, और इसलिए भी कि उन्होंने अपने आप को पूर्णतः भ्रष्ट कर लिया था; क्योंकि विश्वास और मन की सच्चाई ही परमेश्वर के सामने आत्मिक पवित्रता है। जब मनुष्य अपने सारे जीवन में भ्रष्ट हो जाते हैं, और परमेश्वर की शुद्ध आराधना से गिर जाते हैं, तब वे उचित ही व्यभिचारी ठहराए जाते हैं। इसी अर्थ में भविष्यद्वक्ता अब कहता है कि वे सब के सब व्यभिचारी थे, और इस प्रकार वह उस बात की पुष्टि करता है जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि उस समय जो भ्रष्टताएँ प्रबल थीं, उनमें थोड़े ही मनुष्य नहीं खिंच गए थे, वरन् सारी प्रजा अपराध में फँसी हुई थी; क्योंकि वे सब के सब व्यभिचारी थे। यह कहना कि राजा ने उन्हें धोखा दिया था, कि अधिकार के बल से उन्हें विवश किया गया था, कि उनके हाकिमों के अत्याचार ने उन्हें बाध्य किया था, व्यर्थ और निःसार होता, क्योंकि वे सब के सब व्यभिचारी थे।
फिर वह उनकी तुलना भट्ठी या तन्दूर से करता है। वह कहता है, वे उस भट्ठी या तन्दूर के समान हैं, जिसे नानबाई गर्म करता है, जो तब तक उसकाना छोड़ देता है जब तक गूँधा हुआ आटा भली-भाँति ख़मीर से फूल न जाए। इस उपमा के द्वारा भविष्यद्वक्ता और भी स्पष्टता से दिखाता है कि प्रजा किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं, वरन् अपने ही मन के झुकाव और प्रवृत्ति से भ्रष्ट हुई थी; हाँ, दुष्टता करने की एक उन्मत्त और प्रचण्ड अभिलाषा से। उसने पहले कहा था कि जब उन्होंने तत्परता से राजा की आज्ञा को अपना लिया, तब उन्होंने जान-बूझकर पाप किया था; परन्तु अब वह और भी आगे बढ़कर कहता है कि वे एक भीतरी पापमय प्रवृत्ति से जल उठे थे, और गर्म तन्दूर के समान थे। फिर वह आगे कहता है कि यह कोई आकस्मिक आवेग न था, जैसा कभी-कभी होता है; वरन् यह इतना लगातार बना रहा कि वे अपनी दुष्टता में दृढ़ हो गए। जब वह कहता है कि व्यभिचारी जलते हुए तन्दूर के समान हैं, तो उसका अर्थ है कि उनका धर्मत्याग केवल स्वेच्छा से ही न हुआ था, जिससे दोष उन्हीं में था; वरन् उन्होंने पाप करने के अवसर को उत्सुकता से पकड़ भी लिया था, और गर्म तन्दूर के समान तप गए थे। अभक्त लोग प्रायः अपनी अभिलाषाओं को रोके रहते हैं, और जब कोई अवसर सामने नहीं आता तब उन्हें दबाए रखते हैं, परन्तु जब उन्हें दण्ड से बचे रहकर पाप करने का अवसर मिलता है, तब उन्हें खुली छूट दे देते हैं। अतः परमेश्वर अब घोषित करता है कि इस्राएल की प्रजा केवल धर्मत्याग की ओर झुकी हुई ही न थी, वरन् उसने लालसा से उसकी अभिलाषा भी की थी, यहाँ तक कि उनका उन्माद धधकती हुई ज्वाला के समान था।
परन्तु एक तीसरी बात आगे आती है, और वह यह है कि यह आग अचानक नहीं सुलगाई गई थी, वरन् बहुत समय से बल पकड़ती रही थी। इसलिए वह कहता है, उस तन्दूर के समान जिसे नानबाई गर्म करता है, जो, वह कहता है, आटे को हिलाने या गूँधने के बाद, जब तक वह ख़मीर से फूल न जाए, उसकाना छोड़ देता है। {,}לוםlush का अर्थ है "छिड़कना," यहाँ के लोग इसे empaster कहते हैं। कुछ लोग मूर्खता से यह मानते हैं कि वे उन लोगों के समान थे जो सोते हैं और फिर भोर को तड़के जाग उठते हैं। परन्तु भविष्यद्वक्ता के मन में एक भिन्न बात थी, और वह यह कि समय की लम्बाई के साथ, और मानो धीरे-धीरे, उनकी दुष्टता बढ़ती गई थी। संक्षेप में उसका अर्थ यह है कि वे किसी आकस्मिक आवेग के वश में न थे, उन मनुष्यों के समान जो प्रायः बिना सोचे-समझे भड़क उठते हैं और तुरन्त पछताते हैं, और जिनकी अभिलाषा, जो एक क्षण में भड़क उठी थी, थोड़े ही समय में ठण्डी पड़ जाती है। भविष्यद्वक्ता कहता है कि इस्राएल की प्रजा का उन्माद भिन्न प्रकार का था; क्योंकि वे उस तन्दूर के समान थे जिसे नानबाई सुलगाने के बाद पूरी तरह, यहाँ तक कि अत्यन्त अधिक मात्रा तक, गर्म होने देता है; क्योंकि वह तब तक प्रतीक्षा करता है जब तक आटा भली-भाँति ख़मीर से फूल न जाए। तो यह कुछ ही दिनों का असंयम और अभिलाषा न थी; वरन् उन्होंने अपने हृदयों को पूरी तरह गर्म कर लिया था, जैसे नानबाई अपना तन्दूर गर्म करता है, और उसमें बहुत सा ईंधन डाल देता है, कि कुछ समय के बाद वह गर्म हो जाए, जब तक आटा ख़मीर से फूल रहा हो। — 40 "यहाँ जिस कामुकता का वर्णन है, वह वही है जिसका कामुकता पवित्रशास्त्र में सदा प्रतीक है, अर्थात् मूर्तिपूजा की बेतुकी और दुष्ट लालसा।" — बिशप हॉर्सले
{,}מעירmeoir शब्द, "उसकाने से," को {,}מהעיר maeoir के अर्थ में लेना चाहिए; क्योंकि कुछ लोग जो यह कहते हैं कि नानबाई नगर से विश्राम करता था, अर्थात् सार्वजनिक कार्यों का प्रबन्ध करने से, वह नीरस बात है। अन्य लोग इसका अनुवाद यों करते हैं, "वह नगर से विश्राम करता है," जिससे वह नागरिक न रहे, — इसका क्या प्रयोजन? तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ अपनी ही उपमाओं को आगे बढ़ाता है, जिन्हें वह थोड़ी देर में फिर दोहराएगा। आगे आता है — होशे 7:5
5. हमारे राजा के दिन हाकिमों ने उसे दाखमधु की कुप्पियों से रोगी कर दिया; उसने ठट्ठा करनेवालों की ओर अपना हाथ बढ़ाया।
5. Dies regis nostri, fecerunt principes aegrotare utre vini; ex tendit manum suam ad illusores.
भविष्यद्वक्ता यहाँ विशेष रूप से राजा और उसके दरबारियों को डाँटता है। वह सारी प्रजा के विषय में बोल चुका था, और दिखा चुका था कि बुराइयों की मलिनता हर ओर फैली हुई थी: परन्तु अब वह बताता है कि राजा और उसके दरबारी कितनी विचित्र रीति से शासन करते थे। इसलिए वह कहता है, हमारे राजा का दिन! हाकिमों ने उसे रोगी कर दिया है; अर्थात् भोग-विलास का असंयम इतना बड़ा था कि स्वयं राजा अत्यधिक पीने के कारण रोगी हो गया, और उसने ठट्ठा करनेवालों की ओर अपना हाथ बढ़ाया। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता का अर्थ यह है कि इस्राएल के राज्य में शासन के अंग इतने भ्रष्ट हो गए थे कि राजा के भवन या महल में शिष्टता का कोई ध्यान न रहा था, और कोई लज्जा न रही थी।
"राजा के दिन" से कुछ लोग उसका जन्मदिन समझते हैं; और हम जानते हैं कि साधारण लोगों में भी अपना जन्मदिन मनाने की प्रथा बहुत पुरानी रही है। अन्य लोग इसे राज्याभिषेक के दिन से जोड़ते हैं, जो अधिक सम्भव है। कुछ लोग इसे उसके राज्य के बिलकुल आरम्भ के अर्थ में लेते हैं, जो खींचतान का प्रतीत होता है। हमारे राजा का दिन! अर्थात्, "हमारा राजा अब अपने सिंहासन पर बैठ गया है, उसने अब राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया है; तो आओ, हम जी भरकर भोज करें, और खाने-पीने से अपने आप को तृप्त कर लें।" यह अर्थ भली-भाँति बैठता है; परन्तु मैं नहीं जानता कि क्या यह दिन के नाम को सह सकता है; वह इसे राजा का दिन कहता है। इसलिए मैं उनका मत अपनाना अधिक उचित समझता हूँ जो इसकी व्याख्या राज्याभिषेक के वार्षिक दिन के रूप में करते हैं: तो हमारे राजा का दिन। तौभी ऐसे व्याख्याकार भी हैं जो इस वाक्य का अनुवाद यों करते हैं, "उस दिन हाकिमों ने राजा को रोगी कर दिया;" परन्तु मैं इसमें यह विभाजन करता हूँ, राजा का दिन! हाकिमों ने उसे रोगी कर दिया है।
राज्याभिषेक की स्मृति को प्रति वर्ष मनाना निस्सन्देह पाप या निन्दनीय बात न थी; परन्तु तब राजा को चाहिए था कि वह अपने आप को और दूसरों को परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए उभारे; वर्ष के अन्त में प्रभु की उस भलाई को स्वीकार किया जाना चाहिए था जिसने राज्य को सुरक्षित रखा; राजा को भविष्य के लिए परमेश्वर से बुद्धि और सामर्थ्य का आत्मा भी माँगना चाहिए था, कि वह अपने पद का कार्य ठीक रीति से पूरा कर सके। परन्तु भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि उस समय कुछ भी स्वस्थ दशा में न था; क्योंकि जो बात अपने आप में, जैसा मैंने कहा, उपयोगी थी, उसे उन्होंने घोर दुरुपयोग में बदल दिया था। तो हमारे राजा का दिन — वह कैसे बिताया जाता है? क्या राजा परमेश्वर के सामने नम्रता से क्षमा की विनती करता है, यदि उसने अपने पद के अयोग्य कोई काम किया हो, यदि उसने किसी बात में अपराध किया हो? क्या वह धन्यवाद करता है कि परमेश्वर ने अब तक अपनी सहायता से उसे सम्भाले रखा है? क्या वह भविष्य में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने आप को तैयार करता है? ऐसा कुछ भी नहीं; वरन् हाकिम भोग-विलास में लिप्त होते हैं, और अपने राजा को उकसाते हैं; हाँ, वे उसे अत्यधिक पिलाकर ऐसा परास्त कर देते हैं कि उसे रोगी कर देते हैं। तो वह कहता है, उनकी चाल यही है; राजा के महल में अब कुछ भी राजसी, या मनुष्यों के योग्य भी, दिखाई नहीं देता; क्योंकि वे पशुओं के समान अपने आप को मतवालेपन के हाथ सौंप देते हैं, और उनमें इतना बड़ा असंयम प्रबल है कि वे दाखमधु की कुप्पी से स्वयं राजा का नाश कर देते हैं।
कुछ लोग इसका अनुवाद "सुराही" करते हैं; {,}חמתchemet का वास्तविक अर्थ कुप्पी है; और हम जानते हैं कि उस समय दाखमधु कुप्पियों में रखा जाता था, जैसा पूर्वी देशों के लोग आज तक करते हैं। तो दाखमधु की कुप्पी से, अत्यधिक पीने से, उन्होंने राजा को रोगी कर दिया।
फिर वह कहता है कि राजा ने ठट्ठा करनेवालों की ओर अपना हाथ बढ़ाया; अर्थात् अपने आप को भूलकर उसने कोई गम्भीरता न रखी, वरन् भाँड के समान बन गया, और निकम्मे मनुष्यों के साथ अशोभनीय रीति से घुल-मिल गया। क्योंकि मुझे कोई सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता उन्हें ठट्ठा करनेवाले कहता है जो सारी लज्जा को त्यागकर भाँडपन और स्वच्छन्दता में लिप्त रहते हैं। अतः वह कहता है कि राजा ने मित्रता के प्रमाण के रूप में ठट्ठा करनेवालों की ओर अपना हाथ बढ़ाया। तो जब वह भाँडों और निकम्मे मनुष्यों का साथी बन गया था, तब उसने वह सब राजसी गुण अपने से दूर फेंक दिया था जो उसमें होना चाहिए था। यही इसका अर्थ है। अतः भविष्यद्वक्ता इस भ्रष्टता पर विलाप करता है कि राजा और उसके हाकिमों में अब कोई गरिमा या शिष्टता न रही थी, क्योंकि वे पूरी तरह भोग-विलास और मतवालेपन में लगे हुए थे; हाँ, उन्होंने पवित्र दिनों को भी इस दुरुपयोग में बदल दिया था, जबकि राजा को चाहिए था कि वह सर्वोच्च सम्मान के पद के योग्य रीति से आचरण करे: उसने अपने आप को हर प्रकार की स्वच्छन्दता के हाथ बेच दिया, और उसके हाकिम ही उसके अगुवे और उकसानेवाले थे। इतनी बड़ी भ्रष्टता पर भविष्यद्वक्ता अब विलाप करता है। आगे आता है — होशे 7:6
6. क्योंकि जब वे घात लगाए रहते हैं, तब उन्होंने अपना मन तन्दूर के समान तैयार कर रखा है: उनका नानबाई सारी रात सोता रहता है; भोर को वह धधकती हुई आग के समान जलता है।
6. Quoniam appropinquare fecerunt (ad verbum; hoc est, aptarunt) instar fornacis cor suum in fraudibus suis (vel, insidiis;) tota nocte dormiet pistor ipsorum; mane fornax ardebit quasi ignis flammae (hoc est, ignis projciens flammam.)
41 Quasi faces, vel stimuli; — "मानो मशालें, या अंकुश।"
यहाँ भविष्यद्वक्ता कहता है कि इस्राएली गुप्त रूप से और छिपे हुए उपायों से बुरे कामों के लिए अपने हृदयों को तैयार करते थे; और वह लगभग वही उपमा फिर लेता है जो उसने थोड़ी देर पहले ली थी, यद्यपि एक भिन्न प्रयोजन से; क्योंकि वह कहता है कि उन्होंने अपने हृदयों को गुप्त रूप से तैयार किया था, जैसे नानबाई रात को अपने तन्दूर में आग रखता है, और फिर विश्राम करता है, और भोर को तन्दूर भली-भाँति गर्म हो जाता है, क्योंकि उसमें रोटी पकाने के लिए पर्याप्त ताप आ चुका होता है। नानबाई के सोते रहने पर भी तन्दूर भोर को गर्म हो जाता है। ऐसा कैसे? क्योंकि बहुत सा ईंधन इकट्ठा रख दिया गया था, जिससे वह भोर तक गर्म हो जाता है। अतः रात का विश्राम आग को तन्दूर गर्म करने से नहीं रोकता, जब उसमें पर्याप्त ईंधन हो, जब नानबाई ने अपने तन्दूर को ऐसा भर दिया हो कि आग न बुझ सके, न धीरे-धीरे दब सके। जब नानबाई इस प्रकार लकड़ी का ढेर सजा देता है, तब वह निश्चिन्त होकर विश्राम करता है, क्योंकि आग भोर तक बनी रह सकती है। तो अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय देखते हैं।
वह कहता है, उन्होंने कपट से अपने हृदयों को तैयार किया है; अर्थात् यद्यपि उन्होंने पहले-पहल अपनी दुष्टता प्रगट नहीं की, तौभी उन्होंने अपने हृदयों को पहले से तैयार कर रखा है, जैसे तन्दूर सुलगाया जाता है, या जैसे रोटी तैयार होने से पहले भट्ठी गर्म की जाती है; हाँ, बहुत भाग-दौड़ की कोई आवश्यकता नहीं, — जब नानबाई अपना तन्दूर सुलगाता है तब बहुत शोर की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह लकड़ी तैयार करता है, और फिर विश्राम करने चला जाता है; और इस बीच, जब वह सारी रात सोता रहता है, आग जलती रहती है। वैसे ही वे भी, यद्यपि सब लोग उनकी दुष्टता को नहीं पहचानते, तौभी इस बीच उन्होंने अपने हृदयों को तन्दूर के समान गर्म कर लिया है; अर्थात् खुले दुष्ट कामों में प्रगट होने से पहले, बुरे काम धीरे-धीरे और लम्बे समय तक उनके द्वारा मन में गर्भ के समान धारण किए जाते रहे हैं।
अतः हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ तन्दूर की उपमा को उस अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रस्तुत करता है जिसमें वह पहले प्रस्तुत की गई थी; और इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि व्याख्याकार इसे बिना ध्यान दिए पूरी तरह छोड़ जाते हैं, मानो भविष्यद्वक्ता का दोनों स्थलों में एक ही अर्थ हो। परन्तु अर्थ, जैसा स्पष्ट है, बहुत भिन्न है। क्योंकि पहले स्थल में उसका अभिप्राय केवल उस उन्मत्त अभिलाषा को डाँटना था जिससे वे जल रहे थे; परन्तु अब वह उनके षड्यन्त्रों और छिपे हुए छलों की बात करता है; अर्थात् यह कि इस्राएली पहले खुले रूप से अपने आप को अभक्त और दुष्ट दिखाते थे, परन्तु अब वे परमेश्वर के सामने दुष्ट थे। ऐसा कैसे? क्योंकि अब वे रात में सुलगाए गए तन्दूर के समान थे; क्योंकि जैसे नानबाई अपने घर का द्वार बन्द करके आग रखता है, और किसी को पता नहीं चलता कि भट्ठी या तन्दूर गर्म किया जा रहा है; वैसे ही प्रजा परमेश्वर के सामने अपनी दुष्टता को पालती-पोसती रही; और बाद में, समय बीतने पर, जब कभी अवसर मिला, वह खुले रूप से फूट निकली।
प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जबकि तूने एक बार अपने सुसमाचार के द्वारा हम पर अपना प्रकाश चमकाया है, — अनुग्रह कर कि हम सदा इसी ज्योति से मार्गदर्शन पाएँ, और ऐसा मार्गदर्शन पाएँ कि हमारी सारी अभिलाषाएँ वश में रहें; और तेरे आत्मा की सामर्थ्य हममें हर पापमय उत्तेजना को बुझा दे, कि हम अपनी ही टेढ़ी अभिलाषाओं से गर्म न हों, वरन् इन सब के वश में किए जाने पर हम प्रतिदिन नया उत्साह प्राप्त करें, कि अधिकाधिक तेरी ही लालसा करें: और हमारे शरीर की ठण्डक कभी हम पर अधिकार न करने पाए, वरन् हम भक्ति के मार्ग में निरन्तर आगे बढ़ते रहें, जब तक कि अन्त में उस धन्य विश्राम में न पहुँच जाएँ, जिसके लिए तू हमें बुलाता है, और जो तेरे एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह के लहू के द्वारा हमारे लिए प्राप्त किया गया है। आमीन।
उन्नीसवाँ व्याख्यान
होशे 7:7
7. वे सब के सब तंदूर की नाईं धधकते हैं, और उन्होंने अपने न्यायियों को खा डाला है; उनके सब राजा गिर गए हैं; उन में से कोई नहीं जो मेरी दोहाई देता हो।
7. Omnes calent tanquam clibanus, comederunt judices suos: omne reges eorum ceciderunt; nemo in illis clamat ad me.
भविष्यद्वक्ता वही बात दोहराता है जो वह पहले कह चुका था, कि इस्राएली एक उन्मत्त जोश में अपने अन्धविश्वासों और दुष्ट कामों की ओर बहे चले जाते थे, और किसी भी उपचार से शान्त या स्थिर नहीं किए जा सकते थे; और साथ ही वह दिखाता है कि यह रोग या असंयम सारी प्रजा में फैलकर उग्र हो रहा था, ऐसा न हो कि साधारण लोग थोड़े से मनुष्यों पर दोष लगाएँ, मानो वे ही सारी दुष्टता के कर्ता हों। वह उनके उन्माद का प्रमाण देता है, क्योंकि अब तक वे किसी भी ताड़ना से सुधारे न जा सके थे। वह कहता है, उन्होंने अपने ही न्यायियों को खा डाला है; उनके राजा गिर गए हैं; और इस बीच उनमें से एक भी मेरी दोहाई नहीं देता। भविष्यद्वक्ता जो यहाँ कहता है उसे मैं भले राजाओं से, या उन लोगों से सम्बन्धित करता हूँ जो प्रजा में साधारण शासन-व्यवस्था को बनाए रखने में समर्थ थे। वह कहता है कि न्यायी भी और राजा भी गिर गए थे; इन शब्दों से उसका अभिप्राय यह है कि इस्राएली भले और बुद्धिमान शासकों से वंचित कर दिए गए थे; और यह प्रजा के लिए एक दुःखद और दयनीय अव्यवस्था थी; यह ऐसा ही था मानो शरीर से सिर अलग कर दिया गया हो। संक्षेप में, वह कहता है कि शरीर क्षत-विक्षत और अंग-भंग हो गया था, क्योंकि प्रभु ने राजाओं और न्यायियों को उठा लिया था। हम जानते तो हैं कि इस्राएलियों में राजा निरन्तर एक के बाद एक राज्य करते रहे; परन्तु हमें विचार करना चाहिए कि भविष्यद्वक्ता यहाँ किन राजाओं के विषय में बोल रहा है।
परन्तु अब हम ध्यान दें कि वह क्या कहता है: न्यायी खा डाले गए हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि प्रजा अपनी उच्छृंखलता के कारण अपने न्यायियों के विरुद्ध उठ खड़ी हुई थी, और मानो सब व्यवस्थाओं से मुक्त होकर उसने बलपूर्वक सारी व्यवस्था उलट दी थी; परन्तु यह मुझे खींचतान प्रतीत होता है। मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि न्यायी खा डाले गए थे, क्योंकि प्रजा ने अपने ही दोष से परमेश्वर के अनुग्रह को मानो पूर्णतः निष्फल कर दिया था, जैसा प्रतिदिन प्रायः होता है। परमेश्वर तो भलाई करना इस प्रकार आरम्भ करता है कि वह अपने उपकारों को अन्त तक हम पर बनाए रखना चाहता है; परन्तु हम उसके उपकारों को खा डालते हैं; क्योंकि हम मानो उसकी भलाई के सोते को सुखा देते हैं, जो अन्यथा अक्षय होता और निरन्तर हमारी ओर बहता रहता। अतः जैसे परमेश्वर की भलाई, जो अन्यथा अक्षय है, एक प्रकार से हमारे लिए सूख जाती है जब हम उसे अपने निकट आने नहीं देते; उसी अर्थ में भविष्यद्वक्ता अब शिकायत करता है कि इस्राएलियों ने न्यायियों को खा डाला था; क्योंकि अपनी अभक्ति के कारण वे परमेश्वर की इस अनुपम कृपा से वंचित कर दिए गए थे; और उन्होंने उसे ऐसे नष्ट कर दिया था जैसे गेरुआ या कोई अन्य रोग अच्छे फल को नष्ट कर देता है। अब हम इस पद का अर्थ समझ गए हैं।
परमेश्वर पहले यह दिखाता है कि इस्राएली ऐसे धधकते थे कि उनका उन्माद सुधारा या शान्त नहीं किया जा सकता था। यह कैसे? वह कहता है, "मैंने परखकर देखा कि उनका रोग चंगा हो सकता है या नहीं; क्योंकि मैंने उनके राजाओं और शासकों को उठा लिया, जो मेरी अप्रसन्नता का कोई धुँधला चिह्न न था: परन्तु मैंने कुछ भी सिद्ध न किया।" फिर आगे आता है, {,}אין{ }קרא{ }בהם{ }אליain kora beem ali, वह कहता है, उन में से कोई नहीं जो मेरी दोहाई देता हो। उसने कहा था कि सब के सब पाप करने की लालसा से धधक रहे थे; अब उनकी जड़ता पर दोष लगाते हुए वह किसी को अपवाद नहीं ठहराता। इससे हम देखते हैं कि सारी प्रजा ऐसे उन्माद से ग्रस्त थी कि जब परमेश्वर के हाथ से उनकी ताड़ना हुई, तब भी उन्होंने उसकी दोहाई न दी। यह तो निश्चित है कि इस्राएली चिल्लाते थे, परन्तु बिना पश्चाताप के; और कपटियों की यह रीति है कि जब परमेश्वर उन्हें दण्ड देता है तब वे हाय-हाय करते हैं; तौभी वे अपनी विनतियाँ और अपनी कराहें उसकी ओर नहीं लगाते, क्योंकि उनका हृदय हठ से बन्द है। अतः इस वाक्यांश की व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिए, कि उन्होंने न पश्चाताप किया, न दया के लिए परमेश्वर की शरण ली। फिर आगे यह आता है — होशे 7:8
8. एप्रैम देश देश के लोगों से मिलजुल गया है; एप्रैम ऐसी चपाती है जो उलटी न गई हो।
8. Ephraim inter populos ipse miscuitse: Ephraim fuit panis subciniricius, qui versus non est.
अब परमेश्वर शिकायत करता है कि एप्रैम, जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिए चुना था, अन्य जातियों से कुछ भी भिन्न न रहा। हम जानते हैं कि अब्राहम की सन्तान को परमेश्वर ने इसी उद्देश्य से लेपालक बनाया था कि वे अन्यजातियों के समान न हों: क्योंकि परमेश्वर की बुलाहट अपने साथ पवित्रता लाती है। और हमें वह स्मरणीय वचन याद रखना चाहिए जो बार-बार आता है, 'पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।' अतः इस्राएलियों को अपनी बुलाहट का ध्यान रखना चाहिए था, और यह ठान लेना चाहिए था कि वे परमेश्वर की शुद्ध आराधना करेंगे, और अन्यजातियों की अशुद्धताओं और मलिनता से अपने आप को अशुद्ध न करेंगे। परन्तु परमेश्वर यहाँ कहता है कि एप्रैम अब खतनारहित जातियों से कुछ भी भिन्न न रहा। वह कहता है, वह देश देश के लोगों से मिलजुल जाता है। और यहाँ संकेतवाचक सर्वनाम {,}הואeva में जो बल है उस पर ध्यान देना चाहिए; वह कहता है, एप्रैम स्वयं: क्योंकि निश्चय ही यह अयोग्य और किसी भी प्रकार सहन न करने योग्य बात थी कि एप्रैम, जिस पर परमेश्वर ने अपने चुनाव की छाप खोद दी थी, अब अन्यजातियों के अन्धविश्वासों में उलझ गया था। अतः अब हम भविष्यद्वक्ता के शब्दों का आशय देखते हैं, वह, हाँ, एप्रैम ही, जातियों से मिलजुल जाता है। यदि इस्राएल की और सब जातियों की दशा एक-सी और समान होती, तो भविष्यद्वक्ता इस प्रकार न बोलता; परन्तु जब परमेश्वर ने एप्रैम को अपने लिए पवित्र ठहराया था, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ उसके पाप को बढ़ाकर दिखाता है जब वह कहता है कि एप्रैम ने भी अपने आप को जातियों से मिला लिया था।
फिर वह जोड़ता है, एप्रैम राख के नीचे सेंकी गई उस रोटी के समान है जो उलटी नहीं गई। यह रूपक भविष्यद्वक्ता के अभिप्राय और इस अंश की परिस्थितियों से अत्यन्त उपयुक्त रूप से मेल खाता है, यदि उसे ठीक-ठीक समझा जाए। और मैं समझता हूँ कि भविष्यद्वक्ता का सीधा-सा अभिप्राय यह था कि एप्रैम किसी बात में स्थिर न था, वरन् अस्थिर और परिवर्तनशील था; जैसे जब हम लोक-भाषा में उन लोगों की चंचलता को प्रकट करते हैं जो अपने आप से मेल नहीं खाते, और जिनमें कोई सच्चाई नहीं, तो हम कहते हैं, Il n'est ne chair ne poisson, (न वह मांस है न मछली।) इसी प्रकार इस स्थान में भी भविष्यद्वक्ता कहता है कि एप्रैम ऐसी चपाती के समान था जो एक ओर से जल गई हो, और दूसरी ओर से गीली हो, या आटे का कच्चा और बिना पका लोंदा हो। क्योंकि हम जानते हैं कि एप्रैमी अपने आप को परमेश्वर के लिए पवित्र प्रजा होने का घमण्ड करते थे; और जब खतना उस प्रजा को अन्य जातियों से अलग करता था, तो कुछ भिन्नता प्रतीत होती थी; परन्तु इस बीच परमेश्वर की आराधना भ्रष्ट हो चुकी थी; सारे बलिदान मिलावटी हो गए थे, जैसा हम पहले देख चुके हैं, और उनका सारा धर्म एक गड़बड़ मिश्रण था; हाँ, अन्यजातियों के अन्धविश्वासों से और किसी ऐसी वस्तु से जो सच्ची और वैध आराधना के समान दिखती थी, मिलकर बना एक अव्यवस्थित ढेर। अतः जब इस्राएली इस प्रकार विश्वासघात से परमेश्वर का उपहास कर रहे थे, तो उनमें कुछ भी स्थिर न था: इसलिए भविष्यद्वक्ता उनकी तुलना ऐसी चपाती से करता है जो चूल्हे पर रखी जाकर उलटी नहीं जाती; क्योंकि वह एक ओर से तो अवश्य जल जाएगी, जबकि दूसरी ओर से कच्ची रह जाएगी।
42 "एप्रैम! वह देश देश के लोगों में मिलजुल गया है! एप्रैम ऐसी चपाती है जो उलटी न गई!" —बिशप हॉर्सले। बिशप यह टिप्पणी जोड़ते हैं, — "बहुवचन में {,{עמים शब्द सदा पृथ्वी की विभिन्न जातियों को, अर्थात् अज्ञान में पड़ी जातियों को, परमेश्वर की निज प्रजा इस्राएलियों के विपरीत, सूचित करता है।"
भविष्यद्वक्ता यहाँ उस आपत्ति का पहले से उत्तर देता है जो इस्राएली उठा सकते थे; क्योंकि हम जानते हैं कि कपटियों के पास बहानों की कभी कमी नहीं होती। अतः इस्राएली यह बचाव प्रस्तुत कर सकते थे, "तू कहता है कि हम अब अन्यजातियों की अशुद्धताओं में उलझ गए हैं; परन्तु अन्यजातियों में खतना नहीं है; उनके बीच इस्राएल के परमेश्वर को तुच्छ जाना जाता है, वहाँ कोई वेदी नहीं जिस पर लोग सच्चे परमेश्वर के लिए बलि चढ़ा सकें; हम, इसके विपरीत, अब्राहम की सन्तान हैं, हमारा वह परमेश्वर है जिसने हमें मिस्र से छुड़ाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और याजकपद सदा हमारे बीच बना रहता है।" अतः जब इस्राएली अपने अन्धविश्वासों के पक्ष में ये बहाने ला सकते थे, तो भविष्यद्वक्ता पहले से ही कहता है कि वे राख के नीचे सेंकी गई उस रोटी के समान थे, जो चूल्हे पर डाली जाकर उलटी नहीं जाती कि उसकी सिंकाई बराबर हो; क्योंकि तब एक ओर से तो उसे ताप मिलेगा, और दूसरी ओर उचित मात्रा में ताप न पहुँचेगा। वह कहता है, "तुम एक ओर से जले हुए हो, परन्तु दूसरी ओर से कच्चे हो; इसलिए तुममें निरे विश्वासघात के सिवा और कुछ नहीं।" अब हम समझ गए हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय क्या है।
परन्तु यह उपमा उनके दण्ड से भी सम्बन्धित की जा सकती है; क्योंकि परमेश्वर ने पहले बहुत से स्थानों में दिखाया था कि इस्राएली ऐसे टेढ़े थे कि किसी भी संकट के द्वारा न तो वे वश में किए जा सकते थे और न सही बुद्धि पर लाए जा सकते थे: और वह यह शिकायत फिर से दोहराता है। अतः शब्दों का अर्थ यह हो सकता है, कि एप्रैम ऐसी चपाती के समान था जो चूल्हे पर उलटी नहीं गई, क्योंकि उसकी कड़ाई और कठोरता से ताड़ना की गई थी, परन्तु बिना किसी लाभ के; वह उन निकम्मे ठहराए हुओं के समान था जो, चाहे प्रभु उन्हें कुचल भी डाले, तौभी अपनी कठोरता में हठी बने रहते हैं। अतः वे एक ओर से तो जले हुए हैं, क्योंकि वे अपनी विपत्तियों के नीचे लगभग नष्ट हो चुके हैं; परन्तु दूसरी ओर वे पूर्णतः कच्चे हैं, क्योंकि प्रभु ने उनके टेढ़ेपन को कोमल नहीं किया था। परन्तु जो मैंने पहले स्थान पर प्रस्तुत किया है वह प्रसंग के अधिक अनुकूल है। — 43 बिशप हॉर्सले यही व्याख्या देते हैं, — "एक ओर एक बात, दूसरी ओर दूसरी बात; नीचे से जलकर कोयला, ऊपर से कच्चा आटा। यह ऐसे चरित्र का उपयुक्त चित्र है जो पूर्णतः असंगतियों से भरा है। भविष्यद्वक्ता के समय के दस गोत्र ऐसे ही थे; नाम से तो यहोवा के उपासक, परन्तु बछड़ों की अपनी अर्ध-मूर्तिपूजा के अतिरिक्त पड़ोसी जातियों की सारी मूर्तिपूजा को भी अपनानेवाले।" "एक ओर से सिंका हुआ और दूसरी ओर से कच्चा, वह न पूरा गरम है न पूरा ठण्डा, वरन् कुछ यहूदी और कुछ अन्यजाति है।" — जिनेवा बाइबल।
अतः अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता क्या कहता है: पहले वाक्यांश में परमेश्वर एप्रैम पर दोष लगाता है, क्योंकि उसने अन्यजातियों की विधियों और अन्धविश्वासों को ग्रहण करके अपने आप को अपवित्र कर लिया था, यहाँ तक कि, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, एक गड़बड़ मिश्रण हो गया था। दूसरे स्थान पर वह इस्राएलियों को उत्तर देता है, कहीं वे अपने पक्ष में परमेश्वर के नाम की दुहाई न दें, क्योंकि झूठे बहाने बनाना उनकी रीति थी। इसलिए वह कहता है कि वे कुछ बातों में खतनारहित जातियों से भिन्न तो थे, परन्तु यह भिन्नता परमेश्वर के सम्मुख कुछ भी न थी, क्योंकि वे राख के नीचे सेंकी गई उस रोटी के समान थे जो किसी भी ओर से न तो सिंकी है न कच्ची; क्योंकि एक ओर से वह जल जाती है, और दूसरी ओर से कच्ची रह जाती है। अब आगे यह आता है — होशे 7:9
9. परदेशियों ने उसका बल खा डाला है, और वह इसे नहीं जानता; हाँ, उसके बाल कहीं कहीं पक गए हैं, तौभी वह नहीं जानता।
9. Comederunt extranei robur ejus, et ipse non intelligit: etiam canities sparsa est in eo, et ipse non intelligit.
भविष्यद्वक्ता उसी विषय को आगे बढ़ाता है, अर्थात् यह कि इस्राएल ने पश्चाताप नहीं किया था, यद्यपि प्रभु ने विभिन्न रीतियों से उन्हें पश्चाताप के लिए निमन्त्रण दिया था; हाँ, अपने कोड़ों से उन्हें विवश भी किया था। जब परमेश्वर न अपने वचन से और न अपनी मार से हम पर कुछ प्रभाव डाल पाता है, तो यह सचमुच निराशाजनक और असाध्य दुष्टता का प्रमाण है। जब हम उसकी शिक्षा और चेतावनियों के प्रति बहरे हैं, तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम पूर्णतः टेढ़े हैं: परन्तु जब प्रभु अपना हाथ भी उठाता है और दण्ड देता है, यदि तब भी हम न झुकें, तो इसके सिवा और क्या कहा जा सकता है कि हमारे पापों ने ऐसी गहरी जड़ें पकड़ ली हैं कि वे हमसे उखाड़े नहीं जा सकते? इसलिए परमेश्वर इन शब्दों में दिखाता है कि इस्राएली अब सब उपचार से परे हो चुके थे; क्योंकि इतनी बार और इतनी रीतियों से चिताए जाने के बाद भी वे सही मार्ग पर न लौटे; वरन् उन्होंने अपने पापों के विषय में सोचा तक नहीं, परन्तु संवेदनहीन बने रहे। और पौलुस ऐसे लोगों के विषय में कहता है कि वे {απηλγηκοτας} हैं, ("सुन्न होकर," इफिसियों 4:19,) अर्थात् भावना से शून्य। जब मनुष्य अपने संकटों में किसी दुःख से छुए नहीं जाते, तो निश्चित है कि वे भ्रम की आत्मा से मारे गए हैं। तौभी इसमें सन्देह नहीं कि इस्राएली अपनी विपत्तियों को अनुभव करते थे; परन्तु भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि वे ऐसे जड़ हो गए थे कि उन्होंने उनके कारण और स्रोत पर विचार न किया। और इससे क्या लाभ, जब कोई जानता है कि वह रोगी है, तौभी परमेश्वर की ओर दृष्टि नहीं करता, न यह सोचता है कि उस पर न्याय के अनुसार विपत्ति आई है? इसलिए जब कोई केवल मार के कारण चिल्लाता है, और मारनेवाले के हाथ की ओर ध्यान नहीं देता, जैसा एक दूसरा भविष्यद्वक्ता कहता है, (यशायाह 9:13,) तो निश्चय उसमें पूरी जड़ता है। इससे हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता के मन में क्या था जब उसने कहा कि इस्राएल न समझा जबकि परदेशी उसे खा रहे थे, जबकि उस पर पके बाल फैल रहे थे; क्योंकि उसने विपत्तियों के कारण पर ध्यान न दिया, वरन् जड़ बना रहा; न उसने अपना मन परमेश्वर की ओर उठाया, कि जो सब विपत्तियाँ वह भोग रहा था उनका दोष अपने पापों पर डाले।
44 पोकॉक ने, जैसा न्यूकम ने उद्धृत किया है, पूर्व देशों के देहाती लोगों में रोटी सेंकने का जो वर्णन दिया है वह यह है: — "लोग कमरे के बीच में आग जलाते हैं: जब रोटी सेंकने के लिए तैयार हो जाती है, तब वे चूल्हे का एक कोना झाड़ते हैं, रोटी वहाँ रखते हैं, उसे गरम राख और अंगारों से ढाँप देते हैं, और चौथाई घंटे में उसे उलट देते हैं।"
वह कहता है कि उसका बल परदेशियों ने खा डाला था। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि प्रजा उसकी रक्षा में रहेगी; और जब वे परदेशियों की लूट के लिए खुले छोड़ दिए गए, तब उन्होंने क्यों न समझा कि वे परमेश्वर की रक्षा से वंचित कर दिए गए हैं? और यह तब तक नहीं हो सकता था जब तक उनके अपने पाप ने उन्हें इस विशेषाधिकार से वंचित न कर दिया हो। इसलिए इस्राएली अत्यन्त अन्धे और मन से भटके हुए रहे होंगे, जब उन्होंने यह न समझा कि परदेशियों के द्वारा वे इस प्रकार इसलिए लूटे गए क्योंकि परमेश्वर अब उनकी रक्षा नहीं करता था, न उनका संरक्षक था, जैसा वह पहले हुआ करता था।
वह जोड़ता है कि उस पर पके बाल थे। कुछ लोग इससे यह समझते हैं कि वर्षों के लम्बे क्रम से भी इस्राएली सुधरे नहीं थे। जैसा हम जानते हैं, आयु लम्बे अनुभव के द्वारा मनुष्यों को कुछ विवेक देती है। जवान लोग, जब प्रभु उन्हें अपनी ओर बुलाता भी है, तब भी किसी न किसी आवेग में बह जाते हैं; परन्तु वृद्धों में अधिक विवेक और संयम होता है। इसलिए बहुत से लोग सोचते हैं कि इस्राएलियों को यहाँ इसलिए दोषी ठहराया गया है कि उन्होंने कुछ भी लाभ न उठाया था — नहीं, आयु के बढ़ने से भी नहीं। परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता बोलने की इस रीति से उनकी विपत्तियों की बड़ाई प्रकट करता है, जब वह कहता है कि उस पर पके बाल छिड़क दिए गए थे; क्योंकि हम जानते हैं कि जब कोई भारी पीड़ा और क्लेश में पड़ता है, तो विपत्तियों के बोझ ही से उसके बाल पक जाते हैं; क्योंकि बालों का पकना केवल वर्षों से नहीं, वरन् कष्टों और भारी चिन्ताओं से भी होता है, जो मनुष्यों को न केवल क्षीण करती हैं, वरन् उन्हें गला भी डालती हैं। हम जानते ही हैं कि मनुष्य विपत्तियाँ सहते-सहते बूढ़े हो जाते हैं। और यहाँ, मेरे विचार में, भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि "इस्राएल पर बुढ़ापा आ गया था," — अर्थात् उस पर इतनी विपत्तियाँ आ पड़ी थीं कि वह मानो बुढ़ापे से जर्जर हो गया था; और इतने पर भी उसने कोई लाभ न उठाया था। अब हम उस बात की सच्चाई देखते हैं जो मैं पहले कह चुका हूँ, कि भविष्यद्वक्ता की यह निरन्तर शिक्षा थी कि इस्राएल की प्रजा में जो रोग फैले हुए थे वे असाध्य थे, क्योंकि किसी भी उपचार से वे पश्चाताप पर नहीं लाए जा सकते थे। आगे यह आता है — होशे 7:10
10. और इस्राएल का गर्व उसी के मुँह पर साक्षी देता है; और इन सब बातों के रहते हुए भी वे अपने परमेश्वर यहोवा की ओर नहीं फिरे, और न उसको ढूँढ़ा है।
10. Et testificabitur (vel, testificata est) superbia Israelis ad faciem ejus, et non reversi sunt ad Jehovam Deum suum, et non quaesierunt eum in omnibus his.
अब भविष्यद्वक्ता अपनी पहली शिक्षा की पुष्टि करता है, और सामान्य रूप से कहता है कि इस्राएल का गर्व उसके मुँह पर उसके विरुद्ध साक्षी देगा, या उसके मुँह पर उसे नीचा करेगा। {,}ענהone शब्द का अर्थ इब्रानी में "साक्षी देना" है, और प्रायः "नीचा करना" या "दुःख देना" भी, जैसा पाँचवें अध्याय में बताया गया था; और भविष्यद्वक्ता के शब्द अब भी वही हैं, और दोनों अर्थ उपयुक्त हैं। तौभी मैं इस पर अधिक बल नहीं देता, क्योंकि भविष्यद्वक्ता का आशय स्पष्ट है; उसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर ने इस्राएलियों की ऐसी खुली ताड़ना की थी कि उन्हें उसका हाथ पहचान लेना चाहिए था, जब तक कि वे सचमुच अन्धे न हों, और कि साथ ही चिताए जाने पर उन्हें गिड़गिड़ाते हुए अपने आप को दीन करना चाहिए था। अतः चाहे हम "साक्षी देना" पढ़ें या "नीचा करना," अर्थ वही रहेगा, और भविष्यद्वक्ता का आशय भी वही प्रतीत होगा। "अतः इस्राएल का गर्व उसके मुँह पर उसे नीचा करेगा," या, "इस्राएल का गर्व उसके मुँह पर साक्षी देगा:" क्योंकि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि इस्राएली चाहे कितनी ही उग्रता से परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े हों, और उसके भविष्यद्वक्ताओं के प्रति अशिष्ट हों, और चाहे कितनी ही टेढ़ाई से सारी शिक्षा को ठुकरा दें, और अपने पापों के लिए बहाने भी बनाएँ, तौभी इस सब से उन्हें कुछ लाभ न होगा, क्योंकि वे अपने गर्व के द्वारा ऐसे गिरा दिए गए थे कि प्रभु ने उन्हें ऐसा दोषी ठहराया हुआ माना मानो उनका अपराध बहुत से गवाहों के द्वारा सिद्ध हो गया हो, और उनका मुखौटा अब उतार दिया गया हो; संक्षेप में, अब कोई सन्देह शेष न रहा: यही भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय है।
अतः इस्राएल का गर्व उसके मुँह पर साक्षी देता है, या उसे नीचा करता है; अर्थात् यद्यपि इस्राएल अब तक सब चेतावनियों के विरुद्ध, सब दण्डों के विरुद्ध अटल दिखाई दिया था, तौभी वे दोषी ठहराए हुए माने गए; और साथ ही, वह कहता है, वे अपने परमेश्वर की ओर नहीं फिरते, और इन सब बातों के रहते हुए भी उसे नहीं ढूँढ़ते। अब हम देखते हैं वह जो मैंने कहा है, कि उस शैतानी टेढ़ेपन के विषय में, जिसका प्रजा में ऐसा राज्य था, पहले की गई शिकायत की यहाँ पुष्टि की गई है, यहाँ तक कि उनके उद्धार की अब कोई आशा न रही। और वह कहता है कि वे अपने परमेश्वर यहोवा की ओर नहीं फिरे; क्योंकि वे निरन्तर अपनी मूर्तियों के पीछे दौड़ रहे थे, जैसा हम पहले देख चुके हैं; हाँ, वे उस अनियन्त्रित जोश से ग्रस्त थे जिसके विषय में भविष्यद्वक्ता अध्याय के आरम्भ में बोलता है; परन्तु वे यहोवा की ओर नहीं फिरे; वे अपने देवताओं की भीड़ में पूर्णतः लीन थे, और साथ ही उन्हें परमेश्वर की कुछ भी चिन्ता न थी।
और जब वह कहता है, उनका परमेश्वर, तो वह कड़ी भर्त्सना व्यक्त करता है; क्योंकि परमेश्वर ने अपने आप को उन पर प्रगट किया था; हाँ, उसने अपनी व्यवस्था के द्वारा अपने आप को उन पर स्पष्ट रूप से प्रकट किया था। अतः उनका उसकी ओर न फिरना केवल अज्ञान या भूल के कारण न था; वरन् एक शैतानी उन्माद के कारण था, मानो वे अपनी इच्छा से और जान-बूझकर नाश होना चाहते हों। अतः परमेश्वर यहाँ अपने आप को इस्राएल का परमेश्वर कहता है, आदर के लिए नहीं, वरन् इसलिए कि वह उनकी कृतघ्नता को और अधिक उघाड़ दे, और उनके विश्वासघात को और भारी ठहराए, क्योंकि वे उससे फिर गए थे, और उसे ढूँढ़ना नहीं चाहते थे।
जब वह कहता है, इन सब बातों के रहते हुए भी, तो उसका अभिप्राय यह है कि हर प्रकार का उपचार आज़माया जा चुका था, और इसलिए उनका रोग पूर्णतः असाध्य था। जब हम एक रीति से कुछ नहीं कर पाते, तो प्रायः दूसरी रीति आज़माते हैं। परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी ओर लौटा लाने के लिए केवल एक ही रीति नहीं आज़माई थी, वरन् उसने सब उपचार आज़माए थे। जब कोई भलाई न निकली, तो इसके सिवा और क्या कहा जाए कि प्रजा नष्ट हो चुकी थी, और सब आशा से परे थी? अतः भविष्यद्वक्ता का यहाँ यही अभिप्राय है। अब आगे यह आता है — होशे 7:11-12
11. एप्रैम भी एक भोली पंडुकी के समान है जिसके कुछ बुद्धि नहीं; वे मिस्र की दोहाई देते, और अश्शूर को चले जाते हैं।
11. Et fuit Ephraim tanquam columba credula (vel, quae fallitur, vel, declinans, ut alii vertunt) sine corde (id est, sine intelligentia; cor enim saepe est Hebraeis voluntas, sed interdum mentem et intelligentiam significat;)
clamant Aegyptum, proficiscuntur in Assyriam.
12. जब वे जाएँ, तब मैं उनके ऊपर अपना जाल फैलाऊँगा; मैं उन्हें आकाश के पक्षियों की नाईं नीचे गिरा दूँगा; मैं उनको ऐसी ताड़ना दूँगा जैसी उनकी मण्डली सुन चुकी है।
12. Ubi autem profecti fuerunt (vel, quocunque profecti fuerunt) extendam super eos rete meum: tanquam avem coeli dejiciam eos; corrigam eos (vel, ligabo,) secundum auditionem coetus ipsorum. 45
भविष्यद्वक्ता यहाँ पहले इस्राएल को मूर्खतापूर्ण भोलेपन के लिए दोष देता है, और उनकी तुलना पंडुकी से करता है; क्योंकि उन्होंने सहायता के लिए मिस्रियों को बुलाया था और अश्शूर को दूत भेजे थे। सीधापन, जब विवेक के साथ जुड़ा हो, तो वास्तव में एक प्रशंसनीय सद्गुण है। परन्तु जैसे मनुष्यों में जो कुछ तर्कसंगत और विवेकपूर्ण है, वह खराई न होने पर दुष्टता में बदल जाता है; वैसे ही जब मनुष्य बहुत भोले और सब विवेक और बुद्धि से रहित होते हैं, तब वह निरी मूर्खता है। परन्तु जब वह कहता है कि इस्राएल पंडुकी के समान है, तो उसका यह अर्थ नहीं कि इस्राएलियों ने केवल अज्ञान से पाप किया था, वरन् यह कि वे सब विवेक से रहित थे; और यह मूर्खता उस ज्ञान के विपरीत रखी गई है जो परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में उन्हें दिया था: क्योंकि परमेश्वर ने खरी शिक्षा के द्वारा इस्राएल की अगुवाई करना कभी नहीं छोड़ा था; उसने सदा अपने वचन की मशाल उनके सामने रखी थी; परन्तु जब परमेश्वर इस प्रकार उन्हें ज्योति दे रहा था, तब इस्राएल ऐसा भोला था कि शैतान और संसार के छलावों पर कान लगाता था। अतः अब हम भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय समझते हैं।
कुछ लोग {,}פותהpute का अनुवाद "भटकनेवाली" करते हैं: और इसका मूल {,}פתהpite निस्सन्देह "भटकना" का अर्थ रखता है; और कभी-कभी इसका अर्थ "फुसलाना" भी है: इसलिए कुछ लोग यह अनुवाद देते हैं, "सहज में फुसलाई जानेवाली," या, "भोली पंडुकी।" परन्तु मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि वे चापलूसी से बहकाए गए थे, या प्रलोभनों से धोखा खा गए थे, जो एक ही बात है। अतः इस्राएल उस पंडुकी के समान था जो विभिन्न चारों से धोखा खा जाती है।
यह कैसे? क्योंकि वे अश्शूरियों के पास दौड़े, उन्होंने मिस्रियों को बुलाया। यदि इस्राएल ने परमेश्वर की व्यवस्था पर ध्यान दिया होता, तो वे निश्चिन्त रह सकते थे कि उनके भटक जाने का कोई संकट नहीं; क्योंकि प्रभु हमें असमंजस या सन्देह में नहीं रखता कि हम डाँवाडोल होते रहें, वरन् अपने वचन के द्वारा हमारे मनों को स्थिर और शान्त करता है, जैसा एक दूसरे स्थान में भी कहा गया है, 'विश्राम यही है।' अतः इस्राएलियों ने ठान लिया था कि वे अपने पाँव मानो ठोस भूमि पर न टिकाएँगे; और उन्होंने पंडुकियों के समान इधर-उधर उड़ना अधिक पसन्द किया; और उनका भोलापन उन्हें बहुत सी भूलों में ले गया। कैसे? क्योंकि उन्होंने मिस्रियों के द्वारा और अश्शूरियों के द्वारा भी धोखा खाने के लिए अपने आप को सौंप देना अधिक पसन्द किया, जबकि परमेश्वर खरे ज्ञान के द्वारा उनकी अगुवाई करने को तैयार था। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता के इस दोषारोपण का आशय यह है कि इस्राएल ने उद्धार के उस मार्ग को जान-बूझकर ठुकरा दिया जो उनके सामने रखा गया था, और जिस पर वे भरोसे के साथ, और शान्त और स्थिर मन से चल सकते थे; परन्तु इस बीच वे ऊपर-नीचे उड़ते रहे, और जान-बूझकर भटकनेवाले बन गए; क्योंकि उन्होंने अपने आप को विभिन्न चारों से धोखा खाने दिया।
अब यह स्थान हमें सिखाता है कि सीधेपन के बहाने से मनुष्य निर्दोष नहीं ठहराए जा सकते; क्योंकि भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएलियों की इसी दुर्बलता को दोषी ठहराता है।
45 "जैसा वे अपनी मण्डली में घोषित होते सुनते हैं।" — बिशप हॉर्सले।
अतः हमें मसीह के इस नियम पर ध्यान देना चाहिए, 'कबूतरों के समान भोले, और साथ ही साँपों के समान बुद्धिमान बनो।' परन्तु यदि हम बिना विचारे अपने आप को छोड़ दें, तो अज्ञान का बहाना निःसार होगा; क्योंकि प्रभु अपने वचन के द्वारा हम पर ज्योति चमकाता है और हमें सही मार्ग दिखाता है; और विवेक और बुद्धि की आत्मा भी उसके अधिकार में है, जिसे वह माँगनेवालों को कभी देने से इन्कार नहीं करता। परन्तु जब हम वचन को तुच्छ जानते हैं, और परमेश्वर के आत्मा की उपेक्षा करते हैं, और अपनी ही भटकती कल्पनाओं के पीछे चलते हैं, तो हमारा पाप दुगुना है; क्योंकि इस प्रकार हम वचन की ज्योति को तुच्छ जानते और बुझाते हैं, और जब प्रभु हमें बचाना चाहता है तब हम जान-बूझकर नाश भी होते हैं।
परन्तु इसके बाद दण्ड की घोषणा आती है, वह कहता है, वे जहाँ कहीं जाएँगे, मैं उनके ऊपर अपना जाल फैलाऊँगा, और उन्हें आकाश के पक्षियों की नाईं नीचे खींच लाऊँगा। परमेश्वर दिखाता है कि यद्यपि इस्राएली इधर-उधर फिरते रहें, तौभी उनका अन्त दुःखद होगा; क्योंकि उसका जाल फैला हुआ होगा: और वह उस उपमा को आगे बढ़ाता है जिसका प्रयोग उसने पिछले पद में किया था। उसने कहा था कि वे उन पंडुकियों के समान थे जो एक आकस्मिक प्रवृत्ति से चारे की ओर खिंच जाती हैं, और फैले हुए जाल पर ध्यान नहीं देतीं। अतः यदि पंडुकी केवल चारा देखती है, और साथ ही संकट से नहीं बचती, तो यह मूर्खतापूर्ण भोलेपन का प्रमाण है। इसलिए परमेश्वर कहता है, मैं अपना जाल फैलाऊँगा; अर्थात्, मैं तुम्हारे सब प्रयत्नों और योजनाओं को निष्फल कर दूँगा, और तुम्हारी सब आशाओं को व्यर्थ ठहराऊँगा; क्योंकि वे जहाँ कहीं उड़ेंगे, वहाँ मेरा जाल फैला होगा।
यह एक उल्लेखनीय अंश है; क्योंकि इससे हम सीखते हैं कि यदि हम प्रभु के वचन के विपरीत कोई काम करने का यत्न करें, और ऐसी युक्तियाँ करें जिनकी अध्यक्षता उसका आत्मा नहीं करता, तो परिणाम सदा दुर्भाग्यपूर्ण होगा; जैसा यशायाह 30:1 में कहा गया है, 'हाय उन पर जो जाल बुनते हैं, और मेरे मुँह से नहीं पूछते! हाय उन पर जो युक्ति करते हैं, और मेरे आत्मा को नहीं पुकारते!'
यह अंश यशायाह के शब्दों से पूर्णतः मेल खाता है, यद्यपि बोलने की रीति भिन्न है। अतः हमारी युक्तियों को आशीष देना परमेश्वर ही का काम है, कि उन्हें सफल और मनचाहा परिणाम मिले। परन्तु जब परमेश्वर अनुकूल नहीं, वरन् हमारी योजनाओं के विरोध में भी है, तो अन्त में हमारी क्या दशा होगी, सिवाय इसके कि जो कुछ हमने प्राप्त किया हो वह अन्त में हमारे विनाश का कारण बन जाए? अतः हम यह जान लें कि मनुष्य इस संसार में जो कुछ करते हैं वह परमेश्वर के गुप्त विधान के द्वारा शासित होता है; और जैसे परमेश्वर अपना हाथ बढ़ाकर अपने लोगों की अगुवाई करता है, और अपने स्वर्गदूतों को उनकी अगुवाई करने की आज्ञा देता है; वैसे ही उसके पास अपना फैला हुआ जाल भी है, कि उन सब को पकड़ ले जो अपनी भटकती कल्पनाओं के पीछे भटकते हैं। इसलिए वह कहता है, वे जहाँ कहीं जाएँगे, मैं उनके ऊपर अपना जाल फैलाऊँगा; और आगे, मैं उन्हें आकाश के पक्षियों की नाईं नीचे खींच लाऊँगा।
प्रतीत होता है कि भविष्यद्वक्ता उस व्यर्थ भरोसे की ओर संकेत करता है जिसका उल्लेख उसने तब किया था जब उसने कहा था कि इस्राएल ने वायु को अपने पंखों में बाँध रखा था। क्योंकि जब मनुष्य ढिठाई से कोई काम हाथ में लेते हैं, तो साथ ही वे अपने आप से यह प्रतिज्ञा कर लेते हैं कि कोई वस्तु उन्हें अपना लक्ष्य पाने से नहीं रोकेगी। अतः जब मनुष्य इस मूर्खतापूर्ण भरोसे से फूलकर और अधिक साहस बटोर लेते हैं, हाँ, अन्त में उन्मत्त होकर परमेश्वर पर आक्रमण करते हैं, और ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बादलों को भी चीरकर पार निकल जाएँगे, तब भविष्यद्वक्ता कहता है, मैं उन्हें आकाश के पक्षियों की नाईं नीचे खींच लाऊँगा; अर्थात्, "मैं उन्हें कुछ समय के लिए ऊपर उठने दूँगा; परन्तु जब वे बादलों तक पहुँच जाएँगे, तब मैं उन्हें नीचे खींच लाऊँगा, मैं उन्हें जता दूँगा कि उनका उड़ना उनके किसी काम का नहीं।" और हमें ध्यान देना चाहिए कि इस्राएली कहाँ से नीचे खींचे गए थे। क्योंकि कौन यह न सोचता कि अश्शूरियों में या मिस्रियों में इतनी रक्षा अवश्य मिलेगी कि छुटकारे की उनकी आशा व्यर्थ न हो? परन्तु प्रभु संसार की इस व्यर्थ सामर्थ्य को ठट्ठों में उड़ाता है; क्योंकि जब मनुष्य अपने आप को परमेश्वर से अलग कर लेते हैं, तब वे जो भी आशा बाँधें, वह धुएँ के समान पूर्णतः लोप हो जाएगी। — 46 मत्ती 10:16। — fj.
और फिर वह जोड़ता है, मैं उनको ताड़ना दूँगा, या, 'मैं उनको बाँध लूँगा:' क्योंकि {,}יסרisar क्रिया का अर्थ "ताड़ना देना" भी है और "बाँधना" भी; इसलिए कोई भी अर्थ लिया जा सकता है। यदि "बाँधना" शब्द स्वीकार किया जाए, तो वह रूपक से भली-भाँति मेल खाएगा, मानो वह कहता हो, "मैं तुम्हें अपने जालों में जकड़े रखूँगा।" क्योंकि जब तक पक्षियों को उड़ने दिया जाता है, वे सारे आकाश को अपना समझते हैं; परन्तु जब वे जालों में पड़ जाते हैं, तब वे बन्द होकर रह जाते हैं; तब वे उड़ नहीं सकते, और अपने पंख भी नहीं हिला सकते। अतः यह अर्थ, "मैं उनको बाँध लूँगा", बहुत उपयुक्त है; जिसका अर्थ है, "वे मेरे जाल को तोड़ न सकेंगे, वरन् मैं उन्हें अन्त तक वहीं बाँधे रखूँगा।" परन्तु यदि कोई दूसरा अर्थ, मैं उनको ताड़ना दूँगा, अधिक पसन्द करे, तो मुझे आपत्ति नहीं; और जहाँ तक आशय का सम्बन्ध है, हम देखते हैं कि हम कौन-सा अर्थ लें इसमें अधिक अन्तर नहीं, सिवाय इसके कि "बाँधना" शब्द, जैसा मैंने कहा है, रूपक से अधिक मेल खाता है।
वह कहता है, उनकी मण्डली के सुनने के अनुसार। लगभग सब इसका अनुवाद ऐसे करते हैं मानो परमेश्वर ने कहा हो कि वह उन्हें वैसे ही दण्ड देगा जैसी उसने मूसा के द्वारा धमकी दी थी, और मानो यह उनकी लापरवाही पर एक अप्रत्यक्ष दोषारोपण भी हो, क्योंकि लम्बे समय तक चिताए जाने के बाद भी वे बुद्धिमान न हुए, वरन् उन घोषणाओं को तुच्छ भी जाना जो उनके कानों में निरन्तर गूँजती रहती थीं। क्योंकि परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में धार्मिक जीवन का नियम ही नहीं ठहराया था, वरन् भारी और कठोर धमकियाँ भी जोड़ दी थीं, जिनके द्वारा उसने व्यवस्था की शिक्षा को पुष्ट किया। हम जानते हैं कि व्यवस्था के वे शाप कितने भयानक हैं। अतः जब परमेश्वर ने आरम्भ ही से इस्राएलियों को इस प्रकार धमकाया था, तो क्या उन्हें उसके सम्मुख और अधिक सावधानी से नहीं चलना चाहिए था? परन्तु वे इन घोषणाओं से भयभीत न हुए। इसलिए परमेश्वर यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से इस बड़े उन्माद को डाँटता है, कि इस्राएलियों ने उसकी धमकियों पर पर्याप्त ध्यान न दिया, जिनके द्वारा वे सही मार्ग पर लौटाए जा सकते थे; क्योंकि मूसा ने इनके द्वारा मनुष्यों की उग्र वासनाओं पर भी अंकुश लगाया, यदि उनमें खरी समझ का एक कण भी शेष रहा हो। इससे भी बढ़कर, भविष्यद्वक्ताओं ने वही चेतावनियाँ बार-बार उन पर दबाकर रखी थीं; और परमेश्वर ने उन्हें जगाना तब तक कभी नहीं छोड़ा था जब तक उन सब के कान उसकी वाणी के प्रति बहरे न हो गए। इसलिए वह कहता है, 'मैं उन्हें कसकर बाँधे रखूँगा,' या, 'मैं उनकी मण्डली के सुनने के अनुसार उन्हें ताड़ना दूँगा;' अर्थात्, "जो दण्ड मैं दूँगा वह उन्हें बहुत पहले से ज्ञात रहा होगा, क्योंकि मैंने खुले रूप से अपनी व्यवस्था के प्रचार की आज्ञा दी है, कि इस प्रकार कठोर धमकियों के द्वारा अपनी प्रजा को चिताऊँ; अब मैं वह न्याय पूरा करूँगा जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, क्योंकि मैंने अब तक उन्हें छोड़ रखा है।"
जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, व्याख्याकार लगभग सब इस विचार से सहमत हैं, सिवाय इसके कि वे भविष्यद्वक्ता के आशय पर विचार नहीं करते; वे यह नहीं देखते कि इस्राएलियों को उनकी कठोरता के लिए धिक्कारा गया था; वरन् वे केवल दण्ड की बात करते हैं, इस बात का कोई संकेत दिए बिना कि परमेश्वर ने किस अन्त या उद्देश्य से अपनी व्यवस्था में शाप घोषित किए थे, और अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा उनकी स्मृति को नया किया था। जेरोम एक और अर्थ प्रस्तुत करता है, अर्थात् यह कि परमेश्वर प्रजा को उनकी मण्डली की चर्चा के अनुसार दण्ड देगा; अर्थात्, जैसे उन्होंने एक मन होकर परमेश्वर की आराधना को भ्रष्ट किया था, और उसकी व्यवस्थाओं का उल्लंघन किया था, वैसे ही वह उन सब को दण्ड देगा। मैं साथ ही यह विचार भी जोड़ूँगा, कि परमेश्वर उनकी मण्डली के कोलाहल के अनुसार उन्हें ताड़ना देगा, जिससे भविष्यद्वक्ता न केवल इस्राएल की प्रजा में एक षड्यन्त्र को, वरन् एक दूसरे को पाप के लिए उकसाने में उनकी उग्रता को भी दिखाता है। अतः जैसे वे इस प्रकार कोलाहल करते हुए परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे, वैसे ही भविष्यद्वक्ता बदले में घोषणा करता है कि परमेश्वर उन्हें दण्ड देगा; मानो वह कहता हो, "तुम्हारा कोलाहल मुझे तुम्हारे उन्माद को दबाने से न रोकेगा। तुम सचमुच बड़े शोर के साथ मेरा विरोध करते हो, और सोचते हो कि अपने पापों में लिप्त रहकर भी तुम सुरक्षित रहोगे; परन्तु तुम्हारी यह उग्रता कोई बाधा न होगी, क्योंकि तुम्हें ताड़ना देने के साधन मेरे अधिकार में हैं।"
प्रार्थना हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तू देखता है कि हम शैतान और संसार के सब प्रलोभनों की ओर ऐसे झुके हुए हैं, और साथ ही विवेक से ऐसे शून्य हैं, और निरी चंचलता से बह जाते हैं, — इसलिए ऐसा अनुग्रह कर कि तेरे आत्मा की अगुवाई में हम उस सीधे मार्ग पर आगे बढ़ते रहें, जिस पर हम तेरे मार्गदर्शन और तेरे निर्देश देनेवाले हाथ के अधीन पहले ही चल पड़े हैं, कि हम तेरे वचन से कभी न भटकें, और न किसी भी रीति से उस लक्ष्य की ओर बढ़ने से हटें जो तूने हमारे सामने रखा है; और यद्यपि शैतान हमें भटकाने का यत्न करे, तौभी हम तेरी सेवा में दृढ़ बने रहें, और इस प्रकार आगे बढ़ते रहें, जब तक कि हम उस धन्य विश्राम तक न पहुँच जाएँ जिसकी प्रतिज्ञा तूने वर्तमान जीवन के संग्राम के पश्चात् हमारे प्रभु मसीह यीशु में हमसे की है। आमीन।
बीसवाँ व्याख्यान
होशे 7:13
13. उन पर हाय! क्योंकि वे मेरे पास से भाग गए हैं: उनका सत्यानाश हो! क्योंकि उन्होंने मेरा अपराध किया है: यद्यपि मैंने उन्हें छुड़ाया है, तौभी वे मेरे विरुद्ध झूठ बोलते आए हैं।
13. Vae illis, quia recesserunt a me; vastitas illis, (vel, Direptio,) quia perfide egerunt in me: et ego redimam eos (potest etiam resolvi in tempus praeteritum, Redemi eos,) et loquuti sunt contra me mendacia.
यहाँ भविष्यद्वक्ता इस्राएलियों से क्षमा की आशा छीन लेता है, और घोषित करता है कि उनका सब कुछ समाप्त हो चुका है, क्योंकि परमेश्वर ने अब उन्हें नष्ट करने का निश्चय कर लिया था। क्योंकि परमेश्वर सब कहीं अपने आपको क्षमा करने को तत्पर और प्रवृत्त बताता है, इसलिए कपटी लोग आशा रखते हैं कि परमेश्वर उन पर कृपालु होगा; और इसी व्यर्थ भरोसे को पालते हुए वे उसकी धमकियों को तुच्छ जानते हैं और ढिठाई से उसके विरुद्ध उठ खड़े होते हैं। इसलिए भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि परमेश्वर आगे को उनके प्रति अटल और न पसीजनेवाला होगा, क्योंकि उन्होंने बहुत समय तक हठपूर्वक उसकी सहनशीलता का दुरुपयोग किया था। उन पर हाय! वह कहता है, क्योंकि वे मुझसे हट गए हैं: उन पर उजाड़ आए! क्योंकि उन्होंने मुझसे विश्वासघात किया है। भविष्यद्वक्ता कहता है, अतः उनके लिए अब कोई कारण नहीं कि वे आगे को व्यर्थ भरोसे से अपने आपको धोखा दें, जैसा वे अब तक करते आए हैं; क्योंकि परमेश्वर ने यह एक ही बार में सदा के लिए ठहरा दिया है — कि वह उन पर अपना चरम प्रतिशोध लाएगा, क्योंकि उनका धर्मत्याग इसी के योग्य है।
फिर वह जोड़ता है, मैं उन्हें छुड़ाऊँगा, और उन्होंने मेरे विरुद्ध झूठ बोला है। जो लोग पहले शब्द का अनुवाद भविष्यत् काल में करते हैं, वे समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता प्रश्न पूछता है, "क्या मैं उन्हें छुड़ाऊँ? क्योंकि उन्होंने मेरे विरुद्ध झूठ बोला है:" और वे इसे एक अनिश्चित कथन-शैली मानते हैं — "क्या मैं इन विश्वासहीन मनुष्यों को छुड़ाऊँ? ऐसी दया दिखाकर मैं क्या भलाई करूँगा?" दूसरे यह व्याख्या देते हैं — "यद्यपि मैं उन्हें छुड़ाना चाहता था, तौभी मैंने पाया कि यह न तो लाभदायक होगा और न न्यायसंगत, क्योंकि वे मेरे विरुद्ध झूठ बोलते हैं;" मानो परमेश्वर यहाँ वह प्रकट नहीं करता जो उसने किया था, वरन् वह जो वह करना चाहता था। परन्तु भूतकाल इस स्थल के लिए अनुपयुक्त नहीं है; और हम जानते हैं कि इब्रानियों में कालों का परिवर्तन कितना सामान्य और परिचित था। तो अर्थ यह होगा, "मैंने उन्हें छुड़ाया है, और उन्होंने मेरे विरुद्ध झूठ बोला है;" अर्थात्, "जब वे घोर संकट में थे, तब मैंने उन्हें बार-बार मृत्यु से बचाया; परन्तु उन्होंने अपना स्वभाव नहीं बदला; वरन् उन्होंने उस छुटकारे के लिए जो स्तुति मेरी देय थी, वह भी मुझसे छीन ली, और छुटकारा पाने के बाद वे किसी प्रकार भी अच्छी रीति से नहीं जिए। इसलिए जब मैंने अब तक अपने उपकार व्यर्थ ही किए हैं, तो अब इसके सिवा कुछ शेष नहीं रहा कि मैं उन्हें नष्ट करूँ।" और मुझे भविष्यद्वक्ता का यही अभिप्राय जान पड़ता है।
तो वह पहले वाक्यांश में घोषित करता है कि वे परमेश्वर से व्यर्थ ही दया की आशा रखते थे, क्योंकि उनका अन्तिम विनाश ठहराया जा चुका था। फिर इसका कारण आता है, कि उन्होंने मूर्खता और अधर्म से परमेश्वर के अनुग्रह का दुरुपयोग किया था, इस रीति से कि उसके द्वारा छुड़ाए जाने पर भी वे अपनी दुष्टता में बढ़ते गए, और परमेश्वर से विश्वासघात भी करते रहे, जबकि वे दिखावा ऐसा करते थे मानो वे कुछ और ही कर रहे हों। अतः जब अच्छाई की ओर कोई परिवर्तन न हुआ, तो परमेश्वर अब दिखाता है कि वह ऐसे अधर्मी मनुष्यों पर अपना अनुग्रह और अधिक व्यय नहीं करेगा। अब यह स्थल सिखाता है कि हमारी कृतघ्नता कितनी असहनीय है, जब प्रभु के द्वारा छुड़ाए जाने के बाद हम वह विश्वास नहीं निभाते जिसकी प्रतिज्ञा हमने उससे की है, और जिसकी वह हमसे माँग करता है; क्योंकि परमेश्वर इसी शर्त पर हमारा छुड़ानेवाला है, कि हम पूर्णतः उसी को समर्पित हों। क्योंकि जो छुड़ाया गया है, उसे ऐसे नहीं जीना चाहिए मानो उसे अपने ऊपर और अपनी इच्छा पर अधिकार हो; वरन् उसे पूर्णतः अपने छुड़ानेवाले पर आश्रित रहना चाहिए। अतः यदि उसके अनुग्रह से छुड़ाए जाने के बाद हम इस प्रकार परमेश्वर से विश्वासघात करें, तो हम ऐसे अधर्म और विश्वासघात के दोषी ठहरेंगे जो दुगुने प्रतिशोध के योग्य है: और भविष्यद्वक्ता यहाँ यही सिखाता है।
हम सचमुच जानते हैं कि परमेश्वर ने इस्राएल की प्रजा को कितनी दया से छोड़ा था: जब वे अन्धविश्वासी उपासना में गिर गए थे, और दाऊद के वंश के प्रति भी अपना विश्वास भंग कर चुके थे, तब भी प्रभु ने उस प्रजा की अयोग्यता के होते हुए भी उस पर बहुत-से उपकार करना नहीं छोड़ा। हम यह भी जानते हैं कि यारोबाम के अधीन उन्हें सब मानवीय आशा से बढ़कर समृद्धि प्राप्त हुई थी। तौभी वे अपनी दुष्टता में और अधिक कठोर होते गए, सीधे मार्ग पर लौट आना तो दूर रहा। आइए अब आगे चलें — होशे 7:14
14. और जब वे अपने बिछौनों पर पड़े हाय-हाय करते थे, तब उन्होंने मन से मेरी दोहाई नहीं दी: वे अन्न और दाखमधु के लिए इकट्ठे होते हैं, और मुझसे बलवा करते हैं।
14. Et non clamaverunt ad me in corde suo: quia ulularunt super cubilibus suis; ad triticum et vinum congregabunt se, defecerunt (deficient, ad verbum) a me. 47
भविष्यद्वक्ता यहाँ फिर इस्राएलियों को इस बात के लिए डाँटता है कि इतनी बार चिताए जाने पर भी उन्होंने मन नहीं फिराया; क्योंकि, जैसा कल कहा गया था, वे सब ताड़नाएँ जो परमेश्वर अपने हाथ से हम पर लाता है, उनका यही उद्देश्य होता है — कि हमें हमारे दोषों से चंगा करे। अब भविष्यद्वक्ता यहाँ कहता है कि इस्राएलियों ने परमेश्वर की दोहाई नहीं दी, जो पश्चात्ताप में सबसे मुख्य बात है। परन्तु इस कथन पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने मन से मेरी दोहाई नहीं दी; अर्थात् सच्चाई से। हम सचमुच जानते हैं कि उनके बीच परमेश्वर की कुछ उपासना सदा बनी रही थी; यद्यपि इस्राएलियों ने अपने लिए बहुत-से देवता गढ़ लिए थे, तौभी सच्चे परमेश्वर का नाम उनके बीच से कभी पूर्णतः मिटा नहीं था; परन्तु वे परमेश्वर की उपासना को अपनी मनगढ़न्त बातों के साथ मिला देते थे; और परमेश्वर ऐसी बनावटी प्रार्थनाओं को सहन नहीं कर सकता था। इसलिए वह कहता है कि उन्होंने मन से दोहाई नहीं दी। वह उन पर यह दोष नहीं लगाता कि उन्होंने कोई बाहरी कार्य नहीं किया, परन्तु यह कि वे हृदय की सच्ची लालसा नहीं लाए; वरन् वे केवल कपट से परमेश्वर की दोहाई देते थे। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता के इस कथन का क्या अभिप्राय था, उन्होंने मन से मेरी दोहाई नहीं दी। क्योंकि परमेश्वर से प्रार्थना करना धर्म का मुख्य अभ्यास है, और विशेष रूप से हमारे पश्चात्ताप को प्रकट करता है, इसलिए भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से इस्राएलियों की इस त्रुटि का उल्लेख करता है — कि उन्होंने प्रभु की दोहाई नहीं दी। परन्तु चूँकि वे आपत्ति करके कह सकते थे कि उन्होंने विधिपूर्वक प्रार्थना की थी, इसलिए वह जोड़ता है कि उन्होंने ऐसा मन से नहीं किया; क्योंकि हृदय के अभ्यास के बिना बाहरी क्रिया (ceremonia) परमेश्वर के नाम को अपवित्र करने के सिवा और कुछ नहीं है। संक्षेप में, भविष्यद्वक्ता यहाँ इस्राएलियों को उनकी कठोरता दिखाता है; क्योंकि जब वे परमेश्वर के हाथ से मारे गए, तब वे उसकी शरण में भागकर क्षमा की विनती करने नहीं गए, कम से कम उन्होंने ऐसा मन से या सच्चाई से नहीं किया।
फिर वह जोड़ता है, क्योंकि वे अपने बिछौनों पर हाय-हाय करते थे। कुछ लोग {,}כיki निपात की व्याख्या विरोधवाचक रूप में करते हैं; मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो, "यद्यपि वे अपने बिछौनों पर हाय-हाय करते हैं, तौभी अपनी विनतियाँ मेरी ओर नहीं करते।" परन्तु हम इसे इसके उचित अर्थ में ले सकते हैं, और तब वाक्य अधिक अच्छी रीति से चलेगा: वे तो अपने बिछौनों पर हाय-हाय करते हैं, अर्थात्, "वे अपनी बातें मेरे पास नहीं लाते; क्योंकि वे पशुओं के समान अपना चिल्लाना उँडेलते हैं:" और हम देखते हैं कि अविश्वासियों की यही दशा होती है; क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति से डरते हैं, और उसका नाम लेना भी उन्हें भयानक लगता है; इसलिए वे हाय-हाय करते हैं, अर्थात् अपनी उग्र भावनाओं को बाहर उँडेलते हैं, परन्तु साथ ही जहाँ तक हो सके परमेश्वर के पास पहुँचने के हर मार्ग से बचते हैं। तो अर्थ यह है, "वे मन से मेरी दोहाई नहीं देते, क्योंकि वे केवल हाय-हाय करते हैं; परन्तु यह केवल पशु-सरीखी चेष्टा है, जिसमें कोई विवेक नहीं।" तौभी यदि कोई {,}כיki निपात को विरोधवाचक रूप में लेना अधिक पसन्द करे, तो अर्थ अनुपयुक्त न होगा, "यद्यपि वे अपने बिछौनों पर हाय-हाय करते हैं, तौभी मेरी दोहाई नहीं देते;" अर्थात्, "यद्यपि शोक उन्हें बड़ा कोलाहल करने को विवश करता है, तौभी जहाँ तक प्रार्थना की पुकार का सम्बन्ध है, वे गूँगे हैं।" यदि किसी को यह अर्थ अधिक भाता है, तो मैं इसके विरुद्ध कुछ नहीं कहता: परन्तु चूँकि {,}כיki निपात साधारणतः कारणवाचक रूप में लिया जाता है, इसलिए मैं इसकी व्याख्या इस प्रकार करना पसन्द करता हूँ, "चूँकि वे अपने बिछौनों पर चिल्लाते हैं, इसलिए वे परमेश्वर की ओर अपना शब्द नहीं उठाते।" 47 "और वे मन से मेरी दोहाई नहीं देते, यद्यपि वे अपने बिछौनों पर हाय-हाय करते हैं; अन्न और दाखमधु के लिए वे व्याकुल होकर दौड़-धूप करते हैं, वे मुझसे फिर जाते हैं।" जिस शब्द का अनुवाद मैं "दौड़-धूप करते हैं" करता हूँ, चाहे हम मूल पाठ को जैसा है वैसा ही लें, या एक मिलता-जुलता शब्द, {,{יתגודדו, जिसका समर्थन कई हस्तलिपियाँ और सेप्टुआजिंट करते हैं, उसका अर्थ लगभग एक ही है, अर्थात् बड़ी व्याकुलता और चिन्ता। — सं.
फिर आगे आता है, वे अन्न और दाखमधु के लिए इकट्ठे होते हैं, अथवा इकट्ठे होंगे। इस स्थल की व्याख्या दो प्रकार से की जाती है। कुछ लोग समझते हैं कि यहाँ इस्राएलियों को परोक्ष रूप से डाँटा गया है, इस कारण कि जब उन्हें बाज़ार में दाखमधु और अन्न मिल गया, तब अपनी इच्छाएँ पूरी हो जाने पर वे लापरवाही से अपने पापों में बढ़ते गए, और परमेश्वर को तुच्छ जानने लगे, मानो उन्हें अब उसकी सहायता की कोई आवश्यकता न रही हो। अतः वे दाखमधु और अन्न के लिए एक साथ दौड़ पड़े; अर्थात् जैसे ही उन्होंने दाखमधु या अन्न के विषय में सुना, उन्होंने अपने लिए भोजन-सामग्री जुटा ली, और उसके बाद परमेश्वर की उपेक्षा की। परन्तु यह अर्थ बहुत नीरस और खींचतान का जान पड़ता है। अतः मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता उस इकट्ठे दौड़ने को, जिसकी वह चर्चा करता है, प्रार्थना में सच्चे और निष्कपट ध्यान के विपरीत रखता है; मानो उसने कहा हो, "मुझे अप्रसन्न करने के कारण उन्हें कोई दुःख नहीं होता, यद्यपि वे स्पष्ट प्रमाणों से देखते हैं कि मैं उनसे अप्रसन्न हूँ; यदि उन्हें दाखमधु और अन्न की बहुतायत मिलती रहे, तो वे मेरे अनुग्रह या मेरी अप्रसन्नता की कोई परवाह नहीं करते: इसी से वे सन्तुष्ट हैं, और उनके लिए सब एक ही है कि मैं उनके विरुद्ध हूँ या उन पर कृपालु।" यही भविष्यद्वक्ता का वास्तविक अभिप्राय जान पड़ता है।
परन्तु यह डाँट और अधिक स्पष्ट हो, इसके लिए हमें उस पर ध्यान देना चाहिए जो मसीह सिखाता है, कि हमें पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्य बड़ी विचित्र रीति से व्यवहार करते हैं, जब वे केवल इसी जीवन के लिए चिन्तापूर्वक परिश्रम करते हैं, और केवल अपने लिए भोजन और शरीर की आवश्यकताओं के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसे जुटाने का यत्न करते हैं: हम सदा यहीं से आरम्भ करते हैं; और तौभी यह अत्यन्त अविवेकपूर्ण चिन्ता है, जब हम एक नश्वर जीवन पर इतना ध्यान देते हैं, और इस बीच परमेश्वर के राज्य की उपेक्षा करते हैं। अतः जब मनुष्य इस विकृत भावना के द्वारा धर्म की सारी व्यवस्था को उलट-पुलट कर देते हैं, तो भविष्यद्वक्ता यहाँ दिखाता है कि इस्राएलियों ने सच्चाई से और मन से परमेश्वर की दोहाई नहीं दी, क्योंकि उन्हें केवल दाखमधु और अन्न की चिन्ता थी; क्योंकि भूखे होने के सिवा वे परमेश्वर को तुच्छ जानते थे, और उसे स्वर्ग में चैन से बैठा रहने देते थे: अतः दरिद्रता और अभाव ही उन्हें विवश करते थे। जैसे निर्बुद्धि पशु भूखे होने पर थान की ओर जाते हैं, और प्रभु के द्वारा खिलाए जाने की खोज नहीं करते; वैसे ही इस्राएली भी करते थे, जब उन्हें किसी आवश्यकता का बोध होता था; परन्तु साथ ही वे अपने दाखमधु और अन्न से सन्तुष्ट थे; और उनका कोई दूसरा ईश्वर न था। इसलिए वे ऐसे चिल्लाते थे कि उनका शब्द परमेश्वर तक नहीं पहुँचता था, क्योंकि वे सचमुच सच्चाई से और सीधे उसके पास नहीं जाते थे। अतः भविष्यद्वक्ता यहाँ एक विशेष उदाहरण के द्वारा इस्राएलियों को अधर्मी कपट का दोषी ठहराता है, क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं खोजते थे, परन्तु केवल भोजन पर मन लगाए रहते थे; और यदि पेट भली-भाँति भरा रहे, तो वे परमेश्वर की उपेक्षा करते थे, और उसके अनुग्रह की लालसा नहीं रखते थे, और केवल भरे हुए खत्ते और भरे हुए भण्डार चाहते थे; क्योंकि परमेश्वर के पितृवत् अनुग्रह के बिना भोजन-सामग्री की बहुतायत ही उनकी एकमात्र लालसा थी। इससे पर्याप्त रूप से प्रकट है कि उन्होंने प्रभु की दोहाई नहीं दी। 48 मत्ती 6:33; लूका 12:31। — fj.
यह स्थल ध्यान देने योग्य है; क्योंकि यहाँ हम देखते हैं कि यदि हम दाखमधु और रोटी से आरम्भ करें, और पहले परमेश्वर के राज्य की, अर्थात् उसकी महिमा की, खोज न करें; और यदि हम अपना मन इस बात पर न लगाएँ — कि ऐसे जिएँ कि परमेश्वर हम पर कृपालु रहे, तो हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के सामने दोषपूर्ण हैं। जब हम उसके पास, जो दिव्य आशीष का सोता है, जाते हैं, और केवल यही चाहते हैं कि उन अच्छी वस्तुओं की बहुतायत से, जो उसे देनी हैं, अपना पेट भरें, तब वह हमारी सब प्रार्थनाओं को उचित ही ठुकरा देता है। हम पोपवादियों में यही दशा देखते हैं; जब वे अपनी विनतियाँ प्रस्तुत करते हैं, तब वे पूर्णतः पशुओं के समान होते हैं। वे सचमुच परमेश्वर से वर्षा और सूखे मौसम के लिए गिड़गिड़ाते हैं; परन्तु क्या उनमें परमेश्वर से मेल करने की कोई लालसा है? कदापि नहीं; क्योंकि वे जहाँ तक हो सके उससे सबसे अधिक दूर रहना चाहते हैं: परन्तु जब अभाव और अकाल उन्हें विवश करते हैं, तब वे वर्षा माँगते हैं, — किस प्रयोजन से? केवल इसलिए कि उनके पास रोटी और दाखमधु बहुतायत से हो। अतः हमें अपनी प्रार्थनाओं में उचित क्रम बनाए रखना चाहिए। यदि प्रभु हमें अपने क्रोध के प्रमाण दिखाए, तो हमें पहले उसके अनुग्रह में लौटने का यत्न करना चाहिए, और फिर हमें उसकी महिमा का ध्यान रखना चाहिए, और भक्ति की सच्ची भावना से उसकी खोज करनी चाहिए, कि वह हमारा पिता हो: और तब अपने स्थान पर वे बातें जोड़ी जा सकती हैं जो इस वर्तमान जीवन की दशा और उसकी रक्षा से सम्बन्ध रखती हैं।
हमें उस पर भी ध्यान देना चाहिए जो वह जोड़ता है, उन्होंने मुझसे बलवा किया है। {,}סורsur क्रिया का अर्थ है "हट जाना," और "बलवा करना" भी; और यह दूसरा अर्थ सबसे उपयुक्त है; क्योंकि भविष्यद्वक्ता पहले कह चुका था कि वे परमेश्वर से हट गए या दूर चले गए थे; परन्तु अब ऐसा जान पड़ता है कि वह कुछ और अधिक गम्भीर बात का संकेत करता है, अर्थात् यह कि उन्होंने परमेश्वर से बलवा किया था। इसी प्रकार कपटी लोग, जब घुमावदार मार्ग से परमेश्वर को खोजने का दिखावा करते हैं, तब अपना ही बलवा प्रकट कर देते हैं; क्योंकि वे इस शर्त पर उससे मेल करना नहीं चाहते कि उन्हें अपना जीवन सुधारना होगा, शरीर की अभिलाषाओं को त्यागना होगा, और अपने आपका तथा अपनी भ्रष्ट लालसाओं का इनकार करना होगा। इन बातों की वे कदापि खोज नहीं करते। अतः इससे प्रकट हो जाता है कि वे अपने ही बलवे के, और अपनी प्रार्थनाओं के कपट के भी, साक्षी हैं, उस समय भी जब उनमें भक्ति का कुछ दिखावा होता है। आगे आता है — होशे 7:15
15. यद्यपि मैंने उनकी भुजाओं को बाँधा और बलवन्त किया है, तौभी वे मेरे विरुद्ध बुराई की कल्पना करते हैं।
15. Et ego ligavi, eoboravi brachia ipsorum, et contra me cogitant malum. परमेश्वर फिर इस्राएलियों की निन्दा करता है कि उन्होंने नीचतापूर्वक उसकी भलाई और सहनशीलता का दुरुपयोग किया था। कुछ लोग {,}יסרisar क्रिया का अर्थ "ताड़ना देना" मानते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने इस्राएलियों को अनुशासित किया था; और जैसा मैंने कल कहा था, यह प्रायः इसी अर्थ में लिया जाता है। परन्तु चूँकि इसका अर्थ कभी-कभी "बाँधना" भी होता है, इसलिए यह इस स्थल के लिए अधिक उपयुक्त रूपक जान पड़ता है। मैंने उनकी भुजाओं को बाँधा और बलवन्त किया है; मानो परमेश्वर ने कहा हो कि उसी ने उनकी भुजाओं को निर्बल होने नहीं दिया। क्योंकि हम जानते हैं कि भुजा का बल नसों की बनावट पर निर्भर है। यदि हड्डियाँ नसों के द्वारा एक साथ बँधी न हों, तो तुरन्त ढीलापन और बिखराव आ जाएगा। इसलिए परमेश्वर कहता है, मैंने उनकी भुजाओं को बाँधा और बलवन्त किया है; ये दोनों बातें एक ही उद्देश्य के लिए मिलकर काम करती हैं, और ताड़ना देने का विचार मुझे सन्दर्भ के लिए किसी प्रकार भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता। अभिप्राय यह है कि इस्राएली अब तक इसलिए बने रहे थे, क्योंकि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से उन्हें सम्भाले रखा था। जैसे कोई किसी निर्बल या ढीली पड़ी भुजा को बाँधकर दृढ़ करता है, वैसे ही परमेश्वर यहाँ इस्राएल को स्मरण दिलाता है कि उसी ने उन्हें उनकी स्थिति में बनाए रखा था। और मुझे सन्देह नहीं कि भविष्यद्वक्ता यहाँ उन अनेक विपत्तियों की ओर संकेत करता है जिनसे इस्राएल का बल टूट सकता था, यदि प्रभु ने समय पर उपचार न किया होता।
तो परमेश्वर यहाँ अपनी तुलना एक वैद्य या शल्य-चिकित्सक से करता है, जब वह कहता है कि उसने इस्राएल की भुजा को बाँधा और उसे बलवन्त किया, जबकि वह अन्यथा टूट सकती थी: क्योंकि वे बार-बार मानो निर्बल हो गए थे, परन्तु प्रभु ने उन्हें फिर से स्वस्थ किया। अब हम समझते हैं कि भविष्यद्वक्ता का अभिप्राय यह है कि परमेश्वर ने न केवल अपनी सामर्थ्य से इस्राएलियों को सम्भाला था, वरन् उसने शल्य-चिकित्सक या वैद्य का काम भी किया था, जब उसने उनकी भुजाओं को टूटी हुई देखा, जब वे युद्धों के संहारों से और अन्य विपत्तियों से क्षीण हो गए थे।
अब इस्राएली परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने और उसे स्मरण रखने से इतने दूर थे कि वे उसके विरुद्ध बुराई की युक्ति भी करते थे। क्योंकि विजय पाने के बाद, फिर से सँवारे जाने और सब आशीषों की परिपूर्णता से भर दिए जाने के बाद भी, उन्होंने और अधिक ढिठाई से उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचा; क्योंकि इसी बहाने अन्धविश्वास स्थापित किए गए, और फिर सब दुर्गुणों की खुली छूट आई; क्योंकि घमण्ड, और क्रूरता, और महत्त्वाकांक्षा, और छल, अधिकाधिक प्रबल होते गए। अतः जब इस्राएलियों ने इस प्रकार परमेश्वर की आशीषों को विकृत कर दिया था, तो क्या उनसे क्षमा और उद्धार की आशा उचित ही नहीं छीन ली गई? अब इस स्थल में हमें स्मरण दिलाया जाता है कि जब कभी परमेश्वर हमारी बुराइयों को चंगा करता है, और विपत्ति में हमें उठाता और हमारी सहायता करता है, तब हमें भक्तिपूर्वक उसके अनुग्रह को स्वीकार करना चाहिए, और जब वह इतनी कृपा से हमारी ओर अपना हाथ बढ़ाता है, तब उसके विरुद्ध बुराई की कल्पना नहीं करनी चाहिए। आइए अब आगे चलें — होशे 7:16
16. वे फिरते तो हैं, परन्तु परमप्रधान की ओर नहीं: वे धोखा देनेवाले धनुष के समान हैं: उनके हाकिम अपनी जीभ के क्रोध के कारण तलवार से मारे जाएँगे: मिस्र देश में यही उनका उपहास होगा।
16. Revertentur non Deo: fuerunt tanquam arcus dolosus (vel, doli:) ceciderunt (vel, cadent) in gladio principes eorum a superbia (hoc est, propter superbiam) linguae eorum: hoc eorum ludibrium in terra Aegypti.
भविष्यद्वक्ता फिर इस्राएल की हठीली दुष्टता पर, और उनके छल और विश्वासघात पर भी, प्रहार करता है। इसलिए वह कहता है कि उन्होंने किसी प्रकार के पश्चात्ताप का दिखावा तो किया, परन्तु वह झूठ के सिवा और कुछ न था; क्योंकि वे परमेश्वर की ओर नहीं लौटे। वे फिरते तो हैं, वह कहता है, परन्तु परमेश्वर की ओर नहीं। तौभी कुछ लोग समझते हैं कि {,}עלol एक सम्बन्धसूचक अव्यय है, और कुछ बात अध्याहृत है, मानो यह एक अधूरा वाक्यांश हो: "वे फिरते तो हैं, परन्तु किसी बात के लिए नहीं;" अर्थात्, जब वे फिरते हैं, तब यदि कोई पूछे कि उनके मन में क्या है, या उनका उद्देश्य क्या है, तो वह पाएगा कि यह केवल बाहरी रूप है और कुछ भी वास्तविक नहीं। परन्तु यह व्याख्या, जैसा हम देखते हैं, खींचतान की है। इसके अतिरिक्त, सन्दर्भ यह माँगता है कि हम {,}עלol को परमेश्वर के अर्थ में लें, जैसा यह अन्य स्थानों में भी है; क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है। तब वाक्य यह होगा, वे परमेश्वर की ओर नहीं फिरते।
तो भविष्यद्वक्ता यहाँ घोषित करता है कि इस्राएली पूर्णतः हठीले थे, यहाँ तक कि परमेश्वर उनसे कोई पश्चात्ताप नहीं निकलवा सका; कि जब वे कुछ दिखावा करते थे, तो वह केवल छल होता था, क्योंकि वे सीधे मार्ग से परमेश्वर के पास नहीं आते थे। क्योंकि कपटी लोग, जैसा पहले कहा जा चुका है, जब परमेश्वर का हाथ उन पर भारी पड़ता है, तब सचमुच पहले से भिन्न जान पड़ते हैं, परन्तु वे सदा परमेश्वर से बचते रहते हैं। प्रभु व्यर्थ ही यिर्मयाह के द्वारा प्रजा को अपनी ओर लौटने का उपदेश नहीं देता, 'हे इस्राएल, यदि तू लौटे,' वह कहता है, 'तो मेरी ओर लौट आ,' (यिर्मयाह 4:1।)
क्योंकि वह जानता था कि मनुष्य टेढ़े-मेढ़े घुमावों के द्वारा सदा भटक जाते हैं और सीधे मार्ग पर नहीं बने रहते। यही अभिप्राय है।
फिर भविष्यद्वक्ता जोड़ता है कि वे धोखा देनेवाले धनुष के समान थे। यह पिछले वाक्य की व्याख्या है; और इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि {,}על ol शब्द को परमेश्वर के सिवा और किसी अर्थ में नहीं लिया जा सकता। भविष्यद्वक्ता दिखाता है कि इस्राएली किस प्रकार परमेश्वर से अपने आपको हटा लेते थे, जबकि वे मन फिराते हुए जान पड़ते थे, क्योंकि वह कहता है, वे धोखा देनेवाले धनुष के समान थे। कुछ लोग इसकी व्याख्या "फेंकने या चलाने का धनुष" करते हैं; और निस्सन्देह {,}רמהreme का अर्थ फेंकना और तीर चलाना है; परन्तु यह अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सकता, क्योंकि हम देखते हैं कि भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य यह दिखाना था कि इस्राएली एक भेष धारण करते थे, और जब वे पश्चात्ताप का दिखावा करते थे, तब धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं करते थे। इसकी पुष्टि के लिए वह कहता है कि वे टेढ़े धनुष के समान थे। क्योंकि धनुर्धारी, जब तीर चलाना चाहता है, तो पहले किसी निश्चित निशाने को साधता है; तब तीर उसी स्थान की ओर लक्ष्य किया हुआ जान पड़ता है जिस पर धनुर्धारी अपनी आँखें गड़ाता है। अब यदि धनुष टेढ़ा हो, तो तीर कहीं और उड़ जाएगा; या धनुष फिसल सकता है, यहाँ तक कि तीर लौटकर स्वयं धनुर्धारी पर ही आ पड़े। ऐसी ही उपमा भजन संहिता 78 में मिलती है, जहाँ कहा गया है कि यहूदी 'धोखा देनेवाले धनुष के समान' पीछे मुड़ गए; और उस स्थल में ठीक यही शब्द आता है। परन्तु यहाँ कोई द्विअर्थकता नहीं है; क्योंकि परमेश्वर प्रजा पर यह दोष लगाता है कि वे पीछे मुड़ गए थे; अर्थात् उन्होंने अपनी गति को पीछे की ओर मोड़ दिया था, ठीक धोखा देनेवाले धनुष के समान। यदि कोई "फेंकने का धनुष" या "चलाने का धनुष" पढ़े, तो कोई अर्थ न निकलेगा; वरन् वह फीका और बेतुका होगा। अतः यहाँ इस वाक्यांश का अनुवाद 'धोखा देनेवाला धनुष' करना अधिक अच्छा है।
और हमें इस उपमा के आशय पर ध्यान देना चाहिए, जिसकी ओर मैं पहले ही संकेत कर चुका हूँ, अर्थात् यह कि जैसे धनुर्धारी तीर को निशाने की ओर साधते हैं, जैसे वे एक आँख मूँदकर और सीध बाँधकर उसकी उड़ान को दिशा देते और चलाते हैं; वैसे ही कपटी लोग बड़े प्रयत्न से यत्न करते हुए जान पड़ते हैं, परन्तु साथ ही वे धोखा देनेवाले धनुष हैं; अर्थात् उनका मन पीछे को धकेल दिया जाता है, और वे परमेश्वर से दूर उड़ जाते हैं, और टेढ़े-मेढ़े घुमावों के द्वारा भटक जाते हैं, यहाँ तक कि वे कभी परमेश्वर के पास नहीं आते, वरन् उसकी ओर पीठ फेर लेते हैं।
फिर वह जोड़ता है, उनके हाकिम अपनी जीभ के घमण्ड के कारण तलवार से मारे जाएँगे। भविष्यद्वक्ता फिर इस्राएलियों पर प्रतिशोध की घोषणा करता है, कि उन्हें निश्चय हो जाए कि उनके विनाश के विषय में स्वर्गीय आज्ञा बदली नहीं जा सकती। क्योंकि यद्यपि कपटी लोग सदा भयभीत रहते हैं, और परमेश्वर से किसी बात की आशा नहीं रख सकते, तौभी वे अपनी चापलूसी करना, और सदा कोई नई आशा गढ़ना, कभी नहीं छोड़ते। अतः जब वे व्यर्थ प्रतिज्ञाएँ करने में इतने उदार हैं, तो भविष्यद्वक्ता कहता है कि इस्राएलियों के लिए अपने संकटों में किसी उपचार की आशा रखने का कोई कारण नहीं था। तो उनके हाकिम गिरेंगे: और 'हाकिम' कहकर वह अंश को सम्पूर्ण के लिए लेता है; क्योंकि परमेश्वर हाकिमों को इस प्रकार धमकी नहीं देता, या उन पर विनाश की घोषणा नहीं करता, मानो वह साधारण लोगों को छोड़ देना चाहता हो; परन्तु उसका आशय यह है कि विनाश सब पर समान रूप से आएगा, जिससे हाकिम स्वयं भी न बचेंगे। और हम जानते हैं कि युद्धों में, जब बड़ा संहार होता है, तो साधारण सैनिक बड़ी संख्या में मरे पड़े रहते हैं, और प्रधानों में से थोड़े ही। परन्तु परमेश्वर यहाँ कहता है, "मैं प्रजा का सारा उत्तम भाग उठा ले जाऊँगा। और यदि हाकिमों में से कोई भी शेष न रहेगा, तो उस निम्न साधारण जनसमूह का क्या होगा, जिसे किसी गिनती में नहीं लिया जाता?" तो हाकिम तलवार से मारे जाएँगे।
फिर वह जोड़ता है, अपनी जीभ के घमण्ड के कारण। कुछ लोग इस वाक्यांश की व्याख्या सक्रिय अर्थ में करते हैं, मानो भविष्यद्वक्ता ने कहा हो कि उन्होंने अपनी निन्दाओं और अपवित्र बातों से परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था; परन्तु मैं इसे उनकी ऊँची डींग के अर्थ में लेना अधिक उचित समझता हूँ: अपनी जीभ के घमण्ड के कारण, वह कहता है, वे गिरेंगे; अर्थात्, "क्योंकि उन्होंने अहंकार से अपने बल की डींग मारी, और सब भविष्यद्वाणियों को तुच्छ जाना, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध अपनी निन्दाएँ उगलने का साहस किया, और अपनी अधर्मी और भ्रष्ट उपासना-विधियों का बचाव भी उतने ही हठ से जितने घमण्ड से करने का साहस किया, मैं," वह कहता है, "इस घमण्ड का पलटा लूँगा।" अतः हम देखते हैं कि यहाँ "घमण्ड" को उस तिरस्कार के अर्थ में लेना चाहिए जो अधर्मी अपनी ऊँची डींग के द्वारा प्रकट करते हैं, जैसा अन्यत्र कहा गया है, 'वे अपनी जीभ आकाश तक उठाते हैं,' (भजन संहिता 73:9।) मिस्र देश में यही उनका उपहास होगा। अतः जब इस्राएली उस शापित सन्धि पर भरोसा करके, जो उन्होंने मिस्रियों के साथ की थी, परमेश्वर के विरुद्ध हठीले बने रहे, तो वह कहता है, "मैं उन्हें उनके मित्र-राष्ट्रों के बीच उपहास का पात्र बनाऊँगा: वे मिस्र की शक्ति पर घमण्ड करते हैं: वे अपने आपको हानि की पहुँच से परे समझते हैं, क्योंकि यदि कोई उनका विरोध करे, या कोई शत्रु उन पर आक्रमण करे, तो वे तुरन्त मिस्रियों को अपनी सहायता के लिए बुला सकते हैं। अतः जब उनका भरोसा इस प्रकार मिस्र पर टिका है, तो मैं," वह कहता है, "मिस्रियों से उन्हें तिरस्कार की दृष्टि से दिखवाऊँगा; और वे न केवल उन्हीं के द्वारा अपमानित गिने जाएँगे जो उनसे होड़ या डाह करते हैं, वरन् उन मित्रों के द्वारा भी जिन पर वे घमण्ड करते हैं। मैं उन्हें उनके प्रेमियों के बीच हर प्रकार के अनादर के हवाले कर दूँगा।" वह सचमुच, जैसा हम पहले देख चुके हैं, मिस्रियों की और अश्शूरियों की भी तुलना प्रेमियों से करता है, और अपनी प्रजा की तुलना एक विश्वासघातिनी पत्नी से करता है, जो अपने पति को त्यागकर अपनी पवित्रता को व्यभिचार में बेच देती है। "तू," वह कहता है, "अपने आपको अपने प्रेमियों के हाथ बेचती है, और उन्हें प्रसन्न करने का यत्न करती है, और उन्हें लुभाने के लिए अपने आपको रंगती और सँवारती है: मैं तुझे सिर से पाँव तक हर प्रकार की लज्जा और अपमान से ढाँप दूँगा, यहाँ तक कि तेरे प्रेमी तुझे देखने से भी घृणा करेंगे।" इसी प्रकार इस स्थल में भी वह कहता है कि इस्राएली मिस्र देश में उपहास का पात्र होंगे; अर्थात् वे शत्रु नहीं, जिनसे वे डरते हैं, उनका उपहास करेंगे; परन्तु वे उन्हीं के लिए हँसी का कारण होंगे जिन्हें वे अपना रक्षक समझते हैं, और जिनके हथियारों के द्वारा वे कल्पना करते हैं कि वे हर अपमान से मुक्त रहेंगे। अब आठवाँ अध्याय आता है।
